हमारी कोशिश है एक ऐसी दुनिया में रचने बसने की जहाँ सत्य सबका साझा हो; और सभी इसकी अभिव्यक्ति में मित्रवत होकर सकारात्मक संसार की रचना करें।
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रविवार, 7 जून 2026

प्रयाग में नई पारी

आज एक नई पारी प्रारंभ करने का दिन था। सहारनपुर से वापस होकर एक बार फिरसे प्रिय प्रयागराज में सेवा का अवसर मिला है। इस बार नैनी क्षेत्र में स्थापित प्रोफेसर राजेंद्र सिंह (रज्जू भय्या) विश्वविद्यालय में वित्त अधिकारी के पद की जिम्मेदारी है। साथ ही डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के वित्त नियंत्रक का अतिरिक्त प्रभार भी देखना है।

ज्वाइन करने से पहले संगम क्षेत्र के बड़े हनुमान जी का दर्शन करने का सौभाग्य मिला। शनिवार के दिन दर्शनार्थी भक्तों की अपार भीड़ थी। विश्वविद्यालय के असिस्टेंट प्रोफेसर व हमारे सर गंगानाथ झा छात्रावास के जूनियर डॉ सुशील कुमार सिंह के सहयोग से दर्शन-पूजन निर्विघ्न सम्पन्न हुआ।

अपनी पूर्वाधिकारी से चार्ज लेकर कुलपति जी के समक्ष हम उपस्थित हुए और विश्वविद्यालय की अगणित उपलब्धियों पर चर्चा हुई। आगे के कार्यक्रमों की तैयारी पर भी विचार विमर्श हुआ। शिक्षक संघ के पदाधिकारी भी मिलने आये।








रविवार, 8 अक्टूबर 2017

जी.एस.टी. के भ्रष्टाचारी अवरोध

“साहब, यह काम हो ही नहीं पाएगा।” एक सप्ताह की प्रतीक्षा के बाद पधारे ठेकेदार ने कार्यालय में घुसते ही अपनी असमर्थता जाहिर कर दी।
अरे, आप जैसा होशियार और सक्षम ठेकेदार ऐसी बात कैसे कह सकता है? मैंने तो सुना है आप बहुत बड़े-बड़े ठेके लेकर सरकारी काम कराते रहते हैं। तमाम सरकारी बिल्डिंग्स और दूसरे निर्माण और साज-सज्जा के काम आपकी विशेषज्ञता मानी जाती है।
“वो बात ठीक है, लेकिन अब सरकारी काम करना बड़ा मुश्किल है। इस जी.एस.टी. ने सबकुछ बर्बाद कर दिया है। आप बिना रसीद मांगे कैश पेमेन्ट कर दीजिए तो एक दिन में ही आपका काम करा दूंगा। लेकिन आपको पक्की बिल चाहिए तो कोई तैयार नहीं होगा।” यह सुनकर मेरा सिर चकरा गया। यशवन्त सिन्हा ‘शल्य’ की बातें इसके बाद मीडिया में आयीं तो मेरे कान खड़े हो गये।
अब जी.एस.टी. पर मचे घमासान और छोटे दुकानदारों, व्यापारियों और ठेकेदारों की त्राहि-त्राहि देखकर मन चिन्तित हो गया है। बड़े उद्योगपति शायद ज्यादा परेशान नहीं हैं। उन्हें इस नयी व्यवस्था के साथ तालमेल बिठाने में शायद कोई बड़ी दिक्कत नहीं है। मैं कोई अर्थशास्त्री नहीं हूँ। मुझे इस योजना की बारीक बातों की अच्छी समझ नहीं है। इसलिए इसके पक्ष या विपक्ष में तनकर खड़ा होने के बजाय मैं धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करना चाहूंगा। इस बीच मैंने अपने कार्यालय में बैठकर जी.एस.टी. के प्रभाव का जो रोचक अनुभव किया है उसे साझा कर रहा हूँ।
हुआ ये कि नये शहर के नये कार्यालय में काम शुरू करने पर मुझे कुछ अवस्थापना सुविधाओं को अपने हिसाब से संशोधित परिवर्द्धित करने की आवश्यकता महसूस हुई। कंप्यूटर, इन्टरनेट, कुर्सी, टेबल-ग्लास, स्टेशनरी इत्यादि की व्यवस्था तो थोड़ी-बहुत जद्दोजहद से सुदृढ हो गयी लेकिन मेरे कार्यालय कक्ष से सटे हुए विश्राम-कक्ष को मन-माफ़िक बनाने में मुझे सफलता नहीं मिल रही है। दरअसल एक ही बड़े हाल में स्थित इस कक्ष को कार्यालय से अलग करने के लिए एल्यूमिनियम के ढांचे में काँच या फ़ाइवर की शीट लगाकर दीवार नुमा घेरा बनाया गया है जो अर्द्ध-पारदर्शी है। इस दीवार के जिस ओर प्रकाश अधिक रहता है वह दूसरी ओर से साफ़ दिखायी देता है। अधिक प्रकाशित हिस्से में बैठने वाला दूसरी ओर नहीं देख सकता जबकि उसे दूसरी ओर से देखा जा सकता है। इस प्रकार उत्पन्न असहज स्थिति से बचने के लिए पूरे घेरे पर कपड़े के पर्दे लटकाये गये हैं। लेकिन इन पर्दों पर धूल बहुत जल्दी-जल्दी जमा होती है जिसे साफ़ करते रहना बहुत टेढ़ा काम है। धूल से एलर्जी होने के कारण मुझे इनके संपर्क में आते ही लगातार छींकना पड़ जाता है और नाक से पानी आने लगता है।
धीरे-धीरे मेरे भीतर इन पर्दों के प्रति असहिष्णुता का भाव पैदा हो गया है। पर्दों के स्थान पर मैंने इस काँच की दीवार पर अपारदर्शी वाल-पेपर लगवाने का मन बनाया है लेकिन जी.एस.टी. की व्यवस्था ऐसा होने नहीं दे रही है। ठेकेदार कह रहा है कि कोई भी दुकानदार वाल-पेपर की बिक्री ‘एक-नम्बर’ में करने को तैयार नहीं है। अर्थात वह इस बिक्री को अपने लेखा-बही में प्रदर्शित नहीं करना चाहता क्योंकि इसके लिए जरूरी पंजीकरण कराने व ऑनलाइन टैक्स जमा करने की प्रक्रिया से वह जुड़ा ही नहीं है। उसके पास जो माल है वह भी बिना रसीद के ही खरीदा गया है। इसलिए उसे इसपर कोई इनपुट टैक्स-क्रेडिट नहीं मिलने वाला। उसने बताया कि इस प्रकार के बहुत से काम हैं जो पूरी तरह कैश लेन-देन पर ही चलते हैं जो अब जी.एस.टी. के बाद अवैध हो गये हैं। अब कोई ठेकेदार भी उन सामानों को नगद खरीदकर सप्लाई नहीं कर सकता क्योंकि वह अपने लेखे में इसकी खरीद दिखाये बिना इसकी बिक्री या आपूर्ति को जायज नहीं ठहरा सकता।
इस बात से मुझे व्यापारिक गतिविधियों में निचले स्तर पर होने वाली बड़े पैमाने की टैक्स-चोरी की एक झलक दिखायी दे गयी जिसपर लगाम लगाने का ठोस उपाय शायद इस जी.एस.टी. में ढूँढ लिया गया लगता है। यह उपाय कुछ वैसा ही है जैसा नोटबन्दी और डिजिटल लेन-देन के माध्यम से कालेधन पर लगाम लगाने का उपाय किया गया था और जिसे अब प्रायः असफ़ल मान लिया गया है। जिनके पास अघोषित आय का नगद धन मौजूद था वे इसे बचाने के लिए किसी न किसी प्रकार इसे अपने या दूसरों के बैंक खातों में जमा कराने में सफ़ल हो गये। नोटबन्दी के राजमार्ग के किनारे जो चालू खाते, पेट्रोल-पम्प, विद्युत-देय, अन्य शुल्क-टैक्स आदि जमा करने के काउन्टर और दो लाख की सीमा वाली छूट के सर्विस-लेन बना दिये गये थे उसपर जोरदार ट्रैफ़िक चल पड़ी और अधिकांश कालाधन बैंकों में जाकर मुख्यधारा में शामिल हुआ और सफ़ेद हो गया। ऐसे बिरले ही मूर्ख और गये-गुजरे धनपशु होंगे जो अपना पुराना नगद नोट बदलकर नया नहीं कर पाये होंगे। नोटबन्दी की आलोचना करने वाले भी यह नहीं कह पा रहे थे कि इसने आयकर की चोरी पर लगाम लगाकर अच्छा नहीं किया।

साभार : http://news24online.com/know-why-implementing-gst-is-still-a-long-road-ahead-2/

ऐसे में यह निष्कर्ष निकलता है कि भ्रष्टाचार मिटाने और शुचिता बढ़ाने की अच्छी से अच्छी योजना भी क्रियान्वयन के स्तर पर जाकर उसी भ्रष्टाचार और बेईमानी की भेंट चढ़ जाती है जिसे यह रोकने चली थी। उल्टे उसमें छोटे व गरीब वर्ग का जीवन-यापन बुरी तरह प्रभावित हो जाता है। दिहाड़ी मजदूर या कामगार तो दिन में जो कमाता है वही रात में खाता है। यदि किसी दिन उसका काम रुक गया तो शाम को फ़ांके की नौबत आ जाती है। यही हाल छोटे व्यापारियों और दुकानदारों का जी.एस.टी. के लागू होने के बाद हो गया लगता है। वे साफ़-साफ़ यह तो कह नहीं सकते कि अबतक उनका धन्धा टैक्स की चोरी के कारण चोखा हुआ करता था जो चोरी अब मुश्किल हो गयी है, लेकिन नयी व्यवस्था से उपजे दर्द को वे दूसरे तरीकों से व्यक्त तो कर ही रहे हैं।
हमारे समाज में भ्रष्टाचार का रोग इतना सर्वव्यापी हो गया है कि इसे बुरी चीज बताने वाले भी अवसर मिलते ही इसका अवगाहन करने में तनिक देर नहीं लगाते। जबतक हम केवल दूसरों से ईमानदारी और सत्यनिष्ठा की अपेक्षा करते रहेंगे और स्वयं मनसा-वाचा-कर्मणा इसके लाभ उठाने को उद्यत रहेंगे तबतक हम किसी नोटबन्दी, जी.एस.टी. या अन्य कड़े उपायों से भी अपेक्षित फ़ल की प्राप्ति नहीं कर सकते।
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

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सोमवार, 16 मई 2016

पेंशन तो देना बनता है...!

