पंडित सरस्वती पाण्डेय जी ने ही 1999 में मेरा विवाह संस्कार संपन्न कराया था। मैं आज अपने गांव में आया था तो 'ढेलर पंडी जी' अचानक अपने पुत्र के साथ आ गए। चर्चा के दौरान उन्होंने याद दिलाया कि मेरी बारात तीन दिन वाली थी। दूसरे दिन 'मरजाद' रहा। तीसरे दिन बारात विदा हुई थी। मरजाद के दिन जानवासे में "शिष्टाचार सभा" हुई थी। उस सभा में पंडी जी ने संस्कृत मंगलाचरण के बाद जो हिंदी में मंगल कामना सुनाई थी वह उन्हें 91 वर्ष की उम्र में आज भी याद थी। अनुरोध पर उन्होंने सहर्ष सुनाया।
सोमवार, 23 दिसंबर 2024
शनिवार, 23 नवंबर 2024
बुद्धिनाथ मिश्र जी का कालजयी गीत उनके ही स्वर में, मेरे घर में
एक सुखद संयोग बना जब मेरे भाग्य
से आदरणीय बुद्धिनाथ मिश्रा जी ट्रैफिक जाम में अटक गए और उनकी सहारनपुर से लखनऊ
की ट्रेन छूट गई। अगली ट्रेन कुछ घंटे बाद थी। मित्र मनीष कच्छल जी ने बताया तो
मैंने शाम की चाय पर उन्हें सानुरोध
आमंत्रित किया। साथ में कुछ और कविगण भी पधारे। एक अल्पकालिक कविगोष्ठी हो गयी।
शाम यादगार बन गई। कविश्रेष्ठ का कालजयी गीत बगल में बैठकर सुनने का आनंद ही कुछ
और था। "एक बार जाल और फेंक रे मछेरे..."
सोमवार, 18 नवंबर 2024
नई दिशा में साइकिल से सैर
आज लंबे अंतराल के बाद साइकिल_से_सैर का संयोग बना। मुझे "अति सर्वत्र वर्जयेत" के संदेश का
उल्लंघन करना भारी पड़ गया था। पिछली बार जब साइकिल लेकर निकला था तो आनंद के अति
उत्साह में तय सीमा से अधिक दूर तक चला गया। लौटकर आने के कुछ घंटों बाद रीढ़ की
सबसे निचली हड्डी (टेल-बोन) और आसपास की मांसपेशियों में दर्द महसूस होने लगा जो
रुक रुककर महीनों तंग करता रहा। मजबूरन मुझे साइकिल छोड़कर जमीन पर आना पड़ा।
योगासन, प्राणायाम, ध्यान की कक्षा के
बाद 30-40 मिनट जिम में बिताने की दिनचर्या बन गई।
आज हुआ ये कि जिम में पहुंचा तो
ट्रेनर महोदय नदारद थे। ऐसी स्थिति में अपनी डायरी देखकर खुद ही तय करना होता है
कि किस अंग की मांसपेशी पर वजन डालना है -- यथा पीठ, छाती, पेट, कंधा, बाहें, जंघा, पिंडली, एड़ी, कलाई आदि, और किस प्रकार के वजन से क्या और कितनी
क्रियाएं करनी हैं? इस सबका एक जटिल विधान है जिसे नए लड़के
शायद याद रख लेते होंगे लेकिन मैं इसे याद रखने की कोशिश भी नहीं करता। किसी सुजान
ने सबकुछ डायरी में लिखने की सलाह दी थी जिसका पूरी तरह पालन करता हूं। लेकिन आज
मुझे डायरी खोलने का मन नहीं हुआ। ठंडे मौसम की आमद और सोमवार के कारण जिम में
भीड़ भी बहुत थी। मन हुआ कि आज एक बार फिर से साइकिल से सैर की जाय। मैं फौरन बाहर
निकला और मुख्य सड़क से पुंवारका गांव की ओर
चल पड़ा।
गांव में मुख्य सड़क एक नहर को
काटती हुई सहारनपुर की ओर चली जाती है। इसी नहर की पटरी पर एक पक्की सड़क निकलती
हुई दिखाई दी तो मैने मुख्य सड़क छोड़कर साइकिल उस ओर मोड़ ली। आज किसी नई सड़क पर
जाने का मन था। यह ग्रामीण सड़क सुंदलहेड़ी गांव की ओर जाती है। सड़क के दोनों ओर
समतल उपजाऊ खेतों की छटा दिखी। अधिकांश में धान की कटाई की जा चुकी थी और गेहूं
