हमारी कोशिश है एक ऐसी दुनिया में रचने बसने की जहाँ सत्य सबका साझा हो; और सभी इसकी अभिव्यक्ति में मित्रवत होकर सकारात्मक संसार की रचना करें।
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बुधवार, 16 अक्टूबर 2013

दशहरे के दिशाशूल

जब नवरात्रि के अंतिम चरण में माँ दुर्गा के बड़े-बड़े भक्तों द्वारा भगवती जागरण और जगराता के बड़े-बड़े पांडाल सजाये जा रहे थे, जब भारत के क्रिकेट प्रेमी भारत-ऑस्ट्रेलिया के पहले एकदिवसीय मैच में ट्वेन्टी-ट्वेन्टी की तरह जोरदार जीत की उम्मीद से टीवी के आगे जम जाने और बाद में बुरी तरह पिट जाने की तैयारी में लहालोट थे; और जब देश के पूर्वी भाग के लोग मौसम-विज्ञानियों द्वारा फेलीनी के आतंक से भयभीत किये जाने के बाद अपने यात्रा कार्यक्रम बदल रहे थे उस समय मैं अपने बॉस से यह जिरह कर रहा था कि सरकारी छुट्टी के दिन मुझे जिले से बाहर जाने की अनुमति दी जाय ताकि मैं अपने गाँव जाकर दशहरे के त्यौहार पर अपने माता-पिता सहित गाँव भर के बड़े-बुजुर्गों से मिलकर उनका आशीर्वाद ग्रहण कर सकूँ और वहाँ के अन्य सभी लड़के-लड़कियों, महिलाओं-पुरुषों का हाल-चाल जानने की वार्षिक परंपरा का निर्वाह कर सकूँ। बड़ी मशक्कत के बाद मुझे अनुमति तो मिल गयी लेकिन प्रकृति ने कुछ ऐसा संयोग बनाया कि इस बार की मेरी यात्रा मेरे उत्साह और धैर्य की लगातार परीक्षा लेती रही। अहर्निश संघर्ष करता हुआ मैं जब आज रायबरेली लौटा हूँ और कल बकरीद की छुट्टी पर लखनऊ जाने की अनुज्ञा बॉस ने खुद ही बुलाकर दे दी है तब भी मैंने रायबरेली में रुककर आराम करने का मन बनाया है। लगातार की दौड़-धूप से तन ही नहीं मन में भी थकान घुस गयी है। अपनी एक पुरानी कविता याद आ रही है:

कुंजीपट खूँटी पर टांग
धत्‌ कुर्सी कर्मठता का स्वांग
दफ़्तर में अनसुनी है छुट्टी की मांग

कूड़े का ढेर
फाइल में फैला अंधेर
चिट्ठों में आँख मीच रहे उटकेर

आफ़त में जान
भला है बन बैठो अन्जान
देह नहीं मन में घुस पैठी थकान

इस थकान और निराशा के मुख्य कारण जो रहे उनका बिन्दुवार ब्यौरा यहाँ प्रस्तुत है:

  • कॉन्वेन्ट स्कूल की रीति-नीति ने बच्चों को इतना “प्रोफ़ेशनल और बिजी” बना दिया है कि उन्हें एक-दो दिन की छुट्टी में गाँव जाने की बात बिल्कुल कबूल नहीं होती। साथ में महानगरों में त्यौहारों की रौनक जो होती है उसकी तुलना में गाँव की अंधेरी रातें किसे सुहाएंगी भला। इसके फलस्वरूप मेरे परिवार के सभी सदस्यों ने मुझे गाँव जाने के लिए अकेला छोड़ दिया। बच्चों ने साफ-साफ “डू नॉट डिस्टर्ब” का बोर्ड लगाकर स्टडी-रूम भीतर से बन्द कर लिया और उनकी मम्मी पहरेदार बन बैठीं।
  • अकेले यात्रा करने के लिए ट्रेन से जाना उपयुक्त मानकर लखनऊ से गोरखपुर जाने और वापस आने के लिए आरक्षण करा रखा था। अलस्सुबह जागकर तैयार हुआ और निकलने से पहले जब नेट खोलकर गाड़ी की स्थिति जाननी चाही तब शहीद एक्सप्रेस का नाम सूची से नदारद दिखा। हक्का-बक्का होकर जब मैंने ध्यान से अपने मोबाइल में टिकट कन्फर्मेशन का मेसेज देखा तो यात्रातिथि (DoJ) में 13.10.2013 के स्थान पर 13.11.21013 लिखा था। यानि हड़बड़ी में मैंने आरक्षण कराते समय अक्तूबर के बजाय नवंबर के कैलेंडर से तेरह तारीख चुन ली थी।
  • अब तैयार हो चुका था तो जाना था ही। मोबाइल में वापसी यात्रा का मेसेज देखा तो बिल्कुल दुरुस्त निकला-14.10.2013 अवध एक्सप्रेस। पिठ्ठू बैग कंधों में फँसाकर निकल पड़ा। लखनऊ से गोरखपुर के लिए जाने वाली परिवहन निगम की बसें मेरे घर के निकट ही पॉलिटेक्‍निक चौराहे से गुजरती हैं, सो मैं पाँच रूपये ऑटो पर खर्च करके वहीं पहुँच गया। पाँच मिनट में एक बस आयी जो आजमगढ़ जा रही थी- फैजाबाद होते हुए। मैंने सोचा अगली बस पता नहीं कबतक आये इसलिए आधे रास्ते तक की यात्रा इसी से कर लेते हैं। फैजाबाद पहुँचकर गोरखपुर की दूसरी बस ले ली जाएगी। इस कैलकुलेशन में निकट के बादशाहनगर स्टेशन से सात बजे गुजरने वाली बाघ एक्सप्रेस छोड़ दिया जो साढ़े बारह बजे तक गोरखपुर पहुँचा देती। इधर साढ़े छः बजे मेरी बस चल पड़ी थी।
  • चूँकि मूल रूप से मुझे ट्रेन के ए.सी. कोच में यात्रा करनी थी इसलिए मैंने रात में ज्यादा सोने के बजाय बच्चों से बात करने, अपनी सलहज को उसके पति (यानि मेरे साले Smile) के साथ स्टेशन छोड़ने और नेटसर्फ़िंग में ज्यादा समय बिताया था ताकि सुबह गाड़ी में घुसते ही लंबी तानकर सो सकूँ। लेकिन किस्मत में बस की हरहराती-चिघ्घाड़ती सेवा लिखी थी जिसकी आगे की सीट पर दबकर बैठा हुआ मैं इंजन की घरघराती आवाज पर भी भारी पड़ती टेप के गानों की चिल्लाहट सुनने को मजबूर था। आँखें बन्द करके उंघने के मेरे सारे प्रयास निष्फल हो गये।
  • करीब साढ़े सात बजे एक ढाबे पर बस रुक गयी। ड्राइवर और कंडक्टर इत्मीनान से उतरे और तख्त के किनारे लगी कुर्सियों पर बैठ गये। ढाबे वाले ने इनकी आव-भगत शुरू की क्योंकि इन्होंने इस वीराने में अचानक पचासो ग्राहक लाकर डाल दिया था। यात्रियों ने तो चाय, बिस्कुट, और टिकिया आदि खाकर दाम चुकाया लेकिन ये दोनो सरकारी कर्मचारी सुबह-सुबह तंदूरी रोटी के साथ दाल-मखानी और मटर–पनीर मुफ़्त में जीमते रहे। बाद में इन्होंने चाय पी और मुँह में पान दबाकर बस में लौटे। तबतक मैं कई बार घड़ी देख चुका था और नियमित टाइप यात्रियों से पूछ चुका था कि फैजाबाद कबतक पहुँचेंगे।
  • बीस मिनट के ब्रेक के बाद बस आगे बढ़ी तो एक अजीब हरकत शुरू हुई। ड्राइवर साहब को खैनी की तलब लग गयी। मैंने सोचा किसी चेले या कंडक्टर को कहेंगे; लेकिन वे तो खुद ही शुरू हो गये। बस को रोका नहीं, बल्कि नेशनल हाई-वे पर पूरी रफ़्तार से बस को दौड़ाते हुए ही दोनो हाथों से खैनी मलने लगे। मेरी नींद को तो पंख लग गये। चालक महोदय किसी मदारी की तरह अपनी कोहनी से स्टीयरिंग ह्वील को साधते हुए अपने दोनो हाथों से चैतन्य-चुर्ण बनाने लगे। मैंने सोचा-एक दो मिनट सावधान रहना होगा ताकि यदि बस इधर-उधर सरके तो अपना बचाव किया जा सके।
  • सुर्ती मलने का कार्यक्रम जब अपने पाँचवें मिनट में प्रवेश कर गया और इस बीच जब ट्रकों की तीन-चार कतारें ओवर-टेक कर ली गयीं तो मेरा मन घबराने लगा; लेकिन चालक संजय राय का कौशल देखने लायक था; और खैनी के प्रति उनका अनुराग अचंभित करने वाला। मुझे अपने गाँव के स्वर्गीय राम दुलारे जी याद आ गये जो कहा करते थे- तीन सौ चुटकी तेरह ताल, तब देखो सुर्ती का हाल।
  • मेरे मन का ब्लॉगर जाग उठा और इस खैनी-मर्दन की अनुपम छटा को कैमरे में कैद करने को मचल उठा। हाई-वे पर आती-जाती गाड़ियों से गति मिलाती हमारी बस तेजी से बढ़ती जा रही थी और ड्राइवर की एक हथेली पर रखी खैनी दूसरे हाथ के अंगूठे से रगड़ खाकर मोक्षदायी होती जा रही थी। मैंने एक स्टिंग ऑपरेशन कर डाला। यहाँ देखिए:


