(...भाग 3 से आगे)
Gyan Dutt Pandey जी से मेरा प्रथम परिचय 2007-08 में अंतर्जाल की दुनिया में तब हुआ था जब मैंने हिंदी ब्लॉगिंग की दुनिया का ककहरा सीखना शुरू किया था और वे उस दुनिया के लब्ध प्रतिष्ठ शीर्षपुरुष बन चुके थे। उनकी मानसिक हलचल इसी नाम के हिंदी ब्लॉग (https://gyandutt.com/) के माध्यम से न केवल लोकप्रियता के नए आयाम छू रही थी, बल्कि इनके द्वारा असंख्य नव प्रवेशियों को बिंदास लिखने की प्रेरणा देने के साथ-साथ तकनीकी प्रशिक्षण भी दिया जाता था। मैंने तो इन्हें ब्लॉगरी के लिए विधिवत् अपना गुरुदेव मान लिया था। सौभाग्य से हम दोनों एक ही शहर इलाहाबाद, अब प्रयागराज में नौकरी कर रहे थे, इसलिए वर्चुअल दुनिया से बाहर निकलकर हम असली दुनिया में भी मिल गए। मुझे उनसे बड़े भाई जैसा पारिवारिक स्नेह भी मिला और रीता भाभी जी के हाथ का लजीज व्यंजन सपरिवार जीमने का अवसर भी कई बार आया। ब्लॉगरी की पाठशाला से लेकर राष्ट्रीय सेमिनार तक आयोजित कराने जैसी अनेक ऐतिहासिक उपलब्धियाँ गुरुदेव के मार्गदर्शन में प्राप्त हुईं।
प्रयागराज से शुरू हुई यह गुरू-शिष्य परंपरा व बड़े-छोटे भाई जैसी आत्मीयता अभी भी बदस्तूर जारी है। पांडेय सर ने रेलवे की बड़ी नौकरी (IRTS) में पूर्वोत्तर रेलवे के मुख्य परिचालन प्रबंधक के उच्च पद से सेवानिवृत्त होने के बाद पूर्ण स्वेच्छा से एक ग्राम्य जीवन चुन लिया है। रेलवे-अफसरी की चादर को कबीरदास जी की तरह बड़े जतन से ओढ़ने के बाद ज्यों की त्यों वहीं धर आए। अब वे गाँव में बसकर ऐसे बन गए हैं जैसे कभी रेल के एलीट क्लास से कोई लेना-देना ही न रहा हो। जी.टी. रोड पर औराई के निकट के गाँव विक्रमपुर में अपना आश्रम जैसा घर बनाकर गुरुदेव ने वानप्रस्थ आश्रम की एक नयी जीवंत पारी प्रारम्भ की है।
बनारस के डाक बंगले में अलस्सुबह तैयार होकर और बत्तखों की केलि-क्रीड़ा का छोटा वीडियो बनाकर जब हम वहाँ से विंध्याचल के लिए निकले तो मैंने गुरुदेव को फोन मिलाया। जवाब नहीं मिला तो मैं समझ गया कि अभी हाथ खाली नहीं होंगे। साइकिल पर व्यस्त होंगे। थोड़ी देर में ही पलटकर कॉल आ गयी। मैंने लोकेशन शेयर करने को कहा और अपना लाइव लोकेशन भेज दिया। करीब चालीस मिनट बाद हम दोनो परानी उनके गेट पर थे जहाँ वे दोनो आदरणीय खड़े होकर प्रतीक्षा करते मिले। गुरुदेव ने मुझे बाहों में भर लिया। स्नेह और आशीष की बारिश में भींगने के साथ हमें गुलाबजामुन की मिठास और समोसे के चटपटे स्वाद का आनंद भी मिला।
यहाँ पर गाँव के शुद्ध पर्यावरण में हरे-भरे फलदार पेडों व फूलदार सजावटी पौधों के साथ तुलसी और एलोवेरा जैसे औषधीय पादप भी घर के सुदीर्घ लॉन में सुव्यवस्थित थे। सहयोग के लिए एक माली तो है लेकिन वहाँ मुस्कराते खिलखिलाते पौधे यह बता रहे थे कि ये दोनो वानप्रस्थी इन्हें अपने हाथों से भी सवांरते पुचकारते हैं।
पहले DrArvind Mishra जी और अब ज्ञानदत्त जी के सार्थक, स्वास्थ्यपूर्ण और सुखदायी सेवानैवृत्तिक जीवन से प्रेरणा लेकर मुझे इस गंभीर चिंतन ने जकड़ रखा है कि महानगरीय जीवनचर्या किसी व्यवहारिक मजबूरी में तो चल सकती है लेकिन अवसर होने पर इसका परित्याग कर देने में ही भलाई है। गुरुदेव इसे 'रिवर्स माइग्रेशन' का नाम देते हैं। अपने ब्लॉग पर नियमित लेखन के माध्यम से वे इस ग्राम्य जीवन की खूबियों और खामियों के बारे में सच्ची तस्वीर दिखाते रहते हैं। विद्युत आपूर्ति पर निर्भर भौतिक सुख के भारी संसाधन छोड़ दिये जाय तो और कोई कमी नहीं है। बता रहे थे कि निकट में ही रिलायंस ने स्मार्ट पॉइंट नामक स्टोर भी खोल दिया है।
इस प्रकार हमने संबंधों की ताज़गी में कुछ और ऊर्जा भरकर वहाँ से विदा ली और माँ विंध्यवासिनी के दरबार में हाजिर हुए। पंडा अमित गोस्वामी जी व्हाट्सएप पर मुझे प्रतिदिन देवी माँ की मंगला आरती की तस्वीर भेजते रहते हैं। उन्हीं के मार्गदर्शन में माँ भगवती का साक्षात् दर्शन करके हम बाहर आये। यहाँ के मंदिर परिसर में भी एक विशाल कॉरिडोर का निर्माण कार्य चल रहा है। यहाँ पहुँचने वाली पतली गलियों को चौड़ी सड़क में बदलने का काम प्रगति पर है। अभी थोड़ी अस्त-व्यस्त स्थिति है लेकिन दर्शनार्थियों का रेला पूरे धैर्य के साथ अपनी श्रद्धा और भक्ति का अनुष्ठान माँ के दरबार में अहर्निष करता जा रहा है।
माँ विन्ध्यवासिनी धाम की खास पहचान वाली चुनरी और अन्य प्रसाद के साथ चूड़ी-कंगन-बिंदी इत्यादि की किफायती खरीद के बाद श्रीमती जी Rachana Tripathi को अब गर्म जलेबी के आस्वादन की अपनी लंबित इच्छा पूरी करने का ध्यान आया। सामने ही एक साफ-सुथरी दुकान पर कड़ाही चढ़ी हुई थी। जलेबी के साथ हमने गर्मागर्म कचौड़ियां व आलू की रसदार सब्जी का आनंद भी लिया। जब उसके उत्तम स्वाद की प्रशंसा की गई तो परोसने वाले बच्चे ने कहा- अभी तो टमाटर पड़ा ही नहीं है, नहीं तो आप उंगलियां ही चाटते रह जाते।
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
शुक्रवार, 11 अगस्त 2023
गृहस्थ, आश्रम और तीर्थ भाग-4 (समापन)
मंगलवार, 8 अगस्त 2023
गृहस्थ, आश्रम और तीर्थ (भाग-3)
(... भाग 2 से आगे )
डाक बंगला में थोड़ा आराम करने के बाद अपने अभीष्ट के लिए हम समय से तैयार हुए। बनारस की भीड़-भाड़ भरी सड़कों पर अपनी कार से चलना वैसे ही मुश्किल था, उसपर मोहर्रम के ताजियों के जुलूस पूरे शहर की ट्रैफिक व्यवस्था को हाँफने पर मजबूर कर रहे थे। ऐसे में ट्रैफिक पुलिस में ही सेवारत हमारे प्रिय अनुज पंकज ने हमारी मुश्किल आसान कर दी। शहर की सड़कों का मकड़जाल भेदना उनके ड्राइवर अनवर के लिए बाएं हाथ का खेल था सो हम उनके साथ निकल पड़े भोलेबाबा का दर्शन करने।
ज्ञानवापी की सुरक्षा में तैनात सशस्त्र प्रहरी दिनरात मुस्तैदी से उस पुरातन ढाँचे की रक्षा कर रहे हैं जिसके अगल-बगल से गुजरते हुए लाखो शिवभक्त तीर्थयात्री विश्वेश्वर के दर्शन को आते-जाते हैं। मोदी जी ने काशी विश्वनाथ कॉरिडोर क्या बनवा दिया अब यह परिसर उत्साह, उमंग व आत्मविश्वास से भरे अपार जनसमूह के हर-हर महादेव के समवेत जयकारे से लगातार गूँजता रहता है। अब वो पुरानी तंग गलियाँ और उनमें अपने व्यवसाय के लिए आपको रोकते-टोकते दुकानदार और पंडा प्रजाति के लोग इतिहास में जा चुके है। अब दृश्य कुछ ऐसा है कि दर्शन-पूजन व जलाभिषेक से पहले और उसके बाद भी खुले आसमान के नीचे सफेद संगमरमर के लंबे चौड़े फर्श पर टहलते हुए और रुककर पूरे वातावरण को निहारते, अपनी आंखों में बसाते और धूप-चंदन की सुगंध मिश्रित वहाँ की हवा को अपने फेफड़ों में भरते हुए भारत के कोने-कोने से आने वाले तीर्थयात्री जितनी श्रद्धा व भक्ति के भाव से शिवलिंग को देखते और पूजते हैं उतनी ही वितृष्णा से भरी और कदाचित् श्राप देती दृष्टि उस ढाँचे की ओर भी जरूर डालते हैं जो आजकल न्यायालय में अपने अस्तित्व का परीक्षण करा रहा है।
कॉरिडोर के उत्तरी सिरे पर विशालकाय नंदी की अपलक दृष्टि उस वृहद शिवलिंग की ओर लक्षित है जो एक वजूखाने के उच्छिष्ट पानी में डूबा हुआ है। यह हिमालय की कंदराओं में ध्यानमग्न गहरी तपस्या में डूबे महादेव शिव की याद दिलाता है जिनकी तंद्रा को तोड़ने के लिए कामदेव को अपना उत्सर्ग करना पड़ा था। उनकी तीसरी आंख खुलते ही उसके तेज से कामदेव स्वाहा हो गये थे।
सनातन मान्यता के अनुसार गंगाधर शिव के त्रिशूल पर बसी काशी में उत्तर वाहिनी गंगा जी की अविरल धारा अब इस प्रांगण के पूर्वी द्वार के सामने से गुजरती दिखती है। इस घाट के बगल में ही मणिकर्णिका घाट पर अगणित चिताओं की लपट से उठते धूएँ का गुबार भी एक अटल सत्य की ओर इंगित करता है। मंदिर के गर्भगृह से गंगातट तक का नव निर्माण यहाँ आनेवालों के मन-मस्तिष्क पर जो प्रभाव छोड़ता है वह वर्णनातीत है। इसे यहाँ आकर ही महसूस किया जा सकता है। सुरक्षा कारणों से हमारा मोबाइल गाड़ी में ही अनवर के हवाले था, लेकिन प्रिय पंकज ने अपने सरकारी मोबाइल से कुछ ऐसी तस्वीरें खींच ली थीं जो प्रोटोकॉल में अनुमन्य थीं।
परिसर से बाहर आने का तो हमारा मन ही नहीं कर रहा था लेकिन शनिवार के दिन संकटमोचन मंदिर में रुद्रावतार बजरंग बली का दर्शन करने का लोभ हमें वहां से बाहर ले आया। ट्रैफिक जाम को लगभग चीरते हुए हम गोदौलिया चौराहे पर पहुँचे, ठंडाई पीकर प्यास बुझाई और संकटमोचन मंदिर की वह लंबी राह पकड़ी जो मोहर्रम के जुलूस से प्रायः अछूती थी। अंततः हमने अंतिम आरती से पहले ही "पवनतनय संकटहरन मंगल मूरति रूप" का दर्शन किया, तुलसीदल मिश्रित प्रसाद ग्रहण किया, लेकिन परिसर में पर्याप्त समय लेकर आये हुए असंख्य भक्तों की तरह वहाँ बैठकर हनुमान चालीसा या सुंदरकांड का पाठ नहीं कर सके। दर्शन मिल जाने के बाद हमारा ध्यान गर्मी, ऊमस व पसीने से भरी देह की ओर चला गया। हल्की बूंदाबांदी भी शुरू हो गयी थी। हमने प्रसाद का डिब्बा एक काउंटर पर जाकर वहां रखी सुतली से बांधा, जमा किये गए जूते-चप्पल वापस पहने और भागते हुए बाहर आ गए। यहां भी अंदर फोटो लेने का सुभीता नहीं था। बाहर की भीड़ में पंकज ने एक फोटो क्लिक की। गाड़ी खोजकर हम बैठे और राहत की सांस ली।