बोए जाने का काम प्रगति पर था। कुछ खेतों में तो गेहूं के पौधे उग भी आए थे। वही
कुछ खेतों में अभी धान की पराली खड़ी थी। एक खेत में पराली जलाकर छोड़ी हुई थी।
कुछ खेतों में गन्ने की फसल तैयार खड़ी थी। खेती-किसानी के काम में मौसम और मिट्टी
की गुणवत्ता के साथ - साथ किसान की
कर्मठता,
निजी प्रयास और मजदूरों की उपलब्धता की बहुत बड़ी भूमिका है।
अगल-बगल के दो खेतों की फसल की तुलना करने पर इसका स्पष्ट अंतर समझ में आता है।
बहरहाल मैं खेतों और उनकी मेड़ पर
करीने से लगे पॉपलर के पेड़ों की छटा देखते देखते सुंदलहेड़ी गांव को पार करते हुए
दूसरी छोर पर पहुंच गया। कुल 35 मिनट का टाइम सेट कर चुका था जिसमें 20 मिनट बीत
गए थे। मैं वापस मुड़कर गांव के बीच से होता हुआ लौटने लगा। गांव के लोग सुबह की
बेला में सड़क पर ही टहलते मिले। प्रायः सबके हाथ में मोबाइल था और हर दूसरा
व्यक्ति मोबाइल पर सक्रिय था। फोनकॉल, चैटिंग, व्हाट्सएप, रील, फेसबुक,
गेम आदि क्या - क्या नहीं है जो आपका स्क्रीन टाइम बढ़ाता ही जा रहा
है।
गांव के प्रायः सभी मकान पक्के थे।
गांव में किराने के साथ साथ मोबाइल रिचार्ज व एक्सेसरी की दुकानें थीं और एक जनसेवा केंद्र भी था।
पंचायत भवन पर प्रधान पुष्पा देवी और सचिव का नाम लिखा हुआ था। मुख्य सड़क पर ही
प्रधान जी की भव्य कोठी भी आकर्षित कर रही थी। इसे रंगीन कपड़ों की लंबी झालर से
सजाया गया था जो संकेत कर रहा था कि किसी विशेष उत्सव का आयोजन होने वाला है या
हाल ही में हो चुका है।
कई व्यक्ति मुझ जैसे एक अपरिचित को
वहां साइकिल पर देखकर आश्चर्य और कौतूहल से लगभग घूरते हुए अपनी नजरों से ही पीछा
करते दिखे। लेकिन किसी ने टोका नहीं तो मैं भी सिर झुकाए गांव से बाहर निकल आया।
अबतक मोबाइल कैमरा निकालने का विचार कई बार सिर उठा चुका था जिसे मैं दबाता रहा
था। लेकिन अंततः जब गांव से स्कूल के लिए निकल रहे बच्चों का क्रम शुरू हुआ तो
मुझे इस दृश्य ने मोह लिया। पुंवारका में हमारा विश्वविद्यालय तो अभी खुला है
लेकिन यहां नर्सरी स्कूल से लेकर डिग्री कॉलेज तक
बहुत पहले से स्थापित है। वे बच्चे श्री मंगल सिंह मेमोरियल इंटर कॉलेज
पुंवारका की ओर जा रहे थे जिसका मुख्य द्वार नहर की पटरी पर ही है।
कुछ बच्चे पैदल निकले थे जो पीछे
मुड़ मुड़कर किसी संभावित लिफ्ट की तलाश कर रहे थे। मेरे सामने ही एक बाइक वाले को
रोककर दो बच्चे बैठ गए। तीसरा बच्चा हे! हे! की पुकार करता रहा कि उसे क्यों छोड़
दिया। लेकिन बाइक वाला यह बड़बड़ाते हुए चलता बना कि अगली सवारी/ लिफ्ट की
प्रतीक्षा करो। कुछ लड़के और लड़कियां अपनी साइकिल से भी जा रही थीं। एक स्कूटी पर
फर्राटे भरती लड़की कदाचित् अपने छोटे भाई को बिठाकर जा रही थी।
कुछ लड़कियां समूह में पैदल जा रही
थीं लेकिन उन्हें किसी लिफ्ट की तलाश नहीं थीं। प्रायः सिर झुकाए या आपस में बात
करती,
किसी अपरिचित से निगाहें बचाती अपना बस्ता सम्हाले चली जा रही थीं।
यह अंतर प्रकृति प्रदत्त लिंग भेद है या समाज द्वारा सृजित स्वाभाविक व्यवहार है?
