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Tuesday, December 26, 2017

पाकिस्तान की विकलांग न्यायपालिका

पाकिस्तान के सबसे प्रतिष्ठित अखबार डॉन में छपे एक आलेख को पढ़कर मेरा मन दुखी हो गया। इस अभागे देश के नागरिक किस दुर्दशा के शिकार हैं यह जानकर मन काँप उठता है। भारत में रहते हुए हमने सरकार के तीन अंगो कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के बीच जो शक्ति-सन्तुलन देखा है उसकी तुलना में पाकिस्तान की भयावह स्थिति का दर्शन इस लेख में किया जा सकता है। स्तम्भकार बासिल नबी मलिक पाकिस्तान में कराची की एक वादकारी फर्म में कार्यरत हैं। मूल आलेख अंग्रेजी में है जिसका भावानुवाद यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ :-

judicial-Indपाकिस्तान में जो कुछ भी गलत हो रहा है उसके लिए यहाँ के न्यायाधीशों को दोषी ठहराना एक राष्ट्रीय खेल जैसा हो गया है। दुर्भाग्य से अभियोजन पक्ष के गलत व्यवहार, जाँच एजेन्सियों की ढीली-ढाली विवेचना और कानून में निहित कमजोरियों से लेकर कार्यपालिका की (अपराधियों से) दुरभि-सन्धि तक जो कुछ भी इस तन्त्र में गड़बड़ है उस सबके लिए पाकिस्तान के न्यायमूर्तियों को जिम्मेदार मान लिया जाता है।

न्यायाधीशों की ओर उंगली उठाने वाले यह भूल जाते हैं कि न्यायतंत्र के विशाल पहिए में न्यायाधीश सिर्फ़ एक तीली के समान हैं। इस विशाल तन्त्र में दूसरे अनेक भागीदार भी दाँव पर लगे हैं जिसमें कानून बनाने वाली विधायिका व उन्हें लागू कराने के लिए जिम्मेदार कार्यपालिका शामिल है; और हाँ, वे वकील साहब लोग तो हैं ही। इसके हर स्तर पर भयावह असफ़लता दिखायी देती है जिसका यह परिणाम है कि पूरे तन्त्र को ही लकवा मार गया है।

उदाहरण के लिए संघीय विधायिका (नेशनल असेम्बली) इस बात के लिए कुख्यात हो चुकी है कि यह (धार्मिक) अल्पसंख्यकों के साथ भेद-भाव बरतने वाले कानून ही बनाती है और जो भी उनकी आस्था है उसके अनुसार उन्हें जीवन निर्वाह करने के सभी अधिकारों से वंचित कर देती है। उसने ऐसे कानून पारित कर दिये हैं जो चुनाव लड़ने की योग्यता खो चुके नेताओं को भी किसी बड़ी पार्टी का अध्यक्ष बनने का अधिकार दे देता है। इसने ऐसे कलंकित कानून भी बना दिये हैं जो किसी हत्यारे द्वारा पीड़ित परिवार को रूपये देकर सजा से बच जाने की सुविधा देते हैं। कुछ राज्यों ने तो ऐसे कानून बना दिये हैं जिससे एक स्पष्ट राजनैतिक निष्ठा रखने वाले व्यक्ति को दुबारा सरकारी नौकरी में भी रखा जा सकता है जो पहले किसी अपकृत्य के सिद्ध होने के आधार पर पदच्युत किया जा चुका हो।

ऐसे में भले ही न्यायमूर्ति महोदय इन कानूनों से सहमत न हों लेकिन उन्हें इन कानूनों के अनुसार फैसला देना ही पड़ता है। यद्यपि उन्हें इन कानूनों के न्यायिक पुनरावलोकन का अधिकार है लेकिन इस अधिकार की अपनी सीमाएं भी हैं जो किसी न्यायाधीश को विधि-व्याख्याता के बजाय विधि-निर्माता की भूमिका निभाने से रोकती हैं।

