हमारी कोशिश है एक ऐसी दुनिया में रचने बसने की जहाँ सत्य सबका साझा हो; और सभी इसकी अभिव्यक्ति में मित्रवत होकर सकारात्मक संसार की रचना करें।
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बुधवार, 4 अप्रैल 2012

बच्चों के लिए खुद को बदलना होगा…

पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी और उसके बाद या उसके बिना भी शादी तक का सफर पूरा कर लेने पर हमें लगता है कि अब इस जिन्दगी में हमें जैसा होना था वह हो लिए। जो मिलना था वह मिल गया। व्यक्तित्व के विकास का क्रम लगभग पूरा हो गया, अब इसमें किसी क्रान्तिकारी परिवर्तन की गुंजाइश नहीं बचती। नौकरी में कुछ पदोन्नति या बिजनेस में कुछ उन्नति पाकर हम अपनी आर्थिक या सामाजिक हैसियत भले ही बढ़ा लें लेकिन एक बार कैरियर और जीवन साथी मिल जाने के बाद  हमारे व्यक्तिगत आचरण का जो स्वरूप निर्धारित हो जाता है वह कमोबेश जीवन भर बना रहता है। मुझे अभी हाल तक ऐसा ही महसुस होता रहा है। लेकिन इस बीच कुछ ऐसे अनुभव हुए कि मुझे अपनी धारणा को बदलने और आप सबके बीच चर्चा करने का मन हुआ।

एक विद्यार्थी, एक प्रतियोगी परीक्षार्थी, सफल/असफल अभ्यर्थी और फिर  सामर्थ्य व भाग्य के मेल से मिलने वाला कैरियर बनाकर हम चल पड़ते हैं अपने जीवन की नैया को पार लगाने। जीवन संगिनी के साथ जो परिवार बसता है उसकी जिम्मेदारी उठाने में हमारी कार्यकुशलता का स्तर बहुत कुछ हमारे आर्थिक स्तर  पर टिका हुआ है, यह भी एक सामान्य धारणा मेरे मन में रहा करती थी। लेकिन अब मैं सोच रहा हूँ कि एक गृहस्थ के रूप में या बच्चों के अभिभावक के रूप में हमारी भूमिका केवल हमारी आर्थिक स्थिति से नहीं तय होती। हमे तमाम ऐसे काम करने हैं जिनका धन से कोई सरोकार नहीं है लेकिन वे बहुत ही महत्वपुर्ण हैं। इनमें से एक महत्वपुर्ण कार्य है अपने छोटे-छोटे बच्चों को समुचित शिक्षा देना। ऐसी शिक्षा जो उन्हें एक योग्य, कर्तव्यपरायण, ईमानदार और मूल्यपरक जीवन जीने वाला खुशहाल नागरिक बना सके। बड़ी से बड़ी फीस चुकाकर भी हम किसी स्कूल से  इन बातों की गारंटी नहीं ले सकते। ऐसे सद्‍गुण विकसित होने की जो उम्र है वह ज्यादा बड़ी नहीं है। बच्चा जब अपने दो पैरों पर खड़ा  होकर दौड़ने लगता है स्फुट शब्दों का प्रयोग करके अपनी बात माँ तक पहुँचाने लगता है अपनी उम्र के बच्चों के साथ खेलने लगता है तभी उसके सीखने और व्यक्तित्व का स्वरूप निर्धारित होने की प्रक्रिया भी शुरू हो जाती है। कहते तो हैं कि बहुत से गुण-अवगुण आनुवांशिक भी होते हैं लेकिन जिसपर हमारा कोई वश नहीं उसकी क्या बात की जाय। हम तो उस वातावरण की ही बात करेंगे जिसे हम एक सीमा तक  बदल पाने का प्रयास कर सकते हैं।

एक अभिभावक के रूप में बच्चे की परवरिश करते समय हमें किन बातों का ध्यान रखना चाहिए इसपर एक छोटी सी पुस्तिका मेरे हाथ लगी है। सिटी मॉन्टेसरी स्कूल के संस्थापक डॉ.जगदीश गाँधी और उनकी विदुषी पत्नी डॉ. (श्रीमती) भारती गाँधी द्वारा तैयार की गयी इस पुस्तिका में बहुत सी सीखने लायक बातें लिखी गयी हैं। यहाँ सबकुछ तो नहीं दिया जा सकता लेकिन जिन वाक्यों ने मुझे यह सब लिखने को प्रेरित किया उन्हें संक्षेप में उद्धरित कर रहा हूँ :

  • बालक को सीखने की तीव्र प्रक्रिया होती है। उसके सामने सब कुछ सही-सही कीजिए।
  • विश्वविद्यालय की डिग्रियाँ ही शिक्षित होने का प्रमाण नही अपितु उसकी शिक्षा का पता तो उसके व्यवहार से चलता है।
  • बालक की कर्तव्य पालन की शिक्षा देने से पूर्व माता-पिता स्वंय बालक के आज्ञाकारी सेवक बनें।
  • आप अपने बच्चे को कभी छोटा न समझिये, वह आपके अच्छे-बुरे कार्यों को समझता और सीखता है।
  • एक सफल माँ वह है जो बच्चे की उस माँग को पहचानती है जिसे हम रोना कहते हैं।
  • एक सफल पति-पत्नि को बच्चों के सामने कोई ऐसा काम नहीं करना चाहिंए जो बालक को गलत सीख दे।
  • आप जैसा भी करते हैं बच्चा उसी का नकल करता है।
  • आपकी जरा सी शाबाशी से बच्चे का मन प्रसन्नता से बल्लियों उछल पड़ता है।
  • बच्चों को वही खिलौना खरीद कर दीजिए जिससे बच्चा कुछ सीख सके।
  • खेलते हुए बच्चे को कोई आदेश न दीजिए वह आपकी आज्ञा का उल्लंघन कर सकता है।
  • बच्चे जिज्ञासु होते हैं। उन्हें किसी बात के लिए मना न कीजिए अन्यथा वे वैसा ही करेंगे।
  • बालक पैदा होते ही माँ के स्कूल में दाखिला पा लेता है और फिर सोते-जागते, खेलते-खाते, उठते-बैठते हर पल उसकी कक्षाएँ लगी रहती है।
  • माता-पिता अपने बच्चों पर धन तो खर्च करते हैं पर समय नहीं खर्च करते।
  • बच्चे को खेल-तमाशा दिखाने साथ ले जाइये और उससे सम्बन्धित प्रश्नों का उत्तर दीजिए यह भी शिक्षा है।
  • आप आस्तिक हैं और पूजा करना चाहते हैं तो बालक से अच्छा कौन होगा जिसकी पूजा की जाय।
  • बच्चों को घर में प्रतिदिन काम आने वाली वस्तुओं से परिचय अवश्य करा देना चाहिए।
  • बच्चों को पालतू पशुओं और पक्षियों से भी परिचय करा देना चाहिए।
  • बच्चों को कहानियाँ सुनाकर उनमें त्याग, सेवा, आज्ञाकारिता के गुणों को सरलता से भर सकते हैं।
  • पाठशालाओं में माताओं को बराबर आते रहना चाहिए जिससे बच्चा यह महसूस करें कि पाठशाला भी घर का एक अंग है।
  • आप चाहते हैं कि बच्चा सच बोले तो स्वयं सच बोलना शुरू कर दीजिए।
  • बालक को अनुशासित रखना चाहते हो तो स्वयं अनुशासित रहो।
  • प्रायः चार वर्ष की अवस्था का बालक कहानियाँ सुनने को बड़ा उत्सुक रहता है।
  • बच्चों को कहानियाँ इतनी प्रिय होती हैं कि वे कुछ देर के लिए भूख प्यास भी भूल जाते हैं।
  • बच्चे कहानी के पात्रों पर नहीं बल्कि नायक की सफलता और असफलता पर अधिक ध्यान देते हैं।
  • बच्चों को सच्ची कहानियाँ ही सुनानी चाहिंए जिससे बड़े होने पर वे माता-पिता पर अविश्वास न करने लगे।
  • चार वर्ष का शिशु पशु पक्षियों, परियों और चाँद की कहानियाँ पसन्द करता है।
  • बच्चों को राजा रानी की बहादुरी की कहानियाँ सुनाकर माताएँ बच्चों को बहादुर बना सकती हैं।
  • संसार के अनेक महापुरूषों को कहानियाँ द्वारा ही बचपन में संस्कार और प्रेरणा मिली है।
  • माँ ही अपने बच्चे की एक सफल अध्यापिका हो सकती है।
  • बालक माता-पिता या अभिभावकों के कटु व्यवहार, घर की असंतोषजनक स्थिति के कारण ही घर से भगता है।
  • अपने बच्चे को जासूसी और सस्ते किस्म की पुस्तकों से बचाइये।
  • बच्चों को सुधारने से पूर्व माता-पिता या अभिभावकों को अपने बुनियादी बुराइयाँ दूर करनी चाहिंए।
  • जो माता-पिता या अभिभावक स्वभाव से क्रोधी और चिड़-चिड़े हैं वे मेहरबानी करके बच्चों पर तरस खायें उन्हें इन दुर्गणों से दूर रखें।
  • बच्चा अपनी वाणी में ही नहीं वरन् वह आपके हृदय एवं आँखों में भी स्नेह खोजता है।
  • कौन जानता है कि आँगन में खेलने वाला कौन शिशु कल का कवि, डाक्टर, इंजीनियर, दार्शनिक, जनसेवक या कुशल प्रशासक होगा।
  • यह नन्हीं बालिकाएं ही तो कल की सरोजनी नायडू, लक्ष्मीबाई, अहिल्याबाई आदि नारी रत्ना है।
  • देश का भविष्य इन नन्हें मुन्नों के निर्माण में है, इस उत्तरदायित्व से भागने वाले राष्ट्रदोही हैं।
  • बच्चों को निर्दयता से पीटना एक जघन्य पाप एवं अपराध है।
  • प्रसन्नता और मनोरंजन ही आपके बच्चे का जीवन है।
  • बालक को कभी झिड़किये नही अन्यथा वह निरूत्साही एवं भीरू बन जायेगा।
  • बालक को बात-बात पर शाबाशी दीजिए उसका साहस दुगुना हो जायेगा।
  • बालक को ईश्वर का स्वरूप मानकर उसके समक्ष मेहरबानी करके कोई गलत काम न कीजिए।
  • बच्चा जन्मजात अहिंसक होता है।
  • यह मत भूलिये कि 2 वर्ष का शिशु आपकी सारी आदतें सीख रहा है।
  • मेरी मानिये तो मैं कहूँगी कि 2 वर्ष से 5 वर्ष के बच्चों को शिशु विहारों में पुस्तक पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि केवल खेलने के लिए भेजिए।
  • बच्चो को कभी ऐसे पड़ोसियों, मित्रों एवं सम्बन्धियों से न मिलने दें जो असंयम का व्यवहार करते हों।
  • आप पर कितनी ही, परेशानियॅा या आपत्ति क्यों न हों, आप बच्चों के सामने मुस्कराते रहें।
  • बच्चों को श्रेष्ठात्मायें समझ कर उनके प्रति उत्तरदायित्व को पूर्णता से निभाना चाहिए।
  • बच्चों में सहयोग एवं मिलजुल कर कार्य करने की भावना को जाग्रत कीजिए।
  • बच्चों को अपना खाना मिल बाँटकर खाना चाहिंए।
  • माता-पिता या अभिभावक जब समय-समय पर बच्चे की पढ़ाई, उसके विद्यालय के सांस्कृतिक कार्यक्रमों, उन्नति, अवनति आदि के प्रति रूचि दिखाते हैं तो बालक में आत्मविश्वास की भावना पैदा होती है।
  • वे माता-पिता धन्य हैं जो बालक के प्रत्येक कार्य में रूचि लेते हैं और सदैव बालक को आगे बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करते रहते हैं।
  • आज के विद्यार्थी के गुमराह होने का एकमात्र कारण है-माता पिता या अभिभावक द्वारा उसकी उपेक्षा।
  • कभी-कभी माता-पिता प्रायः मोह के वशीभूत होकर उसकी प्रगति में बाधक बन बैठते हैं।
  • चतुर माता पिता ज्वर ग्रस्त शिशु के लाख रोने पर भी उसे लड्डू नहीं खिलायेंगें।
  • माता पिता बालक पर अपनी रूचि न थोपे बल्कि बालक की ही रूचि के अनुसार उसका मार्गदर्शन करते रहें।
  • बच्चे को सदैव अपने से अधिक बुद्धिमान मानते हुए उसकी प्रत्येक बात का सम्मान करना चाहिंए।
  • यह कोरी भूल और अपराध है कि बालक का सुधार डंडे से किया जाय।
  • आप बच्चे की बुराई नहीं स्वयं अपने दोषों का बखान कर रहे हैं, जिसकी छाप बच्चे पर पड़ी है।
  • बच्चे को सदैव क्रियाशील खेलों में लगाइयें।
  • शिशुओं के लिए चिडि़याखाने व अजायबघर जैसे स्थान जिज्ञासा बढ़ाने के लिए बड़े उपयुक्त होते हैं, अवश्य साथ ले जाइये।
  • जो माँ बालक की मूक भाषा नहीं समझ पाती वह अनपढ़ है भले ही उसने कितनी ही डिग्रियाँ प्राप्त कर ली हों।
  • आप लट्टू नहीं नचा सकते तो बालक को नचाने से न रोकिए। उसका मन प्रसन्नता से नाचने लगेगा।
  • बालक एक सफल चितेरा होता है उसकी फेरी हुई प्रत्येक टेढ़ी-मेढ़ी रेखा में कला का पुट होता है।
  • यदि आप बच्चों से विनोद नहीं कर सकते, उसे हॅंसा नही सकते, तो आप उसे पढ़ा भी नहीं सकते।
  • बच्चे की कोई वस्तु गिर जाय तो तुरन्त आप पर आदर के साथ उठाकर बालक को दे दीजिए।
  • बालक के स्कूल जाते समय उसे दरवाजे तक अवश्य छोड़ने जाइये।
  • बच्चों की देखभाल कीजिए कि वे बाजार की खुली चीजें न खायें।
  • बच्चों को पहाड़ों और नदियों की खूब सैर कराईये इससे हृदय की विशालता और करूणा की भावना उत्पन्न होती है।
  • रात में छत या आँगन से बच्चे को चन्दा मामा दिखाइये, उसे प्रसन्नता होगी।

मैने जब इन बातों की कसौटी पर खुद को परखा तो अनेक मुद्दों पर सुधार की आवश्यकता दिखी। आशा है मेरी ही तरह इनमें से कुछ बातें आपका ध्यान जरूर खींचेगी जिनमें आप गलती कर रहे थे।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

मंगलवार, 11 जनवरी 2011

क्या अखबार का पाठक चिरकुट है…?