इसका निर्णय आप पर छोड़ता हूँ।
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
गुरुवार, 14 नवंबर 2024
प्रवृत्ति और निवृत्ति
व्यक्तित्व के गुणों और दुर्गुणों का अच्छा विश्लेषण है। समझने और अनुसरण करने लायक। प्रवृत्ति और निवृत्ति के अवयव।
आलस्य नष्ट करे महत्वाकांक्षा को, गुस्सा नष्ट करे बुद्धिमानी को, भय नष्ट करे सपनों को, अहंकार नष्ट करे उन्नति को, ईर्ष्या नष्ट करे शांति को, संदेह नष्ट करे विश्वास को। इसे उल्टा करके पढ़ें तो भी उतना ही सही है। अब आप तय करें कि आप क्या धारण करना चाहते हैं।
मेरी कोशिश है कि आलस्य, गुस्सा, भय, अहंकार, ईर्ष्या, संदेह आदि का परित्याग करूँ और महत्वाकांक्षा, बुद्धिमानी, सपने, उन्नति, शांति और विश्वास का वरण करके जीवन को सफल बनाऊँ।
गुरुवार, 7 नवंबर 2024
सहारनपुर में छठ पूजा
पूर्वांचल का छठ महापर्व अब अखिल भारतीय स्वरूप ले चुका है। सात समुंदर पार भी डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य देने का अनुष्ठान देखा जा सकता है। सुदूर पश्चिम सहारनपुर में भी यहां गठित पूर्वांचल सांस्कृतिक सभा ने एक भव्य आयोजन किया। मुझे भी सौभाग्य मिला इस प्रकृति के सामीप्य को रेखांकित करने वाली शक्ति की पूजा में सम्मिलित होने का। जय जय छठ मैया! आप सबका कल्याण करें।
गुरुवार, 31 अक्टूबर 2024
लोहिया पार्क लखनऊ में योगासन प्राणायाम
आज लोहिया पार्क लखनऊ के हरे -भरे वातावरण में प्रातः काल के धुंधलके में पहुंच गया था। आसन बिछाकर ऑनलाइन योगकक्षा से जुड़ गया। कक्षा तो सात चक्रों के संतुलन संबंधी आसनों और उनके जागरण की मुद्राओं की थी। किंतु यहां की मनोरम छटा में कुछ नियमित आसन लगने का लोभ संवरण न कर सका। कुछ झलकियां आपके लिए।
मंगलवार, 15 अक्टूबर 2024
कुल्लू दशहरा का अद्भुत मेला
#कुल्लू_दशहरा एक ऐसा विशिष्ट त्यौहार है जिसे हर भारतीय को एक बार जरूर देखना
चाहिए। देवभूमि हिमाचल के विभिन्न पर्वतों कन्दराओं में विराजे प्रायः समस्त देवी
देवता अपना मूल स्थान छोड़कर सजी-धजी पालकी में बैठकर इस दिन कुल्लू के रघुनाथ जी
से भेंट करने आते हैं। मनाली के अत्यंत प्राचीन मंदिर से देवी हिडिंबा भी पधारती
हैं जो यहाँ के राजपरिवार की अतिथि होती हैं। सामने के पर्वत शिखर से बिजली महादेव
भी होते हैं।
रघुनाथ जी स्वयं अपने स्थायी मंदिर
से निकलकर कुल्लू नगर के एक बड़े मैदान में आ विराजते हैं। कुल्लू के ऊंचे पर्वत
शिखर पर निवास करने वाली भेखली देवी अपने स्थान से झण्डा दिखाकर कार्यक्रम प्रारंभ
करने की अनुमति देती हैं। इस दिव्य और भव्य भेंट के बाद कुल्लू के राजपरिवार व
भक्त नागरिकों द्वारा श्री रघुनाथ जी का रथ खींचकर उस अस्थायी शिविर में ले जाया
जाता है जहां वे सभी देवी-देवताओं के साथ अगले एक सप्ताह तक कैम्प करते हैं।
पूरे सात दिनों के मेले में एक ही
स्थान पर सभी देवी-देवता अपनी-अपनी कुटिया (टेंट) में वैसे ही पूजा और दर्शन के
लिए उपलब्ध होते हैं जैसे अपने मूल स्थान के मंदिरों में। मुख्य शिविर श्री रघुनाथ
जी का होता है जहां उपस्थित दर्शनार्थियों के समक्ष उन्हें स्नान कराकर विधिवत्
शृंगार पूजन और आरती का कार्य पूरी श्रद्धा और भक्ति से किया जाता है। पूरे मेले
में ढोल,
मृदंग, नगाड़े और सिंगा की आवाज अद्भुत वातावरण
उत्पन्न करती है।
ऐसी मान्यता है कि श्री रघुनाथ जी
के रथ की रस्सी पकड़कर उसे खींचने का सौभाग्य जिन्हें मिल जाता है उनकी समस्त
मनोकामना पूरी हो जाती है। उस रस्सी को छू लेने भर से सभी कष्ट दूर हो जाते हैं।
उस दृश्य को साक्षात् देख लेने से भी प्रभु की कृपा बरस जाती है।
इस अद्भुत समागम को सपरिवार निकट
से देखने का सौभाग्य इस बार मुझे भी मिला। श्रद्धा और भक्ति का जनसमुद्र इतना
अनुशासित और विनम्र भी हो सकता है यह मैंने हिमाचल में ही देखा। अहोभाग्य।
मंगलवार, 8 अक्टूबर 2024
परिवार के बुजुर्गों की देखभाल - स्कन्द का आलेख
मेरे मित्र Dr Skand Shukla ने पिछले दिनों एक संवेदनशील व संस्कारित पुत्र के रूप में अपनी
जिम्मेदारी का निर्वहन करते हुए जो अनुभव बटोरे उसे लिपिबद्ध किया। प्रतिष्ठित
अंग्रेजी अखबार 'द हिन्दू' ने उसे
प्रकाशित किया। एक महत्वपूर्ण विषय पर इस जरूरी लेख का लाभ वृहत्तर समाज को मिल
सके इसके लिए मैंने उसका हिन्दी भावानुवाद करने का प्रयास किया है। (हूबहू मशीनी
अनुवाद तो गूगल महाराज कर ही रहे हैं।) इसपर आपके निजी विचार आमंत्रित हैं।
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माता-पिता का पालन-पोषण
.................................................
