हमारी कोशिश है एक ऐसी दुनिया में रचने बसने की जहाँ सत्य सबका साझा हो; और सभी इसकी अभिव्यक्ति में मित्रवत होकर सकारात्मक संसार की रचना करें।

Monday, September 19, 2016

यही समय है आँखें खोलो (गीत)

एक अंग्रेजी व्हाट्सएप सन्देश से प्रेरित ताज़ी रचना
यही समय है आँखें खोलो
जब इस दुनिया से चल दूंगा, तुम रोओगे नहीं सुनूंगा
व्यर्थ तुम्हारे आँसू होंगे, तब उनको ना पोछ सकूंगा
बेहतर है तुम अभी यहीं पर मेरी खातिर जी भर रो लो
यही समय है आँखें खोलो
मेरे पीछे तुम भेजोगे गुलदस्तों में फूल सजाकर
उनकी महक व्यर्थ जाएगी, छू न सकूंगा हाथ बढ़ाकर
बेहतर है तुम अभी यहीं पर फूलों वाली खुशबू घोलो
यही समय है आँखें खोलो

जब न रहूँगा इस दुनिया में मुझपर अच्छी बात करोगे
वह सराहना सुन न सकूंगा चाहे जितने भाव भरोगे
बेहतर है तुम अभी यहीं पर मुझे सराहो मुझे भिगो लो
यही समय है आँखें खोलो

प्राण पखेरू उड़ जाने पर सारी गलती माफ़ करोगे
जान नहीं पाऊंगा वह सब जैसा भी इंसाफ करोगे
बेहतर है तुम अभी यहीं पर पाप मेरे निज मन से धो लो
यही समय है आँखें खोलो

जब न मिलूंगा आसपास तो कमी खलेगी तुमको मेरी
पर महसूस कहाँ होगा तब ढँक लेगी जब नींद घनेरी
बेहतर है तुम अभी यहीं पर मिस करते हो खुलकर बोलो
यही समय है आँखें खोलो

इस दुनिया से लेकर हमको चल देगा जब काल हमारा
पछताओगे कितना कम था मेरे संग जो समय गुजारा
बेहतर है तुम अभी यहीं पर साथ-साथ जीवन में हो लो
यही समय है आँखें खोलो

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
ये है मूल रचना
*"When I'll be dead.....,*
*Your tears will flow,..*
*But I won't know...*
*Cry for me now instead !*

*You will send flowers,..*
*But I won't see...*
*Send them now instead !*

*You'll say words of praise,..*
*But I won't hear..*
*Praise me now instead !*

*You'll forget my faults,..*
*But I won't know...*
*Forget them now, Instead !*

*You'll miss me then,...*
*But I won't feel...*
*Miss me now, instead*

*You'll wish...*
*You could have spent more time with me,...*
*Spend it now instead !!"*
Moral......
Spend time with every person you love,
Every one you care for.
Make them feel special,
For you never know when time will take them away from you......