हमने प्यास से सूखे गले को तर करने के लिए एक नुक्कड़ पर रुककर गाढ़ी राबड़ी मिश्रित लस्सी पी। बनारस की स्वादिष्ट ठंडाई और मीठी लस्सी हर नुक्कड़ पर तैयार मिलती है। इसके शौकीनों की भी कोई कमी नहीं। मेरा मन तो बनारसी पान खाने का भी था लेकिन काफी देर हो चुकी थी। हमें 'डाक बंगला' पहुँच कर जल्दी से सोना भी था ताकि अगले दिन विंध्यवासिनी देवी के दर्शन के लिए समय से निकल सकें।
रविवार, 6 अगस्त 2023
गृहस्थ, आश्रम और तीर्थ (भाग-2)
(... भाग 1 से आगे)
सुरम्य आश्रम सरीखे आवासीय परिसर 'मेघदूत' से जब हम विदा होने लगे तो DrArvind Mishra जी ने हमें सलाह दी कि बनारस से पहले जौनपुर से लगभग 12 किमी. आगे एक प्राचीन मंदिर है - त्रिलोचन महादेव, उसे भी देखते जाँय। इसप्रकार अपनी तीर्थयात्रा में हमने इस पवित्र स्थान को भी जोड़ लिया।
त्रिलोचन महादेव मंदिर का परिसर अभी सरकारी कृपा की बाट जोह रहा है। यहाँ श्रद्धालुओं की ठीक-ठाक भीड़ थी। ठेले-खोमचे व गुमटियों में विविध प्रकार की दुकानें सजी हुई थीं। एक ग्रामीण मेले का दृश्य उपस्थित था। श्रीमती जी ने एक ठेले पर गर्मागर्म जलेबी छनती देखकर कहा कि दर्शन के बाद इसे लिया जाएगा। हमने मंदिर के बरामदे से लगे असंख्य पुजारी गण की चौकियां देखीं जहाँ पूजन व जलाभिषेक के साधन उपलब्ध थे। बेलपत्र, भांग-धतूर व मंदार पुष्प की प्रधानता वाले पूजन सामग्री का दोना लेकर और माथे पर चंदन का औदार्यपूर्ण लेप व ॐ का तिलक लगवाकर हमने लोटे में जल भरा और मंदिर के गर्भगृह में जाकर शिवलिंग का दर्शन-पूजन किया। आशुतोष औघड़दानी को जल चढ़ाकर मैंने मन ही मन कहा कि मुझे जो चाहिए वह मुझसे बेहतर आप स्वयं जानते हैं इसलिए तदनुसार ही कृपा करें। ईश्वर की सदाशयता में पूरी आस्था रखना भक्तिभाव की पहली शर्त है।
बाहर आकर हमने कुछ सेल्फी ली जो मनचाही नहीं आ रही थी। एक वालंटियर तलाशना पड़ा। फिर हम जलेबी वाली जगह पर गए तो ठेला वहाँ से अंतर्ध्यान हो चुका था। शायद वहाँ की जलेबी पर हमारा नाम नहीं लिखा था। एक दूसरी दुकान पर कड़ाही चढ़ी तो थी लेकिन वहाँ की गंदगी देखकर श्रीमती जी का मूड बदल गया। हम फौरन बनारस की ओर चल पड़े।
बनारस में हम पूर्व निर्धारित गेस्ट-हाउस में रुके जिसे डाक-बंगला का नाम दिया गया है। छावनी क्षेत्र में स्थापित यह विशाल प्रांगण कदाचित् आजादी से पहले बना होगा। हरे-भरे लॉन और फलदार पेडों के बीच दूर-दूर बने सुइट्स का नामकरण विभिन्न नदियों के नाम पर किया गया है। हमें सरयू नामक कमरा मिला था। बगल में ही राप्ती और ताप्ती नामक कमरे थे। किचेन के सामने वाले लॉन में बारिश का पानी जमा था। इसमें सफेद बत्तखों का झुंड अठखेलियाँ कर रहा था। हम इस मनोरम दृश्य को कैमरे में कैद करने का लोभ संवरण नहीं कर सके। परिसर में दौड़ते एक सफेद खरगोश की तस्वीर हम नहीं खींच सके।
कमरे में सभी मौलिक सुविधाएं मौजूद थीं। करीब तीन सौ किमी. की ड्राइविंग करने के बाद आराम तो करना ही था। हमने जल्दी से लंच लिया। स्थानीय सहयोगी से वार्ता के बाद मंदिर जाने का कार्यक्रम शाम पांच बजे के लिए तय हुआ। इसमें अभी दो घंटे बाकी थे। इसलिए हम चादर तानकर सो गए।
(...जारी)
शनिवार, 5 अगस्त 2023
गृहस्थ, आश्रम और तीर्थ (भाग-1)
पिछले सप्ताहांत में दो दिन की छुट्टी थी- शनिवार को मोहर्रम फिर रविवार। सावन का महीना और एकादशी तिथि। मेरी धर्मपत्नी ने इसबार काशी विश्वनाथ के दर्शन का मन बनाया और हम दोनों प्राणी निकल पड़े एक छोटी मनभावन तीर्थयात्रा पर। वाहन-चालक का काम भी मैंने खुद ही सम्हाला। यह अनुभव इतना शानदार रहा कि पूछिए मत। जीवन संगिनी के साथ यात्रा किसी तीसरे व्यक्ति की उपस्थिति के बिना करने का आनंद ही कुछ और है।
बनारस पहुँचने से पहले हमारा पहला पड़ाव था- मेघदूत। बड़े भाई सा स्नेह देने वाले DrArvind Mishra का पैतृक आवास जो तेली-तारा राजस्व ग्राम में है। यह लखनऊ-वाराणसी हाईवे पर जौनपुर से कुछ पहले ही चुरावनपुर उर्फ चूड़ामणि पुर ग्राम पंचायत का अंग है। विज्ञान विषयों पर विशद लेखन करने और प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहने वाले, अनेक पुस्तकों के लेखक, और ब्लॉग व फेसबुक पर भी वैज्ञानिक चेतना की अलख जगाने वाले डॉ. मिश्र ने सेवानिवृत्ति के बाद अपने लिए ग्रामीण जीवन चुना है। यह बहुत प्रेरित करता है। प्राकृतिक हरियाली के बीच प्रचुर मात्रा में ऑक्सिजन और अपने खेत की साग-सब्जी, अनाज और फल-फूल का उपभोग करने का आनंद और कहाँ मिल सकता है। आदरणीया भाभी जी के साथ भाई साहब सपरिवार इतनी आत्मीयता से मिलते हैं कि वहाँ बार-बार जाने का मन करता है। छोटे भाई DrManoj Mishra को तो विश्वविद्यालय में प्रोफेसर की नौकरी भी मेघदूत से आ-जाकर कर पाने का सौभाग्य प्राप्त है। उनकी बेटी स्वस्तिका ने हम लोगों की तस्वीरें जिस दक्षता से क्लिक किया वह यादगार बन गया।
हमने यहाँ लगभग दो घंटे बिताए। किचन गार्डन के उत्पादों का आनंद लिया, पेड़ से आम, अमरूद और फूल तोड़े। विशालकाय कटहल का स्पर्श किया (क्यों कि उदरस्थ करने की क्षमता नहीं थी)। हरे-भरे आकर्षक चबूतरे मेघ-मंडपम् के साथ फोटो-शूट किया गया। Rachana ने स्वस्तिका की फरमाइश पर मुझे जूड़े में फूल लगाने का अवसर दिया। नई नई शादी के समय जो छूटा रह गया था वह इस सुरम्य आश्रम में घटित हो गया।
(...जारी)
रविवार, 24 मई 2015
मंदिरों में सफाई व प्रबंधन का कानून चाहिए
सोमवार, 27 फ़रवरी 2012
शिवचर्चा के बहाने एक सामाजिक ध्रुवीकरण…
इस बार महाशिवरात्रि की छुट्टी सोमवार के दिन हुई थी इसके पीछे रविवार और शनिवार की साप्ताहिक छुट्टी मिलाकर लगातार तीन दिन कार्यालय से अवकाश मिला। मैंने इसका सदुपयोग अपने गाँव घूमकर आने में किया। प्रायः पूरा गाँव सोमवार के दिन भोर में ही उठकर बगल के शिवमंदिर में ‘जल चढ़ाने’ के लिए चल पड़ा था। पूरे साल प्रायः निर्जन और धूल धूसरित रहने वाला पुराना शिवमंदिर इस अवसर पर देहात की भीड़ से आप्लावित हो जाता है। लाउडस्पीकर लगाकर भजन-कीर्तन होता है और ठेले-खोमचे वाले भी आ जुटते हैं। शंकर जी की अराधना के बहाने गाँव क्षेत्र के लोग एक दूसरे से मिलने और हाल-चाल जानने का काम भी निपटा लेते हैं। भक्तिमय माहौल के बीच छोटे-बड़े ऊँच-नीच का भेद भी मिटा हुआ दिखायी देता है। ऐसे लोग जिनकी दैनिक दिनचर्या में पूजा-पाठ का कोई विशेष स्थान नहीं है वे भी इस वार्षिक आयोजन में धर्म-कर्म का कोटा पूरा कर लेते हैं। शंकर जी ऐसे देवता हैं जो झटपट प्रसन्न हो जाते हैं। इन्हें (शिवलिंग को) एक लोटा जल से स्नान करा देना ही पर्याप्त है। चाहें तो इसके साथ सर्वसुलभ झाड़-झंखाड़ से लाकर भांग-धतूरा-बेलपत्र इत्यादि चढ़ा दें तो कहना ही क्या…! आशुतोष अवघड़दानी प्रसन्न होकर मनचाही इच्छा पूरी कर देंगे - इसी विश्वास के साथ सबलोग मंदिर से घर लौटते हैं।
कुँवारी लड़कियाँ इस जलाभिषेक से अपने लिए मनचाहा वर भी पा जाती हैं। इस विश्वास का नमूना गाँव में ही नहीं, इलाहाबाद विश्वविद्यालय के महिला छात्रावास से निकलकर भारद्वाज आश्रम की ओर जाती तमाम पढ़ाकू लड़कियों की कतार में भी देखा है मैंने।
अपने गाँव-जवार के शिवभक्तों को तो मैंने बचपन से देखा है। ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य-शूद्र, चारों वर्णों को एक साथ एक ही मंदिर में जल चढ़ाते हुए। यह बात दीगर है कि इनकी तुलनात्मक संख्या बराबर नहीं होती बल्कि प्रायः इसी क्रम में क्रमशः घटती हुई होती। शिवरात्रि के मौके पर जुटने वाली भीड़ में सवर्ण, दलित और पिछड़े का विभाजन कभी मेरे दिमाग में आया ही नहीं था। इसबार भी गाँव में लगभग वैसा ही वातावरण देखने को मिला। लेकिन जब मैंने वापसी यात्रा हेतु गाँव से प्रस्थान किया तो रास्ते में एक ऐसा नजारा देखने को मिला कि मैं दंग रह गया।