शत्रुघ्न सिंह चौहान गुजरात राज्य सरकार के सिंचाई विभाग में नौकरी करते थे। उनकी 1976 में छंटनी हो गयी। फिर किसी सरकारी निगम में पुनः सेवायोजित होकर 1991 में सेवानिवृत्त हुए। सरकार इन्हें पेंशन मंजूर करती इसके पहले ही 08 अगस्त 1992 को मृत्यु हो गयी। उनकी विधवा पत्नी अपने पुत्र के साथ गुजरात से अपने गाँव मूल निवास स्थान रायबरेली वापस आ गयी। विभाग ने पति की मृत्यु के बाद 1994 में पेंशन स्वीकृत भी की तो उसमें पत्नी के नाम पारिवारिक पेंशन नदारद थी। पति के जीवनकालीन पेंशन का भुगतान 1994 में ही पत्नी और पुत्र को बराबर-बराबर करने के बाद कोषागार ने पत्रावली बंद कर दाखिल दफ़्तर कर दी।
अब 22 साल बाद गुजरात सरकार ने पारिवारिक पेंशन स्वीकृत कर आदेश ए.जी. के माध्यम से कोषागार रायबरेली को भेज दिया है जिसमें पिछले आदेश का सन्दर्भ देते हुए उसके आगे का भुगतान एरियर सहित करने का प्राधिकार दिया गया है। इधर बाइस साल से बंद हुई फ़ाइल मिल नहीं रही है और न ही उसका किसी इंडेक्स रजिस्टर में कोई उल्लेख मिल रहा है। ऑफिस का लगभग पूरा स्टाफ इसकी तलाश के लिए एक-एक इंच खंगाल चुका है। उस समय जिस लेखाकार ने अंतिम भुगतान किया था वे सेवानिवृत्त होकर हाल ही में स्वर्गीय हो चुके हैं। उनका हस्ताक्षर पेंशनर द्वारा दिखाई जा रही उसके पास सुरक्षित पुरानी कॉपी में दिख रहा है।
अस्सी की उम्र पार कर चुकी अपनी माँ की पेंशन के लिए अहर्निष भाग-दौड़ कर रहे रामहर्ष जी ने बताया कि गुजरात के सैकड़ों चक्कर लगाने के बाद भी जब विभाग ने अम्मा की पेंशन नहीं दी तो मैं तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से उनके जनता दरबार में मिला। उन्होंने पूरी बात सुनने के बाद जाँच बैठा दी। जाँच में पता चला कि कर्मचारी द्वारा भरे गए पेंशन प्रपत्र में पत्नी का नाम मौजूद होने के बावजूद विभाग द्वारा उनके नाम से पारिवारिक पेंशन स्वीकृत नहीं की गयी थी। इस चूक के लिए जिम्मेदार कर्मचारी और उसका उच्चाधिकारी दोनो निलंबित कर दिये गये हैं। उनकी बहाली तबतक नहीं हो सकेगी जबतक वे यह प्रमाणपत्र न प्रस्तुत कर दें कि पीड़ित विधवा को समस्त बकाया पेंशन का भुगतान कर दिया गया है। रामहर्ष ने कहा कि मुझे अपनी माँ की पेंशन से ज्यादा उन दो परिवारों की फिक्र हो रही है जहाँ कई महीनों से वेतन नहीं जा रहा है।
अब मुझे कार्यालय के पुराने अभिलेख की अनुपलब्धता की स्थिति में भी यह भुगतान ताजे प्राधिकार पत्र के आधार पर करना है। मुझे इतने लंबे संघर्ष की कहानी झूठी नहीं लग रही है। भगवान का नाम लेकर विश्वास करने का जी चाहता है।
अस्तु, मैंने आज यह निर्णय सुनाया कि आप अपनी माँ को लेकर आइए, वैयक्तिक पहचान दो पक्के गवाहों (पेंशनर) के माध्यम से कराइए और यह पूरी कहानी एक शपथ-पत्र के माध्यम से प्रस्तुत कराइए। बैंक खाते का विवरण भी साथ लाइए ताकि भुगतान की कार्यवाही पूरी कर प्रमाणपत्र निर्गत किया जा सके।
अब आगे जो होगा देखा जाएगा।
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
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शुक्रवार, 13 मई 2016

रायबरेली के लोक उद्यम भी बदहाल हैं...

साइकिल_से_सैर
आज तीन दिन के ब्रेक के बाद जब साइकिल से सैर की बारी आयी तो बाहर निकलने पर ध्यान आया कि आज मंगलवार है, बजरंग बली का दिन जिनके नाम भक्तगण मंगल व्रत रखते हैं और आज मंदिरों में विशेष पूजा और दर्शन की भीड़ रहती है। मैंने भी छात्र-जीवन में पूरी पाबन्दी से हनुमान जी का व्रत किया है। अभी भी नित्य पूजा की शुरुआत हनुमत वंदन से ही करता हूँ। अस्तु मैंने साइकिल का रुख उस और मोड़ दिया जिधर रायबरेली का सबसे प्रसिद्ध हनुमान मंदिर है।
गोरा बाजार चौराहे से फिरोज गांधी नगर की सड़क पर आगे बढ़ा तो मेरे बगल से एक स्कूल-बस धूल उड़ाते हुए गुजरी। नाक में धूल न घुसे इसलिए मैंने थोड़ी देर साँस खींचना स्थगित कर दिया। लेकिन कितनी देर? धूल का गुबार बैठने से पहले ही साँस लेनी पड़ी। बस आगे जाकर रुकी और बच्चों को बैठाने लगी। मैंने सोचा इसके आगे निकल जाऊँ तभी धूल की नई किश्त थमाते हुई बस फिर चल पड़ी। तीन बार रुक-रुककर इसने बच्चे बैठाये और मुझे धूल से नहलाती रही। चौथी बार रुकी तो मैंने अपनी गति बढ़ाकर इसे पार कर लेने में सफलता पा ली। तबतक सड़क परिवर्तित होकर गली बन चुकी थी यानि बस की धूल से छुटकारा मिल चुका था। लेकिन तभी एक घर का दरवाजा खुला और अंदर से झाड़ू लगाते आते लड़के ने घर का सारा बहारन सींक वाली झाड़ू के जोर से सड़क की ओर उछाल दिया। गनीमत है कि मैं उस कूड़े की बौछार का सीधा निशाना नहीं बना। सिर्फ कुछ धूल ही मेरे हिस्से में आयी। इसके आगे कई दरवाजों से झाड़ू लगाते धूल उड़ाते पुरुष या स्त्रियां दिखीं जिन्हें पीछे छोड़ मैं सुल्तानपुर जाने वाले हाइवे पर निकल आया।
रेलवे क्रासिंग पर पहुँचते-पहुँचते मुझे चार-पाँच भारी भरकम ट्रकों ने पार किया। मैं सोच ही रहा था कि हनुमान जी के कारण मुझे आज धूल-प्रधान सैर करनी पड़ रही है तभी क्रासिंग का बैरियर गिर गया और सभी ट्रकें खड़ी हो गयीं। मैंने साइकिल झुकाकर बैरियर पार किया और दोनों ओर खड़ी बड़ी गाड़ियों को टाटा बॉय बॉय करते हुए साइकिल भवानी पेपर मिल की ओर जाने वाली सड़क पर मोड़ ली जिसके प्रांगण में काले संगमरमर वाले हनुमान जी का मंदिर है।
इस सड़क की एक ओर डेढ़-दो साल से बंद पड़ी पेपर मिल है तो दूसरी ओर दसियों साल पहले बंद हो चुकी आईटीआई का विशाल प्रांगण है। टेलीफोन बनाने वाली यह पब्लिक सेक्टर कंपनी जिस रूप में यहाँ पड़ी हुई है वह सरकारी नौकरशाही के हाथों में उद्योग-धंधों का क्या हश्र होता है इसका जीता-जागता नमूना है। यहाँ करदाता के पैसे से जुटायी गयी भारी पूंजी का निवेश करने के बाद उत्पादन को बाजार की मांग के अनुसार बनाये रखने तथा कंपनी को लाभ दिलाने का लक्ष्य प्रायः किसी के मन को प्रेरित नहीं करता। संचार क्रांति के इस युग में इसी सेक्टर से जुड़ी इतनी बड़ी कंपनी पर यूँ ताला लग जाना यह बताता है कि सरकारी क्षेत्र में भ्रष्टाचार और अकर्मण्यता किस स्तर तक व्याप्त है और उत्तरदायित्व की भावना किस हद तक नदारद है। अलबत्ता यहाँ मजदूर संघ का ऑफिस (INTUC) अभी भी विद्यमान है जो कर्मचारियों के वेतन भत्तों के लिए धरना आदि देता रहता है, लेकिन कम्पनी को दुबारा चलाने की दिशा में कोई ठोस प्रयास किसी भी स्तर पर नहीं दिखायी देता।
आईटीआई का विस्तृत प्रांगण खूब हरा-भरा है जिसमें नीम, पीपल, जामुन, आम आदि के विशाल पेड़ हैं। ऊँची चारदीवारी से घिरे कारखाने के आसपास कर्मचारियों की आवासीय कॉलोनी भी है जिसे दूरभाष नगर कहा जाता है। मैं पेपर मिल के गेट से आगे बढ़कर अगले मोड़ तक पहुंचा तो दायें बायें कुछ गरीब परिवारों के कच्चे मकान दिखे जिनके बाहर स्त्रियां सरकारी नल पर कपड़ा धुल रही थीं और प्लास्टिक के डिब्बों में पानी भर रही थीं। बगल में ही एक बच्चा शौचकर्म में लिप्त था जो दूसरे बच्चों को साइकिल के पुराने टायर से खेलते हुए देख रहा था। नुक्कड़ के दूसरी ओर चाय की दुकान पर दूध उबल रहा था। मुझे एकबारगी मक्खियों से बात करने वाली विद्या बालन जी की याद आ गयी और भारत सरकार की ओडीएफ गाँव (Open Defecation Free Village) की महत्वाकांक्षी परिकल्पना पर तरस भी आने लगी। मैं वहीं से लौट आया।
वापसी करते हुए मैंने साइकिल रोककर मंदिर के सामने जाकर हनुमान जी को प्रणाम निवेदित किया। बिना स्नान किये अंदर जाकर दर्शन करना ठीक नहीं था। इसके बाद मैंने बंद पड़ी पेपर मिल के अलावा भारत सरकार के दो अन्य संस्थानों की भी तस्वीरें लीं जो आईटीआई के अनुपयोगी भवनों को किराये पर लेकर चलाये जा रहे हैं। इनमें एक है राष्ट्रीय औषधि अनुसंधान व शिक्षण संस्थान (National Institute of Pharmaceutical Education and Research) और दूसरा है राष्ट्रीय दुर्घटना अनुसन्धान व विश्लेषण संस्थान (National Centre for Vehicle Research and Safety-Accident Data Analysis Centre.)
रायबरेली में इतने महत्वपूर्ण संस्थानों की उपस्थिति के बारे में मुझे आज से पहले पता ही नहीं था। यहीं एक चौकीदार ने बताया कि राजीव गांधी पेट्रोलियम रिसर्च इंस्टिट्यूट भी आईटीआई के भवन में ही किराया देकर चल रहा है। लगता है इन सब के बारे में विस्तार से जानने के लिए मुझे कई बार इधर आना चाहिए। लेकिन भारी वाहनों से उड़ती-पड़ती रास्ते की धूल का क्या करूँ? लौटते हुए चेहरे पर रूमाल बांधकर आ तो गया लेकिन साइकिल से सैर का असली उद्देश्य तो साफ-सुथरी ऑक्सीजन वाली हवा में साँस लेते हुए शारीरिक व्यायाम करना है न!
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
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शुक्रवार, 6 मई 2016

