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शनिवार, 4 जून 2022

ऐतिहासिक वटवृक्ष की छाया में योग-अभ्यास

282685911_10227128851037219_5303430858485102274_nइलाहाबाद विश्वविद्यालय, प्रयागराज के कला संकाय की सड़कों व पगडंडियों पर #साइकिल_से_सैर करने व मच्छरों के साये में योगकक्षा में प्रतिभाग करने का पहला दिन जैसे हड़बड़ी में गड़बड़ी वाले अनुभव दे गया उसका किस्सा बता चुका हूँ। इस अनुभव के आधार पर मैंने अगले दिन की तैयारी में ध्यान रखा कि घर से थोड़ा और पहले निकल लूँ ताकि ऑनलाइन योगकक्षा के प्रारंभ होने से पहले ही उपयुक्त स्थान पर पहुँचकर अपना आसन जमा लूँ। परिसर का वह प्रवेश द्वार भी चुनना था जिसपर किसी बाड़ की बाधा का सामना किए बिना साइकिल सहित अंदर जा सकूँ। परिसर के पूरब की ओर खुलने वाला यह गेट डब्ल्यू.एच. की ओर से करीब पड़ता है। मुझे तो यहाँ बिल्कुल विपरीत दिशा से पहुँचना था। मच्छरों के संभावित हमले से बचाव के लिए मैंने पूरे पैर को ढंकने वाला लोवर और कॉलर वाली टी-शर्ट पहन लिया, पैरों में मोजे डाल लिए और शेष खुली त्वचा पर ऑडोमॉस क्रीम का लेपन भी कर लिया।

इस प्रकार पूर्व नियोजित तैयारी के साथ मैं ठीक समय पर उस विशाल वट-वृक्ष के नीचे पहुँच गया। मैंने जब अपनी साइकिल को उसके चौकोर चबूतरे से टिकाकर खड़ा किया तो मन में कुछ ऐसे भाव पैदा हो गए कि फौरन साइकिल को अलग हटाकर उसकी लंगड़ी के सहारे खड़ा कर दिया। दोनों हाथ अनायास प्रणाम की मुद्रा में जुड़ गए। 286088687_10227128850797213_2148969932489192006_n

सूर्य देवता ने अभी क्षितिज से झाँकना प्रारम्भ ही किया था। इसलिए इस ऊँचे और विशाल घेरे वाले पेड़ की घनी छाया हरी दूब से ढँके मैदान पर दूर-दूर तक फैली हुई थी। इस सुरम्य वातावरण में कुछ विद्यार्थी अपने-अपने पिठ्ठू बैग के साथ एकल या समूह में बैठकर अध्ययन रत थे। कुछ लड़के लड़कियाँ व्यायाम भी कर रहे थे। कुछ बड़ी उम्र के स्त्री-पुरुष किनारे-किनारे टहलते हुए बातें कर रहे थे।

मैंने इस वट वृक्ष के विशाल तने के ठीक सामने पूर्वाभिमुख होकर अपना आसन जमा लिया और मोबाइल खोलकर गूगल-मीट एप्प पर 'आरोग्यम ध्यान योग केंद्र आगरा' की ऑनलाइन योगकक्षा में लॉगिन करके मोबाइल को सामने स्टैंड पर स्थिर रख दिया। इसके बाद योग-गुरू डॉ. आर.के.एस. राठौर जी के निर्देशानुसार क्रमशः मंत्रोच्चार, सूक्ष्म व्यायाम, सूर्यनमस्कार, योगासन, प्राणायाम व ध्यान की क्रिया में सन्नद्ध हो गया। प्रतिदिन किये जाने वाले आसनों के साथ इस दिन डॉक्टर साहब रीढ़रज्जु की काल्पनिक रेखा पर नीचे से ऊपर स्थित सात चक्रों को संतुलित कराने वाले आसनों का अभ्यास करा रहे थे।285748806_10227128845117071_8397330393272350840_n

मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्धि, आज्ञा व सहस्त्रार नामक सातो चक्रों की क्रमिक स्थिति, इन चक्रों का आकार व रंग-रूप, इनमें पंखुड़ियों की संख्या, इनके अंतर्निहित तत्व- क्रमशः पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, प्रकाश आदि और इनसे संबंधित बीज मंत्रों के उच्चारण का परिचय देते हुए सातो चक्रों के संतुलन के लिए अलग-अलग सात आसन कराए गए।

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मूलाधर चक्र के संतुलन के लिए सेतुबंध आसन, स्वाधिष्ठान चक्र के लिए भुजंगासन, मणिपुर चक्र के लिए धनुरासन, अनाहत चक्र के लिए उष्ट्रासन, विशुद्धि चक्र के लिए मत्स्यासन, आज्ञा चक्र के लिए योगमुद्रा व सहस्त्रार चक्र के लिए यथा-सामर्थ्य शीर्षासन या अर्द्ध शीर्षासन का अभ्यास कराते हुए उन्होंने इन चक्रों के संतुलन से प्राप्त होने वाले लाभ भी बताए। ये चक्र क्रमशः अच्छा स्वास्थ्य (health), प्रसन्नता (happiness), शक्ति (power), करुणा (compassion), वाक्-कला (communication), अन्तःप्रज्ञा (intuition), व परमानंद (bliss) प्रदान करने वाले हैं।

सहस्त्रार चक्र को सभी तत्वों से परे बताया गया है जिसमें एक हजार पंखुड़ियाँ होती हैं। यह सिर के सबसे ऊपरी भाग में ब्रह्मरंध्र के साथ अवस्थित है। इसके संतुलित व जागृत होने पर व्यक्ति को परमानंद की प्राप्ति होती है। इसके लिए शीर्षासन का अभ्यास सर्वोत्तम बताया गया है। किंतु यदि शरीर इसकी अनुमति नहीं दे तो अर्द्ध शीर्षासन या सर्वांगासन भी किया जा सकता है।

उपर्युक्त आसनों द्वारा इन सात चक्रों को संतुलित करने के बाद इन्हें जागृत करने का अभ्यास भी बताया गया। इसके लिए ध्यानात्मक आसन में बैठकर दोनों हाथों से क्रमशः सात प्रकार की अलग-अलग मुद्राएं बनानी होती हैं और उनके बीजाक्षर का जप करना होता है। क्रमशः पृथ्वी मुद्रा, वरुण मुद्रा, अग्नि मुद्रा, वायु मुद्रा, आकाश मुद्रा, शंख मुद्रा व षडमुखी मुद्रा द्वारा इन सात चक्रों का जागरण होता है। इसप्रकार शरीर रूपी यंत्र के साथ मंत्र और तंत्र के सम्मिलित प्रयोग द्वारा व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास की परिकल्पना को साकार करने का साप्ताहिक प्रयास इस विशेष दिन की कक्षा में किया जाता है। इसके पहले वाले दिन रीढ़ की समस्याओं से मुक्ति पाकर इसे मजबूत करने वाले आसन बताए गए थे।