कुशीनगर जिले में कप्तानगंज एक छोटा सा कस्बा है। इससे करीब बारह किलोमीटर पश्चिम परतावल भी एक छोटी सी बाजार है। इन दोनो को जोड़ने वाली टूटी-फूटी सड़क के दोनो ओर पसरा है शुद्ध देहात : उर्वर जमीन में लहलहाती फसलें, चकरोड और कच्ची-पक्की देहाती सड़कों से जुड़े घनी आबादी के गाँव और आधी-अधूरी सरकारी विकास योजनाओं की हकीकत बयान करती लोगों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति। इन दिनों इस इलाके में गेहूँ और सरसो की फसल लगी हुई है। दूर-दूर तक खेत गहरे हरे रंग में या पीले रंग में पेंण्ट किये हुए दिखायी देते हैं। क्षेत्र में नहरों का जाल बिछा हुआ है। सिंचाई की सुविधा अच्छी होने से फसल का उत्पादन बहुत अच्छा हो रहा है। इधर कोई जमीन वर्ष में कभी खाली नहीं रहती। सालोसाल फसलें बोई और काटी जाती हैं।
मैं जब कप्तानगंज से परतावल की ओर बढ़ा तो इन्नरपुर के पास से गुजरने वाली बड़ी नहर के पास जमा भीड़ को देखकर ठिठक गया। हाल ही में गेंहूँ की सिंचाई बीत जाने के बाद नहर में पानी बन्द कर दिया गया था लेकिन थोड़ा बहुत पानी यत्र-तत्र अभी भी रुका हुआ था। इसी पानी में बड़ी संख्या में औरतों को नहाते देखकर मुझे आश्चर्य हुआ। नहर की दोनो पटरियों पर भारी भीड़ जमा थी। औरतें और मर्द, बूढ़े और बच्चे अपनी-अपनी गठरी खोलकर फैलाए हुए थे। कुछ लोग अभी नहाने की तैयारी में थे। जो लोग नहा चुके थे वे अपनी गठरी से निकालकर कुछ चना-चबेना खा रहे थे। आसपास कुछ अस्थायी दुकाने भी जमा हो गयीं थीं जिनपर चाट-पकौड़ी, जलेबी, खुरमा, गट्टा, पेठा इत्यादि पारम्परिक खाद्य सामग्री बिक रही थी। यह स्पष्ट हो रहा था कि ये स्थानीय लोग नहीं हैं बल्कि काफी दूर से आये हुए तीर्थयात्री हैं। पतली सी सड़क के किनारे खड़े हुए वाहन और उनपर लदे सामान भी यही संकेत दे रहे थे। मेरे ड्राइवर ने गाड़ी रोकी नहीं बल्कि भीड़ के बीच से निकल जाने का प्रयास करने लगा।
करीब दो सौ मीटर आगे बढ़ने पर भीड़ का रेला बहुत घना हो गया था और सड़क पर आने-जाने वाले वाहन जाम में फँस गये थे। सामने से एक मोटरसाइकिल पर लदकर आ रहे तीन युवकों ने इशारे से बताया कि आगे बहुत भीड़ है और हमारी गाड़ी उसपार कम से कम दो-तीन घंटे तक निकल नहीं पाएगी। हम फँस चुके थे। पीछे दूसरी गाड़ियाँ आ चुकी थीं। वापस भी नहीं हो सकते थे। सड़क पतली थी और किनारे तीर्थयात्रियों को लाने वाली जीपों, ट्रैक्टर ट्रॉलियों, मोटरसाइकिलों इत्यादि से अटे पड़े थे। बीच-बीच में खोमचे, रेहड़ी, ठेले लगाने वालों ने भी घुसपैठ कर रखी थी। एक लाउडस्पीकर पर कोई व्यक्ति तमाम तरह की उद्घोषणाएँ कर रहा था जो स्पष्ट नहीं हो रही थीं। टीं-टीं की आवाज ज्यादा मुखर थी।
मेरा ब्लॉगर मन अब सक्रिय हो गया। मैंने अपना कैमरा निकाल लिया लेकिन गाड़ी से बाहर निकलने की गुंजाइश नहीं थी। खिड़की का शीशा उतारकर जहाँतक पहुँच बन सकी वहाँतक फोटो खींचता रहा। संयोग से जाम की समस्या के निपटारे के लिए एक-दो सिपाही आ गये थे जिनकी बेंत का असर चमत्कारिक ढंग से हुआ। बीच सड़क में गुत्थमगुत्था लोग अचानक किनारे भागने लगे। ट्रकों और बसों की कतार धीरे-धीरे रेंगने लगी। सड़क के किनारे जमा गढ्ढों का पानी मानव स्पर्श पाकर गंदला हो गया था। एक सिंचाई का नाला लोगों की प्राकृतिक जरूरतों के लिए आवश्यक पानी की आपूर्ति करते-करते मटियामेट होने की कगार पर था।
मैंने खिड़की से सिर निकालकर एक व्यक्ति से पूछा- भाई, यह भीड़ कैसी है? उसने मुझे दोगुने आश्चर्य से देखा और थोड़ी देर तक मुझे लज्जित करने के बाद बोला – आगे शिवचर्चा हो रही है। मैं शिवचर्चा की कोई काल्पनिक छवि इस स्थान पर नहीं बना सका। मैं इस रास्ते से कई बार गुजर चुका था लेकिन किसी सुप्रसिद्ध या कम प्रसिद्ध शिवमंदिर के यहाँ होने की जानकारी मुझे नहीं थी। मेरी गाड़ी भीड़ के बीच से जगह बनाती हुई थोड़ा आगे बढ़ी तो एक तम्बू दिखायी दिया जो एक खेत में खड़ा किया गया था। चारो ओर गेहूँ और सरसो के लहलहाते खेत थे। बीच में कोई हाल ही में खाली हुआ गन्ने का खेत रहा होगा जहाँ कोई गुरूजी प्रवचन करने वाले थे। शायद यही शिवचर्चा थी।
लाउस्पीकर पर आवाज अब साफ आ रही थी। कोई बता रहा था कि एक बैग मेले में लावारिस पड़ा हुआ मिला है। इसमें नगदी और जेवर रखे हैं। जिस किसी का हो वह आकर जितना रुपया है सही-सही बताकर ले जाय। मैं सोचने लगा कि यदि मेरा पर्स इस प्रकार खो जाय तो क्या मैं उसमें रखे रूपयों की सही मात्रा बता पाऊँगा। शायद नहीं। अलबत्ता उसमें रखे पैन कार्ड और ड्राइविंग लाइसेन्स मेरी मदद कर देंगे।
इस भीड़ में जो चेहरे शिवचर्चा में शामिल होने आये थे उन्हें देखकर मुझे एक अजीब उलझन होने लगी। ये तमाम चेहरे एक खास सामाजिक-आर्थिक वर्ग से सम्बंधित लग रहे थे। अत्यन्त गरीब और सामाजिक रूप से पिछड़े हुए। हमारे समाज की अग्रिम पंक्ति में खड़ा कोई चेहरा इस भीड़ में दिखायी नहीं दिया। यह एक अलग तरह का सामाजिक ध्रुवीकरण आकार लेता दिखायी दे रहा था। धार्मिक आस्था के ऐसे प्रदर्शन को देखना एक विलक्षण अनुभव था मेरे लिए। आप भी देखिए - इन तस्वीरों में क्या वही नजर नहीं आता जो मुझे महसूस हुआ?
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
मंगलवार, 2 अगस्त 2011
‘निर्वासन’ में स्त्री विमर्श - प्रेमचंद
पिछली पोस्ट में मैने वादा किया था कि आपको प्रेमचंद की एक विलक्षण कहानी पढ़वाऊंगा। लीजिए, कहानी पढ़िए जिसका शीर्षक है – निर्वासन। यह पूरी कहानी संवाद शैली में लिखी गयी है। कहानीकार ने अपनी ओर से कुछ भी नहीं बताया है; लेकिन इस बात-चीत से तत्कालीन समाज में स्त्री की नाजुक स्थिति का जैसा चित्र उभर कर आया है वह मन को विदीर्ण कर देता है। हम उस परंपरा को ढो रहे हैं जिसमें अग्निपरीक्षा देने के बावजूद सीता को जंगल में निर्वासित जीवन बिताना पड़ा। आज भी स्थितियाँ बहुत नहीं सुधरी हैं। क्या आधुनिक स्त्री-विमर्श इस मानसिकता को बदल पाएगा?
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निर्वासन कहानी- प्रेमचंद परशुराम- वहीं-वहीं, दालान में ठहरो! मर्यादा- क्यों, क्या मुझमें कुछ छूत लग गयी? परशुराम- पहले यह बताओ तुम इतने दिनों कहाँ रहीं, किसके साथ रहीं, किस तरह रहीं और फिर यहाँ किसके साथ आयीं? तब, तब विचार... देखी जायगी। मर्यादा- क्या इन बातों के पूछने का यही वक्त है; फिर अवसर न मिलेगा? परशुराम- हाँ, यही बात है। तुम स्नान करके नदी से तो मेरे साथ ही निकली थीं। मेरे पीछे-पीछे कुछ देर तक आयीं भी; मैं पीछे फिर-फिरकर तुम्हें देखता जाता था, फिर एकाएक तुम कहाँ गायब हो गयीं? मर्यादा- तुमने देखा नहीं, नागा साधुओं का एक दल सामने से आ गया। सब आदमी इधर-उधर दौड़ने लगे। मैं भी धक्के में पड़कर जाने किधर चली गयी। जरा भीड़ कम हुई तो तुम्हें ढूँढ़ने लगी। बासू का नाम ले-लेकर पुकारने लगी, पर तुम न दिखायी दिये। परशुराम- अच्छा तब? मर्यादा- तब मैं एक किनारे बैठकर रोने लगी, कुछ सूझ ही न पड़ता कि कहाँ जाऊँ, किससे कहूँ, आदमियों से डर लगता था। संध्या तक वहीं बैठी रोती रही। परशुराम- इतना तूल क्यों देती हो? वहाँ से फिर कहाँ गयीं? मर्यादा- संध्या को एक युवक ने आकर मुझसे पूछा, तुम्हारे घर के लोग खो तो नहीं गये हैं? मैंने कहा- हाँ। तब उसने तुम्हारा नाम, पता ठिकाना पूछा। उसने सब एक किताब पर लिख लिया और मुझसे बोला- मेरे साथ आओ, मैं तुम्हें तुम्हारे घर भेज दूँगा। परशुराम- वह आदमी कौन था? मर्यादा- वहाँ की सेवा-समिति का स्वयंसेवक था। परशुराम- तो तुम उसके साथ हो लीं? मर्यादा- और क्या करती ? वह मुझे समिति के कार्यालय में ले गया। वहाँ एक शामियाने में एक लम्बी दाढ़ीवाला मनुष्य बैठा हुआ कुछ लिख रहा था। वही उन सेवकों का अध्यक्ष था। और भी कितने ही सेवक वहाँ खड़े थे। उसने मेरा पता-ठिकाना रजिस्टर में लिखकर मुझे एक अलग शामियाने में भेज दिया, जहाँ और भी कितनी खोयी हुई स्त्रियाँ बैठी हुई थीं। परशुराम- तुमने उसी वक्त अध्यक्ष से क्यों न कहा कि मुझे पहुँचा दीजिए? मर्यादा- मैंने एक बार नहीं सैकड़ों बार कहा; लेकिन वह यही कहते रहे, जब तक मेला न खत्म हो जाय और सब खोयी हुई स्त्रियाँ एकत्र न हो जायँ, मैं भेजने का प्रबन्ध नहीं कर सकता। मेरे पास न इतने आदमी हैं, न इतना धन। परशुराम- धन की तुम्हें क्या कमी थी, कोई एक सोने की चीज बेच देती तो काफी रुपये मिल जाते। मर्यादा- आदमी तो नहीं थे। परशुराम- तुमने यह कहा था कि खर्च की कुछ चिंता न कीजिए, मैं अपना गहना बेचकर अदा कर दूँगी? मर्यादा- नहीं, यह तो मैंने नहीं कहा। परशुराम- तुम्हें उस दशा में भी गहने इतने प्रिय थे? मर्यादा- सब स्त्रियाँ कहने लगीं, घबरायी क्यों जाती हो? यहाँ किस बात का डर है। हम सभी जल्द से जल्द अपने घर पहुँचना चाहती हैं; मगर क्या करें? तब मैं भी चुप हो रही। परशुराम- और सब स्त्रियाँ कुएँ में गिर पड़तीं तो