हमारी कोशिश है एक ऐसी दुनिया में रचने बसने की जहाँ सत्य सबका साझा हो; और सभी इसकी अभिव्यक्ति में मित्रवत होकर सकारात्मक संसार की रचना करें।
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शुक्रवार, 19 दिसंबर 2014

रुबाई की आजमाइश

तरही नशिस्त में उस्ताद जी ने चुनौती दी रुबाई कहने की। शायरी में रुबाई छंद कठिन माना जाता है। इसमें बीस-बीस मात्राओं की चार लाइनें कहनी होती हैं जिनकी पहली, दूसरी और चौथी लाइन की तुक (काफिया) समान होता है। सभी लाइ्नों में मात्राओं का क्रम (बह्‍र) एक समान रखना होता है और चारो लाइनों में अभीष्ठ बात पूरी (मुकम्मल) करनी होती है। उस्ताद द्वारा उदाहरण स्वरूप एक लाइन (मिसरा) समस्या के रूप में दे दी जाती है। उसी रूप और गुण वाली चार लाइने तैयार करके रुबाई पूरी होती है। मुझे जो मिसरा मिला उसकी बहर और उनके घटक (औजान) भी बताये गये जो निम्नवत्‍ है-

कुछ लोग बुरा भला मुझे कहते हैं
मफ़ऊल मफाइलुन मफाईलुन फअ
फलफूल सुफूलफल सुफलफलफल फल

इसके आधार पर जो रुबाई मेरे द्वारा कही गयी उसे उस्ताद ने पास कर दिया है। लीजिए आप भी शौक फरमाइए -

-1-
कमज़ोर सदा नज़र झुकी रखते हैं
कमज़र्फ बहुत सितम किया करते हैं
इक रोज बड़ी सज़ा मिलेगी उनको
जो लोग बुरा भला इन्हे कहते हैं

*
-2-
इक नजर तिरी उथल पुथल करती है
पुरजोर कशिश महक महक जाती है
सब लोग चकित पलट पलट तकते हैं
जो आग बुझी लहक लहक उठती है

**

-3-
वह रोज बहुत मरा मरा कहता था
प्रभु नाम वही जपे चला जाता था
यह बात हुई कि जो कभी रहजन था
वह संत बना अमर कथा रचता था

***

मुझे पता है कि आप हौसला आफ़जाई तो करेंगे ही। नया-नया फितूर है। आपकी दाद से ही यह परवान चढ़ेगा। Smile

(इस मौके पर जो ग़जल कही गयी वह अगली पोस्ट में।)

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
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शनिवार, 13 सितंबर 2014

बचपन के मीत का गीत…

आज मेरे बचपन के दोस्त संजय कुमार त्रिपाठी का जन्मदिन है। हम आठवीं से दसवीं कक्षा तक एक साथ पढ़े। उन तीन सालों में शायद ही कोई ऐसा दिन रहा हो जब कक्षा में हम एक साथ न बैठे हों। उस ग्रामीण विद्यालय में पढ़ने के लिए मैं अपने घर से दूर एक ‘क्‍वार्टर’ में रहता था जो वहाँ के इलाके में एक प्रतिष्ठित व्यक्ति के घर के बाहरी बरामदे का छोटा सा कमरा था। संजय अपने मामाजी के घर रहते थे जो बगल के गाँव में था। स्कूल के बाहर भी हम लोगों की पढ़ाई प्रायः एक दूसरे के संपर्क में रहते हुए ही होती थी। कभी-कभी मैं उनके मामाजी के घर जाकर रुक जाता था। कभी वे मेरे कमरे पर आ जाते थे; लेकिन रात में रुक नहीं सकते थे क्यों कि कमरा इतना बड़ा नहीं था। बोर्ड परीक्षा देने के लिए जब परीक्षा केन्द्र तीस किलोमीटर दूर निर्धारित हुआ तो वहाँ हम एक साथ रुके और परीक्षा में लगभग बराबर की सफलता प्राप्त करते हुए एक दूसरे से विदा हुए।

मैंने उस ग्रामीण विद्यालय के खराब माहौल से तौबा कर ली और पिताजी से जिद करके राजकीय इंटर कॉलेज में पढ़ने गोरखपुर चला आया। गोरखपुर से इलाहाबाद विश्वविद्यालय और वहाँ से लोक सेवा आयोग की दी हुई सरकारी नौकरी बजा रहा हूँ। उधर संजय ने उसी जनता इंटर कालेज से इंटर पास किया, फिर बिहार से शिक्षक प्रशिक्षण (बी.टी.सी.) प्राप्त किया, और प्राथमिक शिक्षक बनने से पहले बी.ए. और एम.ए.(अंग्रेजी) की डिग्री गोरखपुर विश्वविद्यालय से अर्जित कर ली। आज वे बिहार के पश्चिमी चंपारण जिले में सरकारी जूनियर हाई स्कूल में एक आदर्श शिक्षक की नौकरी करते हुए अपनी छोटी सी गृहस्थी सम्हाल रहे हैं। उनके शिक्षण कार्य की कुशलता को देखते हुए उन्हें अन्य शिक्षकों को प्रशिक्षण देने का अतिरिक्त कार्य सौंप दिया गया है जिसे पूरा करने के लिए उन्हें रविवार की साप्ताहिक छुट्टी भी समर्पित करनी पड़ती है। इसके लिए मिलने वाला अतिरिक्त पारिश्रमिक उनके समक्ष मुंह खोले तमाम आर्थिक चुनौतियों का सामना करने हेतु कुछ अतिरिक्त संबल जरूर देता होगा लेकिन उनकी कर्मनिष्ठा में डूबी हुई दिनचर्या इतनी व्यस्त हो चुकी है कि नौकरी के बाहर के सारे काम ठप हो चुके हैं। इष्टमित्रों से मिलना-जुलना, रिश्तेदारों के घर आना-जाना, छुट्टियों में बच्चों को लेकर बाहर घूमने जाना या सोशल मीडिया पर स्टेटस डालने और बतकही करने का शौक पैदा ही नहीं हो सका।

संजय एक ऐसी दुनिया में रमे हुए हैं जो महानगरीय संस्कृति और उपभोक्ता वादी सामाजिकता से कोसों दूर है। निवास स्थान से बीस-पच्चीस किलोमीटर दूर की नौकरी बजाने के लिए अनिवार्य हो चुकी मोटरसाइकिल भी काफी प्रतीक्षा के बाद आ सकी और अदना सा मोबाइल उसके भी बाद में। कर्ज लेकर घर का ढाँचा तो खड़ा कर लिया लेकिन उसके खिड़की दरवाजे बनवाने में कई साल लग गये। बच्चों की छोटी-छोटी जरूरतों के लिए भी अपने साथ कई समझौते करने पड़े। लगभग पूरे वेतन पर ई.एम.आई. ने कब्जा कर रखा है लेकिन मजाल क्या कि इनके चेहरे पर कभी शिकन देखने में आयी हो। जब भी पडरौना जाता हूँ तो इनके घर मिलने जरूर जाता हूँ। वही प्रसन्नता से मुस्कराता चेहरा और अपनी गृहस्थी के प्रति सजगता और जिम्मेदारी से भरा, उत्साह से लबरेज जीवन्त व्यक्तित्व देखने को मिलता है।

बात-बात में ठहाके लगाते और गुदगुदाने वाले किस्से-कहानियों का लुत्फ़ लेते हुए संजय की कोई ऑनलाइन प्रोफाइल नहीं है। वर्षों पहले मैंने इनका एक जी-मेल खाता बना के दे दिया तो उसका पासवर्ड धरे-धरे गायब हो गया और मेल चला गया तेल लेने। इंटरनेट तक अपनी पहुँच बनाने की न तो इन्हें जरूरत महसूस हुई और न ही कोई सुभीता ही हुआ। मेरे झकझोरने पर आज जब किसी दूसरे के ई-मेल एकाउंट से इन्होंने मुझे अपनी एक हस्तलिखित रचना भेजी तो मैंने सोचा फोन के बजाय इस पोस्ट के माध्यम से इन्हें अपनी शुभकामनाएँ उनतक पहुँचाऊँ। 

Sanjay K Tripathi1

अपनो का हो साथ तो इक संबल मिलता है
जीवन नौका को खेने का बल मिलता है

सत्य और भ्रम का अंतर जो समझ सका है
श्रमजीवी होने का मतलब समझ सका है
मन में रखता है जो ऊँची अभिलाषाएँ
घोर निराशा में आशा के दीप जलाए

ऐसे ‘कर्मवीर’ को ही प्रतिफल मिलता है
अपनों का हो साथ तो इक संबल मिलता है

जीत हार का जिसपर कोई असर नहीं है
दुनियादारी की बातों का असर नहीं है
अन्तर्मन के निर्णय पर ही चलता जाये
यमदूतों के भय से भी जो ना घबराये

ऐसे को ही हर प्रश्नों का हल मिलता है
अपनों का हो साथ तो इक संबल मिलता है।

-संजय कुमार त्रिपाठी

मैं चाहता हूँ आधुनिकता की चकाचौंध से दूर दुर्गम ग्रामीण इलाकों में शिक्षा की ज्योति जलाने में लगे इस अहर्निश कर्मयोगी को उसके जन्मदिन (१३ सितंबर) पर आप भी शुभकामनाएँ देना चाहें।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
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सोमवार, 31 मार्च 2014

वोट नहीं डालोगे तो लानत है तुमपर

  आगामी लोकसभा चुनावों की सबसे उत्साहजनक तस्वीर यह होने जा रही है कि इस बार वोट देने वालों की संख्या अबतक की सर्वाधिक होगी। जनसंख्या वृद्धि इसका एक कारण तो है ही लेकिन मैं जिस वृद्धि की बात कर रहा हूँ वह मतदान प्रतिशत की है; जो इस बार पिछले सारे रिकार्ड तोड़ने वाला है।

SVEEP Poster1अभी तक होता यह रहा है कि मतदाता सूची में जितने लोगों का नाम होता था उसमें से आधे से कुछ ही अधिक लोग वोट डालते थे, शेष या तो उस स्थान पर रहते ही नहीं थे या रहते हुए भी वोट डालना बेकार का काम समझते थे। इसका कुफल यह हुआ कि राजनीतिक दलों ने अपनी जीट के लिए पन्द्रह से बीस प्रतिशत मतदाताओं को खुश करने के आसान फॉर्मूले खोजने शुरू कर दिए। जाति और धर्म के आधार पर गोलबन्दी होने लगी, अगड़े-पिछड़े-दलित-अल्पसंख्यक वर्ग के लोग अपनी जातीय या सांप्रदायिक पहचान के आधार पर एकजुट होकर अपने को एक वोटबैंक के रूप में देखने लगे और प्रत्याशियों को चुनने के लिए उनकी जातीय या सांप्रदायिक पहचान को अपने मत का आधार बनाने लगे।

इसका परिणाम यह हुआ कि संकीर्ण क्षेत्रीयता और जातीयता का पोषण करने वाली पार्टियों को चुनावों में सफलता मिलने लगी और सत्ता मिलने के साथ ही एक नये प्रभु वर्ग का उदय हो गया जिसके बारे में घोटालों और भ्रष्टाचार की खबरे ज्यादा और जनहित के लिए काम करने की बातें कम सुनायी देती रहीं। हमारी चुनावी पद्धति ऐसी है कि प्रत्याशी को जीत के लिए आधे वोटों की भी जरूरत नहीं पड़ती इसलिए वह सच्चे बहुमत के बारे में सोचने की जरूरत ही नही समझता।

SVEEP Posterभारत के चुनाव आयोग ने ठीक ही अपना कर्तव्य समझा कि सच्चे अर्थों में लोकतंत्र तभी स्थापित होगा जब वास्तव में बहुमत से चुने हुए प्रतिनिधि देश की संसद और विधान सभाओं में जायें। इसके लिए एक सुविचारित रणनीति बनायी गयी है। यह एक कोशिश है देश की जनता को जगाने की, यह समझाने की कि वोट देना कितना जरूरी है। देश के प्रत्येक वयस्क नागरिक को यह कर्तव्यबोध कराने की कि दुनिया का तथाकथित सबसे बड़ा लोकतंत्र असफल हो जाएगा यदि देश की जनता के आलस्य और उदासीनता के कारण दोयम दर्जे के नेता देश की बागडोर सम्हालते रहेंगे।

इस अभियान की सफलता के लिए युद्ध स्तर पर प्रयास किये गये हैं। यह सुनिश्चित किया जाना है कि देश का संविधान जिस व्यक्ति को वोट देने का अधिकार देता है वह इस अधिकार का प्रयोग भी जरूर करे। इस अभियान को नाम दिया गया है– स्वीप; अर्थात्‌ Systematic Voters’ Education and Electoral Participation (SVEEP).

