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शुक्रवार, 25 अगस्त 2017
रामरहीम और अशुभ की समस्या
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मंगलवार, 22 सितंबर 2015
आने वाले धन को रोकती हैं आपकी ये ‘बुरी आदतें’
टाइम्स ऑफ़ इंडिया में आध्यात्मिक और धार्मिक संदर्भों पर रोचक आलेख प्रकाशित करने वाला नियमित स्तंभ स्पीकिंग ट्री अब ऑनलाइन उपलब्ध है और इसका हिंदी संस्करण भी आ गया है, जिसमें अनेक बार ज्योतिष और शास्त्र के नाम पर अंधविश्वास और टोना-टोटका वाली सामग्री भी दिख जाती है। ऐसे में इनपर आँख मूँदकर विश्वास नहीं किया जा सकता। लेकिन आज एक सामग्री ऐसी मिली जिसके मूल संदेश पर अमल किया जाना चाहिए। भले ही बताये गये परिणाम पर भरोसा न हो। वैसे ही जैसे कि शराब के नशे में धुत्त कोई व्यक्ति यह सीख दे कि शराब पीना अच्छी बात नहीं है, इसके जीवन बर्बाद होता है, परिवार नष्ट हो जाता है, तमाम बीमारियाँ शरीर में घर बना लेती हैं, आदि-आदि; तो उसे यह झिड़की दे्ने के बजाय कि पहले अपना उपदेश खुद पर लागू करो, उसकी बात को प्रत्यक्ष उदाहरण के आधार पर सही माना जा सकता है। आइए जानते हैं कुछ जीवनोपयोगी बाते-
यदि आप शास्त्रों में विश्वास रखते हैं तो वाकई शास्त्रों में वर्णित निर्देशों का पालन करते होंगे। लेकिन क्या आप जानते हैं कि यदि आप हर समय, हर दिन शास्त्रीय नियमों का पालन करेंगे, तो लाइफ इतनी आसान हो जाएगी कि आप समझ भी नहीं पाएंगे। लेकिन यदि आपको विश्वास नहीं भी है, तब भी आप एक बार शास्त्रीय नियमों का पालन करके देखें, अच्छे परिणाम आप खुद महसूस करने लगेंगे।
शास्त्रों के अनुसार, शास्त्रीय नियमों का पालन करने वाले लोग भी अनजान होकर दिनभर ऐसी कई गलतियां करते हैं, जो उन्हें नहीं करनी चाहिए। ऐसी आदतें मनुष्य को अशुभ फल देती हैं, और उसके आने वाले समय पर हावी भी होती हैं। शास्त्रों के अनुसार हमें सुबह उठने के बाद रात सोने तक ऐसी किसी भी बुरी आदत को अपनाना नहीं चाहिए, जो हमारे लिए अशुभ फल लाए।
जैसे कि कुछ लोगों की आदत होती है कि सुबह नहाने के बाद बाथरूम को गंदा छोड़ने की। ऐसे लोग फर्श पर गिरे पानी को साफ करना तो दूर, अपने गंदे कपड़े भी बाथरूम में छोड़कर बाहर चले आते हैं। शास्त्रों के अनुसार ऐसा करने से जातक की कुंडली में चंद्र का स्थान बुरा होता चला जाता है। इसलिए इससे बचने के लिए हमेशा अपने बाथरूम की सफाई करें।
बाथरूम वाली बुरी आदत के साथ लोगों की एक और आदत भी बहुत बुरी है, खाने के बाद जूठी प्लेट वहीं छोड़ जाने की। कुछ लोग तो खाना प्लेट में ही छोड़ भी देते हैं। लेकिन शास्त्रों की मानें तो प्लेट में रखा एक-एक अन्न ग्रहण करना चाहिए और साथ ही स्वयं प्लेट लेकर उसे साफ करना चाहिए। ऐसी मान्यता है कि खाना खाने के बाद जूठे बर्तनों को सही स्थान पर रखा जाए तो शनि और चंद्र के दोष दूर होते हैं। साथ ही, लक्ष्मी की प्रसन्नता भी मिलती है। तो आज से आप ध्यान रखेंगे ना इस बात का?
इसके अलावा घर की साफ-सफाई का भी ध्यान रखना जरूरी है। शास्त्रों के मुताबिक कहीं भी चप्पलें उतार देना और बिस्तर की चद्दर को अव्यवस्थित रखना एक बुरी आदत है। इसके कारण व्यक्ति की सेहत खराब रहती है। इसलिए हमेशा बिस्तर को साफ रखें, उसकी चद्दर समय-समय पर झाड़ लें। खासतौर पर रात को सोने से पहले जरूर साफ करें।
शास्त्रों के अनुसार देर रात तक जागना भी नियमों के विरुद्ध है। इससे चंद्र का अशुभ फल मिलता है, जो व्यक्ति की मानसिक स्थिति पर भी गलत प्रभाव करता है। इसलिए हमेशा समय से सो जाएं और सुबह समय से उठ भी जाना चाहिए।
एक और नियम, जो ना केवल शास्त्रीय संदर्भ से मानना चाहिए, बल्कि अपने आसपास सुखद वातावरण बनाने के लिए भी इस नियम का पालन करना महत्वपूर्ण है। हमें कभी ऊंची आवाज़ में बात नहीं करनी चाहिए। इससे हमारे आसपास के लोग तो परेशान होते ही हैं, साथ ही हमारी सेहत पर भी इसका असर होता है।
ऊंचा बोलने के अलावा कुछ लोगों की बेवजह इधर-उधर थूकने की भी आदत होती है। यदि आप ऐसा करते हैं तो लक्ष्मी जी कभी आप पर कृपा नहीं करेंगी। इसीलिए इधर-उधर थूकने से बचना चाहिए, इस काम के लिए निर्धारित स्थान का ही उपयोग करना चाहिए।
[उक्त छोटी-छोटी बातों का पालन करना एक सभ्य और संस्कारित व्यक्ति की पहचान होते हैं। इसलिए शास्त्र के नाम पर बिदकने वाले भी इसका पालन कर सकते हैं।]
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
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गुरुवार, 17 सितंबर 2015
धार्मिक अनुष्ठान से स्वास्थ्य रक्षा
कल सुहागिन स्त्रियों ने कजरी तीज का व्रत रखा। कुछ ने तो फलाहार लिया होगा, मेंहदी रचायी होगी, खूब खुशियाँ मनायी होंगी लेकिन बहुतों ने निराहार, निर्जला व्रत किया होगा। अपने प्राण संकट में डाले होंगे, शारीरिक कष्ट में रात गुजारी होगी अपने पति के सुदीर्घ जीवन की कामना से। इस व्रत में कर्मकांडी पंडितों द्वारा जिस भय तत्व का समावेश किया गया है उसपर मैंने एक पोस्ट लिखी थी। आज छः साल बाद फिर से मन उद्विग्न है। इसबार तीज व्रत से नहीं बल्कि मेरे गाँव पर एक और वृहद अनुष्ठान हो रहा है उसको लेकर।
मेरी माता जी की आयु करीब 68 वर्ष हो चुकी है जो पिछले तीन चार महीने से बीमार चल रही हैं। मधुमेह और गठिया से ग्रस्त होने के कारण उन्हें लगातार दवाइयाँ लेनी पड़ती हैं और खान-पान में भी परहेज रखना होता है। नियमित दवाएँ लेने और यथासंभव परहेज के बावजूद पिछले दिनों उन्हें कुछ ऐसी तकलीफ़ हुई जो डॉक्टर समझ नहीं पा रहे थे। उन्हें भूख लगनी बन्द हो गयी और यदि कुछ खाने की कोशिश करती तो तत्काल उल्टी हो जाती। नियमित घरेलू डॉक्टर की दवा से कोई असर नहीं हुआ तो दूसरे विशेषज्ञों को भी दिखाया गया। सभी प्रकार की जाँच करायी गयी। सबकुछ ठीक-ठाक मिला। अल्ट्रा-साउंड, सीटी-स्कैन, ब्लड इत्यादि की जाँच में कोई ऐसी बात नहीं मिली जिसके आधार पर कोई चिकित्सा करायी जा सके। नियमित डॉक्टर ने बुखार चेक किया और एक-दो दवायें देकर भगवान का नाम लेने को कहा। लेकिन भोजन से अरुचि और उल्टी की स्थिति कमोबेश बनी रही। माताजी का वजन तेजी से गिरा है और बेहद कमजोर हो गयी हैं।
मेरे पिताजी जो सत्तर की उम्र पार कर चुके हैं अपेक्षाकृत स्वस्थ, निरोग और सक्रिय दिनचर्या वाले हैं। गाँव के लोग घरेलू उपयोग के लिए शाक-भाजी उगाने में किये गये उनके परिश्रम और सक्रियता के कायल हैं। वे अपने स्वास्थ्य के प्रति बहुत सचेत रहते हैं लेकिन माताजी की हालत से बेहद चिन्तित होकर उन्होंने एक ज्योतिषी से मुलाकात की। मिलकर आने के बाद उन्होंने मुझसे फोनपर बताया कि शास्त्री जी ने क्या कहा -
“आप दोनो लोगों के ऊपर बुरे ग्रहों का दुष्प्रभाव हो गया है। शनिदेव बेहद वक्र दृष्टि से देख रहे हैं। आपने यदि समय रहते इसका उपचार नहीं किया तो कुछ भी बुरा से बुरा हो सकता है। अमंगल अवश्यंभावी है।” पिता जी की वाणी में भयतत्व साफ सुनायी दे रहा था।
मैंने धैर्यपूर्वक पूछा, “शास्त्री जी ने उपचार क्या बताया?”