विस्मृति का शिकार मुंशीगंज शहीद स्मारक


6 मई, 2016
शहीद स्मारक स्थल मुंशीगंज,रायबरेली
‪#‎साइकिल_से_सैर‬
आज की सुबह का मौसम क्या मस्त था। आसमान में छुट्टा बादलों की आवाजाही और पुरवाई के वेग को रोकती-टोकती पछुवा हवा बारिश की संभावना बताती हुई भी सैर पर निकलने वालों को डरा नहीं रही थी। घर से बाहर निकलते ही महसूस हुआ कि वातावरण में ऑक्सीजन की मात्रा रोज से ज्यादा है। साइकिल पर बैठते ही ठंडी हवा का ताजा झोंका चेहरे पर पड़ा जो किसी भी ए.सी. की बयार को लज्जित करने वाला था। अभी चार दिन पहले तक प्रचंड गर्मी थी, यही प्रकृति झुलसाए डाल रही थी और आज है कि सबकुछ सुहाना लगने लगा है। बुन्देलखण्ड से आ रही खबरों की सोचें तो हम खुद को कितना भाग्यशाली पाते हैं।

आज हम जेलरोड से क्षेत्रीय ग्राम्य विकास संस्थान वाले रास्ते पर मुड़कर सई नदी की ओर चले गए। यहाँ नदी पर एक बहुत पुराने ध्वस्त हो चुके पुल के पायों के ऊपर लोहे का पैदल पुल बनाया गया है। इस पगडंडी-नुमा पुल पर लोगों की अच्छी आवाजाही दिख रही थी। मैंने भी साइकिल खड़ी करके ताला लगा दिया और लोहे की सीढ़िया उतरकर नदी के ठीक ऊपर आ गया। वैसे आजकल सई का जो हाल है इसे नदी नहीं कहा जा सकता। जलकुम्भी, खर-पतवार, शहर के मंदिरों का कूड़ा और भारी गर्मी से सूखती जलधारा के कारण यह एक गंदे नाले का रूप ले चुकी है। इसके बावजूद पुल के नीचे जमा पानी में दर्जनों धोबी कपड़ा धुलते दिखायी दिए। अनेक खाली पाट अपने धोबी का इंतजार कर रहे थे। इस गन्दे पानी से कपड़े साफ कैसे हो जाते हैं यह मेरे लिए एक पहेली ही है। हालांकि मैंने यह कहावत जरूर सुनी है कि कीचड़ से कीचड़ धुलता है।

इस पैदल पुल का दूसरा सिरा प्रसिद्ध 'मुंशीगंज शहीद स्मारक' के प्रांगण में खुलता है। वहाँ पहुँचा तो बहुत से नर-नारी इस विशाल परिसर में अपनी सेहत की देखभाल करते दिखे। यहाँ दूसरे लड़के-लड़कियाँ भी थे जो अपने तरीके से बढ़िया मौसम का लुत्फ़ उठा रहे थे। एक छोटा बच्चा एक पोटली में कच्चे आम (टिकोरा) लिए जा रहा था जिसे तीन-चार लड़के घेरकर अमिया के लिए फँसाने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन वह भी एक चंट था। पोटली पर अपनी पकड़ ढीली न होने दी।

स्वतंत्रता संग्राम में रायबरेली जिले के अमर शहीदों के सम्मान में यह स्मारक बनाया गया था। यहाँ हर साल 7 जनवरी को एक बड़ा कार्यक्रम भी होता है। यहाँ स्मारक स्तम्भ के अलावा भारत माता मंदिर भी है जिसके चौड़े बरामदे में व्यायाम करते युवक इसकी अलग उपादेयता बता रहे थे। स्मारक स्तम्भ पर लगे संगमरमर पर खुदाई करके यहाँ का इतिहास बताया गया है, कुछ शहीदों के नाम लिखे गए हैं और प्रमुख घटनास्थलों को मानचित्र बनाकर दिखाया गया है।

इस परिसर को सुरम्य बनाने के लिए कभी उद्यान विकसित करने की कोशिश की गयी लगती है; लेकिन वर्तमान में सैकड़ो पौधे पानी के अभाव में सूख गए हैं। पगडंडियों को पक्का कर दिया गया है लेकिन सफाई और देखभाल करने की जिम्मेदारी शायद आम जनता के भरोसे ही है। तभी तो 'स्वागत कक्ष' और 'शहीद कला वीथिका' को कबाड़ घर बन जाना पड़ा है, स्वागत द्वार पर खड़े दोनो सफ़ेद घोड़ों की एक-एक टांग काट ली गयी है और दूसरी मूर्तियों पर से सजावटी पत्थरों को उखाड़ लिया गया है। 
शहीद स्तम्भ पर उकेरी गयी सूचनाओं के बीच अनेक उत्साही प्रेमियों ने अपने सन्देश खोद डाले हैं। मैं समझ नहीं पाता कि दिल के आरपार एक नुकीला-कटीला तीर घुस जाने के बावजूद वह धड़कता कैसे है; इजहारे-मोहब्बत करने लायक बचा कैसे रहता है।

यह सब देखकर मन का आनंद थोड़ा कम होने लगा तो मैंने वापस पुल की ओर लौटना मुनासिब समझा। इसी पुल पर 7 जनवरी 1921 को अंग्रेजी शासन के विरुद्ध किसानों ने मोर्चा लिया था जिनपर अंधाधुंध गोलियां बरसायी गयीं थी। सैकड़ों जाने गयीं जिनके खून से सई नदी का पानी लाल हो गया था। अंग्रेज़ो ने स्वातंत्र्य वीरों को रोकने के लिए शायद तभी इस पुल को तोप से उड़ा दिया होगा।
खैर, वापस साइकिल पर चढ़कर हम शहर की ओर लौट आये। हर तरफ टहल कर वापस लौटने वालों के अलावा स्कूल जाते बच्चे, उन्हें पहुँचाने जाते माता-पिता, भाई-बहन, बुआ-चाचा-चाची, ताऊ-ताई, दादा-दादी, रिक्शे वाले आदि और उन्हें पढ़ाने जाते अध्यापक-अध्यापिकाएँ दिखायी दे रहे थे। हम जेल रोड से फिरोज गांधी चौराहा होते हुए कलेक्ट्रेट के बगल से बरगद चौराहा क्रासिंग तक गए लेकिन हाइवे से बचने के लिए वापस नेहरू नगर और इंदिरानगर के बीच वाली सड़क से जेलरोड पर वापस आ गए।