चुनाव आयोग ने यह महसूस किया कि देश की जनता को उसके मताधिकार के प्रति जागरूक करना जितना जरूरी है उससे ज्यादा जरूरी यह है कि वोट डालने की राह में आने वाली उन सभी बाधाओं को दूर किया जाय जो जागरूक वोटर को भी पोलिंग बूथ तक जाने से रोकती हैं।

देश के एक आम नागरिक को मतदाता के रूप में जो ज्ञान रखना चाहिए और वह वास्तव में जितना जानता है  इन दोनो में बड़ा अन्तर है। इस अन्तर को पाटने के लिए आयोग ने गंभीर प्रयास किये हैं। मतदाता पंजीकरण कैसे होगा, फोटोयुक्त मतदाता पहचान पत्र (EPIC) कैसे बनेगा, दूसरे पहचान-पत्र क्या हो सकते है, आपका मतदान केन्द्र कहाँ है, बूथ कौन सा है, ई.वी.एम. का प्रयोग कैसे करना है, चुनाव के दिन क्या करना है और क्या नहीं करना है, प्रत्याशी के लिए आदर्श आचार संहिता क्या है, धन-बल का प्रयोग करने वालों की क्या दवा है, समाज के कमजोर और असहाय तबकों का चुनाव के दौरान भयादोहन कैसे किया जा सकता है, और इसे रोकने  क्या उपाय हैं; इन सभी प्रश्नों का समुचित उत्तर बताने के लिए चुनाव आयोग ने बाकायदा एक कार्य योजना बनाकर जिम्मेदार अधिकारियों की फौज इसके क्रियान्वयन के लिए लगा रखी है।

आयोग ने कम मतदान प्रतिशत के लिए मोटे तौर पर जिन कारणों की पहचान की है वे हैं- त्रुटिपूर्ण व अधूरी मतदाता सूची, शहरी वर्ग की उदासीनता, लैंगिक विभेद, युवाओं की बेपरवाही इत्यादि। इनके निवारण के लिए मतदाताओं को शिक्षित करने, जागरूक करने और चुनाव संबंधी प्रशासनिक तंत्र को दक्ष बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाये गये हैं।

SVEEP Poster2 मतदाता सूची में अनेक फर्जी और गैरहाजिर लोगों के नाम भरे रहते थे जिन्हें गहन समीक्षा करते हुए निकाल दिया जा रहा है, घर से बाहर रहकर रोजी-रोटी कमाने वालों या सरकारी नौकरी करने वालों का नाम गाँव की सूची से निकालकर उनके सामान्य निवास के स्थान पर जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। ऑनलाइन पंजीकरण की सुविधा तो है ही, सभी बूथॊं के लिए स्थानीय रूप से उपलब्ध एक-एक समर्पित कर्मचारी (BLO) की नियुक्ति करके उसे जिम्मेदारी दी गयी है कि वह उस बूथ से संबंधित मुहल्लों में घर-घर जाकर वैध मतदाताओं की सूची तैयार करेगा, उनके पंजीकरण का फॉर्म भरवाएगा, जो मर चुके हैं या कहीं बाहर चले गये हैं उनका नाम सूची से हटवाएगा और वैध व सच्ची मतदाता सूची तैयार करेगा। इस प्रकार तैयार की गयी अद्यतन सूची की प्रतियाँ बूथ के नोटिस बोर्ड पर लगायी जाएंगी, मतदाताओं की चौपाल लगाकर मतदाता सूची को त्रुटिरहित बनाया जाएगा।

सभी मतदाताओं का फोटोयुक्त पहचानपत्र तैयार कराकर घर-घर ले जाकर प्राप्त कराने तक की जिम्मेदारी इस बी.एल.ओ. को दी गयी है। अपने बूथ के प्रायः सभी मतदाताओं को यह व्यक्तिगत रूप से पहचान सकेगा। मतदान के दिन से तीन-चार दिन पहले ही सभी मतदाताओं को वोटर-पर्ची बनाकर उनके घर पर दे आने का जिम्मा भी यह कर्मचारी उठाएगा। अब पार्टियों की स्टॉल लगाकर पर्ची बाँटने के काम से छुट्टी कर दी गयी है।

लाखों की संख्या में जो सरकारी कर्मचारी, पुलिस और अर्द्ध सैनिक बलों के लोग चुनाव की ड्यूटी होने के कारण अपना वोट नहीं डाल पाते थे उनका वोट भी हर हाल में डलवाने की व्यवस्था कर ली गयी है। पोस्टल बैलेट से लेकर ड्यूटी वाले बूथ पर ही उनका वोट डलवाने के विकल्प खोले गये हैं। यह अभियान ‘पल्स पोलियो अभियान’ या ‘सर्व शिक्षा अभियान’ की याद दिलाता है जिसका नारा है- “एक भी बच्चा छूटने न पाये।” चुनाव आयोग भी चाह रहा है कि “एक भी वोटर छूटने न पाये।”

चुनाव आयोग मानो कह रहा है कि हे वोटर महोदय, इतनी कृपा कीजिए कि बूथ तक पहुँचकर अपना वोट डाल दीजिए। लोकतंत्र के मंदिर में वोटर को भगवान बनाने की यह मुहीम रंग लाने वाली है। प्रिन्ट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में, बौद्धिक सेमिनारों में और गाँव-गाँव की गली-गली तक इस संदेश को पहुँचाने की पुरजोर कोशिश की जा रही है। यह सब देखकर बस यही कहने का मन करता है कि इसके बावजूद यदि आप अपने मताधिकार का प्रयोग नहीं करते हैं तो लानत है।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

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शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2014

इधर खाप उधर जिर्गा

Swara Customसनीदा जब पाँच साल की थी तो उसे एक दिन अपने स्कूल से घर वापस जाने में डर लग रहा था। वह इधर-उधर छिपती रही क्यों कि घर पर उसका बाप बैठा हुआ था जिसके सामने वह जाना नहीं चाहती थी। दर असल उसके अब्बा अली अहमद ने उसकी सगाई का सौदा एक दूसरे कबीले से ‘स्वार’ व्यवस्था के तहद कर दिया था। हुआ यह था कि उस दूसरे कबीले की किसी लड़की को वह भगा लाया था और पकड़ा गया था। कबीले वाले उसकी जान लेने पर उतारू थे। झगड़ा निपटाने के लिए जिर्गा बुलायी गयी थी। यह जिर्गा पश्तूनों के झगड़े निपटाने के लिए वही शक्ति रखती है जैसी हमारे यहाँ खाप पंचायतें। जिर्गा ने फैसला सुनाया कि अली अहमद को अपने गुनाह के बदले अपने घर से दो कुँवारी लड़कियाँ देनी होंगी। उसने फैसला मंजूर किया और अपनी बेटी सनीदा (५वर्ष) और भतीजी सपना (१५ वर्ष) को उस कबीले के हाथों स्वार कर दिया।

लेकिन सनीदा का भाग्य उतना बुरा नहीं था। वह उन तमाम पाकिस्तानी स्वात घाटी की पश्तून समुदाय की लड़कियों की तरह अभागिन नहीं थी। उसकी माँ ने इस सौदे का कड़ा प्रतिरोध किया और अपने भाई के माध्यम से कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हाल ही में ग़ैरकानूनी ठहरा दी गयी इस प्रथा के खिलाफ़ कोर्ट ने आदेश पारित करते हुए सनीदा को छोड़े जाने का हुक्म दिया। अली अहमद और जिर्गा के तमाम सरदार गिरफ़्तार कर जेल भेज दिये गये। अब सनीदा सात साल की है और स्कूल में पढ़ने जाती है। यह बात अलग है कि स्कूल में उसे यह कहकर चिढ़ाया जाता है कि इसका सौदा हो चुका है और जल्दी ही कोई मर्द इसका खसम बनेगा। उधर उसकी चचेरी बहन सपना को तो उस दुश्मन कबीले के किसी प्रौढ़ आदमी के साथ घर बसाना ही पड़ा। उसके ऊपर इतने प्रतिबन्ध लाद दिये गये हैं कि बहुत कोशिश के बाद भी मीडिया (AFP) और मानवाधिकार संगठन सपना से बात नहीं कर सके; ताकि उसके अनुभवों को दुनिया के सामने ला सकें।

Swara Custom1पाकिस्तानी अखबार डान की यह खबर पढ़ने के बाद मैंने इस प्रथा के बारे में कुछ जानकारी जुटाने की कोशिश की। स्वार बाल-विवाह की एक ऐसी प्रथा है जो पाकिस्तान और अफगानिस्तान के कबीलाई इलाकों में प्रचलित है। इसका संबंध खून से जुड़े उन विवादों से है जो अलग-अलग कबीलाई खानदानों के बीच प्रायः पैदा होते रहते हैं। पंचायत द्वारा इन झगड़ों का समाधान इन बच्चियों की लेन-देन के हुक्म से होता है जिनकी बलपूर्वक शादी दुश्मन के घर में कर दी जाती है। मुख्य रूप से यह स्वात घाटी के पश्तूनों के बीच प्रचलित है। स्वार को स्थानीय बोलियों में साक (Sak), वानी(Vani) और संगचत्ती (Sangchatti) के नाम से भी जाना जाता है।

कुछ विद्वान बताते हैं कि यह प्रथा तब शुरू हुई जब 400 साल पहले उत्तर-पश्चिम पाकिस्तान के दो पश्तून कबीलों के बीच खूनी संघर्ष हुआ। इस लड़ाई में सैकड़ो मारे गये थे। वहाँ के नवाब ने उन कबीलों के बुजुर्गों की बैठक (जिर्गा) बुलायी। जिर्गा ने फैसला किया कि जिन मर्दों ने हत्या का अपराध किया है उसकी सजा के तौर पर उन्हे अपनी लड़कियाँ विपक्षी कबीले को देनी होंगी। तभी से यह कुप्रथा चल निकली जिसमें इन कबीलों और देहाती जिर्गा द्वारा चार से चौदह साल तक की कुँवारी (Virgin) लड़कियों का इस्तेमाल उनके घर के मर्दों द्वारा हत्या और खून-खराबा जैसे अपराध की सजा चुकाने के लिए किया जाने लगा। खून के बदले खून की यह न्याय व्यवस्था पाकिस्तान के पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान, सरहद और कबायली इलाकों में यत्र-तत्र प्रचलित है। कुछ दूसरे विद्वानों का कहना है कि 1979 में पाकिस्तानी सरकार ने जो हुदूद अध्यादेश जारी कर कानून का मुख्य स्रोत शरियत को बना दिया उसी ने स्वार और वानी जैसी अमानवीय प्रथाओं को प्रोत्साहित कर दिया।

सरकारी आंकड़े बताते हैं कि प्राकृतिक सौन्दर्य से भरी हुई स्वात घाटी में चार साल पहले जब एक सैनिक कार्यवाही द्वारा दो साल के हिंसक तालिबान शासन का अंत हुआ तबसे इस प्रथा में उभार आया है। वर्ष २०१३ में ऐसे नौ मामले दर्ज किये गये जबकि २०१२ में सिर्फ़ एक ही मामला दर्ज हुआ था। मानवाधिकार संगठनों का मानना है कि ऐसी कुरीति के वास्तविक आंकड़े इससे बहुत अधिक होंगे क्योंकि सरकारी स्तर पर इसके विस्तृत आँकड़े इकठ्ठे नहीं किये जाते हैं। मानवाधिकार कार्यकर्ता समर मिनल्ला ने इस कुरीति पर एक डॉक्युमेन्ट्री बनायी थी जिसे खूब सराहा गया। समर बताती हैं कि उन्होंने केवल वर्ष १९१२ में पाकिस्तान में घूम-घूमकर ऐसे १३२ मामलों को चिह्नित किया था।

Swara Custom2मानवाधिकार कार्यकर्ता अहद बताते हैं कि सरकार द्वारा बताये जा रहे नौ मामले तो केवल एक झलक है- बहुत बड़ी और भयानक सच्चाई की । अलबत्ता अब इससे पीड़ित लड़कियाँ और उनके परिवार खुलकर सामने आने लगे हैं। मीडिया के प्रसार से लोग यह समझने लगे हैं कि यह बहुत बुरी प्रथा है जिसे २०११ से गैरकानूनी घोषित किया जा चुका है। पुलिस कहती है कि कुछ मामले दर्ज तो हो जाते हैं लेकिन अभी भी इसमें गवाही देने के लिए लोग आगे नहीं आते जिससे दोषियों को सजा दिलाने में कठिनाई आती है। एक साथ एक ही गाँव में कबीलों में रहने वाले लोग एक दूसरे के विरुद्ध गवाही देने से बचते हैं। वर्ष २०१२ में जो एकमात्र मामला दर्ज किया गया था उसमें आरोपित सभी बारह मुजरिम सबूतों और गवाहों के अभाव में छोड़ दिये गये थे जबकि घटना की सच्चाई सबको पता थी।

हमारे देश की खाप पंचायते जिस प्रकार अमानवीय फैसले सुनाकर उसका क्रियान्वयन भी फौरी तरीके से कर डालती हैं और कानून ताकता रह जाता उसी प्रकार हमारे पड़ोसी देश में जिर्गा के हुक्म की नाफ़रमानी करना बहुत कठिन है। लोग जुबान खोलने से डरते हैं। हमारे समाज में यह रोटी-बेटी का मामला ऐसा जघन्य क्यों है?