एफ.आई.ए. (संघीय जाँच एजेन्सी) और एन.ए.बी. (राष्ट्रीय जवाबदेही ब्यूरो) जैसी अनुसन्धान संस्थाओं और यहाँ तक कि पुलिस की हालत भी अच्छी नहीं है। उनकी अयोग्यता का प्रमाण-पत्र स्वयं सुप्रीम कोर्ट दे चुका है। चाहे वह बेनजीर भुट्टो की हत्या के मामले में विवेचना के (अल्प) सामर्थ्य की बात हो, एन.ए.बी. द्वारा बड़ा माल बटोरने की लालच में अपनी दलीलों का मोलभाव करने में इसकी स्पष्ट अभिरुचि हो या इसके द्वारा आरोपी से अपराध  की फ़र्जी स्वीकारोक्ति हासिल कर लेने की कोशिश हो; ये संस्थाएं अपनी अयोग्यता या अपराधियों से साठ-गाँठ के कारण अभियोजन को नीचा दिखाने की दोषी हैं। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि अपर्याप्त सबूत के कारण न्यायाधीश आरोपी पक्ष को दोषमुक्त करने पर मजबूर हो जाते हैं।

इसके अलावा न्यायालय के फ़ैसलों को लागू कराने की जिम्मेदारी पुलिस व अन्य विधि-प्रवर्तन संस्थाओं की है। जब कोर्ट कोई फ़ैसला सुनाता है तो सरकार को उसे अनिवार्य रूप से लागू कराना चाहिए। न्यायपालिका के पास अपने फ़ैसलों को लागू कराने के लिए अपनी कोई प्रवर्तन शाखा नहीं होने के कारण उसे इसके लिए पूरी तरह कार्यपालिका पर निर्भर होना पड़ता है। यदि फ़ैसला लागू ही नहीं हो सकता तो इन आदेशों की शुचिता, न्यायपालिका की गरिमा, कानून के राज, और संस्थाओं के प्रति सम्मान में क्रमशः गिरावट आती जाएगी जिससे इसका उल्लंघन करने वालों का हौसला बढ़ता जाएगा और पीड़ित पक्ष हताश हो जाएगा।

दुर्भाग्य से (पाकिस्तान में) यही सब हो रहा है। आये दिन न्यायाधीश फ़ैसले सुनाते हैं – भू-माफ़िया के खिलाफ, धोखेबाज बिल्डरों के खिलाफ, कोर्ट के आदेशों की अवमानना करने वालों के खिलाफ़ और दूसरे बदमाशों के खिलाफ़। लेकिन, इन फ़ैसलों को लागू करने में प्रवर्तन एजेन्सी के सहयोग की कमी के कारण ये निष्प्रभावी हो जाते हैं या बहुत देर से लागू होने के कारण इन फ़ैसलों का उद्देश्य पूरा नहीं हो पाता।

इसके साथ ही यहाँ का वृहत्तर न्यायतन्त्र उन वकीलों के ऊपर पलता है जो न सिर्फ़ अपने मुवक्किल की पैरवी करते हैं बल्कि एक विरोधाभास के रूप में कोर्ट के भी अधिकारी होते हैं। किसी भी मुकदमें में सही कानूनी स्थिति तक पहुँचने के लिए कोर्ट की मदद करना और उसके फ़ैसले को अंगीकृत करना उनकी जिम्मेदारी होती है। इसके लिए उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे न्यायाधीश के सामने भली-भाँति अध्ययन करने के बाद सटीक कानूनी तर्क प्रस्तुत करें, अपने मुवक्किल को कानून का पालन करने की सीख और सलाह दें और यह भी कि यदि उनके या उनके मुवक्किल के खिलाफ़ कोई फ़ैसला हो जाता है तो उसे निष्फल करने की कोशिश न करें।