“कह रहे थे कि आप दोनो लोग तुलादान कराइये, छायादान कराइये, गऊदान कराइये, कुश के रस से रुद्राभिषेक कराइये, सात दिनों तक सात ब्राह्मणों से सवालाख महामृत्युञ्य मंत्रों का जप कराकर हवन कराइए…। गऊदान भी केवल प्रकल्पित (notional) नहीं बल्कि वास्तविक रूप से हाल ही की ब्यायी हुई गाय जिसके नीचे बछिया हो खरीदकर लाइये, उसके खुर और सींग पर सोना मढ़वाइये तब उसका संकल्प करके दान दीजिए…”
इतना सुनने के बाद मेरा धैर्य जवाब दे गया। उस शास्त्री पर क्रोध आया तो स्वर ऊँचा हो गया। पिताजी से मैंने रोष में आकर अपनी असहमति व्यक्त की। यह उन्हें अच्छा नहीं लगा। अपनी उम्र और आस्था की दुहाई देने लगे। यह मुझे भावनात्मक दबाव डालने जैसा लगा जिसे मैंने ‘इमोशनल ब्लैकमेलिंग’ की संज्ञा दे दी। यह शब्द सुनने के बाद उन्होंने आगे बात करना जरूरी नहीं समझा और फोन काट दिया। अचानक फोन कट जाना मुझे खटकता रहा, लेकिन कुछ दूसरी व्यस्तताओं में इतना उलझा रहा कि उस दिन दुबारा बात नहीं हो पायी।
अगले दिन गाँव से फोन आया कि पिताजी की तबीयत रात में बहुत ज्यादा बिगड़ गयी थी। रक्तचाप बेहद नीचे गिर गया था, आवाज बन्द हो गयी थी, अंग शिथिल पड़ गये थे और वे बेहद कमजोर होकर बिस्तर पर निढाल पड़ गये थे। उसके बाद घर वालों ने नीबू-नमक का घोल पिलाया तो हालत में सुधार हुआ। सबेरे अस्पताल गये तबतक सामान्य हो चुके थे। पता चलने पर मैंने डॉक्टर साहब से बात की तो बोले- कुछ खास नहीं था। थोड़ी देर के लिए बीपी नीचे चला गया होगा। मैंने तो पूरी जाँच की, सबकुछ नॉर्मल था।
घर फोन करने पर पता चला कि पिछले दिन मुझसे बात करने के बाद पिताजी बेहद आहत महसूस कर रहे थे और प्रायः अवसाद (depression) में चले गये थे। उन्होंने उसके बाद परिवार के दूसरे सदस्यों से भी कोई बात नहीं की और रात होने के बात हालत बिगड़ती चली गयी। ऐसे में उन्होंने घरवालों को मुझे सूचित करने से भी मना कर दिया। यह सब सुनने के बाद मुझे काटो तो खून नहीं। विज्ञान पर मेरा विश्वास कर्मकांडों पर अंधविश्वास के आगे अपराधी बन गया।
घर के दूसरे सदस्यों ने तो जुबान दबाये रखी लेकिन श्रीमती जी ने मुझे खुलकर कोसना शुरू किया। घर के बुजुर्ग से ऐसे ही बात करते हैं? …अभी कुछ हो-हवा जाय तो जिंदगी भर पछताना पड़ेगा। …अब वे जैसा चाह रहे हैं वैसा ही करिए। …अपना ज्ञान अपने पास रखिए। …पूजा-पाठ कोई बुरी चीज नहीं है। …भगवान के आगे किसी की नहीं चलती। जैसे इतना हो रहा है वैसे यह भी सही…।
“अरे भाई, मैं भी कोई नास्तिक व्यक्ति थोड़े न हूँ। रोज स्नान के बाद पूजा भी करता हूँ। ऊपर वाले से डरता भी हूँ…। कोशिश करता हूँ कोई पाप न हो। किसी को कष्ट न पहुँचाऊँ, यथा संभव जरूरतमंदों की मदद करूँ… करता भी हूँ; लेकिन ये लालची… कर्मकांडी पंडित मुझे एक नंबर के धूर्त लगते हैं। उनके चक्कर में पड़कर लाखो खर्च करना राख में घी डालने जैसा है। मैं इन शास्त्री जी को तो एक धेला नहीं देने वाला…” कहते-कहते मैं ताव में आ गया।
श्रीमती जी हँस पड़ीं- अच्छा ठीक है। किसी दूसरे पंडित से दिखवा लेते हैं। “जो मन में आये, तुम लोग कर लो” यह कहते हुए मैंने बात खत्म की।
अब परिणामी स्थिति यह है कि पिताश्री ने किसी ‘संतोष पंडित’ के पौरोहित्य में तुलादान, छायादान, प्रकल्पित गऊदान आदि का कार्यक्रम संपन्न करा लिया है। ह्वाट्सएप्प पर आयी तस्वीरें बता रही हैं कि दोनो बुजुर्ग प्रसन्नचित्त और प्रायः स्वस्थ हैं। माता जी की उल्टियाँ कम हो गयीं हैं। दवा से फायदा होना शुरू हो गया है। पिता जी ने खुद ही बाजार जाकर अनुष्ठान, दान और ब्राह्मणों की सेवा के लिए विस्तृत खरीदारी की है। सात ब्राह्मणों ने घरपर डेरा जमा लिया है जो सात दिनों तक चलने वाले अनुष्ठान में महामृत्युंजय जपयज्ञ को कार्यरूप दे रहे हैं। सातो दिन रुद्राभिषेक किया जाना है। इसकी पूर्णाहुति रविवार को होगी जिसमें सपरिवार उपस्थित होने का आदेश प्राप्त हो गया है। ब्राह्मणों के अलावा उस दिन पूरे गाँव के लोगों को भोज दिया जाएगा।
बच्चे अपनी स्कूली परीक्षा के दृष्टिगत गाँव जाने को कत्तई तैयार नहीं हैं। उनके बिना उनकी मम्मी भी नहीं जा सकती। लेकिन मैं ठहरा सरकारी लोकसेवक। आकस्मिक अवकाश की सुविधा मिली हुई है। इसलिए मैंने विधिवत् छुट्टी लेकर रेलगाड़ी में रिजर्वेशन करा लिया है जो अभी वेटिंग बता रहा है। एक पक्का जुगाड़ लग गया है तो बर्थ कन्फ़र्म हो ही जाए्गी। विश्वास है कि यज्ञ का प्रसाद लेने समय से पहुँच ही जाऊंगा। जय हो।
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
सोमवार, 27 फ़रवरी 2012
शिवचर्चा के बहाने एक सामाजिक ध्रुवीकरण…
इस बार महाशिवरात्रि की छुट्टी सोमवार के दिन हुई थी इसके पीछे रविवार और शनिवार की साप्ताहिक छुट्टी मिलाकर लगातार तीन दिन कार्यालय से अवकाश मिला। मैंने इसका सदुपयोग अपने गाँव घूमकर आने में किया। प्रायः पूरा गाँव सोमवार के दिन भोर में ही उठकर बगल के शिवमंदिर में ‘जल चढ़ाने’ के लिए चल पड़ा था। पूरे साल प्रायः निर्जन और धूल धूसरित रहने वाला पुराना शिवमंदिर इस अवसर पर देहात की भीड़ से आप्लावित हो जाता है। लाउडस्पीकर लगाकर भजन-कीर्तन होता है और ठेले-खोमचे वाले भी आ जुटते हैं। शंकर जी की अराधना के बहाने गाँव क्षेत्र के लोग एक दूसरे से मिलने और हाल-चाल जानने का काम भी निपटा लेते हैं। भक्तिमय माहौल के बीच छोटे-बड़े ऊँच-नीच का भेद भी मिटा हुआ दिखायी देता है। ऐसे लोग जिनकी दैनिक दिनचर्या में पूजा-पाठ का कोई विशेष स्थान नहीं है वे भी इस वार्षिक आयोजन में धर्म-कर्म का कोटा पूरा कर लेते हैं। शंकर जी ऐसे देवता हैं जो झटपट प्रसन्न हो जाते हैं। इन्हें (शिवलिंग को) एक लोटा जल से स्नान करा देना ही पर्याप्त है। चाहें तो इसके साथ सर्वसुलभ झाड़-झंखाड़ से लाकर भांग-धतूरा-बेलपत्र इत्यादि चढ़ा दें तो कहना ही क्या…! आशुतोष अवघड़दानी प्रसन्न होकर मनचाही इच्छा पूरी कर देंगे - इसी विश्वास के साथ सबलोग मंदिर से घर लौटते हैं।
कुँवारी लड़कियाँ इस जलाभिषेक से अपने लिए मनचाहा वर भी पा जाती हैं। इस विश्वास का नमूना गाँव में ही नहीं, इलाहाबाद विश्वविद्यालय के महिला छात्रावास से निकलकर भारद्वाज आश्रम की ओर जाती तमाम पढ़ाकू लड़कियों की कतार में भी देखा है मैंने।
अपने गाँव-जवार के शिवभक्तों को तो मैंने बचपन से देखा है। ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य-शूद्र, चारों वर्णों को एक साथ एक ही मंदिर में जल चढ़ाते हुए। यह बात दीगर है कि इनकी तुलनात्मक संख्या बराबर नहीं होती बल्कि प्रायः इसी क्रम में क्रमशः घटती हुई होती। शिवरात्रि के मौके पर जुटने वाली भीड़ में सवर्ण, दलित और पिछड़े का विभाजन कभी मेरे दिमाग में आया ही नहीं था। इसबार भी गाँव में लगभग वैसा ही वातावरण देखने को मिला। लेकिन जब मैंने वापसी यात्रा हेतु गाँव से प्रस्थान किया तो रास्ते में एक ऐसा नजारा देखने को मिला कि मैं दंग रह गया।
कुशीनगर जिले में कप्तानगंज एक छोटा सा कस्बा है। इससे करीब बारह किलोमीटर पश्चिम परतावल भी एक छोटी सी बाजार है। इन दोनो को जोड़ने वाली टूटी-फूटी सड़क के दोनो ओर पसरा है शुद्ध देहात : उर्वर जमीन में लहलहाती फसलें, चकरोड और कच्ची-पक्की देहाती सड़कों से जुड़े घनी आबादी के गाँव और आधी-अधूरी सरकारी विकास योजनाओं की हकीकत बयान करती लोगों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति। इन दिनों इस इलाके में गेहूँ और सरसो की फसल लगी हुई है। दूर-दूर तक खेत गहरे हरे रंग में या पीले रंग में पेंण्ट किये हुए दिखायी देते हैं। क्षेत्र में नहरों का जाल बिछा हुआ है। सिंचाई की सुविधा अच्छी होने से फसल का उत्पादन बहुत अच्छा हो रहा है। इधर कोई जमीन वर्ष में कभी खाली नहीं रहती। सालोसाल फसलें बोई और काटी जाती हैं।