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
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सोमवार, 9 दिसंबर 2013

निष्ठुर नियति…

उस दिन मैं ‘बिग बाजार’ में कुछ घरेलू सामानों की खरीदारी के लिए गया हुआ था। वहाँ मैंने देखा कि भुगतान काउंटर पर कैशियर एक बच्चे से उलझा हुआ था। बच्चा मुश्किल से छः-सात साल का रहा होगा। कैशियर ने कहा, “आय एम सॉरी, तुम्हारे पास यह गुड़िया खरीदने भर के पैसे नहीं हैं।” इसपर वह बच्चा मेरी ओर मुड़ा और आशा भरी निगाह से पूछने लगा, “अंकल, आप बताइए मेरे पैसे पूरे नहीं हैं क्या? मुझे यह गुड़िया जरूर लेनी है।”

मैंने उसके पैसे गिने और उसके सवाल का जवाब दे दिया, “प्यारे, यह तो तुम्हें भी पता है कि तुम्हारे पास गुड़िया खरीदने के लिए पूरे पैसे नहीं हैं।” इतना कहकर मैं आगे बढ़ गया था; लेकिन वह नन्हा बच्चा इसके बाद भी उस गुड़िया को अपने हाथ में थामे रहा। उसकी लालसा देखकर मैं वापस उसके पास तक गया और धीरे से पूछा कि यह गुड़िया वह किसे देना चाहता है।

“यह गुड़िया मेरी बहन को बहुत पसन्द थी, हर हाल में वह इसे पाना चाहती थी। मैं उसे यह उसके बर्थडे पर गिफ़्ट करना चाहता हूँ।” उसकी आवाज बेहद स्थिर और कोमल थी। “यह गुड़िया मैं अपनी मम्मी को दूंगा जिसे वह दीदी को दे देगी... क्योंकि वह दीदी के पास जाने वाली है।” यह कहते हुए उसकी आंखों में जो वेदना थी उसे देखकर मैं सिहर उठा।

“मेरी दीदी भगवान के पास रहने चली गयी है... डैडी कह रहे हैं कि मम्मी भी बहुत जल्दी भगवान से मिलने जाने वाली है, इसलिए मैंने सोचा कि मम्मी के साथ गुड़िया भेंज दूंगा तो दीदी पा जाएगी...।”

मेरा कलेजा तो थम ही गया। उस छोटे से बच्चे ने सिर ऊपर उठाकर मेरी ओर देखा और बोला, “मैं डैडी से बोलकर आया हूँ कि अभी मम्मी को जाने मत देना जबतक मैं मॉल से लौटकर नहीं आ जाऊँ।” उसके बाद उसने अपनी एक बेहद खूबसूरत तस्वीर दिखायी जिसमें वह हँस रहा था। फिर बोला, “मैं मम्मी के साथ अपनी यह फोटो भी भेजूंगा जिससे मेरी दीदी मुझे भुला न सके।” अब वह सुबकने लगा था, “मैं अपनी मम्मी को बहुत प्यार करता हूँ और नहीं चाहता कि वह मुझे छोड़कर जाये, लेकिन डैडी कहते हैं कि उसे दीदी के पास रहने के लिए जाना ही पड़ेगा।” इसके बाद उसने फिर उस गुड़िया की ओर कातर दृष्टि से देखा, बहुत शान्त होकर...।

मैंने बच्चे से छिपाकर अपना बटुआ निकाला और उस बच्चे से बोला, “चलो, क्यों न एक बार फिर तुम्हारे पैसे गिन लिये जाय; कहीं ऐसा न हो कि सच में तुम्हारे पैसे गुड़िया की कीमत भर के हों?”

“ठीक है!” वह बोला, “मुझे लगता है कि मेरे पैसे उतने जरूर हैं।” मैंने उसको दिखाये बिना उसके पैसों में अपने पास से कुछ मिला दिये और फिर हम उसे गिनने लगे। अब गुड़िया के लिए पर्याप्त पैसे हो गये थे; बल्कि कुछ बच भी रहे थे। नन्हे बच्चे ने कहा, “भगवान, आपको ‘थैंक्यू’! आपने मुझे काम भर का पैसा दे दिया!”

फिर उसने मेरी तरफ़ देखा और बताने लगा, “मैंने कल रात सोने से पहले भगवान से कहा था कि मुझे यह गुड़िया खरीदने भर का पैसा दे देना, ताकि मेरी मम्मी इसे मेरी दीदी तक पहुँचा सके। उसने मेरी सुन ली”

“मैं तो यह भी चाहता था कि काश मेरे पास इतने पैसे होते कि मम्मी के लिए भी एक सफेद गुलाब खरीद सकूँ; लेकिन भगवान से इतना मांगने की हिम्मत नहीं हुई। फिर भी देखिए, भगवान ने मुझे इतना दे दिया कि अब मैं इस गुड़िया के साथ एक सफेद गुलाब भी खरीद लूंगा। मेरी मम्मी को सफेद गुलाब बहुत अच्छे लगते हैं।” मैं वहाँ अब और नहीं ठहर सकता था।

मैंने अपनी खरीदारी बहुत अन्यमनस्क भाव से की। उस बच्चे की बातें मेरे दिमाग से निकलने का नाम नहीं ले रही थीं। तभी मुझे ध्यान आया कि दो दिन पहले स्थानीय अखबार में एक खबर छपी थी कि शराब पीकर ट्रक चला रहे ड्राइवर ने एक कार को टक्कर मार दी थी जिसमें एक युवती और एक छोटी बच्ची सवार थे। छोटी बच्ची तत्काल मर गयी थी और उसकी माँ गंभीर चोट की हालत में अस्पताल में भर्ती करायी गयी थी। खबर यह थी कि अब उस परिवार को यह निर्णय लेना था कि कोमा में जा चुकी महिला को मशीनों के बल पर कृत्रिम रूप से जिन्दा रखा जाय कि मशीनें बन्द कर दी जाय। यह पक्का हो चुका था कि अब वह कोमा से वापस नहीं आ सकेगी। मेरा कलेजा धक्क से रह गया- कहीं यह परिवार इसी बच्चे का तो नहीं है?

बच्चे से मुलाकात के दो दिन बाद अखबार में खबर छपी कि उस महिला की मौत हो गयी। मैं अपने आप को रोक नहीं सका। मैंने सफेद गुलाबों का एक गुच्छा खरीदा और अंतिम संस्कार वाली जगह पर पहुँच गया। वहाँ उस युवती का पार्थिव शरीर परिजनों, मित्रों और अन्य लोगों के लिए अंतिम दर्शन और श्रद्धांजलि अर्पित करने को रखा गया था। ताबूत में वह लेटी हुई थी जिसके हाथों में सफेद गुलाब पकड़ाया गया था, और उसके सीने पर वही गुड़िया और उस बच्चे की तस्वीर सजाकर रखी गयी थी। मैं वहाँ खड़ा नहीं रह सका। आखें पोंछते हुए वहाँ से फौरन चल पड़ा। ऐसा महसूस हो रहा था कि अब मेरी जिन्दगी हमेशा के लिए बदल गयी...

उस छोटे से बच्चे के मन में अपनी माँ और अपनी बहन के लिए जैसा प्यार था, आज भी उसकी कल्पना करना बहुत कठिन है; और मात्र एक क्षण में उस शराबी ड्राइवर ने वह सब छीन लिया उससे।

[वैसे तो नियति पर किसी का कोई वश नहीं होता; लेकिन ऐसी मानवजनित घटनाएँ तो रोकी ही जा सकती हैं। क्या हम शराब पीने और शराब पीकर गाड़ी चलाने पर पूरी तरह रोक नहीं लगा सकते?]

(usefulinformation के संदेश से अनूदित)

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

www.satyarthmitra.com

मंगलवार, 23 जुलाई 2013

खो गया बटुआ मिल गयी चिठ्ठी : कितनी मिठ्ठी

[A Letter in a lost wallet] (http://piqmug.blogspot.in  से अनूदित व साभार)

करीब तीस साल पुरानी बात है। कड़कड़ाती सर्दी की एक शाम जब मैं ऑफ़िस से अपने घर की ओर जा रहा था तो रास्ते पर एक बटुआ पड़ा देखकर रुक गया। शायद किसी की जेब से गिर गया होगा। मैंने उसे उठा लिया और इसे खोलकर देखने लगा कि इसमें शायद इसके मालिक का कोई अता-पता मिल जाय; या शायद कोई नम्बर ही मिल जाय तो उसे फोन करके बता दूँ। लेकिन उस बटुए में सिर्फ़ तीन डॉलर के नोट थे और एक मुड़ा-तुड़ा पत्र था जो देखने में लगता था कि कई सालों से इसी में पड़ा हुआ है।

walletवह पत्र जिस लिफाफे में था वह काफी घिस चुका था और उसपर लिखा हुआ प्रायः सबकुछ मिट चुका था, केवल प्रेषक का पता बचा हुआ था जो मुश्किल से पढ़ा जा सकता था। मैंने पत्र को खोलना शुरू किया। इसमें शायद कोई सुराग मिल जाय। तभी मैंने पत्र की तारीख देखी- 1924। इसका मतलब यह पत्र तबसे करीब साठ साल पहले लिखा गया था।

पत्र की लिखावट बहुत सुन्दर थी जो किसी कन्या द्वारा लिखी जान पड़ती थी। हल्के नीले रंग के आकर्षक कागज के ऊपरी बायें कोने पर एक छोटा सा सुन्दर फूल बना हुआ था। पत्र को पढ़ने से यह पता चला कि यह किसी ‘प्रिय जॉन’ को लिखा गया था जिसका नाम माइकल रहा होगा। पत्र लिखने वाली अब उसे आगे से नहीं मिलने वाली थी क्योंकि उसकी माँ ने उसे मना कर दिया था। इसके बावजूद, उसने लिखा था कि वह उसे हमेशा प्यार करती रहेगी।

नीचे जो हस्ताक्षर थे उसमें नाम था – हना।

पत्र बहुत ही बढ़िया था। लेकिन उसके पाने वाले के नाम ‘माइकल’ के अलावा उसमें ऐसी कोई भी सूचना नहीं थी जिससे इसके मालिक की पहचान की जा सके। मैंने सोचा कि क्यों न प्रेषक का जो पता लिखा हुआ है उसके बारे में पता किया जाय। शायद उस पते का कोई फोन नंबर ही मिल जाय। मैंने टेलीफोन सूचना विभाग में फोन लगा दिया।

“मैडम ऑपरेटर” मैंने धैर्य से समझाते हुए कहा, “मैं आपसे एक विचित्र अनुरोध कर रहा हूँ। ...मुझे रास्ते में पड़ा एक बटुआ मिला है। मैं इसके मालिक का पता लगाने की कोशिश कर रहा हूँ। ...इसमें एक पत्र मिला है जिसपर एक पता लिखा है। क्या आप किसी तरह यह बता सकती हैं कि इस पते से संबंधित कोई फोन नंबर है या नहीं...?”