लेकिन सच्चाई इससे बिल्कुल अलग है। पाकिस्तान में वकील समुदाय के भीतर भाँति-भाँति के लोग पाये जाते हैं जिसमें वे भी शामिल हैं जो खुलेआम कानून के राज को धता बताने में (अपराधियों का) साथ देते रहते हैं। वे अपने मुवक्किल को कानून तोड़ने में मदद करके ऐसा कर सकते हैं, कोर्ट के समक्ष गलत प्रतिवेदन प्रस्तुत करके अपने मुवक्किल के लिए फ़ायदे का इन्तजाम कर सकते हैं, जमानत नहीं मिल पाने पर अपने मुवक्किल को न्यायालय-कक्ष से भाग जाने में मदद कर सकते हैं, अथवा मनमाफ़िक फ़ैसला पाने के लिए जज को डराने-धमकाने की चाल चल सकते हैं। यदि और कुछ नहीं तो वे अपने मुवक्किल को कोर्ट के आदेश की अवहेलना करने की सलाह ही दे सकते हैं, उनसे यह कह सकते हैं कि न्यायालय की अवमानना के दोष को बाद में एक माफ़ीनामा देकर खत्म किया जा सकता है।

संक्षेप में कहें तो वर्तमान न्याय-व्यवस्था की वर्तमान दुरवस्था के लिए केवल न्यायाधीशों को दोषी ठहराना उचित नहीं है। यदि न्यायपालिका को अधिक सुदृढ और शक्तिसम्पन्न बनाना है तो सभी पक्षों को साथ मिलकर काम करते हुए इन न्यायाधीशों का सहयोग और समर्थन करना होगा। इस प्रकार के तालमेल और ऐसी एकता के बिना पाकिस्तान में दूसरी सभी बातों की तरह ही ये न्यायाधीश भी जनता से सरोकार रखने वाले एक प्रभावी और न्यायपूर्ण तन्त्र की तलाश में धीरे-धीरे घिसटते हुए सैनिकों की एक अकेली पड़ गयी टुकड़ी की तरह इतिहास की गर्त में समा जाएंगे।

अनुवाद एवं प्रस्तुति : सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
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Sunday, October 8, 2017