घर पहुंचने के लिए मामा चौराहे की ओर जाते हुए एक साइनबोर्ड देखकर मैं रुक गया। लिखा था- "वातानुकूलित, मॉडल शॉप, बैठकर पीने की उचित व्यवस्था"। वाह, क्या बात है। इससे पहले कि आप कुछ ऐसा-वैसा सोचें, मैं यहाँ स्पष्ट कर दूँ कि मैं रुका था सिर्फ फ़ोटो लेने के लिए। पडोसी राज्य बिहार को देखकर यूपी वाले श्रेष्ठता बोध की खुशफहमी पाले रहते थे, लेकिन अब तो यह मंजर है कि आइना भी चिढ़ा रहा है।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी) 

गुरुवार, 26 फ़रवरी 2015

अहा ! फरवरी कितनी प्यारी। (गीत)

अहा ! फरवरी कितनी प्यारी।
कड़ी ठण्ड से पीछा छूटा
सर्दी से गठ बंधन टूटा
अब अलाव है नहीं जरूरी
दूर हुई सबकी मज़बूरी
बच्चे अब भरते किलकारी
अहा ! फरवरी कितनी प्यारी।1।
बिस्तर से हट गयी रजाई
हीटर की हो गयी विदाई
कम्बल भी बक्से में सोया
सबने ऊनी स्वेटर धोया
अब सूती कपड़ों की बारी
अहा ! फरवरी कितनी प्यारी।2।
एक सूट खबरों में आया
लाखों जिसका दाम बताया
मचा मीडिया में कोहराम
फिर वो सूट हुआ नीलाम
दाम करोड़ों दें व्यापारी
अहा ! फरवरी कितनी प्यारी।3।
अच्छे दिन वाली सरकार
भरने लगी विजय हुंकार
आम आदमी ने रथ रोका
दिल्ली की जनता ने टोका
दम्भ पड़ गया इसको भारी
अहा ! फरवरी कितनी प्यारी।4।
बढ़ा शादियों का भी जोर
विकट बराती हैं चहुँ ओर
फागुन की मस्ती में झूमें
चाहें नर्तकियों को चूमें
लठ्ठम लठ्ठा गोली बारी
अहा ! फरवरी कितनी प्यारी।5।
बोर्ड परीक्षा शुरू हुई है
शुचिता जिसकी छुई मुई है
अजब नकलची गजब निरीक्षक
सॉल्वर बन बैठे हैं शिक्षक
दस्ता सचल करे बटमारी
अहा ! फरवरी कितनी प्यारी।6।
राजनीति में फँसा बिहार
लालू जी की टपकी लार
संख्या बल में इतनी खूबी
माझी की ही नैया डूबी
फिर नितीश को मिली सवारी
अहा ! फरवरी कितनी प्यारी।7।
संसद में घिरती सरकार
भूमि अधिग्रहण को तैयार
अन्ना जी फिर मंचासीन
धरना में फिर सीएम लीन
छुट्टी पर बेटा-महतारी
अहा ! फरवरी कितनी प्यारी।8।
क्रिकेट कुम्भ आरम्भ हुआ है
सौ करोड़ की यही दुआ है
टीम इंडिया रख ले लाज
बिश्व विजेता हो अंदाज
दिखती है अच्छी तैयारी
अहा ! फरवरी कितनी प्यारी।9।
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी) www.satyarthmitra.com

सोमवार, 22 दिसंबर 2014

फासले बढ़ रहे जिंदगी में (तरही ग़जल)

(बह्‍र : फाइलुन फाइलुन फाइलुन फ‍अ)

फासले बढ़ रहे जिंदगी में
दूरियाँ हो गयीं आदमी में

चल पड़े हैं कहीं से कहीं हम 
ज़ानेजाँ बस तिरी आशिक़ी में

इश्क में डूबने की न पूछो
हुस्न देखा किया चाँदनी में

फूल भी, ख़ार भी मोतबर हैं
हुस्न पोशीदा है हर किसी में

नाज़-नख़रे उठाये बहुत से
फ़र्क़ आया नहीं बेरुख़ी में

बेख़ुदी में सनम उठ गए हैं
ये क़दम अब तिरी आशिक़ी में

काम था तो बड़ा मुख़्तसर ही
हो न पाया मगर काहिली में

आदमी आम कहता था खु़द को
सादगी तो न थी सादगी में

या इलाही बचा पाक दामन
जिस्म को घूरती देहलवी में

तू सितमगर अगर हो गया तो
ख़ुद भी तड़पेगा बेचारगी में

वाह रे जिंदगी की कहानी
तिश्‍नगी ही बची ज़िन्दगी में

हर किसी को बराबर न समझो
फर्क है आदमी आदमी में

शायरी में सितम है रुबाई
बह्‍र में या बधें हथकड़ी में

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
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शनिवार, 15 नवंबर 2014

जिन्दगी अपनी बनाते हैं बनाने वाले (तरही ग़जल)

उस्ताद ने इस बार जब मिसरा दिया था तो मैं उपस्थित नहीं था। किसी और ने जब फोन पर बताकर नोट कराया तो इसकी बहर गलत समझ ली गयी और पूरी ग़जल गलत बहर में कह दी गयी। बाद में ऐन वक्त पर नशिस्त से पहले गलती का पता चला तो काट-छांट करके और कुछ मलहम पट्टी लगाकर शेर खड़े किये गये। अब यहाँ ब्लॉग पर तो अपनी मिल्कियत है। सो इस अनगढ़ को भी ठेल देता हूँ। साथ में एक कठिन बहर की रुबाई भी बनाने को दी गयी थी जिसे मैंने डरते-डरते आजमाया। 

रुबाई

हरगिज न करूँ कभी कहीं ऊल जुलूल
अब बाँध लिया गिरह तिरा पाक उसूल
हर रोज किया करूँ मैं सजदा तेरा
कर ले तू खुदा मेरी इबादत को कुबूल

ग़जल

बदगुमाँ होते हैं क्यूँ हार के जाने वाले
जिंदगी अपनी बनाते हैं बनाने वाले

मत करें प्यार का इजहार गरज़मंदी में
बेगरज़ होके रहें प्यार जताने वाले

गुल खिलाती है हवा धूप की गर्मी लेकर
प्यार के जश्न हुए दिल को खिलाने वाले

प्यार गहरा हो तो बढ़ जाती है ताकत दिल की
साहसी होते बहुत दिल से निभाने वाले

चूम लेने का हुनर आया अदा में कुछ यूँ
लब बिना बोले बहुत कुछ हैं बताने वाले

प्यार के रंग बने जैसे कि ये शेरो सुखन
यकबयक बनते नहीं बनने बनाने वाले

एक मुस्कान से शुरुआत भली होती है
प्यार की राह यही लब हैं बताने वाले

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

सत्यार्थमित्र
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रविवार, 26 अक्टूबर 2014

मोदी-चाय है कि बवाल की दावत…

namochayमीडिया के लिए मोदी की चाय पार्टी से सोशल मीडिया में जो हलचल मची है वह प्याले में तूफान की उक्ति चरितार्थ करती है। प्रिन्ट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की प्रायः सभी बड़ी हस्तियाँ जो देश की राजधानी में कार्यरत हैं उन्हें नरेन्द्र मोदी ने आदर सहित बुलाया, दीपावली की शुभकामनाएँ दीं और स्वच्छ भारत अभियान में उनके सहयोग के लिए धन्यवाद दिया। देश के सबसे लोकप्रिय राजनेता के पास पहुँच जाने के बाद कुछ लोगों में यह सहज इच्छा पैदा हो गयी कि उनके साथ तस्वीरें खिचवा ली जाय।

मोबाइल फोन में कैमरे की सुविधा ने तो यह हाल कर दिया है कि हमें राह चलते कोई सुन्दर सा कुत्ता भी दिख जाय तो उसके साथ सेल्फ़ी क्लिक करने लगते हैं और तुरन्त देश भर के मित्रों को फेसबुक और व्हाट्सएप के माध्यम से दिखाने लगते हैं। तो फिर पूरी दुनिया में अपने किस्म की अकेली शख्सियत को देखकर किस चुगद का मन सेल्फ़ी खिंचाने के लिए नहीं ललचा जाएगा। अलबत्ता कुछ स्वनामधन्य ऐसे लोग भी हैं जिन्हें मोदी नाम से ही सख्त नफ़रत है। इन्हें भारतीय लोकतंत्र के किसी भी मूल्य से बड़ा लगता है अपने पूर्वाग्रहों की हर हाल में रक्षा करना।

इस चाय-पार्टी से प्रेस की स्वतंत्रता पर आँच आने की चिन्ता में घुलते तमाम मित्रों के स्टेटस देखकर मैं दंग रह गया। भड़ास4मीडिया पोर्टल पर प्रचुर सामग्री जमा हो चुकी है। कुछ देर के लिए सामान्य शिष्टाचार तो हम अपने दुश्मन के साथ भी निभा लेते हैं। यहाँ तो देश के सर्वोच्च जनप्रतिनिधि ने आदर व सम्मान से बुला रखा था। अब इसे जो लोग उत्कोच समझने कॊ मनोवृत्ति रखते हैं वे निश्चित रूप से यह भी समझते होंगे कि पत्रकार समुदाय में ऐसे लोग भरे पड़े हैं जो थोड़ा सा प्रलोभन सामने आते ही उसओर झपट पड़ेंगे और अपने स्वार्थ के आगे जनहित का ख्याल छोड़ देंगे। namochay.2jpg