(भावानुवाद : सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

Friday, August 26, 2016

हरित दर्शन और पढ़ाई की कठिन राह

#साइकिल_से_सैर

तीन-चार दिन लगातार बारिश होने के बाद कल धूप खिली तो बाहर सड़क पर आवाजाही बढ़ गयी। सुबह बिस्तर पर पड़ा-पड़ा पहले तो मैं आलस्य रस का भोग करता रहा लेकिन अचानक उठ बैठा। मानो मेरी साइकिल ने जोर से घंटी बजाकर जगा दिया हो। बरामदे में खड़ी साइकिल ने दिखाया कि आँगन में बिछी धूप अमरुद के पेड़ की हरियाली के साथ ताल मिला रही है। मैंने फ़ौरन तैयारी की और साइकिल के साथ इंदिरा उद्यान के गेट का चक्कर लगाते हुए गोरा बाजार चौराहे तक जाकर परसदेपुर मार्ग पर निकल पड़ा।
सात बज चुके थे और स्कूली बच्चे घरों से निकलने लगे थे। साइकिल, स्कूटी, स्कूटर, रिक्शा, ठेला, ऑटो, वैन, जीप और बसों में सवार होकर अधिकांश बच्चे आज रंगीन टी-शर्ट्स में जा रहे थे। लाल, पीली, हरी और नीली टी-शर्ट शनिवार की यूनीफॉर्म होती है। इन चार रंगो से स्कूल के बच्चों के चार हॉउस बनते हैं। आशा, एकता, प्रेम और शांति (Hope, Unity, love & Peace) का सन्देश देते ये चार रंग प्राइवेट स्कूलों के बच्चों के ऊपर खिल रहे थे। सरकारी स्कूल सभी दिनों में प्रायः एक ही ड्रेस चलाते हैं। इसलिए सफ़ेद और खाकी वाले बच्चे भी दिखायी दे रहे थे।

लेकिन शहर से बाहर निकलने पर एक ही रंग का साम्राज्य चारो ओर फैला हुआ दिखा। धरती का इंच-इंच हरे और धानी परिधान से ढका हुआ था। पेड़ों की पत्तियां बारिश से धुलकर चमक रही थी। खेतों में धान और कुछ दूसरी फसलें भी और सड़क किनारे की खाली जमीन में उग आये खर पतवार और घासें भी, सभी एक ही ड्रेस-कोड का पालन कर रहे थे।

मैं भुएमऊ गेस्ट-हाउस के गेट के पास एक चाय की दुकान पर रुका। फूस की मड़ई के भीतर एक तख़्त पर बैठकर चाय पीते हुए मैं सड़क के उसपार पसरी हुई हरियाली और सड़क पर आती-जाती सवारियों को देखता रहा। देहात से शहर की ओर जाते साइकिल सवार मजदूर और स्कूली बच्चे व कोचिंग करने वाले विद्यार्थी निकलते जा रहे थे। मोबाइल कैमरे से सबकुछ समेट लेने का जी कर रहा था। नीले आसमान में यत्र-तंत्र सफ़ेद बादल लटके हुए थे जिनपर पड़ने वाली सूरज की तेज किरणें आकर्षक छटा बना रही थीं।
वहाँ से लौटते हुए एक जोड़ी सूखे पेड़ों ने रोक लिया। हरी-भरी धरती पर नीले आसमान में चमकते सूरज की किरणों से सराबोर ये तरुकंकाल ग़जब की कन्ट्रास्ट छवि प्रस्तुत कर रहे थे। इनके तने पर किसी उभरते कांग्रेसी नेता ने एक बोर्ड टंगवा रखा था जिसपर राहुल गांधी के जन्मदिन और रमजान व ईद की मुबारकबाद का सन्देश लिखा था। शायद गेस्ट हॉउस जाने वाले बड़े नेताओं और सोनिया जी के काफ़िले की नज़रे इनायत की उम्मीद से।

कुछ फोटो खींचकर आगे बढ़ा तो शहर की ओर साइकिल भगाते हुए अनुराग जायसवाल मिल गये। कॉमर्स की बारहवीं कक्षा के विद्यार्थी थे। अपनी साइकिल उनके बगल में लाकर मैंने बात शुरू की। उन्होंने सिविल लाइन्स तक आते-आते जो बातें बतायी वह एक सामाजिक अध्ययन का विषय है। महात्मा गांधी इंटर कालेज से उनका घर 10 किमी. दूर अयासपुर डीही गाँव में है। घर में छोटी बहन और माँ है, बाबा-दादी हैं। पिताजी राजस्थान में किसी मोज़े बनाने वाली फैक्ट्री में काम करते हैं। इन्हें स्कूल की पढ़ाई और कोचिंग करने के लिए रोज दो बार रायबरेली आना-जाना पड़ता है। यानि रोज 40 किलोमीटर साइकिल चलाते हैं।