तुम भी गिर पड़तीं? मर्यादा- जानती तो थी कि यह लोग धर्म के नाते मेरी रक्षा कर रहे हैं, कुछ मेरे नौकर या मजूर नहीं हैं, फिर आग्रह किस मुँह से करती? यह बात भी है कि बहुत-सी स्त्रियों को वहाँ देखकर मुझे कुछ तसल्ली हो गयी। परशुराम- हाँ, इससे बढ़कर तस्कीन की और क्या बात हो सकती थी? अच्छा, वहाँ कै दिन तस्कीन का आनन्द उठाती रहीं? मेला तो दूसरे ही दिन उठ गया होगा? मर्यादा- रात-भर मैं स्त्रियों के साथ उसी शामियाने में रही। परशुराम- अच्छा, तुमने मुझे तार क्यों न दिलवा दिया? मर्यादा- मैंने समझा, जब यह लोग पहुँचाने को कहते ही हैं तो तार क्यों दूँ? परशुराम- खैर, रात को तुम वहीं रहीं। युवक बार-बार भीतर आते-जाते रहे होंगे। मर्यादा- केवल एक बार एक सेवक भोजन के लिए पूछने आया था, जब हम सबों ने खाने से इनकार कर दिया तो वह चला गया और फिर कोई न आया। मैं रात-भर जागती ही रही। परशुराम- यह मैं कभी न मानूँगा कि इतने युवक वहाँ थे और कोई अंदर न गया होगा। समिति के युवक आकाश के देवता नहीं होते। खैर, वह दाढ़ीवाला अध्यक्ष तो जरूर ही देखभाल करने गया होगा? मर्यादा- हाँ, वह आते थे; पर द्वार पर से पूछ-पूछकर लौट जाते थे। हाँ, जब एक महिला के पेट में दर्द होने लगा था तो दो-तीन बार दवाएँ पिलाने आये थे। परशुराम- निकली न वही बात! मैं इन धूर्तों की नस-नस पहचानता हूँ। विशेषकर तिलक-मालाधारी दढ़ियलों को मैं गुरुघंटाल ही समझता हूँ। तो वह महाशय कई बार दवाएँ देने गये? क्यों, तुम्हारे पेट में तो दर्द नहीं होने लगा था? मर्यादा- तुम एक साधु पर आक्षेप कर रहे हो। वह बेचारे एक तो मेरे बाप के बराबर थे, दूसरे आँखें नीची किये रहने के सिवाय कभी किसी पर सीधी निगाह नहीं करते थे। परशुराम- हाँ, वहाँ सब देवता ही देवता जमा थे। खैर, तुम रात-भर वहाँ रहीं। दूसरे दिन क्या हुआ? मर्यादा- दूसरे दिन भी वहीं रही। एक स्वयंसेवक हम सब स्त्रियों को साथ लेकर मुख्य-मुख्य पवित्र स्थानों का दर्शन कराने गया। दोपहर को लौट कर सबों ने भोजन किया। परशुराम- तो वहाँ तुमने सैर-सपाटा भी खूब किया, कोई कष्ट न होने पाया। भोजन के बाद गाना-बजाना हुआ होगा? मर्यादा- गाना-बजाना तो नहीं; हाँ, सब अपना-अपना दुखड़ा रोती रहीं। शाम तक मेला उठ गया तो दो सेवक हम लोगों को लेकर स्टेशन पर आये। परशुराम- मगर तुम तो आज सातवें दिन आ रही हो और वह भी अकेली? मर्यादा- स्टेशन पर एक दुर्घटना हो गयी। परशुराम- हाँ, यह तो मैं समझ ही रहा था। क्या दुर्घटना हुई? मर्यादा- जब सेवक टिकट लेने जा रहा था, तो एक आदमी ने आकर उससे कहा- यहाँ गोपीनाथ की धर्मशाला में एक बाबूजी ठहरे हुए हैं, उनकी स्त्री खो गयी है, उनका भला-सा नाम है, गोरे-गोरे लम्बे-से खूबसूरत आदमी हैं, लखनऊ मकान है, झबाई टीले में। तुम्हारा हुलिया उसने ऐसा ठीक बयान किया कि मुझे उस पर विश्वास आ गया। मैं सामने आकर बोली, तुम बाबू जी को जानते हो? वह हँसकर बोला, जानता नहीं हूँ तो तुम्हें तलाश क्यों करता फिरता हूँ। तुम्हारा बच्चा रो-रोकर हलाकान हो रहा है। सब औरतें कहने लगीं, चली जाओ, तुम्हारे स्वामीजी घबरा रहे होंगे। स्वयंसेवक ने उससे दो-चार बातें पूछकर मुझे उसके साथ कर दिया। मुझे क्या मालूम था कि मैं किसी नर-पिशाच के हाथों में पड़ी जाती हूँ। दिल में खुशी थी कि अब बासू को देखूँगी, तुम्हारे दर्शन करूँगी। शायद इसी उत्सुकता ने मुझे असावधान कर दिया। परशुराम- तो तुम उस आदमी के साथ चल दीं? वह कौन था? मर्यादा- क्या बतलाऊँ कौन था? मैं तो समझती हूँ, कोई दलाल था? परशुराम- तुम्हें यह न सूझी कि उससे कहतीं, जाकर बाबूजी को भेज दो? मर्यादा- अदिन आते हैं तो बुध्दि भ्रष्ट हो जाती है। परशुराम- कोई आ रहा है। मर्यादा- मैं गुसलखाने में छिपी जाती हूँ। परशुराम- आओ भाभी, क्या अभी सोयी नहीं, दस तो बज गये होंगे। भाभी- वासुदेव को देखने को जी चाहता था भैया, क्या सो गया? परशुराम- हाँ, वह तो अभी रोते-रोते सो गया है। भाभी- कुछ मर्यादा का पता मिला? अब पता मिले तो भी तुम्हारे किस काम की। घर से निकली हुई स्त्रियाँ थान से छूटी हुई घोड़ी है जिसका कुछ भरोसा नहीं। परशुराम- कहाँ से कहाँ मैं उसे लेकर नहाने गया। भाभी- होनहार है भैया, होनहार! अच्छा तो मैं जाती हूँ। मर्यादा- (बाहर आकर) होनहार नहीं है, तुम्हारी चाल है। वासुदेव को प्यार करने के बहाने तुम इस घर पर अधिकार जमाना चाहती हो। परशुराम- बको मत! वह दलाल तुम्हें कहाँ ले गया? मर्यादा- स्वामी, यह न पूछिए, मुझे कहते लज्जा आती है। परशुराम- यहाँ आते तो और भी लज्जा आनी चाहिए थी। मर्यादा- मैं परमात्मा को साक्षी देती हूँ, कि मैंने उसे अपना अंग भी स्पर्श नहीं करने दिया। परशुराम- उसका हुलिया बयान कर सकती हो? मर्यादा- साँवला-सा छोटे डील का आदमी था। नीचा कुरता पहने हुए था। परशुराम- गले में ताबीजें भी थीं? मर्यादा- हाँ, थीं तो। परशुराम- वह धर्मशाले का मेहतर था। मैंने उससे तुम्हारे गुम हो जाने की चर्चा की थी। उस दुष्ट ने उसका वह स्वाँग रचा। मर्यादा- मुझे तो वह कोई ब्राह्मण मालूम होता था। परशुराम- नहीं मेहतर था। वह तुम्हें अपने घर ले गया? मर्यादा- हाँ, उसने मुझे ताँगे पर बैठाया और एक तंग गली में, एक छोटे-से मकान के अंदर ले जाकर बोला, तुम यहीं बैठो, तुम्हारे बाबूजी यहीं आयेंगे। अब मुझे विदित हुआ कि मुझे धोखा दिया गया। रोने लगी। वह आदमी थोड़ी देर के बाद चला गया और एक बुढ़िया आकर मुझे भाँति-भाँति के प्रलोभन देने लगी। सारी रात रोकर काटी। दूसरे दिन दोनों फिर मुझे समझाने लगे कि रो-रोकर जान दे दोगी, मगर यहाँ कोई तुम्हारी मदद को न आयेगा। तुम्हारा एक घर छूट गया। हम तुम्हें उससे कहीं अच्छा घर देंगे जहाँ तुम सोने के कौर खाओगी और सोने से लद जाओगी। जब मैंने देखा कि यहाँ से किसी तरह नहीं निकल सकती तो मैंने कौशल करने का निश्चय किया। परशुराम- खैर,सुन चुका। मैं तुम्हारा ही कहना मान लेता हूँ कि तुमने अपने सतीत्व की रक्षा की, पर मेरा हृदय तुमसे घृणा करता है, तुम मेरे लिए फिर वह नहीं हो सकती जो पहले थीं। इस घर में तुम्हारे लिए स्थान नहीं है। मर्यादा- स्वामीजी, यह अन्याय न कीजिए, मैं आपकी वही स्त्री हूँ जो पहले थी। सोचिए, मेरी क्या दशा होगी? परशुराम- मैं यह सब सोच चुका और निश्चय कर चुका। आज छ: दिन से यही सोच रहा हूँ। तुम जानती हो कि मुझे समाज का भय नहीं है। छूत-विचार को मैंने पहले ही तिलांजलि दे दी, देवी-देवताओं को पहले ही विदा कर चुका; पर जिस स्त्री पर दूसरी निगाहें पड़ चुकीं, जो एक सप्ताह तक न-जाने कहाँ और किस दशा में रही, उसे अंगीकार करना मेरे लिए असम्भव है। अगर यह अन्याय है तो ईश्वर की ओर से है, मेरा दोष नहीं। मर्यादा- मेरी विवशता पर आपको जरा भी दया नहीं आती? परशुराम- जहाँ घृणा है वहाँ दया कहाँ? मैं अब भी तुम्हारा भरण-पोषण करने को तैयार हूँ। जब तक जीऊँगा, तुम्हें अन्न-वस्त्र का कष्ट न होगा। पर तुम मेरी स्त्री नहीं हो सकतीं। मर्यादा- मैं अपने पुत्र का मुँह न देखूँ अगर किसी ने मुझे स्पर्श भी किया हो। परशुराम- तुम्हारा किसी अन्य पुरुष के साथ क्षण-भर भी एकांत में रहना तुम्हारे पतिव्रत को नष्ट करने के लिए बहुत है। यह विचित्र बंधन है, रहे तो जन्म-जन्मांतर तक रहे; टूटे तो क्षण-भर में टूट जाय। तुम्हीं बताओ, किसी मुसलमान ने जबरदस्ती मुझे अपना उच्छिष्ट भोजन खिला दिया होता तो तुम मुझे स्वीकार करतीं? मर्यादा- वह...वह...तो दूसरी बात है। परशुराम- नहीं, एक ही बात है। जहाँ भावों का संबंध है, वहाँ तर्क और न्याय से काम नहीं चलता। यहाँ तक कि अगर कोई कह दे कि तुम्हारे पानी को मेहतर ने छू लिया है तब भी उसे ग्रहण करने से तुम्हें घृणा आयेगी। अपने ही दिल से सोचो कि तुम्हारे साथ न्याय कर रहा हूँ या अन्याय? मर्यादा- मैं तुम्हारी छुई हुई चीजें न खाती, तुमसे पृथक् रहती, पर तुम्हें घर से तो न निकाल सकती थी। मुझे इसीलिए न दुत्कार रहे हो कि तुम घर के स्वामी हो और समझते हो कि मैं इसका पालन करता हूँ। परशुराम- यह बात नहीं है। मैं इतना नीच नहीं हूँ। मर्यादा- तो तुम्हारा यह अंतिम निश्चय है? परशुराम- हाँ, अंतिम। मर्यादा- जानते हो इसका परिणाम क्या होगा? परशुराम- जानता भी हूँ और नहीं भी जानता। मर्यादा- मुझे वासुदेव को ले जाने दोगे? परशुराम- वासुदेव मेरा पुत्र है। मर्यादा- उसे एक बार प्यार कर लेने दोगे? परशुराम- अपनी इच्छा से नहीं, तुम्हारी इच्छा हो तो दूर से देख सकती हो। मर्यादा तो जाने दो, न देखूँगी। समझ लूँगी कि विधवा भी हूँ और बाँझ भी। चलो मन! अब इस घर में तुम्हारा निबाह नहीं। चलो जहाँ भाग्य ले जाय!