भगवान न करे यह बात सच हो; लेकिन यदि इस बात में लेश मात्र भी सच्चाई है कि मीडिया वाले भी मात्र अर्थोपार्जन के उद्देश्य से ही काम कर रहे हैं और ‘मिशन’ वाला हिस्सा पीछे छूट चुका है तो इसके लिए सिर्फ़ उस चाय-पार्टी में सम्मिलित होने को दोष देकर छुटकारा नहीं मिलने वाला। फिर तो पत्रकार बन्धुओं द्वारा गुजारी गयी हर शाम पर निगाह रखनी होगी जिसमें दस-पाँच रूपये की टुच्ची चाय नहीं बल्कि एक से एक उम्दा ब्रैंड की देशी-विदेशी मदिरा और फाइव-स्टार डिनर पार्टी भी आसानी से उपलब्ध है। प्रोफेशनलिज्म की मांग तो यह है कि अपनी स्टोरी को विश्वसनीय बनाने के लिए और अन्दर की सच्ची खबर बाहर लाने के लिए चाहे जिस भी रूप में अन्दर जाना पड़े, चले जाना चाहिए। घोटालेबाज के साथ मक्कारी का खेल खेलकर भी सच्चाई बाहर निकल आये तो ऐसी मक्कारी करने में कोई हर्ज़ नहीं। स्टिंग ऑपरेशन इसे ही तो कहते हैं।

namochay.1jpgलेकिन जो लोग नरेन्द्र मोदी का नाम लेते ही उल्टियाँ महसूस करने लगते हैं, सारी तर्कशक्ति मिथ्या प्रलाप में लगा देते हैं और हास्यास्पद होने की सीमातक प्रतिकार की भाषा बोलने लगते हैं उनका रोग बहुत भयानक और असाध्य है। कोई एक दशक पहले लगा आघात इनके मन मस्तिष्क पर जो निशान छोड़ गया उससे मानो इनमें बदलते समय के साथ आगे बढ़ने की क्षमता ही जाती रही। स्थिति यह हो गयी है कि अब ये “पाप से घृणा करो पापी से नहीं” वाले सन्देश को उल्टा समझते हैं। यानि- वे पाप से भले ही घृणा न करें लेकिन पापी से घूणा करने का दिखावा जरूर करेंगे। अगर वे वास्तव में पाप से घृणा कर रहे होते तो ऐसे पाप की लंबी फेहरिश्त से जुड़े सभी पापियों से समान दूरी बनाकर चलते। लेकिन तमाम दलों में विविध रूप लेकर बैठे इसी प्रकार का पाप कर चुके लोगों की गोद में बैठकर अपना उल्लू सीधा करते रहने में इन्हें कोई शर्म नहीं आती।

लोकसभा चुनाव से पहले और बाद में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के चर्चित चेहरों के रुख में आये बदलाव को देखकर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि लाखो की लागत लगाकर करोड़ो की कमाई करने के लिए कैसे रंग बदलना पड़ता है, कैसे शर्म-हया ताख पर रख देनी पड़ती है और मालिकान के फरमान को हर हाल में पूरा करना पड़ता है। यह सब मोदी की चाय-पार्टी से पहले की बात है; तो फिर इस चाय पर इतना तूफान क्यों?

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
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सोमवार, 22 सितंबर 2014

जुगनू अपना फर्ज़ निभाते रहते है (तरही ग़जल)

तरही नशिस्त के सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए इस बार उस्ताद ने जो मिसरा दिया उसने मुझे बहुत परेशान किया। लेकिन आखिर कुछ तुकबन्दियाँ बन ही गयीं। आप भी समाद फरमाइए :

जुगनू अपना फर्ज़ निभाते रहते हैं


पूंजीपति के मॉल सजीले बनते हैं
श्रमजीवी बदहाल वहीं पे रहते हैं

सरकारों ने दिये बहुत उपहार उन्हें
खोज रहा हूँ गाँव जहाँ वे मिलते हैं

जंग जीतता सूरज सदा अँधेरे से
जुगनू अपना फर्ज़ निभाते रहते है

बीज डालने की फितरत कुछ लोगों की
कुछ हैं जो बस फसल काटते रहते है

छोटे से छोटे को छोटा मत समझो
बूंदों से ही पत्थर चिकने बनते हैं

मर्दों ने तामीर मकानों की कर ली
औरत के हाथों ही वे घर बनते हैं

मन में हो तूफान मगर मत घबराना
अक्सर मंद समीर बाद में बहते हैं

अच्छी फसलें बहुत सजोनी पड़ती हैं
खर पतवार बिना बोये ही उगते हैं

सदाचार सच्‍चाई की है राह कठिन
झूठे रस्ते अनायास खुल पड़ते हैं

-सत्यार्थमित्र

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
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शनिवार, 13 सितंबर 2014

बचपन के मीत का गीत…

आज मेरे बचपन के दोस्त संजय कुमार त्रिपाठी का जन्मदिन है। हम आठवीं से दसवीं कक्षा तक एक साथ पढ़े। उन तीन सालों में शायद ही कोई ऐसा दिन रहा हो जब कक्षा में हम एक साथ न बैठे हों। उस ग्रामीण विद्यालय में पढ़ने के लिए मैं अपने घर से दूर एक ‘क्‍वार्टर’ में रहता था जो वहाँ के इलाके में एक प्रतिष्ठित व्यक्ति के घर के बाहरी बरामदे का छोटा सा कमरा था। संजय अपने मामाजी के घर रहते थे जो बगल के गाँव में था। स्कूल के बाहर भी हम लोगों की पढ़ाई प्रायः एक दूसरे के संपर्क में रहते हुए ही होती थी। कभी-कभी मैं उनके मामाजी के घर जाकर रुक जाता था। कभी वे मेरे कमरे पर आ जाते थे; लेकिन रात में रुक नहीं सकते थे क्यों कि कमरा इतना बड़ा नहीं था। बोर्ड परीक्षा देने के लिए जब परीक्षा केन्द्र तीस किलोमीटर दूर निर्धारित हुआ तो वहाँ हम एक साथ रुके और परीक्षा में लगभग बराबर की सफलता प्राप्त करते हुए एक दूसरे से विदा हुए।

मैंने उस ग्रामीण विद्यालय के खराब माहौल से तौबा कर ली और पिताजी से जिद करके राजकीय इंटर कॉलेज में पढ़ने गोरखपुर चला आया। गोरखपुर से इलाहाबाद विश्वविद्यालय और वहाँ से लोक सेवा आयोग की दी हुई सरकारी नौकरी बजा रहा हूँ। उधर संजय ने उसी जनता इंटर कालेज से इंटर पास किया, फिर बिहार से शिक्षक प्रशिक्षण (बी.टी.सी.) प्राप्त किया, और प्राथमिक शिक्षक बनने से पहले बी.ए. और एम.ए.(अंग्रेजी) की डिग्री गोरखपुर विश्वविद्यालय से अर्जित कर ली। आज वे बिहार के पश्चिमी चंपारण जिले में सरकारी जूनियर हाई स्कूल में एक आदर्श शिक्षक की नौकरी करते हुए अपनी छोटी सी गृहस्थी सम्हाल रहे हैं। उनके शिक्षण कार्य की कुशलता को देखते हुए उन्हें अन्य शिक्षकों को प्रशिक्षण देने का अतिरिक्त कार्य सौंप दिया गया है जिसे पूरा करने के लिए उन्हें रविवार की साप्ताहिक छुट्टी भी समर्पित करनी पड़ती है। इसके लिए मिलने वाला अतिरिक्त पारिश्रमिक उनके समक्ष मुंह खोले तमाम आर्थिक चुनौतियों का सामना करने हेतु कुछ अतिरिक्त संबल जरूर देता होगा लेकिन उनकी कर्मनिष्ठा में डूबी हुई दिनचर्या इतनी व्यस्त हो चुकी है कि नौकरी के बाहर के सारे काम ठप हो चुके हैं। इष्टमित्रों से मिलना-जुलना, रिश्तेदारों के घर आना-जाना, छुट्टियों में बच्चों को लेकर बाहर घूमने जाना या सोशल मीडिया पर स्टेटस डालने और बतकही करने का शौक पैदा ही नहीं हो सका।

संजय एक ऐसी दुनिया में रमे हुए हैं जो महानगरीय संस्कृति और उपभोक्ता वादी सामाजिकता से कोसों दूर है। निवास स्थान से बीस-पच्चीस किलोमीटर दूर की नौकरी बजाने के लिए अनिवार्य हो चुकी मोटरसाइकिल भी काफी प्रतीक्षा के बाद आ सकी और अदना सा मोबाइल उसके भी बाद में। कर्ज लेकर घर का ढाँचा तो खड़ा कर लिया लेकिन उसके खिड़की दरवाजे बनवाने में कई साल लग गये। बच्चों की छोटी-छोटी जरूरतों के लिए भी अपने साथ कई समझौते करने पड़े। लगभग पूरे वेतन पर ई.एम.आई. ने कब्जा कर रखा है लेकिन मजाल क्या कि इनके चेहरे पर कभी शिकन देखने में आयी हो। जब भी पडरौना जाता हूँ तो इनके घर मिलने जरूर जाता हूँ। वही प्रसन्नता से मुस्कराता चेहरा और अपनी गृहस्थी के प्रति सजगता और जिम्मेदारी से भरा, उत्साह से लबरेज जीवन्त व्यक्तित्व देखने को मिलता है।