    तीन सौ चुटकी तेरह ताल, तब देखो सुर्ती का हाल
  • जब ड्राइवर साहब ने मतवाली खैनी को होठ में दबाया और दोनो हाथों से स्टियरिंग थामकर चलने लगे तो मन को सुकून हुआ और ध्यान आया कि फैजाबाद आते-आते नौ बज गये हैं। स्टेशन पर उतरे तो फैजाबाद से लखनऊ जाने वाली चार बसें तैयार खड़ी मिलीं, लेकिन गोरखपुर के लिए कोई सवारी नहीं थी।
  • तभी एक जीप फर्राटे भरती आयी और बस्ती की सवारी पुकारने लगी। मैंने बढ़कर गोरखपुर के लिए पूछा तो वह आगे बढ़ गया लेकिन थोड़ी देर में वापस आ गया। उसे काम भर की सवारियाँ नहीं मिलीं थीं तो मुझे पटाने लगा। बोला- मैं गोरखपुर तो नहीं जाऊँगा लेकिन आपको बस्ती रोडवेज पर छोड़ दूंगा जहाँ से आपको गोरखपुर की बस मिल जाएगी। मुझे पता था कि यह जब तक तीन की सीट पर चार आदमी नहीं ठूस लेगा तबतक नहीं चलेगा। फिर भी मैंने अपना बैग बीच वाली सीट पर रखा और इधर उधर बेहतर विकल्प तलाशते हुए भी अंदर घुसने का उपक्रम करने लगा। तभी पीछे एक बस से आवाज आयी- आइए गोरखपुर। मैं फौरन मुड़ा और बैग उठाकर उधर झपट पड़ा जहाँ ड्राइवर अपनी बस के आगे लगी लखनऊ और गोरखपुर की तख्तियाँ अदल-बदल रहा था।
  • बस में आगे की सीट पर हम ज्यों ही बैठे तभी दूसरे दर्जनों यात्री भी अंदर आ घुसे। लेकिन तभी ड्राइवर बस को एक किनारे ले जाकर उसमें किसी व्यापारी का माल लादने लगा। इसे देखकर मुझे आगे की यात्रा बड़ी विकट जान पड़ी। काफी पुराने जमाने की खड़खड़िया बस थी यह। मैंने शीशा-विहीन खिड़की से झांककर देखा तो वह जीप भी जा चुकी थी। निराशा ने मन में पाँव पसारना शुरू ही किया था कि एक झोंके के समान लखनऊ की ओर से एक चमचमाती बस आ पहुँची जिसपर लिखा था- गोरखपुर मेल। मैं झट से उठा और उस मेल की ओर लपक लिया। देखते-देखते यह माल लादने वाली बस लगभग पूरी खाली हो गयी और गोरखपुर मेल पूरी सवारी भरकर चल पड़ी।
  • मैं सोच रहा था कि अब तो बात बन गयी। मौसम भी सुहाना हो गया था। तभी बस्ती पहुँचने से पहले ही हल्की बूँदा-बाँदी से मुलाकात हो गयी जो क्रमशः बढ़ती गयी। लोगों ने बस के शीशे खींच लिए और बारिश को देखने का आनंद लेने लगे। गोरखपुर पहुँचने से पहले मैंने अपने भतीजों को फोन करके शहर के प्रवेश द्वार पर ही मुझे रिसीव कर लेने को कहा ताकि शहर की भीड़-भाड़ पार करके बस स्टेशन तक जाने में लगने वाले अतिरिक्त एक घंटे की बचत हो सके। जब हम दो बजे गोरखपुर के आवास पर पहुँचे तो मूसलाधार बारिश शुरू हो चुकी थी। हमें यहाँ से साठ किलोमीटर दूर गाँव तक जाना अभी बाकी था। लेकिन मुझे जोर की भूख लगी थी सो दबाकर खाना खाया और भयंकर नींद सता रही थी सो वहीं पसर गये।
  • हम दो घंटे बाद सोकर उठे तो बड़े भैया और भतीजे के साथ घनघोर बारिश को चीरते हुए गाँव के लिए चल पड़े। बरसात के लिहाज से अच्छे रास्ते की तलाश में हमें बीस-पच्चीस किलोमीटर अतिरिक्त चलना पड़ा लेकिन अंधेरा होते-होते हम गाँव पहुँच गये। वहाँ जाने पर दो बातें पता चलीं जो मुझे फिरसे निराश करने वाली थीं।
  • पहली बात यह कि मेरे गाँव में उसदिन दशहरा मनाया ही नहीं जाने वाला था। स्थानीय पंडित जी ने ‘साइत’ (मुहूर्त) देखकर बताया था कि असली दशहरा 14 अक्तूबर को पड़ेगा। यानि गाँव के घर-घर जाकर मिलने-जुलने वाली शाम अगले दिन आयोजित होने वाली थी जब मैं अपनी वापसी यात्रा में ट्रेन में रहूँगा। रही-सही कसर लगातार हो रही बारिश ने पूरी कर दी जिससे गाँव के भीतर कींचड़ और जल-जमाव का कब्जा हो गया था; और चाहकर भी किसी के दरवाजे पर नहीं जाया जा सकता था। घुप अंधेरे का साम्राज्य तो था ही।
  • दूसरी निराशाजनक बात यह सामने आयी कि पड़ोस की मेरी सबसे उम्रदराज भौजाई (पचासी साल की) पिछले दिनों चल बसी थीं जिनकी तेरहवीं की रस्म अगले दिन थी। हमारे लिए साल में दो बार, होली और दशहरा पर उनसे मिलना विशेष उत्सुकता का विषय होता था। उम्र में भारी अन्तर होते हुए भी हम तीन भाइयों के साथ उनका देवर-भाभी के रिश्ते का निर्वाह अद्‌भुत था। अब इसपर सदा के लिए विराम लग चुका था। उन्हें हमारी श्रद्धांजलि।
  • अपने घर पर अम्मा-बाबूजी से मिलना और उनका आशीर्वाद पाना सुकून देने वाला था। परिवार के अन्य कई सदस्यों से लंबे समय बाद भेंट हुई थी इसलिए देर रात तक बातें होती रहीं। गाँव के एक बड़े आदमी ने कालीस्थान पर अखंड रामायण का पाठ आयोजित कर रखा था जहाँ जाकर रामचरितमानस की चौपाइयाँ बाँचने का लोभ हो रहा था; लेकिन बताया गया कि उन्होंने संपूर्ण पाठ को पूरा करने का ठेका किसी बाहरी मंडली दे रखा है और इसमें गाँव के लोगों का स्वतःस्फूर्त सहयोग अपेक्षित नहीं हैं। काले बादलों की गर्जन और घनघोर बारिश की तर्जन ने वहाँ तक जाने का विचार स्थगित करा दिया और हम मच्छरदानी लगाकर घर के बाहरी बरामदे में सो गये। [बाद में इसके लिए लखनऊ लौटकर डाँट भी खानी पड़ी। मैंने स्वास्थ्य और शरीर दोनो की सुरक्षा को खतरे में जो डाल दिया था। Sad smile]
  • अगले दिन हमें सुबह आठ बजे ही लौटना था। लेकिन स्वर्गीया भौजाई के नाम पर उनके घर अन्न ग्रहण करने का भावुक आमंत्रण पाकर हमें वहाँ जाना ही था; सो हम गये और दही-चिउड़ा-चीनी-चटनी की अत्यल्प मात्रा के साथ बुनिया (शीरे में भिगोयी हुई बूँदी) खाकर लौट आये।
  • एक दिन पहले से जो बारिश चल रही थी वह बदस्तूर जारी थी। लेकिन मुझे डेढ़ बजे अवध एक्सप्रेस पकड़नी थी और बड़े भैया को अपनी ससुराल में एक गोद-भराई की रस्म में फूफा की भूमिका का निर्वाह करना था। इसलिए हम फिरसे उसी राह वापस चल पड़े और राह में जगह-जगह हुए जल-जमाव को पार करने के अलावा बिना किसी अन्य व्यवधान के वापस गोरखपुर आ गये।
  • 2013-10-14 18.56.52अवध एक्सप्रेस की यात्रा बहुत अच्छी रही। मैंने जाते ही ऊपरी बर्थ पर अपने को कंबल में लपेट लिया था और सो गया था। लेकिन गहरी नींद को भी भगाने वाली नीचे से आ रही कोमल और कर्णप्रिय बातचीत ने हमें नीचे आकर बैठ जाने पर मजबूर कर दिया। एक युवा दंपति के साथ उनकी दो नन्ही-नहीं बेटियाँ हमारी सहयात्री थीं। उनकी बातें हमें रास्ते भर गुदगुदाती रहीं। उनके करतब से कंपार्टमेंट में कोई भी सो नहीं सका था; लेकिन किसी को इसका मलाल भी नहीं रहा। मुझे भी नहीं, जबकि मैं कई दिनों से अच्छी नींद की तलाश में था।
  • लखनऊ जब बच्चों के पास लौटा तो सबने मेरी खूब मौज ली। बच्चों ने भी। आखिर मैं उनकी पसन्द का ख्याल किये बिना अपने गाँव वालों से मिलने जो गया था।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)  