उसने मुझे सलाह दी कि मैं उसके सुपरवाइजर से बात कर लूँ। सुपरवाइजर ने थोड़ी हिचकिचाहट के बाद कहा, “हाँ ठीक है, ...उस पते पर एक फोन नंबर तो है लेकिन उसे मैं आपको नहीं दे सकती।” उसने कहा कि वह मेरी इतनी मदद कर सकती है कि वह स्वयं उन लोगों से बात कर ले और यदि वे इजाजत दें तो मेरी बात उन लोगों से करा दे। मैंने कुछ ही मिनट प्रतीक्षा की होगी कि वह दुबारा फोन लाइन पर आ गयी, “लीजिए, कोई आपसे बात करना चाहता है।”

फोन पर दूसरी ओर जो महिला मिलीं उनसे मैंने पूछा कि क्या वे किसी हना नाम की लड़की को जानती हैं। थोड़ी देर वो अचंभित सी चुप रहीं, फिर बोलीं, “ओह, हम लोगों ने जिस परिवार से यह मकान खरीदा था उनकी एक बेटी थी - हना नाम की। लेकिन यह तीस साल पहले की बात है।”

मैंने पूछा- “क्या आपको पता है कि वे लोग इस समय कहाँ मिल सकते हैं?”

“मुझे हना के बारे में इतना याद है कि कुछ साल पहले उसे अपनी माँ को एक नर्सिंग होम में रखना पड़ा था।” उस महिला ने बताया। “हो सकता है यदि आप उस नर्सिंग होम वालों से संपर्क करें तो शायद उनसे हना के बारे में कुछ पता चल सके।”

उन्होंने मुझे नर्सिंग होम का पता दिया और मैंने वहाँ फोन मिला दिया। उन लोगों ने बताया कि वहाँ भर्ती बुजुर्ग महिला कुछ साल पहले गुजर गयी; लेकिन उनके पास एक फोन नंबर जरूर था जिसकी मदद से उसकी बेटी तक पहुँचा जा सकता था। कम से कम ऐसा उनका अनुमान था।

मैंने उन्हें धन्यवाद दिया और उस नंबर पर फोन मिलाया। जिस औरत ने फोन उठाया उसने बताया कि हना अब खुद ही एक नर्सिंग होम में रहती है।

अब मैं सोचने लगा कि मुझसे यह कितनी बड़ी बेवकूफ़ी हो रही है। आखिर मैं यह क्यों कर रहा हूँ..? सड़क पर पड़े मिले एक साधारण से पर्स के मालिक का पता लगाकर ऐसा क्या बड़ा तीर मार लूंगा जिसमें पड़े हैं केवल तीन डॉलर और एक चिठ्ठी जो लगभग साठ साल पुरानी है...?

ऐसा सोचते हुए भी मैंने उस नर्सिंग होम को फोन मिला ही दिया जिसमें हना के निवास करने की आशा थी। जिस आदमी ने फोन उठाया उसने बताया, “जी हाँ, हना जी हमारे साथ ही रहती हैं।”

हाँलाकि तबतक रात के दस बज चुके थे फिर भी मैंने पूछ लिया कि क्या मैं उनसे मिलने वहाँ आ सकता हूँ।

“ठीक है...,” उसने सकुचाते हुए कहा- “यदि आप कोशिश करना चाहते हैं तो आइए, हो सकता है अभी वे दिन वाले कमरे (डे-रूम) में बैठकर टीवी देख रही हों।”

मैंने उन्हें धन्यवाद दिया और गाड़ी लेकर उस नर्सिंग होम में पहुँच गया। रात्रिकालीन ड्यूटी नर्स और सिक्यूरिटी गार्ड ने दरवाजे पर मेरा अभिवादन किया। हम इस विशाल इमारत की तीसरी मंजिल पर गये। डे-रूम में नर्स ने मेरा परिचय हना से कराया।

चेहरे पर ताजी मुस्कान और आँखों में अनोखी चमक लिए चाँदी से चमकते बालों वाली वह पुराने जमाने की एक खूबसूरत महिला थीं।

मैंने उन्हें बटुए के बारे में बताया और उसमें रखी वह चिठ्ठी दिखायी। जिस क्षण उन्होंने उस हल्के नीले रंग के लिफाफे और उसके कोने पर बने छोटे से फूल को देखा, उन्होंने एक गहरी साँस भरी और बोल पड़ी, “नौजवान, माइकल के साथ मेरा आखिरी संपर्क इस चिठ्ठी से ही हुआ था।”

वे थोड़ी देर के लिए मुँह घुमाकर गहरी सोच में डूब गयीं। उसके बाद बहुत कोमल आवाज में बताने लगीं, “मैं उसे बहुत प्यार करती थी। लेकिन तब मैं केवल सोलह साल की थी और मेरी माँ को लगा कि मैं बहुत छोटी हूँ। ...ओह, वह बेहद खूबसूरत इन्सान था। ...वह अभिनेता सीन कोनेरी की तरह दिखता था।”

“हाँ...” वे बोलती जा रही थीं, “माइकल गोल्डस्टीन अनोखा आदमी था। यदि तुमसे मिले तो उससे कहना कि मैं अभी भी उसके बारे में सोचती हूँ। और...” थोड़ी देर के लिए वे सकुचाकर रुक गयीं, फिर अपने होंठ लगभग काटते हुए बोलीं, “उससे कहना कि मैं अभी भी उससे प्यार करती हूँ... और...” वे एक ओर मुस्करा रही थीं और दूसरी ओर उनकी आँखों से बड़ी-बड़ी बूँदे टपकती जा रहीं थीं, “मैंने कभी शादी नहीं की...। मैं समझती हूँ कि माइकल जैसा दूसरा कोई था ही नहीं...”

मैंने हना जी को धन्यवाद कहा और विदा ली। लिफ़्ट से पहली मंजिल पर उतर आया। वहाँ जो गार्ड खड़ा था उसने पूछा- “क्या उस बूढ़ी महिला ने आपकी कोई मदद की?”

मैंने उसे बताया कि उन्होंने मुझे एक सूत्र दिया है। “अब मुझे कम से कम इसके मालिक का पूरा नाम पता चल गया है। लेकिन मुझे लगता है कि अब मैं इसे यूँ ही कुछ समय तक रहने दूँगा। मैंने लगभग पूरा दिन इसके मालिक का पता लगाने में खर्च कर दिया है।”

इस बीच मैंने उस बटुए को बाहर निकाल लिया था जो कत्थई रंग के चमड़े का एक साधारण सा बटुआ था जिसके किनारों पर लाल रंग के गोटे लगे थे। जब गार्ड ने उसे देखा तो बोल पड़ा- “अरे, एक मिनट रुकिए तो! यह तो गोल्डस्टीन साहब का बटुआ है। मैं तो इसे कहीं भी पहचान सकता हूँ। इसमें जो चमकता हुआ लाल गोटा लगा है उससे। वे इसे हमेशा खो देते हैं। मैंने इस बटुए को कम से कम तीन बार तो यहाँ के हालों में ही गिरा हुआ पाया है।”

“ये गोल्डस्टीन साहब कौन हैं?” यह पूछते हुए मेरे हाथ काँपने लगे।

“वे आठवीं मंजिल पर रहने वाले बुजुर्गों में से एक हैं। यह निश्चित रूप से माइकल गोल्डस्टीन साहब का ही बटुआ है। जरूर उन्होंने टहलते समय इसे गिरा दिया होगा।”

मैंने गार्ड को शुक्रिया कहा और लगभग दौड़ते हुए नर्स के ऑफिस में घुस गया। मैंने उसे गार्ड की कही बात बतायी। हम लिफ़्ट तक गये और अन्दर चढ़ गये। मैं मन ही मन प्रार्थना करता रहा कि ऊपर श्री गोल्डस्टीन मिल जाँय।

आठवीं मंजिल की नर्स ने बताया, “मुझे लगता है कि वे अभी भी डे-रूम में ही हैं। वे रात को पढ़ना पसन्द करते हैं। वे बहुत प्यारे बुजुर्ग हैं।

हम उस एकमात्र कमरे में पहुँच गये जहाँ कोई बत्ती जल रही थी और एक आदमी किताब पढ़ रहा था। नर्स उनके पास तक गयी और पूछा- क्या आपका बटुआ खो गया है? श्री गोल्डस्टीन ने हैरत से सिर ऊपर उठाकर देखा, अपना हाथ पीछे की जेब पर रखकर टटोला और बोले, “ओह, यह तो गायब है।”

“इन सज्जन को रास्ते में एक बटुआ पड़ा मिला है और हमें आश्चर्य है कि यह आपका हो सकता है...।”

मैंने श्री गोल्डस्टीन को वह बटुआ थमा दिया। उन्होंने उसे देखते ही राहत महसूस की और मुस्कराकर कहा, “हाँ, यही है! जरूर आज शाम को मेरी जेब से यह गिर गया होगा। मैं आपको कुछ ईनाम देना चाहता हूँ।”

“जी नहीं, धन्यवाद,” मैंने इन्कार करते हुए कहा। “लेकिन मुझे आपसे कुछ कहना है। मैंने वह चिठ्ठी पढ़ डाली... इस आशा में कि शायद इस बटुए के मालिक का पता लग जाय।”

उनके चेहरे की मुस्कान अचानक गायब हो गयी, “तुमने चिठ्ठी पढ़ डाली?”

“मैंने चिठ्ठी पढ़ ही नहीं डाली, मुझे हना जी का वर्तमान पता भी मालूम हो गया है।”

अब उनका चेहरा पीला पड़ गया। “हना...? तुम जानते हो कि वह कहाँ है? कैसी है वो? क्या वह अभी भी उतनी ही सुन्दर है जैसी पहले थी? प्लीज, ....प्लीज मुझे बताओ...।” उन्होंने याचना की।

“वो ठीक हैं... बिल्कुल वैसी ही सुन्दर जैसी आप को मालूम है।” मैंने धीरे से कहा।

वे बुजुर्ग किसी प्रत्याशा में मुस्कराये और पूछने लगे, “बताइए न, कहाँ है वो? मैं उससे बात करना चाहता हूँ।” उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया और बोले, “महोदय, आप कुछ जानते हैं, मैं उस लड़की से इतना प्यार करता था कि जब वह चिठ्ठी आयी तो मेरी जिन्दगी सच में खत्म हो गयी। ...मैंने कभी शादी नहीं की। ...मुझे लगता है कि मैं हमेशा उसे ही प्यार करता रहा हूँ।”

“श्री गोल्डस्टीन जी, मेरे साथ आइए।” मैंने कहा।

हम लिफ़्ट से तीसरी मंजिल पर उतर आये। गलियारे में अंधेरा था। एक-दो नाइट लैंप जल रहे थे जिनके सहारे हम डे-रूम तक आ गये जहाँ हना जी अकेली बैठी टीवी देख रही थीं। नर्स उनके पास तक गयी।

“हना जी,” उसने फुसफुसाते हुए बुलाया। दरवाजे के पास मेरे साथ खड़े प्रतीक्षा कर रहे माइकल की ओर इशारा करते हुए उसने पूछा, “क्या आप इस आदमी को जानती हैं?”

उन्होंने अपना चश्मा ठीक किया, थोड़ी देरे तक उधर देखा लेकिन कुछ बोला नहीं। माइकल ने हल्के से फुसफुसाकर कहा, “हना, मैं हूँ माइकल...। क्या मैं याद हूँ तुम्हें?”