वो रातों की नींद गायब होना, डायपर पर नजर रखना, गीला हो जाने पर उन्हें बदलना, नेबुलाइज करना,
विषम समय में दवाएं देना, देह की असहज अवस्था
में सहारा देना, जो लोग इस प्रकार के अनुभव से गुजर चुके हैं
उनके ब्यौरे से तुलना करना... यह सब लगभग बीस साल बाद वापस आ गया है। हम दोनो
अर्थात् मेरी पत्नी और मैं, एक बार फिर माता-पिता होने का अनुभव कर रहे हैं; लेकिन
इस बार हमारा पाल्य कोई बच्चा नहीं बल्कि हमारे माता-पिता में से एक है। यह है तो
उसी तरह का लेकिन बहुत अलग सा भी है।
बार्ड ने 'एज़
यू लाइक इट' में लिखा है कि बूढ़ी उम्र 'दूसरा बचपना और महज एक विस्मृति' है - 'मुंह में दांत नहीं, आंखों में रोशनी नहीं, जीभ में स्वाद नहीं, प्रायः कुछ भी नहीं'। सोते समय जब वे पहलू बदलते हैं, या हिलते-डुलते
हैं तो उनकी नाजुक चमड़ी पर बिस्तर की चादर का खुरदरापन भी घाव पैदा कर सकता है,
सामान्य तरीके से मुंह खोलने के लिए कहने पर भी उन्हें यह समझने में
समय लगता है, पतली खिचड़ी या अन्य पके हुए खाने का निवाला भी
चबाकर निगलने का शऊर भूल गए लगते हैं। स्मृति लोप का शिकार हो जाने के कारण इनकी
असहाय आँखें सूनी सी हो जाती हैं। जब इनका मन चिड़चिड़ा हो जाता है तो कोई भी बात
सुनने, और जवाब देने या बात मानने से साफ इनकार कर देते है।
ऐसे में मन एक बच्चे की छवि के बारे में सोचने ही लगता है।
वैसे अपने आप को यह विश्वास दिलाना
बहुत मुश्किल होता है कि भले ही वे हमसे बहुत बड़े हैं लेकिन वस्तुतः हम एक बच्चे
के साथ ही जूझ रहे हैं। हम अभी भी उन्हें एक मजबूत व्यक्ति समझ रहे होते हैं
क्योंकि हमें बचपन से इसकी आदत होती है। यह स्वीकार करना कठिन महसूस होता है कि वे
अचानक कमजोर हो गए हैं। यह भूलना बहुत मुश्किल है कि कुछ समय पहले तक आप हर चीज़
के लिए उनकी सलाह पर आश्रित थे। उनकी आवाज़ में एक अधिकार था। आप अभी हाल तक अक्सर
उनके मार्गदर्शन के लिए उनकी ओर देखते थे, जबकि आप दुनिया के लिए एक
बड़े आदमी बन चुके होते है।
यदि आपका बच्चा कुछ आपकी इच्छा के
अनुसार नहीं कर रहा है तो आप उसपर चिल्ला सकते हैं और उस पर गुस्सा निकाल सकते हैं, लेकिन
यहाँ आप चिल्ला भी नहीं सकते; बिल्कुल भी नहीं। वे जिद पर
अड़े रहें तो आपको उन्हें बहुत प्यार और मनुहार से मनाना होगा। एक बच्चे की तुलना
में उनका शरीर बहुत बड़ा और भारी भी होता है। आप एक बच्चे को आसानी से उठाकर नहला
सकते हैं, कपड़े बदल सकते हैं, लेकिन
बुजुर्गों के मामले में उन्हें उठाना-बिठाना और स्थिर बनाए रखना अपने आप में एक
बड़ा काम है।
आजकल जब मैं इस अनुभव से गुज़र रहा
हूं तो अपने देश में बुजुर्गों की चिकित्सीय देख-भाल की व्यापक तस्वीर पर भी
चिंतन-मनन कर रहा हूँ।
यद्यपि भारत में युवाओं की संख्या
सबसे अधिक है, लोगों की उम्र बढ़ने की गति तेजी से बढ़ रही है।
यूएनएफपीए की रिपोर्ट के अनुसार 60 वर्ष और उससे अधिक आयु की वर्तमान बुजुर्ग
आबादी 15.3 करोड़ है जो 2050 तक 34.7 करोड़ तक पहुंचने की संभावना है। जैसे-जैसे
जन्म दर कम हो रही है और जीवन प्रत्याशा बढ़ रही है, बुजुर्गों
की संख्या बढ़ना निश्चित है। लेकिन हमारे पास इस विशाल जनसंख्या को ठीक से
सम्हालने के लिए समुचित व्यवस्था नहीं है।
यह स्पष्ट दिखता है कि बुजुर्गों
के लिए विशेषज्ञ चिकित्सा सहायता प्रणाली उपलब्ध ही नहीं है। यहाँ बालरोग विशेषज्ञ
तो बहुतायत में हैं लेकिन बड़े शहरों में भी जरारोग विशेषज्ञ प्रायः नहीं के बराबर
हैं। हमारे देश के मेडिकल कॉलेजों में वृद्धावस्था विभाग दुर्लभप्राय हैं। लोगों