मैं जब कप्तानगंज से परतावल की ओर बढ़ा तो इन्नरपुर के पास से गुजरने वाली बड़ी नहर के पास जमा भीड़ को देखकर ठिठक गया। हाल ही में गेंहूँ की सिंचाई बीत जाने के बाद नहर में पानी बन्द कर दिया गया था लेकिन थोड़ा बहुत पानी यत्र-तत्र अभी भी रुका हुआ था। इसी पानी में बड़ी संख्या में औरतों को नहाते देखकर मुझे आश्चर्य हुआ। नहर की दोनो पटरियों पर भारी भीड़ जमा थी। औरतें और मर्द, बूढ़े और बच्चे अपनी-अपनी गठरी खोलकर फैलाए हुए थे। कुछ लोग अभी नहाने की तैयारी में थे। जो लोग नहा चुके थे वे अपनी गठरी से निकालकर कुछ चना-चबेना खा रहे थे। आसपास कुछ अस्थायी दुकाने भी जमा हो गयीं थीं जिनपर चाट-पकौड़ी, जलेबी, खुरमा, गट्टा, पेठा इत्यादि पारम्परिक खाद्य सामग्री बिक रही थी। यह स्पष्ट हो रहा था कि ये स्थानीय लोग नहीं हैं बल्कि काफी दूर से आये हुए तीर्थयात्री हैं। पतली सी सड़क के किनारे खड़े हुए वाहन और उनपर लदे सामान भी यही संकेत दे रहे थे। मेरे ड्राइवर ने गाड़ी रोकी नहीं बल्कि भीड़ के बीच से निकल जाने का प्रयास करने लगा।
करीब दो सौ मीटर आगे बढ़ने पर भीड़ का रेला बहुत घना हो गया था और सड़क पर आने-जाने वाले वाहन जाम में फँस गये थे। सामने से एक मोटरसाइकिल पर लदकर आ रहे तीन युवकों ने इशारे से बताया कि आगे बहुत भीड़ है और हमारी गाड़ी उसपार कम से कम दो-तीन घंटे तक निकल नहीं पाएगी। हम फँस चुके थे। पीछे दूसरी गाड़ियाँ आ चुकी थीं। वापस भी नहीं हो सकते थे। सड़क पतली थी और किनारे तीर्थयात्रियों को लाने वाली जीपों, ट्रैक्टर ट्रॉलियों, मोटरसाइकिलों इत्यादि से अटे पड़े थे। बीच-बीच में खोमचे, रेहड़ी, ठेले लगाने वालों ने भी घुसपैठ कर रखी थी। एक लाउडस्पीकर पर कोई व्यक्ति तमाम तरह की उद्घोषणाएँ कर रहा था जो स्पष्ट नहीं हो रही थीं। टीं-टीं की आवाज ज्यादा मुखर थी।
मेरा ब्लॉगर मन अब सक्रिय हो गया। मैंने अपना कैमरा निकाल लिया लेकिन गाड़ी से बाहर निकलने की गुंजाइश नहीं थी। खिड़की का शीशा उतारकर जहाँतक पहुँच बन सकी वहाँतक फोटो खींचता रहा। संयोग से जाम की समस्या के निपटारे के लिए एक-दो सिपाही आ गये थे जिनकी बेंत का असर चमत्कारिक ढंग से हुआ। बीच सड़क में गुत्थमगुत्था लोग अचानक किनारे भागने लगे। ट्रकों और बसों की कतार धीरे-धीरे रेंगने लगी। सड़क के किनारे जमा गढ्ढों का पानी मानव स्पर्श पाकर गंदला हो गया था। एक सिंचाई का नाला लोगों की प्राकृतिक जरूरतों के लिए आवश्यक पानी की आपूर्ति करते-करते मटियामेट होने की कगार पर था।
मैंने खिड़की से सिर निकालकर एक व्यक्ति से पूछा- भाई, यह भीड़ कैसी है? उसने मुझे दोगुने आश्चर्य से देखा और थोड़ी देर तक मुझे लज्जित करने के बाद बोला – आगे शिवचर्चा हो रही है। मैं शिवचर्चा की कोई काल्पनिक छवि इस स्थान पर नहीं बना सका। मैं इस रास्ते से कई बार गुजर चुका था लेकिन किसी सुप्रसिद्ध या कम प्रसिद्ध शिवमंदिर के यहाँ होने की जानकारी मुझे नहीं थी। मेरी गाड़ी भीड़ के बीच से जगह बनाती हुई थोड़ा आगे बढ़ी तो एक तम्बू दिखायी दिया जो एक खेत में खड़ा किया गया था। चारो ओर गेहूँ और सरसो के लहलहाते खेत थे। बीच में कोई हाल ही में खाली हुआ गन्ने का खेत रहा होगा जहाँ कोई गुरूजी प्रवचन करने वाले थे। शायद यही शिवचर्चा थी।
लाउस्पीकर पर आवाज अब साफ आ रही थी। कोई बता रहा था कि एक बैग मेले में लावारिस पड़ा हुआ मिला है। इसमें नगदी और जेवर रखे हैं। जिस किसी का हो वह आकर जितना रुपया है सही-सही बताकर ले जाय। मैं सोचने लगा कि यदि मेरा पर्स इस प्रकार खो जाय तो क्या मैं उसमें रखे रूपयों की सही मात्रा बता पाऊँगा। शायद नहीं। अलबत्ता उसमें रखे पैन कार्ड और ड्राइविंग लाइसेन्स मेरी मदद कर देंगे।
इस भीड़ में जो चेहरे शिवचर्चा में शामिल होने आये थे उन्हें देखकर मुझे एक अजीब उलझन होने लगी। ये तमाम चेहरे एक खास सामाजिक-आर्थिक वर्ग से सम्बंधित लग रहे थे। अत्यन्त गरीब और सामाजिक रूप से पिछड़े हुए। हमारे समाज की अग्रिम पंक्ति में खड़ा कोई चेहरा इस भीड़ में दिखायी नहीं दिया। यह एक अलग तरह का सामाजिक ध्रुवीकरण आकार लेता दिखायी दे रहा था। धार्मिक आस्था के ऐसे प्रदर्शन को देखना एक विलक्षण अनुभव था मेरे लिए। आप भी देखिए - इन तस्वीरों में क्या वही नजर नहीं आता जो मुझे महसूस हुआ?
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
मंगलवार, 2 अगस्त 2011
‘निर्वासन’ में स्त्री विमर्श - प्रेमचंद
पिछली पोस्ट में मैने वादा किया था कि आपको प्रेमचंद की एक विलक्षण कहानी पढ़वाऊंगा। लीजिए, कहानी पढ़िए जिसका शीर्षक है – निर्वासन। यह पूरी कहानी संवाद शैली में लिखी गयी है। कहानीकार ने अपनी ओर से कुछ भी नहीं बताया है; लेकिन इस बात-चीत से तत्कालीन समाज में स्त्री की नाजुक स्थिति का जैसा चित्र उभर कर आया है वह मन को विदीर्ण कर देता है। हम उस परंपरा को ढो रहे हैं जिसमें अग्निपरीक्षा देने के बावजूद सीता को जंगल में निर्वासित जीवन बिताना पड़ा। आज भी स्थितियाँ बहुत नहीं सुधरी हैं। क्या आधुनिक स्त्री-विमर्श इस मानसिकता को बदल पाएगा?
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निर्वासन कहानी- प्रेमचंद परशुराम- वहीं-वहीं, दालान में ठहरो! मर्यादा- क्यों, क्या मुझमें कुछ छूत लग गयी? परशुराम- पहले यह बताओ तुम इतने दिनों कहाँ रहीं, किसके साथ रहीं, किस तरह रहीं और फिर यहाँ किसके साथ आयीं? तब, तब विचार... देखी जायगी। मर्यादा- क्या इन बातों के पूछने का यही वक्त है; फिर अवसर न मिलेगा? परशुराम- हाँ, यही बात है। तुम स्नान करके नदी से तो मेरे साथ ही निकली थीं। मेरे पीछे-पीछे कुछ देर तक आयीं भी; मैं पीछे फिर-फिरकर तुम्हें देखता जाता था, फिर एकाएक तुम कहाँ गायब हो गयीं? मर्यादा- तुमने देखा नहीं, नागा साधुओं का एक दल सामने से आ गया। सब आदमी इधर-उधर दौड़ने लगे। मैं भी धक्के में पड़कर जाने किधर चली गयी। जरा भीड़ कम हुई तो तुम्हें ढूँढ़ने लगी। बासू का नाम ले-लेकर पुकारने लगी, पर तुम न दिखायी दिये। परशुराम- अच्छा तब? मर्यादा- तब मैं एक किनारे बैठकर रोने लगी, कुछ सूझ ही न पड़ता कि कहाँ जाऊँ, किससे कहूँ, आदमियों से डर लगता था। संध्या तक वहीं बैठी रोती रही। परशुराम- इतना तूल क्यों देती हो? वहाँ से फिर कहाँ गयीं? मर्यादा- संध्या को एक युवक ने आकर मुझसे पूछा, तुम्हारे घर के लोग खो तो नहीं गये हैं? मैंने कहा- हाँ। तब उसने तुम्हारा नाम, पता ठिकाना पूछा। उसने सब एक किताब पर लिख लिया और मुझसे बोला- मेरे साथ आओ, मैं तुम्हें तुम्हारे घर भेज दूँगा। परशुराम- वह आदमी कौन था? मर्यादा- वहाँ की सेवा-समिति का स्वयंसेवक था। परशुराम- तो तुम उसके साथ हो लीं? मर्यादा- और क्या करती ? वह मुझे समिति के कार्यालय में ले गया। वहाँ एक शामियाने में एक लम्बी दाढ़ीवाला मनुष्य बैठा हुआ कुछ लिख रहा था। वही उन सेवकों का अध्यक्ष था। और भी कितने ही सेवक वहाँ खड़े थे। उसने मेरा पता-ठिकाना रजिस्टर में लिखकर मुझे एक अलग शामियाने में भेज दिया, जहाँ और भी कितनी खोयी हुई स्त्रियाँ बैठी हुई थीं। परशुराम- तुमने उसी वक्त अध्यक्ष से क्यों न कहा कि मुझे पहुँचा दीजिए? मर्यादा- मैंने एक बार नहीं सैकड़ों बार कहा; लेकिन वह यही कहते रहे, जब तक मेला न खत्म हो जाय और सब खोयी हुई स्त्रियाँ एकत्र न हो जायँ, मैं भेजने का प्रबन्ध नहीं कर सकता। मेरे पास न इतने आदमी हैं, न इतना धन। परशुराम- धन की तुम्हें क्या कमी थी, कोई एक सोने की चीज बेच देती तो काफी रुपये मिल जाते। मर्यादा- आदमी तो नहीं थे। परशुराम- तुमने यह कहा था कि खर्च की कुछ चिंता न कीजिए, मैं अपना गहना बेचकर अदा कर दूँगी? मर्यादा- नहीं, यह तो मैंने नहीं कहा। परशुराम- तुम्हें उस दशा में भी गहने इतने प्रिय थे? मर्यादा- सब स्त्रियाँ कहने लगीं, घबरायी क्यों जाती हो? यहाँ किस बात का डर है। हम सभी जल्द से जल्द अपने घर पहुँचना चाहती हैं; मगर क्या करें? तब मैं भी चुप हो रही। परशुराम- और सब स्त्रियाँ कुएँ में गिर पड़तीं तो तुम भी गिर पड़तीं? मर्यादा- जानती तो थी कि यह लोग धर्म के नाते मेरी रक्षा कर रहे हैं, कुछ मेरे नौकर या मजूर नहीं हैं, फिर आग्रह किस मुँह से करती? यह बात भी है कि बहुत-सी स्त्रियों को वहाँ देखकर मुझे कुछ तसल्ली हो गयी। परशुराम- हाँ, इससे बढ़कर तस्कीन की और क्या बात हो सकती थी? अच्छा, वहाँ कै दिन तस्कीन का आनन्द उठाती रहीं? मेला तो दूसरे ही दिन उठ गया होगा? मर्यादा- रात-भर