बुधवार, 17 अप्रैल 2013

पाँच के दाम में नौ का मजा…

मार्च की क्लोजिंग हो जाने के बाद थोड़ी फुर्सत निकालकर गाँव जाने का मन हुआ। पिताजी जबसे सेवानिवृत्त होकर गाँव पर अपनी धुनी रमाये हैं तबसे उनकी एक ही इच्छा रहती है कि बच्चे यानि मैं और मेरे बड़े भाई जल्दी-जल्दी गाँव जाते रहें। नौकरी की मजबूरियाँ ऐसी हैं कि उनकी इच्छा पूरी करने में  हमें तमाम जुगाड़ लगाना पड़ता है। इस बार मेरे बॉस ने थोड़ी ना-नुकुर के बाद सेकेंड सैटर्डे तथा सन्डे को शामिल करते हुए कुल तीन दिन की छुट्टी तो दे दी लेकिन उसमें इतना बिलम्ब कर दिया कि ट्रेन में कन्फर्म रिजर्वेशन नहीं मिल पाया था। भला हो अपनी ब्लॉगर बिरादरी का कि टिकट कन्फर्म कराने का जुगाड़ लग गया।

लखनऊ से गोरखपुर की इन्टरसिटी में बठते ही मैंने उन्हें धन्यवाद ज्ञाप करने हेतु एस.एम.एस. किया कि- “धन्यवाद सर, मुझे बिठाकर गाड़ी चल दी है”

“What? You have been left sitting at station?” मेरे संदेश पर जाने क्यों वे चिंताग्रस्त (शायद विनोदपूर्ण)  हो गये और त्वरित  जवाब मांगा।

मैंने फौरन जवाब दिया, “ना ना, गाड़ी में बैठा हूँ Smile
“आपकी गाड़ी मुझे छोड़ कैसे सकती हैOpen-mouthed smile