वह अचानक धक्‌ से रह गयी, “माइकल! मुझे विश्वास नहीं हो रहा। माइकल! यह तुम्हीं हो! मेरे माइकल!” वे धीरे–धीरे उनकी ओर आगे बढ़े और आलिंगन कर लिया। नर्स और मैं, दोनो अपने चेहरों पर आँसू बहाते बाहर आ गये।

“देखो, ” मैंने कहा। “देखो ईश्वर की कैसी लीला है...! होनी को कोई टाल नहीं सकता। उसके घर देर है अन्धेर नहीं है।”

करीब तीन सप्ताह बाद मुझे अपने ऑफ़िस में एक फोन आया, “आप रविवार को आयोजित एक विवाह समारोह में सादर आमंत्रित हैं। आयु. हना और चि. माइकल वैवाहिक गठबंधन में बँधने जा रहे हैं।

यह बहुत ही सुन्दर वैवाहिक समारोह था। नर्सिंग होम के सभी लोग आकर्षक परिधान में सज-धजकर जश्‍न में हिस्सा ले रहे थे। हना ने हल्के कत्थई रंग का जोड़ा पहन रखा था और बेहद आकर्षक लग रही थी। माइकल ने गहरे नीले रंग का सूट पहना था जो दूर से ही पहचाना जा रहा था। मुझे उन लोगों ने सबसे अधिक तवज्जो दी।

हॉस्पिटल ने उन दोनो को एक अलग कमरा दे दिया। यदि आपको किशोर उम्र की तरह चहकती-महकती छिहत्तर साल की दुल्हन और उन्यासी साल का दूल्हा देखना हो तो यह जोड़ा ही देखने लायक होगा। लगभग साठ साल लंबे प्रेम-प्रसंग का ऐसा आदर्श पटाक्षेप और कहाँ।

(अनुवाद : सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

मूल पोस्ट : http://piqmug.blogspot.in/2013/07/a-letter-in-lost-wallet.html

शुक्रवार, 31 अगस्त 2012

प्रति-उपकार की कभी मत सोचें

कृतज्ञता

क्या आपको अपने जीवन में कभी दूसरों की मदद पाने की जरूरत पड़ी?
क्या आप को किसी ने ऐसे समय में आर्थिक सहायता की जब आपके पास जरूरी पैसे नहीं थे और कठिनाई में फँसे हुए थे?
क्या कभी आप बीमार पड़े और आपके किसी मित्र ने आपकी सेवा-सुश्रुषा की, डॉक्टर के पास ले गया?
क्या आपकी पत्नी या बच्चे के सड़क-दुर्घटना का शिकार हो जाने पर एक अपरिचित राहगीर ने उनकी सहायता की, मलहम-पट्टी करायी?
क्या आपका भाई झगड़े के पुलिस केस में फँसा तो किसी प्रभावशाली दोस्त ने अपने रसूख का प्रयोग करके उसे बचाया था?
क्या किसी तनाव के कारण जब आप मानसिक अवसाद के शिकार होते जा रहे थे तब आपके सहकर्मी ने अपना हाथ बढ़ाकर आपको सम्बल दिया था ?

यदि इन प्रश्नों का उत्तर ‘हाँ’ है तो ऐसे मददगारों के प्रति आपके मन में कृतज्ञता का भाव जरूर पैदा होता होगा। आप उनके उपकार के भार से दबा हुआ महसूस करते होंगे। आभारी होंगे उनके। यह आभार उनसे प्रदर्शित भी करते होंगे। थैंक्यू बोलकर मन कुछ हल्का हो जाता होगा। कृतज्ञता का यह भाव रखना कदाचित्‍ अच्छा माना जाता है।

लेकिन क्या आप ऐसे उपकार का बदला चुकाने के बारे में भी सोचते हैं?  क्या मन में ऐसी ख्वाहिश पालते हैं कि काश आपको भी ऐसा अवसर मिलता कि जिस व्यक्ति ने आपकी मदद की उसकी मदद आप भी कर सकें? आपके ऊपर जो एहसान किया गया है उसे याद रखते हुए क्या आप प्रति-उपकार के अवसर की तलाश में रहते हैं? क्या आप यह कामना करते हैं कि ईश्वर आपको इस लायक बनाये कि आप भी इनकी मदद कर सकें? और सबसे बढ़कर, क्या आप अपनी इस भावना से दूसरों को अवगत भी कराते हैं जिन्होंने आपकी मदद की है?

यदि इन प्रश्नों का आपका उत्तर ‘हाँ’ है तो सावधान हो जाइए। आप सही नहीं हैं। आप अन्जाने में अपने दोस्तों, मददगारों व हितैषियों का अहित कर रहे हैं। आपकी प्रति-उपकार की भावना उन्हें संकट में डाल सकती है। आप यदि ईश्वर से अपने लिए ऐसे अवसर की कामना कर रहे हैं जिसमें आप अपने ऊपर किये गये एहसान का बदला चुका सकें तो इस कामना में यह भी शामिल है कि भगवान उनके लिए कोई ऐसी परिस्थिति बनाये जिसमें उन्हें किसी की मदद की जरूरत पड़ जाय। यानि जाने-अनजाने आप उनके लिए बुरे दिनों की कामना कर रहे हैं। उन्हें आर्थिक बदहाली, बीमारी या दुर्घटना का सामना करने की नौबत आ जाय तभी आपकी वह इच्छा पूरी होगी जिसे आप उपकार का बदला चुकाना समझ रहे हैं।

इसलिए आप एहसान चुकाने की बात मत सोचें। कहीं आपकी इच्छा का मान रखने के लिए प्रकृति ऐसे उपाय न कर दे कि अगले को कठिनाई पैदा हो जाय। इसलिए बेलौस होकर अपने ऊपर किये गये एहसान का एकाउंट बनाना भूल जाइए। यह याद मत रखिए कि अमुक व्यक्ति ने आपके गाढ़े वक्त में मदद की थी। और मुझे भी उसके गाढ़े वक्त में….। ना बाबा ना…। कत्तई नहीं। छोड़ दीजिए उसे उसके हाल पर। ईश्वर उसे अच्छे कार्य का पुरस्कार देगा।

इसका एक दूसरा पहलू भी है जो आम तौर पर एक अन्य कारण से समझाया जाता है। वह यह कि आप किसी की कोई मदद करते हैं तो काम हो जाने के बाद उसे अवश्य भुला दीजिए। नेकी कर दरिया में डाल। यह भुला देना सबसे ज्यादा आपके लिए लाभदायक है। यदि आप बदले में कुछ अपेक्षा करते हैं तो नुकसान ही नुकसान है। अव्वल तो आपकी उम्मीद पूरी नहीं होने पर आप निराशा के शिकार हो जाएंगे और मानसिक त्रासदी झेलेंगे। लेकिन दूसरी महत्वपूर्ण बात यह होगी कि आप अन्जाने में  स्वयं अपने लिए बुरे वक्त को न्यौता देते रहेंगे। आप यदि चाह रहे हैं कि आपको भी अमुक व्यक्ति वैसी ही सहायता करे जैसी आपने की थी तो आप सबसे पहले अपने लिए वैसी विपरीत परिस्थिति की परिकल्पना कर रहे हैं।

इसलिए यदि अपना भला चाहते हैं तो अपनी उपलब्धियों के लिए केवल ईश्वर को धन्यवाद दीजिए और उससे प्रार्थना कीजिए कि वह आपको कभी भी एहसान का बदला चुकाने का मौका न दे; और न ही किसी दूसरे के मन में ऐसी भावना पैदा होने दे कि वे आपकी मदद करने की कामना पालें। एक बार इस दृष्टि से सोचकर देखिए आपके मन का बहुत सा असंतोष और भार पल भर में मिट जाएगा और आप बहुत हल्का महसूस करेंगे। करना ही है तो उनकी मदद कीजिए जिनसे आपको कोई रिटर्न लेने की गुन्जाइश नहीं है। फिर मस्त रहेंगे।

मैंने तो जबसे यह सूत्र पाया है बहुत मजे में हूँ। Smile
आप भी आजमाइए…। क्या ख्याल है?

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी - सत्यार्थमित्र)

शुक्रवार, 9 दिसंबर 2011

सेमिनार रिपोर्ट... डेटलाइन कल्याण (मुम्बई) :एक क्षेपक

...पिछ्ली किश्त से आगे

चाय विश्राम से लौटकर मुझे सीधे मंच को ‘सुशोभित’ करना था इसलिए लाइव रिपोर्टिंग का सिलसिला थम गया। मुझे तमाम लोगों को यह बताना था कि ब्लॉगिंग की उपयोगिता क्या है। मुझसे पहले चार-पाँच विद्वानों को इस विषय पर प्रपत्र वाचन भी करना था। बहुत जानदार व शानदार सत्र रहा। मंच पर जो कुछ हुआ उसका किस्सा आगे है। अभी यह बताता चलूँ कि जिस ‘बालाजी इंटरनेशनल’ में हमें ठहराया गया था उसमें हम आज की रात मौजूद नहीं हैं।

हमें कोई ले उड़ा है। सिर्फ़ हमें ही नहीं, हमारे साथ रवीन्द्र प्रभात जी और शैलेश भारतवासी भी आ गये हैं। या कह लीजिए कि हम उनके साथ उड़ा लिए गये हैं। कल्याण से करीब पचास किलोमीटर दूर पहाड़ी ऊबड़ खाबड़ रास्तों से होते हुए हमें जिस तरह लाया गया है उसका परिणाम यह है कि हम लोग यहाँ से वापस भी अपनेआप नहीं जा पाएंगे। अंधेरे रास्ते से होते हुए आये। मुम्बई के रास्तों पर भी स्ट्रीट लाइट नहीं जलती है यह जानकर हमें सदमा सा लग रहा था। कार के बन्द शीशे से बाहर झाँकते हुए रस्तेभर हम साइनबोर्ड पढ़ने की कोशिश करते रहे कि जान सकें किधर को जा रहे हैं। लेकिन अभी जब मैं लिखने की कोशिश कर रहा हूँ तो एक भी नाम याद नहीं आ रहे। रवीन्द्र जी भी भौचक बैठे हैं। रास्ते में शैलेश बार-बार एक उन्नत मोबाइल पर लोकेशन का नक्शा देखने की कोशिश करते रहे लेकिन उन्हें भी कुछ खास पता नहीं चला। हमें बस इतना पता है कि इस समय ‘नवी मुम्बई’ के किसी पॉश इलाके की ऊँची मिनार नुमा एक रिहाइशी बिल्डिंग की नवीं मंजिल पर हम दो जने ठकुआए एक दूसरे को निहार रहे हैं। भकुआए हुए खिड़कियों से बाहर जगमगाती मुम्बई को ताक रहे हैं।

इस पेन्टहाउस (Painthouse Penthouse) के ऊपरी कमरे के हवाले कर हमें लाने वाली शख़्सियत “सुबह भेंट होगी” कहकर चली गयी हैं। शैलेश भी किसी बहाने से अपने एक दोस्त के घर मिलने निकल गया।  हमारे ‘मेजबान’ ने दिनभर की बातें और तमाम ब्लॉगजगत का हालचाल जानने और उसपर चर्चा करने के बाद कहा कि आप लोगों को कल सुबह वापस छोड़ दिया जाएगा। रात यहीं काटनी होगी। उनके जाने के बाद हमने फौरन कमरे की बत्ती बुझा दी, सारी खिड़कियाँ खोल लीं जिनसे ताजा हवा अंदर आने लगी। ए.सी. का रिमोट हमें दिखा दिया गया था लेकिन उसे चलाने की जरूरत नहीं पड़ी। (क्या पूछ रहे हैं? ए.सी.? जी हाँ, यहाँ मुम्बई में इतनी गर्मी है कि लोग ए.सी. पंखा इस्तेमाल कर रहे हैं। हमने जो स्वेटर और कोट रखा था उसका प्रयोग गैर जरूरी हो गया है।)

खैर... हम सोने की कोशिश करते रहे लेकिन बहुत करवट बदलने के बाद भी नींद नहीं आयी। अन्ततः हमने हमने सोचा कि अरविन्द जी की प्रतीक्षा और लम्बी करने के बजाय आज का पूरा हाल यहाँ लिख ही डालें। सो हम उठ बैठे हैं; और चायकाल के सत्र के बाद का हाल बताने वाले हैं...