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इस योगकक्षा में जितने साधक सम्मिलित होते हैं उनमें कुछ लोग ही शीर्षासन का अभ्यास करते हैं। उम्र व शारीरिक सीमा के कारण शेष लोगों को अर्द्ध शीर्षासन या सर्वांगासन की ही अनुमति दी जाती है। मैंने जब इस वटवृक्ष के समक्ष शीर्षासन की तैयारी की तो इस ऐतिहासिक देशकाल व वातावरण के अविस्मरणीय क्षण को सहेजने का मन हुआ। थोड़ी दूर पर व्यायाम कर रहे एक विद्यार्थी को मैंने इशारे से बुलाया और उन्हें मोबाइल कैमरा थमाते हुए अनुरोध किया कि मेरे शीर्षासन की तस्वीर खींच लें। उन्होंने सहर्ष मुझे उपकृत किया। मेरी अपेक्षा से भी आगे जाकर क्रमवार अनेक मुद्राओं व अनेक कोणों से मेरे शीर्षासन की अच्छी फोटुएं खींच डाली। इसके लिए मैने हृदय से आभार व्यक्त किया। इसलिए भी कि वे चित्र कदाचित् यहाँ पहुँचकर अनेक मित्रों की प्रसन्नता बढ़ा देंगे।

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मैंने आप लोगों के लिए उस स्थल के जो चित्र सहेज लिए थे उनमें से कुछ यहाँ छोड़ जाता हूँ। आनंद लीजिए। शेष किस्सा यूँ ही समय-समय पर जारी रहेगा।

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(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

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शनिवार, 30 सितंबर 2017

आज़मगढ़ के चौक पर

ऑफिस से पाँच बजे फुर्सत मिल गयी तो मन हुआ कि शहर में घूमा जाये। सुबह दैनिक जागरण के स्थानीय पृष्ठ पर खबर थी कि पूरा शहर दुर्गामय हो गया है। श्रद्धालु मंदिरों में उमड़ रहे हैं। चौक स्थित प्राचीन दक्षिणमुखी दुर्गा मंदिर में सबसे ज्यादा भक्त दर्शन के लिए आ रहे हैं। आजमगढ़ का मुख्य बाजार चौक नाम से जाना जाता है।
मैंने ड्राइवर को बुलाकर चौक चलने की योजना बतायी। सुनते ही वो चौक पड़ा। मुझे लगा ऑफिस का समय पूरा होते ही वह अपने घर की राह लेना चाहता था। ऐसे में मुझे उसकी जो परेशानी समझ मे आयी वह पूछने पर गलत निकली। उसने कहा - साहब, चौक में कैसे जा पाएंगे, वहाँ तो पैदल चलना मुश्किल है। ओहो, ये बात है! तब तुम घर जाओ - मेरे इतना कहते ही वह चौकड़ी भरता चला गया।
मुझे तो अब नवरात्र में देवी दर्शन की इच्छा पूरी करनी ही थी। पहली बार तो आजमगढ़ की सड़कों पर घूमने का भी मन बना था। मैंने अपने इलाहाबाद विश्वविद्यालय के सर गंगानाथ झा हॉस्टल के सह-अंतेवासी और स्थानीय मित्र देवदत्त पांडेय को फोन मिलाकर अपनी इच्छा जतायी। वे सहर्ष तैयार हो गये और थोड़ी देर बाद अपनी मोटरसाइकिल से हाज़िर भी हो गये। मैंने कहा कि इस नवरात्र के शुभ मौके पर देवी जी की जितनी किरपा बटोर ली जाय उतना ही अच्छा हो। जीन्स, टी-शर्ट और हवाई चप्पल में हम फर्राटा भरते सबसे पहले सबसे निकट के मंदिर में गये।
मंदिर के गेट पर बाइक खड़ी कर हम अंदर गये तो आरती चल रही थी। धूप, अगरबत्ती और कर्पूर से उठती विशिष्ट महक और धुँए के बीच दर्जनों नर-नारी जय अम्बे गौरी का सस्वर गायन करते हुए झूम रहे थे। छत से लटकते विशाल घंटों के लोलक को पकड़कर आगे-पीछे टकराते हुए टंकार की ध्वनि निकालती स्त्रियां और दूसरे भक्त मां की श्रद्धा और भक्ति में लीन थे। बाकी दर्शनार्थियों के हाथ प्रणाम की मुद्रा में जुड़े हुए अथवा ताली बजाते हुए व्यस्त थे। आरती समाप्त होने के बाद मूर्ति के सबसे पास खड़े दो पुजारी नुमा युवकों ने कोई और अस्फुट मंत्र वाचन प्रारंभ कर दिया। उनमें से एक जोर जोर से यंत्रवत घंटा बजाता जा रहा था। थोड़ी देर प्रतीक्षा के बाद भी भक्तगण टस से मस नहीं हुए तो हम दोनो ने उनके बीच से जगह बनाया और हाथ बढाकर माँ की वेदी को स्पर्श किया और अपनी श्रद्धा भेंट कर बाहर निकल आये। दुर्गा माँ के बायीं ओर सांई बाबा का मंदिर भी था और दायीं ओर क्रमशः शिवलिंग और हनुमान जी के मंदिर भी थे। हमने बारी-बारी से उन सबके सामने जाकर दर्शन किये और शीश नवाये। मंदिर के बाहर प्रसाद की दुकानों और भीख मांगते बच्चों और औरतों को नजरअंदाज करके हमने एक विकलांग भिखारी को कुछ सिक्के थमाये और चौक के मंदिर के लिए निकल पड़े।
चौक की सड़क ठेले-खोमचे और पटरी की दुकानों के अतिक्रमण और दुपहिया वाहनों की बेतरतीब पार्किंग के कारण बेहद संकरी हो गयी थी। आवागमन के लिए जो सड़क बची हुई थी उसपर पैदल, साइकिल, रिक्शा, और बाइक वाले रेंग-रेंगकर चल रहे थे। निश्चित ही वहाँ किसी चार पहिए वाले का निबाह नहीं था। डीडी ने भी एक पान वाले के सामने बाइक लगा दी और हम सड़क पार करके सामने स्थित मंदिर के छोटे से प्रांगण में प्रवेश कर गये। यहाँ आरती समाप्त हो चुकी थी और उसमें भाग लेने वाले भक्त लौट चुके थे। दुर्गा जी की दक्षिणमुखी प्रतिमा पूर्ण सृंगार में चमक रही थी। उनके पैर फूल-मालाओं और दूसरी चढ़ावे की सामग्रियों से ढंक चुके थे। प्रतिमा और दर्शनार्थियों के बीच में लोहे की एक रेलिंग थी जिसके उस पार दो पुजारिन स्त्रियाँ दायें-बायें बैठी हुई थीं। वे दोनो दर्शनार्थी भक्तों से चढ़ावे की सामग्री लेकर उसे प्रतिमा से स्पर्श कराती और रुपये-पैसे व फूल-माला यथास्थान चढ़ाकर प्रसाद वापस कर देतीं। ज्यादा भीड़ नहीं थी इसलिए हमने आराम से दर्शन किया।
पुजारिन ने हमारे चढ़ावे के नोट को उलट-पलटकर तीन बार देखा, फिर मेरी ओर भी नजर उठाकर देखा तब सन्तुष्ट होकर उसे गल्ले में मिला दिया। दरअसल प्रसाद वाले ने जब मुझे यह नोट दिया था तो मुझे भी हिचक हुई थी, इसीलिए मैंने उस नोट को आगे ले जाना ठीक नहीं समझा और उसका तत्काल उपयोग कर दिया था। मैंने रेलिंग के नीचे रखे पत्थर पर नारियल फोड़ा, घुटनों पर बैठकर वेदिका पर माथा टिकाया और सप्तश्लोकी दुर्गा व दुर्गाष्टोत्तरशतनाम का पाठ किया। हम जब प्रसाद लेकर मुड़े तो देखा यहाँ भी बजरंगबली बिराज रहे हैं। मंगलवार था इसलिए वहां भी भक्तों की भीड़ ठीकठाक थी।
जब हम मंदिर के गेट से सडकपर निकल रहे थे तो भिखारियों के झुंड ने घेर लिया था। अपने मित्र की देखादेखी मैंने भी इसकी तैयारी पहले से कर ली थी। अर्थात प्रसाद वाले से नोट के बदले कुछ सिक्के ले लिए थे। फिर भी सिक्कों की तुलना में उनकी संख्या इतनी अधिक थी और उनमें प्रतिद्वंद्विता इतनी आक्रामक थी कि मुझे सबसे दीन-हीन और विकलांग का चुनाव यहाँ भी करना पड़ा।
देवी दर्शन के बाद अब बारी बाजार घूमने की थी। डीडी ने कुछ खाने को पूछा। मैंने कहा अगर यहाँ कुछ स्पेशल मिलता हो तो खिलाओ। फिर हम सड़क किनारे लगी एक चाट की पुरानी दुकान पर पहुँचे। लकड़ी के ठेले पर सजी इस दुकान के नीचे नाली थी जो बह नहीं रही थी। ठेले पर अनेक छोटे-बड़े पात्र थे जिनमें चटपटी मसालेदार खाद्य सामग्री रखी होगी। चाट बनाने वाले महाशय भी वैसे ही स्थूलकाय थे जैसे उनका ठेला। वे ठेले के बीच में पाल्थी मारकर बैठे हुए थे और अपने सामने चूल्हे पर रखे भारी भरकम तवे पर चाट की सामग्री एक लोहे की खुरपी नुमा यंत्र से चला चलाकर तैयार कर रहे थी। अपने दायें बायें ऊपर नीचे रखे बर्तनों से अलग अलग स्वाद के मसाले, चटनियाँ और रस-गंध आदि निकालकर गरम तवे पर रखी मटर व आलू के साथ भूनते और दोने में रखकर पेश करते जाते।
हम थोड़ी देर से पहुंचे थे, या आज मेला घूमने वाले ज्यादा आ गये थे इसलिए हमें गोलगप्पे नहीं मिल सके। पूरा स्टॉक खत्म हो गया था। हमने मटर वाली चाट ली, केवल नमकीन वाली। दही और मीठी चटनी से परहेज करते हुए। पता चला कि इस नामचीन दुकान पर लहसुन-प्याज का प्रयोग नहीं होता है और तेल के बजाय शुद्ध देसी घी में ही सबकुछ बनता है।