में यह समझ ही नहीं है कि बुजुर्ग और वयस्क एक जैसे नहीं होते; बल्कि
इनमें उतना ही अंतर हैं, जितना एक बच्चे और एक वयस्क में
होता है।
आजकल एकल परिवार का चलन बढ़ गया है, और
बच्चों का कामकाज के लिए घर से दूर जाना घर के बुजुर्गों को असहाय सा बना दे रहा
है। ऐसे में उनका मानसिक स्वास्थ्य गड़बड़ होने और इससे संबंधित बीमारियों की
संभावना बढ़ती जा रही है। पार्किंसंस और अल्जाइमर जैसी बीमारियाँ बुजुर्गों में
बहुत आम होती जा रही हैं लेकिन लोगों को आम तौर पर इनके बारे में पता ही नहीं
होता।
वास्तविकता के धरातल पर, विशेष
रूप से शहरी क्षेत्रों में बुजुर्गों के लिए ऐसा कोई सामाजिक संबल अस्तित्व में
नहीं है जहां वे अपनी भावनात्मक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिकता
की जरूरतों को पूरा कर सकें। सामाजिक
मेलजोल की आवश्यकता बहुत प्रबल होती है। मुझे याद है मेरे पिताजी हर महीने की पहली
तारीख को पैसे निकालने के लिए नहीं, बल्कि अपने सेवानिवृत्त
पूर्व सहयोगियों से मिलने के लिए बैंक जाना चाहते थे।
हम सबकी उम्र बढ़ रही है और ज्यादा
लंबा समय नहीं है जब हम स्वयं उस स्थिति में होंगे जिस स्थिति में आज हमारे
माता-पिता हैं। यह इस समय की पुकार है कि हमारा समाज और हमारा पूरा तंत्र अपने
बुजुर्ग नागरिकों के बारे में चिंता करे। कहीं ऐसा न हो कि यीट्स की कविता 'सेलिंग
टू बाइजेन्टियम' (यद्यपि एक अलग संदर्भ में लिखी गई थी) की
प्रारंभिक पंक्ति हमारे दिमाग में गूंजती रहे – ‘That is no country for
old men’ (बूढ़ों के लिए कोई देश नहीं है।)
डॉ स्कन्द शुक्ल.
मूल आलेख का लिंक (इसे क्लिक करें)
शनिवार, 14 सितंबर 2024
हिंदी को कामकाजी बनाएं
हिंदी भाषा को साहित्य के सभागार
के बाहर निकलकर, मनोरंजन के मंच से नीचे उतरकर और राजनीति के रण को पीछे
छोड़कर व्यावहारिक जीवन के लिए उपयोगी ज्ञान, विज्ञान और
कामकाजी संचार का वाहक बनना होगा तभी इसे सच्ची प्रतिष्ठा मिल सकेगी। आज आवश्यक है
कि मात्र कविता, कहानी, गीत, चुटकुलों और गोष्ठियों की भाषा से अधिक हिंदी का प्रयोग उच्च शिक्षा के
विविध पाठ्यक्रमों हेतु मौलिक विषय-वस्तु तैयार करने में, वाणिज्य,
उद्योग व व्यवसाय का संचालन करने में तथा सरकारी कार्यालयों से लेकर
उच्च व सर्वोच्च न्यायालय के कार्यों को निष्पादित करने में सहजता से हो सके इसके
लिए गंभीर प्रयास किए जाएं। अभी इन सभी प्रतिष्ठानों में अंग्रेजी की प्रधानता है।
एक विद्वान प्रोफ़ेसर, प्रतिष्ठित
वैज्ञानिक, एक सफल वकील, चार्टर्ड
एकाउंटेंट, बैंकर, उच्च पदस्थ नौकरशाह,
कॉर्पोरेट प्रबंधक और ऐसे अन्यान्य पेशेवर कार्य हिंदी की परिधि से
अभी भी प्रायः बाहर ही हैं। हिंदुस्तान की आजादी के अमृतकाल में भी अच्छी नौकरी
पाने और इसे ठीक से निभाने के लिए अंग्रेजी के प्रयोग में कुशलता को प्रायः
अनिवार्य मान लिया गया है।
रोजगार के मोर्चे पर हिंदी भाषा के
अच्छे जानकार भी हीनता ग्रंथि के शिकार हो जाते हैं। संघ लोक सेवा आयोग की
प्रतिष्ठित परीक्षा के परिणाम भी इस ओर संकेत करते हैं। दूसरी तरफ हम देखते हैं कि
देश की विशाल जनसंख्या में हिंदीभाषी ही सर्वाधिक हैं। इन्हें वृहद उपभोक्ता के
रूप में देखने वाली कंपनियां अपने उत्पादों के प्रचार-प्रसार के लिए लुभावने
विज्ञापन हिंदी में ही देती हैं। उत्पाद की पैकेजिंग भी हिंदी में करती हैं। टीवी
पर हिंदी चैनलों की टीआरपी अंग्रेजी वालों से बहुत आगे है। हिंदी अखबारों का
प्रसार भी अंग्रेजी से अधिक है। लेकिन इन सबका कार्यालय व व्यवसाय अंग्रेजी के
माध्यम से चलता है। हिंदी की पैठ वहाँ भी क्यों नहीं हो सकती?