खैर, रात को दस बजे गोरखपुर बड़े भैया के आवास पर पहुँच गया। अगले दिन सुबह ससुराल होते हुए गाँव जाना था।

लौटते समय गाँव से गोरखपुर जल्दी आना पड़ा क्योंकि लखनऊ के लिए अवध एक्सप्रेस का निर्धारित समय दोपहर डेढ़ बजे ही था। भतीजे ने इन्टरनेट से अपडेट लिया तो गाड़ी एक घंटे विलम्ब से बतायी गयी। घर वालों से विदा लेकर मैंने ढाई बजे रेलवे स्टेशन की राह पकड़ी। पौने तीन बजे प्लैटफ़ॉर्म-१ पर पहुँचा तो प्लैटफ़ॉर्म-७ पर अवध एक्सप्रेस खड़ी दिखायी दी। इस घबराहट में कि कहीं यह मेरे सामने ही न निकल जाय मेरी साँस फूल गयी। दौड़कर ओवरब्रिज की दो-दो सीढ़ियाँ एक-एक बार में फाँदते हुए प्लैटफ़ॉर्म-७ पर पहुँचा। देखा तो ट्रेन ज्यों की त्यौं खड़ी थी और सारे डिब्बों में ताला लगा था। सभी खिड़कियाँ बन्द थीं। प्लैटफ़ॉर्म पर यात्री तो थे लेकिन किसी दूसरी गाड़ी की प्रतीक्षा कर रहे थे।

मुझे अब समझ में आया कि जिस अवध एक्सप्रेस से मुझे जाना है वो यह नहीं है। यह तो बान्द्रा (मुम्बई) से आयी है और अपनी यात्रा समाप्त कर चुकी है। मुझे अपनी बेवकूफ़ी पर झेंप आयी। मुझे ध्यान आया कि इस छोटी सी दौड़ में मैंने शायद राह में आने वाले कितने ही लोगों को पार करने के लिए धक्का दे दिया होगा।

थोड़ा रुककर मैंने अपनी साँसे स्थिर कीं और स्टेशन पर प्रसारित की जाने वाली सूचना को सुनने का यत्न करने लगा। पूरा एक चक्र सुन लेने के बाद भी मुझे अपनी गाड़ी का कोई उल्लेख सुनने को नहीं मिला। मैंने भतीजे को फोन लगाकर नेट से अपडेट लेने को कहा। उसने बताया कि गाड़ी ढाई घंटे विलम्ब से चल रही है। अब मैं दुबारा प्लैटफ़ॉर्म-१ पर वापस आकर कहीं बैठने की जगह तलाशने लगा। काफ़ी पसीना हो चुका था और बैठने की कोई हवादार जगह नहीं दिख रही थी। खटर-पटर के साथ चल रहे एक पंखे के नीचे खड़ा होकर थोड़ी राहत मिली लेकिन अब पैर दर्द करने लगा। हवा की जरूरत पर बैठने की जरूरत हावी होने लगी। मैंने पिठ्ठू बैग उठाया और एक कोने में लगी पत्थर की बेंच पर बैठ गया। अब दुबारा पसीना होने लगा लेकिन मैं बैठा रहा।

यहाँ लगभग एक घंटे की प्रतीक्षा करनी ही थी। जल्द ही बोर होने लगा तो पास के स्टाल से कोई पत्रिका लेने उठ गया। वहाँ कोई वेंडर नहीं था। ‘शुक्रवार’ का ताजा अंक पसंद आया क्योंकि उतने ही पृष्ठों की ‘इंडिया-टुडे’ और ‘ऑउटलुक’ के पैंतीस रूपये मूल्य की तुलना में इसका मूल्य मात्र पन्द्रह रूपया था। विषय सामग्री तो एक जैसी ही रही होगी, विज्ञापन वाले पृष्ठ इसमें कम थे। मैंने पर्स से पन्द्रह रूपये निकालकर इधर-उधर देखा तो बगल में जूस बेंचने वाले ने मुझसे पैसे ले लिए और मुझे पत्रिका दे दी। पत्रिका में मैंने देखा कि विष्णु  नागर ने अपने सम्पादकीय आलेख में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री द्वारा राह चलते अपनी गाड़ी से उतरकर कींचड़ में फँसे एक मेमने को बचाने के समाचार पर कलम तोड़कर लिखा था। संपादक जी ने अपने मनमोहन सिंह को भी इस मानक पर तौलने की कोशिश की थी।

बहरहाल चार बजे घोषणा हुई कि “अवध एक्सप्रेस” थोड़ी ही देर में प्लैटफ़ॉर्म-७ पर आने वाली है। पहले मुझे ‘सात’ के बजाय ‘चार’ सुनायी दिया। शक होने पर मैंने फटी आवाज वाले भोंपू के पास जाकर कन्फ़र्म किया और प्लैटफ़ॉर्म-७ पर पहुँच गया। आधे घंटे फिर खड़ा रहा। अन्ततः साढ़े चार पर गाड़ी आयी। सीधे ऊपर की बर्थ पर जाकर लेट गया। सभी संबंधित को मोबाइल से सूचित करने का काम तुरन्त निपटाने के बाद तकिया चादर की प्रतीक्षा किये बगैर आंखें बन्दकर सोने की कोशिश करने लगा।

अचानक मोबाइल की घंटी से नींद खुली तो गिरिजेश भैया लाइन पर मिले। पूछ रहे थे - कहाँ हो? अचानक नींद से जागने पर मुझे यह याद करने में कुछ समय लग गया कि आज मैंने उन्हें सपरिवार लखनऊ में अपने घर बुलाया था और साथ भोजन करने का कार्यक्रम था। गाड़ी को सात बजे पहुँच जाना था इसलिए मुझे यह कार्यक्रम बनाने में कोई बाधा नहीं महसूस हुई थी। मैंने सम्हालते हुए पूरी बात बतायी और अनुरोध किया कि आप घर पहुँचिए, मैं भी देर-सबेर पहुँच ही जाऊंगा। घर पर श्रीमती जी को उनके आने के बारे में ताक़ीद करके मैं दुबारा सो गया। लेकिन अब अच्छी नींद नहीं आ रही थी। बार-बार गाड़ी खड़ी हो जाती और मेरी बेचैनी बढ़ती जाती।