मैं स्त्रियों के साथ उसी शामियाने में रही। परशुराम- अच्छा, तुमने मुझे तार क्यों न दिलवा दिया? मर्यादा- मैंने समझा, जब यह लोग पहुँचाने को कहते ही हैं तो तार क्यों दूँ? परशुराम- खैर, रात को तुम वहीं रहीं। युवक बार-बार भीतर आते-जाते रहे होंगे। मर्यादा- केवल एक बार एक सेवक भोजन के लिए पूछने आया था, जब हम सबों ने खाने से इनकार कर दिया तो वह चला गया और फिर कोई न आया। मैं रात-भर जागती ही रही। परशुराम- यह मैं कभी न मानूँगा कि इतने युवक वहाँ थे और कोई अंदर न गया होगा। समिति के युवक आकाश के देवता नहीं होते। खैर, वह दाढ़ीवाला अध्यक्ष तो जरूर ही देखभाल करने गया होगा? मर्यादा- हाँ, वह आते थे; पर द्वार पर से पूछ-पूछकर लौट जाते थे। हाँ, जब एक महिला के पेट में दर्द होने लगा था तो दो-तीन बार दवाएँ पिलाने आये थे। परशुराम- निकली न वही बात! मैं इन धूर्तों की नस-नस पहचानता हूँ। विशेषकर तिलक-मालाधारी दढ़ियलों को मैं गुरुघंटाल ही समझता हूँ। तो वह महाशय कई बार दवाएँ देने गये? क्यों, तुम्हारे पेट में तो दर्द नहीं होने लगा था? मर्यादा- तुम एक साधु पर आक्षेप कर रहे हो। वह बेचारे एक तो मेरे बाप के बराबर थे, दूसरे आँखें नीची किये रहने के सिवाय कभी किसी पर सीधी निगाह नहीं करते थे। परशुराम- हाँ, वहाँ सब देवता ही देवता जमा थे। खैर, तुम रात-भर वहाँ रहीं। दूसरे दिन क्या हुआ? मर्यादा- दूसरे दिन भी वहीं रही। एक स्वयंसेवक हम सब स्त्रियों को साथ लेकर मुख्य-मुख्य पवित्र स्थानों का दर्शन कराने गया। दोपहर को लौट कर सबों ने भोजन किया। परशुराम- तो वहाँ तुमने सैर-सपाटा भी खूब किया, कोई कष्ट न होने पाया। भोजन के बाद गाना-बजाना हुआ होगा? मर्यादा- गाना-बजाना तो नहीं; हाँ, सब अपना-अपना दुखड़ा रोती रहीं। शाम तक मेला उठ गया तो दो सेवक हम लोगों को लेकर स्टेशन पर आये। परशुराम- मगर तुम तो आज सातवें दिन आ रही हो और वह भी अकेली? मर्यादा- स्टेशन पर एक दुर्घटना हो गयी। परशुराम- हाँ, यह तो मैं समझ ही रहा था। क्या दुर्घटना हुई? मर्यादा- जब सेवक टिकट लेने जा रहा था, तो एक आदमी ने आकर उससे कहा- यहाँ गोपीनाथ की धर्मशाला में एक बाबूजी ठहरे हुए हैं, उनकी स्त्री खो गयी है, उनका भला-सा नाम है, गोरे-गोरे लम्बे-से खूबसूरत आदमी हैं, लखनऊ मकान है, झबाई टीले में। तुम्हारा हुलिया उसने ऐसा ठीक बयान किया कि मुझे उस पर विश्वास आ गया। मैं सामने आकर बोली, तुम बाबू जी को जानते हो? वह हँसकर बोला, जानता नहीं हूँ तो तुम्हें तलाश क्यों करता फिरता हूँ। तुम्हारा बच्चा रो-रोकर हलाकान हो रहा है। सब औरतें कहने लगीं, चली जाओ, तुम्हारे स्वामीजी घबरा रहे होंगे। स्वयंसेवक ने उससे दो-चार बातें पूछकर मुझे उसके साथ कर दिया। मुझे क्या मालूम था कि मैं किसी नर-पिशाच के हाथों में पड़ी जाती हूँ। दिल में खुशी थी कि अब बासू को देखूँगी, तुम्हारे दर्शन करूँगी। शायद इसी उत्सुकता ने मुझे असावधान कर दिया। परशुराम- तो तुम उस आदमी के साथ चल दीं? वह कौन था? मर्यादा- क्या बतलाऊँ कौन था? मैं तो समझती हूँ, कोई दलाल था? परशुराम- तुम्हें यह न सूझी कि उससे कहतीं, जाकर बाबूजी को भेज दो? मर्यादा- अदिन आते हैं तो बुध्दि भ्रष्ट हो जाती है। परशुराम- कोई आ रहा है। मर्यादा- मैं गुसलखाने में छिपी जाती हूँ। परशुराम- आओ भाभी, क्या अभी सोयी नहीं, दस तो बज गये होंगे। भाभी- वासुदेव को देखने को जी चाहता था भैया, क्या सो गया? परशुराम- हाँ, वह तो अभी रोते-रोते सो गया है। भाभी- कुछ मर्यादा का पता मिला? अब पता मिले तो भी तुम्हारे किस काम की। घर से निकली हुई स्त्रियाँ थान से छूटी हुई घोड़ी है जिसका कुछ भरोसा नहीं। परशुराम- कहाँ से कहाँ मैं उसे लेकर नहाने गया। भाभी- होनहार है भैया, होनहार! अच्छा तो मैं जाती हूँ। मर्यादा- (बाहर आकर) होनहार नहीं है, तुम्हारी चाल है। वासुदेव को प्यार करने के बहाने तुम इस घर पर अधिकार जमाना चाहती हो। परशुराम- बको मत! वह दलाल तुम्हें कहाँ ले गया? मर्यादा- स्वामी, यह न पूछिए, मुझे कहते लज्जा आती है। परशुराम- यहाँ आते तो और भी लज्जा आनी चाहिए थी। मर्यादा- मैं परमात्मा को साक्षी देती हूँ, कि मैंने उसे अपना अंग भी स्पर्श नहीं करने दिया। परशुराम- उसका हुलिया बयान कर सकती हो? मर्यादा- साँवला-सा छोटे डील का आदमी था। नीचा कुरता पहने हुए था। परशुराम- गले में ताबीजें भी थीं? मर्यादा- हाँ, थीं तो। परशुराम- वह धर्मशाले का मेहतर था। मैंने उससे तुम्हारे गुम हो जाने की चर्चा की थी। उस दुष्ट ने उसका वह स्वाँग रचा। मर्यादा- मुझे तो वह कोई ब्राह्मण मालूम होता था। परशुराम- नहीं मेहतर था। वह तुम्हें अपने घर ले गया? मर्यादा- हाँ, उसने मुझे ताँगे पर बैठाया और एक तंग गली में, एक छोटे-से मकान के अंदर ले जाकर बोला, तुम यहीं बैठो, तुम्हारे बाबूजी यहीं आयेंगे। अब मुझे विदित हुआ कि मुझे धोखा दिया गया। रोने लगी। वह आदमी थोड़ी देर के बाद चला गया और एक बुढ़िया आकर मुझे भाँति-भाँति के प्रलोभन देने लगी। सारी रात रोकर काटी। दूसरे दिन दोनों फिर मुझे समझाने लगे कि रो-रोकर जान दे दोगी, मगर यहाँ कोई तुम्हारी मदद को न आयेगा। तुम्हारा एक घर छूट गया। हम तुम्हें उससे कहीं अच्छा घर देंगे जहाँ तुम सोने के कौर खाओगी और सोने से लद जाओगी। जब मैंने देखा कि यहाँ से किसी तरह नहीं निकल सकती तो मैंने कौशल करने का निश्चय किया। परशुराम- खैर,सुन चुका। मैं तुम्हारा ही कहना मान लेता हूँ कि तुमने अपने सतीत्व की रक्षा की, पर मेरा हृदय तुमसे घृणा करता है, तुम मेरे लिए फिर वह नहीं हो सकती जो पहले थीं। इस घर में तुम्हारे लिए स्थान नहीं है। मर्यादा- स्वामीजी, यह अन्याय न कीजिए, मैं आपकी वही स्त्री हूँ जो पहले थी। सोचिए, मेरी क्या दशा होगी? परशुराम- मैं यह सब सोच चुका और निश्चय कर चुका। आज छ: दिन से यही सोच रहा हूँ। तुम जानती हो कि मुझे समाज का भय नहीं है। छूत-विचार को मैंने पहले ही तिलांजलि दे दी, देवी-देवताओं को पहले ही विदा कर चुका; पर जिस स्त्री पर दूसरी निगाहें पड़ चुकीं, जो एक सप्ताह तक न-जाने कहाँ और किस दशा में रही, उसे अंगीकार करना मेरे लिए असम्भव है। अगर यह अन्याय है तो ईश्वर की ओर से है, मेरा दोष नहीं। मर्यादा- मेरी विवशता पर आपको जरा भी दया नहीं आती? परशुराम- जहाँ घृणा है वहाँ दया कहाँ? मैं अब भी तुम्हारा भरण-पोषण करने को तैयार हूँ। जब तक जीऊँगा, तुम्हें अन्न-वस्त्र का कष्ट न होगा। पर तुम मेरी स्त्री नहीं हो सकतीं। मर्यादा- मैं अपने पुत्र का मुँह न देखूँ अगर किसी ने मुझे स्पर्श भी किया हो। परशुराम- तुम्हारा किसी अन्य पुरुष के साथ क्षण-भर भी एकांत में रहना तुम्हारे पतिव्रत को नष्ट करने के लिए बहुत है। यह विचित्र बंधन है, रहे तो जन्म-जन्मांतर तक रहे; टूटे तो क्षण-भर में टूट जाय। तुम्हीं बताओ, किसी मुसलमान ने जबरदस्ती मुझे अपना उच्छिष्ट भोजन खिला दिया होता तो तुम मुझे स्वीकार करतीं? मर्यादा- वह...वह...तो दूसरी बात है। परशुराम- नहीं, एक ही बात है। जहाँ भावों का संबंध है, वहाँ तर्क और न्याय से काम नहीं चलता। यहाँ तक कि अगर कोई कह दे कि तुम्हारे पानी को मेहतर ने छू लिया है तब भी उसे ग्रहण करने से तुम्हें घृणा आयेगी। अपने ही दिल से सोचो कि तुम्हारे साथ न्याय कर रहा हूँ या अन्याय? मर्यादा- मैं तुम्हारी छुई हुई चीजें न खाती, तुमसे पृथक् रहती, पर तुम्हें घर से तो न निकाल सकती थी। मुझे इसीलिए न दुत्कार रहे हो कि तुम घर के स्वामी हो और समझते हो कि मैं इसका पालन करता हूँ। परशुराम- यह बात नहीं है। मैं इतना नीच नहीं हूँ। मर्यादा- तो तुम्हारा यह अंतिम निश्चय है? परशुराम- हाँ, अंतिम। मर्यादा- जानते हो इसका परिणाम क्या होगा? परशुराम- जानता भी हूँ और नहीं भी जानता। मर्यादा- मुझे वासुदेव को ले जाने दोगे? परशुराम- वासुदेव मेरा पुत्र है। मर्यादा- उसे एक बार प्यार कर लेने दोगे? परशुराम- अपनी इच्छा से नहीं, तुम्हारी इच्छा हो तो दूर से देख सकती हो। मर्यादा तो जाने दो, न देखूँगी। समझ लूँगी कि विधवा भी हूँ और बाँझ भी। चलो मन! अब इस घर में तुम्हारा निबाह नहीं। चलो जहाँ भाग्य ले जाय!