क्या कहा? उससे पहले यह बताएँ कि इस हाईजैकिंग का राज क्या है? बिना यह जाने कि यू.पी. की तहजीबी राजधानी से आये हम दो ब्लॉगरान के साथ यह बरजोरी किसने की, आप सेमिनार का आगे का हाल नहीं पढ़ेंगे? तो साहब, बस इतना जान लीजिए कि हम अपने साथ घटी इस घटना से बहुत खुश हो लिए हैं। क्योंकि सेमिनार के आयोजकों के भरोसे तो हम कल्याण के उस मुहल्ले से बाहर कदम भी नहीं रख पाते। पहली बार मुम्बई आये लेकिन बिना कुछ देखे-जाने लौट जाते। इसलिए हम यहाँ आकर आनंदित च किलकित हैं। जिस व्यक्ति ने हमें अपनी गाड़ी में बिठाकर, खुद ड्राइव करते हुए अपने भव्य आशियाने तक लाया, बालकनी से चारो ओर की जगमगाती मुम्बई का दर्शन कराया, तालाब के आकार का एक्वेरियम और उसमें तैरती मछलियों से परिचय कराया और स्वादिष्ट भोजन अपने हाथ से परोसकर खिलाया उसे आप स्वयं देख लीजिए। हम अपने मुँह से उनका नाम क्या लें...! तारीफ़ के शब्द कम पड़ रहे हैं सो यह तस्वीर लगाकर काम चला लेते हैं। देखिए...



इस भोजन के बाद नींद भला कैसे न आती। रवीन्द्र जी जगाकर पूछ रहे हैं कि क्या हुआ पोस्ट का। छाप दिए कि नहीं...? 
ओहो... क्या बजा है? 
साढ़े बारह बज गये। 
अब इतनी रात कौन लिखेगा और कौन पढ़ेगा...
अब कल देखी जाएगी...

हम ही सो गये दास्ताँ कहते-कहते... 
(सिद्धार्थ)

शनिवार, 17 सितंबर 2011

घर में जंग की नौबत : टालिए न…!

आज मेरे घर में बात-बात में एक बहस छिड़ गयी। बहस आगे बढ़कर गर्मा-गर्मी तक पहुँच गयी है। घर में दो धड़े बन गये हैं। दोनो अड़े हुए हैं कि उनकी बात ही सही है। दोनो एक दूसरे को जिद्दी, कुतर्की, जब्बर, दबंग और जाने क्या-क्या बताने पर उतारू हैं। दोनो पक्ष अपना समर्थन बढ़ाने के लिए लामबन्दी करने लगे हैं। मोबाइल फोन से अपने-अपने पक्ष में समर्थन जुटाने का काम चालू हो गया है। अपने-अपने परिचितों, इष्ट-मित्रों व रिश्तेदारों से बात करके अपनी बात को सही सिद्ध करने का प्रमाण और सबूत इकठ्ठा कर रहे हैं। अब आप जानना चाहेंगे कि मुद्दा क्या है…?

तो मुद्दा सिर्फ़ इतना सा है कि यदि कोई व्यक्ति स्कूटी, स्कूटर, मोटरसाइकिल इत्यादि दुपहिया वाहन चलाना सीखना चाहे तो इसके लिए उसे पहले साइकिल चलाना आना चाहिए कि नहीं?

प्रथम पक्ष का कहना है कि जब तक कोई साइकिल चलाना नहीं सीख ले तबतक वह अन्य मोटर चालित दुपहिया वाहन नहीं सीख सकता। इसके समर्थन में उसका तर्क यह है कि दुपहिया सवारी पर संतुलन बनाये रखने का कार्य पूरे शरीर को करना पड़ता है जिसका अभ्यास साइकिल सीखने पर होता है। साइकिल चलाने आ जाती है तो शरीर अपने आप आवश्यकतानुसार दायें या बायें झुक-झुककर दुपहिया सवारी पर संतुलन साधना सीख जाती है। शरीर को यह अभ्यास न हो तो अन्य मोटरचालित दुपहिया वाहन सीख पाना सम्भव नहीं तो अत्यन्त कठिन अवश्य है। इसलिए पहले साइकिल सीखना जरूरी है।

द्वितीय पक्ष का कहना है कि साइकिल चलाने में असंतुलित होने की समस्या ज्यादा इसलिए होती है कि उसमें पैडल मारना पड़ता है। जब पैर दायें पैडल को दबाता है तो साइकिल दाहिनी ओर झुकने लगती है और जब बायें पैडल को दबाता है तो बायीं ओर झुकती है। इस झुकाव को संतुलित करने के लिए शरीर को क्रमशः बायीं और दायीं ओर झुकाना पड़ता है। लेकिन मोटरचालित दुपहिया में यह समस्या नहीं आयेगी क्योंकि उसमें पैर स्थिर रहेगा और पैडल नहीं दबाना होगा। जब एक बार गाड़ी चल पड़ेगी तो उसमें संतुलन अपने आप स्थापित हो जाएगा। इसलिए स्कूटी सीखने के लिए साइकिल चलाने का ज्ञान कत्तई आवश्यक नहीं है।

फोटोसर्च.कॉम से साभार

clipartpal.com से साभार

इन दो पक्षों में सुलह की गुन्जाइश फिलहाल नहीं दिखती। प्रथम पक्ष का कहना है कि यदि द्वितीय पक्ष एक भी ऐसे व्यक्ति को सामने ला दे जो बिना साइकिल सीखे ही स्कूटी/ मोटरसाइकिल चलाना सीख गया हो तो वह हार मान जाएगा और उस ‘दिव्य आत्मा’ का शागिर्द बन जाएगा। दूसरे पक्ष को किसी ने फोन पर आश्वासन दिया है कि वह ऐसे आम आदमियों, औरतों व लड़के-लड़कियों की लाइन लगा देंगे जिन्होंने ‘डाइरेक्ट’ मोटरसाइकिल- स्कूटर चलाना सीख लिया है।

अब प्रथम पक्ष दिल थामे उस लाइन की प्रतीक्षा में है जो उसके घर के सामने लगने वाली है। लेकिन समय बीतने के साथ अभी उसके आत्मविश्वास में कोई कमी नहीं आयी है क्योंकि अभी कोई उदाहरण सामने नहीं आया है। मुद्दा अभी गरम है। सबूतों और गवाहों की प्रतीक्षा है।

इस मुद्दे को यहाँ लाने का उद्देश्य तो स्पष्ट हो ही गया है कि कुछ जानकारी यहाँ भी इकठ्ठी की जाय। ब्लॉग-जगत में भी तमाम (अधिकांश प्राय) लोग ऐसे हैं जो दुपहिया चलाना जानते हैं। आप यहाँ बताइए कि आपका केस क्या रहा है- पहले साइकिल या ‘डाइरेक्ट’ मोटर साइकिल? निजी अनुभव तो वास्तविक तथ्य के अनुसार बताइए लेकिन इस मुद्दे का व्यावहारिक, वैज्ञानिक और सैद्धान्तिक विवेचन करने की भी पूरी छूट है।

(नोट : घर के भीतर प्रथम पक्ष का प्रतिनिधित्व कौन कर रहा है व दूसरे पक्ष का कौन, यह स्वतःस्पष्ट कारण से गोपनीय रखा जा रहा है।)

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)  

बुधवार, 9 मार्च 2011

रेलवे की जुगाड़ सुविधा...

 

समय: प्रातःकाल 6:30 बजे

स्थान: बर्थ सं.18 - A1, पटना-सिकंदराबाद एक्सप्रेस

इस पोस्ट को लिखने का तात्कालिक कारण तो इस ए.सी. कोच का वह ट्वॉएलेट है जिससे निकलकर मैं अभी-अभी आ रहा हूँ और जिसके दरवाजे पर लिखा है- ‘पाश्चात्य शैली’। लेकिन उसकी चर्चा से पहले बात वहाँ से शुरू करूँगा जहाँ पिछली पोस्ट में छोड़ रखा था।

आप जान चुके हैं कि वर्धा से कार में इलाहाबाद के लिए चला था तो एक चौथाई रास्ता टायर की तलाश में बीता। जबलपुर में टायर मिला तो साथ में एक पोस्ट भी अवतरित हो ली। आगे की राह भी आसान न थी। रीवा से इलाहाबाद की ओर जाने वाला नेशनल हाई-वे पिछले सालों से ही टूटा हुआ है। अब इसकी मरम्मत का काम हो रहा है। नतीज़तन पूरी सड़क बलुआ पत्थर, पथरीली मिट्टी और बेतरतीब गढ्ढों का समुच्चय बनी हुई है। पिछले साल इसी रास्ते से वर्धा जाते समय मुझे करीब चालीस किमी. की दूरी पार करने में ढाई घंटे लग गये थे। इसलिए इस बार मैं सावधान था।

मैंने अपने एक मित्र से वैकल्पिक रास्ता पूछ लिया था जो रीवा से सिरमौर की ओर जाता था; और काफी घूमने-फिरने के बाद रीवा-इलाहाबाद मार्ग पर करीब साठ किमी आगे कटरा नामक बाजार में आकर मिल जाता था। रीवा से सिरमौर तक चिकनी-चुपड़ी सड़क पर चलने के बाद हमें देहाती सड़क मिली जो क्यौटी होते हुए कटरा तक जाती थी। हमें दर्जनों बार रुक-रुककर लोगों से आगे की दिशा पूछनी पड़ी। एक गाँव के बाहर तिराहे पर भ्रम पैदा हो गया जिसे दूर करने के लिए हमें पीछे लौटकर गाँव के भीतर जाना पड़ा। अँधेरा हो चुका था। कोई आदमी बाहर नहीं दिखा। एक घर के सामने गाड़ी रोककर ड्राइवर रास्ता पूछने के लिए उस दरवाजे पर गया। दो मिनट के भीतर कई घरों के आदमी हाथ में टॉर्च लिए गाड़ी के पास इकठ्ठा हो गये। फिर हमें रास्ता बताने वालों की होड़ लग गयी। कम उम्र वालों को चुप कराकर एक बुजुर्गवार ने हमें तफ़्सील से पूरा रास्ता समझा दिया। उनके भीतर हमारी मदद का ऐसा जज़्बा था कि यदि हम चाहते तो वे हमारे साथ हाइ-वे तक चले आते।

खैर, आगे का करीब चालीस किमी. का सर्पाकार देहाती रास्ता प्रायः गढ्ढामुक्त था। रात का समय था इसलिए इक्का-दुक्का सवारी ही सामने से आती मिली। सड़क इतनी पतली थी कि किसी दुपहिया सवारी को पार करने के लिए भी किसी एक को सड़क छोड़ने की नौबत आ जाती। जब हम हाइ-वे पर निकल कर आ गये तो वही क्षत-विक्षत धूल-मिट्टी से अटी पड़ी सड़क सामने थी। उफ़्‌... हम हिचकोले खाते आगे बढ़ते जा रहे थे और सोचते जा रहे थे कि शायद हमारा वैकल्पिक रास्ते का चुनाव काम नहीं आया। खराब सड़क तो फिर भी मिल गयी। हमने कटरा बाजार में गाड़ी रुकवायी। सड़क किनारे दो किशोर आपस में तल्लीनता से बात कर रहे थे। उनमें से एक साइकिल पर था। जमीन से पैर टिकाए। दूसरा मोबाइल पर कमेंट्री सुन रहा था और अपने साथी को बता रहा था।

मैंने पूछा- भाई, यह बताओ यह सड़क अभी कितनी दूर तक ऐसे ही खराब है?