लखनऊ में बादशाहनगर स्टेशन पड़ता है जहाँ से उतरकर मुझे इन्दिरानगर जाना था। इस चिन्ता में कि कहीं मैं सोया न रह जाऊँ और गाड़ी आगे बढ़ ले मैं प्रत्येक ठहराव पर नीचे वालों से स्टेशन का नाम पूछता रहा। वे भी बेचारे तंग आ गये होंगे। विलम्ब की हद बढ़ती जा रही थी और मैं घरवाली और घर आये मेहमान को लगातार ढांढस देता जा रहा था। मेहमान घर पर आ गये हैं, खाना तैयार हो चुका है, नौ बज गये हैं कब तक आएंगे.. आदि-आदि। उनके और मेरे बच्चे भी खेल-खेलकर बोर हो चुके थे। दोनों की पत्नियाँ भी सारी गलचौर निपटा चुकी थीं। अन्ततः दस बजे मैंने बताया कि आप लोग भोजन प्रारंभ कर दीजिए मुझे लेट हो जाएगा। खाना खाने के बाद उन लोगों ने थोड़ी और प्रतीक्षा की। ग्यारह बजे मैंने उन्हें अपनी बर्थ से ही खेद प्रकट करते हुए ‘शुभ-विदा’ कहा और पत्नी को ही उन लोगों को नीचे छोड़ आने की जिम्मेदारी सौंप दी।

बारह बज गये तो मैं अपनी बर्थ से नीचे उतरकर गलियारे में चहल-कदमी करने लगा। रुकते-रुकाते गाड़ी डेढ़ बजे बादशानगर पहुँची। लगभग सारे यात्री खीझ और गुस्से से बिलबिला रहे थे। डिब्बे का केयरटेकर मजेदार आदमी था। उतरते हुए मैंने कहा  – “आज तो हद ही हो गयी यार। गोरखपुर में तीन घंटे लेट थी और उसके बाद पाँच घंटे की यात्रा में नौ घंटे लगा दिए।”

उसने मुस्कराते हुए कहा, “इसे यूँ भी तो कह सकते हैं कि पाँच घंटे का किराया देकर नौ घंटे ए.सी. का मजा लेते रहे।”

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

बुधवार, 28 सितंबर 2011

रेलयात्रा हमें सहिष्णु बनाती है…

हमें स्कूल में भारतीय संस्कृति की विशेषताएँ विषय पर निबन्ध रटाया गया था। इसमें एक विशेषता थी- सहिष्णुता। इस विशेषता को लेकर मेरे मन में कौतूहल होता रहा है। भूख, भय, बेरोजगारी, प्राकृतिक आपदा या किसी दुर्घटना  से उत्पन्न दुख व विपत्ति को सहन कर लेने की क्षमता यदि हमारे भीतर प्रचुर मात्रा में है तो अच्छा ही है। हमें उस विपरीत परिस्थिति से बाहर निकलने में मदद मिलती है। लेकिन यदि इस फेर में हमें कुछ भी सह लेने की आदत पड़ जाय तो वही होता है जो भारत के साथ हुआ है। इतिहास बताता है कि किस तरह हमने विदेशी लुटेरों और आक्रान्ताओं को भी आराम से सहन कर लिया। घर बुलाकर मेहमान बनाया और फिर मालिक बनाकर देश की राजगद्दी सौंप दी। एक के बाद एक भ्रष्टाचारी कीर्तिमान हमारी आँखों के सामने बनते जाते हैं और हम मूक दर्शक बनकर या “अन्ना हजारे जिन्दाबाद” का नारा लगाकर घर बैठ जाते हैं। हमारे भीतर अन्याय, अत्याचार, शोषण, और भ्रष्टाचार के प्रति गजब की सहनशक्ति विकसित हो चुकी है। इस उपलब्धि के पीछे हमारी भारतीय रेल का भी थोड़ा हाथ है इसका विचार मेरे मन में पिछली यात्रा के दौरान प्रकट हुआ।

मेरा अनुभव कुछ नया नहीं है। आप सबको इस स्थिति का सामना आये दिन होता होगा। एक आम भारतीय के लिए रेलगाड़ी से यात्रा करना अपनेआप में एक मजबूरी है। एक मात्र सस्ता और टिकाऊ विकल्प यही है, सुन्दर भले ही न हो। a-crowded-passenger-trainलम्बी दूरी की गाड़ियो के जनरल डिब्बे किस प्रकार जीवित मानव देह की लदान करते हैं; और जायज टिकट वालों को भी किसप्रकार थप्पड़ खानी पड़ती है और अंटी ढीली करनी पड़ती है, यह वर्णनातीत है। मैं उस चरम स्थिति की चर्चा नहीं कर रहा हूँ। मैं तो अपेक्षाकृत अधिक सुविधा सम्पन्न श्रेणियों में यात्रा करने वालों में से एक होकर उससे प्राप्त अनुभव के आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि रेलयात्रा हमें सहिष्णु बनाती है और इस प्रकार भारतीय संस्कृति की रक्षा में अनुपम योगदान दे रही है।Open-mouthed smile

हाल ही में मुझे अपनी माता जी के खराब स्वास्थ्य की चिन्ता से गोरखपुर जाना हुआ। वहाँ से लखनऊ वापसी की यात्रा रविवार 25 जुलाई, 2011 को अवध एक्सप्रेस से करनी थी जिसका निर्धारित समय दोपहर 1:15 का था। गाड़ी पकड़ने से पहले मुझे अम्मा को हड्डी के डॉक्टर से दिखाना था। अलस्सुबह उठकर मैंने डॉक्टर के यहाँ नम्बर लगाया, क्‍लिनिक खुलने पर लाइन लगाया, डॉक्टर ने प्रारम्भिक जाँच के बाद डिजिटल एक्स-रे के लिए अन्यत्र भेजा। वहाँ एक घंटे लगे। वापस आकर उन्होंने रिपोर्ट देखी और दवाएँ लिखने के बाद दो अन्य विशेषज्ञ चिकित्सकों (न्यूरोलॉजिस्ट और गैस्ट्रोइंटेरोलॉजिस्ट) को रेफ़र कर दिया। दोनो जगह जाने पर पता चला कि रविवार होने से इनके क्‍लिनिक बन्द थे। मेरे बड़े भैया ने कहा कि वे अम्मा को अगले दिन दिखा देंगे। यानि मुझे अब लखनऊ की गाड़ी पकड़ने के लिए स्टेशन जाना चाहिए। मैं यह सब दौड़-धूप करता हुआ लगातार मोबाइल से गाड़ी के प्रस्थान समय की सूचना ले रहा था।

गाड़ी 50 मिनट लेट होने की कम्प्यूटरीकृत सूचना मोबाइल पर एक बार शुरू हुई तो अन्ततक रिकार्ड बदला नहीं गया। मैं उसी के अनुसार स्टेशन पहुँचा तो पू्छताछ केन्द्र पर लगा बोर्ड गाड़ी के 30 मिनट देरी से  7-नम्बर प्‍ले‍टफॉर्म पर आने की सूचना दे रहा था। मेरे हाथ पाँव फूल गये। दौड़ता-भागता हुआ मैं ओवरब्रिज पर चढ़कर प्‍ले‍टफॉर्म नम्बर-7 पर उतरा। एक दिक्कत यह भी हुई कि ओवरब्रिज से प्‍ले‍टफॉर्मों पर उतरने वाली सीढ़ियों के पास प्‍ले‍टफॉर्म संख्या दर्शाने वाले बोर्ड नदारद थे। मुझे एक मिनट रुककर पहले नम्बर से गिनती करते हुए सातवें नम्बर का अनुमान लगाना पड़ा।

