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बुधवार, 26 नवंबर 2025

संविधान दिवस की शुभकामनाएं

देश आज संविधान दिवस मना रहा है। आप सबको ढेरों बधाई और हार्दिक शुभकामनाएं।

वर्ष 2011में गणतंत्र दिवस के अवसर पर मैंने एक गीत लिखा था। करीब 15 वर्ष बाद आज मुझे स्थितियां कुछ कुछ बदली हुई महसूस हुई हैं। फलस्वरूप मैने उस गीत को थोड़ा संशोधित कर दिया है। मूल गीत का लिंक कमेंट में दे रहा हूं।

     हे संविधान जी नमस्कार,

हो गए छिहत्तर के फिर भी क्या कर पाये कुछ चमत्कार?

ऐ संविधान जी नमस्कार…

 

संप्रभु-समाजवादी-सेकुलर यह लोकतंत्र-जनगण अपना,

क्या पूरा कर पाये अब तक देखा जो गाँधी ने सपना?

बलिदानी अमर शहीदों ने क्या चाहा था बतलाते तुम

सबको समान दे आजादी, हो गयी कहाँ वह धारा गुम?

सिद्धांत बघारे बहुत मगर परिपालन में हो बेकरार,

हे संविधान जी नमस्कार…

 

बाबा साहब ने जुटा दिया दुनियाभर की अच्छी बातें,

दलितों पिछड़ों के लिए दिया धाराओं में भर सौगातें।

मौलिक अधिकारों की झोली लटकाकर चलते आप रहे;

स्तम्भ तीन जो खड़े किए वे अपना कद ही नाप रहे।

इक दूजे को धकियाने की ज्यों होड़ लगी है धुँआधार,

हे संविधान जी नमस्कार…

 

अब कार्यपालिका चलती है बस बुलडोजर के गर्जन से,

नौकरशाही का तालमेल है धन कुबेर के अर्जन से।

माफ़िया निरंकुश थे जो वे अब मिट्टी में मिल जाते हैं;

अब कोर्ट कचहरी जाए बिन लूले लंगड़े बन जाते हैं

यह त्वरित न्याय है या तेरा पन्ना होता है तार-तार  

हे संविधान जी नमस्कार…

 

कानून बनाने वाले जब कानून तोड़ते दिखते हैं,

संसद सदस्य या एम.एल.ए. सबका भविष्य यूँ लिखते हैं।

जन-गण की बात हवाई है, दकियानूसी, बेमानी है;

जनता के हाथों कुंजी तो बस पाँच वर्ष में आनी है?

अब हंगामा, तू-तू मैं-मैं से संसद होती जार-जार  ,

हे संविधान जी नमस्कार…

 

क्या न्याय पालिका अडिग खड़ी कर्तव्य वहन कर पाती है?

जूते उछालने वालों से क्या कुर्सी तनिक लजाती है?

क्या जिला कचहरी, तहसीलों में न्याय सुलभ हो पाया है?

क्या मजिस्ट्रेट से, मुंसिफ़ से यह भ्रष्ट तंत्र घबराया है?

अफ़सोस तुम्हारी देहरी पर जन-गण-मन करता इंतजार

हे संविधान जी नमस्कार…



 

रविवार, 23 नवंबर 2025

प्रयाग-पथ के हितेश

पिछले सप्ताह हाई कोर्ट में एक व्यक्तिगत शपथपत्र प्रस्तुत करने के लिए अचानक प्रयागराज जाना हुआ। विशुद्ध सरकारी काम था। कोई चिंता वाली बात नहीं थी। सहारनपुर से प्रयाग जाने और वापस आने के लिए नौचंदी एक्सप्रेस में लगातार दो रातों में 16-16 घंटे की यात्रा करनी पड़ी। इलाहाबाद में पढ़ाई, नौकरी की तैयारी और दो बार की तैनाती पाने के बाद भी मुझे वहां जाने से मन नहीं भरता है। इस बार तो इस शहर में कुल 7-8 घंटे ही बिताने को मिले। वह भी हाईकोर्ट के अंदर-बाहर काले कोट की अपार भीड़ के बीच। संयोग से उत्तर प्रदेश बार काउंसिल के चुनाव के लिए नामांकन हो रहे थे। पूरे प्रदेश के वकील प्रत्याशी अपने दलबल के साथ इलाहाबाद में पहुंचे हुए थे। अपना काम निपटाने के बाद वापस गेस्ट हाउस जाने के बजाय मुझे बेहतर यह लगा कि रेलवे स्टेशन के पास ही अपने एक अभिन्न मित्र स्कन्द शुक्ल से उनके ऑफिस में जाकर मिल लूँ। बोनस में वहाँ अच्छी कॉफी भी मिली।

उसके बाद प्रयाग स्टेशन पर पहुंचते हुए मुझे यह चिंता हुई कि फॉर्मल कोट-पैंट और जूतों में 16 घंटे की यात्रा में असुविधा होगी। ट्रेन आने में बस 5-7 मिनट ही बचे थे जब मैं प्लेटफॉर्म पर पहुँचा। मैंने अपने अनुज तुल्य हितेश कुमार सिंह को फोन लगाया तो संयोग से वे वहीं ड्यूटी पर मिल गए। उन्होंने तत्काल मेरी समस्या का समाधान कर दिया। एक कमरे में जाकर मैंने चेंज करके आरामदायक कपड़े पहने। हवाई चप्पल डाली और वापस प्लेटफॉर्म पर पहुंचा तो रेलगाड़ी आकर खड़ी हो चुकी थी।