हमने वहाँ से आगे बढ़कर एक दुकानपर रस-मलाई का आनंद भी लिया क्योंकि बकौल डीडी यह यहाँ की शानदार मिठाई की दुकान थी। सबसे अच्छी और प्रतिष्ठित। हमने यहां से नमकीन खुरमे का एक पैकेट भी लिया। अबतक काफी देर हो चुकी थी। कमरे पर लौटे तो थोड़ी देर में हॉस्टल के ही दूसरे मित्र अनूप भी सपरिवार आ गये। पति-पत्नी दोनो अध्यापक हैं जिनकी दो बच्चे थोड़े शर्मीले लेकिन बहुत प्यारे हैं। मेरे पास उन बच्चों की आवभगत के लिए कुछ था ही नहीं। बस चाय के साथ उन नमकीन खुरमों ने इज्ज़त रख ली। बतकही में काफी समय निकल गया। चपरासी ने जब खाने की याद दिलायी तो हम सबने एक दूसरे से विदा ली। इसप्रकार आजमगढ़ में एक अच्छे दिन का अंत हुआ।



सोमवार, 19 सितंबर 2016

यही समय है आँखें खोलो (गीत)

एक अंग्रेजी व्हाट्सएप सन्देश से प्रेरित ताज़ी रचना
यही समय है आँखें खोलो
जब इस दुनिया से चल दूंगा, तुम रोओगे नहीं सुनूंगा
व्यर्थ तुम्हारे आँसू होंगे, तब उनको ना पोछ सकूंगा
बेहतर है तुम अभी यहीं पर मेरी खातिर जी भर रो लो
यही समय है आँखें खोलो
मेरे पीछे तुम भेजोगे गुलदस्तों में फूल सजाकर
उनकी महक व्यर्थ जाएगी, छू न सकूंगा हाथ बढ़ाकर
बेहतर है तुम अभी यहीं पर फूलों वाली खुशबू घोलो
यही समय है आँखें खोलो

जब न रहूँगा इस दुनिया में मुझपर अच्छी बात करोगे
वह सराहना सुन न सकूंगा चाहे जितने भाव भरोगे
बेहतर है तुम अभी यहीं पर मुझे सराहो मुझे भिगो लो
यही समय है आँखें खोलो

प्राण पखेरू उड़ जाने पर सारी गलती माफ़ करोगे
जान नहीं पाऊंगा वह सब जैसा भी इंसाफ करोगे
बेहतर है तुम अभी यहीं पर पाप मेरे निज मन से धो लो
यही समय है आँखें खोलो

जब न मिलूंगा आसपास तो कमी खलेगी तुमको मेरी
पर महसूस कहाँ होगा तब ढँक लेगी जब नींद घनेरी
बेहतर है तुम अभी यहीं पर मिस करते हो खुलकर बोलो
यही समय है आँखें खोलो

इस दुनिया से लेकर हमको चल देगा जब काल हमारा
पछताओगे कितना कम था मेरे संग जो समय गुजारा
बेहतर है तुम अभी यहीं पर साथ-साथ जीवन में हो लो
यही समय है आँखें खोलो

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
ये है मूल रचना
*"When I'll be dead.....,*
*Your tears will flow,..*
*But I won't know...*
*Cry for me now instead !*

*You will send flowers,..*
*But I won't see...*
*Send them now instead !*

*You'll say words of praise,..*
*But I won't hear..*
*Praise me now instead !*

*You'll forget my faults,..*
*But I won't know...*
*Forget them now, Instead !*

*You'll miss me then,...*
*But I won't feel...*
*Miss me now, instead*

*You'll wish...*
*You could have spent more time with me,...*
*Spend it now instead !!"*
Moral......
Spend time with every person you love,
Every one you care for.
Make them feel special,
For you never know when time will take them away from you......

