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बुधवार, 12 दिसंबर 2012

वालमार्ट जी आइए… स्वागत गीत


वालमार्ट जी आइए

वालमार्ट जी आइए, वालमार्ट जी आइए
देश हमारा व्याकुल बैठा, पूँजी से सहलाइए

घपलों और घोटालों की तस्वीर यहाँ की झूठी है
बिना विदेशी पूँजी के तकदीर देश की रूठी है
रंक बने राजा ऐसी मनमोहन नीति अनूठी है
बिछी लाल कालीन आइए दो का बीस बनाइए
वालमार्ट जी आइए

तथाकथित विद्वान देश के आपके आगे बौने हैं
बड़े-बड़े मन्त्री भी देखो कैसे भले खिलौने हैं
संसद की लॉबी में भी सब बिकते औने-पौने हैं
यहाँ निलामी सस्ती है अब खुलकर दाँव लगाइए
वालमार्ट जी आइए

बहुत हुई आजादी की सूखी बातें अब ऊब रहे
आम आदमी के सपने केजरीवाल संग डूब रहे
अर्थनीति पर राजनीति के कन्फ़्यूजन भी खूब रहे
भटक रहे सन्‌ सैतालिस से पटरी पर लौटाइए
वालमार्ट जी आइए

-सत्यार्थमित्र (12.12.12)

शनिवार, 30 जून 2012

भ्रष्टाचारी का आत्मविश्वास तगड़ा है

क्या हमारा समाज सादा जीवन उच्‍च विचार का मंत्र भूलता जा रहा है?

ashok-chavan-adarsh-panel-295महाराष्ट्र के एक पूर्व मुख्यमंत्री एक बड़े और चर्चित घोटाले की जांच के लिए राज्य सरकार द्वारा गठित आयोग के समक्ष शनिवार को पेश हुए। आज शाम यह समाचार सभी चैनेलों पर वीडियो क्‍लिप के साथ आ रहा है। गाड़ी से उतरकर नेता जी बत्तीसो दाँत मुस्करा रहे हैं और अपने समर्थकों और “प्रशंसकों” से हाथ मिलाते हुए ऐसे आगे बढ़ रहे हैं जैसे दिल्‍ली में खाली हुए वित्तमंत्री के पद की शपथ लेने जा रहे हों। चेहरे पर ऐसा आत्मविश्वास सी.डब्ल्यू.जी. और थ्रीजी घोटाले के सरगनाओं  के चेहरे पर भी चस्पा रहता था जब चैनेल वाले उनके जेल से अदालत आने जाने की तस्वीरें दिखाते थे। ऐसा आत्मविश्वास देखकर मुझे पहले तो आश्चर्य होता था लेकिन अब अपनी सोच बदलने की जरूरत महसूस होने लगी है।

मैंने अपने समान विचारों वाले एक मित्र से चर्चा की तो उसने तपाक से कहा- मुझे तो इन सबको देखकर अपने भीतर हीनता का भाव पैदा होने लगा है। वह आगे बोलता गया और मैं समर्थन में सिर हिलाता हुआ हूँ-हूँ करता रहा - थोड़ी ईर्ष्या सी होती है इस मजबूती को देखकर। इधर तो इस आशंका में ही घुले जाते हैं कि सरकारी कुर्सी पर बैठने के कारण ही लोग जाने क्या-क्या सोचते होंगे। गलती से भी कोई गलत काम हो गया और बॉस ने स्पष्टीकरण मांग लिया तो क्या इज्‍जत रह जाएगी। समाज को क्या मुँह दिखाएंगे? बीबी बच्चों को कैसे समझाएंगे कि मैने कोई ऐसा-वैसा काम नहीं किया है, बस थोड़ी ग़लतफहमी पैदा हो गयी है जो जल्दी ही ठीक हो जाएगी। प्रत्तिष्ठा बचाने के चक्‍कर में बहुत नुकसान उठाना पड़ा। कई बार सुनहले मौके हाथ से चला जाने दिया। सहकर्मियों की लानत-मलानत झेलनी पड़ी। कितने बड़े लोगों से दोस्ती बनाने का अवसर चूक गया। बड़ी-बड़ी पार्टियाँ हमसे किनारा करती गयीं। सत्ता के गलियारों में पूछने वाला कोई नहीं रहा। कोई गॉडफादर नहीं मिला हमें। शायद मैं किसी काम नहीं आने वाला था। किसी ने हमपर दाँव नहीं लगाया। बार-बार ट्रान्सफर होता रहा।

