हमारी कोशिश है एक ऐसी दुनिया में रचने बसने की जहाँ सत्य सबका साझा हो; और सभी इसकी अभिव्यक्ति में मित्रवत होकर सकारात्मक संसार की रचना करें।
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रविवार, 26 अक्टूबर 2014

मोदी-चाय है कि बवाल की दावत…

namochayमीडिया के लिए मोदी की चाय पार्टी से सोशल मीडिया में जो हलचल मची है वह प्याले में तूफान की उक्ति चरितार्थ करती है। प्रिन्ट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की प्रायः सभी बड़ी हस्तियाँ जो देश की राजधानी में कार्यरत हैं उन्हें नरेन्द्र मोदी ने आदर सहित बुलाया, दीपावली की शुभकामनाएँ दीं और स्वच्छ भारत अभियान में उनके सहयोग के लिए धन्यवाद दिया। देश के सबसे लोकप्रिय राजनेता के पास पहुँच जाने के बाद कुछ लोगों में यह सहज इच्छा पैदा हो गयी कि उनके साथ तस्वीरें खिचवा ली जाय।

मोबाइल फोन में कैमरे की सुविधा ने तो यह हाल कर दिया है कि हमें राह चलते कोई सुन्दर सा कुत्ता भी दिख जाय तो उसके साथ सेल्फ़ी क्लिक करने लगते हैं और तुरन्त देश भर के मित्रों को फेसबुक और व्हाट्सएप के माध्यम से दिखाने लगते हैं। तो फिर पूरी दुनिया में अपने किस्म की अकेली शख्सियत को देखकर किस चुगद का मन सेल्फ़ी खिंचाने के लिए नहीं ललचा जाएगा। अलबत्ता कुछ स्वनामधन्य ऐसे लोग भी हैं जिन्हें मोदी नाम से ही सख्त नफ़रत है। इन्हें भारतीय लोकतंत्र के किसी भी मूल्य से बड़ा लगता है अपने पूर्वाग्रहों की हर हाल में रक्षा करना।

इस चाय-पार्टी से प्रेस की स्वतंत्रता पर आँच आने की चिन्ता में घुलते तमाम मित्रों के स्टेटस देखकर मैं दंग रह गया। भड़ास4मीडिया पोर्टल पर प्रचुर सामग्री जमा हो चुकी है। कुछ देर के लिए सामान्य शिष्टाचार तो हम अपने दुश्मन के साथ भी निभा लेते हैं। यहाँ तो देश के सर्वोच्च जनप्रतिनिधि ने आदर व सम्मान से बुला रखा था। अब इसे जो लोग उत्कोच समझने कॊ मनोवृत्ति रखते हैं वे निश्चित रूप से यह भी समझते होंगे कि पत्रकार समुदाय में ऐसे लोग भरे पड़े हैं जो थोड़ा सा प्रलोभन सामने आते ही उसओर झपट पड़ेंगे और अपने स्वार्थ के आगे जनहित का ख्याल छोड़ देंगे। namochay.2jpg

भगवान न करे यह बात सच हो; लेकिन यदि इस बात में लेश मात्र भी सच्चाई है कि मीडिया वाले भी मात्र अर्थोपार्जन के उद्देश्य से ही काम कर रहे हैं और ‘मिशन’ वाला हिस्सा पीछे छूट चुका है तो इसके लिए सिर्फ़ उस चाय-पार्टी में सम्मिलित होने को दोष देकर छुटकारा नहीं मिलने वाला। फिर तो पत्रकार बन्धुओं द्वारा गुजारी गयी हर शाम पर निगाह रखनी होगी जिसमें दस-पाँच रूपये की टुच्ची चाय नहीं बल्कि एक से एक उम्दा ब्रैंड की देशी-विदेशी मदिरा और फाइव-स्टार डिनर पार्टी भी आसानी से उपलब्ध है। प्रोफेशनलिज्म की मांग तो यह है कि अपनी स्टोरी को विश्वसनीय बनाने के लिए और अन्दर की सच्ची खबर बाहर लाने के लिए चाहे जिस भी रूप में अन्दर जाना पड़े, चले जाना चाहिए। घोटालेबाज के साथ मक्कारी का खेल खेलकर भी सच्चाई बाहर निकल आये तो ऐसी मक्कारी करने में कोई हर्ज़ नहीं। स्टिंग ऑपरेशन इसे ही तो कहते हैं।