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(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
शुक्रवार, 12 नवंबर 2010
पुराण चर्चा: लिंग पुराण (क्रोधी दुर्वासा और अंबरीष की कथा) भाग-१
भाग-१: लिंग पुराण का संक्षिप्त परिचय:
ग्यारह हजार श्लोकों व १६३ अध्यायों में विभक्त इस पुराण में भगवान शिव से संबंधित विभिन्न पौराणिक आख्यानों, उपाख्यानों व घटनाओं का वर्णन करते हुए शैव सिद्धांतों का प्रतिपादन अत्यंत सहज, सरल और तर्कसंगत रीति से किया गया है।
यद्यपि लिंग का एक अर्थ जननेंद्रिय भी होता है, लेकिन इस पुराण में इसका तात्पर्य ‘ॐकार’ से है। समस्त पुराणों में यह माना गया है कि सृष्टि की उत्पत्ति निर्गुण निराकार ‘परब्रह्म’ से हुई है। उसी निर्गुण परब्रह्म के स्वरूप को व्यक्त करने का प्रतीक है ‘लिंग’। लिंग पुराण में भगवान शिव के तीन रूपों को निम्नवत् परिभाषित किया गया है।
“एकेनैव हृतं विश्वं व्याप्त त्वेन शिवेन तु।
अलिंग चैव लिंगं च लिंगालिंगानि मूर्तयः॥”
अर्थात् भगवान इस सृष्टि से पूर्व ही अव्यक्त लिंग अर्थात् ब्रह्म स्वरूप में सदा विद्यमान रहते हैं। तत्पश्चात् वे ही व्यक्त लिंग के रूप में प्रकट होकर सृष्टि की रचना करते हैं। इस प्रकार वे अव्यक्त (निर्गुण) व व्यक्त (सगुण) दोनो स्वरूपों से सृष्टि में विद्यमान हैं।
लिंग पुराण के अनुसार जब ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना का विचार किया तो उन्होंने सर्वप्रथम अहम (अविद्या) को उत्पन्न किया। इस अहंकार से क्रमशः पाँच तन्मात्राएँ उत्पन्न हुईं- शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गंध। इन पाँच गुणविशेष ने पंचतत्वों को उत्पन्न किया- आकाश, वायु, अग्नि, जल तथा पृथ्वी। इस प्रकार तन्मात्राएँ सूक्ष्म तथा तत्व स्थूल कहे जाते हैं।
इस उत्पत्ति का क्रम निम्नवत् समझाया गया है: अहंकार से शब्द नामक तन्मात्रा, शब्द से आकाश रूपी तत्व, आकाश तत्व से स्पर्श तन्मात्रा, स्पर्श से वायु तत्व, वायु से रूप तन्मात्रा, रूप से अग्नि तत्व, अग्नि से रस तन्मात्रा, रस से जल तत्व, जल से गंध तन्मात्रा व गंध से पृथ्वी रूपी तत्व का प्रादुर्भाव हुआ। तत्वों और तन्मात्राओं के इसी उत्पत्ति क्रम से सृष्टि का प्राकट्य होता है।
इस पुराण में धर्म की व्याख्या करते हुए कहा गया है कि इस चराचर जगत की रचना भगवान द्वारा ही की गयी है। इसलिए मनुष्य को ऊँच-नीच, जाति-पाँति, तथा वर्ण संकीर्णता को त्यागकर अपने हृदय में समस्त प्राणियों के प्रति आत्मीयता तथा दया का भाव रखना चाहिए। वस्तुतः यही मनुष्य का धर्म है।
इस पुराण में सदाचार का वर्णन करते हुए साररूप में कहा गया है कि संयमी, धार्मिक, दयावान, तपस्वी, सत्यवादी तथा सभी प्राणियों के लिए हृदय में प्रेम का भाव रखने वाले मनुष्य ही भगवान शिव को प्रिय हैं। जो मनुष्य अपने जीवन में इन गुणों को उतार लेता है उसे ईश्वर सुख, शांति और समृद्धि प्रदान करते हैं।
इस पुरान में अंधकासुर नामक दैत्य की उत्पत्ति व भगवान शिव द्वारा उसके पराभव की कथा, विष्णु भगवान द्वारा वाराहावतार धारणकर पृथ्वी के उद्धार की कथा तथा दैत्य जलंधर के उद्धार की कथा वर्णित है। इन सभी कथाओं द्वारा यह समझाने का प्रयास किया गया है कि एक सदाचारी मनुष्य के सद्कर्म उसकी उन्नति के तथा तथा दुराचारी व्यक्ति के दुष्कर्म उसके पराभव का कारण बनते हैं। ईश्वर इस न्यायपूर्ण व्यवस्था का नियामक है।
लिंग पुराण में दक्ष प्रजापति की कथा, पार्वती जन्म, कामदेव दहन, शिव-पार्वती विवाह, गणेश जन्म, शिव तांडव, तथा उपमन्यु चरित्र का वर्णन बहुत रोचक शैली में किया गया गया है। ये सभी प्रसंग किसी न किसी सकारात्मक उद्देश्य की ओर भी ले जाते हैं। जम्बू-प्लक्ष आदि सात द्वीपों सहित भारतवर्ष का वर्णन, क्षुप-दधीचि की कथा, ध्रुव की कथा व काशी माहात्म्य इत्यादि देखकर लगता है जैसे यह पुस्तक अपने जमाने की ट्रेवेल गाइड के रूप में भी लिखी गयी होगी।
लिंग पुराण के अंतिम भाग में राजा अंबरीष व महाक्रोधी दुर्वासा ऋषि की रोचक कथा का वर्णन है जिसके माध्यम से सदाचार एकादशी व्रत के माहात्म्य का निरूपण किया गया है।
भाग-२: क्रोधी दुर्वासा और अंबरीष की कथा:
प्राचीन समय की बात है। राजा नाभाग के अंबरीष नामक एक प्रतापी पुत्र थे। वे बड़े बीर, बुद्धिमान व तपस्वी राजा थे। वे जानते थे कि जिस धन-वैभव के लोभ में पड़कर प्राणी घोर नरक में जाते हैं वह कुछ ही दिनों का सुख है, इसलिए उनका मन सदैव भगवत भक्ति व दीनों की सेवा में लगा रहता था। राज्याभिषेक के बाद राजा अंबरीष ने अनेक यज्ञ करके भगवान विष्णु की पूजा-उपासना की जिन्होंने प्रसन्न होकर उनकी रक्षा के लिए अपन्ने ‘सुदर्शन चक्र’ को नियुक्त कर दिया।
एक बार अंबरीष ने अपनी पत्नी के साथ द्वादशी प्रधान एकादशी व्रत करने का निश्चय किया। उन्होंने भगवान विष्णु का पूजन किया और ब्राह्मणों को अन्न-धन का भरपूर दान दिया। तभी वहाँ दुर्वासा ऋषि का आगमन हो गया। वे परम तपस्वी व अलौकिक शक्तियों से युक्त थे किंतु क्रोधी स्वभाव के कारण उनकी सेवा-सुश्रुशा में विशेष सावधानी अपेक्षित थी…(जारी)
शनिवार, 28 अगस्त 2010
रेल में पकवान और कार्यशाला वीरान… लखनऊ के ब्लॉगर नदारद…?
जब मैंने वर्धा से लखनऊ आने के लिए टिकट बुक कराया तो मन में यह उत्साह था कि हिंदी ब्लॉगरी की यात्रा मुझे एक ऐसे मुकाम पर ले जाने वाली है जहाँ अपनी तहज़ीबों और नफ़ासत के लिए मशहूर शहर की एक शानदार शाम अपने् प्रिय ब्लॉगर मित्रों की खुशगवार सोहबत में बीतेगी। मैंने कुलपति जी से अनुमति माँगी और उन्होंने सहर्ष दे दी। एक आदरणीय ब्लॉगर मित्र ने ही टिकट पक्का कराया और मैं सेवाग्राम से लखनऊ के लिए राप्तीसागर एक्सप्रेस पर सवार हो लिया।
जब मैं अपने टिकट पर अंकित बर्थ संख्या पर पहुँचा तो देखा कि मेरे कूपे में तमिलभाषी तीर्थयात्रियों के एक बहुत बड़े समूह का एक हिस्सा भरा हुआ था। नीचे की मेरी बर्थ पर एक प्रौढ़ा महिला सो रही थीं। उनकी गहरी नींद में खलल डालने में मुझे संकोच हुआ। थोड़ी देर मैं चुपचाप खड़ा होकर सोचता रहा। अगल-बगल की बर्थों पर भी तीर्थयात्री या तो जमकर बैठे हुए थे, सो रहे थे या उनका सामान लदा हुआ था। मैने अपना बैग उठाकर दुबारा पटका ताकि उसकी आवाज से मेरे आने की सूचना उनके कानों तक पहुँच सके। (बाद में मैंने ध्यान दिया कि अधिकांश ने अपने कानों में सचमुच की रूई डाल रखी थी। खैर…) दोपहर के भोजन के बाद की नींद थी, शायद ज्यादा गहरी नहीं थी। सामने की बर्थ पर लेटी हुई दूसरी महिला ने आँखें खोल दीं। उन्होंने मेरी सीट वाली महिला को हल्की आवाज देकर कुछ कहा- शायद यह कि अब उठ जाओ, जिसके आने का अंदेशा था वह आ चुका है- इन्होंने आँखें खोल दी। मुझे खड़ा देखकर झटपट अपने को समेटने की कोशिश करने लगीं।
लेकिन यह इतना आसान नहीं था। ईश्वर ने उन्हें कुछ ज्यादा ही आराम की जिंदगी दी थी। जिसका भरपूर लाभ उठाते हुए उन्होंने काफ़ी वजन इकठ्ठा कर लिया था। वजन तो उस समूह की प्रायः सभी महिलाओं और पुरुषों का असामान्य था। कोई भी फुर्ती से उठने-बैठने लायक नहीं था। मुझे मन हुआ कि कह दूँ- आप यूँ ही लेटी रहिए, मैं कोई और बर्थ खोजता हूँ। उनकी आँखों में भी कुछ ऐसी ही अपेक्षा झाँक रही थी तभी बगल की बर्थ पर लेटे एक भीमकाय बुजुर्ग ने टूटी हिंदी में कहा कि ‘वो ऊपर चढ़ नहीं सकता’। मैंने ऊपर की साइड वाली सीट देखी- खाली थी। मैंने झट ऊपर अपना लैपटॉप का बैग चढ़ाया, प्रौढ़ा माता जी को लेटे रहने का इशारा किया और अपना ट्रेवेल बैग खिड़की वाली बर्थ के नीचे फिट करने लगा। उनकी आँखों में धन्यवाद और आशीर्वाद के भाव देखकर मैं भावुक हो लिया, बल्कि मेरी अपनी माँ याद आ गयी जो बहुत दिनों बाद मेरे पास रहने का समय निकालकर वर्धा आ पायी हैं।
आयोजकों ने ए.सी.थ्री की सीमा पहले ही समझा दी थी। ऐसे में लगातार लेटकर यात्रा करने की कल्पना से मैं परेशान था। लेकिन जब मुझे साइड की ऊपरी सीट मिल गयी तो मन खुश हो लिया। उसपर तुर्रा यह कि सहयात्रियों ने मुझे बड़े दिल वाला भी समझ लिया। अब तो ऊपर बैठकर, लेटकर, करवट बदल-बदलकर, आधा लेटकर, तिरछा होकर, चाहे जैसे भी यात्रा करने को मैं स्वतंत्र था। किसी का कोई हस्तक्षेप नहीं होने वाला था। लेकिन इस अवसर का ज्यादा हिस्सा मैने एक मौन अध्ययन में बिताया। चेतन भगत की पुस्तक ‘टू स्टेट्स’ हाल की दिल्ली यात्रा में पढ़ने को मिली थी। उसमें मद्रासी (तमिल) परिवार के खान-पान और आचार-व्यवहार का बहुत सूक्ष्म वर्णन किया गया है। मैंने उस रोचक वर्णन का सत्यापन करने के उद्देश्य से इनपर चुपके से नजर रखनी शुरू की।
उस कहानी के पात्रों के विपरीत मैने यह पाया कि वे तमिल बुजुर्ग् बड़े खुशमिजाज़ और शौकीन लोग थे। जिन माताजी को मैने अपनी बर्थ दी थी उन्होंने तो मानो मुझे अपना बेटा ही मान लिया। भाषा की प्रबल बाधा के बावजूद (उन्हें हिंदी/अंग्रेजी नहीं आती थी और मैं तमिल का ‘त’ भी नहीं जानता था) उन्होंने बार-बार मुझे अपनी दर्जनों गठरियों में रखे खाद्य पदार्थ (मैं उनके नाम नहीं ले पा रहा- बहुतेरे थे) ऑफर किए। मैंने हाथ जोड़कर मना करने के संकेत के साथ धन्यवाद कहा जो उन्हें समझ में नहीं आया। डिब्बे का मुँह खोलकर मेरी ओर उठाए उनके हाथ वापस नहीं जा रहे थे तो मैँने एक टुकड़ा उठाकर 'थैंक्यू' कहा और आगे के लिए मना किया, लेकिन वो समझ नहीं रही थीं या समझना नहीं चाहती थी। नतीजा यह हुआ कि उन लोगों के खाने के अनन्त सिलसिले का मैं न सिर्फ़ प्रत्यक्षदर्शी रहा बल्कि उसमें शामिल होता रहा। सुबह के वक्त तो उन्होंने मुझसे पूछना भी जरूरी नहीं समझा और मेरे रेल की रसोई (Pantry) से आये नाश्ते के ऊपर से अपनी जमात का उपमा, साँभर, इडली और 'बड़ा' एक साथ लाद दिया। मैंने जिंदगी में पहली बार ये चार सामग्रियाँ एक साथ खायीं।
वे लोग मेरे बारे में जाने क्या-क्या बात करते रहे। मैं समझ नहीं पा रहा था, इसलिए थोड़ी झुँझलाहट भी हो रही थी। एक लुंगीधारी बुजुर्ग ने मुझसे मेरा नाम और काम पूछा था। मैंने जो बताया था वही शब्द उनकी तमिल के बीच-बीच में सुनायी दे रहे थे। जो इस बात के गवाह थे कि उनकी चर्चा का एक् विषय मैं भी था। तभी उन माता जी ने मुझसे कुछ पूछा। मैं तमिल् समझ न सका। दूसरे बुजुर्गवार ने अनुवादक बन कर कहा- तुमरा कितना बड़ा बच्चा है? मैंने बताया- एक बेटी दस साल की और एक बेटा चार साल का। उम्र समझाने के लिए उंगलियों का प्रयोग करना पड़ा। इस पर उनके बीच आश्चर्य व कौतूहल मिश्रित हँसी का फव्वारा फूट पड़ा। जो दूसरे कूपे तक भी गया। मैं चकराकर दुभाषिया ढूँढने लगा।
इस बातचीत का रस लेने ऊपर की बर्थ पर लेटा एक तमिल नौजवान भी नीचे चला आया था। मैंने उससे परिचय चलाया तो पता चला कि वह भैरहवा (नेपाल) से एम.बी.बी.एस. कर रहा था। नीचे वाले बुजुर्ग ने उसकी पीठ ठोकते हुए तस्दीक किया था। मैने उससे पूछा- “what were they talking about me?”