(भावानुवाद : सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

शुक्रवार, 26 अगस्त 2016

हरित दर्शन और पढ़ाई की कठिन राह

#साइकिल_से_सैर

तीन-चार दिन लगातार बारिश होने के बाद कल धूप खिली तो बाहर सड़क पर आवाजाही बढ़ गयी। सुबह बिस्तर पर पड़ा-पड़ा पहले तो मैं आलस्य रस का भोग करता रहा लेकिन अचानक उठ बैठा। मानो मेरी साइकिल ने जोर से घंटी बजाकर जगा दिया हो। बरामदे में खड़ी साइकिल ने दिखाया कि आँगन में बिछी धूप अमरुद के पेड़ की हरियाली के साथ ताल मिला रही है। मैंने फ़ौरन तैयारी की और साइकिल के साथ इंदिरा उद्यान के गेट का चक्कर लगाते हुए गोरा बाजार चौराहे तक जाकर परसदेपुर मार्ग पर निकल पड़ा।
सात बज चुके थे और स्कूली बच्चे घरों से निकलने लगे थे। साइकिल, स्कूटी, स्कूटर, रिक्शा, ठेला, ऑटो, वैन, जीप और बसों में सवार होकर अधिकांश बच्चे आज रंगीन टी-शर्ट्स में जा रहे थे। लाल, पीली, हरी और नीली टी-शर्ट शनिवार की यूनीफॉर्म होती है। इन चार रंगो से स्कूल के बच्चों के चार हॉउस बनते हैं। आशा, एकता, प्रेम और शांति (Hope, Unity, love & Peace) का सन्देश देते ये चार रंग प्राइवेट स्कूलों के बच्चों के ऊपर खिल रहे थे। सरकारी स्कूल सभी दिनों में प्रायः एक ही ड्रेस चलाते हैं। इसलिए सफ़ेद और खाकी वाले बच्चे भी दिखायी दे रहे थे।

लेकिन शहर से बाहर निकलने पर एक ही रंग का साम्राज्य चारो ओर फैला हुआ दिखा। धरती का इंच-इंच हरे और धानी परिधान से ढका हुआ था। पेड़ों की पत्तियां बारिश से धुलकर चमक रही थी। खेतों में धान और कुछ दूसरी फसलें भी और सड़क किनारे की खाली जमीन में उग आये खर पतवार और घासें भी, सभी एक ही ड्रेस-कोड का पालन कर रहे थे।

मैं भुएमऊ गेस्ट-हाउस के गेट के पास एक चाय की दुकान पर रुका। फूस की मड़ई के भीतर एक तख़्त पर बैठकर चाय पीते हुए मैं सड़क के उसपार पसरी हुई हरियाली और सड़क पर आती-जाती सवारियों को देखता रहा। देहात से शहर की ओर जाते साइकिल सवार मजदूर और स्कूली बच्चे व कोचिंग करने वाले विद्यार्थी निकलते जा रहे थे। मोबाइल कैमरे से सबकुछ समेट लेने का जी कर रहा था। नीले आसमान में यत्र-तंत्र सफ़ेद बादल लटके हुए थे जिनपर पड़ने वाली सूरज की तेज किरणें आकर्षक छटा बना रही थीं।
वहाँ से लौटते हुए एक जोड़ी सूखे पेड़ों ने रोक लिया। हरी-भरी धरती पर नीले आसमान में चमकते सूरज की किरणों से सराबोर ये तरुकंकाल ग़जब की कन्ट्रास्ट छवि प्रस्तुत कर रहे थे। इनके तने पर किसी उभरते कांग्रेसी नेता ने एक बोर्ड टंगवा रखा था जिसपर राहुल गांधी के जन्मदिन और रमजान व ईद की मुबारकबाद का सन्देश लिखा था। शायद गेस्ट हॉउस जाने वाले बड़े नेताओं और सोनिया जी के काफ़िले की नज़रे इनायत की उम्मीद से।

कुछ फोटो खींचकर आगे बढ़ा तो शहर की ओर साइकिल भगाते हुए अनुराग जायसवाल मिल गये। कॉमर्स की बारहवीं कक्षा के विद्यार्थी थे। अपनी साइकिल उनके बगल में लाकर मैंने बात शुरू की। उन्होंने सिविल लाइन्स तक आते-आते जो बातें बतायी वह एक सामाजिक अध्ययन का विषय है। महात्मा गांधी इंटर कालेज से उनका घर 10 किमी. दूर अयासपुर डीही गाँव में है। घर में छोटी बहन और माँ है, बाबा-दादी हैं। पिताजी राजस्थान में किसी मोज़े बनाने वाली फैक्ट्री में काम करते हैं। इन्हें स्कूल की पढ़ाई और कोचिंग करने के लिए रोज दो बार रायबरेली आना-जाना पड़ता है। यानि रोज 40 किलोमीटर साइकिल चलाते हैं।

मैंने सुझाया कि सुबह स्कूल के लिए निकलें तो टिफिन लेकर आया करें और शाम की कोचिंग निपटा के ही वापस जाया करें। बीच के तीन-चार घंटे किसी लाइब्रेरी में बैठकर उसका सदुपयोग करें। इसपर वे बोले कि घरपर कुछ जानवर हैं जिनकी देखभाल भी करनी पड़ती है। मैंने फिर समझाने की कोशिश की। दोपहर का ज्यादा समय आने-जाने में बर्बाद करना ठीक नहीं। थकान भी ज्यादा होती होगी और शाम को जल्दी नींद भी आती होगी। ऐसे में सी.ए. बनने का सपना बहुत कठिन हो जाएगा।

मेरी बात उन्हें कुछ-कुछ समझ में आती प्रतीत हुई क्योंकि जब हमारा रास्ता अलग होने को आया तो उन्होंने रुककर एक फोटो खिंचवाने के मेरे अनुरोध को सहर्ष स्वीकार कर लिया था।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी) 


शनिवार, 11 जून 2016

कुकरैल जंगल की सैर के बहाने...