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(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
शुक्रवार, 12 नवंबर 2010
पुराण चर्चा: लिंग पुराण (क्रोधी दुर्वासा और अंबरीष की कथा) भाग-१
भाग-१: लिंग पुराण का संक्षिप्त परिचय:
ग्यारह हजार श्लोकों व १६३ अध्यायों में विभक्त इस पुराण में भगवान शिव से संबंधित विभिन्न पौराणिक आख्यानों, उपाख्यानों व घटनाओं का वर्णन करते हुए शैव सिद्धांतों का प्रतिपादन अत्यंत सहज, सरल और तर्कसंगत रीति से किया गया है।
यद्यपि लिंग का एक अर्थ जननेंद्रिय भी होता है, लेकिन इस पुराण में इसका तात्पर्य ‘ॐकार’ से है। समस्त पुराणों में यह माना गया है कि सृष्टि की उत्पत्ति निर्गुण निराकार ‘परब्रह्म’ से हुई है। उसी निर्गुण परब्रह्म के स्वरूप को व्यक्त करने का प्रतीक है ‘लिंग’। लिंग पुराण में भगवान शिव के तीन रूपों को निम्नवत् परिभाषित किया गया है।
“एकेनैव हृतं विश्वं व्याप्त त्वेन शिवेन तु।
अलिंग चैव लिंगं च लिंगालिंगानि मूर्तयः॥”
अर्थात् भगवान इस सृष्टि से पूर्व ही अव्यक्त लिंग अर्थात् ब्रह्म स्वरूप में सदा विद्यमान रहते हैं। तत्पश्चात् वे ही व्यक्त लिंग के रूप में प्रकट होकर सृष्टि की रचना करते हैं। इस प्रकार वे अव्यक्त (निर्गुण) व व्यक्त (सगुण) दोनो स्वरूपों से सृष्टि में विद्यमान हैं।
लिंग पुराण के अनुसार जब ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना का विचार किया तो उन्होंने सर्वप्रथम अहम (अविद्या) को उत्पन्न किया। इस अहंकार से क्रमशः पाँच तन्मात्राएँ उत्पन्न हुईं- शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गंध। इन पाँच गुणविशेष ने पंचतत्वों को उत्पन्न किया- आकाश, वायु, अग्नि, जल तथा पृथ्वी। इस प्रकार तन्मात्राएँ सूक्ष्म तथा तत्व स्थूल कहे जाते हैं।
इस उत्पत्ति का क्रम निम्नवत् समझाया गया है: अहंकार से शब्द नामक तन्मात्रा, शब्द से आकाश रूपी तत्व, आकाश तत्व से स्पर्श तन्मात्रा, स्पर्श से वायु तत्व, वायु से रूप तन्मात्रा, रूप से अग्नि तत्व, अग्नि से रस तन्मात्रा, रस से जल तत्व, जल से गंध तन्मात्रा व गंध से पृथ्वी रूपी तत्व का प्रादुर्भाव हुआ। तत्वों और तन्मात्राओं के इसी उत्पत्ति क्रम से सृष्टि का प्राकट्य होता है।
इस पुराण में धर्म की व्याख्या करते हुए कहा गया है कि इस चराचर जगत की रचना भगवान द्वारा ही की गयी है। इसलिए मनुष्य को ऊँच-नीच, जाति-पाँति, तथा वर्ण संकीर्णता को त्यागकर अपने हृदय में समस्त प्राणियों के प्रति आत्मीयता तथा दया का भाव रखना चाहिए। वस्तुतः यही मनुष्य का धर्म है।
इस पुराण में सदाचार का वर्णन करते हुए साररूप में कहा गया है कि संयमी, धार्मिक, दयावान, तपस्वी, सत्यवादी तथा सभी प्राणियों के लिए हृदय में प्रेम का भाव रखने वाले मनुष्य ही भगवान शिव को प्रिय हैं। जो मनुष्य अपने जीवन में इन गुणों को उतार लेता है उसे ईश्वर सुख, शांति और समृद्धि प्रदान करते हैं।
इस पुरान में अंधकासुर नामक दैत्य की उत्पत्ति व भगवान शिव द्वारा उसके पराभव की कथा, विष्णु भगवान द्वारा वाराहावतार धारणकर पृथ्वी के उद्धार की कथा तथा दैत्य जलंधर के उद्धार की कथा वर्णित है। इन सभी कथाओं द्वारा यह समझाने का प्रयास किया गया है कि एक सदाचारी मनुष्य के सद्कर्म उसकी उन्नति के तथा तथा दुराचारी व्यक्ति के दुष्कर्म उसके पराभव का कारण बनते हैं। ईश्वर इस न्यायपूर्ण व्यवस्था का नियामक है।
लिंग पुराण में दक्ष प्रजापति की कथा, पार्वती जन्म, कामदेव दहन, शिव-पार्वती विवाह, गणेश जन्म, शिव तांडव, तथा उपमन्यु चरित्र का वर्णन बहुत रोचक शैली में किया गया गया है। ये सभी प्रसंग किसी न किसी सकारात्मक उद्देश्य की ओर भी ले जाते हैं। जम्बू-प्लक्ष आदि सात द्वीपों सहित भारतवर्ष का वर्णन, क्षुप-दधीचि की कथा, ध्रुव की कथा व काशी माहात्म्य इत्यादि देखकर लगता है जैसे यह पुस्तक अपने जमाने की ट्रेवेल गाइड के रूप में भी लिखी गयी होगी।
लिंग पुराण के अंतिम भाग में राजा अंबरीष व महाक्रोधी दुर्वासा ऋषि की रोचक कथा का वर्णन है जिसके माध्यम से सदाचार एकादशी व्रत के माहात्म्य का निरूपण किया गया है।
भाग-२: क्रोधी दुर्वासा और अंबरीष की कथा:
प्राचीन समय की बात है। राजा नाभाग के अंबरीष नामक एक प्रतापी पुत्र थे। वे बड़े बीर, बुद्धिमान व तपस्वी राजा थे। वे जानते थे कि जिस धन-वैभव के लोभ में पड़कर प्राणी घोर नरक में जाते हैं वह कुछ ही दिनों का सुख है, इसलिए उनका मन सदैव भगवत भक्ति व दीनों की सेवा में लगा रहता था। राज्याभिषेक के बाद राजा अंबरीष ने अनेक यज्ञ करके भगवान विष्णु की पूजा-उपासना की जिन्होंने प्रसन्न होकर उनकी रक्षा के लिए अपन्ने ‘सुदर्शन चक्र’ को नियुक्त कर दिया।
एक बार अंबरीष ने अपनी पत्नी के साथ द्वादशी प्रधान एकादशी व्रत करने का निश्चय किया। उन्होंने भगवान विष्णु का पूजन किया और ब्राह्मणों को अन्न-धन का भरपूर दान दिया। तभी वहाँ दुर्वासा ऋषि का आगमन हो गया। वे परम तपस्वी व अलौकिक शक्तियों से युक्त थे किंतु क्रोधी स्वभाव के कारण उनकी सेवा-सुश्रुशा में विशेष सावधानी अपेक्षित थी…(जारी)
गुरुवार, 27 मई 2010
साँईं बाबा का प्रसाद और ज्ञानजी की सेहत…
आज वृहस्पतिवार है। शिर्डी वाले साँई बाबा के भक्तों का खास दिन। इस दिन व्रत-उपवास रखकर श्रद्धालु जन साँईं मन्दिरों में दर्शन के लिए उमड़ पड़ते हैं। इलाहाबाद का मुख्य मन्दिर भी इस दिन विशेष आकर्षण का केन्द्र हो जाता है। श्रद्धा और सबूरी के बीज मन्त्रों से प्रेरित भक्तजन बड़ी भीड़ के बावजूद पूरी तरह अनुशासित रहकर लम्बी लाइन में अपनी बारी की प्रतीक्षा करते हुए साँईं मन्त्रों का जप करते हैं और आगे बढ़ते हैं। शाम के वक्त तो इतनी भीड़ हो जाती है कि व्यवस्थापकों को रस्सियाँ तानकर लाइन बनानी पड़ती है जो मन्दिर के भीतर कई चक्रों में घूमने के बाद भी बाहर सड़क तक आ जाती है।
जब श्रीमती जी के आग्रह पर पहली बार मैं इस मन्दिर में दर्शन करने गया था तो साँईं बाबा के प्रति श्रद्धा से अधिक एक अच्छे पति होने की सदिच्छा के वशीभूत होकर गया था। यहाँ आकर जब मैंने भक्तों की अपार भीड़ देखी और यह अनुमान किया कि भीतर साँईं बाबा की मूर्ति तक पहुँचने में कम से कम दो घण्टे लगेंगे तो मेरे पसीने छूट गये। भीड़ में तिल रखने की जगह नहीं थी इसलिए करीब ढाई साल के बेटे को भी गोद में लेना अपरिहार्य हो गया था। इस दुस्सह परिस्थिति में भी हम लोगों ने धैर्यपूर्वक दर्शन किये थे। वहाँ साँई बाबा के भजनों और उनकी जय-जयकार के बीच इतना अच्छा भक्तिमय माहौल बना हुआ था कि मन में किसी कठिनाई के भाव ने कब्जा नहीं किया।
उस प्रथम दर्शन के समय एक ऐसी बात हो गयी थी जो साँईं बाबा के चमत्कारी प्रभाव की पुष्टि करती सी लगी। मेरे लाख सिर हिलाने के बावजूद श्रीमती जी तो इसे चमत्कार ही मानती हैं। हुआ ये कि जब मैं लाइन में लगा था उसी समय मेरा मोबाइल बज उठा। बड़ी मुश्किल से जब मैंने इसे जेब से निकालकर ‘काल रिसीव’ किया तो मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। यह एक ऐसे व्यक्ति का फोन था जिसे मैं करीब दो साल से ढूँढ रहा था। वह मेरे तीस हजार रुपये लौटाने में लगातार टाल-मटोल करते हुए अबतक मुझे टहलाता रहा था। उसदिन उसने अचानक फोन पर बताया कि रूपयों की व्यवस्था हो गयी है। किसी को भेंज दीजिए, आकर ले जाय। बस क्या था, मेरी पत्नी ने इसे साँईं बाबा का अनुपम प्रसाद मानते हुए उनमें अपना अडिग विश्वास प्रकट किया और आगे ऐसी कुछ अन्य उपलब्धियों को भी साँई बाबा की कृपा मानने सिलसिला शुरू हो गया। ऐसे प्रत्येक अवसर पर हमने साँईं के दर्शन किए। लेकिन मैने समय की अनुपलब्धता के कारण हमेशा वृहस्पतिवार को दर्शन से परहेज किया। मुझे लगता है कि पूजा-अर्चना में शान्तचित्त होकर बैठना और ध्यान करना अधिक महत्वपूर्ण है, न कि भीड़ में गुत्थमगुत्था होकर प्रसाद चढ़ाना।