उसने मुस्करा कर कहा – “They said that you have got two children, still you look so young.’’
मैं मन ही मन खुश हो लिया लेकिन चेहरे पर थोड़ी शर्म आ ही गयी। मैंने अपनी ओर उठी हुई उन सबकी प्रश्नवाचक निगाहों को जवाब दिया – “Thanks a lot to all of you… this is one of the rarest complements for me as here I am told to have an older look of face than my actual age” महिलाओं ने तमिल में नकारा और पुरुषों ने मुस्कराकर चुप्पी लगा ली।
गाड़ी जब लखनऊ पहुँची तो मुझे ध्यान आया कि मैं ब्लॉग लेखन की पाँच दिवसीय कार्यशाला में भाग लेने आया हूँ और मुझे पहली बार किसी सत्र की अध्यक्षता करनी है। मैंने सबको एक बार फिर धन्यवाद दिया, अच्छी यात्रा के लिए और दक्षिण भारतीय व्यंजनों के लिए। स्टेशन से बाहर आकर ऑटो लिया और गेस्ट हाउस की ओर चल पड़ा। रास्ते में यहाँ का गर्म मौसम देखकर रमजान के रोजेदारों का ध्यान हो आया।
(२)
दूर-दूर तक भेंजा गया था निमंत्रण-पत्र
राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्यौगिकी संचार परिषद(NCSTC), नई दिल्ली और लखनऊ की ‘तस्लीम’ संस्था द्वारा एक पाँच दिवसीय कार्यशाला ‘ब्लॉग लेखन के द्वारा विज्ञान संचार’ विषय पर आयोजित थी। तस्लीम ब्लॉग पर इसकी सूचना अनेकशः प्रकाशित हुई थी। जाकिर भाई और बड़े भाई डॉ. अरविंद जी मिश्र ने मुझसे और मेरे जैसे अनेक ब्लॉगर्स को लखनऊ पहुँचने के लिए कहा था। मेरी यात्रा सुखद रही थी इसलिए आगे भी मामला चकाचक रहने की पूरी आशा थी। मैंने गेस्ट हाउस पहुँचकर नहाने और तैयार होने में बहुत कम समय लगाया। आभासी दुनिया के साथियों से प्रत्यक्ष मुलाकात का सुख पाने की लालसा जोर मार रही थी। ज़ाकिर भाई घटनास्थल… सॉरी कार्यक्रम स्थल से पल-पल की सूचना मोबाइल पर दे रहे थे। मुझे लेने कोई गाड़ी आने वाली थी। उसके खोजे जाने, चल पड़ने और गेस्ट हाउस पहुँच जाने के बीच तीन-चार बार फोन आ गये। मैं घबराकर नीचे उतरकर रिसेप्शन पर जाकर खड़ा हो गया। जो ही दो-चार मिनट बचा लिए जाते।
मैं ठीक दो बजे वहाँ पहुँच गया। अरविंद जी तैयारियों को अंतिम रूप में बुरी तरह व्यस्त थे। शायद उन्होंने ज़ाकिर भाई से कमान अपने हाथों में ले ली थी। ज़ाकिर भाई रमजान के महीने में पसीने से तर-बतर दिखायी पड़े। मैने गर्मजोशी से हाथ मिलाया। वे बोले- “बस दस मिनट में लंच आ रहा है। खा लीजिए फिर शुरू करते हैं।” मैं सोचने लगा कि कार्यक्रम की शुरुआत में सिर्फ़ मेरे खा लेने की प्रतीक्षा आड़े आ रही है तो उसे टाल देते हैं। तभी अरविंद जी ने संयोजक महोदय को झिड़की दी- “मुख्य अतिथि को बैठाकर आप खाना खिलाने की बात कर रहे हैं? चलिए कार्यक्रम शुरू करते हैं” मैं उनसे सहमत होने के एक मात्र उपलब्ध विकल्प पर सिर हिलाते हुए आगे बढ़ गया।
“लेकिन दूसरे भाई लोग कहाँ हैं?” मैंने ज़ाकिर से पूछा। हाल में अभी तीन-चार छात्र टाइप प्रतिभागी दिखा्यी दे रहे थे। कुछ पंजीकरण काउंटर पर अपना नाम लिखा रहे थे। मेरी उम्मीद से उलट वहाँ एक भी ऐसा ब्लॉगर चेहरा नहीं दिखा जो मुझसे पहले न मिला हो। वहाँ थे तो बस अरविंद जी और ज़ाकिर भाई। जाहिर है कि तीसरा सुपरिचित बड़ा नाम मेरा ही था :)
‘अवध रिसर्च फाउंडेशन’ नामक निजी संस्था के कार्यालय में ही कार्यशाला आयोजित थी। ज़ाकिर भाई उन खाली कुर्सियों की ओर देख रहे थे जो वर्तमान और भविष्य के ब्लॉगर्स की राह देख रही थीं। आमद बहुत धीमी और क्षीण थी। पूर्व कुलपति प्रो. महेंद्र सोढ़ा जी ठीक समय पर पधार चुके थे। अरविंद जी भी समय की पाबंदी पर जोर देने लगे और कार्यक्रम तत्काल शुरू करने का निर्णय हुआ। मैने मन ही मन ट्रेन वाली उन माता जी को एक बार फिर धन्यवाद दिया जिन्होंने सुबह नाश्ते के नाम पर मुझे दिन भर के लिए भूख से मुक्त कर दिया था। हमने उद्घाटन सत्र प्रारम्भ किया। इसका हाल आप यहाँ और यहाँ पढ़ सकते हैं।
उद्घाटन सत्र के बाद हमने लजीज व्यंजनों से भरा लंच पैकेट खोला और तृप्त हुए। अरविंद जी ने दो बार बताया कि वे बहुत जिद्दी इंसान हैं और जो बात एक बार तय कर लेते हैं उसे करवाकर मानते हैं। हम उनकी इसकी बात का लोहा मानते हुए खाना खाते रहे। समय की पाबंदी को जबतक जिद्द का विषय न बनाया जाय तबतक उसका भारत में अनुपालन असंभव है। इस बीच NCSTC के प्रेक्षक महोदय भी आ चुके थे और उद्घाटन सत्र की सफलता से गदगद हो रहे थे। सबकी भूख प्रायः शांतिपथ पर चल पड़ी थी।
लेकिन कदाचित् मेरी दूसरी भूख अतृप्त ही रहने वाली थी। मैंने आखिरकार पूछ ही लिया- “भाई साहब, आप ये बताइए कि आपने किस-किसको बुलाया था जो नहीं आये?” ज़ाकिर भाई एक से एक नाम गिनाने लगे और उनके न आने के ज्ञात-अज्ञात कारण बताने लगे। मैं निराश होकर सुनता रहा। हद तो तब हो गयी जब उन्होंने यह बताया कि आज के प्रथम तकनीकी सत्र के मुख्य वक्ता ज़ीशान हैदर ज़ैदी और वक्ता अमित ओम के आने में भी संदेह उत्पन्न हो गया है। सारांशक अमित कुमार का न आना तो पक्का ही है। मैंने अरविंद जी से पूछा कि मेरी ज़िंदगी की ‘पहली अध्यक्षी’ मंच पर अकेले ही गुजरेगी क्या? वे इस सत्र में जाकिर भाई के साथ किनारे बैठकर उद्घाटन सत्र पर एक ब्लॉग पोस्ट तैयार करके तुरंत ठेलने की योजना बना रह थे। बोले- “यह सत्र आपके हाथ में है। जैसे चाहिए संचालित करिए।” मैंने कहा- “अध्यक्ष की भूमिका तो चुपचाप बैठने और सबसे अंत में यह बोलने की होती है कि किसने क्या बोला? अब यहाँ तो सीधे स्लॉग ओवर की नौबत आ गयी है।”
इसपर उन्होंने ‘आधुनिक सेमिनारों में अध्यक्ष की बढ़ती भूमिका’ विषय पर एक लम्बी व्याख्या प्रस्तुत कर दी जिसका सारांश यह था कि अध्यक्ष को पूरा सेमिनार हाइजैक करने का पावर होता है। उसे शुरुआत से लेकर अंत तक वे सारे काम खुद करने पड़ते हैं जो करने वाला कोई और नहीं होता है। दीपक जलाने के लिए पंखा बंद करने से लेकर तेल की बत्ती से अतिरिक्त तेल निचोड़ने तक और अतिथियों व प्रतिभागियों के स्वागत से लेकर धन्यवाद ज्ञापन तक उसे हर उस तत्वज्ञान से गुजरना पड़ता है जो किसी सेमीनार की सफलता के लिए आवश्यक होते हैं। मुझे शरद जोशी द्वारा बताये गये ‘अध्यक्ष बनने के नुस्खे’ बेमानी लगने लगे।
अपनी नैया किनारे पर ही डूबती देख मैंने भगवान को स्मरण किया। बाईचान्स भगवान ने मेरी प्रार्थना सुन भी ली। सत्र प्रारम्भ होने के ठीक पहले ओम जी भागते हुए पहुँच ही तो गये। मैंने उनके लिए फ़ौरन चाय-पानी का इंतजाम करने को कहा। पता चला कि उन्होंने जिंदगी में कभी चाय पी ही नहीं। यह मजाक नहीं सच कह रहा हूँ। मेरे सामने एक ऐसा निर्दोष सुदर्शन नौजवान खड़ा था जिसके शरीर में चाय नामक बुराई का लेशमात्र भी प्रवेश नहीं हो पाया था। ऐसे पवित्र आत्मा के आ जाने के बाद सफलता पक्की थी। अब मेरी भगवान में आस्था और बढ़ गयी।
मैंने एक बार हाल में झाँककर प्रतिभागियों का मुआयना किया। दिल जोर से धड़क गया। कुल जमा पाँच विद्यार्थी यह जानने बैठे हैं कि ‘साइंस ब्लॉगिंग’ क्या है…! इन्हें यह समझाने में दो घंटे लगाने हैं। वह भी तब जब इसी बिन्दु पर अरविंद जी अपना पॉवर-प्वाइंट शो एक घंटा पहले ही प्रस्तुत कर चुके हैं। मैं भी थोड़ा बहुत जो कुछ पता था वह उद्घाटन सत्र में ही उद्घाटित कर चुका हूँ। नये वक्ता ओम जी पर सारा दारोमदार था। इसी उधेड़-बुन में लगा रहा कि पसीना बहाते एक दढ़ियल नौजवान नमूदार हुआ। मानो खुदा ने कोई फ़रिश्ता भेंज दिेया हो। परिचय हुआ तो पता चला कि ये ही जनाब जीशान हैदर ज़ैदी साहब हैं। ये साइंस फिक्शन के माहिर लेखक हैं और वैज्ञानिक विषयों को रोचक शैली में प्रस्तुत करने का हुनर रखते हैं। आप रोजे से थे और अपने मेडिकल कॉलेज में परीक्षा कराकर भागते चले आये थे।