जी.एस.टी. के भ्रष्टाचारी अवरोध

“साहब, यह काम हो ही नहीं पाएगा।” एक सप्ताह की प्रतीक्षा के बाद पधारे ठेकेदार ने कार्यालय में घुसते ही अपनी असमर्थता जाहिर कर दी।
अरे, आप जैसा होशियार और सक्षम ठेकेदार ऐसी बात कैसे कह सकता है? मैंने तो सुना है आप बहुत बड़े-बड़े ठेके लेकर सरकारी काम कराते रहते हैं। तमाम सरकारी बिल्डिंग्स और दूसरे निर्माण और साज-सज्जा के काम आपकी विशेषज्ञता मानी जाती है।
“वो बात ठीक है, लेकिन अब सरकारी काम करना बड़ा मुश्किल है। इस जी.एस.टी. ने सबकुछ बर्बाद कर दिया है। आप बिना रसीद मांगे कैश पेमेन्ट कर दीजिए तो एक दिन में ही आपका काम करा दूंगा। लेकिन आपको पक्की बिल चाहिए तो कोई तैयार नहीं होगा।” यह सुनकर मेरा सिर चकरा गया। यशवन्त सिन्हा ‘शल्य’ की बातें इसके बाद मीडिया में आयीं तो मेरे कान खड़े हो गये।
अब जी.एस.टी. पर मचे घमासान और छोटे दुकानदारों, व्यापारियों और ठेकेदारों की त्राहि-त्राहि देखकर मन चिन्तित हो गया है। बड़े उद्योगपति शायद ज्यादा परेशान नहीं हैं। उन्हें इस नयी व्यवस्था के साथ तालमेल बिठाने में शायद कोई बड़ी दिक्कत नहीं है। मैं कोई अर्थशास्त्री नहीं हूँ। मुझे इस योजना की बारीक बातों की अच्छी समझ नहीं है। इसलिए इसके पक्ष या विपक्ष में तनकर खड़ा होने के बजाय मैं धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करना चाहूंगा। इस बीच मैंने अपने कार्यालय में बैठकर जी.एस.टी. के प्रभाव का जो रोचक अनुभव किया है उसे साझा कर रहा हूँ।
हुआ ये कि नये शहर के नये कार्यालय में काम शुरू करने पर मुझे कुछ अवस्थापना सुविधाओं को अपने हिसाब से संशोधित परिवर्द्धित करने की आवश्यकता महसूस हुई। कंप्यूटर, इन्टरनेट, कुर्सी, टेबल-ग्लास, स्टेशनरी इत्यादि की व्यवस्था तो थोड़ी-बहुत जद्दोजहद से सुदृढ हो गयी लेकिन मेरे कार्यालय कक्ष से सटे हुए विश्राम-कक्ष को मन-माफ़िक बनाने में मुझे सफलता नहीं मिल रही है। दरअसल एक ही बड़े हाल में स्थित इस कक्ष को कार्यालय से अलग करने के लिए एल्यूमिनियम के ढांचे में काँच या फ़ाइवर की शीट लगाकर दीवार नुमा घेरा बनाया गया है जो अर्द्ध-पारदर्शी है। इस दीवार के जिस ओर प्रकाश अधिक रहता है वह दूसरी ओर से साफ़ दिखायी देता है। अधिक प्रकाशित हिस्से में बैठने वाला दूसरी ओर नहीं देख सकता जबकि उसे दूसरी ओर से देखा जा सकता है। इस प्रकार उत्पन्न असहज स्थिति से बचने के लिए पूरे घेरे पर कपड़े के पर्दे लटकाये गये हैं। लेकिन इन पर्दों पर धूल बहुत जल्दी-जल्दी जमा होती है जिसे साफ़ करते रहना बहुत टेढ़ा काम है। धूल से एलर्जी होने के कारण मुझे इनके संपर्क में आते ही लगातार छींकना पड़ जाता है और नाक से पानी आने लगता है।
धीरे-धीरे मेरे भीतर इन पर्दों के प्रति असहिष्णुता का भाव पैदा हो गया है। पर्दों के स्थान पर मैंने इस काँच की दीवार पर अपारदर्शी वाल-पेपर लगवाने का मन बनाया है लेकिन जी.एस.टी. की व्यवस्था ऐसा होने नहीं दे रही है। ठेकेदार कह रहा है कि कोई भी दुकानदार वाल-पेपर की बिक्री ‘एक-नम्बर’ में करने को तैयार नहीं है। अर्थात वह इस बिक्री को अपने लेखा-बही में प्रदर्शित नहीं करना चाहता क्योंकि इसके लिए जरूरी पंजीकरण कराने व ऑनलाइन टैक्स जमा करने की प्रक्रिया से वह जुड़ा ही नहीं है। उसके पास जो माल है वह भी बिना रसीद के ही खरीदा गया है। इसलिए उसे इसपर कोई इनपुट टैक्स-क्रेडिट नहीं मिलने वाला। उसने बताया कि इस प्रकार के बहुत से काम हैं जो पूरी तरह कैश लेन-देन पर ही चलते हैं जो अब जी.एस.टी. के बाद अवैध हो गये हैं। अब कोई ठेकेदार भी उन सामानों को नगद खरीदकर सप्लाई नहीं कर सकता क्योंकि वह अपने लेखे में इसकी खरीद दिखाये बिना इसकी बिक्री या आपूर्ति को जायज नहीं ठहरा सकता।
इस बात से मुझे व्यापारिक गतिविधियों में निचले स्तर पर होने वाली बड़े पैमाने की टैक्स-चोरी की एक झलक दिखायी दे गयी जिसपर लगाम लगाने का ठोस उपाय शायद इस जी.एस.टी. में ढूँढ लिया गया लगता है। यह उपाय कुछ वैसा ही है जैसा नोटबन्दी और डिजिटल लेन-देन के माध्यम से कालेधन पर लगाम लगाने का उपाय किया गया था और जिसे अब प्रायः असफ़ल मान लिया गया है। जिनके पास अघोषित आय का नगद धन मौजूद था वे इसे बचाने के लिए किसी न किसी प्रकार इसे अपने या दूसरों के बैंक खातों में जमा कराने में सफ़ल हो गये। नोटबन्दी के राजमार्ग के किनारे जो चालू खाते, पेट्रोल-पम्प, विद्युत-देय, अन्य शुल्क-टैक्स आदि जमा करने के काउन्टर और दो लाख की सीमा वाली छूट के सर्विस-लेन बना दिये गये थे उसपर जोरदार ट्रैफ़िक चल पड़ी और अधिकांश कालाधन बैंकों में जाकर मुख्यधारा में शामिल हुआ और सफ़ेद हो गया। ऐसे बिरले ही मूर्ख और गये-गुजरे धनपशु होंगे जो अपना पुराना नगद नोट बदलकर नया नहीं कर पाये होंगे। नोटबन्दी की आलोचना करने वाले भी यह नहीं कह पा रहे थे कि इसने आयकर की चोरी पर लगाम लगाकर अच्छा नहीं किया।