आज रचना ने वृहस्पति को ही वहाँ जाने की खास वजह बतायी। उन्होंने लगातार नौ गुरुवार साँईं का व्रत रखा था जिसका आज समापन (उद्यापन) करना था। इसके अन्तर्गत गरीबों और लाचारों को भोजन कराना होता है। हलवा और पूड़ी का मीठा भोजन थैलियों में पैक करके हम मन्दिर गये। लेकिन शाम को नहीं, सुबह साढ़े दस बज गये। इस समय भीड़ बहुत कम थी। मन्दिर और इसके आस-पास का वातावरण दर्शन, पूजन, और दान-पुण्य करने के लिए आवश्यक सभी अवयवों से युक्त है। मन्दिर प्रांगण में ही पूजन और प्रसाद की सामग्री के लिए साँई प्रसादालय है तो वहीं साँईं इम्पोरियम में बाबा से जुड़ी अनेक पुस्तकें, मूर्तियाँ, तस्वीरें, चुनरी, चादरें, ऑडियो कैसेट्स, सीडी, और अन्य प्रयोग की वस्तुएं उपलब्ध हैं। जूते-चप्पल रखने के लिए एक ओर बने स्टैण्ड में दो तीन कर्मचारी मुस्तैद हैं जो अलग-अलग खानों में इसे सुरक्षित रखकर टोकन दे देते हैं। हाथ धुलने के लिए और पीने के लिए स्वच्छ और शीतल पेयजल की व्यवस्था है।
मन्दिर के बाहर वाहन स्टैण्ड भी है और बड़ी संख्या में भिखारी भी। उनमें से अनेक विकलांग, अपंग और लाचार हैं तो कई बिल्कुल ठीकठाक सुविधाभोगी और अकर्मण्य भी। साधुवेश धारी कुछ व्यक्ति कमण्डल लटकाये या रामनामी बिछाए हुए भी मिले जो कदाचित् गुरुवार को ही यहाँ दान बटोरने आते हैं। अनेक महिलाएं अपने झुण्ड के झुण्ड बच्चों के साथ भीख इकट्ठा करने के लिए जमा थीं। सड़क पर भी फूल-माला और प्रसाद की अनेक दुकानें सजी हुई थीं। हर स्तर के भक्तों के लिए अलग-अलग सामग्री यहाँ मौजूद है।
जब हम गाड़ी से उतरकर भोजन की थैलियाँ बाँटने शारीरिक रूप से अक्षम कुछ गरीबों के पास गये तो वहाँ एक व्यक्ति रसीद-बुक लिए खड़ा था। उसने उसे आगे बढ़ाते हुए कहा कि साहब यह रसीद कटा लीजिए। इसका पैसा विकलांगों की सेवा में खर्च होता है। मैंने पूछा- इसकी क्या गारण्टी? वह बोला- साहब आप विश्वास कीजिए। उसकी वेश-भूषा और शैली देखकर मुझे कत्तई विश्वास नहीं हुआ। हमने साक्षात् दरिद्रनारायण की यथासामर्थ्य सेवा की और वहाँ से दर्शन-पूजन करने के बाद प्रसाद लेकर आदरणीय ज्ञानदत्त जी का कुशल क्षेम जानने रेल-अस्पताल की ओर चल पड़े। (मन्दिर के भीतर फोटो खींचने की मनाही है इसलिए हमारा कैमरा ज्यादा कुछ नहीं कर सका।)
| रेलवे अस्पताल के वी.आई.पी. केबिन में आसन जमाए ज्ञानजी किसी भी तरह से मरीज जैसे नहीं लगे। विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों और परिवारीजन के साथ बातचीत में मशगूल थे। वागीशा और सत्यार्थ (मेरे बेटी-बेटे) ने उनका पैर छुआ तो प्रमुदित होकर दोनो हाथों से आशीर्वाद दिया। वहाँ ‘बाबूजी’ सबसे सक्रिय और मुस्तैद दिखे। सुबह से शाम तक लगातार अपने बेटे के आस-पास रहते हुए उन्होंने अपना सुख और आराम मुल्तवी कर रखा है। वैसे तो शुभेच्छुओं और तीमारदारों की कोई कमी नहीं है, लेकिन बाबूजी की उपस्थिति पिता-पुत्र के बीच विलक्षण आत्मीय सम्बन्ध को रेखांकित करती हुई भावुक बना देती है। ए.सी. कमरे में एक्स्ट्रा बेड और सोफे पड़े हुए हैं, और टीवी भी लगी है। लैप-टॉप भी आ गया है जो अभी खोला नहीं गया है, लेकिन मोबाइल पर लगातार हाथ चल रहा है। | सबकुछ चंगा है जी… |
मेरी पिछली पोस्ट पर अबतक की सर्वाधिक प्रतिक्रियाएं दर्ज हुईं। ज्ञान जी के लिए आप सबका प्रेम और आदर देखकर अभिभूत हूँ। दद्दा तूसी ग्रेट हो जी…
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
गुरुवार, 28 जनवरी 2010
पुण्यदायी व्यवसाय- तीर्थयात्रा कम्पनी…!
भारत की सांस्कृतिक एकता को मजबूत करने हेतु आदि शंकराचार्य नें भारत की चार दिशाओं में चार धामों की स्थापना की। उत्तर में बद्रीनाथ, दक्षिण में रामेश्वरम , पूरब में जगन्नाथपुरी एवं पश्चिम में द्वारका, हिन्दुओं के चार धाम हैं। आस्थावान हिन्दू इन धामों की यात्रा करना अपना पवित्र कर्तव्य मानते थे। शंकराचार्य से पूर्व पौराणिक काल से बद्रीनाथ, केदारनाथ, जमुनोत्री और गंगोत्री को चार धामों की प्रतिष्ठा प्राप्त है। कालान्तर में हिन्दुओं के नये तीर्थ आते गये हैं। बद्रीनाथ, द्वारका, रामेश्वरम, जगन्नाथपुरी के चार धामों के अतिरिक्त केदारनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री, ऋषिकेष, हरिद्वार, वैष्णो देवी, वाराणसी, प्रयाग, अयोध्या बैजनाथधाम, तिरुपति, शिरडी, गंगासागर, पशुपतिनाथ (काठमाण्डू) आदि तीर्थस्थल आस्थावान हिन्दुओं द्वारा विशेष श्रद्धा के साथ भ्रमण किये जाते हैं। शक्ति की देवी दुर्गाजी के अनेक रूपों के मन्दिर प्रायः पहाड़ों की चोटियों व दुर्गम स्थानों पर स्थापित है। लेकिन भक्तगण दुर्गम रास्तों की परवाह किए बिना माँ का आशीर्वाद प्राप्त करने निकल पड़ते हैं। देश के अलग-अलग हिस्सों में प्रतिष्ठित भगवान शंकर से संबन्धित द्वादश ज्योतिर्लिंग भी हिन्दू आस्था और भक्ति के अनन्य केन्द्र हैं:
सौराष्ट्रे सोमनाथम् च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्
उज्जयिन्याम् महाकालम् ओंकाराममलेश्वरम्
केदारम् हिमवत्पृष्ठे डाकिन्याम् भीमशंकरम्
वाराणास्यान्तु विश्वेशम् त्र्यम्बकम् गौतमीतटे
बैद्यनाथम् चिताभूमौ नागेशम् दारुकावने
सेतुबन्धेतु रामेश्वरम् द्युश्मेशं च शिवालये
द्वादशैतानि नामानि प्रातरुत्थाय यः पठेत्
सर्वयाय विनिर्मुक्तः सर्वसिद्धिः फलंलभेत्
इन पवित्र तीर्थस्थलों का दर्शन करने और पवित्र नदियों में स्नान करने से समस्त पापों का नाश होने और पुण्य के अर्जन का विश्वास प्रायः सभी हिन्दुओं को तीर्थयात्रा के लिए प्रेरित करता है। मार्ग की तमाम कठिनाइयों का सामना करते हुए प्राचीन काल में चारों धाम की यात्रा हिन्दुओं द्वारा देश की सांस्कृतिक एकता का दर्शन करने के लिये नहीं वरन् अपना परलोक सुधारने के लिये ही की जाती होगी। इसी प्रकार गंगा का दर्शन करने लोग इस भाव से नहीं जाते कि वे सांस्कृतिक दृष्टि से भावविभोर हो जायें वरन् इस भाव से जाते होंगे कि गंगा स्वयं शिव की जटा से निकली हैं और इसमें स्नान करने से उनके पापों का मोचन होगा।
पुराने जमाने में ये तीर्थयात्राएं बहुत कष्टकारी होती थीं। घर से बाहर निकलते ही कष्ट सहयात्री बन जाता था। कच्चे और दुर्गम मार्ग, दुर्लभ और धीमी सवारियाँ, प्रायः पैदल यात्रा की मजबूरी, खान-पान में कठिनाई और ठहरने के स्थानों का अभाव साधारण हैसियत वालों को यात्रा से रोकते थे। बहुत कम हिन्दू चारोधाम की यात्रा कर पाते थे। सुना जाता है कि भविष्य अनिश्चित् जान बहुत से लोग यात्रा पर निकलने से पहले ही मृत्यु के बाद कराये जाने वाले कर्मकाण्ड और अनुष्ठान सम्पन्न कराकर जाते थे। जो भाग्यशाली होते थे और सकुशल यात्रा समाप्त कर लौट आते थे उनके दर्शन को भी पुण्यदायी माना जाता था। उनके पाँव पखारने और सेवा करने वालों की लाइन लग जाती थी।
पाप-पुण्य का विचार हमारे जनमानस में बहुत गहराई तक पैठा हुआ है। अच्छी और संस्कारित शिक्षा से हमारे मन को अच्छे और बुरे का भेद करना आता है। कम से कम हमारी आत्मा तो जानती ही है कि क्या गलत है और क्या सही। लेकिन लाख पढ़े-लिखे होकर भी ऐसे कम ही लोग हैं जो अपने सदाचरण पर टिके रहने को ही सबसे बड़ा पुण्य मानें। बहुतायत तो उन्हीं की है जो इसके बजाय पहले काम, क्रोध, मद और लोभ के वशीभूत होकर निरन्तर अनैतिक कार्य करते जाते हैं और उसके बाद विश्वास रखते हैं कि पुरोहित द्वारा बताये गये कर्मकाण्डों के आयोजन और पवित्र तीर्थों के दर्शन द्वारा अपने एकाउण्ट से पाप की liability घटा लेंगे और पुण्य का asset बढ़ा लेंगे। इसी बैलेन्स शीट को कृत्रिम रूप से प्रभावशाली बनाने के प्रयास में नये जमाने के लोग भी अपने पाप धोने के लिए संगम सहित तमाम नदियों व सरोवरों में खास मूहूर्त पर स्नान करने के लिए उमड़े जाते हैं और मन्दिरों में दर्शनार्थियों की भीड़ साल-दर-साल बढ़ती जा रही है।
इस पाप-पुण्य के व्यापार में बहुत से असली व्यापारियों ने व्यावसायिक पूँजी निवेश किया है। अब यात्रा की अनेकानेक सुविधाएं बढ़ती जा रही हैं। अब तो घर से ज्यादा बाहर की यात्रा खुशगवार होती जा रही है। पैकेज टूर ऑपरेटर्स, ट्रैवेल एजेन्सियाँ और सरकारी संस्थान, जैसे- रेलवे और पर्यटन विभाग द्वारा भी यात्रियों की जरूरत के अनुसार सुविधाए उपलब्ध करायी जा रही हैं। अब पुण्य कमाने निकले यात्रियों को सेवा देकर आर्थिक लाभ अर्जित करने वाली एजेन्सियों की भरमार होती जा रही है। मुझे यह सब चर्चा करने का मन इसलिए हुआ है कि हाल ही में मुझे एक ऐसी सुविधा से साक्षात्कार हुआ जो अत्यन्त सस्ते दर पर भारत के अधिकांश महत्वपूर्ण तीर्थस्थलों की सैर लगातार पैंतीस दिनों तक कराती है। वह भी ऐसे कि यात्री को न तो अपने ठहरने का स्थान बदलना पड़ता और न ही सोने का बिस्तर। अपने सामान की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी नहीं, उसे यहाँ से वहाँ ढोने की फिक्र भी नहीं और खाने-पीने के लिए गर्म व ताजे घरेलू भोजन को मिस करने की मजबूरी भी नहीं है। मुझे तो यह किसी चमत्कार से कम नहीं लगा।