निश्चित ही हिंदी के उन्नयन की
संभावना अपार है। हिंदी का भला चाहने वाले यदि इसके सामर्थ्य को बढ़ाकर इसे वास्तव
में कामकाज की भाषा बना सकें तो यही हिंदी की सच्ची सेवा होगी।
सभी हिन्दी प्रेमियों को ढेरों
बधाई और हार्दिक शुभकामनाएँ। 🎉💐💕
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी) वित्त
अधिकारी,
मां शाकुम्भरी विश्वविद्यालय सहारनपुर
मंगलवार, 10 सितंबर 2024
हिंदुस्तान ने मेरे गाँव जवार को पढ़वाई मेरी खबर
माँ शाकुंभरी की कृपा ऐसी हुई कि
मुझ अकिंचन को सहारनपुर के इस विश्वविद्यालय में सेवा करने का आदेश मिला। एक नव
स्थापित विश्वविद्यालय के लिए बहुत कुछ पहली बार हो रहा था। मुझे उस सबका साक्षी
बनते हुए उसमें कुछ योगदान करने का भी अवसर मिला। देवी की कृपा से कुलगीत की रचना
हुई जिसके लिए महामहिम राज्यपाल से प्रशस्ति-पत्र और नकद पुरस्कार की प्राप्ति हुई। इस
सौभाग्य के क्षण का समाचार यहाँ से लगभग 1000 किलोमीटर दूर मेरे पैतृक गाँव जनपद
कुशीनगर में पहुँचने वाले अखबार में भी छप गया। अब मन बल्लियों उछल रहा है।
गुरुवार, 5 सितंबर 2024
महामहिम ने कुलगीत के लिए दिया सम्मान
आज शिक्षक दिवस को ही माँ शाकुंभरी
विश्वविद्यालय का दूसरा दीक्षांत समारोह भी था। इस अवसर पर मेधावी बच्चों को मेडल
देने महामहिम राज्यपाल और हमारी कुलाधिपति सहारनपुर पधारीं। मेरे द्वारा रचे हुए
कुलगीत की रचना के लिए प्रशस्ति-पत्र पर हस्ताक्षर तो 22 फरवरी 2024 को हो गए थे
लेकिन धूमधाम से मंच पर उनके हाथों से इसे ग्रहण करने का सौभाग्य आज ही मिला।। साथ
में पुरस्कार राशि का चेक तो सोने में सुहागा ही हो गया।
आपसब की बधाइयों के लिए अग्रिम
धन्यवाद। ,🙏🏻🎉💐
इस कुलगीत का आनंद लेने के लिए
लिंक ये रहा –
https://youtu.be/ooR8QIkvgKw?feature=shared
रविवार, 14 जुलाई 2024
बाग में टपके आम बीनने का मजा
मेरे मित्र प्रोफेसर संदीप गुप्ता पिछले
दिनों अपने बाग के आम लेकर आए थे। उनके साथ मैं पहले बाग देखकर आया था लेकिन तब आम
कच्चे थे। बरौली से 2 किलोमीटर पहले सड़क से लगभग लगा हुआ उनका बाग है।
विश्वविद्यालय परिसर से बरौली 12 किलोमीटर है। इस प्रकार #साइकिल_से_सैर के लिए मैंने वहां जाकर आने का आज का लक्ष्य
20 किलोमीटर निर्धारित किया था।
वैसे तो मैं उनके साथ कार से जा
चुका हूं लेकिन आज साइकिल से वहां पहुंचने की कोशिश में भटक गया। झिझौली गांव के
आगे "बरौली 2 किमी" का माइलस्टोन आया तो मैं उस कच्ची सड़क के मोड़ को
तलाशने लगा जो उनके बाग में जाती है। लेकिन वह चकरोड मिली ही नहीं। लगभग 1 किमी
आगे जो कच्ची सड़क मिली वह मुझे किसी दूसरे बाग में ले गई। वहां एक पेड़ के नीचे
बहुत से आम टपके हुए पड़े थे। मैने दो चार बड़े - बड़े आम उठा लिए। पक्के दशहरी
थे। एक तरफ हल्के पीले या धानी झलक के साथ प्रायः हरे रंग के। मैने चारो ओर दृष्टि
दौड़ायी ताकि इस बाग के रखवाले को देख सकूं और उसकी सहमति से कुछ आम इकठ्ठे कर
उसका मूल्य चुका सकूं। लेकिन दूर - दूर तक रखवाला नहीं दिखा। मैने आम वहीं पर छोड़
दिए। तभी एक लड़का सड़क पर जाता दिखाई दिया। उससे पूछने पर पता चला कि मुख्य सड़क
की ओर शायद रखवाला मिल जाय। उसने कहा कि आप ये आम अभी लेकर उधर जा सकते हैं।
मैंने संकोच त्यागकर आम झोली में
रखे और मुख्य सड़क पर आ गया और बाग के भीतर झांकता रहा। तभी रखवाले की बरसाती दिखी
जहां एक साइकिल खड़ी थी। मैने अपनी साइकिल उस पगडंडी पर उतार दी जो उस ठीहे पर