इंदिरानगर मुंशीपुलिया के सेक्टर 16 के अपने अपार्टमेंट की छत से जब उत्तर की ओर देखता था तो कंक्रीट के जंगल के पीछे मीलों दूर प्राकृतिक हरियाली वाले असली जंगल की स्काइलाइन दिखायी देती थी। जब मेरी साइकिल कुछ दिनों के लिए लखनऊ पहुंची तो मैंने उस हरियाली को नजदीक से देखने का मन बनाया। 
रविवार की सुबह जल्दी उठकर मैं तैयार हुआ और धूप का चश्मा खोल सहित कैरियर में दबाकर निकल पड़ा इन्दिरानगर के उत्तरी छोर की थाह लगाने। सेक्टर 17 की पुरानी सब्जी मण्डी के पास से गुजरते हुए मानस सिटी की ओर जाने वाली सड़क पर बढ़ा तो 'गहरी सीवर की खुदाई का काम प्रगति पर' होने के कारण 'कष्ट के लिए खेद' प्रकट करने वाले बोर्ड ने रास्ता रोक लिया। लेकिन ऐसे छोटे अवरोध से न मैं डिगने वाला था न मेरी साइकिल रुकने वाली थी। बगल की एक पतली गली पर टेढ़े-मेढ़े चलते हुए एक कच्चे रास्ते से होकर मैं चांदन होते हुए सुगामऊ जाने वाली पक्की सड़क पर पहुँच गया।
यह इलाका मेरे लिए बिल्कुल अनजान था। मैं तो बस दिशाओं को पहचान कर शहर से बाहर की ओर जाने वाली सड़क पर आगे बढ़ते जाना चाहता था ताकि शहरी प्रदूषण से दूर गाँव की साफ-सुथरी हवा में साइकिल चला सकूँ।
चाँदन में एक बड़ी सी सुन्दर मस्जिद मिली और एक बड़ा सा मैरेज हॉउस भी। सड़क पर साफ-सफाई की कोई व्यवस्था नहीं दिखी। यहाँ न तो नगर निगम के स्वीपर आते होंगे और न ही ग्राम पंचायत के सफाई कर्मी। यहीं पर मुझे एक विचित्र नजारा देखने को मिला।
मुझे एक के बाद एक बीस-पच्चीस लड़के मिले जिनकी उम्र सोलह से बाइस वर्ष के बीच रही होगी। वे सभी एक हाथ में गाइड बुक और नोट्स की कॉपी, जीन्स की जेब में कलम और मोबाइल तथा दूसरे हाथ में जमीन पर बैठने के लिए प्लास्टिक वाली सीमेंट की बोरियाँ तह करके पकड़े हुए चले जा रहे थे। आगे एक आवासीय दड़बानुमा मकान मिला जिसमें ये परीक्षार्थी प्रवेश कर रहे थे। मैं रुके बिना आगे बढ़ा तो दूसरी और से भी वैसे ही विद्यार्थी आते मिले। जरूर यहाँ कोई सस्ती डिग्री बनवाने का कारखाना लगा होगा। मन तो हुआ कि मोबाइल कैमरे से इस गतिविधि का स्टिंग ऑपरेशन कर लूँ लेकिन सुरक्षा की कोई गारंटी न होने के कारण इस विचार को फ़ौरन मटिया कर आगे बढ़ गया।

इसके आगे बायीं ओर एक बड़ा सा खाली मैदान था जिसके पीछे मानस ग्रीन सिटी बस रही थी। खाली मैदान असमतल था, कूड़े-कचरे का आश्रय था और इसमें आवारा झाड़ियों के झुरमुट भी थे। आसपास जिनके घरों में शौचालय नहीं उनके लिए भी यहाँ सुबह का सुभीता था। कुछ लोग हाथ में पानी की बोतल लटकाये उस ओर तेजी से जाते और आराम से वापस आते दिखाई दिये। यह सब अपनी आँखों से लाइव देखता हुआ मैं चलता रहा।
आगे बढ़ा तो एक बड़ी सी झोपड़पट्टी दाहिनी ओर फैली हुई दिखाई दी। टिन के पत्तरों और टाट से घेरकर बने इन असंख्य झोपड़ों की छत पर इतने चीथड़े कहाँ से आते हैं यह समझ में नहीं आया। इनमें रहने वाले पुरुष मुख्य रूप से घर-घर घूमकर कबाड़ खरीदने का काम करते जान पड़ते थे। वहाँ खड़े ठेले और जमा कबाड़ तो यही बता रहे थे। औरतें भी शहरी मुहल्लों में जाकर कामवाली बाई का काम ही करती होंगी। वहीं एक कूड़ा बीनने वाली युवती अपने काम पर निकल चुकी दिखायी दी। सड़क के दूसरी ओर एक पब्लिक स्कूल मिला जो तीन-मंजिला था। नाम था तथागत पब्लिक स्कूल और तथागत टेक्निकल इंस्टीट्यूट। खूब रंगा-पुता यह संस्थान कई प्रकार के कोर्स चलाने की सूचना दे रहा था। 
आगे सुगामऊ का उपनगरीय बाजार मिला जो शहर और देहात के बीच की कड़ी बना हुआ है। इसकी दुकानों पर लगे बोर्ड बता रहे थे कि यहाँ के लोग भी अपने को इंदिरानगर का ही बताते है। इसे पार करने पर पक्के मकानों की सृंखला टूटने लगी और सड़क किनारे की जमीन चारदीवारी वाले खाली प्लॉट्स में बंटती हुई मिलने लगी। बीच-बीच में इक्का-दुक्का परचून की दुकानें थीं जहाँ मोबाइल रिचार्ज की सुविधा भी उपलब्ध थी। बिल्डिंग मटेरियल वाली बिना छत की अनेक दुकानें भी थीं जो गाँव की ओर पाँव पसारते शहर की जरुरी खुराक मुहैया कराती हैं। ट्रेक्टर-ट्रॉली या छोटे ट्रकों पर ढोयी जाती ईंट और बालू तथा बड़े ट्रकों पर बाहर से आती गिट्टी, मोरंग और सरिया की खेप इन लगातार खड़े होते मकानों और बनते हुए मुहल्लों में खप रही है और खप रहे हैं आम के असंख्य बाग भी जिनके कारण कभी यहाँ एक गाँव का नाम पड़ा था अमराई।
इसी सड़क पर एक मकान के आगे फुटपाथ पर खाना बनाते-खाते मजदूर मिले। ईंटो को तीन तरफ से जमाकर बनाये गए लकड़ी के कामचलाऊ चूल्हों पर सब्जी और चावल या रोटी बनाकर एल्युमिनियम की थाली में परोसकर हरी मिर्च और नमक के साथ खाकर ये श्रमजीवी नया शहर खड़ा करने के काम पर निकल जाएंगे। मैंने रुककर पूछा तो पता चला कि उन्होंने सात सौ रूपये मासिक किराये पर एक कमरा ले रखा है जिसमें बिजली का कनेक्शन नहीं है। इसमें चार-पाँच मजदूर एक साथ रहते हैं। रहते क्या हैं, अपने कुछ कपड़े, बर्तन और राशन रखते हैं। रात में सोने के लिए मकान की छत है और सुबह दिशा-मैदान के लिए खाली जमीने हैं जिनकी बाउंड्री से आड़ भी मिल जाती है। मकान मालिक ने एक नल जरूर लगवा दिया है जिसमें एक-दो घंटे पानी भी आता है जिसे वे पी सकते हैं। फतेहपुर, मऊ, इटावा, सीतापुर और हरदोई जिले से आकर ये दिहाड़ी मजदूर जैसी कठिन दशा में जी रहे हैं वह मार्क्स के सर्वहारा की याद दिलाती है।
आगे सड़क एक तिराहे पर जाकर खत्म हो गयी जिसका नाम था बजरंग चौराहा। इसके आसपास के गाँव हैं मोहम्मदपुर और रसूलपुर। इस तिराहे पर एक दुकान की भठ्ठी जल रही थी जिसपर आलू उबाला जा रहा था। मैंने साइकिल खड़ी करते हुए पूछा- चाय पिला दोगे क्या? दस बारह साल के लड़के ने हाँ में सिर हिलाया और प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठने का इशारा किया। मैंने पहले से बनी रखी चाय लेने से मना कर दिया और अदरक वाली स्पेशल चाय बनाने को कहा वह भी पैन को धुलकर और ताजी पत्ती डालकर।
उस छोटू ने अब मुझे ध्यान से स्कैन करते हुए देखा और समझ गया कि मैं उसका रेगुलर ग्राहक नहीं बल्कि शहर से भटका हुआ नया आदमी हूँ। मैंने बात-बात में उसका अता-पता जानने की कोशिश की। नाम था रामशंकर यादव जो एक साल पहले फतेहपुर के अपने घर से भागकर लखनऊ कमाने आया था। छठी क्लास में फेल हो जाने के बाद पढ़ाई छोड़ दी थी क्योंकि स्कूल में पढ़ाई नहीं होती थी, केवल खिचड़ी खिलाते थे, वह भी बहुत ख़राब। उसने यह तंज भी कसा कि जब इम्तहान में कोई फेल ही नहीं हो सकता तो पढ़ाई क्या घंटा होगी...?
उसने बताया कि इस दुकान का मालिक ही यहाँ का मेन कारीगर था जो अभी आया नहीं था। आठ बजे आता है। तबतक वह आलू उबालकर छील लेगा। सब्जी की तैयारी कर लेगा। छोला के लिए चना भी उबाल देगा और चावल भी बना देगा।
इस ढाबे के मुख्य ग्राहक आसपास काम करने वाले प्रवासी मजदूर थे। एक थाली खाना 30 रूपये में मिलता था। चार रोटियाँ, सब्जी, दाल और क्वाटर चावल। मैंने पूछा- इतने में मजदूर का पेट भर जाता है क्या? लड़का चुप रहा लेकिन इस प्रश्न का उत्तर दिया भीतर बेंच पर बैठे एक मजदूर ने जो हमारी बात ध्यान से सुन रहा था। बोला- कभी नहीं साहब। पचास रूपये से कम नहीं लगता है। चार रोटी इस्टरा लो तब कुछ बुझाता है। कुछ भी इस्टरा लेने पर पैसा लेता है। बहुत चालू है यह लौंडा।