बस फिर क्या था। तकनीकी सत्र शुरू हुआ। लखनऊ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता और जनसंचार विभाग के बच्चों ने पंजीकरण करा रखा था जिनके आने से हाल भरा-भरा सा लगने लगा। मैने माइक संभाला। सबसे संक्षिप्त परिचय लिया, उनका मन टटोलने के लिए। सभी उत्सुक लगे। जिज्ञासु विद्यार्थी किसे नहीं भाते? जीशान ने अपनी कुशलता का परिचय दिया। मैंने दुतरफ़ा संवाद सुनिश्चित करने के लिए सभी प्रतिभागियों को टिप्पणी करना अनिवार्य कर दिया। अध्यक्षीय फरमान था। पूरा अनुपालन हुआ। प्रश्नोत्तर का दौर कुछ लम्बा ही हो गया। कुछ प्रश्न अगले सत्रों के लिए टालने पड़े। …सब आज ही जान लोगे तो अगले चार दिन क्या करोगे भाई…? मैने उनका हौसला बढ़ाते हुए पहले हि कह दिया था कि जब मेरे जैसा कोरा आर्ट्स साइड का विद्यार्थी साइंस ब्लॉगिंग सेमिनार में अध्यक्षता कर सकता है तो आप लोग तो बहुतै विद्वान हो। उनका उत्साह बहुत बढ़ गया। अरविंद जी ने उद्घाटन के समय कह ही दिया था कि ब्लॉग बनाने में केवल तीन मिनट लगते हैं।
मुझे अंदेशा हुआ कि कहीं ये ऐसा न समझ लें कि ब्लॉग सच्ची में तीन मिनट का खेल है। मैंने फिर संशोधित सूचना दी। ब्लॉग बना लेना उतना भर का काम है जितना एक भारी-भरकम किताब खरीदकर ले आना और पहला पन्ना खोल लेना। असली मेहनत तो उसके बाद शुरू होती है जिसका कोई अंत ही नहीं है। अगर पन्ना पलट-पलत कर पढ़ाई नहीं की गयी तो किताब पर धूल जम जाएगी और खरीदना बेकार हो जाएगा। वही हाल ब्लॉग का है….
अंत में अमित ओम ने सारांशक की भूमिका निभाते हुए सारी बातें दुबारा बताना शुरू कर दिया। बच्चे तबतक काफी कुछ सीख चुके थे इसलिए उठकर जाने लगे। मौके की नज़ाकत भाँपते हुए मैने फिर पतवार थामी और नाव को सीधा किनारे लगाकर खूँटे से बाँध दिया। अब कल खुलेगी। कल के नाविक कोई और हैं। लेकिन वह बहुत अनुभवी, मेहनतकश और मजेदार बातें करने वालों की टीम है। हम भी नाव में बैठकर यात्रा करेंगे। शायद कल कुछ लखनवी ब्लॉगर्स के दर्शन भी हो जाय।
समय: ११:५५ रात्रि (२७ अगस्त,२०१०)
स्थान: २१३, एन.बी.आर.आई. गेस्टहाउस, गोखले मार्ग, लखनऊ।
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
गुरुवार, 28 जनवरी 2010
पुण्यदायी व्यवसाय- तीर्थयात्रा कम्पनी…!
भारत की सांस्कृतिक एकता को मजबूत करने हेतु आदि शंकराचार्य नें भारत की चार दिशाओं में चार धामों की स्थापना की। उत्तर में बद्रीनाथ, दक्षिण में रामेश्वरम , पूरब में जगन्नाथपुरी एवं पश्चिम में द्वारका, हिन्दुओं के चार धाम हैं। आस्थावान हिन्दू इन धामों की यात्रा करना अपना पवित्र कर्तव्य मानते थे। शंकराचार्य से पूर्व पौराणिक काल से बद्रीनाथ, केदारनाथ, जमुनोत्री और गंगोत्री को चार धामों की प्रतिष्ठा प्राप्त है। कालान्तर में हिन्दुओं के नये तीर्थ आते गये हैं। बद्रीनाथ, द्वारका, रामेश्वरम, जगन्नाथपुरी के चार धामों के अतिरिक्त केदारनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री, ऋषिकेष, हरिद्वार, वैष्णो देवी, वाराणसी, प्रयाग, अयोध्या बैजनाथधाम, तिरुपति, शिरडी, गंगासागर, पशुपतिनाथ (काठमाण्डू) आदि तीर्थस्थल आस्थावान हिन्दुओं द्वारा विशेष श्रद्धा के साथ भ्रमण किये जाते हैं। शक्ति की देवी दुर्गाजी के अनेक रूपों के मन्दिर प्रायः पहाड़ों की चोटियों व दुर्गम स्थानों पर स्थापित है। लेकिन भक्तगण दुर्गम रास्तों की परवाह किए बिना माँ का आशीर्वाद प्राप्त करने निकल पड़ते हैं। देश के अलग-अलग हिस्सों में प्रतिष्ठित भगवान शंकर से संबन्धित द्वादश ज्योतिर्लिंग भी हिन्दू आस्था और भक्ति के अनन्य केन्द्र हैं:
सौराष्ट्रे सोमनाथम् च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्
उज्जयिन्याम् महाकालम् ओंकाराममलेश्वरम्
केदारम् हिमवत्पृष्ठे डाकिन्याम् भीमशंकरम्
वाराणास्यान्तु विश्वेशम् त्र्यम्बकम् गौतमीतटे
बैद्यनाथम् चिताभूमौ नागेशम् दारुकावने
सेतुबन्धेतु रामेश्वरम् द्युश्मेशं च शिवालये
द्वादशैतानि नामानि प्रातरुत्थाय यः पठेत्
सर्वयाय विनिर्मुक्तः सर्वसिद्धिः फलंलभेत्
इन पवित्र तीर्थस्थलों का दर्शन करने और पवित्र नदियों में स्नान करने से समस्त पापों का नाश होने और पुण्य के अर्जन का विश्वास प्रायः सभी हिन्दुओं को तीर्थयात्रा के लिए प्रेरित करता है। मार्ग की तमाम कठिनाइयों का सामना करते हुए प्राचीन काल में चारों धाम की यात्रा हिन्दुओं द्वारा देश की सांस्कृतिक एकता का दर्शन करने के लिये नहीं वरन् अपना परलोक सुधारने के लिये ही की जाती होगी। इसी प्रकार गंगा का दर्शन करने लोग इस भाव से नहीं जाते कि वे सांस्कृतिक दृष्टि से भावविभोर हो जायें वरन् इस भाव से जाते होंगे कि गंगा स्वयं शिव की जटा से निकली हैं और इसमें स्नान करने से उनके पापों का मोचन होगा।
पुराने जमाने में ये तीर्थयात्राएं बहुत कष्टकारी होती थीं। घर से बाहर निकलते ही कष्ट सहयात्री बन जाता था। कच्चे और दुर्गम मार्ग, दुर्लभ और धीमी सवारियाँ, प्रायः पैदल यात्रा की मजबूरी, खान-पान में कठिनाई और ठहरने के स्थानों का अभाव साधारण हैसियत वालों को यात्रा से रोकते थे। बहुत कम हिन्दू चारोधाम की यात्रा कर पाते थे। सुना जाता है कि भविष्य अनिश्चित् जान बहुत से लोग यात्रा पर निकलने से पहले ही मृत्यु के बाद कराये जाने वाले कर्मकाण्ड और अनुष्ठान सम्पन्न कराकर जाते थे। जो भाग्यशाली होते थे और सकुशल यात्रा समाप्त कर लौट आते थे उनके दर्शन को भी पुण्यदायी माना जाता था। उनके पाँव पखारने और सेवा करने वालों की लाइन लग जाती थी।
पाप-पुण्य का विचार हमारे जनमानस में बहुत गहराई तक पैठा हुआ है। अच्छी और संस्कारित शिक्षा से हमारे मन को अच्छे और बुरे का भेद करना आता है। कम से कम हमारी आत्मा तो जानती ही है कि क्या गलत है और क्या सही। लेकिन लाख पढ़े-लिखे होकर भी ऐसे कम ही लोग हैं जो अपने सदाचरण पर टिके रहने को ही सबसे बड़ा पुण्य मानें। बहुतायत तो उन्हीं की है जो इसके बजाय पहले काम, क्रोध, मद और लोभ के वशीभूत होकर निरन्तर अनैतिक कार्य करते जाते हैं और उसके बाद विश्वास रखते हैं कि पुरोहित द्वारा बताये गये कर्मकाण्डों के आयोजन और पवित्र तीर्थों के दर्शन द्वारा अपने एकाउण्ट से पाप की liability घटा लेंगे और पुण्य का asset बढ़ा लेंगे। इसी बैलेन्स शीट को कृत्रिम रूप से प्रभावशाली बनाने के प्रयास में नये जमाने के लोग भी अपने पाप धोने के लिए संगम सहित तमाम नदियों व सरोवरों में खास मूहूर्त पर स्नान करने के लिए उमड़े जाते हैं और मन्दिरों में दर्शनार्थियों की भीड़ साल-दर-साल बढ़ती जा रही है।
इस पाप-पुण्य के व्यापार में बहुत से असली व्यापारियों ने व्यावसायिक पूँजी निवेश किया है। अब यात्रा की अनेकानेक सुविधाएं बढ़ती जा रही हैं। अब तो घर से ज्यादा बाहर की यात्रा खुशगवार होती जा रही है। पैकेज टूर ऑपरेटर्स, ट्रैवेल एजेन्सियाँ और सरकारी संस्थान, जैसे- रेलवे और पर्यटन विभाग द्वारा भी यात्रियों की जरूरत के अनुसार सुविधाए उपलब्ध करायी जा रही हैं। अब पुण्य कमाने निकले यात्रियों को सेवा देकर आर्थिक लाभ अर्जित करने वाली एजेन्सियों की भरमार होती जा रही है। मुझे यह सब चर्चा करने का मन इसलिए हुआ है कि हाल ही में मुझे एक ऐसी सुविधा से साक्षात्कार हुआ जो अत्यन्त सस्ते दर पर भारत के अधिकांश महत्वपूर्ण तीर्थस्थलों की सैर लगातार पैंतीस दिनों तक कराती है। वह भी ऐसे कि यात्री को न तो अपने ठहरने का स्थान बदलना पड़ता और न ही सोने का बिस्तर। अपने सामान की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी नहीं, उसे यहाँ से वहाँ ढोने की फिक्र भी नहीं और खाने-पीने के लिए गर्म व ताजे घरेलू भोजन को मिस करने की मजबूरी भी नहीं है। मुझे तो यह किसी चमत्कार से कम नहीं लगा।