मैंने सुझाया कि सुबह स्कूल के लिए निकलें तो टिफिन लेकर आया करें और शाम की कोचिंग निपटा के ही वापस जाया करें। बीच के तीन-चार घंटे किसी लाइब्रेरी में बैठकर उसका सदुपयोग करें। इसपर वे बोले कि घरपर कुछ जानवर हैं जिनकी देखभाल भी करनी पड़ती है। मैंने फिर समझाने की कोशिश की। दोपहर का ज्यादा समय आने-जाने में बर्बाद करना ठीक नहीं। थकान भी ज्यादा होती होगी और शाम को जल्दी नींद भी आती होगी। ऐसे में सी.ए. बनने का सपना बहुत कठिन हो जाएगा।

मेरी बात उन्हें कुछ-कुछ समझ में आती प्रतीत हुई क्योंकि जब हमारा रास्ता अलग होने को आया तो उन्होंने रुककर एक फोटो खिंचवाने के मेरे अनुरोध को सहर्ष स्वीकार कर लिया था।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी) 


Wednesday, June 29, 2016

साइकिल के साथ तैराकी का लुत्फ़

रायबरेली के नेहरू स्टेडियम में स्विमिंग पूल चालू हुआ तो मैंने अपनी साइकिल से सैर का कार्यक्रम इस तरण-ताल से जोड़ दिया। पिछले महीने भर से मेरी रायबरेली में सुबह की चर्या प्रायः एक जैसी हो गयी है। अब साइकिल से इधर-उधर घूमने के बजाय मैं तैराकी की तैयारी से निकलता हूँ, जेलरोड से चलकर स्टेडियम तक साइकिल से जाता हूँ। रास्ते में रोज ही वही चेहरे दिखायी देते हैं। बुजुर्ग और प्रौढ़ टहलते हुए, सड़क किनारे बने झोंपड़ों की औरतें घर के सामने झाड़ू-बुहारू और बर्तन मांजते हुए, घोषियों के बाड़े में गायों और भैंसों की सेवा में लगी लड़कियाँ और औरतें गोबर निकालती हुई और पुरुष दूध दुहते हुए, अपने डिब्बों के साथ कुछ लोग दूध नपवाने की प्रतीक्षा करते हुए और चाय की दुकान वाले भठ्ठी में कोयला भरते और आग सुलगाते हुए मिलते हैं।
सड़क की पटरी पर कुछ छोटी झोपड़ियां ऐसी भी हैं जिनके बाहर पड़ी खटिया पर कुछ बच्चे-बच्चियां और मर्द गहरी नींद में सोये मिलते हैं जैसे रात में गर्मी और ऊमस ने सोने न दिया हो और भोर की ठंडी हवा मिलने के बाद चैन की नींद आयी हो। खटिया के पास ही घर की औरत जमीन पर बैठकर सब्जी काटती या खाना बनाने की तैयारी करती दिख जाती है। एक दो तांगे भी मुंह ऊपर किए खड़े नज़र आते हैं जिनमें जुतने वाले घोड़े या घोड़ियां छुट्टा घूमते और जेल के सामने वाली खाली जमीन में घास चरते दिख जाते हैं। इन्हीं झोपड़ियों के सामने कुछ ठेले भी खड़े मिलते हैं जिनपर चमकदार सजावट और रंगीन बोतलें देखकर लगता है कि ये शहर के अलग अलग नुक्कड़ों पर रंगीन बर्फ़ वाला पानी, शर्बत और दूसरी चीजें बेचने के लिए जाते होंगे।
पेट्रोल पंप से आगे बढ़ने पर साई के स्पोर्ट्स हॉस्टल के प्रांगण में बने चबूतरे पर कुछ बुजुर्ग योग और प्राणायाम करते दिख जाते हैं तो स्टेडियम के गेट से लडके-लड़कियाँ, औरतें और मर्द अपने-अपने स्वास्थ्य की जरूरतों व पसंद के हिसाब से दौड़ने, टहलने, गप्पें लड़ाने, टाइम पास करने, हवा खाने या क्रिकेट, बैडमिंटन, वॉलीबॉल, फुटबॉल, हॉकी आदि खेलने के लिए आते या वापस जाते मिल जाते हैं। मैं अपनी साइकिल लेकर जब भी गेट के भीतर घुसता हूँ तो बैडमिंटन कोर्ट के सामने कोई न कोई साथी मिल जाता है। 
मुस्कान और अभिवादन के बाद सीधे स्विमिंग पूल के चैनेल गेट की और बढ़ जाता हूँ- रोज यह सोचता हुआ कि स्टेडियम के भीतर की यह सड़क जो अब गढ्ढों में बिखरे कंकड़-पत्थर के ढेर में तब्दील हो चुकी है वह कब किसी विकास योजना की कृपा प्राप्त करेगी। इस सड़क की दोनो तरफ अशोक के पेड़ जो बत्तीस साल पहले यहाँ के चौकीदार/चपरासी/माली रामनरेश ने लगाये थे वे बढ़कर आसमान से बातें करने लगे हैं, लेकिन सड़क का निरंतर ह्रास होता गया है। प्रकृति की देखभाल पाकर पेड़ों ने तो आसमान छू लिया लेकिन मनुष्य के भरोसे रहने वाली सड़क उसका भार ही ढोती रही और दुर्दशा से ग्रस्त हो गयी।