साभार : http://news24online.com/know-why-implementing-gst-is-still-a-long-road-ahead-2/

ऐसे में यह निष्कर्ष निकलता है कि भ्रष्टाचार मिटाने और शुचिता बढ़ाने की अच्छी से अच्छी योजना भी क्रियान्वयन के स्तर पर जाकर उसी भ्रष्टाचार और बेईमानी की भेंट चढ़ जाती है जिसे यह रोकने चली थी। उल्टे उसमें छोटे व गरीब वर्ग का जीवन-यापन बुरी तरह प्रभावित हो जाता है। दिहाड़ी मजदूर या कामगार तो दिन में जो कमाता है वही रात में खाता है। यदि किसी दिन उसका काम रुक गया तो शाम को फ़ांके की नौबत आ जाती है। यही हाल छोटे व्यापारियों और दुकानदारों का जी.एस.टी. के लागू होने के बाद हो गया लगता है। वे साफ़-साफ़ यह तो कह नहीं सकते कि अबतक उनका धन्धा टैक्स की चोरी के कारण चोखा हुआ करता था जो चोरी अब मुश्किल हो गयी है, लेकिन नयी व्यवस्था से उपजे दर्द को वे दूसरे तरीकों से व्यक्त तो कर ही रहे हैं।
हमारे समाज में भ्रष्टाचार का रोग इतना सर्वव्यापी हो गया है कि इसे बुरी चीज बताने वाले भी अवसर मिलते ही इसका अवगाहन करने में तनिक देर नहीं लगाते। जबतक हम केवल दूसरों से ईमानदारी और सत्यनिष्ठा की अपेक्षा करते रहेंगे और स्वयं मनसा-वाचा-कर्मणा इसके लाभ उठाने को उद्यत रहेंगे तबतक हम किसी नोटबन्दी, जी.एस.टी. या अन्य कड़े उपायों से भी अपेक्षित फ़ल की प्राप्ति नहीं कर सकते।
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

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Saturday, September 30, 2017