मैं ऐसे तमाम लोगों को देखता रहता हूँ जिन्होंने मेरे साथ ही नौकरी शुरू की और देखते-देखते कहाँ से कहाँ पहुँच गये। बड़ी-बड़ी कोठियाँ खरीद लीं, कितने प्‍लॉट अपने घर-परिवार के नाम कर लिये, आलीशान कारें और विलासिता के तमाम साधन जुटा लिए। इनके आगे-पीछे प्रशंसकों और तीमारदारों की भीड़ लगी रहती है। तमाम लोग सेवा के लिए तत्पर रहते हैं। नौकरी में एक ही जगह लम्बे समय तक जमे रहे। किसी ने हटाने के लिए शिकायती चिठ्ठी नहीं लिखी। इनसे वे सभी लोग संतुष्ट और प्रसन्न रहे जो सत्ता के गलियारों में जाकर इनकी शिकायत कर सकते थे और नुकसान करा सकते थे। मुझमें यह कुशलता नहीं रही। मुझसे ऐसे लोग प्रायः नाराज ही रहे। सरकारी नियमों से डरा-सहमा सा मैं उनकी ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाने में चूक गया। बदले में मिली झूठी शिकायतें और सत्ता प्रतिष्ठान की उपेक्षा।

अबतक अपने मन को, अपने परिवार को और अपनी पत्‍नी को भी सफलता पूर्वक समझाता आया हूँ कि ग़लत तरीके से कमाया हुआ पैसा तमाम ग़लत रास्तों पर ले जाता है। ऐसे लोगों को अच्छी नींद नहीं आती। जीवन में वास्तविक सुख और आनन्द नहीं मिलता। भौतिक साधनों में अधिकतम की कोई सीमा नहीं होती। इसे और बढ़ाते जाने की लालसा लगातार बढ़ती ही जाती है। इसलिए हमें अपनी जरूरतों का न्यूनतम स्तर तय करना चाहिए और उनकी पूर्ति कर लेने भर से प्रसन्न रहना चाहिए। संतोष-धन को ही सबसे बड़ा धन मानना चाहिए।

लेकिन यह सारी समझाइश कभी-कभी मुझे ही डाउट में डाल देती है।

देखता हूँ उनकी पूजा होते हुए जो माल कमाने और खर्च करने में प्रवीण हैं। उनकी हाई-सोसायटी में तगड़ी पकड़ है। सत्ता के ऊँचे गलियारों में गहरी पैठ है। देखता हूँ उनके घर-परिवार वाले उनसे बहुत खुश हैं, रिश्तेदार उन्हें घेरे रहते हैं। वे शादी-ब्याह और अन्य पार्टियों में अलग से बुलाये जाते हैं। बच्‍चे उन्हें कुछ ज्यादा ही मिस करते हैं। वे उनकी सभी फरमाइशें पूरी कर सकते हैं इसलिए बहुत अच्छे पापा और लविंग-हस्बैंड हैं। वे उन्हें देश-दुनिया की सैर कराने ले जाते हैं, मॉल, पिकनिक, सिनेमा, शॉपिंग आदि पर खूब खर्च कर सकते हैं। शायद वे अपने लिए ज्यादा खुशियाँ भी खरीद पा रहे हैं। समाज में उनकी इज्‍जत कुछ ज्यादा ही है।

हमारे समाज का नजरिया क्या कुछ बदल नहीं गया है? एक बार मैंने अपने एक अधिकारी मित्र से अपने किसी दूर के परिचित की सिफारिश कर दी। परिचित का काम बिल्कुल सही था लेकिन उक्त अधिकारी ने बिना उचित और पर्याप्त सुविधा शुल्क के काम करने से मना कर दिया था। मैने सिफारिश करने से पहले उक्त अधिकारी से ही यह कन्फर्म भी कर लिया कि काम सोलहो आने सही है, इसमें कोई कानूनी बाधा नहीं है। लेकिन जब मैंने काम कर देने के लिए सिफारिश कर दी तो उन्होंने बड़ी विनम्रता से काम करने से मना कर दिया। बोले- भले ही यह काम सही है लेकिन यदि मैंने आपके कहने पर यह काम बिना पैसा लिए कर दिया तो मेरा नुकसान तो होगा ही; आपको भी बहुत दिक्‍कत पेश आएगी।

उनकी आखिरी बात से मैं उलझन में पड़ गया। मेरे चेहरे पर तैरती जिज्ञासा को भाँपकर उन्होंने स्थिति स्पष्ट कर दी - बात सिर्फ़ इस केस की नहीं है, डर इस बात का है कि यदि फील्ड में यह बात फैल गयी कि मैंने आपके कहने पर बिना पैसा लिए काम कर दिया तो लोग आगे भी आपको एप्रोच करने लगेंगे। मैं यह कत्तई नहीं चाहता कि यह मेसेज जाय कि मै बिना पैसा लिए भी काम कर सकता हूँ।