प्‍ले‍टफॉर्म पर अधिकांश यात्री अपना सामान हाथ में संभाले गाड़ी आने की दिशा की ओर देख रहे थे। मुझे आश्वस्ति हुई कि अभी गाड़ी आयी नहीं है, बल्कि कुछ ही देर में आने वाली है। दस-पन्द्रह मिनट बीते और गाड़ी नहीं आयी तो सबने अपने हाथ में टँगा सामान नीचे रखना शुरू किया और अपनी जगह पर वापस आने लगे। कुछ देर खड़ा रहने के बाद मैं भी थकान के कारण बैठने की जगह खोजने लगा। सारी बेन्चें क्षमता से अधिक भार से लदी हुई थीं। रेलगाड़ी चलाने वाले गार्ड्स के उपयोग हेतु बने लकड़ी या लोहे के बक्से बड़ी मात्रा में वहीं बिखरे पड़े थे। उनपर भी यात्रियों ने कब्जा जमा रखा था। एक जगह बक्से एक के ऊपर एक रखे हुए थे जो ऊँचे हो जाने के कारण खाली थे। मैं उचककर ऐसे ही एक बक्से पर बैठ गया। निचले बक्से के कोने की टिन फटी हुई थी जिसमें मेरे पैंट की मोहरी उलझ गयी लेकिन संयोग से कोई चीरा नहीं लगा।

मोबाइल पर कम्प्यूटरीकृत सूचना अभी भी वास्तविक आगमन समय 13:55 और वास्तविक प्रस्थान समय 14:00 बजे का बता रही थी जबकि सवा दो बज चुके थे और गाड़ी का कुछ पता नहीं था। कुछ देर बाद सात नम्बर प्‍ले‍टफॉर्म पर ही दूसरी दिशा से (लखनऊ की ओर से) एक गाड़ी आकर रुकी। इस पर भी अवध एक्सप्रेस लिखा था। कुछ लोग इसपर चढ़ने का उपक्रम करने लगे। ये वो थे जिन्हें अपने गन्तव्य की सही दिशा का ज्ञान नहीं था। गनीमत थी कि यह इस गाड़ी का आखिरी स्टेशन था और यात्रियों के उतरने के बाद रेलकर्मी इसकी खिड़कियाँ और दरवाजे बन्द करने लगे। मुझे अब यह चिन्ता हुई कि इस गाड़ी के प्‍ले‍टफॉर्म खाली करने में कम से कम आधे घंटे तो लगेंगे ही, इसलिए मेरी गाड़ी अभी आधे घंटे और नहीं आ सकेगी। तभी घोषणा हुई कि अवध एक्सप्रेस थोड़ी ही देर में दूसरी ओर प्‍ले‍टफॉर्म नम्बर-6 पर आ रही है। सभी यात्री अपना सामान उठाकर उसी प्‍ले‍टफॉर्म पर एक तरफ़ से दूसरी तरफ़ हो लिए।

three_tier_air_conditioned_करीब सवा तीन बजे गाड़ी नमूदार हुई। हम थके-हारे अपना ए.सी. थर्ड कोच नम्बर-B2 ढूँढकर उसके बर्थ संख्या-11 पर पहुँचे। यह सबसे ऊपर की बर्थ मैंने जानबूझकर ली थी ताकि दिन में भी आराम से लेटकर यात्रा की जा सके। थकान इतनी थी कि तुरन्त सो जाने का मन हुआ। मैंने अटेन्डेन्ट को खोजकर तत्काल बेडरोल ले लेने का सोचा लेकिन वह अपने स्थान पर नहीं मिला। मैं अपनी बर्थ पर लौट आया और यूँ ही लेट गया। सामने की बर्थ से पहले से प्रयोग की जा चुकी एक तकिया लेकर अपने सिर को आराम दे दिया। गाड़ी चल चुकी थी। पन्द्रह-बीस मिनट बाद जब टीटीई साहब आये तो मुझे नींद लग चुकी थी। उनके जगाने पर मैंने आँखें मूँदे हुए ही जेब से टिकट और फोटो आईडी (PAN Card) निकाला और उनकी ओर बढ़ाते हुए अनुरोध किया कि बेडरोल वाले को चादर के साथ भेज दें। उनके आश्वासन से सन्तुष्ट होकर मैं करवट बदलकर सो गया।

करीब एक घंटे बाद एक स्टेशन पर कुछ और यात्री चढ़े। उनका टिकट देखने टीटीई साहब दुबारा आये तो मैंने उठकर बेडरोल की बात याद दिलायी। वे चकित होकर बोले- मैंने तो उससे तभी कह दिया था, क्या अभी तक नहीं दिया उसने? यह कहते हुए वे तत्परता से किनारे की ओर गये और थोड़ी देर में एक लड़के के साथ वापस आये। यह कोच अटेन्डेन्ट था। टीटीई ने उससे कहा कि इन्हें बताओ कि मैंने तुमसे बेडरोल के लिए कहा था कि नहीं। वह बोला- अच्छा, दे देंगे। उसकी लापरवाह शैली से मुझे झुँझलाहट हुई। मैंने अधीर होकर पूछा- कबतक दे दोगे। लखनऊ पहुँच जाने के बाद? इस पर वह तैश में आ गया और बोला- जाओ, नहीं दूँगा (मानो कह रहा था- क्या कल्लोगे!) मैं हतप्रभ सा हो गया। टीटीई साहब को भी यह बहुत बुरा लगा। वे उसे डाँटने जैसा कुछ कहने लगे। उसमें यह बात भी शामिल थी  कि उस लड़के के साथ ही अक्सर ऐसा लफड़ा हो जाता है। मैंने उनसे पूछा- क्या आपके पास इसकी शिकायत दर्ज करने का कोई अधिकार नहीं है? आप मेरी ओर से लिखित शिकायत दर्ज कर लीजिए और उच्चाधिकारियों के संज्ञान में लाइए।

मेरी इस बात पर टीटीई साहब थोड़े संजीदा हो गये। सकुचाते हुए बोले- अरे साहब, यह बात किसको नहीं पता है! जबसे यह काम प्राइवेट ठेकेदारों के हाथ में दे दिया गया है तबसे कोई कंट्रोल नहीं रह गया है। ये किसी की नहीं सुनते। इन्हें कोई डर ही नहीं है। मैं अगर शिकायत करना चाहूँ तो मुझे तमाम कागज बनाने पड़ेंगे, कई बार ऑफिस के चक्कर लगाने पड़ेंगे और परिणाम फिर भी कुछ नहीं मिलेगा। मैंने पूछा- अगर मैं शिकायत करना चाहूँ तो किसे लिखना होगा? वे बोले- वेबसाइट पर देखिएगा। यह गाड़ी (19040/AVADH EXP) पश्चिम रेलवे की है। ठेकेदार भी उन्ही का है। यहाँ से उनके खिलाफ़ कुछ नहीं हो पाता है। आप वहीं शिकायत कीजिए। मैंने तय किया कि घर पहुँचकर रेलवे में उस लापरवाह केयरटेकर की शिकायत ऑनलाइन दर्ज कराऊंगा।