राष्ट्रीय संगोष्ठी में बहस का मुद्दा बना एक प्रबंध संपादक का बयान

देश की प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के प्रतिनिधि इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में जुटे थे। विश्वविद्यालयों में पत्रकारिता की शिक्षा देने वाले प्रोफ़ेसर, बड़े अखबारों के संपादक और न्यूज चैनेल्स के एंकर सिर जोड़कर वर्धा विश्वविद्यालय के पत्रकारिता के छात्रों और अकादमिकों को मीडिया की असली दुनिया से परिचित करा रहे थे। मिशनरी पत्रकारिता पर बहस चल रही थी। मीडिया द्वारा मिशन छोड़कर व्यावसायिकता की ओर मुड़ जाने पर चिंता व्यक्त की जा रही थी। मीडिया और राडिया के अंतर्सम्बन्ध खंगाले जा रहे थे। तभी एक प्रतिष्ठित अखबार के प्रबंध संपादक ने यह मंतव्य रखा कि जब एक साबुन की टिकिया के लिए लोग अपना अखबार बदल देते हैं तो उनसे प्रतिबद्धता की उम्मीद क्या की जाय। दो-ढाई रूपये देकर क्या उन्होंने अखबार के मालिक को खरीद लिया है जो उससे मिशन और नैतिकता की अपेक्षा करते हैं?

पाठकों को उक्त प्रकार से चिरकुट बताने से पहले उन्होंने पत्रकारों को भी उनकी औकात बताने की कोशिश की। बोले- आप इस भ्रम में मत रहिएगा कि यह राज-काज आपके भरोसे चल रहा है। आपकी स्थिति उस छिपकली जैसी है जो छत से चिपककर यह भ्रम पाल बैठी है कि इसे उसी ने रोक रखा है; या हाथी की पीठ पर बैठी उस मक्खी की तरह है जो उसे छोड़कर अकेले जंगल में इसलिए नहीं जाने देती कि उसके बिना इसकी (हाथी की) रक्षा नहीं हो सकेगी।

उनके पहले के वक्ताओं ने “मिशनरी पत्रकारिता- संदर्भ और प्रासंगिकता” नामक विषय पर बोलते हुए देश में लगातार बढ़ रहे भ्रष्टाचार, माफ़ियागीरी, घोटालों, इत्यादि के परिप्रेक्ष्य में मीडिया की भूमिका पर अनेक सुंदर व्याख्यान दिए थे और भविष्य के मीडियाकर्मियों को उनकी बढ़ती जिम्मेदारियों का बोध कराने का प्रयास किया था। चहुँओर निराशा के घने बादलों के बीच आशा का एक मात्र सूरज समाज के चौथे स्तंभ को बताया गया था। तब प्रबंध सम्पादक जी ने अपनी बात की शुरुआत एक रोचक कहानी से की थी-

बताने लगे- एक वृद्ध मौलवी लैंप पोस्ट के नीचे सड़क पर बहुत देर से कुछ ढूँढ रहा था।  एक नौजवान को उसकी परेशानी देखी नहीं गयी। सहायता करने की गर्ज़ से पूछा- बाबा क्या खोज रहे हो?

“बेटा, मैं अपनी टोपी सी रहा था, अचानक सुई हाथ से गिर गयी। वही ढूँढ रहा हूँ लेकिन मिल नहीं रही है” मौलवी ने तफ़सील से बताया।

“अच्छा बताइए टोपी कहाँ सिल रहे थे और सूई ठीक कहाँ गिरी? मैं खोजता हूँ।” युवक ने सहानुभूति दिखायी।

“बेटा सुई तो मस्ज़िद में गिरी थी लेकिन वहाँ बहुत अंधेरा है इसलिए यहाँ रोशनी में ढूँढ रहा हूँ।”

हाल में ठहाका लगना तय था ही। तालियाँ थमीं तो उक्त वक्ता ने बताया कि आज यहाँ की चर्चा भी कुछ इसी प्रकार की हो रही है। समस्या की असली जड़ जहाँ है उसे कोई नहीं देखना चाहता। सबका समाधान मीडिया से कराना चाहता है। देश की सरकारें भ्रष्ट है, संसद अपना काम नहीं कर पा रही। न्यायालय भी संदेह से परे नहीं रह गये हैं। उद्योगपति तेजी से अपना पैसा बढ़ा रहे हैं। गुप्त गठबंधन हो रहे हैं। हर आदमी लाभ कमाने के उद्यम में लगा है, लेकिन मीडिया को नैतिकता और मिशन का पाठ पढ़ाया जाता है। जब हम मीडिया में प्रोफ़ेशनलिज़्म की बात करते हैं तो इसे गाली समझा जाता है। आजादी से पहले अखबारों ने एक मिशन के साथ काम किया था- देश को गुलामी से मुक्त कराने का मिशन। लेकिन आज स्थिति वैसी नहीं है। आज यह अन्य प्रोफेशन्स की तरह एक पेशा के रूप में क्यों नहीं पहचाना जाना चाहिए? अख़बार या टीवी चैनेल का जो मालिक करोड़ो रुपये का पूँजी निवेश करता है उसे लाभ कमाने के बारे में क्यों नहीं सोचना चाहिए? मात्र दो रूपये में चालीस पृष्ठ का अखबार आपके दरवाजे पर पहुँचाने का प्रबंध करने वाला अखबार मालिक आपके बारे में कितना सोचे जब आप दो रुपये की साबुन की टिकिया पाने के लिए अपना वर्षों पुराना अखबार बदल देते हैं। आपकी कोई प्रतिबद्धता नहीं है तो अखबार चलाने वालों से आप क्या अपेक्षा रखते हैं?

उन्होंने अखबार पहुँचाने वाले हॉकर के प्रति पाठकों के रूखे व्यवहार का वर्णन भी किया कि कैसे वह विपरीत मौसम में भी सुबह छः बजे घर पर अखबार पहुँचाता है और कभी देर हो जाने पर सुबह की चाय का स्वाद खराब कर देने का दोषी बन जाता है। बिना नागा किए तीस दिन अखबार देने के बाद जब वह पैसा लेने पहुँचता है तो महानुभावों को  ‘आज नहीं कल’ का जवाब देते देर नहीं लगती। “ऐसे लोग जब बिना जाने समझे अखबार के मालिक, अखबार के सम्पादक और अखबार के रिपोर्टर पर आरोप लगाते हैं तो मुझे आपत्ति होती है।”

कोई भी व्यवसाय जब प्रारम्भ किया जाता है तो उसकी प्रगति का लक्ष्य निर्धारित किया जाता है। लाभ कमाना एक सर्वमान्य लक्ष्य है। उसके लिए जरूरी उपाय तलाशे जाते हैं और उन्हें अपनाया जाता है। स्वतंत्रता मिलने के बाद पत्रकारिता भी किसी अन्य  व्यवसाय की तरह कुछ लक्ष्यों की पूर्ति के उद्देश्य से आगे बढ़ी। समय के साथ तालमेल बिठा कर चलने वाले सफल हुए। यह कार्य आज भी एक मिशन बना हुआ है, लेकिन इसका स्वरूप बदल गया है। आज पत्रकारिता ‘स्वांतः सुखाय’ नहीं है।

धारा प्रवाह बोलते हुए उन्होंने एक-दो और चुटकुले और आख्यान सुनाये और बोले- यह अजीब स्थिति है कि प्रायः सभी पत्रकार अपने प्रबंधन को कोसते रहते हैं। उनके अनैतिक कार्यों और शोषक प्रवृत्तियों का रोना रोते हैं। लेकिन वे ही जब स्वयं प्रबंधक अर्थात्‌ मालिक बन जाते हैं तो वे सारी मिशनरी बातें हवा हो जाती हैं और वे सभी बुराइयाँ अपना लेते हैं जिन्हें कोसते इनका समय बीता है। फिर उन्होंने जोड़ा कि इन सारी बातों के बावजूद आज भी जब देशहित का मुद्दा उठता है तो देश की पूरी मीडिया एकजुट होकर आवाज उठाती है। उन्होंने इसके कई उदाहरण भी गिना डाले।

अपने को एक अदना सा पत्रकार बताते हुए उन्होंने ‘छोटे-छोटे प्रयासों का महत्व’ रेखांकित करने के लिए उस गिलहरी की कथा सुनायी जिसने समुद्र पर रामसेतु के निर्माण की प्रक्रिया में योगदान कर्ताओं की सूची में अपना नाम लिखाने के लिए बार-बार तट पर लोटपोट कर शरीर में रेत बटोरने और पुल पर जाकर शरीर झाड़ देने का उद्यम किया था। ताकि भविष्य में इतिहास लिखने वाले यह न लिखें कि जब सारा  बानर समाज पुल बना रहा था तो वहाँ मौजूद एक गिलहरी कुछ नहीं कर रही थी। अस्तु कुछ न कुछ यथा सामर्थ्य करते रहना चाहिए। इसके बाद उन्होंने एक जोरदार वीररस की कविता सुनायी। मैं एक ही पंक्ति नोट कर पाया क्योंकि उन्होंने दुहराया नहीं था। हाल को गुँजाने वाली तालियाँ बजीं और अगले वक्ता बुलाये गये।

यहाँ तक तो सब ठीक-ठाक रहा लेकिन जब प्रश्न-उत्तर का दौर चला तो प्रबंध-संपादक महोदय को उठकर सफाई देनी पड़ी। छात्र श्रोताओं के तीखे प्रहार वाकई बेचैन करने वाले थे। अंततः कुलपति जी को अध्यक्षीय भाषण में इस मसले पर अंतिम बात कहनी पड़ी। वह बहुत ही मार्मिक और सजग करने वाली बात थी। लेकिन उसकी चर्चा अगली कड़ी में। अभी तो आप उस वीररस की कविता का आनंद लेते हुए इस ‘चिरकुटई के आरोप’ का जवाब दीजिए।

गूगल महराज ने उस एक लाइन का ‘जामन’ लेकर पल भर में अपने क्षीर सागर के भंडार से पूरी कविता की दही परोस कर रख दी।

वह लाइन थी-

हम वो कलम नहीं हैं जो बिक जाती हों दरबारों में
हम शब्दों की दीप- शिखा हैं अंधियारे चौबारों में

इस लंबी कविता के मूल कवि हैं डॉ. हरिओम पवार। इसके आगे पीछे की कुछ और लाइनें यहाँ आपके लिए। पूरी कविता यहाँ है।

इन्कलाब के गीत सुनाते जायेंगे

कोई रूप नहीं बदलेगा सत्ता के सिंहासन का
कोई अर्थ नहीं निकलेगा बार-बार निर्वाचन का
एक बड़ा ख़ूनी परिवर्तन होना बहुत जरुरी है
अब तो भूखे पेटों का बागी होना मजबूरी है

जागो कलम पुरोधा जागो मौसम का मजमून लिखो
चम्बल की बागी बंदूकों को ही अब कानून लिखो
हर मजहब के लम्बे-लम्बे खून सने नाखून लिखो
गलियाँ- गलियाँ बस्ती-बस्ती धुआं-गोलियां खून लिखो

हम वो कलम नहीं हैं जो बिक जाती हों दरबारों में
हम शब्दों की दीप- शिखा हैं अंधियारे चौबारों में
हम वाणी के राजदूत हैं सच पर मरने वाले हैं
डाकू को डाकू कहने की हिम्मत करने वाले हैं

जब तक भोली जनता के अधरों पर डर के ताले हैं
तब तक बनकर पांचजन्य हम हर दिन अलख जगायेंगे
बागी हैं हम इन्कलाब के गीत सुनाते जायेंगे

अगवानी हर परिवर्तन की भेंट चढ़ी बदनामी की
हमने बूढ़े जे.पी. के आँसू की भी नीलामी की
परिवर्तन की पतवारों से केवल एक निवेदन था
भूखी मानवता को रोटी देने का आवेदन था

अब भी रोज कहर के बादल फटते हैं झोपड़ियों पर
कोई संसद बहस नहीं करती भूखी अंतड़ियों पर
अब भी महलों के पहरे हैं पगडण्डी की साँसों पर
शोकसभाएं कहाँ हुई हैं मजदूरों की लाशों पर

निर्धनता का खेल देखिये कालाहांडी में जाकर
बेच रही है माँ बेटी को भूख प्यास से अकुलाकर
यहाँ बचपना और जवानी गम में रोज बुढ़ाती हैं
माँ , बेटे की लाशों पर आँचल का कफ़न उढाती है

जब तक बंद तिजोरी में मेहनतकश की आजादी है
तब तक हम हर सिंहासन को अपराधी बतलायेंगे
बाग़ी हैं हम इन्कलाब के गीत सुनाते जायेंगे

 

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

शुक्रवार, 31 दिसंबर 2010

क्या है भारत में धर्मनिरपेक्षता का भविष्य?