रेलगाड़ी की चार बोगियों को विशेष रूप से तैयार कराकर इस बड़ी यात्रा के लिए तीर्थयात्रा कम्पनी को उपलब्ध करा दिया जाता है। तीर्थयात्री को उसकी जो आरक्षित बर्थ यात्रा के प्रारम्भ में मिलती है वही अगले पैंतीस दिनों तक उसका बिस्तर होता है और वही कम्पार्टमेण्ट उसका घर बन जाता है। कम्पार्टमेण्ट की अन्य बर्थों के यात्री उसके परिवार के सदस्य बन जाते हैं और बगल का कम्पार्टमेण्ट उसका पड़ोसी घर हो जाता है। पूरी बोगी एक मुहल्ला और चार-पाँच बोगियाँ मिलकर एक शहर बना देती हैं। एक ऐसा शहर जिसमें देश के अलग-अलग राज्यों से आकर लोग बसे हुए हैं। सच में ‘भारत-दर्शन’ को निकले ये लोग स्वयं भारत का दर्शन कराते हैं। ये चारो डिब्बे अलग-अलग मार्गों पर अलग-अलग ट्रेनों से जुड़ते और टूटते हुए एक साथ देश के अलग-अलग हिस्सों तक पहुँचते रहते हैं।
मुझे यह सब देखने और जानने का सुअवसर तब मिला जब एक ऐसी ही यात्रा मण्डली बसन्त पञ्चमी के दिन इलाहाबाद पहुँची। इस यात्रा दल में मेरे गाँव के आठ लोगों की टोली में मेरे माता-पिता भी शामिल थे। उत्सुकतावश मैं सुबह सोकर उठने के बाद जल्दी-जल्दी तैयार होकर आठ बजे स्टेशन पहुँच गया। इलाहाबाद जंक्शन पर मजार वाली प्लैटफ़ॉर्म के दोनो ओर यात्री दल के दो-दो डिब्बे खड़े थे लेकिन उनमें ताला बन्द था। कम्पनी के स्टिकर से पहचान हुई जिसके कर्मचारियों ने बताया कि यात्रा बनारस से रात में ही यहाँ आ गयी थी। प्रातःकाल सभी यात्री लक्जरी कोच बसों से संगम क्षेत्र की ओर चले गये हैं। गंगा स्नान करके बड़े हनुमान जी, अक्षयबट आदि का दर्शन करके आनन्द भवन जाएंगे। वहाँ से भारद्वाज आश्रम देखने के बाद बसें उन्हें करीब बारह बजे स्टेशन छोड़ जाएगी। प्लैटफ़ॉर्म पर यात्रियों का भोजन कम्पनी के रसोइए तैयार कर रहे थे।
मैं फौरन लौटकर घर आया। कार्यालय में बॉस से मिलकर छुट्टी लिया और बच्चों को तैयार कराकर श्रीमती जी के साथ स्टेशन पर पहुँच गया। अपने सास-ससुर की पसन्द का भोजन तैयार करने में श्रीमती जी सुबह से ही व्यस्त रही थीं। चम्पा की मदद से हरे मटर की पूड़ियाँ, गोभी, लौकी, आलू और टमाटर की पकौड़ियाँ और पिताजी की पसन्दीदा खीर अपने हाथों तैयार कर डिब्बे में भर लिया था और झोले में अन्य जरूरी सामान डालकर हम स्टेशन पहुँच गये। ठोड़ी देर बाद यात्रियों का समूह प्लेटफ़ॉर्म पर आने लगा। प्रायः सबकी उम्र पचास के ऊपर थी। सबके चेहरे पर सन्तुष्टि का भाव तैर रहा था। लम्बी यात्रा की थकान जैसा कुछ भी नहीं दिखा। सबके गले में लटका परिचय पत्र जरूर ध्यान आकर्षित कर रहा था।
एक चादर बिछाकर मैने अपने गाँव की यात्रा मण्डली को बिठाया। श्रीमती जी ने डिब्बा खोलकर अपने घर का पकवान परोसना शुरू किया और मैने इस यात्रा के प्रबन्धक को खोजना। वे निकट ही मिल गये। इतनी बड़ी यात्रा को सुव्यवस्थित ढंग से संचालित करने वाला व्यक्ति निश्चित ही बहुत जानकार और गुणी होगा यह अनुमान पहले से कर चुका था।
लाला लक्ष्मीनारायण अग्रवाल को देखकर कोई सहज ही अन्दाज लगा सकता है कि उन्होंने किसी मैनेजमेण्ट स्कूल से इवेन्ट मैनेजमेण्ट का कोई कोर्स नही किया है। न ही उन्होंने उन्होंने कोई प्रोफ़ेशनल डिग्री ही हासिल की होगी। लोहे की एक फोल्डिंग चेयर पर बैठे हुए वे अपने स्टाफ़ को जरूरी हिदायतें दे रहे थे। बीच-बीच में देश के अन्य हिस्सों में चल रही उनकी कम्पनी की अन्य तीर्थयात्रा बोगियों से आने वाले फोन काल्स भी सुनते जा रहे थे। अगली यात्रा की बुकिंग भी करते जा रहे थे, और टूर-पैकेज के बारे में भी बताते जा रहे थे। मल्टी-टास्किंग का बेजोड़ नमूना थे लालाजी।
“लालाजी, कबसे हैं आप इस धन्धे में…?” मैने उनका मोबाइल बन्द होते ही पूछ लिया।
“सरसठ से चल रहा है जी… बयालीस साल हो गये है” उन्होंने सहजता से उत्तर दिया।
मुझे अपनी अल्पज्ञता पर लज्जा आयी। जो काम १९६७ से वर्षानुवर्ष हो रहा है मुझे उसका पता अब जाकर चल पाया है। मैने झेंप छिपाते हुए आश्चर्य से पूछा, “लगातार बयालिस साल से आप यह वार्षिक यात्रा आयोजित कराते है...?”
“नहीं जी, …यह तो साल भर चलता रहता है। …अगला टूर एक हफ्ते बाद रवाना होगा। वह सत्रह दिन का है। साल में चार-पाँच हो जाते हैं”
“कैसे करते हैं आप यह सब?” मैने अपना कौतूहल छिपाते हुए पूछा।
“स्टाफ़ लगा रखा है जी। बाकी तो ऊपर वाला सब कराता है…सारा सामान हम साथ लेकर चलते हैं। लोकल केवल सब्जियाँ खरीदते हैं। हमारा स्टाफ़ अब ट्रेण्ड है। …सब प्रभु का आशीर्वाद है”
मैने जब यात्रा के रूट और प्रमुख दर्शनीय स्थलों का व्यौरा जानना चाहा तो उन्होंने एक गुलाबी पर्चा थमा दिया। इस पर्चे में यात्रियों की जानकारी के लिए बहुत स्पष्ट और सूक्ष्म तरीके से सभी जरूरी बातें बतायी गयी थीं। नीचे सारणी में यात्रापथ का विवरण दूंगा। (अभी देर रात हो गयी है इसलिए इसे टालता हूँ)
वहीं पर गर्मागरम रोटियाँ सेंकी जा रही थीं। चार लोग मिलकर जिस कुशलता से लकड़ी की आग पर फुलके बना रहे थे उन्हें देखकर मैं लोभसंवरण न कर सका। आप यह वीडियो देखिए:
खाने में लहसुन-प्याज का प्रयोग नहीं होता। तेल, मिर्च और मसाला का प्रयोग भी बुजुर्गों की सहूलियत के हिसाब से कम किया जाता है। यात्री की उम्र, पसन्द और डाक्टरी सलाह का ध्यान रखते हुए सुबह की चाय, नाश्ता और दोपहर व शाम के भोजन को तैयार किया जाता था। हमारे गाँव के लोगों ने कहा कि ‘बहूजी’ ने इतना खिला दिया है कि अब कम्पनी का खाना हम नहीं खा सकते। हमें दावत दी गयी। हमने सहर्ष दावत कबूल की और सपरिवार डिब्बे में बैठ गये। डिब्बा क्या था बम्बई की किसी चाल का कमरा लग रहा था। ऊपर बाँधी गयी रस्सियों पर कपड़े झूल रहे थे। ऑलआउट मशीन और मोबाइल चार्जर की व्यवस्था सभी कूपों में थी। दवाइयाँ, चश्मे, और मोबाइल सबके सिरहाने रखे हुए। किसी चोर उचक्के या उठाई गीर के खतरे निश्चिन्त सबकुछ खुला हुआ जैसे घर में रखा हुआ हो। यात्रियों की आपसी बातचीत में घरेलू परिचय का पुट। इलाहाबाद में हम उनलोगों से मिलने वाले हैं यह पूरी बोगी के लोग जानते थे। वे सभी पिछले महीने भर से साथ जो थे।
भोजन परोसने के लिए दक्ष कर्मचारी थे। सभी यात्रियों को उनकी बर्थ पर थालियाँ थमा दी गयीं। सादी सब्जी, तीखी-मसालेदार सब्जी, सादा चावल, मीठा चावल, मटर-पनीर स्पेशल (दाल के बदले) आदि बाल्टियों में भर-भरकर एक ओर से आते और जरूरत के हिसाब से थालियों में डालते हुए दूसरी ओर निकलते जाते। दस-पन्द्रह मिनट में ही स्वादिष्ट और स्वास्थ्यवर्द्धक भोजन का काम पूरा हो गया।
वहाँ से लौटकर आया तो यही सोचता रहा कि स कम्पनी के बारे में आप सबको बताऊंगा। घर आकर गुलाबी पर्चा खोला तो उसमें सबसे पहले यही बताया गया था कि-
‘हमारी संस्था की सफलता को देखते हुए अन्य बहुत से अनुभवहीन व्यक्तियों ने नाम के आरम्भिक ‘श्री’ के स्थान पर अन्य नाम डिजाइन जोड़कर अपना नाम रख लिया है।और वे मिलते-जुलते नामों से VIP ए.सी. कोच से यात्रा करने के प्रलोभन द्वारा यात्रियों को भ्रमित कर रहे हैं। कृपया उनसे दस वर्ष पुराने यात्रियों की सूची रिकार्ड मांगे व उनके पुराने यात्रियों से सम्पर्क करके सुविधा, व्यवस्था की जानकारी करें तभी आपको वास्तविकता ज्ञात होगी। चूँकि हम यात्रियों को पूरी-पूरी सुविधा प्रधान करते हैं इसलिए हमारा खर्चा अन्य संस्थाओं से ज्यादा है। कृअपया आप हमारे पुराने यात्रियों से सुविधा व्यवस्था की जानकारी प्राप्त कर्रें व सन्तुष्ट होने के बाद हि सीट बुक कराएं।’
मुझे महसूस हुआ कि इस क्षेत्र में भी प्रतिस्पर्धा का दखल हो गया है। ग्राहकों (यात्रियों) को इससे लाभ मिलना ही है। धार्मिक आस्था के वशीभूत हिन्दुओं को चारोधाम व द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से अधिकांश की यात्रा एक मुश्त कराने वाली यह योजना इन कम्पनियों को आर्थिक लाभ चाहे जो दे रही हो लेकिन प्रतिवर्ष हजारों लोगों को पुण्य अर्जन में सहयोग और सेवा प्रदान करने वाली कम्पनी के कर्मचारी और प्रबन्धक पुण्य का लाभ जरूर कमा रहे हैं। आप क्या सोचते हैं?