उनकी बात का लब्बो-लुआब यह था कि उन्होंने बड़ी मेहनत से यह ख्याति अर्जित की थी कि बिना पैसा लिए वे अपने बाप की भी नहीं सुनते। इस ख्याति के साथ कुर्सी पर जमे रहने के लिए उन्हें “ऊपर” काफी मैनेज भी करना पड़ता था इसलिए मेरी सिफारिश ठुकरा देना उनकी भयानक मजबूरी थी जिसका उन्हें खेद था।

अब ऐसे अधिकारियों की संख्या बढ़ती जा रही है जो अपना प्रोमोशन जानबूझकर रुकवा देते हैं क्योंकि प्रोमोशन वाले पद की अपेक्षा वर्तमान पद ज्यादा मालदार है। ऐसा करने के लिए वे बाकायदा अपनी एसीआर खराब करवा लेते हैं, जानबूझकर सस्पेंड हो लेते हैं, या प्रोमोशन प्रक्रिया में खामी ढूंढकर अदालत से स्टे करा लेते हैं। यह सब करते हुए इन्हें कभी कोई शर्म नहीं आती। यह सब बड़े ही आत्मविश्वास से किया जाता है। शायद अदालते इस खेल को समझ नहीं पाती हैं या कैंसर वहाँ भी फैल चुका है... पता नहीं।

धन की लूट में यदि यदा-कदा ट्रैप कर लिये जाँय, एफ़.आई.आर. हो जाय, जेल जाना पड़ जाय तो भी जमानत कराकर लौटने के बाद चेहरे पर कोई मायूसी या झेंप का भाव नहीं रहता। बड़े आराम से दिनचर्या वापस उसी पटरी पर लौट आती है। वही हनक दुबारा फैल जाती है और वही आत्मविश्वास फिर से लौट आता है।

राष्ट्रीय पटल पर बड़े-बड़े घोटाले और उनमें शामिल हाई-प्रोफाइल घोटालेबाजों को मुस्कराते देखते हुए हमारे समाज में अब इन्हें ऐसी स्वीकृति मिल चुकी है कि निचले स्तर पर कदम-कदम पर भ्रष्टाचार से सामना होने पर हम कतई विचलित नहीं होते। फिर इनका आत्मविश्वास तगड़ा क्यों न हो भाई...!

(Satyarthmitra सत्यार्थमित्र)  

सोमवार, 21 नवंबर 2011

राजा क्या करता है... घोटाला?

सप्ताहांत अवकाश था तो बच्चों के साथ थोड़ा समय बिताने का मौका मिला। वैसे तो मैं इस छुट्टी के दिन का सदुपयोग मन भर सो लेने के लिए करना चाहता हूँ लेकिन बच्चों की दुनिया सामने हो तो बाकी सबकुछ भूल सा जाता है। सत्यार्थ अभी अपना पाँचवाँ जन्मदिन मनाने वाले हैं लेकिन उनका खाली समय जिस प्रकार के कम्प्यूटरी खेलों में बीतता है उसे देखकर मुझे रा.वन, जी.वन और ‘रोबोट’ फिल्म के वशीकरण और चिट्टी के सपने आने लगते हैं। मुझे कभी-कभी चिन्ता होने लगती है कि इस जमाने की हवा कहीं उनका बचपन जल्दी ही न छीन ले। छोटी सी उम्र में इतनी बड़ी-बड़ी हाई-टेक बातें निकलती हैं; ऐसे-ऐसे एक्शन होते हैं कि मैं चकरा जाता हूँ।

मेरी कोशिश होती है कि उनका ध्यान टीवी के कार्टून चैनेल्स और कम्प्यूटर के ऑनलाइन गेम्स की दुनिया से बाहर खींचकर कुछ पारंपरिक और देशज खेलों की ओर ले जाऊँ। लेकिन लूडो और साँप सीढ़ी के खेल उन्हें बोर करते हैं। अब ‘मोनॉपली’ और ‘प्लॉट-फोर’ में वे बड़ों-बड़ों को हराने का आनंद लेते हैं। इसमें वे अपने दादा जी के साथ-साथ मुझे भी मात दे चुके हैं। अब अपने से छः साल बड़ी दीदी के साथ उसके स्तर के खेल पूरी निपुणता से खेलते हैं। कम्प्यूटर पर रोज नया गेम सर्च कर लेते हैं और घंटों ‘की-बोर्ड’ के माध्यम से उछल-कूद, मार-धाड़, लुका-छिपी और निशानेबाजी करते रहते हैं। इसके नुकसान से बचाने के लिए घर में कम्प्यूटर का समय सीमित करने के लिए नियम बनाने पड़े हैं।