वर्धा वि.वि. के स्थापना-दिवस पर बड़े बुद्धिजीवियों ने दिया जवाब…

कुलदीप नैयर का कहना है कि हिंदुस्तान में धर्मनिरपेक्षता का भविष्य बहुत सुंदर है। यहाँ सेक्युलरिज्म बहुत मजबूत होता जा रहा है। इस देश का आम आदमी सांप्रदायिक नहीं है। जिन (साम्प्रदायिक) पार्टियों द्वारा हिंदू-हिंदू की रट लगायी जाती है उनको देश के बहुसंख्यक हिंदुओं ने ही सत्ता से बाहर बैठा रखा है।

यह चर्चा हो रही थी महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के हबीब तनवीर प्रेक्षागृह में और अवसर था विश्वविद्यालय की स्थापना को तेरह साल पूरा होने पर आयोजित समारोह का। यहाँ देश के तीन बड़े बुद्धिजीवी और विचारक आमंत्रित किये गये थे - इस प्रश्न पर विचार मंथन करने के लिए कि देश के वर्तमान परिदृश्य में धर्मनिरपेक्षता का मूल्य कितना महत्वपूर्ण है और इसका भविष्य कितना सुरक्षित है। पाकिस्तान के साथ भाईचारा बढ़ाने के लिए वाघा सीमा पर मोमबत्तियाँ जलाकर अभियान चलाने वाले वरिष्ठ स्तम्भकार कुलदीप नैयर, गांधी संग्रहालय पटना के सचिव व प्रतिष्ठित इतिहासकार डॉ.रज़ी अहमद और देश विदेश की मीडिया में अनेक प्रकार से सक्रिय रहने वाले वरिष्ठ पत्रकार रामशरण जोशी ने इस परिचर्चा में अपने विचार रखे।

इस विषय पर चर्चा क्यों : विभूति नारायण राय

विश्वविद्यालय के कुलपति विभूतिनारायण राय ने अपने अतिथियों का स्वागत करने के बाद विषय प्रवर्तन करते हुए यह स्पष्ट किया कि इस समय धर्मनिरपेक्षता के मुद्दे पर चर्चा की आवश्यकता क्यों पड़ी। उन्होंने कहा कि हाल की दो घटनाओं ने इस मुद्दे पर दुबारा विचार के लिए प्रेरित किया। एक तो अयोध्या के विवादित मुद्दे पर हाईकोर्ट के अनपेक्षित फैसले ने और दूसरा विनायक सेन को देशद्रोह के आरोप में आजीवन कारावास की सजा ने।

कुलपति ने कहा कि अयोध्या पर उच्च न्यायालय ने जो निर्णय लिया उसमें आस्था को आधार बनाया। यह एक खतरनाक बात है। अगर देश का कायदा-कानून आस्था के आधार पर चलने लगा तो अनेक मध्यकालीन कुरीतियाँ दुबारा सिर उठा सकती है। संभव है कि सती-प्रथा दुबारा जन्म ले ले; क्योंकि आज भी देश में एक बड़ी संख्या सती को पूजनीय मानती है। अस्पृश्यता की प्रथा भी दुबारा सिर उठा सकती है क्योंकि बहुत लोग आज भी उसमें आस्था रखते हैं। विनायक सेन की सजा हमें ‘ककड़ी के चोर को कटार से काट डालने’ की कहावत याद दिलाती है। जनता के हक के लिए लड़ने वाले को एक लोकतांत्रिक देश में ऐसी सजा होना दुर्भाग्यपूर्ण है। क्या हमारी न्याय व्यवस्था अब जन आंदोलनों को दबाने का काम भी करेगी?

धर्मनिरपेक्षता को लोकतंत्र, आधुनिकतावाद व राष्ट्रवाद के परिप्रेक्ष्य में देखें- रामशरण जोशी

पत्रकारिता के क्षेत्र में विशद अनुभव रखने वाले और अबतक तेईस पुस्तकों के प्रणेता डॉ. रामशरण जोशी ने इतिहास का संक्षिप्त संदर्भ देते हुए कहा कि भारत में अलग-अलग चरणों में हिंदू और मुस्लिम शासक व शासित वर्ग के रूप में बँटे रहे हैं। अंग्रेजी गुलामी के समय दोनो शासित वर्ग में आ गये। सम्मिलित संघर्ष के बाद आजादी मिली लेकिन देश का बँटवारा हो गया। भारत में धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य की स्थापना हुई। पाकिस्तान में भी जिन्ना समर्थकों ने ‘पॉलिटिकल सेक्यूलरिज़्म’ की बात उठायी थी। लेकिन वहाँ स्थिति बदल गयी। भारत में स्वतंत्रता मिलने के तिरसठ वर्ष बाद  धर्मनिरपेक्षता का स्वरूप क्या होना चाहिए यह मुद्दा विचारणीय बना हुआ है।

उन्होंने बताया कि सोवियत संघ के विघटन के बाद बची विश्व की एकमात्र महाशक्ति अमेरिका के राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने संयुक्त राष्ट्र संघ में कहा था कि शीतयुद्ध के बाद सबसे अधिक ‘धार्मिक आतंकवाद (religious terrorism)’ बढ़ा है।

डॉ.जोशी ने यह सवाल उठाया कि क्या हमारे देश के राष्ट्रीय चरित्र में धर्मनिरपेक्षता का मूल्य व्यावहारिक स्वरूप ले पाया है। क्या हम वास्तविक अर्थों में एक बहुलवादी राष्ट्र बन पाये हैं। हमारे संविधान में जिन मूल्यों को समाहित किया गया है क्या उन मूल्यों की पैठ हमारे जनमानस में हो पायी है? अयोध्या के उस विवादित ढाँचे का गिराया जाना उतना चिंताजनक नहीं है जितना उस कृत्य से हमारे संविधान में रचे-बसे भारतीय राष्ट्र के चरित्र का नष्ट हो जाना है। संविधान के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को ढहा देने वाले आज भी सुरक्षित हैं और फल-फूल रहे हैं, यह बहुत महत्वपूर्ण है।

धर्मनिरपेक्षता को आज के हालात में समझने के लिए हमें आधुनिकतावाद (modernism) को समझना होगा, लोकतांत्रिक राष्ट्रवाद की विवेचना करनी होगी। इसके अतिरिक्त राष्ट्र-राज्य के चरित्र पर वैश्वीकरण और तकनीकी विकास के प्रभावों की पड़ताल भी करनी होगी। हमारे राजनेताओं ने धर्मनिरपेक्षता के मुद्दे का प्रयोग अपनी राजनैतिक रोटियाँ सेंकने में की हैं। वे `सेलेक्टिव सेकुलरिस्ट’ नीतियों पर चले हैं। (अर्थात्‌ अपनी सुविधा और वोट खींचने की संभावना के अनुसार सेक्यूलरिज़्म की व्याख्या और प्रचार-प्रसार करते रहे हैं)

राजनीतिक प्रतिस्पर्धा  में पक्षपातपूर्ण नीतियों का अनुगमन होने लगता है। अपने देश में यही हुआ है। धर्मनिरपेक्षता आज भी भारतीय नागरिक के जीवन के अविभाज्य अंग के रूप में विकसित नहीं हो सकी है। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद केवल दिल्ली में दिनदहाड़े हजारो सिक्खों का कत्ल कर दिया गया लेकिन आजतक किसी को इस जुर्म में फाँसी नहीं हुई। (बल्कि हत्यारों को उकसाने वाले और संरक्षण देने वाले राजनेता सत्तासीन होते रहे हैं)

आज यह देखने में आ रहा है कि वैश्वीकरण और तकनीकी विकास से उपजी नयी अर्थव्यवस्था में उभरने वाला नव-मध्यम वर्ग अधिक धार्मिक प्रतीकों का प्रयोग कर रहा है। नये धनिकों द्वारा सबसे अधिक मंदिर-मस्ज़िद-गुरुद्वारे बनवाये जा रहे हैं। इस परिदृश्य में धर्मनिरपेक्षता के स्थान पर पंथनिरपेक्षता की बात की जा रही है। देश के राष्ट्रीय चरित्र में धर्मनिरपेक्षता का मूल्य बचा होने पर ही शंकाएँ उठने लगी हैं। इन शंकाओं का उठना ही सेक्यूलरिज़्म की हार है। इसलिए यह मुद्दा बहुत गम्भीर चिंतन के योग्य है। वैश्विक पूँजीवाद, तकनीक और अंतरराष्ट्रीयतावाद के परिप्रेक्ष्य में इस मूल्य को व्याख्यायित करना होगा।

इतना बताता चलूँ कि विद्वान वक्ताओं द्वारा कही गयी इन बातों को यहाँ प्रस्तुत करते समय मुझे अपने निजी विचारों को रोक कर रखना पड़ा है। टिप्पणियों की शृंखला में आवश्यकतानुसार चर्चा की जा सकती है। अगली कड़ी में मैं डाँ रज़ी अहमद की चमत्कृत कर देने वाली बातों की चर्चा करूंगा और कुलदीप नैयर के अति आशावादी जुमलों को प्रस्तुत करूंगा। इन विचारों पर आपकी प्रतिक्रिया सादर आमंत्रित है। अभी इतना ही… (जारी)

!!! आप सबको नये वर्ष की कोटिशः बधाई और हार्दिक शुभकामनाएँ !!!

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

गुरुवार, 23 दिसंबर 2010

दास्ताने स्कूटर… बहुत कठिन है डगर।

पिछली कड़ी में आपने पढ़ा…

…तभी एक हँसमुख डॉक्टर साहब ने मुस्कराते हुए कहा- “मुझे इसका बहुत अच्छा अनुभव है। आपकी समस्या का जो पक्का समाधान है वह मैं बताता हूँ…। ऐसा कीजिए इसे जल्दी से जल्दी बेंच दीजिए…। जो भी दो-तीन हजार मिल जाय उसे लेकर खुश हो जाइए और मेरी तरह शेल्फ़-स्टार्ट वाली स्कूटी ले लीजिए…” वहाँ उपस्थित सभी लोग ठठाकर हँस पड़े, इनका चेहरा उतर गया और मेरे पहियों के नीचे से जमीन खिसक गयी…।

अब आगे…

लेकिन इन्होंने धैर्य नहीं खोया। बोले- “बेंचने का तो मैंने कभी सोचा ही नहीं; अधिक से अधिक मैं इसे वापस उत्तर प्रदेश भेज दूंगा। वहाँ पर इसके स्पेयर पार्ट्स मिल जाएंगे। …आपलोग बस इतना कन्फ़र्म कर दीजिए कि उद्योगपति जमनालालाल बजाज के मूलस्थान वर्धा में बजाज स्कूटर का एक भी मिस्त्री नहीं है। दीपक तले अंधेरा की इस मिसाल को मैं पूरी दुनिया को बता लूँगा उसके बाद ही हार मानूंगा।” इतना सुनने के बाद वहाँ के डिप्टी स्पोर्ट्स ऑफीसर ने कहा कि आप घबराइए नहीं; मैं आपको एक एक्सपर्ट के पास ले चलता हूँ। मेरे मुहल्ले में रहता है। इन्होंने मुझे उनकी बाइक के पीछे लगा दिया। कई चौराहों, तिराहों और अंधे मोड़ों को पार करते हुए, मोटी-पतली गलियों से गुजरते हुए हम अंततः एक मिस्त्री के दरवाजे पर जा पहुँचे। सुबह आठ बजे का वक्त था और उसके छोटे से अहाते से लेकर बाहर सड़क तक पंद्रह-बीस मोटरसाइकिलें आड़े-तिरछे खड़ी हुईं थीं। इन्होंने उचक-उचक कर देखा, उस भीड़ में एक भी स्कूटर नहीं दिखा।

‘नितिन मिस्त्री’ ने अभी काम शुरू नहीं किया था। ये सभी गाड़ियाँ पिछले दिन इलाज के लिए भर्ती हुईं थीं। उस भीड़ की ओर देखते हुए स्पोर्ट्स ऑफीसर ने भावपूर्ण मुस्कान बिखेरी। मानो कह रहे हों- “देखा, कितना बड़ा मिस्त्री है… गाड़ियों की लाइन लगी है। एक दिन जमा करो तो दूसरे-तीसरे दिन नम्बर लगता है”

मुझे उस मुस्कान में कोई आशा की किरण नहीं दिखी। यदि बोल पाता तो मैं कहता- “हाँ देख रहा हूँ… कितना चिरकुट मिस्त्री है। आठ-गुणा-आठ फुट के कमरे में तीन-चार बच्चो और पत्नी के साथ रह रहा है और साथ में शायद एक छोटा भाई भी है। इतनी ही कमाई होती तो एक बड़ा गैरेज न बना लेता…!! काम अधिक है तो असिस्टेंट रख लेता, स्टाफ़ बढ़ा लेता…!!!”  दर‌असल मुझे वहाँ ‘प्रोफ़ेसनलिज़्म’ का घोर अभाव दिखायी दे रहा था।

स्पोर्ट्स ऑफीसर ने नितिन मिस्त्री को बुलाया जो ब्रश करते हुए बाहर निकला। आपस में दोनो ने मराठी में कुछ बात की। वे शायद हम नये ग्राहकों का परिचय बता रहे थे। कुछ देर बाद मिस्त्री मेरे मालिक से मुखातिब हुआ, “सर जी, हम इसको देख तो लेंगा लेकिन इसमें कोई स्पेयर पार्ट ‘लगेंगा’ तो यहाँ नहीं मिल ‘पायेंगा’।  नागपुर से आपको मँगाना पड़ेंगा…” हमें इस बात की उम्मीद तो पहले से ही थी इसलिए उसके बाद तय यह हुआ कि मिस्त्री मेरी जनरल सर्विसिंग करेगा। मेरी हेड लाइट का स्विच जाम हो गया है उसकी ऑयलिंग-ग्रीसिंग करेगा, पुरानी हो चुकी बैटरी बदल देगा ताकि हॉर्न और लाइट तेज हो सके, लेकिन ‘चोक-वायर’ की समस्या ठीक होने की गारंटी नहीं होगी। कोई जुगाड़ आजमाने की कोशिश करेगा लेकिन सफलता की संभावना क्षीण ही है। इन्होंने जब संभावित समय पूछा तो मध्यस्थ महोदय के दबाव में उसने मुझे ‘अगले दिन भर्ती कर लेने’ पर सहमति दे दी।

