देश आज संविधान दिवस मना रहा है।
आप सबको ढेरों बधाई और हार्दिक शुभकामनाएं।
वर्ष 2011में गणतंत्र दिवस के अवसर
पर मैंने एक गीत लिखा था। करीब 15 वर्ष बाद आज मुझे स्थितियां कुछ कुछ बदली हुई
महसूस हुई हैं। फलस्वरूप मैने उस गीत को थोड़ा संशोधित कर दिया है। मूल गीत का
लिंक कमेंट में दे रहा हूं।
हे संविधान जी नमस्कार,
हो गए छिहत्तर के फिर भी क्या कर पाये कुछ चमत्कार?
ऐ संविधान जी नमस्कार…
संप्रभु-समाजवादी-सेकुलर यह लोकतंत्र-जनगण अपना,
क्या पूरा कर पाये अब तक देखा जो गाँधी ने सपना?
बलिदानी अमर शहीदों ने क्या चाहा था बतलाते तुम;
सबको समान दे आजादी, हो गयी कहाँ वह धारा गुम?
सिद्धांत बघारे बहुत मगर परिपालन में हो बेकरार,
हे संविधान जी नमस्कार…
बाबा साहब ने जुटा दिया दुनियाभर की अच्छी बातें,
दलितों पिछड़ों के लिए दिया धाराओं में भर सौगातें।
मौलिक अधिकारों की झोली लटकाकर चलते आप रहे;
स्तम्भ तीन जो खड़े किए वे अपना कद ही नाप रहे।
इक दूजे को धकियाने की ज्यों होड़ लगी है धुँआधार,
हे संविधान जी नमस्कार…
अब कार्यपालिका चलती है बस बुलडोजर के गर्जन से,
नौकरशाही का तालमेल है धन कुबेर के अर्जन से।
माफ़िया निरंकुश थे जो वे अब मिट्टी में मिल जाते हैं;
अब कोर्ट कचहरी जाए बिन लूले लंगड़े बन जाते हैं
यह त्वरित न्याय है या तेरा पन्ना होता है तार-तार
हे संविधान जी नमस्कार…
कानून बनाने वाले जब कानून तोड़ते दिखते हैं,
संसद सदस्य या एम.एल.ए. सबका भविष्य यूँ लिखते हैं।
जन-गण की बात हवाई है, दकियानूसी, बेमानी है;
जनता के हाथों कुंजी तो बस पाँच वर्ष में आनी है?
अब हंगामा, तू-तू मैं-मैं से संसद होती जार-जार ,
हे संविधान जी नमस्कार…
क्या न्याय पालिका अडिग खड़ी कर्तव्य वहन कर पाती है?
जूते उछालने वालों से क्या कुर्सी तनिक लजाती है?
क्या जिला कचहरी, तहसीलों में न्याय सुलभ हो पाया है?
क्या मजिस्ट्रेट से, मुंसिफ़ से यह भ्रष्ट तंत्र घबराया है?
अफ़सोस तुम्हारी देहरी पर जन-गण-मन करता इंतजार
हे संविधान जी नमस्कार…