बात-बात में ठहाके लगाते और गुदगुदाने वाले किस्से-कहानियों का लुत्फ़ लेते हुए संजय की कोई ऑनलाइन प्रोफाइल नहीं है। वर्षों पहले मैंने इनका एक जी-मेल खाता बना के दे दिया तो उसका पासवर्ड धरे-धरे गायब हो गया और मेल चला गया तेल लेने। इंटरनेट तक अपनी पहुँच बनाने की न तो इन्हें जरूरत महसूस हुई और न ही कोई सुभीता ही हुआ। मेरे झकझोरने पर आज जब किसी दूसरे के ई-मेल एकाउंट से इन्होंने मुझे अपनी एक हस्तलिखित रचना भेजी तो मैंने सोचा फोन के बजाय इस पोस्ट के माध्यम से इन्हें अपनी शुभकामनाएँ उनतक पहुँचाऊँ। 

Sanjay K Tripathi1

अपनो का हो साथ तो इक संबल मिलता है
जीवन नौका को खेने का बल मिलता है

सत्य और भ्रम का अंतर जो समझ सका है
श्रमजीवी होने का मतलब समझ सका है
मन में रखता है जो ऊँची अभिलाषाएँ
घोर निराशा में आशा के दीप जलाए

ऐसे ‘कर्मवीर’ को ही प्रतिफल मिलता है
अपनों का हो साथ तो इक संबल मिलता है

जीत हार का जिसपर कोई असर नहीं है
दुनियादारी की बातों का असर नहीं है
अन्तर्मन के निर्णय पर ही चलता जाये
यमदूतों के भय से भी जो ना घबराये

ऐसे को ही हर प्रश्नों का हल मिलता है
अपनों का हो साथ तो इक संबल मिलता है।

-संजय कुमार त्रिपाठी

मैं चाहता हूँ आधुनिकता की चकाचौंध से दूर दुर्गम ग्रामीण इलाकों में शिक्षा की ज्योति जलाने में लगे इस अहर्निश कर्मयोगी को उसके जन्मदिन (१३ सितंबर) पर आप भी शुभकामनाएँ देना चाहें।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
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गुरुवार, 31 जुलाई 2014

वाह जुलाई के क्या कहने…!

भाग-एक


स्कूलों की घंटी बोली, बच्‍चों की लो निकली टोली
भारी बस्ते चढ़े पीठ पर, फिर भी करते हँसी ठिठोली
नौनिहाल को हैं सब सहने, वाह जुलाई के क्या कहने ॥१॥

अब तिहवारी मौसम आया, सबने ईद उल फित्र मनाया
आयी तीज लिए हरियाली, मंगल व्रत करती घरवाली 
राखी चुनने निकली बहनें, वाह जुलाई के क्या कहने ॥२॥

सूखे की आहट से टूटे, यह किसान की दुनिया लूटे
मानसून ने कर दी देर, लिया विकट चिन्ता ने घेर
तभी लगी पुरवाई बहने, वाह जुलाई के क्या कहने॥३॥

आम दशहरी, चौसा- लगड़ा, अल्फान्सो का रुतबा तगड़ा
हफ़्तेभर तक जामुन आया मधुरोगी ने छककर खाया
हरित वसन धरती ने पहने, वाह जुलाई के क्या कहने ॥४॥

शिव शंकर का सावन आया, भक्तजनों का मन हर्षाया
सांई पर उखड़े आचार्य भूले संत सरीखे कार्य
ऐसे कैसे धर्म निबहने? वाह जुलाई के क्या कहने ॥५॥

भाग-दो

बजट बिगाड़ा महंगाई ने, रेट बढ़ा डाला बाई ने 
दूर पकौड़ी, प्याज रुलाये, हरी मिर्च भी आंख दिखाये
घर में नहीं टमाटर रहने, वाह जुलाई के क्या कहने ॥६॥

सबसे पहले रेल किराया, बोले बरसों बाद बढ़ाया
पेश बजट तो ऊँचा शोर, संसद बहस करे घनघोर
किले हवाई लगते ढहने, वाह जुलाई के क्या कहने॥७॥

लॉर्ड्स जीतकर मारा तुक्का, अगले टेस्ट में खाया धक्का
कॉमनवेल्थ पदक की होड़, भारत की कुश्ती बेजोड़
जीत लिए सोने के गहने, वाह जुलाई के क्या कहने ॥८॥

नटवर करे प्रहार करारा, त्याग नहीं नाटक था सारा
सहजादे ने रोकी राह, भीतर ही दब गयी कराह
चाटुकार अब लगे बहकने, वाह जुलाई के क्या कहने ॥९॥

कैसा अंगरेजी आयोग, अजब गजब का करे प्रयोग
प्रतियोगी हैं जन्तर-मन्तर, अंग्रेजी भारी है सबपर
निकल पड़े कुछ फिरसे जलने वाह जुलाई के क्या कहने ॥१०॥

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
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मंगलवार, 22 जुलाई 2014

पीछे की अक्ल में आगे बुद्धिजीवी

नौ साल पहले सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा किये गये भ्रष्टाचार के पोषण के बारे में जस्टिस मारकंडेय काटजू ने जो खुलासा किया वह बहुत आश्चर्यजनक नहीं है; लेकिन इसपर जो बहस चल रही है वह बहुत ही रोचक होती जा रही है। एक राज्य के मुख्यमंत्री द्वारा एक जिला जज को उसके द्वारा पूर्व में किये गये उपकार (जमानत) के बदले हाईकोर्ट में एडिशनल जज बनवा दिया गया; फिर उसका कार्यकाल बढ़वाने का सफल प्रयास किया गया; हाई-कोर्ट में उस जज ने कुछ और उपकार कर दिये होंगे जिससे खुश होकर उसका कार्यकाल और बढ़वाने फिर स्थायी जज बनवाने का इन्तजाम भी नेता जी द्वारा कर दिया गया। इस इन्तजाम के तहत ही केन्द्र सरकार को दिये जा रहे समर्थन के बदले प्रधानमंत्री की सिफारिश से भारत के चीफ जस्टिस की कृपा भी प्राप्त कर ली गयी। चीफ जस्टिस ने प्रधानमंत्री जी की खुशी के लिए उस जज के खिलाफ़ खुफिया रिपोर्ट को थोड़ा अनदेखा कर दिया। बस इत्ती सी तो बात है।

सामान्य दुनियादारी की समझ रखने वाले एक साधारण बुद्धि के मनुष्य के लिए इसमें कुछ भी अजूबा नहीं है। लेकिन देश के भारी भरकम बुद्धिजीवी और पत्रकार इस बात को लेकर हलकान हुए जा रहे हैं। लगता है कि इन लोगों को न्यायपालिका में इसके पहले भ्रष्टाचार के कोई चिह्न ही नहीं दिखे थे। जबकि आम आदमी निचले स्तर पर यह सब रोज ही झेल रहा है। चैनेल वाले तो ऐसे बदहवास हैं मानो मनमोहन सिंह के बारे में कोई बहुत गूढ़ और अनसुनी बात खुलकर सामने आ गयी हो। जबकि देश की जनता ने मौनी बाबा की हकीकत समझकर उन्हें कबका किनारे लगा दिया है।

लूट, डकैती , हत्या, बलात्कार, इत्यादि की घटना घटित हो जाने और अपराधी के बच निकलने और भाग जाने के बाद जब लोग इकठ्ठा होते हैं तो एक से एक बढ़िया तरीके बताते हैं कि उस समय क्या किया जाना चाहिए था। चुटकी में पॉलिसी और स्ट्रेटजी बनाने वाले एक से एक विशेषज्ञ प्रकट हो जाते है। दरअसल असली मौके की नज़ाकत  और तात्कालिक परिस्थिति की मजबूरियों को न समझने का सुभीता इन रायचंदों के पास खूब होता है।

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टाइम्सनाऊ पर जस्टिस काटजू के सामने बहस के लिए राम जेठमलानी और सोली जे.सोराबजी आये थे। तीनो अपने क्षेत्र के धुरन्धर और ख्यातिनाम। पहली बार अर्नब गोस्वामी को कम बोलते और सीमित टोका-टाकी करते देखकर अच्छा लगा। मजेदार बात यह थी कि कानून के तीनो दिग्गज एक दूसरे से असहमत होते हुए भी सच्चाई से बोलते दिखे।

सोराब जी ने कहा कि काटजू की बात पर कोई संदेह नहीं किया जा सकता लेकिन इन्होंने यह बात खोलने में बहुत देर कर दी जो एक प्रकार से अपने कर्तव्यों की उपेक्षा है। इन्हें पता था कि एक भ्रष्ट आदमी को जज बनाया जा रहा है लेकिन उन्होंने इसे रोकने के लिए जितना करना चाहिए था उतना नहीं किया। राम जेठमलानी ने भी कहा कि मैं होता तो चीफ जस्टिस द्वारा अनसुना कर दिये जाने पर चुप नहीं बैठता और आगे बढ़कर इसका खुला विरोध कर देता। जेठमलानी का मत था कि काटजू को शायद उस भ्रष्ट जज द्वारा किया जाने वाला नुकसान उतना बड़ा नहीं लगा होगा जितना उनके द्वारा अनुशासन तोड़ देने पर न्यायपालिका की छवि को होता। काटजू से यह रहस्योद्घाटन करने में इतनी देर करने की वजह जेठमलानी को बिल्कुल समझ में नहीं आ रही थी।

जब दोनो की घेरेबन्दी को अर्नब गोस्वामी ने काटजू के ऊपर और कसना शुरू किया तो काटजू ने झल्लाकर कहा- ये दोनो लोग कानून के बहुत बड़े जानकार भले ही होंगे, वकील भी बहुत बड़े होंगे लेकिन ये कभी जज नहीं रहे हैं। इसीलिए मेरी बात ये लोग नहीं समझ पा रहे हैं। न्यायमूर्ति की कुर्सी पर बैठे रहते हुए मैं पब्लिक के बीच कोई मुद्दा कैसे उठा सकता था? मैंने जीफ जस्टिस को इस बारे में पूरी बात बता दी थी। इससे ज्यादा मैं और क्या कर सकता था?