अगले दिन स्टेडियम से हम दुबारा उसकी दुकान पर पहुँचे। मिस्त्री ने इन्हें घर तक छोड़ा और मुझे वापस अपने घर/दुकान/गैरेज पर ले जाकर खड़ा कर दिया। मैं दिन भर दूसरी बाइक्स का आना-जाना देखता रहा। मिस्त्री वास्तव में बहुत बिजी था। उसकी मेहनत की तुलना में उसका मेहनताना बहुत कम था। ज्यादातर ग्राहक उसके परिचित टाइप थे जो छोटी-मोटी गड़बड़ियाँ मुफ़्त में ठीक कराने की फिराक में लगे रहते थे। पिछले दिन से भर्ती गाड़ियाँ एक-एक कर जाती रहीं और शाम तक उतनी दूसरी गाड़ियाँ आकर जमा हो गयीं। मेरी पैरवी करने वाला कोई नहीं था, इसलिए मुझे शाम होने तक उसने हाथ नहीं लगाया। शाम को छः बजे मेरे मालिक का फोन आया कि काम पूरा हो गया हो तो मुझे लेने आ जाँय। ऑफिस से छूटते वक्त इन्होंने फोन किया होगा। इधर से मिस्त्री ने जवाब दिया कि अभी थोड़ा काम बाकी रह गया है। एकाध घंटे बाद हो पाएगा। फोन पर मिस्त्री के हाव-भाव से लगा कि वे इस समय मुझे लेने नहीं आ रहे हैं, क्योंकि उसने उस फोन के बाद भी मुझे छुआ नहीं था।

अगले दिन सुबह आठ बजे ये स्टेडियम से खेलकर कार से गैरेज पर  आये तो मेरी बारी आ चुकी थी। हेडलाइट का स्विच ठीक हो चुका था लेकिन असली समस्या जस की तस थी। मिस्त्री ने उन्हें बताया कि स्कूटर के लिए ‘ओरिजिनल बैटरी’ कल मिल नहीं पायी थी। आज मँगाया है। शाम तक मैं चोक का भी कुछ कर दूँगा। ये चले गये तो उसने दूसरी गाड़ियों का काम शुरू कर दिया। आखिरकार दोपहर बाद बैटरी बदली गयी। शाम को ये आये तो मिस्त्री ने चोक की समस्या न ठीक कर पाने के कई कारण गिनाने शुरू किए। इन्होंने उससे पारिश्रमिक पूछकर डेढ़ हजार रूपये थमाए और मुझे लेकर घर आ गये।

अगले दिन से इन्होंने चोक वायर की खोज शुरू की। इनके एक मित्र इलाहाबाद से वर्धा आने वाले थे। उनसे इन्होंने कहा कि बजाज-लीजेंड में जितने किस्म के ‘वायर’ लगते हों सभी वहाँ से लेते आयें। एक सप्ताह बाद क्लच-वायर, एक्सीलरेटर-वायर और चोक वायर इलाहाबाद से वर्धा की यात्रा करके आ गये। अगले दिन चोक वायर के साथ मुझे नितिन के गैरेज़ भेजा गया। एक बार फिर चौबीस घंटे की प्रतीक्षा के बाद नम्बर आया। लेकिन दुर्भाग्य के क्षण अभी समाप्त नहीं हुए थे…Sad smile

पुराना केबल निकालकर नया केबल डालने में उसके पसीने छूट गये। अंततः उसने हार मान ली। फोन करके इसने बता दिया कि इलाहाबाद से मँगाया हुआ चोक-वायर इस मॉडल का नहीं हैं इसलिए नहीं लग सकता। फिर एक विचित्र जुगाड़ लगाने का काम शुरू हुआ। चोक वायर के दोनो सिरों पर घुंडियाँ होती हैं। एक सिरा दाहिनी हैंडिल के पास बने लीवर के खाँचे में फिट होता है और दूसरा सिरा कार्ब्यूरेटर में जाता है जहाँ एक स्प्रिंग के साथ जोड़कर इसे खास तरीके से फिट किया जाता है। नितिन मिस्त्री ने एक पुराने तार के घुंडी वाले सिरे को नीचे कार्ब्यूरेटर में तो फिट कर दिया लेकिन दूसरे सिरे को उसके सही रूट से हैंडिल तक ले जाने के बजाय सीट के नीचे से दाहिनी ओर बाहर निकाल दिया और उसमें एक छल्ला बना दिया। इस प्रकार चोक लेने के लिए सीट के नीचे छिपे छल्ले को बाहर निकालकर उसमें उंगली फसाते हुए जोर से खींचना होता था और फिर इसी स्थिति में किक मारना होता था।

जुगाड़ वाला चोक लगवाकर हम घर आये। लेकिन इसमें एक बड़ी खामी रह गयी थी। छल्ला पकड़कर जोर से खींचने पर चोक लेने की प्रक्रिया तो पूरी हो गयी लेकिन छोड़ने पर तार ठीक से वापस नहीं हो पा रहा था। नतीजा यह हुआ कि एक बार चोक में ही तार अटका रह गया और मेरे मालिक मुझे चोक में ही हाँकते रहे। अलस्सुबह जब पहली किक में ही मैं भरभराकर स्टार्ट हो गया तो इन्हें कुछ संदेह तो हुआ लेकिन एक दो बार उस तार की पूँछ उल्टा घुसेड़ने के अलावा ये कुछ न कर सके। इनका संदेह यकीन में तब बदला जब मेरी टंकी का पेट्रोल सम्भावित समय से बहुत पहले ही खत्म हो गया। मुझे एक बार फिर उसी नितिन के पास जाना पड़ा। उसने ढ‌क्‌कन खोलकर फँसा हुआ तार छुड़ा दिया और तार को ‘आहिस्ता खींचने’ की ट्रेनिंग देकर चलता कर दिया।

अब दो-चार दिन के अभ्यास से काम आसान होता गया और जुगाड़ चल निकला। लेकिन एक दूसरी समस्या तैयार खड़ी थी।  अचानक क्लच वायर की घुंडी भी तीन-चार साल की सेवा देकर चल बसी। गनीमत थी कि यह दुर्घटना घर पर ही हुई, इसलिए मुझे ठेलकर चलाने की जरुरत नहीं पड़ी। वैसे तो नया क्लच वायर डालने में पाँच से दस मिनट ही लगते हैं लेकिन मिस्त्री की तलाश में ही तीन दिन लग गये। मुझको बिना क्लच के स्टार्ट करके दुकान तक ले जाना संभव नहीं था। इन्होंने नितिन मिस्त्री को फोन मिलाया तो उसने असमर्थता जताते हुए ‘ऑउट ऑफ़ स्टेशन’ होने की बात बतायी। दूसरी कई दुकानों पर संपर्क किया गया तो सबने कहा कि दुकान छोड़कर नहीं जाएंगे। गाड़ी यहीं लाइए, यह भी कि गाड़ी देखकर ही बता पाएंगे कि काम हो पाएगा कि नहीं। रोज़ शाम को ये घर आते और अपनी असफलता की कहानी मालकिन को सुनाते। मैं  उत्सुकता पूर्वक रोज किसी मिस्त्री की प्रतीक्षा करता रहा।

अंततः इन्होंने विश्वविद्यालय के इंजीनियर साहब को, जो यहाँ का स्थानीय निवासी ही हैं, मेरी समस्या बताकर एक मिस्त्री का जुगाड़ करने का अनुरोध किया। उन्होंने विश्वास दिलाया कि बहुत जल्द मेरा काम हो जाएगा। दो-दिन और बीते तब अचानक इनके ऑफ़िस का एक कर्मचारी एक मिस्त्री को लेकर आया और उसने दस मिनट में एक क्लच वायर फिट कर दिया। इलाहाबाद से आया क्लच-वायर का केबल पड़ा रह गया। इन्होंने उस मिस्त्री से अनुरोध किया कि यदि हो सके तो चोक वायर को उसके सही स्थान पर फिट कर दो। इसपर उसने कहा कि किसी दिन फुर्सत से गाड़ी दुकान पर भेज दीजिएगा। ठीक करा दूँगा।

अगले इतवार को इन्होंने स्वयं उसकी दुकान पर जाकर चोक वायर डलवाने का निश्चय किया। लेकिन जब इन्होंने मोबाइल पर आने की अनुमति माँगी तो उसने टरकाते हुए कहा कि आज वह मिस्त्री आया ही नहीं है जो इस काम का एक्सपर्ट है।

इतना सुनने के बाद कोई भी झुँझलाकर सिर पीट लेता। लेकिन दाद देनी पड़ेगी इनके धैर्य की और काम पूरा कराने की जिद्दी धुन की। ये चोक वायर की केबिल डिक्की में डाल मुझे लेकर शहर की ओर निकल पड़े। पूछते-पू्छते बजाज कंपनी की अधिकृत वर्कशॉप पर जा पहुँचे। वही वर्कशॉप जहाँ से बहुत पहले मुझे बैरंग लौटाया जा चुका था। उसबार इनके चपरासी ने मुझे वहाँ ले जाकर सर्विसिंग कराने की असफल कोशिश की थी। तब किसी मिस्त्री ने मुझे घास नहीं डाली थी। कहते थे कि इस शहर में यह गाड़ी है ही नहीं इसलिए हम इसका स्पेयर पार्ट नहीं रखते। कंपनी के नियमों के अनुसार हम बाहर से मँगाकर कोई स्पेयरपार्ट डाल भी नहीं सकते।

इस बार भी यही टका सा जवाब इन्हें मिला। लेकिन इन्होंने मैनेजर से बहस करनी शुरू की। बोले- यदि बजाज कंपनी ने मुझे यह स्कूटर बेचा है और आपको सर्विस सेंटर चलाने का लाइसेंस दिया है तो आपको इसे ठीक करना ही चाहिए…। यह कैसे होगा यह आप जानिए, लेकिन आप बिना सर्विस दिए लौटा नहीं सकते…। मैं इसके लिए ‘राहुल बजाज’ को भी एप्रोच कर सकता हूँ…। आपकी कम्पलेंण्ट करके कुछ नुकसान तो करा ही सकता हूँ। आप अपने उत्तरदायित्व से भाग नहीं सकते… कुछ तो संवेदनशील होना सीखिए आप लोग…  आदि-आदि। मैनेजर भौचक होकर देख रहा था। ...फिर इनका पूरा परिचय पूछने लगा।

एक मिस्त्री ने इनको किनारे ले जाकर प्रस्ताव रखा कि सामने जो प्राइवेट मिस्त्री ने दुकान खोल रखी है वह स्कूटर का स्पेशलिस्ट  है। मैं उससे बोल देता हूँ कि आपका चोक वायर डाल दे। लेकिन इन्होंने ठान लिया था कि काम यहीं से कराकर जाना है। अब और भटकने को तैयार नहीं थे ये। इनकी मंशा भाँपकर वहाँ सबने आपस में बात की और भीतर काम कर रहे एक मिस्त्री को बुलाया गया। उस मिस्त्री ने मुझे देखकर पहचान लिया। उसी ने पिछली बार मुझे छू-छाकर छोड़ दिया था। लेकिन इस बार उसे मैनेजर द्वारा समझाया गया कि काम करना ही है, चाहे जैसे हो। जनार्दन मिस्त्री ने बेमन से तैयार होते हुए आखिरी दाँव चला। साहब जी, इसे छोड़कर जाना पड़ेगा। तीन-चार घण्टे लगेंगे। न हो तो कल सुबह लेकर आ जाओ।

लेकिन ये टस से मस न हुए। बोले- आज मेरी छुट्टी है। मैं पूरा दिन यहीं बैठने को तैयार हूँ। बस अब आगे के लिए नहीं टाल सकता। देखते-देखते सभी मिस्त्री वहाँ से चले गये, एक आदमी दुकान का शटर गिराने लगा। इन्होंने पूछा तो बताया गया कि लंच ब्रेक हो गया है अब तीन बजे से काम शुरू होगा। ये अड़े रहे कि मैं काम पूरा कराकर ही जाऊँगा, आपलोग लंच करके आइए। इसपर उस मिस्त्री ने मुझे स्टैंड से उतारा और भीतर की ओर लेकर चला गया। इनको पिछले दरवाजे से आने के लिए कह दिया।

जब ये पिछले दरवाजे से भीतरी अहाते में पहुँचे तो जनार्दन मिस्त्री अपना टिफिन समाप्त करने वाला था। हाथ धोकर उसने मेरी डिक्की से केबल निकाला, दोनो सिरों की घुंडियों का मुआइना किया और इंजन का ढक्कन उतारकर पुरानी केबल के उपरी सिरे से नयी केबल का निचला सिरा एक पतले तार से बाँध दिया। फिर पुरानी केबल के निचले सिरे को धीरे-धीरे खींचकर बाहर निकालने लगा। इस प्रकार दो-तीन मिनट में ही पुरानी केबल का स्थान नयी केबल ने ले लिया। केबल के भीतर दौड़ रहे चोक-वायर के दोनो सिरों को उनके जायज स्थानों में फिट करने में पाँच मिनट और लगे। इस प्रकार पूरा काम पंद्रह मिनट का ही निकला।

मेरे मालिक इस टुच्चे से काम पर इतना समय और दौड़-धूप करने के बाद मन ही मन कुढ़ तो रहे ही थे लेकिन अंततः मिली अपनी सफलता पर प्रसन्न भी हो गये थे। इन्होंने उस मिस्त्री को पचास रूपये देने का मन बनाया था, लेकिन देने से पहले आदतन उससे ही पूछ लिया। पहले तो उसने संकोच किया लेकिन जब इन्होंने कहा कि ‘काम मेरे मनमाफ़िक और दाम तुम्हारी इच्छानुसार’ तो उसने अपनी फीस माँगी- 20/- रूपये।