लड़का मुस्कराया- “अंकल जी, अब तो आप ‘कढ़’ आये हैं। पाँच सौ मीटर के बाद तो क्या पूछना। गाड़ी हवा की तरह चलेगी।” उसने अपने दोनो हाथों को हवा में ऐसे लहराया जैसे पानी में मछली के तैरने का प्रदर्शन कर रहा हो। जब हमने बताया कि हम हाई-वे से होकर नहीं आ रहे हैं बल्कि सिरमौर होकर आ रहे हैं तो उसने हमें शाबासी दी और बुद्धिमान बता दिया। बोला- जो लोग हाई-वे से आ रहे हैं उनकी गाड़ी लाल हो जाती है। गेरुए मिट्टी-पत्थर की धूल से। आप अपनी कार  ‘चीन्ह’  नहीं पाते। हमें समझ में आ गया कि आगे का रास्ता बन चुका है। हम खुश हो लिए और आगे चल दिए। इलाहाबाद तक कोई व्यवधान नही हुआ।

इलाहाबाद में सरकारी काम निपटाने के अलावा अनेक लोगों से मिलने का सुख मिला। आदरणीय ज्ञानदत्त पांडेय जी के घर गया। श्रद्धेया रीता भाभी के दर्शन हुए। सपरिवार वर्धा जाकर नौकरी करने के हानि-लाभ पर चर्चा हुई। गुरुदेव के स्वास्थ्य की जानकारी मिली। लम्बे समय तक चिकित्सकीय निगरानी में रहने और लगातार दवाएँ लेते रहने की मजबूरी चेहरे पर स्थिर भाव के रूप में झलक रही थी। वे इस बार कुछ ज्यादा ही गम्भीर दिखे।

प्रयाग में मेरे पूर्व कार्यस्थल-कोषागार से जुड़े जितने भी अधिकारी-कर्मचारी और इष्टमित्र मिले उन सबका मत यही था कि मुझे अपना प्रदेश और इलाहाबाद छोड़कर बाहर नहीं जाना चाहिए था। इस विषय पर फिर कभी चर्चा होगी।

वर्धा वापस लौटने का कार्यक्रम रेलगाड़ी से बना। दिन भर मंगल-व्रत का फलाहार लेने के बाद शाम को एक मित्र की गृहिणी के हाथ की बनी रोटी और दही से व्रत का समाहार करके मैं स्टेशन आ गया। अनामिका प्रकाशन के विनोद शुक्ल और वचन पत्रिका के संपादक प्रकाश त्रिपाठी गाड़ी तक विदा करने आये। उन्हें हार्दिक धन्यवाद देकर हम विदा हुए। रात में अच्छी नींद आयी।

आज सुबह जब हम ‘पाश्चात्य शैली’ के शौचालय में गये तो वहाँ का अद्‌भुत नजारा देखकर मुस्कराए बिना न रह सके। साथ ही पछताने लगे कि काश कैमरा साथ होता। फिलहाल ट्वॉएलेट की देखभाल करने वालों के बुद्धि-कौशल और गरीबी में भी काम चला लेने की भारतीय प्रतिभा का नमूना पेश करते इस ए.सी. कोच के पश्चिमी बनावट वाले शौचालय की कुछ तस्वीरें मैंने अपने मोबाइल से ही खींच डाली हैं। खास आपके लिए। देखिए न...

IMG0069A भारत की एक बड़ी आबादी जैसे स्थानों पर शौच आदि से निवृत्त होती है उससे बेहतर सफाई है यहाँ। यह दीगर बात है कि सीट को ट्‍वाएलेट पेपर से अपने हाथों साफ़ करने के बाद फोटो लेने का विचार आया।
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IMG0070A ट्‍वाएलेट पेपर ...? पूरा बंडल उपलब्ध है जी। भले ही इसे रखे जाने का मूल बक्सा बेकार हो गया है लेकिन ठेकेदार ने इसे पॉलीथीन से बाँधकर वहीं लटका छोड़ा है। इसे प्रयोगार्थ निकालने के लिए थोड़ी ही मशक्कत करनी पड़ी।
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IMG0061A हाथ धुलने के लिए पेपर सोप रखने की कोई जरूरत नहीं। रेलवे द्वारा लिक्विड सोप की सुविधा गारंटीड है। इसे रखने की डिबिया अपने स्थान से उखड़ गयी तो भी कोई बात नहीं।  'रेलनीर'  की बोतल तो है। साबुन भरकर बेसिन के बगल में ही लटका रखा है। जी भर इस्तेमाल करें।
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IMG0062A ट्‍वाएलेट पेपर रोल को पॉलीथीन से बाँध कर रखने का काम बहुत बुद्धिमानी से किया गया है। स्टील फ्रेम में न होने के बावजूद यह नाचता भी है और थोड़ी  मेहनत करने पर टुकड़ों में निकल भी आता है। मनोरंजक भी है और स्किल टेस्टिंग भी...
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IMG0068A येजो चमक रहे हैं उनमें एक स्टील का जग है, पानी की टोटी है, और स्वयं पानी है जो नीचे जमा है। जो नहीं चमक रही है वह लोहे की जंजीर है जिससे जग बँधा हुआ है। कौन जाने यह कीमती जग किसी को भा जाय और दूसरे यात्रियों को परेशानी उठानी पड़े। इसीलिए बाँध के डाल दिया होगा।
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IMG0066A यदि आप पेपर का प्रयोग नहीं कर पाते और संयोग से टंकी का पानी खत्म होने के बाद आपकी बारी आयी तो क्या करेंगे? चिंता मत करिए...। एक बोतल एक्स्ट्रा पानी भी में डाल दिया गया है उधर कोने में...
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रेल  हमारी सुविधाओं का कितना
ख्याल रखती है

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

शुक्रवार, 7 जनवरी 2011

हिंदी में लिखा जा रहा साहित्य प्रायः प्रासंगिक नहीं है

प्रोफेसर गंगा प्रसाद विमल ने ‘शुक्रवारी’ में रखी बेबाक राय...

शुक्रवारी चर्चा आजकल जबर्दस्त फॉर्म में है। माहिर लोग जुटते जा रहे हैं और हम यहाँ बैठे लपक लेते हैं उनके विचार और उद्‌गार। इस विश्वविद्यालय की किसी कक्षा में मैं नहीं गया ; क्योंकि न यहाँ का विद्यार्थी हूँ और न ही शिक्षक हूँ। लेकिन एक से एक आला अध्यापकों को सुनने का मौका मिल रहा है जो देश और विदेश के अलग-अलग विश्वविद्यालयों और दूसरे शिक्षा केंद्रों में लंबे समय तक पढ़ाते रहे हैं। विषय भी देश की नब्ज टटोलने वाले। पिछले दिन अशोक चक्रधर जी आये तो कंप्यूटर और इंटरनेट पर हिंदी की दशा और दिशा पर अपने तीस-चालीस साल के अनुभव बताकर गये। पूरी तरह अपडेटेड लग रहे थे। रिपोर्ट यहाँ है। उसके पहले विनायक सेन को हुई सजा के बहाने नक्सलवादी आंदोलन के हिंसक स्वरूप और मानवाधिकार संबंधी मूल्यों की चर्चा गांधी हिल के मुक्तांगन में हुई। राजकिशोर जी ने अपनी कविता के साथ विनायक सेन का भरपूर समर्थन व्यक्त किया तो कुलपति विभूतिनारायण राय ने स्पष्ट किया कि उनके साथ सहानुभूति रखते हुए भी हम इतना जरूर याद दिलाना चाहेंगे कि आज के जमाने में राजसत्ता को हिंसा के भय से दबाया नहीं जा सकता। किसी हिंसक आंदोलन को समर्थन देना उचित नहीं है। हाँ, मनुष्यता की रक्षा के लिए जरूरी है कि विनायक सेन जैसे लोग जेल से बाहर रहें और स्वतंत्र होकर समाज के दबे-कुचले लोगों के लिए कार्य कर सकें।

इस बार शुक्रवारी के संयोजक राजकिशोर जी ने चर्चा का विषय रखा था- वर्तमान समय में साहित्य की प्रासंगिकता; और बिशिष्ट वक्ता के रूप में बुलाया था प्रो. गंगा प्रसाद विमल को।

प्रो.गंगा प्रसाद विमल जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से सेवानिवृत्त हो चुके हैं। इसके पहले वे केंद्रीय हिंदी निदेशालय में निदेशक पद पर भी कार्यरत थे। आप एक सुपरिचित कवि और उपन्यासकार के रूप में जाने जाते हैं। विमल जी के एक उपन्यास ‘मृगांतर’ पर हॉलीवुड में एक फिल्म भी बन चुकी है और इसका जर्मन भाषा में अनुवाद भी छप चुका है। चाय की चुस्कियों के बीच आपने हल्के मूड में जो बातें कहीं वो बहुत गम्भीर किस्म की थीं।

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बाएँ से:राजकिशोर,ए.अरविंदाक्षन,विमल

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बोले- साहित्य की प्रासंगिकता सदा से रही है। आज भी बनी हुई है। इसका सबूत यह है कि आज भी साहित्य का डर मौजूद है। समाज का प्रभु वर्ग आज भी साहित्य के प्रभाव के प्रति सतर्क रहता है। एक अमेरिकी लेखक ने उपन्यास लिखा- ‘पैलेस ऑफ़ मिरर्स’। इसमें उन्होंने चार बड़े अमेरिकी व्यावसायिक घरानों की पोल पट्टी खोल कर रख दी थी।  इसपर उनके प्राण संकट में पड़ गये। उन्हें मार डालने के लिए माफ़िया ने सुपारी दे दी। किताब का प्रकाशक बहादुर और जिम्मेदार निकला। लेखक को पाताल में छिपा दिया। उनकी रॉयल्टी पाबंदी से भेज देता है और सुरक्षा जरूरतों को पूरा करता है। लेखक गुमनाम और भूमिगत है, लेकिन उसका रचा साहित्य खलबली मचा रहा है।

सलमान रुश्दी की किताब का नाम भी उन्होंने लिया। बोले- इसके चालीस पृष्ठ पढ़कर मैने छोड़ दिया था। कलात्मक दृष्टि से मुझे यह उपन्यास बहुत घटिया लगा। इसके रूपक भद्दे और बेकार लगे। फिर जब इसकी चर्चा बहुत हो ली तो मैने ‘मनुष्य जाति को इस्लाम का योगदान’ विषयक एम.एन.रॉय की पुस्तक पढ़ने के बाद इसे दुबारा पढ़ा। तब मुझे यह किताब कुछ समझ में आनी शुरू हुई। उन्होंने इस पुस्तक में बहुत बारीकी से मनुष्यता विरोधी विचारण को निरूपित किया है। यह विचारण किसी धर्म की रचना नहीं कर सकता। जिन लोगों ने उसे अपने धर्म का दुश्मन मान लिया वे मूर्ख हैं। वे ऐसे लोग हैं जो सत्य से डरते हैं। सलमान रुश्दी मनुष्यता का दुश्मन नहीं है बल्कि मूर्खों को उससे दुश्मनी है।

ये उदाहरण बताते हैं कि साहित्य कितना बड़ा प्रभाव छोड़ सकता है। लेकिन हिंदी के साहित्य जगत पर दृष्टिपात करें तो निराशा ही हाथ लगती है। यहाँ ऐसी प्रासंगिक रचनाये प्रायः नहीं लिखी जा रही हैं। मनुष्यता के जो सही सवाल हैं उन्हें ठीक से नहीं उठाया जा रहा है। यह साहित्य पढ़कर मन में बेचैनी नहीं उठती। कोई एक्सटेसी महसूस नहीं होती। यहाँ प्रायोजित लेखन अधिक हो रहा है। एक खास समूह और वर्ग में रहकर उसके अनुकूल साहित्य रचा जा रहा है। पुरस्कारों के लिए लिखा जा रहा है। आपकी साहित्यिक प्रतिभा का मूल्यांकन इस या उस गुट की सदस्यता के आधार पर किया जा रहा है।

यहाँ भी शोषक और शोषित का समाजशास्त्र विकसित हो चुका है। जो लोग सबसे अधिक दबे-कुचले वर्ग की बात करते हैं वे ही मौका मिलने पर शोषक वर्ग में शामिल हो जाते हैं। केरल और पश्चिम बंगाल में सबसे पहले वामपंथी सरकारें बनी। बंगाल में तो एक अरसा हो गया। लेकिन विडम्बना देखिए कि आज भी कलकत्ते में हाथगाड़ी पर ‘आदमी को खींचता आदमी’ मिल जाएगा। मार्क्स का नाम जपने वाले वामपंथी सत्ता प्राप्त करने के बाद कांग्रेस की तरह व्यवहार करने लगे और पूँजीपतियों को लाभ पहुँचाने वाली नीतियाँ बनाने लगे। यह दो-मुँहापन यहीं देखने को मिलता है। साहित्य जगत में भी ऐसी ही प्रवृत्तियाँ व्याप्त हैं।

