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गुरुवार, 31 अक्टूबर 2024

लोहिया पार्क लखनऊ में योगासन प्राणायाम

 आज लोहिया पार्क लखनऊ के हरे -भरे वातावरण में प्रातः काल के धुंधलके में पहुंच गया था। आसन बिछाकर ऑनलाइन योगकक्षा से जुड़ गया। कक्षा तो सात चक्रों के संतुलन संबंधी आसनों और उनके जागरण की मुद्राओं की थी। किंतु यहां की मनोरम छटा में कुछ नियमित आसन लगने का लोभ संवरण न कर सका। कुछ झलकियां आपके लिए।














मंगलवार, 15 अक्टूबर 2024

कुल्लू दशहरा का अद्भुत मेला

 #कुल्लू_दशहरा एक ऐसा विशिष्ट त्यौहार है जिसे हर भारतीय को एक बार जरूर देखना चाहिए। देवभूमि हिमाचल के विभिन्न पर्वतों कन्दराओं में विराजे प्रायः समस्त देवी देवता अपना मूल स्थान छोड़कर सजी-धजी पालकी में बैठकर इस दिन कुल्लू के रघुनाथ जी से भेंट करने आते हैं। मनाली के अत्यंत प्राचीन मंदिर से देवी हिडिंबा भी पधारती हैं जो यहाँ के राजपरिवार की अतिथि होती हैं। सामने के पर्वत शिखर से बिजली महादेव भी होते हैं।

रघुनाथ जी स्वयं अपने स्थायी मंदिर से निकलकर कुल्लू नगर के एक बड़े मैदान में आ विराजते हैं। कुल्लू के ऊंचे पर्वत शिखर पर निवास करने वाली भेखली देवी अपने स्थान से झण्डा दिखाकर कार्यक्रम प्रारंभ करने की अनुमति देती हैं। इस दिव्य और भव्य भेंट के बाद कुल्लू के राजपरिवार व भक्त नागरिकों द्वारा श्री रघुनाथ जी का रथ खींचकर उस अस्थायी शिविर में ले जाया जाता है जहां वे सभी देवी-देवताओं के साथ अगले एक सप्ताह तक कैम्प करते हैं।

पूरे सात दिनों के मेले में एक ही स्थान पर सभी देवी-देवता अपनी-अपनी कुटिया (टेंट) में वैसे ही पूजा और दर्शन के लिए उपलब्ध होते हैं जैसे अपने मूल स्थान के मंदिरों में। मुख्य शिविर श्री रघुनाथ जी का होता है जहां उपस्थित दर्शनार्थियों के समक्ष उन्हें स्नान कराकर विधिवत् शृंगार पूजन और आरती का कार्य पूरी श्रद्धा और भक्ति से किया जाता है। पूरे मेले में ढोल, मृदंग, नगाड़े और सिंगा की आवाज अद्भुत वातावरण उत्पन्न करती है।

ऐसी मान्यता है कि श्री रघुनाथ जी के रथ की रस्सी पकड़कर उसे खींचने का सौभाग्य जिन्हें मिल जाता है उनकी समस्त मनोकामना पूरी हो जाती है। उस रस्सी को छू लेने भर से सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। उस दृश्य को साक्षात् देख लेने से भी प्रभु की कृपा बरस जाती है।

इस अद्भुत समागम को सपरिवार निकट से देखने का सौभाग्य इस बार मुझे भी मिला। श्रद्धा और भक्ति का जनसमुद्र इतना अनुशासित और विनम्र भी हो सकता है यह मैंने हिमाचल में ही देखा। अहोभाग्य।