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
वीडिओ पता: http://www.youtube.com/watch?v=4vIE27ViX4o
रविवार, 1 नवंबर 2009
इलाहाबाद का फेफ़ड़ा... जहाँ साँसें ताजा होती हैं!
बहुत दिनों बाद आज छुट्टी टाइप मूड के साथ बिस्तर छोड़ने को मिला। जगने के बाद तुरन्त कोई जरूरी काम नहीं था। सिविल सर्विसेज की मुख्य परीक्षा के सिलसिले में कोषागार के द्वितालक दृढ़कक्ष (double-lock strong-room) को सुबह -सुबह खोलने की जिम्मेदारी भी आज नहीं निभानी थी। आज कोई पेपर नहीं था। इधर ब्लॉगरी में भी कोई नयी बात होती देखने की उत्सुकता नहीं थी। गंगा जी का पानी शान्त होकर अब अघोरी के किस्से कहने लगा है। ब्लॉगर संगोष्ठी की स्मृतियाँ ही बची हैं।
बिस्तर पर ही मुझे सूचना मिली कि मेरा परिवार मेरी भली पड़ोसन (प्रशिक्षु आई.ए.एस.) के साथ उनकी गाड़ी से ही सभी बच्चों समेत सुबह की ठण्डी हवा खाने पार्क में जा रहा है। मैने करवट बदलकर ‘ओके’ कहा और नींद की एक बोनस किश्त के जुगाड़ में पड़ गया। ....लेकिन कुछ देर बाद ही काम वाली के खटर-पटर से जागना पड़ा। सूने घर में अकेले पड़े बोर होने से अच्छा था कि मैं भी उधर ही निकल लूँ जहाँ बच्चे गये थे। स्कूटर से अल्फ्रेड पार्क जाने में पाँच मिनट लगे।
यह वही पार्क है जिसमें चन्द्र शेखर आजाद (को अंग्रेजो ने मार डाला था।) को जब अंग्रेजों ने घेर लिया तो उन्होंने खुद को गोली मार ली और मरते दम तक आजाद रहे। २७ फरवरी, १९३१ को जब वे इस पार्क में सुखदेव के साथ किसी चर्चा में व्यस्त थे तो किसी मुखवीर की सूचना पर पुलिस ने उन्हें घेर लिया। इसी मुठभेड़ में आज़ाद शहीद हुए। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद इसका नाम अब ‘चन्द्रशेखर आज़ाद राजकीय उद्यान’ कर दिया गया है।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय से दक्षिण जी.टी.रोड से लगे हुए करीब १८३ एकड़ क्षेत्र पर फैले इस विशाल परिसर में अंग्रेजों के जमाने से स्थापित अनेक संस्थाएं आज भी अपने गौरव और ऐतिहासिकता के कारण बाहरी पर्यटकों को आकर्षित करती हैं। इसी परिसर में इलाहाबाद संग्रहालय है, अल्फ्रेड पब्लिक लाइब्रेरी है, हिन्दुस्तानी एकेडेमी है, और मदन मोहन मालवीय स्पोर्ट्स स्टेडियम भी है। इसी परिसर में उद्यान विभाग द्वारा संचालित दो पौधशालाएं हैं जो आम, अमरुद, आँवला और सजावटी फूलों के पौधे बहुत कम कीमत पर उपलब्ध कराती हैं।
बहुत से औषधीय पौधे भी इस परिसर में यत्र-तत्र बिखरे हुए मिल जाते हैं। हाल ही में ‘भैया दूज’ के दिन श्रीमती जी ने ताना मारा कि इलाहाबाद आने के बाद लगता है आप गोधन कूटने और भाई को सरापने का पारम्परिक अनुष्ठान छुड़वा ही देंगे। ललकारे जाने पर ताव में आकर मैंने भजकटया, झड़बेरी, बरियार और चिचिड़ा (लटजीरा) सब का सब जुटाकर रख दिया था। गोबर्धन पूजा में लगने वाली ये कटीली झाड़ियाँ मैं यहीं से खोज कर लाया था। मेरी इज्जत रख ली इस उद्यान ने।
शहर के बीचोबीच बसे इस हरे-भरे उद्यान में दूर-दूर से आकर टहलने, ताजी हवा खाने, व्यायाम करने, दोस्तों-यारों के साथ मधुर क्षण गुजारने और पिकनिक मनाने वालों की अच्छी भीड़ लगी रहती है। पार्क बन्द होने का समय रात ९:०० बजे से सुबह ४:०० बजे तक का ही है। शेष समय यहाँ कोई न कोई लाभार्थी मौजूद ही रहता है।
सुबह पहुँचा तो गेट पर नारियल पानी वाला मिला, “इतनी सुबह कौन तुम्हारा ग्राहक होता है जी?”
“दिन भर लगाता हूँ जी, कोई न कोई इस समय भी आ जाता है।”
सामने की ओर केला, पपीता, सेब, खीरा, ककड़ी, अंकुरित चना, मूली, इत्यादि का सलाद बनाकर बेचने वाले ठेले लगे हुए थे। जूस का खोमचा भी दिखा। भीतर घुसते ही नीम, पीपल, पाकड़ और अन्य बड़े-बड़े पेड़ों की छाँव में खड़ी कारों, जीपों और दुपहिया वाहनों की कतार बता रही थी अन्दर बहुत से साहब और सेठ लोग भी हैं। दिनभर शहर के प्रदूषण में इजाफ़ा करने वाली गाड़ियाँ यहाँ हरियाली के बीच मानो खुद को रिफ़्रेश कर रही थीं।
मुझे अपने बच्चों को ढूँढने में देर नहीं लगी थी। चादर बिछाकर योगासन करती मम्मी लोग के पास बैठे बच्चे बोर हो रहे थे। मैने उन तीनो को साथ लिया और पार्क का चक्कर लगाने निकल पड़ा। शरदकालीन फूलों का खिलना अभी शुरू नहीं हुआ है। क्यारियाँ तैयार की जा रही हैं। कुछ जगह तो अभी जुताई ही हुई है। लेकिन सदाबहार किस्म के फूल बदस्तूर मुस्कराते मिले। उनकी मुस्कराहटों के बीच करीब पौने तीन किलोमीटर के पैदल परिक्रमा पथ पर टहलने के बाद सुस्ताते हुए अनेक बुजुर्ग, जवान, औरतें और बच्चे मिले। झाड़ि्यों की झुरमुट के पीछे और घने पेड़ों के नीचे लगी बेन्चों पर बैठे लड़के-लड़कियाँ भी मिले।
रविवार का लाभ उठाते हुए कुछ साप्ताहिक सैर करने वाले परिवार भी मिले। हमने अपने बच्चों की फोटुएं उतारी। वागीशा और सत्यार्थ के साथ पड़ोस की कीर्तिचन्द्रा भी अपनी मम्मी को छोड़कर तोप पर सवारी करती हुई तस्वीर खिंचाने में खुश हो रही थी। मास्टर सत्यार्थ ने जरूर अपने उत्साह पर हावी होते डर को प्रकत करने के लिए कुछ क्षण के लिए मुँह रुआँसा कर लिया। लेकिन कैमरे का फ्लैश बड़ों बड़ों से ऐक्टिंग करा देता है तो वह कैसे बच जाता।
पार्क में एक सफेद रंग की गुम्बजाकार इमारत मिली जिसके केन्द्र में एक ऊँचा चबूतरा था। पता चला कि इस चबूतरे पर किसी जमाने में महारानी विक्टोरिया की बड़ी सी प्रतिमा विराजमान थी। पार्क के बीचोबीच जो बड़ा सा घेरा बना है उसके चारो ओर लगी बेंचों पर बैठकर अंग्रेज बहादुर लोग अपनी-अपनी मेमों के साथ सुबह-शाम हवा खाते थे। घेरे के बीच में जो गोल चबूतरा है उसपर बैंडसमूह पाश्चात्य संगीत बजाते थे। अभी भी उस चबूतरे को ‘बैण्ड-स्टैण्ड’ ही कहा जाता है। आजादी के बाद विक्टोरिया महारानी यहाँ से हटा दी गयी हैं जो अब संग्रहालय की शोभा बढ़ा रही हैं।
उद्यान में एक तरफ कोई योगगुरू कुछ लोगों को ध्यान और योगासन सिखा रहे थे। कुछ लोग बिना गुरू के ही अपना अभ्यास कर रहे थे। कुछ कम-उम्र और हम-उम्र जोड़े भी अपनी बतकही में व्यस्त थे। हमने उधर ध्यान न देना ही उचित समझा और अपने साथ के बच्चों को फोटो खिंचाने के इधर से उधर ले जाता रहा। इसी उपक्रम में संयोग से एक रोचक स्नैप ऐसा भी क्लिक हो गया है।
‘औरतनुमा पुरुष जाते हुए और पुरुषनुमा महिला आती हुई’ इस तस्वीर में आ गयी है यह घर आने पर पता चला। यद्यपि टहलने वालों की भीड़ वापस लौट चुकी थी और `इतवारी’ टाइप कम ही लोग बचे रह गये थे लेकिन बच्चों ने घूम-घूमकर इतना मजा किया, और फोटू खिंचाने में इतना मशगूल रहे कि काफी देर तक बाहर गाड़ी में प्रतीक्षा करती मम्मी लोगों को इनकी खोज करने के लिए फॉलोवर को भेंजना पड़ा।
मैने भी कैमरा समेटा और डाँटे जाने का मौका न देते हुए स्कूटर की ओर बढ़ लिया। चलते चलते एक मोटे से पेंड़ में लटके बहुश्रुत संदेश की फोटू भी कैमरे में कैद कर ली। इस परिसर को किसी ने इलाहाबाद का फेफ़ड़ा कहा था जहाँ शुद्ध ऑक्सीजन की आपूर्ति लेने दूर दूर से लोग आते हैं। आप भी इसे देखिए और अपनी अगली इलाहाबाद यात्रा पर इस परिसर के लिए कम से कम एक दिन जरूर रखिए। धन्यवाद।
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)