इस कहासुनी के दस-पन्द्रह मिनट बाद उसने मुझे दो चादरें व एक तकिया लाकर दे दिया। कम्बल सामने की बर्थ पर मौजूद था जिसकी जरूरत नहीं थी, और छोटा तौलिया वह किसी को दे ही नहीं रहा था।

मैं अपनी बर्थ पर लेटे हुए इस परिदृश्य पर विचार करता रहा। काश रेलवे का कोई सक्षम अधिकारी बिना किसी पूर्व सूचना के ऐसे यात्री डिब्बों में चुपचाप यात्रा करता और बाद में दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्यवाही करता! wishful thinking!!! मैंने देखा तो यह है कि जब किसी ट्रेन में कोई बड़ा रेल अधिकारी अपने सैलून में चल रहा होता है तो वह ट्रेन भी समय से चलती है और दूसरी यात्री सुविधाएँ भी जैसे- भोजन व जलपान आदि  बेहतर हो जाती हैं। बाकी समय में रेल हमारी सहिष्णुता भरी छाती पर मूँग दलते ही चलती है।

मैं उस डिब्बे में चल रहे अन्य यात्रियों के दृष्टिकोण को परखने की कोशिश करने लगा। मैंने महसूस किया कि रेलवे द्वारा टिकट के पैसों में इस सुविधा के लिए अलग से शुल्क वसूलकर भी इसको वास्तव में उपलब्ध कराने में की जा रही लापरवाही के प्रति लोगों में प्रायः उदासीनता है। जो चिन्तित करने वाली बात है। मैंने देखा कि जिन्हें बेडरोल की तुरन्त जरूरत थी वे कोच के एक सिरे तक जाते और वहाँ उस लड़के से अनुरोध करके अपने लिए चादर वगैरह खुद ले आते। मैंने देखा कि वह लड़का जाने कहाँ से आये अपने साथियों के साथ ताश खेलने में व्यस्त रहा। उसने न तो कोई यूनीफॉर्म पहन रखा था और न ही नाम का कोई बिल्ला लगा रखा था कि उसे पहचाना जा सके। यात्री आपस में भुनभुनाते हुए उसके प्रति असंतोष तो व्यक्त कर रहे थे लेकिन उससे उलझने या उसको टोकने की जरूरत किसी ने नहीं समझी। शायद वे रात में सोने का समय होने की प्रतीक्षा कर रहे थे। शायद तबतक उन्हें बेडरोल अपनेआप ही मिल जाता। लेकिन रात दस बजे लखनऊ पहुँचने तक लगभग सात घंटे की यात्रा में मैंने एक भी बर्थ पर उसे अपनेआप बेडरोल पहुँचाते नहीं देखा।

घर वापस आकर मैं अपनी गृहस्थी और नौकरी में व्यस्त हो गया हूँ। शिकायत दर्ज करने की इच्छा धीरे-धीरे दम तोड़ रही है। तीन दिन बीत जाने के बाद यह हाल आपको बता पाने का मौका पा सका हूँ। यात्रा की तिथि, स्थान, समय व अन्य विवरण वास्तविक रूप से इसलिए उद्धरित कर दिया है कि शायद रेल महकमें का कोई जिम्मेदार अधिकारी इसे पढ़कर कोई स्वतः स्फूर्त कार्यवाही कर डाले। हमें तो परिस्थितिजन्य सहिष्णुता ने घेर लिया है। Confused smile

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

बुधवार, 9 मार्च 2011

रेलवे की जुगाड़ सुविधा...

 

समय: प्रातःकाल 6:30 बजे

स्थान: बर्थ सं.18 - A1, पटना-सिकंदराबाद एक्सप्रेस

इस पोस्ट को लिखने का तात्कालिक कारण तो इस ए.सी. कोच का वह ट्वॉएलेट है जिससे निकलकर मैं अभी-अभी आ रहा हूँ और जिसके दरवाजे पर लिखा है- ‘पाश्चात्य शैली’। लेकिन उसकी चर्चा से पहले बात वहाँ से शुरू करूँगा जहाँ पिछली पोस्ट में छोड़ रखा था।

आप जान चुके हैं कि वर्धा से कार में इलाहाबाद के लिए चला था तो एक चौथाई रास्ता टायर की तलाश में बीता। जबलपुर में टायर मिला तो साथ में एक पोस्ट भी अवतरित हो ली। आगे की राह भी आसान न थी। रीवा से इलाहाबाद की ओर जाने वाला नेशनल हाई-वे पिछले सालों से ही टूटा हुआ है। अब इसकी मरम्मत का काम हो रहा है। नतीज़तन पूरी सड़क बलुआ पत्थर, पथरीली मिट्टी और बेतरतीब गढ्ढों का समुच्चय बनी हुई है। पिछले साल इसी रास्ते से वर्धा जाते समय मुझे करीब चालीस किमी. की दूरी पार करने में ढाई घंटे लग गये थे। इसलिए इस बार मैं सावधान था।

मैंने अपने एक मित्र से वैकल्पिक रास्ता पूछ लिया था जो रीवा से सिरमौर की ओर जाता था; और काफी घूमने-फिरने के बाद रीवा-इलाहाबाद मार्ग पर करीब साठ किमी आगे कटरा नामक बाजार में आकर मिल जाता था। रीवा से सिरमौर तक चिकनी-चुपड़ी सड़क पर चलने के बाद हमें देहाती सड़क मिली जो क्यौटी होते हुए कटरा तक जाती थी। हमें दर्जनों बार रुक-रुककर लोगों से आगे की दिशा पूछनी पड़ी। एक गाँव के बाहर तिराहे पर भ्रम पैदा हो गया जिसे दूर करने के लिए हमें पीछे लौटकर गाँव के भीतर जाना पड़ा। अँधेरा हो चुका था। कोई आदमी बाहर नहीं दिखा। एक घर के सामने गाड़ी रोककर ड्राइवर रास्ता पूछने के लिए उस दरवाजे पर गया। दो मिनट के भीतर कई घरों के आदमी हाथ में टॉर्च लिए गाड़ी के पास इकठ्ठा हो गये। फिर हमें रास्ता बताने वालों की होड़ लग गयी। कम उम्र वालों को चुप कराकर एक बुजुर्गवार ने हमें तफ़्सील से पूरा रास्ता समझा दिया। उनके भीतर हमारी मदद का ऐसा जज़्बा था कि यदि हम चाहते तो वे हमारे साथ हाइ-वे तक चले आते।