तरण ताल का निर्धारित समय साढ़े-पाँच से साढ़े-छः का है लेकिन मैं पन्द्रह-बीस मिनट देर से ही पहुँचता हूँ। वहाँ पहले से शुरू कर चुके ढेर सारे किशोरों और बड़ी उम्र के शौकिया तैराकों के बीच डाइव लगाकर पहुँचता हूँ और हरे पानी से भरे ताल में तैरने का अभ्यास करता हूँ। कोच की सीटी बजने के बाद सभी बाहर निकलते हैं। सबसे अंत में मैं निकलता हूँ ताकि बाथरूम में धक्का-मुक्की से बचा रहूँ।
आज-कल मानसून की पहली बारिश के बाद मौसम सुहाना लगने लगा है। धूल, गर्मी और पसीने से राहत मिल गयी है और घर से बाहर निकलना अच्छा लग रहा है। आज जब हमलोग तैर रहे थे तो आसमान में अचानक काले बादलों का एक पहाड़ ऊपर से गुजरा। लगभग अँधेरा छा गया। कुछ बच्चे तो चिल्ला-चिल्लाकर कहने लगे- कोच अंकल, लाइट जलवा दीजिए। लेकिन दो-तीन मिनट में ही हवा ने बादलों को परे धकेल दिया और रोशनी बढ़ गयी। एक बच्चे का जन्मदिन भी मनाया जा रहा था। बेचारे को पूल में सभी तंग कर रहे थे। फिर फोटुएं भी खींची गयीं।

आज जब मैं तैराकी के बाद बाथरूम में घुसा तो अगले बैच के बच्चे तैराकी के लिए जमा हो चुके थे। कोच द्वारा उनसे तैराकी के पहले कुछ वार्मअप एक्सरसाइज करायी जा रही थी। लेकिन दो तीन बच्चे बाथरूम एरिया में छिपे हुए कानाफूसी कर रहे थे। उनका आशय यह था कि अभी कसरत से बचा रहा जाय और जब पानी में उतरने की बारी आये तब बाहर निकला जाय। मैं यह हरकत भी प्रायः रोज देखता रहा हूँ। आज मैंने कोच को बता दिया। कोच ने उन बच्चों को डांटा और पूल का चक्कर तो लगवाया ही, मुझे बताया कि उनमें से एक के पापा यह शिकायत भी कर रहे थे कि दो महीने से तैरने के बावजूद उसका वजन क्यों नहीं घट रहा है।
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी) www.satyarthmitra.com