आज़मगढ़ के चौक पर

ऑफिस से पाँच बजे फुर्सत मिल गयी तो मन हुआ कि शहर में घूमा जाये। सुबह दैनिक जागरण के स्थानीय पृष्ठ पर खबर थी कि पूरा शहर दुर्गामय हो गया है। श्रद्धालु मंदिरों में उमड़ रहे हैं। चौक स्थित प्राचीन दक्षिणमुखी दुर्गा मंदिर में सबसे ज्यादा भक्त दर्शन के लिए आ रहे हैं। आजमगढ़ का मुख्य बाजार चौक नाम से जाना जाता है।
मैंने ड्राइवर को बुलाकर चौक चलने की योजना बतायी। सुनते ही वो चौक पड़ा। मुझे लगा ऑफिस का समय पूरा होते ही वह अपने घर की राह लेना चाहता था। ऐसे में मुझे उसकी जो परेशानी समझ मे आयी वह पूछने पर गलत निकली। उसने कहा - साहब, चौक में कैसे जा पाएंगे, वहाँ तो पैदल चलना मुश्किल है। ओहो, ये बात है! तब तुम घर जाओ - मेरे इतना कहते ही वह चौकड़ी भरता चला गया।
मुझे तो अब नवरात्र में देवी दर्शन की इच्छा पूरी करनी ही थी। पहली बार तो आजमगढ़ की सड़कों पर घूमने का भी मन बना था। मैंने अपने इलाहाबाद विश्वविद्यालय के सर गंगानाथ झा हॉस्टल के सह-अंतेवासी और स्थानीय मित्र देवदत्त पांडेय को फोन मिलाकर अपनी इच्छा जतायी। वे सहर्ष तैयार हो गये और थोड़ी देर बाद अपनी मोटरसाइकिल से हाज़िर भी हो गये। मैंने कहा कि इस नवरात्र के शुभ मौके पर देवी जी की जितनी किरपा बटोर ली जाय उतना ही अच्छा हो। जीन्स, टी-शर्ट और हवाई चप्पल में हम फर्राटा भरते सबसे पहले सबसे निकट के मंदिर में गये।
मंदिर के गेट पर बाइक खड़ी कर हम अंदर गये तो आरती चल रही थी। धूप, अगरबत्ती और कर्पूर से उठती विशिष्ट महक और धुँए के बीच दर्जनों नर-नारी जय अम्बे गौरी का सस्वर गायन करते हुए झूम रहे थे। छत से लटकते विशाल घंटों के लोलक को पकड़कर आगे-पीछे टकराते हुए टंकार की ध्वनि निकालती स्त्रियां और दूसरे भक्त मां की श्रद्धा और भक्ति में लीन थे। बाकी दर्शनार्थियों के हाथ प्रणाम की मुद्रा में जुड़े हुए अथवा ताली बजाते हुए व्यस्त थे। आरती समाप्त होने के बाद मूर्ति के सबसे पास खड़े दो पुजारी नुमा युवकों ने कोई और अस्फुट मंत्र वाचन प्रारंभ कर दिया। उनमें से एक जोर जोर से यंत्रवत घंटा बजाता जा रहा था। थोड़ी देर प्रतीक्षा के बाद भी भक्तगण टस से मस नहीं हुए तो हम दोनो ने उनके बीच से जगह बनाया और हाथ बढाकर माँ की वेदी को स्पर्श किया और अपनी श्रद्धा भेंट कर बाहर निकल आये। दुर्गा माँ के बायीं ओर सांई बाबा का मंदिर भी था और दायीं ओर क्रमशः शिवलिंग और हनुमान जी के मंदिर भी थे। हमने बारी-बारी से उन सबके सामने जाकर दर्शन किये और शीश नवाये। मंदिर के बाहर प्रसाद की दुकानों और भीख मांगते बच्चों और औरतों को नजरअंदाज करके हमने एक विकलांग भिखारी को कुछ सिक्के थमाये और चौक के मंदिर के लिए निकल पड़े।
चौक की सड़क ठेले-खोमचे और पटरी की दुकानों के अतिक्रमण और दुपहिया वाहनों की बेतरतीब पार्किंग के कारण बेहद संकरी हो गयी थी। आवागमन के लिए जो सड़क बची हुई थी उसपर पैदल, साइकिल, रिक्शा, और बाइक वाले रेंग-रेंगकर चल रहे थे। निश्चित ही वहाँ किसी चार पहिए वाले का निबाह नहीं था। डीडी ने भी एक पान वाले के सामने बाइक लगा दी और हम सड़क पार करके सामने स्थित मंदिर के छोटे से प्रांगण में प्रवेश कर गये। यहाँ आरती समाप्त हो चुकी थी और उसमें भाग लेने वाले भक्त लौट चुके थे। दुर्गा जी की दक्षिणमुखी प्रतिमा पूर्ण सृंगार में चमक रही थी। उनके पैर फूल-मालाओं और दूसरी चढ़ावे की सामग्रियों से ढंक चुके थे। प्रतिमा और दर्शनार्थियों के बीच में लोहे की एक रेलिंग थी जिसके उस पार दो पुजारिन स्त्रियाँ दायें-बायें बैठी हुई थीं। वे दोनो दर्शनार्थी भक्तों से चढ़ावे की सामग्री लेकर उसे प्रतिमा से स्पर्श कराती और रुपये-पैसे व फूल-माला यथास्थान चढ़ाकर प्रसाद वापस कर देतीं। ज्यादा भीड़ नहीं थी इसलिए हमने आराम से दर्शन किया।