जाती थी। दूर एक पेड़ के नीचे आम बीनता रखवाला दिख गया। मैने उसके पास जाकर उसे
पूरी बात बताई और कुछ और आम खरीदने की इच्छा व्यक्त की। उसने कुछ लंगड़ा आम इकठ्ठा
कर रखे थे। उसे देते हुए बोला कि यह सब ले जाइए। लेकिन पैसा नहीं लूंगा। मालिक अभी
हैं नहीं। मैने उसे चाय पानी के लिए कहकर यथोचित धनराशि जबर्दस्ती थमायी और वापस
लौट पड़ा।
रास्ते में दोनो तरफ आम के बाग ही
बाग पड़ते हैं। दशहरी, मालदा और लंगड़ा की जबरदस्त पैदावार हुई
है। लेकिन मैं देसी आम तलाश रहा था। पेट्रोल पंप के आगे बढ़ा तो वह बाग मिला जहां
मैं एक बार पहले भी आ चुका था। तब देसी आम तैयार नहीं थे। इस बार पूछने पर ठेकेदार
ने झट डेगची उठाई और देसी आम बीनने चल पड़े। मैंने भी साइकिल खड़ी की और उसके पीछे
चल दिया। पूरे बाग में आम टपके पड़े थे। लेकिन वो एक खास देसी प्रजाति के पेड़ के
नीचे रुके। पेड़ से टपके इतने ताजे आमों को देखकर मैं अपना लोभ संवरण नहीं कर सका।
देसी आम के अलावा मैने दो चार दशहरी, मालदा और लंगड़ा भी उठा
लिए।
डेगची भरकर हम दोनो वापस लौटे।
छंटनी करके आम की तौल की गई। मैंने उसकी मुंहमांगी कीमत चुकाई जो बाजार दर से बहुत
कम थी। दो पके आम जो जमीन पर टपकते ही फट गए थे उन्हें वहीं धुलकर मैंने उदरस्थ
किया। अहा! क्या स्वाद मिला! उन्होंने आमों की भारी पोटली मेरी साइकिल के कैरियर
पर ठीक से बांध दी। मैंने प्रमुदित मन से पैडल दबाया और वापस चल पड़ा।
आगे एक विराम उस महकते धान के खेत
पर लेना पड़ा। इसकी बालियां अब भरपूर बढ़ आई हैं। अब चावल के दाने विकसित हो रहे
होंगे। दस पंद्रह दिन में यह फसल काटने के लिए तैयार हो जायेगी। इसके ठीक सामने
सड़क की दूसरी ओर के खेत में अभी अभी धान की रोपनी की गई थी। बल्कि आजकल धान की
रोपनी का सीजन अपने उत्स पर है। एक खेत में धान रोपती स्त्रियों का सुंदर दृश्य भी
दिखा लेकिन मैंने संकोचवश फोटो लेने का विचार त्याग दिया।
आज की यात्रा में 22 किमी से अधिक का साइकिल चालन हुआ जो कार्डियोवैस्कुलर व्यायाम की श्रेणी में आता है। इससे मेरे व्यायाम निर्देशक निश्चित ही बहुत प्रसन्न होंगे।
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
शनिवार, 6 जुलाई 2024
झमाझम मानसून और अमराई में ताक-झांक
#साइकिल_से_सैर
मानसून के बादल पूरे उत्तर भारत के
ऊपर छा चुके हैं। प्रचंड गर्मी के बाद पड़ने वाली पहली फुहारों का तेजाबी चरण भी
निपट गया है। अब बरसात में भींगने का आनंद लेने का समय आ गया है। इसी आनंद के लिए
में अलस्सुबह साइकिल लेकर पुंवारका से बरौली की ओर निकल पड़ा।
रिमझिम बारिश का असर क्या है? आम
जनजीवन के साथ-साथ इस राह में पड़ने वाले चहुंओर फैले आम के बगीचों, धान के हरेभरे महकते खेतों और खुले आसमान के नीचे रहने वाली भेड़ों का
मेघवृष्टि ने क्या हाल किया है? आज मुझे यह देखने का मौका तो
मिला ही, साइकिल चलाते हुए भींगकर खुले आसमान में शुद्ध हवा
व पानी के बीच फेंफड़ों में भरपूर ऑक्सीजन भर लेने का लाभ भी मिला।
आज गांव के लोग घर के बाहर कम ही
दिखे। इक्के दुक्के लोग छाता लगाकर आते-जाते दिखे। अनुमान हुआ कि कदाचित् ग्रामीण
स्वच्छता कार्यक्रम के अंतर्गत हर घर में शौचालय सुनिश्चित करने की सरकारी योजना
इनके घर तक नहीं पहुंची है। भरी बारिश के बीच एक मोहतरमा अपने पक्के दुआर पर झाड़ू
लगा रही थीं और बहारन को फुटपाथ पर इकठ्ठा कर रही थीं। लखनौती गांव के बड़े से
तालाब की सतह पर मछलियों की हलचल कुछ बढ़ी हुई लगी। पानी के ऊपर मंडराता हुआ केवल