चालू कहे जाने पर रामशंकर की बाछें खिल गयीं। मैंने पूछा- घर की याद आती है?
बोला- अभी तो गये थे। आठ की मार्कशीट भी बनवा लाये हैं।
-पढ़ने का मन करता है क्या?
-क्या पढ़ें, पैसा भी कमाना जरूरी है।
-कितना कमा लेते हो?
-अभी तक तो काम सीख रहा था। अब सब सीख गया हूँ तो मालिक तनख्वाह बढ़ाएंगे।
-फिर भी ढाई-तीन हजार तो मिलता ही होगा?
इसपर वह हँसने लगा जैसे इतने रुपयों की कल्पना करके ही उसे ख़ुशी मिल गयी हो। मैंने और कुरेदना ठीक नहीं समझा। इतना जरूर बता दिया कि ठीक से पढ़ लेते तो अच्छी नौकरी मिलती और सुन्दर छोकरी भी। छोकरी शब्द सुनते ही उसकी बत्तीसी फिर चमक उठी।

इस बीच चावल का पानी उबलने लगा था और वह छनौटे से चावल के दाने निकालकर उनके पक जाने का पता लगाने लगा। मैंने पूछा कि चावल में पानी ज्यादा तो नहीं है। उसने बताया कि पक जाने के बाद चावल पानी से छानकर निकाल लिया जाएगा। पानी में छोड़ देने पर तो यह गीला होकर चिपक जाएगा। कोई खाएगा ही नहीं। लेबर को 'फरहर' चावल पसंद है।

इतना ज्ञान पाते-पाते मेरी चाय खत्म हो गयी। मैंने उसे यह नहीं बताया कि छानकर बनाये गये चावल से कुछ कार्बोहाइड्रेट निकलकर पानी में चला जाता है और बर्बाद हो जाता है। उसे चाय के पाँच रूपये थमाते हुए मैंने जंगल की ओर जाने का रास्ता पूछा और इस बजरंग चौराहे से मोहम्मदपुर होकर कुर्सी रोड की ओर जाने वाली सड़क पर चल पड़ा।
आगे एक पतली नहर मिली जिसमें पानी भी भरा हुआ था। वहीं आम के पेड़ पर लटके हुए टिकोरे मेरी साइकिल को फिर से रोकने में सफल हो गये। एक चारदीवारी के भीतर मक्के की हरीभरी फसल लहलहा रही थी।
इस बीच धूप चढ़ आयी थी तो मैंने काला चश्मा चढ़ा लिया। सुरम्य वातावरण के आनंद को लंबी और गहरी साँसों में महसूस करने के बाद मैं आगे बढ़ा तो जरहरा गाँव को पार करके कुकरैल के जंगल में बनायीं गयी पक्की सड़क पर आ गया जो जंगल को पार करके शहर में चली जाती है। रास्ते में एक कम उम्र का छुट्टा साँड़ आता दिखा तो मेरा कलेजा धकधक करने लगा। लेकिन मुझे देखकर साँड़ की हवा भी ख़राब हो गयी शायद। उसने सड़क छोड़कर पेड़ों के पीछे की राह ली और मैंने राहत की साँस। 

वहीं दूसरी ओर एक ईंट भट्ठे की चिमनी धुँवा उगल रही थी। मैंने तेजी से साइकिल दबाते हुए घने जंगल की ओर रुख किया। करीब छः किलोमीटर जंगल के भीतर साइकिल से चलने का आनंद अद्भुत था। पहले बबूल, बाँस, नीम, चिलबिला और फिर सागौन, साखू, यूकेलिप्टस, सेमल, और दूसरे अज्ञातनाम पेड़-पौधों से लबरेज इस जंगल में शहर से लगे सिरे पर वन विभाग द्वारा एक पार्क (पिकनिक स्पॉट) विकसित किया गया है जहाँ मगरमच्छों का विशेष आकर्षण है।
जब मैं काफी चल लेने के बाद थकान महसूस करने लगा तब एक मील के पत्थर ने बताया कि फरीदीनगर 5 किमी दूर है। इसका मतलब था कि मुझे अभी घर पहुँचने के लिए आठ-नौ किलोमीटर और चलना पड़ेगा। मैंने सोच लिया कि अब बिना कहीं रुके घर चलना चाहिए।लेकिन रास्ते में मुझे तीन जगह रुकना पड़ा। एक, जहाँ की हरियाली पेड़ों में आग लगने के कारण मिट गयी थी और सड़क किनारे पेड़ों के काले कंकाल दिखायी दे रहे थे। दूसरे, जहाँ एक ग्रामीण अपने खेत में पैदा हुए बिल्कुल ताजा नेनुआ और परवल रखकर मेरे जैसे किसी शहरी ग्राहक की प्रतीक्षा कर रहा था; और तीसरा जब मैं पिकनिक स्पॉट के गेट से अपने घर जाने के मुख्य रास्ते के अवरुद्ध हो जाने के कारण वैकल्पिक रास्ता नहीं समझ पा रहा था। 
अस्तु, मैंने पर्णविहीन पेड़ों के साथ अपनी तस्वीरें खींचने, सस्ती-ताज़ी-हरी सब्जी खरीदकर साइकिल के कॅरियर में दबाने के बाद फरीदीनगर से मुंशी पुलिया के बीच टेढ़ी-मेढ़ी गलियों के बीच भटकते-पूछते हुए रास्ता तय किया और दुबारा ऐसी सैर पर जाने का खुद से वादा करके घर लौट आया।
(सत्यार्थमित्र)
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मंगलवार, 24 मई 2016