मंगलवार, 8 अक्टूबर 2024

परिवार के बुजुर्गों की देखभाल - स्कन्द का आलेख

 मेरे मित्र Dr Skand Shukla ने पिछले दिनों एक संवेदनशील व संस्कारित पुत्र के रूप में अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करते हुए जो अनुभव बटोरे उसे लिपिबद्ध किया। प्रतिष्ठित अंग्रेजी अखबार 'द हिन्दू' ने उसे प्रकाशित किया। एक महत्वपूर्ण विषय पर इस जरूरी लेख का लाभ वृहत्तर समाज को मिल सके इसके लिए मैंने उसका हिन्दी भावानुवाद करने का प्रयास किया है। (हूबहू मशीनी अनुवाद तो गूगल महाराज कर ही रहे हैं।) इसपर आपके निजी विचार आमंत्रित हैं।

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माता-पिता का पालन-पोषण
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वो रातों की नींद गायब होना, डायपर पर नजर रखना, गीला हो जाने पर उन्हें बदलना, नेबुलाइज करना, विषम समय में दवाएं देना, देह की असहज अवस्था में सहारा देना, जो लोग इस प्रकार के अनुभव से गुजर चुके हैं उनके ब्यौरे से तुलना करना... यह सब लगभग बीस साल बाद वापस आ गया है। हम दोनो अर्थात् मेरी पत्नी और मैं, एक बार फिर माता-पिता होने का अनुभव कर रहे हैं; लेकिन इस बार हमारा पाल्य कोई बच्चा नहीं बल्कि हमारे माता-पिता में से एक है। यह है तो उसी तरह का लेकिन बहुत अलग सा भी है।
बार्ड ने 'एज़ यू लाइक इट' में लिखा है कि बूढ़ी उम्र 'दूसरा बचपना और महज एक विस्मृति' है - 'मुंह में दांत नहीं, आंखों में रोशनी नहीं, जीभ में स्वाद नहीं, प्रायः कुछ भी नहीं'। सोते समय जब वे पहलू बदलते हैं, या हिलते-डुलते हैं तो उनकी नाजुक चमड़ी पर बिस्तर की चादर का खुरदरापन भी घाव पैदा कर सकता है, सामान्य तरीके से मुंह खोलने के लिए कहने पर भी उन्हें यह समझने में समय लगता है, पतली खिचड़ी या अन्य पके हुए खाने का निवाला भी चबाकर निगलने का शऊर भूल गए लगते हैं। स्मृति लोप का शिकार हो जाने के कारण इनकी असहाय आँखें सूनी सी हो जाती हैं। जब इनका मन चिड़चिड़ा हो जाता है तो कोई भी बात सुनने, और जवाब देने या बात मानने से साफ इनकार कर देते है। ऐसे में मन एक बच्चे की छवि के बारे में सोचने ही लगता है।
वैसे अपने आप को यह विश्वास दिलाना बहुत मुश्किल होता है कि भले ही वे हमसे बहुत बड़े हैं लेकिन वस्तुतः हम एक बच्चे के साथ ही जूझ रहे हैं। हम अभी भी उन्हें एक मजबूत व्यक्ति समझ रहे होते हैं क्योंकि हमें बचपन से इसकी आदत होती है। यह स्वीकार करना कठिन महसूस होता है कि वे अचानक कमजोर हो गए हैं। यह भूलना बहुत मुश्किल है कि कुछ समय पहले तक आप हर चीज़ के लिए उनकी सलाह पर आश्रित थे। उनकी आवाज़ में एक अधिकार था। आप अभी हाल तक अक्सर उनके मार्गदर्शन के लिए उनकी ओर देखते थे, जबकि आप दुनिया के लिए एक बड़े आदमी बन चुके होते है।