ऐसी निराशाजनक स्थिति हिंदी साहित्य के क्षेत्र में खूब मिलती है। विरोधी खेमे को घेरकर चारो ओर से हमला किया जाता है। लेकिन यूरोप में स्थिति दूसरी है। फ्रांस में द’ गाल के शासनकाल में सार्त्र द्वारा उनका विरोध बड़े आंदोलन का रूप ले रहा था। सार्त्र को जेल में डाल देने की सलाह पर द’ गाल ने कहा कि मैं फ्रांस को गिरफ़्तार नहीं कर सकता। विरोधी विचार का सम्मान करना हिंदी पट्टी ने नहीं सीखा है। यहाँ पार्टी लाइन पर चलकर जो विरोध होता है वह भोथरे किस्म का होता हैं। तलवार की धार कुंद हो चुकी है। गदा जैसा प्रहार हो रहा है। प्राणहीन सा। हिंदी में जो कृतियाँ आ रही हैं वे निष्प्राण सी हैं। मन को उद्वेलित करने वाला कुछ नहीं आ रहा है।

वे पूछते हैं कि क्या स्वतंत्रता के बाद के साठ साल में ऐसी कोई घटना नहीं हुई जिसपर उत्कृष्ट साहित्य रचा जा सके। इंदिरा गांधी द्वारा लगाया गया आपात काल हो या पाकिस्तान के साथ लड़े गये युद्ध हों; या चीन के साथ हुआ संघर्ष। इन घटनाओं ने हिंदी साहित्यकारों को उद्वेलित नहीं किया। इनपर कोई बड़ी कृति सामने नहीं आयी। सुनामी जैसी प्राकृतिक विपदा भी मनुष्यता के पक्ष में साहित्यकारों को खड़ा नहीं कर सकी। क्या कारण है कि बड़ी से बड़ी घटनाएँ हमें विचलित नहीं करती। कड़वे यथार्थ से तालमेल बिठाने में हिंदी साहित्य असफल सा रहा है।

इतनी निराशा भरी बातें कहने के बाद उन्होंने पहलू बदला और बोले कि ऐसा नहीं है कि अच्छी प्रतिभाएँ हमारे बीच नहीं है। मुश्किल बस ये है कि उनका लिखा सामने नहीं आ पाता। आलोचना के जो बड़े मठ हैं वे इसे आने नहीं देते। उनकी देहरी पर माथा टेकने वाला ही पत्र-पत्रिकाओं में स्थान पाता है। समीक्षा उसी की हो पाती है जो उस परिवार का अंग बनने को तैयार होता है। राजकिशोर जी ने गुटबंदी की बात का समर्थन करते हुए विनोदपूर्वक कहा कि ‘यदि आप हमारे किरायेदार हैं तो आप सच्चे साहित्यकार हैं; यदि आप दूसरे के घर में हैं या अपना स्वतंत्र घर जमाने की कोशिश में हैं तो आपका साहित्य दो कौड़ी का भी नहीं है। एक खास विचारधारा का पोषण यदि आप नहीं करते तो आप अप्रासंगिक हैं।

मीडिया ने भी साहित्य जगत का और हिंदी भाषा का बड़ा नुकसान किया है। शब्द बदल गये हैं, शैली दूषित हो गयी है, वाक्य रचना अंग्रेजी की कार्बन कॉपी जैसी हो गयी है। कृतियों पर अंग्रेजी प्रभाव होता जा रहा है। नकल के आरोप भी खुलकर आ रहे हैं। मौलिकता समाप्त सी होती जा रही है।

आज हम सबका दायित्व है कि हम हिंदी में लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य को सामने लायें। मनुष्यता के मुद्दे उठाने वाली रचनाओं को तलाशें। संकुचित सोच के दायरे से बाहर आकर विराट धरातल पर विचार करें। मैं हद दर्जे का आशावादी भी हूँ। कुछ लोग बहुत अच्छा कार्य कर रहे हैं। लेकिन उनकी संख्या अत्यल्प है। इसे कैसे बढ़ाया जाय इसपर विचार किया जाना चाहिए।

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विमल जी की बात समाप्त होने के बाद प्रश्न उत्तर का दौर चला। कई लोगों ने कई कारण गिनाए। मैंने पिछले दिनों श्रीप्रकाश जी की शुक्रवारी वार्ता के हवाले से बताया कि अच्छी रचना तब निकल कर आती है जब कोई बड़ा आंदोलन चल रहा हो। क्रांति का समय हो। शांतिकाल में तो साधारण बैद्धिक जुगाली ही होती रहती है। मुद्दों को तलाशना पड़ता है। इसपर जर्मनी से आये एक हिंदी अध्यापक ने अनेक ताजा मुद्दे गिनाये। दलित और स्त्री संबंधी विमर्श की चर्चा की। प्रायः सबने इसका समर्थन किया। लेकिन इन मुद्दों पर भी अच्छी रचनाओं की दरकार से प्रायः सभी सहमत थे। विदेशी मेहमान ने यह भी बताया कि यूरोप में हिंदी रचनाओं को ‘पश्चिम की नकल’ पर आधारित ही माना जाता है।

विमल जी ने हिंदी साहित्य के पाठकों की भी कमी के प्रति चिंता जाहिर की। बोले कि अब अच्छी रचनाओं के लिए भी पाठक नहीं मिलते। जेब से पैसा खर्च करके हिंदी की किताबें खरीदने और पढ़ने वालों की संख्या बहुत कम है। इसके लिए वे ‘अध्यापक समाज’ को दोषी ठहराते हैं। कह रहे थे कि आजकल के अध्यापक न तो अपना पैसा खर्च करके किताबें खरीदते हैं, न पढ़ते हैं और न ही अपने छात्रों व दूसरे लोगों को पढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं। उन्होंने बताया कि यदि उन्हें कोई अच्छी किताब मिल जाती है तो कम से कम सौ लोगों को उसे पढ़ने के लिए बताते हैं।

अन्य के साथ राजकिशोर जी ने अच्छी रचनाओं की कमी होने की बात का प्रतिवाद किया। बोले- मैं आपको हिंदी की कुछ मौलिक कृतियों का नाम बताता हूँ। आप इनके मुकाबले खड़ा हो सकने लायक एक भी अंग्रेजी पुस्तक का नाम बता पाइए तो बोलिएगा...। उन्होंने नाम बताने शुरू किए जिसमें दूसरे लोगों ने भी जोड़ा- श्रीलाल शुक्ल की `राग दरबारी’, रेणु का `मैला आँचल’, रांगेय राघव का `कब तक पुकारूँ’, यशपाल की `दिव्या’, अज्ञेय का `नदी के द्वीप’, अमृतलाल नागर का `बूँद और समुद्र’, भगवतीचरण वर्मा की `चित्रलेखा’, हजारी प्रसाद द्विवेदी की `बाणभट्ट की आत्मकथा’, आदि-आदि। किसी ने चुनौती देते हुए जोड़ा कि निराला की कविता ‘राम की शक्तिपूजा’ यदि नकल पर आधारित है तो इसका असल अंग्रेजी रूप ही दिखा दीजिए। इसकी पहली पंद्रह पंक्तियों का अनुवाद ही करके कोई दिखा दे। इसके बाद और भी अनेक रचनाओं का नाम लिया जाने लगा।

अंततः मुझे विमल जी से उनके प्रारम्भिक वक्तव्य की पुष्टि करानी पड़ी। उन्होंने माना कि अपनी इस बात को स्वीकार करने के अलावा उनके पास कोई चारा नहीं है कि साहित्य की प्रासंगिकता बनी हुई है लेकिन हिंदी में जो लिखा जा रहा है उसमें अधिकांश प्रासंगिक नहीं है। उन्होंने पहले यह भी बताया था कि वे एक नियमित स्तंभ लिखते रहे हैं जिसका नाम है ‘अप्रासंगिक’।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

वर्धा परिसर के क्लब में झूमने का मजा…

 

वर्धा विश्वविद्यालय शहर से दूर एक वीरान स्थल पर बसाया गया था। पाँच निर्जन शुष्क पहाड़ी टीले इस संस्था को घर बनाने के लिए नसीब हुए। बड़े-बड़े पत्थर और कंटीली झाड़ियाँ चारो ओर पसरी हुई थीं। लेकिन मनुष्य की अदम्य ऊर्जा और निर्माण करने की अनन्य शक्ति के आगे प्रकृति को भी रास्ता देना पड़ता है। शुरू-शुरू में एक कागज पर अवतरित हुआ विश्वविद्यालय आज इस पंचटीला पर धड़कता हुआ एक सुंदर रूपाकार ले रहा है। पहाड़ी ढलान से तादात्म्य बनाती इमारतों की डिजाइन ऐसी बनी है कि प्राकृतिक सौंदर्य अक्षुण्ण बना रहे। यहाँ वृक्षारोपण और जल-संग्रहण के विशेष प्रयास किए गये हैं।

परिसर में अध्यापकों, अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों के परिवार भी आकर बसने लगे हैं। शहर से दूरी के कारण मौलिक जरूरतों की वस्तुओं को जुटाना कठिन है। अब धीरे धीरे दुकानें इस ओर सरकती आ रही है। आस-पास की जमीनें महँगी होने लगी हैं। यहाँ अब खेल और मनोरंजन की जरूरत पूरी करने का उपाय भी खोजा गया है। फैकल्टी एंड ऑफिसर्स क्लब का गठन हो गया है। वर्ष २०११ का आगमन हुआ तो उसी समय क्लब का विधिवत उद्‌घाटन किया गया। कुलपति जी की पत्नी पद्‍मा जी ने लाल फीता काटा। प्रतिकुलपति जी की पत्नी ने केक काटकर सबको बाँटा। बच्चों ने गुब्बारे फोड़ने की प्रतियोगिता खेली। बड़ों ने भी हाउज़ी का लुत्फ़ उठाया। खूब धूमधाम से नये साल का जश्न मना।

इसके पहले विश्वविद्यालय के १३वें स्थापना दिवस (२९ दिसंबर) को भी सबके परिवारों और विद्यार्थियों ने मिलजुलकर शाम को रंगारंग कार्यक्रम प्रस्तुत किया। क्रिकेट, वॉलीबाल और बैडमिंटन की प्रतियोगिताएँ हुईं। पाककला का प्रदर्शन भी हुआ। मेरे बच्चों की उम्र छोटी है, लेकिन बड़ों के साथ उन्हें फैशन परेड और नृत्य करते देखकर मेरा मन झूम उठा। यहाँ कुछ तस्वीरें लगा रहा हूँ।

 

 

 

 

स्थापना दिवस समारोह के रंगारंग कार्यक्रम को परिसर में रहने वाले परिवारों की महिलाओं व बच्चों ने छात्रावासी छात्र-छात्राओं के साथ मिलकर तैयार किया था। दीपाजी के निर्देशन में एक बांग्ला गीत पर नृत्य प्रस्तुत किया चार बेटियों ने जिसमें एक मेरी वागीशा भी थी।

स्थापना दिवस समारोह में बांग्ला नृत्य प्रस्तुत करती वागीशा की टीम

भीषण गर्मी और नीरस दिनचर्या की बातें नेपथ्य में चली गयी हैं। आजकल यहाँ एक से एक कार्यक्रमों की झड़ी लगी है। रिपोर्ट लगाना मुश्किल हो गया है। यहाँ के मौसम के क्या कहने…! सारा देश कड़ाके की ठंड से परेशान है और हमें दोपहर की धूप से बचने के लिए छाया तलाशनी पड़ती है। घर के भीतर हाफ स्वेटर से काम चल जाता है। इलाहाबाद से बाँध कर लायी हुई रजाइयाँ खुली ही नहीं। पतला कम्बल पर्याप्त है। मेरे जैकेट और सूट भी ड्राई क्लीनर के टैग के साथ बक्से में सो रहे हैं।

क्या कहा, …जलन हो रही है? अजी यहाँ कुछ कठिनाइयाँ भी हैं। लेकिन इस मजे के वक्त हम अपनी तकलीफ़ें क्यों बताएँ…!!!

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)