सी.एम.के साथ साइकिल यात्रा

#साइकिल_से_सैर, लखनऊ में


पिछले शनिवार को बुद्ध पूर्णिमा और अगले दिन रविवार की छुट्टी तो थी ही, शुक्रवार को एनपीएस पर परिचर्चा के लिए मुख्यालय से सभी कोषाधिकारियों को बुलावा आ गया तो मुझे लगातार चार रातें और तीन दिन लखनऊ में गुजारने का मौका मिल गया। वृहस्पतिवार की शाम ऑफिस से लौटकर लखनऊ के लिए चलने को हुआ तो मेरी पार्टनर भी साथ चलने को मचल उठी। इतने दिनों रायबरेली में अकेले गुजारना इसे गँवारा नहीं था। मैंने भी इसके साथ लंबे ब्रेक को टालने के लिए इसे साथ ले चलना ही ठीक समझा। इस तरह मेरी सरकारी गाड़ी पर सवार होकर मेरी हमसफ़र साइकिल नवाबों की नगरी में नमूदार हो गयी।
लखनऊ में अगली सुबह स्पेशल हो गयी। मेरी बेटी वागीशा साइकिल चलाने के लिए बहुत उत्साहित थी। दरअसल मुख्यमंत्री अखिलेश यादव जी ने उस दिन पर्यावरण को प्रदूषण मुक्त रखने में साइकिल के प्रयोग को बढ़ावा देने के लिए स्कूली बच्चों के साथ साइकिल चलाने का कार्यक्रम बनाया था। टाइम्स ऑफ़ इण्डिया के Go Green Campaign का हिस्सा बने इस कार्यक्रम में शहर के प्रत्येक स्कूल से एक बच्चा बुलाया गया था। वागीशा को उसके स्कूल से इसके लिए चुना गया था। बच्चे के साथ अभिभावक भी 'सादर' आमंत्रित थे। फिर क्या था। मैंने अपनी साइकिल से ही मुंशी पुलिया से मुख्य मंत्री आवास की दूरी तय करने की ठानी। अलबत्ता बेटी को उसकी साइकिल सहित गाड़ी पर बिठाकर 5-कालिदास मार्ग के लिए रवाना कर दिया।

मेरी साइकिल का उत्साह देखते ही बनता था। हम मुंशी पुलिया से पॉलिटेक्निक चौराहा तक सर्विस लेन पकड़कर कतारबद्ध हरे-भरे पेड़ों से बात करते हुए पहुँचे। गोमतीनगर के विभूतिखंड में 'वेव मॉल' को पार करके फ्लाईओवर की चढ़ाई चढ़ने में अच्छी कसरत हो गयी लेकिन उसकी ढलान पर बिना पैडल चलाये तेजी से उतरते हुए ठंडी हवा खाकर थकान छू-मंतर भी हो गयी। लोहिया पार्क चौराहे को पार करते ही मैं सड़क के बायीं ओर थोड़ा ऊँचा बनाये गये पैदल पथ पर चढ़ गया। 

लाल टाइल्स लगे इस चिकने ट्रैक पर साइकिल चलाने में थोड़ी सावधानी तो जरुरी थी लेकिन मुख्य सड़क पर फर्राटा भरती गाड़ियों से सुरक्षित दूरी और बायीं ओर घने पेड़ों से घिरे लोहिया पार्क से निकटता के कारण मन प्रफुल्लित हुआ। इस पैदल पथ पर साइकिल चलाने का आनंद जल्दी ही जाता रहा क्यों कि आगे इसके निर्माण का कार्य 'प्रगति पर' हो गया था। मिट्टी के ढूहे में घुसकर बिला गयी थी यह पगडंडी। यहाँ साइकिल खड़ी कर एक दो तस्वीरें लेने के बाद मैं मुख्य सड़क पर आ गया और फन रिपब्लिक मॉल को पार करते हुए उस ओर बढ़ गया जिसे लखनऊ की शान समझा जाता है।

संगमरमर से बनी हाथियों के अलावा अनेक (दलित) महापुरुषों की विशालकाय प्रतिमाओं से सजे सामाजिक परिवर्तन स्थल की शोभा देखते ही बनती है। बाबासाहब की महिमा इस स्थान पर खूब मुखरित हुई है। इस समय यहाँ धूप निकल आयी थी लेकिन इससे बेखबर एक आदमी यहीं पैदल पथ पर गहरी नींद में सो रहा था। जैसे पूरी रात गर्मी में जागकर ठंडी सुबह की प्रतीक्षा में गुजारी हो। यह बात दीगर है कि अच्छे दिनों की आस पर महंगाई की मार की तरह इसकी शीतल कामना पर भी सूरजदेव अग्नि के कोड़े बरसाने की तैयारी करने लगे थे।


इस मंजर को पीछे छोड़ मैं गोमती नदी के पुल पर पहुँच गया। नदी के किनारों को पक्का करके उसे आकर्षक रूप देने का काम प्रगति पर है। मिट्टी के पहाड़ काटे जा रहे हैं, कंक्रीट की मोटी दीवारें खड़ी की जा रही हैं जिनपर पत्थर की सीढ़िया जमायी जा रही हैं। सुन्दर नारियल के पेड़ सीधी कतार में लगाये जा रहे हैं। सुना है कि शहर में गुजरती गोमती को लन्दन की टेम्स नदी का रूप दिया जाने वाला है।
पहली बार मैंने रुककर देखा तो नदी का पानी काफी साफ-सुथरा और हरा-भरा दिखा। मुझे तो वहीं ठहर जाने का मन हो रहा था, लेकिन सात बजने में कुछ ही मिनट बाकी थे और मुख्यमंत्री का कार्यक्रम शुरू होने वाला था। मैंने पैडल पर दबाव तेज़ किया और पूरी शक्ति लगाकर तेजी से कालिदास मार्ग चौराहे पर पहुँच गया जहाँ वागीशा अपनी साइकिल के साथ मुख्यमंत्री आवास तक चलने के लिए मेरी प्रतीक्षा कर रही थी। सुरक्षा कर्मियों ने हमारा हुलिया देखकर सहर्ष गेट के अंदर जाने दिया। मैंने अपनी साइकिल अगले सुरक्षा बूथ के किनारे खड़ी कर लॉक किया और मुख्यमंत्री आवास के सामने उस स्थान पर चला गया जहाँ से कार्यक्रम की शुरुआत होनी थी।


