प्रयाग का माघ मेला समाप्त हो चुका है। मेला प्रशासन मेला सकुशल सम्पन्न होने की खुशी मनाने और धन्यवाद ज्ञापन हेतु सत्यनारायण की कथा आयोजित कराकर और प्रसाद का वितरण कराकर सुदीर्घ परम्परा का निर्वाह कर चुका है। सारे तम्बू उखड़ चुके हैं और करीब दो माह तक गंगा तट के बालू के ऊपर बसा रहा माघमेलानगर अपने हजारों पटकुटीरों (Tents), कनातों, टिनघेरे से बनी दुकानों, बाँस-बल्लियों से बने अहातों, रेशमी झालर वाले भव्य शामियानों, उनमें सजी ऊँची व्यास गद्दियों, उनपर बैठने वाले त्रिपुण्डधारी महन्थों और प्रवचन कर्ताओं, रामलीला मंचों, नाटक मण्डलियों, दानी-धर्मी कल्पवासियों और दूर दूर से आये भिखारियों को विदा करने के बाद अब अस्थायी रूप से निर्मित सड़कों पर बिछी लोहे की चेकर्ड प्लेटों को भी उटवकर गोदाम भेंज चुका है। यमुना की सतह पर लहरों के साथ उठती गिरती दूर-दूर तक सफ़ेद चादर सी पसरी हुई प्रवासी पक्षियों की वृहद् मण्डली भी अपनी केलि-क्रीड़ा समेटते हुई क्षीण होने लगी है
जाड़े का मौसम विदा ले रहा है, वसन्त अपनी रवानी पर है, फागुन की मस्ती से दिशाएं सराबोर हैं और देश की जनता हर हाल में अपने मनोरंजन के लिए उतावली है। बड़ी-बड़ी सरकारें इस कार्य में सहयोग हेतु कमर कस चुकी है और फिल्मों की रिलीज के लिए पुलिस वाले भी मुस्तैद कर दिए गये हैं। इधर छठे वेतन आयोग की कृपा से सरकारी कर्मचारी भी बढ़े हुए वेतन का एरियर भँजा रहे हैं। वित्त वर्ष समाप्त होने तक सरकारी विभाग, नेता, मन्त्री, ठेकेदार, माफ़िया, व्यापारी, थानेदार, इन्स्पेक्टर आदि अपना-अपना लक्ष्य पूरा करने की होड़ में जी-तोड़ मेहनत कर रहे हैं। आयकर विभाग भी रसूखदार लोगों की नींद उड़ाकर लंठई पर उतारू है। मजनता खबर पढ़कर मुस्करा रही है। देश क्रिकेट में जीत की खबर से भी खुशी में पागल हुआ जा रहा है। सारे चैनेल बम विस्फोट भूलकर कलकत्ता के कमाल पर कलरव कर रहे हैं। वाह क्या माहौल है…!
इसी मनभावन माहौल में मेरे मिनी महानगर में महोत्सव की महक बिखरने वाली है। जी हाँ, प्रयाग की पुण्य भूमि पर अगले सात दिनों तक कला, शिल्प और संस्कृति का संगम होने जा रहा है- त्रिवेणी महोत्सव। देश-विदेश के ख्यातिनाम कलाकार, गायक, कवि, गीतकार और शायर अपने फन से इलाहाबाद के दर्शकों और श्रोताओं का मन लुभाने आ रहे हैं।
ये प्रसिद्ध कलाकार कौन-कौन से हैं और कौन-कब आ रहे हैं इसे जानने के लिए नीचे के चित्र पर चटका लगाइए। प्रारम्भ होने का समय तो रोज ही साढ़े छः बजे सायं से है लेकिन अन्त होने का समय किसी को नहीं मालूम।
यद्यपि त्रिवेणी महोत्सव तो वर्षों से होता रहा है लेकिन इसे अत्यन्त भव्य कार्यक्रम में बदलने का श्रेय यहाँ के पूर्व जिलाधिकारी आशीष गोयल जी को जाता है। उनके अगले उत्तराधिकारी राजीव अग्रवाल जी ने उसे नयी ऊँचाई दी और अब वर्तमान डी.एम. संजय प्रसाद जी ने इसे अभूतपूर्व उत्कृष्टता प्रदान कर दी है। पता चला है कि तीन साल पहले जब इसे ताज महोत्सव की तर्ज पर आयोजित करने का विचार बना उस समय संजय प्रसाद जी ही आगरा में डी.एम. थे और तीसरी बार ताज महोत्सव का कुशल संचालन कर रहे थे।
यमुना नदी के तट पर शहर की ओर जो ऊँचा बाँध बना है उससे नदी की ओर के ढलान पर कुर्सियाँ लगी हैं, बोट क्लब भवन के सामने। नदी की धारा को अपने नेपथ्य में दिखाता पानी में खड़ा विशाल मंच अपने दायें-बायें यमुना जी पर बने नये और पुराने दो पुलों पर सजी रोशनी के साथ जो आकार लेकर एक विलक्षण दृश्य उत्पन्न करता है उससे चमत्कृत हुए बगैर नहीं रहा जा सकता। इस विशाल मंच को तैयार करने वाली कम्पनी वही है जिसने लन्दन में आइफा एवार्ड्स का भव्य सेट तैयार किया था। सुना है कि उद्घाटन के बाद पहली रात के कार्यक्रम में श्रेया घोषाल इस विशाल मंच पर सीधे रेलगाड़ी के डिब्बे से उतरेंगी।
जानता तो बहुत कुछ हूँ, लेकिन कार्यक्रम देखकर आने के बाद ही सच्ची रिपोर्ट देना चाहूंगा। वैसे देर रात तक जागकर एक से बढ़कर एक प्रस्तुतियों का आनन्द लेने और दिन में ऊंघते हुए कोषागार की नौकरी बजाने के बीच ब्लॉग पर पोस्ट ठेलना कितना सम्भव हो पाएगा यह तो समय ही बताएगा। लेकिन आप कार्यक्रम का विवरण देखकर आसानी से अनुमान कर सकते हैं कि अगले सात दिन (बल्कि सात रातें) कितने विलक्षण होने वाले हैं जब एक के बाद एक हमारी सांस्कृतिक पहचान के रौशन सितारे इलाहाबाद की जमीन पर अपने पाँव रख रहे होंगे। …तो आइए यदि आप इलाहाबाद या इसके आसपास हैं तो इस महोत्सव का भरपूर आनन्द उठाइए। वैसे दूर वालों को भी कोई मनाही नहीं है।
नोट: यह सबकुछ मुफ़्त में देखने को मिलेगा। कोई टिकट नहीं है लेकिन कुर्सियों की संख्या सीमित है। भीड़ ज्यादा बढ़ने पर वहाँ खड़ा रहना पड़ सकता है, या बाहर की सड़कों पर लगे विशाल साइट स्क्रीन्स को देखकर संतोष करना पड़ सकता है। कुछ लोग तो अपने-अपने घरों में बैठे केबल नेटवर्क पर सीधा-प्रसारण देखना ही पसन्द करते हैं। :)
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