namochay.1jpgलेकिन जो लोग नरेन्द्र मोदी का नाम लेते ही उल्टियाँ महसूस करने लगते हैं, सारी तर्कशक्ति मिथ्या प्रलाप में लगा देते हैं और हास्यास्पद होने की सीमातक प्रतिकार की भाषा बोलने लगते हैं उनका रोग बहुत भयानक और असाध्य है। कोई एक दशक पहले लगा आघात इनके मन मस्तिष्क पर जो निशान छोड़ गया उससे मानो इनमें बदलते समय के साथ आगे बढ़ने की क्षमता ही जाती रही। स्थिति यह हो गयी है कि अब ये “पाप से घृणा करो पापी से नहीं” वाले सन्देश को उल्टा समझते हैं। यानि- वे पाप से भले ही घृणा न करें लेकिन पापी से घूणा करने का दिखावा जरूर करेंगे। अगर वे वास्तव में पाप से घृणा कर रहे होते तो ऐसे पाप की लंबी फेहरिश्त से जुड़े सभी पापियों से समान दूरी बनाकर चलते। लेकिन तमाम दलों में विविध रूप लेकर बैठे इसी प्रकार का पाप कर चुके लोगों की गोद में बैठकर अपना उल्लू सीधा करते रहने में इन्हें कोई शर्म नहीं आती।

लोकसभा चुनाव से पहले और बाद में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के चर्चित चेहरों के रुख में आये बदलाव को देखकर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि लाखो की लागत लगाकर करोड़ो की कमाई करने के लिए कैसे रंग बदलना पड़ता है, कैसे शर्म-हया ताख पर रख देनी पड़ती है और मालिकान के फरमान को हर हाल में पूरा करना पड़ता है। यह सब मोदी की चाय-पार्टी से पहले की बात है; तो फिर इस चाय पर इतना तूफान क्यों?

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
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बुधवार, 26 फ़रवरी 2014

न्याय के मंदिर में पंडागीरी

जब भी सरकारी पक्ष की पैरवी करने किसी अदालत में जाता हूँ मन परेशान हो जाता है। न्याय के जिन मंदिरों में स्वतंत्र और निष्पक्ष न्यायपालिका के कर्णधार न्यायमूर्ति अपने फैसलों से देश के आम नागरिकों को भारतीय लोकतंत्र के प्रति आस्था बनाये रखने का संबल देते हैं उन्हीं के अहाते, बरामदों और गलियों में विधि व्यवसाय की दुकानें खोलकर या दूसरे आनुषंगिक घंधों से रोजी-रोटी का जुगाड़ करने वालों को देखकर मथुरा और विंध्याचल के पंडे याद आ जाते हैं।

एक दुखियारी पार्टी, एक गर्जमंद ग्राहक, एक बदहवास मुवक्किल, एक परेशान सरकारी मुलाजिम के रूप में आप जब न्यायालय की शरण में जाते हैं तो आपको माननीय न्यायमूर्ति के दर्शन हो न हों लेकिन उनके प्रांगण में काम करने वाले तमाम ऐसे कर्मचारियों का सामना करना पड़ता है जो आपकी मजबूरी को भुनाने की ताक में रहते हैं। सरकार द्वारा निर्धारित फीस चुका भर देने से न तो आपको अपनी फाइल देखने को मिलेगी और न ही सरकारी वकील आपका मुकदमा लड़ेगा। अपनी जेब से यदि आप ‘खर्चा-पानी’ के नाम पर कुछ ढीला करने को तैयार नहीं हैं तो एक साधारण शपथ पत्र दाखिल करने में आपको नाकों चने चबाने पड़ सकते हैं। कई-कई दिन तक वकील साहब को आपका शपथपत्र डिक्टेट करने के लिए समय नहीं मिलेगा। उसके बाद स्टेनो साहब को खुश नहीं किया तो उन्हें दूसरे तमाम काम आ जाएंगे और आपकी सी.ए. टाइपिंग का इन्तजार करती रहेगी। उसके बाद ‘ओथ कमिश्नर’ का हक-महसूल अलग है। जबकि इन सभी कार्यों के लिए उन्हें बाकायदा सरकारी फीस मिलती है।