प्रस्तुति : सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी

मंगलवार, 21 दिसंबर 2010

स्कूटर बोले तो घुर्र.. घुर्र.. घुर्र.. टींऽऽऽ

 

hamara-bajajयूँ तो मेरे मालिक आजकल बहुत परेशान हैं लेकिन मुझे पता है कि कुछ ही दिनों में समस्या का समाधान हो ही जाएगा। चूँकि चालू परेशानी का कारण मैं बना हुआ हूँ इसलिए मुझे थोड़ी सफाई देने की – या कहें कि बतकही करने की – तलब महसूस हो रही है। दरअसल पहली बार मुझे अपने भाग्य पर बहुत कोफ़्त हो रही है। मेरी तबीयत थोड़ी सी ही नासाज़ है लेकिन आजकल मैं ऐसे विचित्र स्थान पर ला दिया गया हूँ कि यहाँ साधारण सी गड़बड़ी की दवा करने वाले भी नहीं मिल पा रहे हैं। यहाँ कुछ ऐसे नीम-हकीमों से मेरा पाला पड़ा है कि उन्होंने मेरी बीमारी ठीक करने को कौन कहे मेरा हुलिया ही बिगाड़ दिया। अपनी विचित्र स्थिति पर चिंतन करता हूँ तो मन बहुत दूर तक सोचने लगता है।

क्या आपने कभी सुना है कि देवाधिदेव महादेव को नंदी ‘भाई’ से कोई परेशानी हुई हो? क्या छोटे उस्ताद मूषक राज ने कभी भारी-भरकम गणेश जी को पैदल चलने पर मजबूर किया? कार्तिकेय जी से रेस हुई तो कैसे उसने बुद्धि के बल से जीत दर्ज कर ली। घर-घर में धन-संपत्ति का डिस्ट्रीब्यूशन करने में घँणी बिजी रहने वाली लक्ष्मी माता को भी क्या उल्लू राजा ने कभी धोखा दिया? लक्ष्मी जी को चंचला की उपाधि दिलाने में निश्चित रूप से उसकी मेहनत, लगन व परिश्रम का हाथ रहा होगा। विद्या की देवी सरस्वती जी को भी हंस की सवारी में कभी रुकावट का सामना नहीं करना पड़ा होगा। कम से कम मैंने तो नहीं सुना है। सभी देवताओं में बड़े विष्णु भगवान को देखिए। पक्षीराज गरुण की सेवाओं के प्रताप से ही उनके यत्र-तत्र सर्वत्र पाये जाने की बात प्रचलित है। यह सब कहने का मतलब यह है है कि यदि काम लायक सवारी न हो तो बड़े से बड़ा आदमी भी घोर संकट में पड़ जाता है।

रामचंद्र जी को वनवास में सबसे अधिक तकलीफ़ सवारी के अभाव के कारण ही उठानी पड़ी थी। बेचारे पैदल होने के कारण ही मारीच के पीछे भागते रहे और उधर रावण उड़नखटोले पर सीता मैया को ले उड़ा। उनके पास भी अच्छी सवारी रहती तो यह दुर्घटना नहीं हो पाती। इस कलयुग में तो एक से एक अच्छी सवारियों की ईजाद मनुष्यों ने कर ली है। जितना बड़ा आदमी उतनी बड़ी सवारी। जानवरों की सवारी छोड़कर अब मनुष्य साइकिल से लेकर हवाई जहाज तक की कल-पुर्जे वाली सवारियाँ  अपना चुका है। इस परिवर्तन का एक प्रभाव यह है कि अब सवारियाँ अपने मालिक की इच्छानुसार सेवाएँ तो दे रही हैं लेकिन मनुष्य अब बिना सवारी के एक कदम भी चलने लायक नहीं रह गया है। सभी कोई न कोई सवारी गाँठने के चक्कर में ही पड़े रहते हैं।

मैंने भी अपने मालिक की सेवा में यथा सामर्थ्य कभी कोई कसर नहीं रखी। मैं हूँ तो दो पहिए का एक अदना सा स्कूटर लेकिन मुझमें कुछ तो ऐसा खास है कि नयी चमचमाती कार आने के बाद भी मेरा महत्व कम नहीं हुआ। किसी ने एक बार मेरे स्वामी को सलाह दी कि अब ‘फोर व्हीलर’ अफ़ोर्ड कर सकते हैं तो इस फटफटिया को निकाल दीजिए। इसपर उन्हे रहीम का दोहा सुनना पड़ा – “रहिमन देखि बड़ेन को लघु न दीजिए डारि”। यह सुनकर मेरा मन बल्लियों उछल पड़ा था। वैसे भी जब बैंक से लोन लेकर मुझे खरीदा गया था उस समय इनके पास एक मारुती कार थी; लेकिन घर से बाहर बाजार तक जाने, परचून की दुकान से लेकर सब्जी आदि खरीदने और स्टेडियम जाकर खेल-कूद में पसीना बहाने तक के काम में मेरा विकल्प वह खर्चीली कार नहीं बन सकती थी। जितना समय उसे गैरेज़ से निकालने व रखने में लगता उतने समय में मैं बाजार जाकर लौट भी आता।

मुझे कभी लम्बी दूरी की यात्रा अपने पहियों से नहीं करनी पड़ी। जब भी इनका कहीं तबादला हुआ मुझे ट्रक पर लादकर नयी जगह पर लाया गया। इस उठा-पटक में मुझे कई बार खरोंचे भी आयीं। मुझे याद है अबसे नौ साल पहले अपने नये नवेले रूप पर आत्ममुग्ध हो जब मैं शान से चलता था तो सबकी निगाहें एक बार मेरी ओर बरबस खिंची चली आती थीं। लोग मेरे सीने पर ‘बजाज’ का लोगो देखते तो हैरत से मेरा नाम पढ़ते। ‘लीजेंड’…? यह मॉडेल तो एक बार फेल हो गया था। फिर फोर-स्ट्रोक में दुबारा लांच कर दिया गया? एवरेज क्या है इसकी? ये सकुचाते हुए बताते कि चालीस-पैंतालीस तक जाता है; इन्हें पता होता कि भीड़-भाड़ भरी बाजार में ही चलने के कारण मैं ज्यादा माइलेज कभी नहीं दे पाऊँगा।

शान की सवारी…फिर ये मेरी उपयोगिता के सौ-सौ उदाहरण गिनाते। बाजार से चाहे जितना भी सामान खरीद लिया गया हो, उसे ढोने के लिए मैं हमेशा तैयार रहता हूँ। धोने-पोंछने और मेंटिनेन्स में भी कोई खास मेहनत नहीं है। ट्रबुल-फ्री गाड़ी है। केयर-फ्री ड्रायविंग है। आगे की डीक्की और डिक्की व सीट के बीच की खुली जगह में ढेर सारा सामान आसानी से रखकर चला आता है। सीट के आगे खड़े होकर इनके दोनो बच्चों ने बारी-बारी से मेरी सवारी खूब इन्ज्वॉय किया है। कभी-कभार तो मालकिन भी पीछे बैठकर इनका कंधा पकड़े पीठ से सटकर चलना ज्यादा पसंद करती हैं। मैंने इन लोगों को आपस में बात करते सुना है कि कार की ‘स्प्लिट सीट’ में वह आनंद कहाँ…। इश्किया सुना तो और भी बहुत कुछ है लेकिन वो मैं नहीं बताने वाला…!

फिर भी जब लोग इनसे पूछते हैं कि इस महंगाई के जमाने में तेल की कीमत इतनी बढ़ गयी है तब भी आप एक लीटर में सौ-सौ किमी. तक चलने वाली बाइक्‍स के बजाय इस बजाज के थकेले स्कूटर को क्यों ढो रहें है; तो मेरा कलेजा धक्क से रह जाता है। डरता हूँ कि जाने कब ये इस मतलबी दुनिया की बातों में आ जाँय; इनका मन मुझसे फिर जाय और मेरी छुट्टी हो ले। वर्धा में आकर यह संकट और गहरा होता जा रहा है, मेरा भय घनीभूत होकर मेरी साँसे चोक करने लगा है। ‘चोक’ से मुझे याद आया कि मेरी इस दुरवस्था का तात्कालिक कारण यह चोक ही बना है।

हुआ यह कि नौ-दस साल की अहर्निश सेवा के बाद मेरा चोक खींचने वाले तार की घुंडी एक दिन टूट गयी। इन्होंने आदतन अपने चपरासी को मार्केट भेजा कि दूसरा नया ‘चोक-वायर’ डलवा लाये। काफी चक्कर लगाकर हम और चपरासी दोनो लौट आये। पूरे शहर में कोई मिस्त्री ऐसा नहीं मिला जो मुझे छूने के लिए भी तैयार हो। यह सुनकर इन्हें तो विश्वास ही नहीं हुआ। ये चपरासी पर बिगड़ पड़े कि वह कामचोर है, कहीं गया नहीं होगा, एक छोटा सा काम भी नहीं कर सकता। इलाहाबाद में ‘सुदेश’ था तो चुटकी बजाते ऐसा कोई भी काम कर लाता था। अब मैं ठहरा एक बेजुबान सेवक। चाहकर भी यह नहीं बता सकता था कि चपरासी की कोई गलती नहीं है; और इलाहाबाद में सुदेश चुटकी में काम इसलिए पूरा कर देता था कि कचहरी में स्थित आपके ऑफिस से बाहर निकलते ही लाइन से मिस्त्री और सर्विसिंग की दुकाने सजी रहती थीं। एक से एक हुनरमंद मिस्त्री बजाज के स्पेशलिस्ट थे। यहाँ वर्धा में न तो सड़कों पर कोई बजाज का स्कूटर दिखता है और न ही दुकानों पर कोई स्पेयर पार्ट मिलता है। 

मुझे पता चला है कि है कि वर्धा का यह इलाका सेठ जमनालाल बजाज जी का मूल स्थान रहा है। यहाँ की अधिकांश जमीन उनकी मिल्कियत रही है। गांधी जी ने जब साबरमती आश्रम इस संकल्प के साथ छोड़ दिया कि अब आजादी मिले बिना नहीं लौटना है तो जमनालाल जी ने उन्हें वर्धा आमंत्रित कर सेगाँव नामक गाँव में उन्हें आश्रम खोलने के लिए पर्याप्त जमीन दे दी और इस प्रकार प्रसिद्ध ‘सेवाग्राम आश्रम’ की नींव पड़ी। विडंबना देखिए कि उसी बजाज परिवार के उद्योग से जन्म लेकर मैं सुदूर पूर्वी उत्तर प्रदेश में सेवा के लिए धरती पर उतारा गया और प्रसन्नता पूर्वक घूमते-घामते वर्धा आ जाने के बाद मेरी देखभाल को एक अदद काबिल मिस्त्री नहीं मिल रहा है।

मैंने यह भी सुना है कि कुटीर उद्योग के प्रबल पक्षधर गांधी जी की महिमा से इस क्षेत्र को बड़े उद्योग लगाने से प्रतिबंधित कर दिया गया है और यहाँ का आर्थिक विकास अनुर्वर जमीन में कपास की खेती करने वाले किसानों के भरोसे है जो प्रकृति की मार खाते हुए खुद पर भरोसा खोकर आत्महत्या करने पर मजबूर हो जाते हैं।

ओह, मैं अपनी राम कहानी सुनाते-सुनाते विषयांतर कर बैठा…। क्या करूँ, सोचते-सोचते मन भारी हो गया है।

हाँ तो, …चपरासी को ‘अयोग्य’ और ‘नकारा’ करार देने के बाद इन्होंने मेरी हालत स्वयं सुधरवाने का निश्चय किया। अगले दिन मुझे किसी तरह स्टार्ट करके स्टेडियम तक ले गये। वहाँ इनके साथ बैडमिंटन खेलने वाले अनेक स्थानीय लोग थे। खेल के बाद जब चलने को हुए तो इन्होंने मेरे सामने ही इन लोगों से मेरी समस्या बतायी। सबने सहानुभूति पूर्वक ग़ौर से सुना। फिर ये लोग आपस में मराठी में एक दूसरे से बात करने लगे। मैंने अनुमान किया कि सभी किसी न किसी मिस्त्री को जानते होंगे; इसलिए आपस में यह विचार-विमर्श कर रहे हैं कि कौन सा मिस्त्री सबसे अच्छा है, उसी को ‘रेफ़र’ किया जाय। बाहर से आये  हुए व शहर से अन्जान त्रिपाठी जी की मदद करने को सभी आगे आना चाहते होंगे शायद…। ‘शायद’ इसलिए कि इनकी बातचीत का ठीक-ठीक अर्थ तो ये भी नहीं लगा पा रहे थे।

तभी एक हँसमुख डॉक्टर साहब ने मुस्कराते हुए कहा- “मुझे इसका बहुत अच्छा अनुभव है। आपकी समस्या का जो पक्का समाधान है वह मैं बताता हूँ…। ऐसा कीजिए इसे जल्दी से जल्दी बेंच दीजिए…। जो भी दो-तीन हजार मिल जाय उसे लेकर खुश हो जाइए और मेरी तरह शेल्फ़-स्टार्ट वाली स्कूटी ले लीजिए…” वहाँ उपस्थित सभी लोग ठठाकर हँस पड़े, इनका चेहरा उतर गया और मेरे पहियों के नीचे से जमीन खिसक गयी…।

(पोस्ट लम्बी होती जा रही है और मेरी कहानी का चरम अभी आना बाकी है इसलिए अभी के लिए इतना ही…)

प्रस्तुति: सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी

समय: जब ‘इनके’ भगीरथ प्रयत्न के बाद मेरा स्वास्थ्य सुधरने की दहलीज़ पर है और पूरा देश सचिन तेंदुलकर के पचासवें शतक के जश्न में डूबकर दक्षिण अफ़्रीका के हाथों हुई धुनाई और पारी की हार को भूल जाने का प्रयास कर रहा है।