लेकिन इस सारी भागदौड़ के बीच भी मुझे प्रिय हितेश की साहित्यिक मेधा का मूर्तरूप देखने और पाने का अवसर नहीं छोड़ना था। साहित्य, कला और संस्कृति का संचयन करने का उनका अनथक प्रयास 'प्रयाग-पथ' के रूप में पिछले 11 वर्षों से प्रकाशित हो रहा है। उन्होंने मुझे इसका नवीनतम अंक भेंट किया जो मोहन राकेश की जन्मशती पर केंद्रित है। मोहन राकेश के जीवन-प्रसंग के रोचक संस्मरण और उनके नाटकों, कहानियों, एकांकियों, डायरी और उपन्यास पर गहन समीक्षाओं का अद्भुत संकलन इस अंक में बहुत सुरुचिपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया गया है। इसके अतिरिक्त उत्तम कोटि की अन्य कहानियां, कविताएं, संस्मरण, पुस्तक समीक्षा इत्यादि भी सदा की भांति प्रयाग-पथ के इस अंक में सजी हुई हैं। निश्चित ही यह एक सुंदर संग्रहणीय अंक बन पड़ा है।

अत्यंत जिम्मेदारी और व्यस्तता से भरी हुई रेलवे की नौकरी करने के साथ साथ इतने बड़े  साहित्यिक अनुष्ठान का संपादन करना बहुत जीवट का काम है। डिजिटल क्रांति के युग में ऐसे प्रकाशन का काम व्यावसायिक दृष्टि से बहुत लाभदायक तो नहीं ही होगा। लेकिन साहित्य की साधना को अपने जीवन का ड्राइविंग फोर्स मानने वाले हितेश कहते हैं कि यदि वे यह काम नहीं करते तो उनका जीवन ही निरर्थक हो जाता। प्रिय हितेश, आप वास्तव में बहुत सार्थक काम कर रहे हैं।

मेरे लिए तो इस बार प्रयागराज की संक्षिप्त यात्रा की सबसे बड़ी उपलब्धि प्रयाग-पथ की यह अनमोल प्रति की प्राप्ति ही रही। आप भी इसे जरूर पढ़ें। विवरण के लिए चित्र देखें।






शुक्रवार, 14 नवंबर 2025

एक भयावह आशंका को मिटाता चुनाव परिणाम

आजतक चैनल पर सांसद मनोज तिवारी के मुँह से आज यह गीत सुनते हुए अनायास मेरी आंखों से आंसू निकलने लगे। खुद ही हतप्रभ सा हो गया मैं। ऐसा कमजोर कैसे हो गया मैं? पत्नी ने पूछा - इतना भावुक क्यों हो रहे हैं?

क्या बताता मैं? बिहार के जंगल राज की व्यक्तिगत पीड़ा मुझे याद आ रही थी जिसकी पुनरावृत्ति की संभावना अब फिलहाल पांच साल के लिए टल गई है। स्कूल हेडमास्टर रहे मेरे एक बुजुर्ग नाना जी का अपहरण हुआ था जिन्हें महीनों नारायणी के दियारा क्षेत्र में गन्ने के खेतों और पटेर के जंगल में जिंदगी की जंग लड़नी पड़ी थी। फिर एक मामा जी के साथ भी यही हुआ। मेरे सगे चाचा जी जो एक शिक्षक थे उन्हें प्रायः जंगल सरकार के रंगदार गुंडे वसूली की नोटिस भेजते रहते थे जिसपर कारतूस की मुहर चस्पा रहती थी। अपनी आंखों से देखा था मैने एक पत्र जिसमें आटा, चावल, दाल, आलू, प्याज, तेल, मसाला, बकरा, मुर्गा, लुंगी, कुर्ता, जांघिया, बनियान, गमछा आदि की मांग करते हुए उसे अमुक स्थान पर पहुंचाने की समय सीमा बतायी गई थी जिसका उल्लंघन होने पर गोली की गारंटी लिखी हुई थी। ये रंगदार सरेराह उनके साथ मारपीट कर चुके थे। यह सबकुछ पुलिस के संरक्षण में चल रहा था। रिटायर होने के बाद चाचाजी बिहार छोड़कर उत्तर प्रदेश वाले हमारे घर आ गए।

आज जब चुनाव के परिणाम आए तो मन में जो एक आशंका घर बना रही थी वह टूटकर बाहर आ गई और आंसुओं के साथ वह सारा अनकहा भय जाता रहा। मुझे विश्वास है कि 40 की उम्र से ऊपर के बिहार के अधिकांश नागरिक आज ऐसा ही भावुक क्षण महसूस कर रहे होंगे। ईश्वर करे बिहार में आया यह परिवर्तन चिर स्थायी हो। 🙏🏻💐



गुरुवार, 6 नवंबर 2025

कार्तिक पूर्णिमा मे हरकी पैड़ी-हरिद्वार

कल कार्तिक पूर्णिमा के पवित्र अवसर पर हरिद्वार में हरकीपैड़ी पर गंगास्नान का सौभाग्य मिला। उसके बाद अपार संख्या में जुटे श्रद्धालुओं के बीच गंगा जी की आरती का दर्शन करके मन तृप्त हुआ। 

नमामि गंगे, तव दर्शनार्थ मुक्तिः।