रेलगाड़ी की चार बोगियों को विशेष रूप से तैयार कराकर इस बड़ी यात्रा के लिए तीर्थयात्रा कम्पनी को उपलब्ध करा दिया जाता है। तीर्थयात्री को उसकी जो आरक्षित बर्थ यात्रा के प्रारम्भ में मिलती है वही अगले पैंतीस दिनों तक उसका बिस्तर होता है और वही कम्पार्टमेण्ट उसका घर बन जाता है। कम्पार्टमेण्ट की अन्य बर्थों के यात्री उसके परिवार के सदस्य बन जाते हैं और बगल का कम्पार्टमेण्ट उसका पड़ोसी घर हो जाता है। पूरी बोगी एक मुहल्ला और चार-पाँच बोगियाँ मिलकर एक शहर बना देती हैं। एक ऐसा शहर जिसमें देश के अलग-अलग राज्यों से आकर लोग बसे हुए हैं। सच में ‘भारत-दर्शन’ को निकले ये लोग स्वयं भारत का दर्शन कराते हैं। ये चारो डिब्बे अलग-अलग मार्गों पर अलग-अलग ट्रेनों से जुड़ते और टूटते हुए एक साथ देश के अलग-अलग हिस्सों तक पहुँचते रहते हैं।
मुझे यह सब देखने और जानने का सुअवसर तब मिला जब एक ऐसी ही यात्रा मण्डली बसन्त पञ्चमी के दिन इलाहाबाद पहुँची। इस यात्रा दल में मेरे गाँव के आठ लोगों की टोली में मेरे माता-पिता भी शामिल थे। उत्सुकतावश मैं सुबह सोकर उठने के बाद जल्दी-जल्दी तैयार होकर आठ बजे स्टेशन पहुँच गया। इलाहाबाद जंक्शन पर मजार वाली प्लैटफ़ॉर्म के दोनो ओर यात्री दल के दो-दो डिब्बे खड़े थे लेकिन उनमें ताला बन्द था। कम्पनी के स्टिकर से पहचान हुई जिसके कर्मचारियों ने बताया कि यात्रा बनारस से रात में ही यहाँ आ गयी थी। प्रातःकाल सभी यात्री लक्जरी कोच बसों से संगम क्षेत्र की ओर चले गये हैं। गंगा स्नान करके बड़े हनुमान जी, अक्षयबट आदि का दर्शन करके आनन्द भवन जाएंगे। वहाँ से भारद्वाज आश्रम देखने के बाद बसें उन्हें करीब बारह बजे स्टेशन छोड़ जाएगी। प्लैटफ़ॉर्म पर यात्रियों का भोजन कम्पनी के रसोइए तैयार कर रहे थे।
मैं फौरन लौटकर घर आया। कार्यालय में बॉस से मिलकर छुट्टी लिया और बच्चों को तैयार कराकर श्रीमती जी के साथ स्टेशन पर पहुँच गया। अपने सास-ससुर की पसन्द का भोजन तैयार करने में श्रीमती जी सुबह से ही व्यस्त रही थीं। चम्पा की मदद से हरे मटर की पूड़ियाँ, गोभी, लौकी, आलू और टमाटर की पकौड़ियाँ और पिताजी की पसन्दीदा खीर अपने हाथों तैयार कर डिब्बे में भर लिया था और झोले में अन्य जरूरी सामान डालकर हम स्टेशन पहुँच गये। ठोड़ी देर बाद यात्रियों का समूह प्लेटफ़ॉर्म पर आने लगा। प्रायः सबकी उम्र पचास के ऊपर थी। सबके चेहरे पर सन्तुष्टि का भाव तैर रहा था। लम्बी यात्रा की थकान जैसा कुछ भी नहीं दिखा। सबके गले में लटका परिचय पत्र जरूर ध्यान आकर्षित कर रहा था।
एक चादर बिछाकर मैने अपने गाँव की यात्रा मण्डली को बिठाया। श्रीमती जी ने डिब्बा खोलकर अपने घर का पकवान परोसना शुरू किया और मैने इस यात्रा के प्रबन्धक को खोजना। वे निकट ही मिल गये। इतनी बड़ी यात्रा को सुव्यवस्थित ढंग से संचालित करने वाला व्यक्ति निश्चित ही बहुत जानकार और गुणी होगा यह अनुमान पहले से कर चुका था।
लाला लक्ष्मीनारायण अग्रवाल को देखकर कोई सहज ही अन्दाज लगा सकता है कि उन्होंने किसी मैनेजमेण्ट स्कूल से इवेन्ट मैनेजमेण्ट का कोई कोर्स नही किया है। न ही उन्होंने उन्होंने कोई प्रोफ़ेशनल डिग्री ही हासिल की होगी। लोहे की एक फोल्डिंग चेयर पर बैठे हुए वे अपने स्टाफ़ को जरूरी हिदायतें दे रहे थे। बीच-बीच में देश के अन्य हिस्सों में चल रही उनकी कम्पनी की अन्य तीर्थयात्रा बोगियों से आने वाले फोन काल्स भी सुनते जा रहे थे। अगली यात्रा की बुकिंग भी करते जा रहे थे, और टूर-पैकेज के बारे में भी बताते जा रहे थे। मल्टी-टास्किंग का बेजोड़ नमूना थे लालाजी।
“लालाजी, कबसे हैं आप इस धन्धे में…?” मैने उनका मोबाइल बन्द होते ही पूछ लिया।
“सरसठ से चल रहा है जी… बयालीस साल हो गये है” उन्होंने सहजता से उत्तर दिया।
मुझे अपनी अल्पज्ञता पर लज्जा आयी। जो काम १९६७ से वर्षानुवर्ष हो रहा है मुझे उसका पता अब जाकर चल पाया है। मैने झेंप छिपाते हुए आश्चर्य से पूछा, “लगातार बयालिस साल से आप यह वार्षिक यात्रा आयोजित कराते है...?”
“नहीं जी, …यह तो साल भर चलता रहता है। …अगला टूर एक हफ्ते बाद रवाना होगा। वह सत्रह दिन का है। साल में चार-पाँच हो जाते हैं”
“कैसे करते हैं आप यह सब?” मैने अपना कौतूहल छिपाते हुए पूछा।
“स्टाफ़ लगा रखा है जी। बाकी तो ऊपर वाला सब कराता है…सारा सामान हम साथ लेकर चलते हैं। लोकल केवल सब्जियाँ खरीदते हैं। हमारा स्टाफ़ अब ट्रेण्ड है। …सब प्रभु का आशीर्वाद है”
मैने जब यात्रा के रूट और प्रमुख दर्शनीय स्थलों का व्यौरा जानना चाहा तो उन्होंने एक गुलाबी पर्चा थमा दिया। इस पर्चे में यात्रियों की जानकारी के लिए बहुत स्पष्ट और सूक्ष्म तरीके से सभी जरूरी बातें बतायी गयी थीं। नीचे सारणी में यात्रापथ का विवरण दूंगा। (अभी देर रात हो गयी है इसलिए इसे टालता हूँ)
वहीं पर गर्मागरम रोटियाँ सेंकी जा रही थीं। चार लोग मिलकर जिस कुशलता से लकड़ी की आग पर फुलके बना रहे थे उन्हें देखकर मैं लोभसंवरण न कर सका। आप यह वीडियो देखिए:
खाने में लहसुन-प्याज का प्रयोग नहीं होता। तेल, मिर्च और मसाला का प्रयोग भी बुजुर्गों की सहूलियत के हिसाब से कम किया जाता है। यात्री की उम्र, पसन्द और डाक्टरी सलाह का ध्यान रखते हुए सुबह की चाय, नाश्ता और दोपहर व शाम के भोजन को तैयार किया जाता था। हमारे गाँव के लोगों ने कहा कि ‘बहूजी’ ने इतना खिला दिया है कि अब कम्पनी का खाना हम नहीं खा सकते। हमें दावत दी गयी। हमने सहर्ष दावत कबूल की और सपरिवार डिब्बे में बैठ गये। डिब्बा क्या था बम्बई की किसी चाल का कमरा लग रहा था। ऊपर बाँधी गयी रस्सियों पर कपड़े झूल रहे थे। ऑलआउट मशीन और मोबाइल चार्जर की व्यवस्था सभी कूपों में थी। दवाइयाँ, चश्मे, और मोबाइल सबके सिरहाने रखे हुए। किसी चोर उचक्के या उठाई गीर के खतरे निश्चिन्त सबकुछ खुला हुआ जैसे घर में रखा हुआ हो। यात्रियों की आपसी बातचीत में घरेलू परिचय का पुट। इलाहाबाद में हम उनलोगों से मिलने वाले हैं यह पूरी बोगी के लोग जानते थे। वे सभी पिछले महीने भर से साथ जो थे।
भोजन परोसने के लिए दक्ष कर्मचारी थे। सभी यात्रियों को उनकी बर्थ पर थालियाँ थमा दी गयीं। सादी सब्जी, तीखी-मसालेदार सब्जी, सादा चावल, मीठा चावल, मटर-पनीर स्पेशल (दाल के बदले) आदि बाल्टियों में भर-भरकर एक ओर से आते और जरूरत के हिसाब से थालियों में डालते हुए दूसरी ओर निकलते जाते। दस-पन्द्रह मिनट में ही स्वादिष्ट और स्वास्थ्यवर्द्धक भोजन का काम पूरा हो गया।
वहाँ से लौटकर आया तो यही सोचता रहा कि स कम्पनी के बारे में आप सबको बताऊंगा। घर आकर गुलाबी पर्चा खोला तो उसमें सबसे पहले यही बताया गया था कि-
‘हमारी संस्था की सफलता को देखते हुए अन्य बहुत से अनुभवहीन व्यक्तियों ने नाम के आरम्भिक ‘श्री’ के स्थान पर अन्य नाम डिजाइन जोड़कर अपना नाम रख लिया है।और वे मिलते-जुलते नामों से VIP ए.सी. कोच से यात्रा करने के प्रलोभन द्वारा यात्रियों को भ्रमित कर रहे हैं। कृपया उनसे दस वर्ष पुराने यात्रियों की सूची रिकार्ड मांगे व उनके पुराने यात्रियों से सम्पर्क करके सुविधा, व्यवस्था की जानकारी करें तभी आपको वास्तविकता ज्ञात होगी। चूँकि हम यात्रियों को पूरी-पूरी सुविधा प्रधान करते हैं इसलिए हमारा खर्चा अन्य संस्थाओं से ज्यादा है। कृअपया आप हमारे पुराने यात्रियों से सुविधा व्यवस्था की जानकारी प्राप्त कर्रें व सन्तुष्ट होने के बाद हि सीट बुक कराएं।’
मुझे महसूस हुआ कि इस क्षेत्र में भी प्रतिस्पर्धा का दखल हो गया है। ग्राहकों (यात्रियों) को इससे लाभ मिलना ही है। धार्मिक आस्था के वशीभूत हिन्दुओं को चारोधाम व द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से अधिकांश की यात्रा एक मुश्त कराने वाली यह योजना इन कम्पनियों को आर्थिक लाभ चाहे जो दे रही हो लेकिन प्रतिवर्ष हजारों लोगों को पुण्य अर्जन में सहयोग और सेवा प्रदान करने वाली कम्पनी के कर्मचारी और प्रबन्धक पुण्य का लाभ जरूर कमा रहे हैं। आप क्या सोचते हैं?
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
वीडिओ पता: http://www.youtube.com/watch?v=4vIE27ViX4o