खैर, आगे का करीब चालीस किमी. का सर्पाकार देहाती रास्ता प्रायः गढ्ढामुक्त था। रात का समय था इसलिए इक्का-दुक्का सवारी ही सामने से आती मिली। सड़क इतनी पतली थी कि किसी दुपहिया सवारी को पार करने के लिए भी किसी एक को सड़क छोड़ने की नौबत आ जाती। जब हम हाइ-वे पर निकल कर आ गये तो वही क्षत-विक्षत धूल-मिट्टी से अटी पड़ी सड़क सामने थी। उफ़्‌... हम हिचकोले खाते आगे बढ़ते जा रहे थे और सोचते जा रहे थे कि शायद हमारा वैकल्पिक रास्ते का चुनाव काम नहीं आया। खराब सड़क तो फिर भी मिल गयी। हमने कटरा बाजार में गाड़ी रुकवायी। सड़क किनारे दो किशोर आपस में तल्लीनता से बात कर रहे थे। उनमें से एक साइकिल पर था। जमीन से पैर टिकाए। दूसरा मोबाइल पर कमेंट्री सुन रहा था और अपने साथी को बता रहा था।

मैंने पूछा- भाई, यह बताओ यह सड़क अभी कितनी दूर तक ऐसे ही खराब है?

लड़का मुस्कराया- “अंकल जी, अब तो आप ‘कढ़’ आये हैं। पाँच सौ मीटर के बाद तो क्या पूछना। गाड़ी हवा की तरह चलेगी।” उसने अपने दोनो हाथों को हवा में ऐसे लहराया जैसे पानी में मछली के तैरने का प्रदर्शन कर रहा हो। जब हमने बताया कि हम हाई-वे से होकर नहीं आ रहे हैं बल्कि सिरमौर होकर आ रहे हैं तो उसने हमें शाबासी दी और बुद्धिमान बता दिया। बोला- जो लोग हाई-वे से आ रहे हैं उनकी गाड़ी लाल हो जाती है। गेरुए मिट्टी-पत्थर की धूल से। आप अपनी कार  ‘चीन्ह’  नहीं पाते। हमें समझ में आ गया कि आगे का रास्ता बन चुका है। हम खुश हो लिए और आगे चल दिए। इलाहाबाद तक कोई व्यवधान नही हुआ।

इलाहाबाद में सरकारी काम निपटाने के अलावा अनेक लोगों से मिलने का सुख मिला। आदरणीय ज्ञानदत्त पांडेय जी के घर गया। श्रद्धेया रीता भाभी के दर्शन हुए। सपरिवार वर्धा जाकर नौकरी करने के हानि-लाभ पर चर्चा हुई। गुरुदेव के स्वास्थ्य की जानकारी मिली। लम्बे समय तक चिकित्सकीय निगरानी में रहने और लगातार दवाएँ लेते रहने की मजबूरी चेहरे पर स्थिर भाव के रूप में झलक रही थी। वे इस बार कुछ ज्यादा ही गम्भीर दिखे।

प्रयाग में मेरे पूर्व कार्यस्थल-कोषागार से जुड़े जितने भी अधिकारी-कर्मचारी और इष्टमित्र मिले उन सबका मत यही था कि मुझे अपना प्रदेश और इलाहाबाद छोड़कर बाहर नहीं जाना चाहिए था। इस विषय पर फिर कभी चर्चा होगी।

वर्धा वापस लौटने का कार्यक्रम रेलगाड़ी से बना। दिन भर मंगल-व्रत का फलाहार लेने के बाद शाम को एक मित्र की गृहिणी के हाथ की बनी रोटी और दही से व्रत का समाहार करके मैं स्टेशन आ गया। अनामिका प्रकाशन के विनोद शुक्ल और वचन पत्रिका के संपादक प्रकाश त्रिपाठी गाड़ी तक विदा करने आये। उन्हें हार्दिक धन्यवाद देकर हम विदा हुए। रात में अच्छी नींद आयी।

आज सुबह जब हम ‘पाश्चात्य शैली’ के शौचालय में गये तो वहाँ का अद्‌भुत नजारा देखकर मुस्कराए बिना न रह सके। साथ ही पछताने लगे कि काश कैमरा साथ होता। फिलहाल ट्वॉएलेट की देखभाल करने वालों के बुद्धि-कौशल और गरीबी में भी काम चला लेने की भारतीय प्रतिभा का नमूना पेश करते इस ए.सी. कोच के पश्चिमी बनावट वाले शौचालय की कुछ तस्वीरें मैंने अपने मोबाइल से ही खींच डाली हैं। खास आपके लिए। देखिए न...

IMG0069A भारत की एक बड़ी आबादी जैसे स्थानों पर शौच आदि से निवृत्त होती है उससे बेहतर सफाई है यहाँ। यह दीगर बात है कि सीट को ट्‍वाएलेट पेपर से अपने हाथों साफ़ करने के बाद फोटो लेने का विचार आया।
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IMG0070A ट्‍वाएलेट पेपर ...? पूरा बंडल उपलब्ध है जी। भले ही इसे रखे जाने का मूल बक्सा बेकार हो गया है लेकिन ठेकेदार ने इसे पॉलीथीन से बाँधकर वहीं लटका छोड़ा है। इसे प्रयोगार्थ निकालने के लिए थोड़ी ही मशक्कत करनी पड़ी।
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IMG0061A हाथ धुलने के लिए पेपर सोप रखने की कोई जरूरत नहीं। रेलवे द्वारा लिक्विड सोप की सुविधा गारंटीड है। इसे रखने की डिबिया अपने स्थान से उखड़ गयी तो भी कोई बात नहीं।  'रेलनीर'  की बोतल तो है। साबुन भरकर बेसिन के बगल में ही लटका रखा है। जी भर इस्तेमाल करें।
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IMG0062A ट्‍वाएलेट पेपर रोल को पॉलीथीन से बाँध कर रखने का काम बहुत बुद्धिमानी से किया गया है। स्टील फ्रेम में न होने के बावजूद यह नाचता भी है और थोड़ी  मेहनत करने पर टुकड़ों में निकल भी आता है। मनोरंजक भी है और स्किल टेस्टिंग भी...
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IMG0068A येजो चमक रहे हैं उनमें एक स्टील का जग है, पानी की टोटी है, और स्वयं पानी है जो नीचे जमा है। जो नहीं चमक रही है वह लोहे की जंजीर है जिससे जग बँधा हुआ है। कौन जाने यह कीमती जग किसी को भा जाय और दूसरे यात्रियों को परेशानी उठानी पड़े। इसीलिए बाँध के डाल दिया होगा।
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IMG0066A यदि आप पेपर का प्रयोग नहीं कर पाते और संयोग से टंकी का पानी खत्म होने के बाद आपकी बारी आयी तो क्या करेंगे? चिंता मत करिए...। एक बोतल एक्स्ट्रा पानी भी में डाल दिया गया है उधर कोने में...
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रेल  हमारी सुविधाओं का कितना
ख्याल रखती है

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)