कदाचित्‌ इन परेशानियों के कारण ही सरकारी मुकदमों की पैरवी बहुत कठिन हो जाती है। कार्यपालिका के निचले स्तर पर सरकारी मुकदमों के प्रति खुब लापरवाही बरती जाती है। अधिकारी प्रायः कोर्ट की ओर तबतक रुख नहीं करते जबतक अवमानना की नोटिस न मिल जाय। कुछ खुर्राट तो ऐसे हैं जो वैयक्तिक हाजिरी (Personal Appearance) की नोटिस मिलने से पहले नहीं हिलते। सरकार के विरुद्ध जो पार्टी कोर्ट में जाती है उसे तो अपनी जेब से खर्च करके मनचाहा वकील रखने और जोरदार पैरवी करने का सुभीता है; लेकिन सरकार की ओर से जो वकील एलॉट किये जाते हैं और शासन से जो मुकदमा लड़ने की अनुमति लेनी होती है उसमें निहित जद्दोजहद आपको हतोत्साहित करती है। ऐसे में अगर कमजोर पैरवी करने से व्यक्तिगत लाभ मिलने लगे तो क्या कहने। ऐसे बहुत से उदाहरण देखने में आते है।

सरकारी अधिकारी के रूप में जब मैं मूलभूत प्रशिक्षण ले रहा था तो एकदिन उच्च न्यायालय के एक बेहद प्रतिष्ठित माननीय न्यायमूर्ति हम लोगों को पढ़ाने आये थे। उन्होंने कोर्ट केस के प्रति हमारी जिम्मेदारियों के बारे में बताया और समय से कोर्ट में जवाब लगा देने की सलाह दी। इससे पहले मुझे शिक्षा विभाग में काम करने का थोड़ा अनुभव था; जिसके आधार पर मैंने उनसे एक ऐसी समस्या साझा की जिसका संतोषजनक समाधान वे नहीं दे पाये; सिवाय इसके कि इस विडम्बना का ठीकरा अधिकारियों के सिर फोड़ दिया। पहले इस समस्या को संक्षिप्त रूप में बताता हूँ-

शिक्षकों के वेतन के लिए सरकारी अनुदान प्राप्त करने वाले निजी प्रबन्धतंत्र के विद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्ति के लिए माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड बना है जो प्रतियोगी परीक्षा और इंटरव्यू के आधार पर शिक्षकों का चयन करता है। इन चयनित शिक्षकों को विद्यालय के प्रबंधक द्वारा नियुक्त किया जाना होता है। लेकिन बहुत से खुर्राट प्रबन्धक इन अभ्यर्थियों को नियुक्ति पत्र देकर कार्यभार ग्रहण नहीं कराते  हैं; बल्कि शासन की रोक के बावजूद अपनी पसन्द के शिक्षक (भाई-भतीजा या धनकुबेर) की फर्जी नियुक्ति कर ली जाती है। इनके नियन्त्रक अधिकारी जिला विद्यालय निरीक्षक द्वारा इस नियुक्ति की मान्यता नहीं दी जाती है, लेकिन वे इस फर्जी नियुक्ति की पूरी प्रक्रिया के दौरान मौन रहते हैं। प्रबन्धक अपने अभिलेखों में उन्हें सूचित करने के रिकार्ड बना कर रखता रहता है। एक दिन अचानक उस फर्जी शिक्षक के वेतन भुगतान हेतु बिल जिला विद्यालय निरीक्षक के कार्यालय में प्रस्तुत कर दिया जाता है। इस फर्जी नियुक्त शिक्षक का वेतन भुगतान नहीं किया जाता है। कुछ समय बाद दबाव बनता है तो जिला विद्यालय निरीक्षक इस आशय का एक आदेश पारित करते है कि अमुक शिक्षक की नियुक्ति नियमानुसार नहीं होने के कारण निरस्त की जाती है। इस आदेश को लेकर प्रबन्धतंत्र कोर्ट की शरण में जाता है। रिट याचिका की सुनवायी के पहले दिन माननीय न्यायमूर्ति द्वारा ‘पीड़ित शिक्षक’ की बात सुनने के बाद कहा जाता है कि नोटिस जारी करके जिला विद्यालय निरीक्षक से पूछा जाय कि उन्होंने नियुक्ति क्यों निरस्त की; साथ ही तदनन्तर जिला विद्यालय निरीक्षक द्वारा जारी निरस्तीकरण आदेश स्थगित कर दिया जाता है। यह ‘स्टे-ऑर्डर’ लेकर शिक्षक विजयी मुद्रा में लौटता है क्योंकि उसे पता है कि न्यायालय की अगली प्रक्रिया इतनी लंबी और थकाऊ है कि कोर्ट का अंतिम फैसला आने में दस-पन्द्रह साल लग सकते हैं। इस बीच डीआईओएस साहब की मेहरबानी से सरकारी पैरवी कमजोर करा दी जाती है और कोर्ट की मेहरबानी से एक फर्जी नियुक्त शिक्षक सरकारी वेतन पाने लगता है।