यदि आपका बच्चा कुछ आपकी इच्छा के अनुसार नहीं कर रहा है तो आप उसपर चिल्ला सकते हैं और उस पर गुस्सा निकाल सकते हैं, लेकिन यहाँ आप चिल्ला भी नहीं सकते; बिल्कुल भी नहीं। वे जिद पर अड़े रहें तो आपको उन्हें बहुत प्यार और मनुहार से मनाना होगा। एक बच्चे की तुलना में उनका शरीर बहुत बड़ा और भारी भी होता है। आप एक बच्चे को आसानी से उठाकर नहला सकते हैं, कपड़े बदल सकते हैं, लेकिन बुजुर्गों के मामले में उन्हें उठाना-बिठाना और स्थिर बनाए रखना अपने आप में एक बड़ा काम है।
आजकल जब मैं इस अनुभव से गुज़र रहा हूं तो अपने देश में बुजुर्गों की चिकित्सीय देख-भाल की व्यापक तस्वीर पर भी चिंतन-मनन कर रहा हूँ।
यद्यपि भारत में युवाओं की संख्या सबसे अधिक है, लोगों की उम्र बढ़ने की गति तेजी से बढ़ रही है। यूएनएफपीए की रिपोर्ट के अनुसार 60 वर्ष और उससे अधिक आयु की वर्तमान बुजुर्ग आबादी 15.3 करोड़ है जो 2050 तक 34.7 करोड़ तक पहुंचने की संभावना है। जैसे-जैसे जन्म दर कम हो रही है और जीवन प्रत्याशा बढ़ रही है, बुजुर्गों की संख्या बढ़ना निश्चित है। लेकिन हमारे पास इस विशाल जनसंख्या को ठीक से सम्हालने के लिए समुचित व्यवस्था नहीं है।
यह स्पष्ट दिखता है कि बुजुर्गों के लिए विशेषज्ञ चिकित्सा सहायता प्रणाली उपलब्ध ही नहीं है। यहाँ बालरोग विशेषज्ञ तो बहुतायत में हैं लेकिन बड़े शहरों में भी जरारोग विशेषज्ञ प्रायः नहीं के बराबर हैं। हमारे देश के मेडिकल कॉलेजों में वृद्धावस्था विभाग दुर्लभप्राय हैं। लोगों में यह समझ ही नहीं है कि बुजुर्ग और वयस्क एक जैसे नहीं होते; बल्कि इनमें उतना ही अंतर हैं, जितना एक बच्चे और एक वयस्क में होता है।
आजकल एकल परिवार का चलन बढ़ गया है, और बच्चों का कामकाज के लिए घर से दूर जाना घर के बुजुर्गों को असहाय सा बना दे रहा है। ऐसे में उनका मानसिक स्वास्थ्य गड़बड़ होने और इससे संबंधित बीमारियों की संभावना बढ़ती जा रही है। पार्किंसंस और अल्जाइमर जैसी बीमारियाँ बुजुर्गों में बहुत आम होती जा रही हैं लेकिन लोगों को आम तौर पर इनके बारे में पता ही नहीं होता।
वास्तविकता के धरातल पर, विशेष रूप से शहरी क्षेत्रों में बुजुर्गों के लिए ऐसा कोई सामाजिक संबल अस्तित्व में नहीं है जहां वे अपनी भावनात्मक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिकता की जरूरतों को पूरा कर सकें। सामाजिक मेलजोल की आवश्यकता बहुत प्रबल होती है। मुझे याद है मेरे पिताजी हर महीने की पहली तारीख को पैसे निकालने के लिए नहीं, बल्कि अपने सेवानिवृत्त पूर्व सहयोगियों से मिलने के लिए बैंक जाना चाहते थे।
हम सबकी उम्र बढ़ रही है और ज्यादा लंबा समय नहीं है जब हम स्वयं उस स्थिति में होंगे जिस स्थिति में आज हमारे माता-पिता हैं। यह इस समय की पुकार है कि हमारा समाज और हमारा पूरा तंत्र अपने बुजुर्ग नागरिकों के बारे में चिंता करे। कहीं ऐसा न हो कि यीट्स की कविता 'सेलिंग टू बाइजेन्टियम' (यद्यपि एक अलग संदर्भ में लिखी गई थी) की प्रारंभिक पंक्ति हमारे दिमाग में गूंजती रहे – ‘That is no country for old men’ (बूढ़ों के लिए कोई देश नहीं है।)
डॉ स्कन्द शुक्ल.
मूल आलेख का लिंक ये रहा-