एक ही बगुला दिखा जो शायद अधिक भूखा होगा। वर्ना अधिकांश तो बारिश में उड़ने के
बजाय शांत बैठकर मौन साधना कर रहे थे।
खेतों की हरियाली बारिश से धुलने
के कारण कुछ ज्यादा ही निखर आई थी। उसपर हल्की हवा का इशारा पाकर पेड़ पौधे मस्ती
से झूम रहे थे। पशुओं के चारे के लिए खेतों में ज्वार बाजरा की फसल जो ज्यादा बढ़
गई थी उसे बारिश के साथ आने वाली तेज हवाओं ने जमीन पर सुला दिया था। एक किसान इस
चारे को खेत से जल्दी निकाल लेने की तजबीज करता दिखा। गन्ने की फसल तनकर खड़ी थी
क्योंकि चतुर किसानों ने समय रहते गन्नों को समूहों में बांध दिया था।
छः किलोमीटर की यात्रा पूरी करने
के बाद मैं एक बड़े से बाग में चला गया। बाग के बीच में रखवाली के लिए बनाए गए
पक्की छत वाले चबूतरे की ओर जाने के लिए सड़क से उतरा तो एक कच्ची पगडंडी मिली
जिसपर पानी जमा होने से फिसलने का डर था। मैंने साइकिल को भरपूर सावधानी से आगे
बढ़ाया। फिर भी एक जगह फंस ही गया। मजबूरी में एक पैर उस कीचड़ में उतारना पड़ा।
रखवाली के उस अड्डे पर दो खाटें
पड़ी थीं। एक खाली थी और दूसरी पर रखवाले साहब सो रहे थे। थोड़ी देर रुककर मैंने
उन्हें जगा दिया। वे हड़बड़ाकर उठे और मेरा परिचय पूछा। फिर मेरे पूछने पर
उन्होंने अपना जो अस्पष्ट नाम बताया उसमें मुझे रॉकिन शब्द ध्वनित हुआ। रॉकिन ने
बताया कि कुल 250 पेड़ों वाले बाग को उन्होंने दो साल की फसल के लिए 13
लाख में खरीदा है। मैंने पेड़ से टपके देसी आम के बारे में जानकारी
चाही तो उन्होंने एक टोकरी दिखाई। दशहरी और मालदा के बीच अटके पड़े दो-चार
छोटे-छोटे पीले रंग के बीजू आम दिखाई दिए। मैंने दो आम वहीं चख लिए जिसमें पहला
खट्टा निकला और दूसरा मीठा। मैने मीठे वाले की शक्ल-सूरत वाले मुश्किल से तीन चार
आम टोकरी से खोज निकाले और एक पॉलीथिन में लटकाकर रॉकिन को धन्यवाद देकर वापस लौट
पड़ा।
वापसी में मैंने उस महकते धान के
खेत पर रुककर एक-दो तस्वीरें लीं। इस खेत के धान की बालियां अब सभी पौधों में निकल
आई हैं। हमारे अपने गांव में जो पूर्वी उत्तर प्रदेश में है अभी धान की रोपाई चल
रही है।
भेड़ों के बाड़े के पास आकर मैंने
जो देखा उससे मन थोड़ा दुखी हो गया। बारिश में भींगने से बचाव का कोई रास्ता उन
बेचारी भेड़ों के पास नहीं था। उनका बाड़ा चार दीवारों और दरवाजों वाला तो है
लेकिन उसमें कोई छत नहीं है। भींगती हुई भेड़ें कष्ट में थीं। उनका करुण क्रंदन
यही बता रहा था। उनके पालक गड़ेरिए प्रमोद ने अपने बचाव के लिए सड़क किनारे एक
कामचलाऊ बरसाती डाल रखी थी। लेकिन यह भी कतई सुरक्षित नहीं थी।
बाड़े के सामने ही सड़क की दूसरी
ओर स्थित ईंट भट्ठे की स्थाई चिमनी शांत पड़ी थी। अर्थात् उसमें से धुआं नहीं निकल
रहा था। अब पहले से तैयार पकी हुई ईंटों को बेचकर काम चलेगा। गेट के भीतर एक खाली
बुग्गी खड़ी थी जिसमें जुता हुआ घोड़ा भी खुले में भींगने को मजबूर बोझ लादे जाने
की प्रतीक्षा कर रहा था।
कुल 12
किलोमीटर की सैर के बाद वापस लौटा तो साइकिल और क्रॉक्स की चप्पल सहित मेरे सभी
कपड़े भींगे हुए तो थे ही उनमें कीचड़ भी पर्याप्त मात्रा में सनी हुई थी। लेकिन
मन में केवल आनंद ही आनंद घुला हुआ था। घर के बाहर की तस्वीरें बाद में रीटेक करनी
पड़ी क्योंकि इसे खींचने के लिए मेरे सहायक मेरे बुलाने पर बाहर आए।
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)




























