स्थान: वहीं जहाँ गांधी जी के ‘बुनियादी तालीम प्रकल्प’ का सूत्र पकड़कर दुनिया का एक मात्र अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय अंगड़ाई ले रहा है।

बुधवार, 5 मई 2010

वर्धा में अम्बेडकर को याद करने का तरीका अनूठा था…

 

मेरी वर्धा यात्रा की प्रथम, द्वितीय, और तृतीय रिपोर्ट आप यहाँ पढ़ चुके हैं। अब आगे…

विश्वविद्यालय गेस्ट हाउस से जब हम सेवाग्राम आश्रम के लिए निकले तो धूप चढ़ चुकी थी। यद्यपि यह आश्रम घूमने का सबसे अच्छा समय नहीं था, लेकिन हमारे पास कोई दूसरा विकल्प उपलब्ध भी नहीं था। हम वर्धा शहर के बीच से होकर ही गुजरे लेकिन रास्ते में कोई भीड़ भरी ट्रैफ़िक नहीं मिली। निश्चित ही गर्मी का असर सड़कों पर उतर आया था। हमें किसी मोड़, तिराहे या चौराहे पर रुककर सेवाग्राम का रास्ता पूछने के लिए गाड़ी से उतरकर किसी दुकानदार तक जाना पड़ता क्यों कि सड़क पर राहगीर नहीं मिल रहे थे। लेकिन हमें दो स्थानों पर इस कड़ी धूप को धता बताते लोग मिले जो पूरी सज-धज के साथ समूह में इकठ्ठा होकर किसी जश्न की तैयारी में जाते दिखायी दिए।

अम्बेडकर जयन्ती की धूम मैने नजदीक पहुँचकर देखा तो पता चला कि ये लोग बाबा साहब के जन्मदिन की शोभायात्रा निकाल रहे हैं। नीले अबीर का तिलक लगाकर एक दूसरे का अभिवादन करते लोगों में बड़े-बुजुर्ग, मर्द-औरतें, लड़के व लड़कियाँ, सभी मौजूद थे। एक अदम्य उत्साह और उमंग से लबरेज़ ये श्रद्धालु अपने नेता के प्रति सम्मान व्यक्त करने के लिए जिस स्वतः स्फूर्त भाव से इस आयोजन में शामिल हो रहे थे उसे देखकर सहज ही अनुमान किया जा सकता था कि डॉ.भीमराव अम्बेडकर ने किस प्रकार एक बहुत बड़े समाज को अपनी अस्मिता पर गौरव महसूस करने और सिर ऊँचा उठाकर जीने की प्रेरणा दे दी है।

एक पेट्रोल पंप के अहाते में जमा हो रहे समूह को पीछे छोड़कर जब हम सेवाग्राम में बापू के आश्रम के मुख्यद्वार पर पहुँचे तो वहाँ भी एक ऐसा ही जुलूस जश्न के उल्लास में डूबा हुआ मिला। एक खुली हुई गाड़ी पर बाबा साहब अम्बेडकर के आदमकद चित्र को सजाकर झाँकी तैयार की गयी थी जिसके सामने बड़ी संख्या में लड़के और वयस्क पुरुष नाच रहे थे। ढोल-नगाड़े और बैण्ड-बाजे की तेज ध्वनि पर उनके पाँव खुशी-खुशी तारकोल की गर्म सड़क पर भी सहजता से थिरक रहे थे। मैने गेट के किनारे गाड़ी खड़ी की और अपना कैमरा निकाल कर इस शोभा यात्रा की कुछ तस्वीरें लेनी चाही। लेकिन पहले स्नैप के बाद ही कैमरा स्वचालित तरीके से बन्द हो गया। स्क्रीन पर यह संदेश आया कि सीमा से अधिक गर्म हो जाने के कारण कैमरा बन्द हो रहा है। ए.सी. कार के डैश बोर्ड पर शीशे से छन कर आ रही धूप इस सोनी डिजिटल कैमरे की नाजुक कार्यप्रणाली को बन्द करने में सक्षम थी लेकिन अपने नेता के जन्मदिन को यादगार बनाने में जुटे उन लोगों के ऊपर कड़ी धूप का जरा भी असर नहीं दिखा। माथे पर नीली पट्टी बाँधे हुए दर्जनों नौजवान लड़के मोटरसाइकिलों पर फर्राटा भरते किसी बाराती का सा उत्साह लिए समूह में आ जा रहे थे।

जब वह शोभा यात्रा थोड़ी दूर चली गयी तो हम एक और महापुरुष की कर्मस्थली के प्रांगण में चले गये। यह था बापू का सेवाग्राम आश्रम। 

सन्‌ १९३४ मेंबापू यहाँ बैठकर काम करते गांधीजी को उनके प्रिय मित्र और प्रसिद्ध उद्योगपति जमनाबापू का दफ़्तरलाल बजाज ने वर्धा में निवास हेतु आमन्त्रित किया था। वर्धा के करीब शेगाँव (Shegaon) नामक ग्रामीण क्षेत्र में जंगली वनस्पतियों से हरे-भरे इलाके में बापू के रहने के लिए स्थानीय सामग्री के उपयोग से खपरैल की छत वाला जो मकान बना उसे अभी भी ज्यों का त्यों सजोकर रखा गया है।  सबसे पहले हम उसी ‘आदि निवास’ के बरामदे में पहुँचे।  हमने वहाँ उल्लिखित निर्देश के सम्मान में अपने पैर के जूते निकाल दिए। पूरे प्रांगण में पत्थर की छोटी गिट्टियों की परत बिछायी गयी थी जो धूप से गर्म तो हो ही चुकी थी, उनपर नंगे पाँव चलने से इनकी तीखी नोक से चुभन भी खूब हो रही थी। वहाँ कार्यरत एक बुजुर्ग महिला ने बताया कि इस स्थान पर साँप और बिच्छू बहुत निकलते हैं। इन गिट्टियों के बीच उनका चलना कठिन होता है इसलिए सुरक्षा की दृष्टि से यह गिट्टी डाली गयी है। एक्यूप्रेशर चिकित्सा में विश्वास करने वाले इन गिट्टियों पर नंगे पाँव चलना स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद मानते हैं। एक कक्ष में साँप पकड़ने का पिजरा भी रखा हुआ था जिसमें साँपों को पकड़कर दूर जंगल में छोड़ दिया जाता था।

बताते हैं कि बापू के कार्यकाल में निर्मित भवनों जैसे- आदि निवास, बा-कुटी, बापू- कुटी, आखिरी निवास, परचुरे कुटी, महादेव कुटी, किशोर निवास, रुस्तम भवन इत्यादि में से किशोर निवास को छोड़कर किसी भी भवन में पक्की ईंटों व सीमेण्ट का प्रयोग नहीं किया गया था। इस प्रांगण में गांधी जी द्वारा व्यक्तिगत रूप से उपयोग की गयी वस्तुओं को करीने से सजाकर आगन्तुकों के दर्शनार्थ रखा गया है। आश्रम में आकर मेरा कैमरा अबतक ठण्डा हो चुका था इसलिए हमने कुछ यादगार तस्वीरें उतार लीं।

 दवात बापू द्वारा उपयोग की गयी संग्रहित वस्तुएं तीन बन्दर और लकड़ी का करण्डक
बापू का टेलीफोन गांधी जी का सामान

  बापू का चश्मा 

 

बापू कुटी का परिचय देता यह बोर्ड हमारा ध्यान बरबस खींचता है। इसमें सात सामाजिक पातक (social sins) उल्लिखित हैं जो यंग इण्डिया से उद्धरित हैं। समाज को पतन की ओर ले जाने वाले जिन तत्वों की पहचान गांधी जी ने तब की थी वे आज हमारे सामने प्रत्यक्ष उपस्थित हैं और उनका वैसा ही प्रभाव होता भी दिखायी दे रहा है। बापू कुटी का परिचय और सात सामाजिक पातक सिद्धान्तहीन राजनीति, विवेकभ्रष्ट भोग-विलास, बिना श्रम के अर्जित सम्पत्ति, मानवीय मूल्यों से विहीन वैज्ञानिक विकास, अनैतिक बाणिज्य-व्यापार, त्याग और बलिदान से रहित पूजा-पाठ, और चरित्र निर्माण से रहित शिक्षा  जैसे घटक हमारे समाज को आज भी अन्धेरे की ओर ले जा रहे हैं। यदि हमारे देश के नीति नियन्ता राष्ट्रीय स्तर पर इन्हीं विन्दुओं को दृष्टिगत रखकर नीति निर्माण करें और उनके अनुपालन की कार्ययोजना तैयार करें तो बहुत कुछ सुधारा जा सकता है।

प्रांगण में अनेक छायादार और फलदार वृक्ष दिखे जिनका रोपण देश की महान विभूतियों ने किया था और उनकी नाम पट्टिकाएं वृक्षों पर लगी हुई थीं। भारतीय स्वतंत्रता संगाम के अन्तिम दशक में देश का ऐसा कोई भी महत्वपूर्ण व्यक्ति नहीं रहा होगा जो वर्धा के सेवाग्राम आश्रम तक न आया हो। गांधी जी ने अपने जीवन के अन्तिम भाग में अधिकांश समय यहीं बिताया। विभाजन के बाद उपजे साम्प्रदायिक दंगो से लड़ने के लिए बंगाल के नोआखाली के लिए प्रस्थान करने के बाद गांधी जी यहाँ नहीं लौट सके।

इस प्रांगण से बाहर आकर हमने खादी की दुकान से कुछ खरीदारी की। भूख और प्यास ने जब हमें नोटिस थमायी तो हमें बगल के प्राकृतिक आहार केन्द्र की ओर जाना पड़ा। इस रेस्तराँ को देखकर हम झूम उठे। डाइनिंग टेबल के स्थान पर यहाँ चौकोर चौकियाँ रखी हुई थीं जिनके बीच में तिपाये पर ठण्डे पानी से भरे मिट्टी के घड़े रखे हुए थे।प्राकृतिक आहार केन्द्र, सेवाग्राम हमने वहाँ किसी फूल के अर्क से तैयार किया हुआ ठंडा स्वादिष्ट शरबत लिया, कुछ तस्वीरें ली और अपनी गाड़ी की ओर बढ़ चले। गेस्ट हाउस की कैण्टीन में बना भोजन हमारा इन्तजार कर रहा था।

शाम को गेस्ट हाउस के चबूतरे पर आयोजित एक अद्भुत कार्यक्रम में शामिल होने का अवसर मिला। अम्बेडकर जयन्ती के अवसर पर विश्वविद्यालय के संस्कृति विभाग ने इस विशेष कार्यक्रम का  आयोजन किया था। विभाग के विशेष कार्याधिकारी (OSD) राकेश जी ने कार्यक्रम के प्रथम चरण में डॉ. अम्बेडकर की राजनैतिक आर्थिक दृष्टि और आज का समय विषय पर बोलने के लिए नागपुर से आमन्त्रित प्रोफ़ेसर श्रीनिवास खान्देवाले का परिचय दिया। अर्थशास्त्र के प्रतिष्ठित विद्वान प्रोफ़ेसर खान्देवाले ने करीब एक घण्टे के अपने भाषण में डॉ. भीमराव अम्बेडकर के जिस व्यक्तित्व से परिचित कराया उसे इतनी गहराई से हम पहले नहीं जान पाये थे। भारतीय संविधान के निर्माता और दलित समुदाय के मसीहा के रूप में अम्बेडकर की जो छवि हमारे मन में थी उसके दो रूप थे। एक रूप वह था जिसमें वे राजनैतिक रूप से जागरूक हो रहे एक खास सामाजिक जाति वर्ग के प्रेरणापुंज और उपास्य देवता थे जिनकी अन्धभक्ति में डूबे हुए लोग अपने समर्थक समूह से इतर प्रत्येक व्यक्ति को मनुवादी कहकर गाली देने का काम करते रहे हैं।

उनकी छवि का दूसरा रूप वह था जो अरुण शौरी जैसे लेखकों द्वारा ‘फर्जी भगवान’ के रूप में गढ़ा गया था- जिसके प्रति विद्वेष से भरे हुए लोगों द्वारा चौराहे पर लगी उनकी मूर्तियों को तोड़ने, अपमानित करने और एक जाति विशेष के लोगों के लिए अपशब्द प्रयोग करने और उत्पीड़ित करने का जघन्य कार्य किया जाता रहा है।  कदाचित्‌ डॉ. अम्बेडकर को एक खास राजनैतिक उद्देश्य से इस्तेमाल करने की होड़ में लगी पार्टियों ने इस प्रकार की परस्पर विरोधी छवियों का निर्माण कर रखा है। प्रो. खान्देवाले ने अपने वक्तव्य में अम्बेडकर की एक मध्यमार्गी छवि पेश की। उनका कहना था कि अम्बेडकर की दृष्टि सच्चे समाजवाद से ओतप्रोत थी। वे शान्तिपूर्ण ढंग से सामाजिक परिवर्तन लाने के हिमायती थे। उनकी राजनैतिक दृष्टि तो उनके द्वारा तैयार किये गये हमारे संविधान में परिलक्षित होती ही है, साथ में उनकी आर्थिक दृष्टि को भी संविधान के सूक्ष्म अध्ययन से समझा जा सकता है।रजिस्ट्रार, प्रतिकुलपति और कुलपति के साथ प्रो. श्रीनिवास खान्देवाले (सबसे दाएं)