इसपर जेठमलानी बोले कि आपकी मजबूरी तभी तक थी न जबतक आप न्यायमूर्ति थे। छोड़ देते कुर्सी और आ जाते मैदान में। मैं तो इस्तीफा दे देता और इस भ्रष्टाचार की पोल खोल देता। इसपर काटजू ने पहले तो हँसकर मौज लेने की कोशिश की लेकिन बाद में गंभीर होकर बोले कि बेहतर होगा कि आप वकालत से ही इस्तीफा दे दीजिए। उनका आशय शायद यह था कि देश के सभी बड़े-बड़े अपराधी और घोटालेबाज जेठमलानी जी के मुवक्किल होते हैं। काटजू ने यह भी याद दिलाया कि उन्होंने अपनी मर्यादा में रहते हुए भी जो किया वह पहले किसी ने नहीं किया। इलाहाबाद हाईकोर्ट में ‘जज-अंकल’ की सड़ांध के बारे में उन्होंने ही खुलेआम चीफ जस्टिस को बताया था और उसपर कार्यवाही हुई थी।

उधर मनमोहन सिंह अभी साल भर पहले ही प्रधानमंत्री बने थे। उनकी कुर्सी सोनिया गांधी के आशीर्वाद के साथ साथ करुणानिधि की कृपा पर भी टिकी थी। हाईकोर्ट के एक भ्रष्ट जज को रोकने के लिए क्या वे अपनी सरकार चली जाने देते? लेकिन आज सबलोग यही कह रहे हैं कि उन्हें वह सिफारिश नहीं करनी चाहिए थी। भले ही करुणा बाबू अपना समर्थन खींच लेते। इन लोगों से कैसी महानता की आशा कर लेते हैं हम?  बहुत भोले हैं न हम सब?

सोमवार, 30 जून 2014

अच्छे दिन की जल्दी मची है…

विज्ञान भवन सभागार में उद्योग और व्यापार संबंधी सम्मेलन में मनमोहन सिंह के भाषण के बाद नरेन्द्र मोदी ने जब उनकी इस बात का समर्थन अपने खास अन्दाज में किया कि भारत की बिगड़ी अर्थव्यवस्था में जल्द ही सुधार होगा और अच्छे दिन आएंगे तो इसका अर्थपूर्ण ढंग से तालियाँ बजाकर स्वागत करने वालों ने भी नहीं सोचा होगा कि अच्छे दिन का जुमला इतनी दूर और इतनी देर तक लोगों की जुबान पर चढ़ा रहेगा। चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा ने जमकर यह नारा लगाया और भुनाया। कुछ इस तरह कि यदि जनता ने वोट देकर भाजपा को जिता दिया तो चुनाव के परिणाम घोषित होते ही देश का काया-पलट हो जाएगा।

ऐसे वादे हुए मानो गरीबी, अशिक्षा, महंगाई और भ्रष्टाचार समुद्र में डूबकर आत्महत्या कर लेंगे, गाँव- गाँव में तेल के कूँए निकल आएंगे, जमीन में से हजारो टन सोना सही में बाहर आ जाएगा, लोगों का बैंक में जमा सारा रूपया डॉलर में तब्दील हो जाएगा और स्विस बैंक से काला धन मालगाड़ी में लादकर भारत चला आएगा, बेरोजगारी उड़न-छू हो जाएगी, सभी अपराधियों का हृदय परिवर्तन हो जाएगा और बलात्कारी साधुवेश धारणकर तीर्थाटन पर निकल जाएंगे । जनता ने शायद इसी तरह के चमत्कार की आशा में प्रचंड बहुमत से उन्हें जिता भी दिया।

अब जबकि झटपट रेल का किराया बढ़ा दिया गया है, एक महीने के भीतर दूसरी बार पेट्रोलियम उत्पादों के दाम बढ़ रहे हैं और देश की बाकी चीजें जहाँ की तहाँ वैसी ही बनी हुई हैं तो वही जनता सरकार पर पिल पड़ी है। क्या यही हैं अच्छे दिन? मानो मोदी सरकार ने घोर अनर्थ और भयंकर धोखा कर डाला हो उनके साथ। सरकार को खरी-खोटी सुनाने में कांग्रेस समर्थक और वामपंथी खेमा तो स्वाभाविक रूप से आगे है लेकिन बहुत से पार्टी-लाइन से स्वतंत्र विचार रखने वाले और कुछ भाजपा समर्थक भी इस हो-हल्ले में शामिल हो गये दिख रहे हैं।

कोई यह मानने को तैयार नहीं कि चुनावी मौसम की जुमलेबाजी और यथार्थ के धरातल पर नीति निर्माण और शासन का संचालन बिल्कुल दो अलग बातें हैं। बिगड़ी हुई अर्थ-व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए जिस कठिन संयम, कठोर अनुशासन और संयत धैर्य की आवश्यकता है उसका संज्ञान लेने की सुध सोशल मीडिया के लिक्खाड़ों से लेकर अखबार के संपादकों और न्यूज चैनेलो के पैनेलो में बोलने वाले विशेषज्ञों में भी नहीं दिख रहा है। चुनाव में करारी शिकस्त खाने वाले कांग्रेसी अपनी दस साल की करनी को भूलकर इस बात से खफा हैं कि इसी एक महीने में वह चमत्कारी परिवर्तन हुआ क्यों नहीं। वामपंथी और ‘सेकुलर गिरोह’ की तो बाछें खिली हुई हैं कि जनता का मोहभंग इतना जल्दी हो गया।

देश की अर्थव्यवस्था कैसे चलती है और किसी आर्थिक नीति का प्रभाव कितने दिनों बाद दिखायी देता है यह सब सोचने-समझने की किसी को फुर्सत नहीं है। बौद्धिक स्तर पर खुद से बेईमानी भरी सोच के एक से एक नमूने दिखायी दे रहे हैं।

किसी अच्छे-भले घर को सिर्फ़ रंगवाने-पुतवाने का काम कराना हो तो भी कुछ दिन के लिए इसमें रहने वालों को परेशानी का सामना करना पड़ता है, बजट के संतुलन के लिए कुछ दूसरे कामों को रोकना पड़ता है तब जाकर काम पूरा होता है। सोचिए अगर किसी इमारत की हालत बेहद कमजोर हो जाय, उसकी दीवारें खराब हो जायें, नींव की ताकत पर भी संदेह हो जाय तो उसे ठीक और मजबूत करने के लिए क्या-क्या करना पड़ेगा। शर्त यह भी है कि इमारत को ठीक तो करा दिया जाय लेकिन इसके लिए इसमें निवास करने वालों को कोई तकलीफ़ न हो, उन्हें इमारत से न तो बाहर निकालना है और न ही पूरी इमारत को गिराकर नये सिरे से बनाना है।

अब ऐसा चमत्कार तो कोई जिन्न ही कर सकता है जिसे अलादीन अपने चिराग से निकालते थे। फिलहाल मोदी सरकार के पास कोई जादू की छड़ी है नहीं। आपने अगर इस मुगालते में वोट दे दिया था तो आप घामड़ किस्म के इंसान हैं। आप अपने निर्णय पर पछता लीजिए, अपने बाल नोच लीजिए, स्टेटस डालकर पूरी भड़ास निकाल लीजिए। अच्छे दिन की इतनी जल्दी है तो छत से कूद जाइए लेकिन उसे आना होगा तो भी वह अपना समय लेकर ही आएगा। अभी जो वातावरण है उसमें तो नहीं आने वाला है अच्छा दिन।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
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गुरुवार, 19 जून 2014

मन कहे तो गुनगुनाइए

यह गीत उन तमाम सरकारी सेवकों को समर्पित है जिनकी दिनचर्या में हंसने, मुस्कराने और गुनगुनाने के लिए कोई अवसर नहीं मिल पाता। मुझे लगता है कि वे कोशिश करें तो अवसर जरूर मिलेगा। बस थोड़ी सोच बदलनी होगी।

मन कहे तो गुनगुनाइए

मन कहे तो गुनगुनाइए
मन कहे तो गुनगुनाइए
राग और छंद बिगड़ते हैं तो बिगड़े
दिल की बात लब पे लाइए।

बात आपकी सुने या अनसुना करे जहाँ
प्यार दे दुलार दे या छोड़ दे जहाँ तहाँ
खुद ही देखिए भला क्या मान अपमान है
फिक्र नहीं कीजिए क्या सोचता जहान है
कभी अपने से मुस्कुराइए
मन कहे तो गुनगुनाइए

संवेदना मन की हमको जगाये
अंतस की पहचान हमसे कराये
मन के सवालो की भरपाई करती
ओजस्वी आशा की प्राणवायु भरती
फिर निराशा न उपजाइए
मन कहे तो गुनगुनाइए

देश के प्रदेश के विकास के हरास की
मन में फ़िक्र होने लगे डूब रही आस की
इष्ट मित्र भाई बंधु टूटते समाज की
धर्म में अधर्म और जाति के रिवाज की
थोड़ी देर भूल जाइए
मन कहे तो गुनगुनाइए