रंगी-पुती चौड़ी सड़क की बायीं पटरी पर लोहे की रेलिंग से घेरकर साइकिल ट्रैक बनाया गया था जिसके ऊपर आकर्षक साइनबोर्ड लगाकर पर्यावरण की रक्षा और साइक्लिंग के महत्व को दर्शाते नारे लिखे गये थे। वहाँ एक-एक कर इकट्ठा होते बच्चों और उनकी साइकिलों को पंक्तिबद्ध खड़ा कराने के लिए सुरक्षा कर्मी और कुछ वरिष्ठ अधिकारी मुस्तैद थे। एक सिपाही खोजी कुत्ते की बागडोर थामें चारो ओर घुमा रहा था। कुत्ते ने जब इंच-इंच को सूंघकर सिक्यूरिटी क्लीयरेंस दे दिया तब एक सुरक्षा अधिकारी ने वॉकी-टॉकी पर खबर भेजी। एक सफारी वाला लम्बा-तगड़ा आदमी सिपाहियों को समझा रहा था कि गार्जियन्स‍ को सी.एम. से कितनी दूरी पर रोकना है।
लाइन लगाकर खड़े बच्चों की तस्वीरें खींची जा रही थीं। मीडिया वालों का एंगल अलग था और अभिभावकों का अलग। वे अपने बच्चे को फोकस कर रहे थे। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का जमावड़ा बढ़ता गया और उनके रिपोर्टर अपनी स्टोरी तैयार करने लगे। बच्चों को अब अपनी-अपनी साइकिल के साथ ट्रैक में खड़ा कर दिया गया ताकि फ़ोटो अच्छी आ सके। अंग्रेजी अखबारों की रिपोर्टर प्रायः नयी उम्र की लड़कियाँ थी जो एक-एक बच्चे से सवाल पूछकर नोट बना रही थीं और अपने मोबाइल कैमरे से जरूरी फोटोग्राफ लेती जा रही थीं।


टाइम्स ऑफ़ इण्डिया की रिपोर्टर मेरे पास भी आयी और मुझसे वागीशा के बारे में पूछा। यह भी पूछा कि साइकिल से स्कूल क्यों नहीं जाती। लखनऊ की बेतरतीब ट्रैफिक में सुरक्षा की चिंता और स्कूल की दूरी, ये दो वजहें मैंने बतायी। उसने कहा कि आप बड़े उत्साह से बेटी की तस्वीरें ले रहे थे। प्लीज़ एक बार और ऐसा कीजिए ताकि मैं आपकी फोटो ले सकूँ। मैंने ख़ुशी-ख़ुशी आईपैड का कैमरा ऑन किया और बच्चों की ओर फोकस करने लगा। मोहतरमा ने मुझे थैंक्यू बोला तो लगा जैसे कल अख़बार में मुझे जरूर छापेंगी। 

लेकिन अगले दिन फ़ोटो खींचते हुए जिस अभिभावक की फ़ोटो छपी वो एक मॉम की थी जिन्होंने यहाँ आने से पहले जरूर किसी ब्यूटी पार्लर में अच्छा समय और पैसा खर्च किया होगा। खैर जो हुआ अच्छा हुआ। सम्पादक का सौंदर्यबोध उम्दा था। उसने मेरे बारे में लिखित रिपोर्ट जरूर छापी लेकिन वह थी विशुद्ध कल्पना पर आधारित; ऐसी बात जो मुझसे मेल नहीं खाती।


इतने में हूटर बजाती गाड़ियों का काफिला आ पहुँचा। मैं अचकचा कर सोचने लगा कि सामने के ही आवास से आने के लिए सी.एम. को इतनी गाड़ियों की जरूरत क्यों पड़ी। लेकिन कुछ समझ पाता इससे पहले ही श्री अखिलेश जी सामने आ चुके थे। साथ में उनकी बेटी भी थी। मीडिया वालों ने उन्हें ऐसे घेर लिया कि बच्चे उनसे ओझल हो गये। सुरक्षा कर्मियों ने रेलिंग से एक मोटा रस्सा बांधकर उसके भीतर कैमरामेन और रिपोर्टर्स को सीमित करने की कोशिश की लेकिन सब बेकार साबित हुआ। थोड़ी देर तक मीडिया वाले एक दूसरे पर चढ़ते हुए फ़ोटो और बाईट लेते रहे।


आखिर मुख्यमंत्री जी को ही बच्चों की सुध आयी। उन्होंने मीडिया वालों को परे धकेलते हुए बच्चों से परिचय लेना शुरू किया और धक्का-मुक्की के बीच अपनी स्पोर्ट्स साइकिल पर बैठकर ट्रैक में घुस गये। उनके ब्लैक कैट कमांडो भी सुरक्षा घेरा नहीं बना पा रहे थे। मीडिया वाले इस कदर हावी थे कि मुख्यमंत्री जी साइकिल के पैडल का प्रयोग अंत तक नहीं कर सके। पैरों से ठेलते हुए और पोज़ देते हुए करीब पचास मीटर की साइकिल यात्रा पूरी हुई। स्कूली बच्चों ने भी साइकिल घसीटते हुए उनका साथ दिया। 

आगे सुरक्षा बूथ पर रुककर उन्होंने बाकायदा प्रेस को संबोधित किया। इस बीच सभी गाड़ियाँ उनके प्रस्थान के लिए वहीं पर लगा दी गयीं। लेकिन उन्होंने अपनी बात खत्म करने के बाद सभी बच्चों को अपने निवास के प्रांगण में साथ चलने का इशारा किया और साइकिल से ही चल दिये। बाकी सबको वहीं रुकने का आदेश दिया।

जब बच्चों के साथ मुख्यमंत्री जी गेट के भीतर चले गये तब अभिभावक गण गेट पर इकठ्ठा हो गये। तभी भीतर से आदेश हुआ की पेरेंट्स को भी अंदर बुला लिया जाय। इस प्रकार मुख्यमंत्री आवास के विशाल और भव्य प्रांगण में जाने का सुअवसर हमें भी मिला। खूब घने और छायादार वृक्ष परिसर की शोभा बढ़ा रहे थे। फूलों की क्यारियाँ अलग छटा बिखेर रही थीं। वहाँ सबकुछ सलीके से हुआ। बच्चों और अभिभावकों के साथ विधिवत् फोटो सेशन भी हुआ और सबको मिठाई के साथ ठंडा पानी भी पिलाया गया।

बेहद प्रसन्न बेटी के साथ जब हम बाहर आये तो प्रायः सभी साइकिलें अलग-अलग चार-पहिया वाहनों पर लादी जा रही थीं जिनकी व्यवस्था अभिभावकों ने की थी। हमने भी वागीशा को साइकिल सहित गाड़ी में बिठाकर उसके स्कूल छोड़ने को भेज दिया और अपनी साइकिल पर सवार होकर मुंशी पुलिया इंदिरानगर चला आया।
नौ बज चुके थे और तैयार होकर राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (NPS) पर आयोजित परिचर्चा में भाग लेने वित्तीय प्रबंध प्रशिक्षण और शोध संस्थान (IFMTR) के सभागार में पहुँचना था। सरकारी नौकरी में समझौता भी बहुत करना पड़ता है। इसी वजह से यह वृतांत लिखने में इतना विलम्ब तो होना ही था।
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी) www.satyarthmitra.com