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इस शनिवार मैंने टीवी और कम्प्यूटर बन्द रखा। इन्हें अपने पास बुलाया और दुनिया भर की बातें करने की कोशिश की। स्कूल का हाल-चाल पूछा। क्लास टीचर मै'म कैसी लगती हैं, कैसा पढ़ाती हैं, यह भी पूछ लिया। लेकिन ये मायूस थे। इनकी दीदी अपनी दोस्त के घर चली गयी थी। वह दोस्त जो बीमारी में स्कूल नहीं जा सकी थी और उसका क्लास वर्क पिछड़ गया था। वागीशा उसी की मदद के लिए कुछ घंटे इनसे दूर चली गयी थी; और ये बुरी तरह से बोर हो रहे थे। जब मैंने दूसरों की मदद करने को अच्छा काम बताया और इन्हें यह सब समझ पाने में ‘समर्थ’ होने के लिए प्रशंसा की और बधाई दी तो ये खुश हो गये। फिर बोले- तो ये तो बताओ, मैं अकेले कौन सा खेल खेलूँ?

मैंने कहा- मोनोएक्टिंग करिए। एकल अभिनय। थोड़े संकेत में ही ये समझ गये। डबल बेड पर खड़ा होकर सबसे पहले हनुमान जी की तरह हवा में गदा भाँजने लगे। फिर रोबोट फिल्म के चिट्टी की तरह मशीनी चाल चलने लगे। एक-एक कदम की सटीक नकल देखकर मैं हैरत में पड़ गया। मैं उन्हें यह खेल थमाकर वहीं एक किनारे लेट गया। ये तल्लीन होकर विविध पात्रों की एक्टिंग करने लगे।

इसी शृंखला में एक पात्र राजा का आया जो अपने अनुचर से तमाम फरमाइशें कर रहा था; और अनुचर अपने ‘आका’ के हुक्म की तामील कर रहा था। प्रत्येक संवाद पर पात्र की स्थिति के अनुसार स्थान परिवर्तन हो रहा था। राजा एक काल्पनिक सिंहासन से बोल रहा था और अनुचर नीचे घुटना टेककर बैठे हुए।

-सिपाही…
-हुक्म मेरे आका…
-जाओ मिठाई ले आओ…
-जो हुक्म मेरे आका…
-जाओ, बिस्कुट लाओ…
-जो हुक्म मेरे आका…
-जाओ, सेब लाओ…
-जो हुक्म मेरे आका…
-जाओ, मैगी लाओ…
-जो हुक्म मेरे आका…
-जाओ, चॉकलेट लाओ…
-जो हुक्म मेरे आका…
-जाओ, कुरकुरे लाओ…
-जो हुक्म मेरे आका…
-जाओ, एप्पल लाओ…
-जो हुक्म मेरे आका…
-जाओ, बनाना लाओ…
-जो हुक्म मेरे आका…
-जाओ, किंडर-जॉय लाओ…
-जो हुक्म मेरे आका…
-जाओ, ....

अब फरमाइशी सामग्री का नाम नहीं सूझ रहा था। इसलिए प्रवाह थमने लगा। मेरी भीतरी मुस्कान अब हँसी बनकर बाहर आने लगी थी। मैंने चुहल की- अरे राजा केवल खाता ही रहेगा कि कोई काम भी करेगा?

वे विस्मय छिपाते हुए पूरा आत्मविश्वास सहेजकर बोले- राजा क्या करता है? वह तो बस खाता-पीता और आराम ही करता है।

मैंने कहा- नहीं, ऐसी बात नहीं है। वह अपने राज्य में बड़े-बड़े काम करता है।

उन्होंने पूछा- राजा कौन से बड़े काम करता है?

मुझे मजाक सूझा, मैने कहा- ‘राजा’ बड़े-बड़े घोटाले करता है।

‘घोटाला’ शब्द उनके लिए बिल्कुल नया था। वे सोच में पड़ गये।

थोड़ी देर उधेड़-बुन करने के बाद  मुझसे ही पूछ लिया- डैडी, यह घोटाला कैसे किया जाता है?

अब झेंपने की बारी मेरी थी। कैसे समझाऊँ कि कैसे किया जाता है। वे घोटाला करने का अभिनय करने को उतावले थे। मेरी बात पकड़कर बैठ गये। “बताओ न डैडी....”

मैने समझाया- बेटा, जब देश का राजा जनता की मेहनत से कमाया हुआ पैसा हड़प लेता है और उसे जनता की भलाई के लिए खर्च नहीं करता है तो उसे घोटाला करना कहते हैं।

-हड़पने का मतलब क्या होता है?

-मतलब यह कि जो चीज अपनी नहीं है, दूसरे की है उसे जबरदस्ती ले लेना या चुरा लेना।

-अच्छा, तो अब मैं चला दूसरों का पैसा चुराने...

इसके बाद वे बिस्तर से कूदकर नीचे आये और एक काल्पनिक गठरी बगल में दबाए दौड़ते हुए बाहर भाग गये।

उफ़्फ़्‌, खेल-खेल में मैंने यह क्या सिखा दिया?

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)