समाज में फैली घोर आर्थिक विषमता को दूर करने के लिए सम्पत्ति का प्रवाह ऊपर से नीचे की ओर होना आवश्यक है लेकिन हो रहा है इसका उल्टा। गरीब मजदूर और किसान अपनी विकट परिस्थिति से हारकर आत्महत्या कर रहे हैं और पूँजीपति वर्ग लगातार अपनी सम्पत्ति बढ़ाता जा रहा है। आई.पी.एल. के अर्थशास्त्र का उदाहरण देकर उन्होंने बताया कि जबतक समाज के पिछ्ड़े तबके को आर्थिक उन्नति के उचित और न्यायपूर्ण अवसर नहीं प्राप्त होंगे तबतक सामाजिक समरसता नहीं पायी जा सकेगी। यही उचित अवसर दिलाने की लड़ाई शान्तिपूर्ण तरीके से लड़ने की राह डॉ.अम्बेडकर ने दिखायी। पारस्परिक विद्वेष को भुलाकर इस लड़ाई में समाज के सभी तबकों से बराबर का सहयोग करने का आह्वान भी प्रो. खान्देवाले ने वहाँ उपस्थित छात्रों, अध्यापकों और वि.वि. के पदाधिकारियों से किया।

कार्यक्रम के अगले चरण में लखनऊ से आयी संगीत मण्डली रवि नागर एण्ड ग्रुप ने कुछ बेहतरीन कविताओं का मोहक संगीतमय पाठ किया। इसमें सबसे पहले डॉ.दिनेश कुमार शुक्ल के कुछ दोहे गाकर सुनाये गये-

भाषा के सोपान से, शब्द लुढकते देख।

पढ़ा लिखा सब पोंछकर, लिखो नया आलेख॥

जीवन को अर्था रहा, गूंगा बहरा मौन।

किसने देखा राम को, रमता जोगी कौन॥

सीली-सीली है हवा, ठण्डी-ठण्डी छाँव।

सन्निपात का ज्वर बढ़ा, झुलस रहा है गाँव॥

यहाँ न सूर्योदय हुआ, यहाँ न फैली धूप।

कालरात्रि फैली रही, जैसे अन्धा कूप॥

काले भूरे खुरदुरे, ले अकाल के रंग।

गगन पटल पर लिख रहा, औघड़ एक अभंग॥

जंगलों में रहने वाले आदिवासी समुदाय के जीवन पर आधारित निर्मला पुतुल की कविता ‘तुम्हारे हाथों बने पत्तल पर भरते हैं पेट हजारो, पर हजारों पत्तल भर नहीं पाते पेट तुम्हारा’  के भावुक प्रस्तुतिकरण ने वातावरण बहुत मार्मिक बना दिया। इसके बाद अदम गोंडवी की प्रसिद्ध रचना चमारों की गली का गायन हुआ। आइए महसूस करिए जिन्दगी के ताप को। मैं चमारों की गली तक ले चलूंगा आपको॥

इस एक घंटे की संगीतमय प्रस्तुति ने दलित शोषित समाज की जिस कष्टप्रद और शोचनीय परिस्थिति की जिन्दा तस्वीर पेश की उसको और गहनता से महसूस कराया कार्यक्रम के अगले चरण में प्रस्तुत नुक्कड़ नाटक ‘सात हजार छः सौ छियासी’ ने।

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प्रोबीर गुहा निर्देशित नुक्कड़ नाटक७६८६

विश्वविद्यालय के फिल्म व थिएटर विभाग के विद्यार्थी कलाकारों द्वारा इसे कोलकाता के नाट्य समूह ‘अल्टरनेटिव लिविंग थिएटर’ के प्रोबीर गुहा के नाट्य निर्देशन में प्रस्तुत किया गया। श्री गुहा वि.वि. के गेस्ट फैकल्टी हैं जो कुछ दिनों के लिए यहाँ आये हुए थे। महाराष्ट्र में कपास किसानों द्वारा बड़ी संख्या में की जा रही आत्महत्या के पीछे जो सामाजिक-आर्थिक कारण हैं उन्हें समझाने का यह बहुत ही प्रभावशाली प्रयास था।  भयंकर गरीबी के बीच नैसर्गिक जिजीविषा से प्रेरित किसान अपनी जमीन पर कपास उगाने में खाद, बीज और कीटनाशक के लिए आने वाली तमाम कठिनाइयों से लड़ता हुआ, पूँजीपतियों, ऋणदाता बैंको, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों, भ्रष्ट नौकरशाहों, विपरीत मौसम और पर्यावरण की तमाम समस्यायों से जूझता हुआ जब अपना तैयार माल बाजार में बेंचने ले जाता है तो वहाँ लालची दलालों के हाथों पड़कर अपना सर्वस्व लुटा देता है। ऐसे में जब यह रिपोर्ट आती है कि विदर्भ क्षेत्र में ७६८६ किसानों ने आत्महत्या कर ली तो मात्र कुछ दिनों के लिए हाहाकार मचता है। उसके बाद स्थिति जस की तस हो जाती है।

चौदह अप्रैल की वह शाम मेरे लिए अभूतपूर्व अनुभवों वाली साबित हुई। एक के बाद एक उम्दा कार्यक्रमों को देखने-सुनने का मौका पाकर मुझे वहाँ कुछ और दिन रुकने का मन हो चला लेकिन ये मुई सरकारी नौकरी इतने भर की छुट्टी भी बड़ी मुश्किल से देती है। हम अगले दिन विश्वविद्यालय के नवनिर्मित प्रशासनिक भवन, पुस्तकालय व विभिन्न विद्यापीठ देखने टीले के ऊपर गये। DSC02667 वित्त अधिकारी मो.शीस खान से मिलने के बाद हम अन्त में कुलपति जी के कार्यालय में गये। आधुनिक सुविधाओं और संचार साधनों  से लैस कार्यालय में कुर्ता पाजाम पहनकर श्री विभूति नारायण राय एक साथ दक्षता, सादगी और कर्मठता का परिचय दे रहे थे। इस शुष्क टीले को हरा-भरा करके उसपर स्थापित अनेक उत्कृष्ट विद्यापीठों में पठन-पाठन व शोध सम्बन्धी गतिविधियों को गति प्रदान करने का जो कार्य आपने शुरू किया है वह किसी भगीरथ प्रयत्न से कम नहीं है।

हमने उनकी मेज पर रखे कम्प्यूटर से अपने रेल टिकट का पी.एन.आर. स्टेटस जाँचा और टिकट कन्फ़र्म होने की खुशी का भाव लिए  उनसे विदा लेकर विनोद जी के साथ सेवाग्राम स्टेशन के लिए चल पड़े।

(समाप्त)

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

 

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बुधवार, 28 अप्रैल 2010

वर्धा परिसर का परिक्रमण और चाय पर चर्चा…

 

MGAHV-logo कुलपति जी के आवास से रात का भोजन लेने के बाद राजकिशोर जी, अब्दुल बिस्मिल्लाह, प्रो.सचिन तिवारी, प्रो. सुवास कुमार के साथ हम गेस्ट हाउस लौट आये। वहाँ खुले आसमान के नीचे चबूतरे पर कुर्सियाँ डाल रखी गयीं थी। दो बुजुर्गवार लोग तो सोने के लिए अपने कमरे में चले गये लेकिन राजकिशोर जी और प्रो. सुवास कुमार के साथ मैं वही पर कुर्सियाँ खींच कर बैठ गया। कारण यह कि वहाँ प्रियंकर जी पहले से मौजूद थे। हम दोनो हिन्दी ब्लॉगजगत के माध्यम से पहले ही एक दूसरे से परिचित थे। हिन्दी चिट्ठाकारी की दुनिया विषयक राष्ट्रीय गोष्ठी में वे इलाहाबाद आये थे तब उनसे भेंट हुई थी। यहाँ दुबारा मिलकर मन में सखा-भाव उमड़ पड़ा और हम भावुक सा महसूस करने लगे।

प्रियंकर जी ने हिन्दीसमय.कॉम के कोर-ग्रुप की बैठक की कुछ और जानकारी दी। इसके तीन सदस्यों के आगरा, लखनऊ और कोलकाता में बसे होने के कारण क्या कुछ कठिनाइयाँ नहीं आतीं? मैने इस आशय का सवाल किया तो उन्होंने बताया कि सभी नेट के माध्यम से जुड़े रहते हैं और एक-दो महीने पर किसी एक के शहर में या वर्धा में बैठक कर अगली रणनीति तय कर ली जाती है। कुलपति जी द्वारा इस महत्वाकांक्षी योजना को नई ऊँचाइयों पर ले जाने के लिए और भी जतन किए जा रहे हैं। नेट पर उत्कृष्ट साहित्य अपलोड करने में कॉपीराइट सम्बन्धी अड़चनों की चर्चा भी हुई। कुछ प्रकाशकों ने तो सहर्ष सहमति दे दी है लेकिन कुछ अन्य प्रकाशक पूरी सामग्री नेट पर निःशुल्क सुलभ कराने में अपनी व्यावसायिक क्षति देख रहे हैं।

अनुवाद एवं निर्वचन विभाग

इसी बीच राजकिशोर जी को अपने करीब बैठा देख मुझे अपने मन में उठे एक सवाल का निराकरण करा लेने की इच्छा हुई। सभ्यता के भविष्य पर बोलते हुए उन्होंने सामुदायिक जीवन (commune life) का महिमा मण्डन किया था। इस पुरानी सभ्यता की ओर लौट जाने की आवश्यकता पर जोर देते हुए उन्होंने कहा था कि आजका अन्धाधुन्ध मशीनी विकास हमें सामाजिक गैर बराबरी की ओर ले जा रहा है। इससे विश्व समाज में तमाम युद्ध और उन्माद की स्थिति उत्पन्न हो रही है। अमीर लगातार और अमीर होते जा रहे हैं और गरीब भुखमरी का शिकार हो रहे हैं। इसके विपरीत कम्यून में सभी बराबर हुआ करते थे। सभी श्रम करते थे और उत्पादन पर सबका सामूहिक अधिकार था। मनुष्य को शान्ति और सन्तुष्टि तभी मिल सकती है जब वह इस प्रकार के सामुदायिक जीवन को अपना ले।

मैने उनसे पूछा कि आप व्यक्ति की निजी प्रतिभा और उद्यम को कितना महत्व देते हैं। मनुष्य अपने निजी परिश्रम और प्रतिभा के दम पर जो उपलब्धियाँ हासिल करता है उनपर उसका अधिकार होना चाहिए कि नहीं? यदि वह उसका प्रयोग निजीतौर पर करने का अधिकार नहीं पाएगा तो अतिरिक्त प्रयास (extra effort) करने के लिए आवश्यक अभिप्रेरणा (motivation) उसे कहाँ से मिलेगी? फिर मानव सभ्यता के विकास की गाड़ी आगे कैसे बढ़ेगी?

राजकिशोर जी ने कहा कि individual effort तो महत्वपूर्ण है ही लेकिन उसका प्रयोग कम्यून के लिए होना चाहिए। उपलब्धियों का लाभ सबको बराबर मिलना चाहिए। चर्चा में प्रो.सुवास कुमार ने हस्तक्षेप किया, बोले- मुझे लगता है कि सारी समस्या की जड़ ही ‘प्राइवेट प्रॉपर्टी’ है। सम्पत्ति के पीछे भागते लोग सभ्यता भूल जाते हैं। मुझे लगा कि मैं बी.ए. की कक्षा में बैठा मार्क्सवाद का पाठ पढ़ रहा हूँ। दोनो मनीषियों ने मुझे कम्यूनिष्ट विचारधारा के मोटे-मोटे वाक्य सुनाये। इस चर्चा के बीच में ही मेरे साथी विनोद शुक्ला जी उठते हुए याद दिलाया कि बारह बज चुके हैं, सुबह कुलपति जी ने साढ़े पाँच बजे टहलने के लिए तैयार रहने को कहा है। वे सोने चले गये। लेकिन मुझे तो कुछ दूसरा ही आनन्द मिल रहा था। गान्धी हिल्स पर सूर्योदय (१५.४.२०१०)

मैने प्रो. सुवास कुमार की बात को लपकते हुए कहा कि सर, मुझे तो लगता है कि समस्या सिर्फ़ प्राइवेट प्रॉपर्टी में नहीं है। सम्पत्ति चाहे निजी हाथों में रहे या सार्वजनिक नियन्त्रण में उसको लेकर समस्या पैदा होती रहेगी। पूँजीवाद के विरुद्ध जो रूसी क्रान्ति हुई और साम्यवादी सरकार गठित हुई उसने भी क्या किया? सम्पत्ति सरकारी हाथों में गयी और जो लोग सरकार के मालिक थे उनकी दासी बन गयी। एक प्रकार का स्टेट कैपिटलिज्म स्थापित हो गया। किसी निजी पूँजीवादी में जो बुराइयाँ देखी जाती थीं वही सब इन साम्यवादी सरकारों में आ गयीं जो अन्ततः इनके पतन का कारण बनीं। इसलिए आवश्यकता से अधिक सम्पत्ति अपने आप में बुराई की जड़ है।

राजकिशोर जी मुस्करा रहे थे। बोले- यह सम्पत्ति तो माया है और इसे महा ठगिनी कहा गया है। हमने उनका समर्थन किया। वे फिर बोले- इस माया का श्रोत क्या है? सुवास जी बोले- माया तो हमारे मन की बनायी हुई है। फिर राजकिशोर जी ने कहा कि ईश्वर को भी तो हमारे मन ने ही बनाया है। वे जोर से हँसे और बोले- ईश्वर और माया दोनो को गोली मार दो। सारी समस्या खत्म हो जाएगी। दुनिया में सारे झगड़े फ़साद की जड़ यही दोनो हैं।

मैने अपने दर्शनशास्त्र का विद्यार्थी होने का परिचय दिए बिना ही उन्हें टोका- आप ऐसा कर ही नहीं सकते। ईश्वर को गोली नहीं मारी जा सकती क्योंकि ईश्वर कोई व्यक्ति नहीं है। यह तो सत्य का दूसरा नाम है, और सत्य को समाप्त नहीं किया जा सकता। यह जो माया है वह कुछ और नहीं हमारा अज्ञान(ignorance) है। हम अज्ञान के अन्धकार में भटक रहे है और एक-दूसरे से लड़-भिड़ कर अपना सिर फोड़ रहे हैं। ज्योंही हमें सत्य का ज्ञान होगा, अन्धेरा अपने आप भाग खड़ा होगा। इसलिए हमें बनावटी बातों के बजाय सत्य के निकट पहुँचने की कोशिश करनी चाहिए। जो सत्य के निकट है वह ईश्वर के निकट है। जो ईश्वर के निकट है वह गलत काम नहीं करेगा। लेकिन सत्य का संधान करना इतना आसान भी नहीं है। चर्चा दूसरी ओर मुड़ गयी…।