कामकाज खोज रहे जीविका की चाह में
छोड़ दिए राग रंग जो भी मिले राह में
भौतिक सुख साधन से घर आँगन भरते
माया की खातिर जाने क्या क्या करते
थोड़ा खुद पे तरस खाइए
मन कहे तो गुनगुनाइए

29.05.2014
सत्यार्थमित्र
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शनिवार, 31 मई 2014

कितना रौशन रौशन उसका चेहरा है

चुनावी कार्यक्रम की जिम्मेदारियों से निवृत्त होने के बाद तरही नसिश्त के संयोजक से मुलाकात हुई। उन्होंने कहा कि अगली बैठक में तो आना ही पड़ेगा। मैंने पूछा मिसरा क्या है तो बोले – “कितना रौशन-रौशन उसका चेहरा है।” फिर क्या था मेरे भीतर शायरी का कीड़ा कुलबुलाने लगा। इसके बाद जो कुछ अवतरित हुआ है वह आपकी नज़र करता हूँ :

कितना रौशन रौशन उसका चेहरा है

(भाग-१)

कितना रौशन रौशन उसका चेहरा है
बैठा उस पर काले तिल का पहरा है

आँखें अपलक देख रहीं हैं सूरत को
दिल भी मेरा उसी ठाँव पर ठहरा है

प्यारी सूरत से ही प्यार हुआ है जो
प्यार का तूने सीखा नहीं ककहरा है

जिसने सूरत से बेहतर सीरत समझा
उसके सर पर सजता सच्चा सेहरा है

चक्कर खा गिर पड़े अचानक अरे मियाँ
बस थोड़ा सा उसका आँचल लहरा है

 

(भाग-२)

वह पुकारती रही सांस थम जाने तक
उसे पता क्या यह निजाम ही बहरा है

अच्छे दिन आने की आस लगी मुझको
मुस्तकबिल उनके संग बड़ा सुनहरा है

वो आये तो अन्धकार मिट जाएगा
ऐतबार इस चमत्कार पर गहरा है

नौजवान उठ खड़ा हुआ तो ये समझो
छंटने वाला बदअमनी का कोहरा है

जिसके सर तोहमद है कत्लो गारद की
गुनहगार वो असल नहीं बस मोहरा है

बदल गयी है बात चुनावी मौसम की
राजनीति का यह चरित्र ही दोहरा है

बैरी ने हमको जब भी ललकारा है
उसके सर पे सदा तिरंगा फहरा है

 

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
www.satyarthmitra.com

गुरुवार, 29 मई 2014

बदलाव की बातें

new governmentसभी ज्योतिषियों, चुनावी पंडितों व भाजपा सहित सभी राजनीतिक पार्टियों के अनुमानों को धता बताते हुए नरेन्द्र मोदी ने अपनी बेहतरीन नेतृत्व क्षमता, उपलब्ध संसाधनों के प्रभावशाली प्रयोग के कौशल और विपक्षी की हर बात का माकूल जवाब देने की चतुराई से लोकसभा के चुनाव में रिकॉर्ड सफलता अर्जित करते हुए देश के पंद्रहवें प्रधानमंत्री के रूप में कुर्सी संभाल ली है। राहुल गांधी, सोनिया गांधी और बाद में सक्रिय हुई प्रियंका गांधी के पास मोदी के हमलों का कोई जवाब नहीं था। कुछ सस्ते किस्म के सिखाये हुए जुमलों और मुहावरों से मोदी के गंभीर, तार्किक और तथ्यपूर्ण भाषणों का कोई मुकाबला नहीं किया जा सका। भ्रष्टाचार, मंहगाई और सरकारी अकर्मण्यता से उकताई हुई जनता को “अच्छे दिन आने वाले हैं” की धुन में एक आशा का राग सुनायी पड़ा और उसने जाति, धर्म और क्षेत्रीयता की बंटवार से बाहर आकर एक ऐसा जनादेश दे दिया जिसमें अनेक समस्याओं का समाधान समाया हुआ था। ऐसी समस्याएँ जिनसे पिछली अनेक सरकारें ग्रसित थीं। आइए देखते हैं क्या-क्या बदल गया है :

  1. रिमोट कंट्रोल : सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब सत्ता का असली अधिकार भी उसी के पास है जिसके पास जवाबदेही की जिम्मेदारी है। नरेन्द्र मोदी ने अपनी मेहनत और योग्यता से जो सत्ता हासिल की है उसके महत्वपूर्ण नि्र्णयों के लिए उन्हें किसी अन्य अधिष्ठान की ओर ताकने की जरूरत नहीं होगी।
  2. गठबंधन : लंबे समय से क्षेत्रीय क्षत्रपों ने अपनी स्वार्थी राजनीति से बहुदलीय गठबंधन वाली सरकारों को परेशान कर रखा था। किसी राष्ट्रीय-नीति के निर्माण और क्रियान्वयन जैसी कोई बात हो ही नहीं सकती थी। अपने क्षेत्र में धुर विरोधी राजनीति करने वाले नेता भी एक साथ केन्द्र सरकार को भीतर या बाहर से समर्थन देकर अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति कर रहे थे।
  3. अस्थिरता : पिछली सरकारों की सबसे बड़ी चिन्ता मात्र सरकार को बचाये रखने की ही रहती थी। घटक दलों में से कोई नाराज न हो जाय इसके लिए तमाम जतन करने पड़ते थे। सीबीआई लगाने से लेकर लालबत्ती देने तक के तमाम हथकंडे जिनकी देश के विकास और राष्ट्र के निर्माण में कोई भूमिका नहीं थी।
  4. अनिर्णय : निर्णय लेने वाले इतने केन्द्र हुआ करते थे कि कोई एक निर्णय लेना लगभग असंभव था। कुछ निर्णय ले भी लिए गये तो उनके लागू होने से पहले कोई न कोई बिदक गया और कागज फाड़ कर फेंक दिया गया। रोचक बात यह है कि लोगों को ऐसे फाड़ू निर्णय मजेदार लगने लगे।
  5. देसी-विदेशी : बार-बार यह सफाई देने से निजात मिली कि सत्ता की असली चाभी शुद्ध भारतीय हाथों में ही है, कोई विदेशी शक्ति सत्ता के गलियारों में नियंत्रक की भूमिका में नहीं है।
  6. लिखित-वाचन : अब हमें स्वाभाविक भाषण सुनने को मिला करेंगे। बोलने वाला यह समझता भी रहेगा कि किस विषय पर बात कर रहा है। लिखी हुई स्क्रिप्ट बाँचने के चक्कर में हमारे नेता नर्मदा योजना को नर-मादा योजना से कन्फ़्यूज नहीं करेंगे।
  7. राज-परिवार : फिलहाल देश में अब जनता द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों को किसी राज परिवार के प्रति अपनी निष्ठा सिद्ध करने के लिए अपनी गरिमा और स्वतंत्र विचार का बलिदान नहीं करना पड़ेगा। बहुत से प्रतिभाशाली नेता इस अपरिहार्य चरण-वंदना की वृत्ति के कारण कांतिहीन होकर अपनी दुर्गति को प्राप्त हो गये। उम्मीद है कि नयी सरकार जाति और वंश पर ध्यान दिये बिना प्रतिभा और योग्यता के आधार पर बेहतर काम का अवसर देगी।
  8. पिलपिली उदारता : भ्रष्टाचार, महंगाई, अल्पसंख्यकवाद, क्षेत्रीयतावाद, परिवारवाद, विदेशी घुसपैठ, सांप्रदायिक उन्माद, झगड़े और ब्लैकमेलिंग के प्रति एक लिजलिजे उदार दृष्टिकोण को अब जगह नहीं मिलने वाली। कम से कम गुजरात में सफल मोदी मॉडल के आधार पर ऐसी उम्मीद की जा सकती है।
  9. सेकुलर-कम्युनल विमर्श : चुनाव परिणाम देखकर भारतीय राजनीति के सेकुलर खेमे के सभी सूरमाओं की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गयी है। वे सोच रहे होंगे कि देश की भतेरी जनता ही कम्युनल हो गयी है। जब तक वे इस सदमे से बाहर नहीं आते तबतक यह विमर्श ठंडे बस्ते में रहेगा।
  10. दूरदर्शन : सरकारी टेलीविजन के समाचारों में दिखने वाले चेहरों और पैनेल डिस्कसन के विशेषज्ञों का नया सेट आ गया है। कुछ दिनों तक इस चैनेल की टीआरपी ऊँची रहने वाली है।
  11. पप्पू और फेंकू : सोशल मीडिया के इन दो दुलारों को अब बहुत मिस किया जाएगा। पप्पू शायद कहीं पढ़ाई करने चले जाय और फेंकू ने राजनैतिक पटल पर जो-जो बीज फेंके थे उनके जमीन से उग आने पर खेत में निराई-गुड़ाई करने और उसकी फसल काटने में व्यस्त हो जाएंगे।

बदलाव तो और भी बहुत से होने वाले हैं; लेकिन सब के सब मैं ही थोड़े न बताऊँगा। कुछ आप भी गिनाइए, अपनी नजर से देखकर। टिप्पणी बक्सा इसीलिए तो खुला है। Smile

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
www.satyarthmitra.com

छपते-छपते- इधर मैंने 11 तक गिनती पूरी की उधर धारा-370 पर “ले तेरी की - दे तेरी की” शुरू हो गयी है। मैंने तो यह सोचा ही नहीं था। मतलब सरप्राइज एलीमेन्ट भी भरपूर रहने वाला है।