माननीय न्यायमूर्ति से मेरा प्रश्न यह था कि क्या माननीय न्यायालय को अपने स्टे-ऑर्डर का इस प्रकार किये जा रहे दुरुपयोग का संज्ञान नहीं लेना चाहिए। न्यायहित में दिया गया अंतरिम स्थगनादेश वास्तव में इतना लाभदायक हो जाता है कि कई बार इस लूट में सरकारी अधिकारी भी हिस्सेदार हो जाते हैं। कदाचित यह मुकदमा एक नूराकुश्ती बनकर रह जाता है। वकील तो इस प्रणाली के विशेषज्ञ के रूप में अपनी पहचान बना चुके हैं। इसके जवाब में जज साहब ने कार्यपालिका के फेल हो जाने, चयनबोर्ड द्वारा अपना काम न कर पाने तथा विद्यालय में शिक्षकों की आवश्यकता पूरी करने हेतु प्रबन्धक को जिम्मेदार बताने जैसे कारण गिना डाले। मैं आज भी देखता हूँ कि जो कानूनी दाँवपेंच जानते हैं वे कोर्ट के आदेश से कदाचित्‍ अनियमित कार्य को नियमित बना डालते हैं। सरकारी पैरवी कमजोर होना उसका महत्वपूर्ण कारण तो है लेकिन क्या न्यायपालिका को इस प्रवृत्ति के प्रति सतर्क होकर निरोधात्मक कार्यवाही नहीं करनी चाहिए? न्यायिक सुधार आयोग को इस प्रश्न पर विचारकर कुछ ठोस सुझाव देने चाहिए।

(सत्यार्थमित्र)
satyarthmitra.com

बुधवार, 29 जनवरी 2014

यह रिपोर्ट विचलित करती है

आज के अखबार में ये विचलित करने वाले आंकड़े देखने को मिले- भारत में गरीब घरों के वे बच्चे जो लगातार चार साल स्कूल जाते रहे उनमें से 90 प्रतिशत बच्चे साक्षर ही नहीं हो सके। यही नहीं पाँच से छः साल तक स्कूल जाने के बावजूद 30 प्रतिशत बच्चों को अक्षर ज्ञान नहीं हो सका। ग्रामीण क्षेत्रों में कक्षा-पाँच में पढ़ने वाले महाराष्ट्र के 44% विद्यार्थियों और तमिलनाडु के 53% विद्यार्थियों को दो अंको का जोड़-घटाना नहीं आता। बाकी राज्यों में भी हालत खराब ही है। ग्रामीण भारत की गरीब लड़कियों को शतप्रतिशत साक्षर बनाने में अभी 66 साल और लगेंगे। ssa-logo

ये शर्मनाक आंकड़े काल्पनिक नहीं हैं और न ही किसी पार्टी विशेष को लक्ष्य करके तैयार किये गये हैं। भारत सहित दुनिया के तमाम देशों में संचालित सर्व शिक्षा अभियान को अरबो रूपये की आर्थिक मदद देने वाली संस्था यूनेस्को की 11वीं ग्लोबल मॉनीटरिंग रिपोर्ट में ये आंकड़े बताये गये हैं। स्वतंत्र एजेन्सियों द्वारा किये गये सर्वेक्षण पर आधारित ये आंकड़े हमारी प्रशासनिक असफलता और शिक्षा के प्रति लापरवाह दृष्टिकोण को उजागर करते हैं।