अचानक रात के एक बजे हमें याद आया कि सुबह पाँच बजे उठना है। हम झटपट चर्चा को विराम देकर उठ लिए और मोबाइल में एलार्म सेट करके बिस्तर पर जा पड़े।

सुबह योजना के मुताबिक साढ़े पाँच बजे तैयार होकर नीचे सड़क पर पहुँचना था, लेकिन हमारी नींद साढे चार बजे ही खुल गयी। दरअसल विनोद जी, जो जल्दी सो गये थे वे जल्दी उठकर खटर-पटर करने लगे। मुझे भी सुबह पहाड़ी पर टहलने की उत्सुकता के मारे अच्छी नींद ही नहीं आयी थी। हम पाँच बजे ही तैयार होकर कमरे से बाहर आ गये। अम्बेडकर जयन्ती का ब्राह्म मूहूर्त वर्धा गेस्ट हाउस से यह तस्वीर गेस्ट हाउस के चबूतरे पर खड़े होकर हमने उसी समय ली थी जब सूर्योदय अभी नहीं हुआ था।

थोड़ी देर में गेस्ट हाउस के एक सूट से विश्व विद्यालय के वित्त अधिकारी मो.शीस खान जी बाहर आये और क्रमशः अपने-अपने आवास से कुलपति विभूति नारायण राय, प्रति-कुलपति नदीम हसनैन, कुलसचिव डॉ. कैलाश जी. खामरे और डीन प्रो. सूरज पालीवाल भी अपनी टहलने की पोशाक में निकल पड़े। हमारी कच्ची तैयारी पर पहली निगाह कुलपति जी की ही पड़ी। हमारे पैरों में हवाई चप्पल देखकर उन्होंने कहा कि स्पोर्ट्स शू नहीं लाये हैं तो ऊपर दिक्कत हो सकती है। हमारे पास चमड़े के जूते और हवाई चप्पल का ही विकल्प था इसलिए हमने इसे ही बेहतर समझा था। जीन्स और टी-शर्ट में ही हमने ट्रैक-सूट  का विकल्प खोजा था। फिर भी हमारे उत्साह में कोई कमी नहीं थी।

मो.शीस खान जी का व्यक्तित्व देखकर हम दंग रह गये। वे साठ साल की उम्र में सरकारी सेवा पूरी करके रेलवे से सेवानिवृत्त हो चुके थे उसके बाद यहाँ वित्त अधिकारी का काम सम्हाला है। लेकिन शरीर से इतने चुस्त-दुरुस्त कि टहलने वालों में सबसे पहले जाग कर सबको मोबाइल पर घण्टी देकर जगाते हैं, टीले की चढ़ाई पर सबसे पहले चढ़ जाते है और रुक-रुककर पीछे छूट गये साथियों को अपने साथ लेते हैं। उन्होंने हाथ मिलाकर मेरे अभिवादन का जवाब दिया। नदीम हसनैन साहब स्थिर गति से अपनी भारी देह को सम्हालते हुए आगे बढ़ते रहे। प्रायः मौन रहते हुए उन्होंने वाकिंग ट्रैक पूरा किया। अपने पीछे से आगे जाते हुए लोगों को निर्विकार देखते हुए। खामरे साहब सबकी प्रतीक्षा छोड़कर जल्दी-जल्दी आगे बढ़ जाते हैं ताकि थकान होने से पहले चढ़ाई पूरी कर लें। ऊपर जाकर कुछ व्यायाम करना भी उनके मीनू में शामिल है।

कुलपति जी और वित्त अधिकारी मो.शीस खान

टहलते हुए हमने कुछ बातें यहाँ के मौसम के बारे में की। मध्य अप्रैल में पारा ४३ डिग्री तक पहुँचने लगा था। पता चला कि मई-जून में यह ५३-५४ तक पहुँच जाता है। यहाँ बरसात का मौसम बड़ा खुशगंवार होता है। ढलान के कारण जल-जमाव नहीं होता। हरियाली बढ़ जाती है और तापमान भी नीचे रहता है।

मैने पूछा कि विश्वविद्यालय की स्थापना १९९७ में हुई बतायी जाती है तो यहाँ के परिसर का विकास कार्य अभी तक अधूरा क्यों है? पेड़-पौधे अभी हाल में रोपे गये लगते हैं। सड़कें भी नई बनी हुई लग रही हैं। भवनों का निर्माण कार्य अभी भी हो रहा है। आखिर इतनी देर क्यों हुई? इसका जवाब मुझे अगले दो दिनों में टुकड़ों में मिला। दरअसल संसद से विश्वविद्यालय का एक्ट पारित होने के बाद दो-तीन साल इस कवायद में बीत गये कि इसकी स्थापना वर्धा के बजाय किसी विकसित स्थान पर क्यों न किया जाय। जब यह अन्तिम रूप से तय हो गया कि इस विश्वविद्यालय की परिकल्पना ही गांधी जी के सेवाग्राम आश्रम में देखे गये सपने को साकार करने के लिए की गयी है और एक्ट में ही वर्धा का स्थल के रूप में निर्धारण किया जा चुका है, जो बदला नहीं जा सकता है तब यहाँ इसके स्थापत्य की जरूरत महसूस की गयी। वर्धा जिला मुख्यालय के आसपास उपयुक्त स्थल के चयन के लिए तत्कालीन अधिकारियों ने हवाई सर्वेक्षण करके इन पाँच निर्जन टीलों का चयन किया और करीब दो सौ एकड़ जमीन अधिग्रहित की गयी। दूसरे कुलपति के कार्यकाल में भी निर्माणकार्यों की गति बहुत धीमी रही। योजना आयोग का अनुदान और वार्षिक बजट लौटाया जाता रहा। वर्धा शहर में कुछ मकान किराये पर लेकर विश्वविद्यालय चलाने की औपचारिकता पूरी की जाती रही।

वर्तमान में विश्वविद्यालय के तीसरे कुलपति के रूप में उत्तर प्रदेश कैडर के पुलिस अधिकारी और साहित्य की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाने वाले विभूति नारायण राय को कमान सौंपी गयी। अपने पीछे एक लम्बा प्रशासनिक अनुभव, हिन्दी साहित्य के विशद अध्ययन से उपजी व्यापक दृष्टि और क्षुद्र स्वार्थों और एकपक्षीय आलोचना से ऊपर उठकर नव-निर्माण करने की रचनात्मक ललक लेकर जबसे आप यहाँ आए हैं तबसे इस प्रांगण को विकसित करने व सजाने सवाँरने का काम तेजी से आगे बढ़ा है। केन्द्रीय लोक निर्माण विभाग की मन्थर गति से असन्तुष्ट होकर इन्होंने उत्तर प्रदेश की एक सरकारी निर्माण एजेन्सी को विश्वविद्यालय परिसर के भवनों का निर्माण कार्य सौंप दिया। रिकॉर्ड समय में यहाँ प्रशासनिक भवन, पुस्तकालय, अनुवाद और निर्वचन केन्द्र, गान्धी और बौद्ध अध्ययन केन्द्र, महिला छात्रावास, गेस्ट हाउस, आवासीय परिसर इत्यादि का निर्माण कार्य पूरा हुआ और अभी आगे भी रात-दिन काम चल रहा है।

दूसरी ओर विश्वविद्यालय में अध्ययन और अध्यापन का सबसे महत्वपूर्ण कार्य भी सुचारु ढंग से चलाने के लिए जिन अध्यापकों की आवश्यकता थी उन्हें भी नियुक्त किये जाने की प्रक्रिया तेज की गयी। हमारे देश में जिस एक कार्य पर सबसे अधिक अंगुलियाँ उठायी जाती हैं वह है नियुक्ति प्रक्रिया। विश्वविद्यालय भी इसका अपवाद नहीं रहा। मैने जब इस बावत कुलपति जी से सवाल किया तो बोले- देखिए, आलोचना तो होती ही है। लेकिन उससे डरकर यदि हम हाथ पर हाथ धरे बैठे रह जाँय तो स्थिति सुधरेगी कैसे? मैं अपना काम करने में ज्यादा ध्यान लगाता हूँ। यह करते हुए मेरी चमड़ी थोड़ी मोटी हो गयी है। सबको सफाई देने के चक्कर में अपना समय बर्बाद नहीं कर सकता। अन्ततः तो हमारा काम ही सामने आएगा और समय इसका मूल्यांकन करेगा। मेरी कोशिश है अच्छे लोगों को इस विश्वविद्यालय से जोड़ने की। वे चाहे जिस फील्ड के हों, यदि उनके भीतर कुछ सकारात्मक काम करने की सम्भावना है तो मैं उन्हें जरूर अवसर देना चाहूंगा।

ऊपरी टीले का चक्कर लगाते हुए हम दूसरे सिरे से नीचे आने वाली सड़क  पर टहलते हुए अर्द्धनिर्मित महिला छात्रावास के पास आ गये। इसके आधे हिस्से में छात्राएं आ चुकी हैं। छात्रों का हॉस्टल इस साल बनकर पूरा हो जाएगा। अभी वे शहर में एक किराये के भवन में रहते हैं जहाँ से बस द्वारा विश्वविद्यालय परिसर में आते हैं। हाल ही में बनी कंक्रीट और सीमेण्ट की सड़क के दोनो ओर लगे नीम और पीपल के पौधे लगाये गये थे जो पाँच से दस फीट तक बढ़ चुके थे। चार दीवारी पर वोगनबेलिया की बेलें फैली हुई थी। इस शुष्क मौसम में कोई अन्य फूल पत्ती उगाना बड़ा ही कठिन काम था। पानी की कमी सबसे बड़ी समस्या थी। कुलपति जी ने हाल ही में अधिग्रहित खेल के मैदान की जमीन दिखायी जिसे जोतकर बराबर कर लिया गया था। जंगली पौधों और कटीली घास को समूल नष्ट करने के लिए लगातार निराई और गुड़ाई की जा रही थी ताकि समतल मैदान पर नर्म मुलायम घास लगायी जा सके। मैने वहाँ एक इनडोर स्पोर्ट्स हाल बनवाने की सलाह दी जिसमें बैडमिण्टन, टेबुल टेनिस, जिम्नेजियम, इत्यादि की सुविधा रहे। कुलपति जी ने अगली पंचवर्षीय योजना में इसके सम्मिलित होने की बात बतायी।

प्रो. पालीवाल (सबसे बाएं) के घर में सुबह की चायइस प्रकार टहलते हुए हम अपने अगले ठहराव पर पहुँच गये। आज प्रो. सूरज पालीवाल की बारी थी। जी हाँ, वहाँ यह स्वस्थ परम्परा बनी है कि टहलने के बाद कुलपति जी सहित सभी अधिकारी किसी एक सदस्य के घर पर सुबह की चाय एक साथ लेंगे। पालीवाल जी अपने घर में अकेले रहते हैं।  कदाचित्‌ स्वपाकी हैं, क्यों कि सबको बैठाकर वे स्वयं किचेन में गये और अपने हाथ से ही चाय की ट्रे लेकर आये। वहाँ शुद्ध दूध में बनी गाढ़ी चाय पीकर हमें अपने घर की बिना दूध की ‘नीट चाय’ बहुत याद आयी। सुबह-सुबह टहलने की थकान इस एनर्जी ड्रिंक से जाती रही। साथ ही जो कैलोरी हमने टहलने में खर्च की वह तत्काल जमा हो गयी होगी। इस बीच मेरा ध्यान अपने हवाई चप्पल से रगड़ खाते पाँव की ओर गया। दोनो पट्टियों के नीचे पाँव में सुर्ख लाल निशान बन गये थे। थोड़ी देर में वहाँ छाले उभर आये।

करीब साढ़े सात बजे हम वहाँ से उठे तो कुलपति जी ने बताया कि आज अम्बेडकर जयन्ती के कारण विश्वविद्यालय में छुट्टी है। आपलोग सेवाग्राम देख आइए। हमें तो मन की मुराद मिल गयी। सेवाग्राम अर्थात्‌ वह स्थान जहाँ गांधी जी ने राजनीति से सन्यास लेने के बाद अपना आश्रम स्थापित करते हुए अपने सिद्धान्तों की प्रयोगशाला बनायी थी।

करीब साढ़े ग्यारह बजे तैयार होकर हम कुलपति जी के आवास पर पहुँचे ताकि सेवाग्राम आश्रम जाने के लिए किसी वाहन  का इन्तजाम हो सके। कुलपति जी हमारी मांग सुनकर पशोपेश में पड़ गये। छुट्टी के कारण कोई ड्राइवर आया नहीं था और अब किसी को बुलाने में काफ़ी देर हो जाती। धूप और गर्मी प्रचण्ड थी। यहाँ से सेवाग्राम जाने का कोई सार्वजनिक साधन उपलब्ध नहीं था। तभी वे अन्दर गये और अपनी निजी कार की चाबी ले आये। मुझे थमाते हुए बोले कि आप “वैगन-आर” तो चला लेंगे न? मैने सहर्ष हामी भरी और गाड़ी गैरेज से निकालकर, ए.सी. ऑन किया, विनोद शुक्ला जी को बगल में बैठाया और सेवाग्राम की ओर चल पड़े।

(मैने पिछली कड़ी में वादा किया था कि इस कड़ी में अम्बेडकर जयन्ती के अनूठे अनुभव की बात बताउंगा, लेकिन पोस्ट लम्बी हो चली है और अभी उस बात की चर्चा शुरू भी नहीं हो पायी है। इसलिए क्षमा याचना सहित उसे अगली कड़ी पर टालता हूँ। बस इन्तजार कीजिए अगली कड़ी का… :)

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)