पुजारिन ने हमारे चढ़ावे के नोट को उलट-पलटकर तीन बार देखा, फिर मेरी ओर भी नजर उठाकर देखा तब सन्तुष्ट होकर उसे गल्ले में मिला दिया। दरअसल प्रसाद वाले ने जब मुझे यह नोट दिया था तो मुझे भी हिचक हुई थी, इसीलिए मैंने उस नोट को आगे ले जाना ठीक नहीं समझा और उसका तत्काल उपयोग कर दिया था। मैंने रेलिंग के नीचे रखे पत्थर पर नारियल फोड़ा, घुटनों पर बैठकर वेदिका पर माथा टिकाया और सप्तश्लोकी दुर्गा व दुर्गाष्टोत्तरशतनाम का पाठ किया। हम जब प्रसाद लेकर मुड़े तो देखा यहाँ भी बजरंगबली बिराज रहे हैं। मंगलवार था इसलिए वहां भी भक्तों की भीड़ ठीकठाक थी।
जब हम मंदिर के गेट से सडकपर निकल रहे थे तो भिखारियों के झुंड ने घेर लिया था। अपने मित्र की देखादेखी मैंने भी इसकी तैयारी पहले से कर ली थी। अर्थात प्रसाद वाले से नोट के बदले कुछ सिक्के ले लिए थे। फिर भी सिक्कों की तुलना में उनकी संख्या इतनी अधिक थी और उनमें प्रतिद्वंद्विता इतनी आक्रामक थी कि मुझे सबसे दीन-हीन और विकलांग का चुनाव यहाँ भी करना पड़ा।
देवी दर्शन के बाद अब बारी बाजार घूमने की थी। डीडी ने कुछ खाने को पूछा। मैंने कहा अगर यहाँ कुछ स्पेशल मिलता हो तो खिलाओ। फिर हम सड़क किनारे लगी एक चाट की पुरानी दुकान पर पहुँचे। लकड़ी के ठेले पर सजी इस दुकान के नीचे नाली थी जो बह नहीं रही थी। ठेले पर अनेक छोटे-बड़े पात्र थे जिनमें चटपटी मसालेदार खाद्य सामग्री रखी होगी। चाट बनाने वाले महाशय भी वैसे ही स्थूलकाय थे जैसे उनका ठेला। वे ठेले के बीच में पाल्थी मारकर बैठे हुए थे और अपने सामने चूल्हे पर रखे भारी भरकम तवे पर चाट की सामग्री एक लोहे की खुरपी नुमा यंत्र से चला चलाकर तैयार कर रहे थी। अपने दायें बायें ऊपर नीचे रखे बर्तनों से अलग अलग स्वाद के मसाले, चटनियाँ और रस-गंध आदि निकालकर गरम तवे पर रखी मटर व आलू के साथ भूनते और दोने में रखकर पेश करते जाते।
हम थोड़ी देर से पहुंचे थे, या आज मेला घूमने वाले ज्यादा आ गये थे इसलिए हमें गोलगप्पे नहीं मिल सके। पूरा स्टॉक खत्म हो गया था। हमने मटर वाली चाट ली, केवल नमकीन वाली। दही और मीठी चटनी से परहेज करते हुए। पता चला कि इस नामचीन दुकान पर लहसुन-प्याज का प्रयोग नहीं होता है और तेल के बजाय शुद्ध देसी घी में ही सबकुछ बनता है।

हमने वहाँ से आगे बढ़कर एक दुकानपर रस-मलाई का आनंद भी लिया क्योंकि बकौल डीडी यह यहाँ की शानदार मिठाई की दुकान थी। सबसे अच्छी और प्रतिष्ठित। हमने यहां से नमकीन खुरमे का एक पैकेट भी लिया। अबतक काफी देर हो चुकी थी। कमरे पर लौटे तो थोड़ी देर में हॉस्टल के ही दूसरे मित्र अनूप भी सपरिवार आ गये। पति-पत्नी दोनो अध्यापक हैं जिनकी दो बच्चे थोड़े शर्मीले लेकिन बहुत प्यारे हैं। मेरे पास उन बच्चों की आवभगत के लिए कुछ था ही नहीं। बस चाय के साथ उन नमकीन खुरमों ने इज्ज़त रख ली। बतकही में काफी समय निकल गया। चपरासी ने जब खाने की याद दिलायी तो हम सबने एक दूसरे से विदा ली। इसप्रकार आजमगढ़ में एक अच्छे दिन का अंत हुआ।