यह रिपोर्ट बताती है कि सर्व शिक्षा अभियान के जो लक्ष्य तय किये गये थे उनमें से अधिकांश 2015 तक पूरे नहीं किये जा सकेंगे। यह भी कि दक्षिण-पश्चिम एशिया के देशों में प्राथमिक, जूनियर हाईस्कूल व हाईस्कूल स्तर पर गरीब और वंचित वर्ग के शत प्रतिशत बच्चों को साक्षर और शिक्षित करने की रफ़्तार बहुत ज्यादा धीमी है। भारत में आर्थिक रूप से संपन्न घरों की लड़कियाँ तो शत प्रतिशत साक्षर हो गयी हैं लेकिन गरीब घरों की लड़कियों को शत प्रतिशत साक्षर करने का लक्ष्य सन्‌ 2080 से पहले पूरा होता नहीं दिखता।

इस रिपोर्ट में यह विश्लेषण भी किया गया है कि समाज के हाशिये पर रहने वाले बच्चों को अच्छी गुणवत्ता की शिक्षा देने के लिए सरकारे पर्याप्त खर्च नहीं कर पा रही हैं। एक बच्चे पर खर्च की जाने वाली औसत राशि की तुलना उसे अच्छी शिक्षा देने के लिए आवश्यक राशि से की गयी तो स्थिति बहुत खराब पायी गयी। भारत के आंकड़ों के अनुसार अपेक्षाकृत धनी राज्य केरल में प्रति बालक 685 डालर खर्च किये गये जबकि बिहार में प्रति बालक मात्र 100 डालर की ही व्यवस्था की जा सकी।

इस रिपोर्ट के मुताबिक सभी बच्चों को स्कूल तक पहुँचा देने के लक्ष्य को हासिल करने में भारत अग्रणी रहा है लेकिन स्कूल में उन्हें प्राथमिक स्तर की शिक्षा वास्तव में मिल भी जाय इसकी ओर जैसे कोई ध्यान ही नहीं गया। पूरी दुनिया के करीब 25 करोड़ बच्चे स्कूल जाने के बावजूद निरक्षर हैं और इनमें से एक तिहाई दक्षिण-पश्चिम एशिया के देशों में हैं। इस बेहद निराशाजनक स्थिति में भारत प्रमुख रूप से सम्मिलित है।

ssaशैक्षिक स्तर में प्रगति अत्यन्त धीमी है, खासकर वंचित वर्ग के बालको में। गणित में तो उनकी हालत बहुत ही खराब है। ग्रामीण क्षेत्रों के अध्ययन में यह बात स्पष्त रूप से सामने आयी कि आर्थिक रूप से संपन्न राज्यों में शिक्षा का स्तर गरीब राज्यों की अपेक्षा बहुत बेहतर है। लेकिन महाराष्ट्र और तमिलनाडु जैसे संपन्न राज्यों में भी गरीब घरों की लड़कियाँ शैक्षिक रूप से बहुत पिछड़ी हुई हैं।

बच्चों द्वारा कक्षा-पाँच में पहुँचने से पहले ही स्कूल छोड़ देने का प्रतिशत सीधे तौर पर गरीबी से जुड़ा है। गरीब राज्यों से और गरीब परिवारों के बच्चे स्कूल में टिके रहना ज्यादा कठिन पाते हैं। उत्तर प्रदेश में ऐसे ड्रॉप-ऑउट्स की संख्या 70% और मध्य प्रदेश में 85% पायी गयी।

प्रथमिक स्तर पर शिक्षा के इस संकट का सबसे बड़ा कारण शिक्षकों पर कुशल प्रशासन का अभाव बताया गया है। स्कूल से गैरहाजिर रहने वाले अध्यापकों का प्रतिशत संपन्न राज्यों में 15% (महाराष्ट्र) और 17% (गुजरात) से लेकर विपन्न राज्यों में 38% (बिहार) और 42% (झारखंड) तक है।

इन आंकड़ों को देखकर यह सुनिश्चित जान पड़ता है कि दुनिया चाहे जितनी कोशिश कर ले, हम भारत के लोग विकसित होने को कतई तैयार नहीं हैं। हमें जो भी अवसर मिलेगा हम उसे अपनी मक्कारी, जाहिली और क्षुद्र स्वार्थों की भ्रष्ट बलि-बेदी पर चढ़ा देंगे और झूठी आत्मप्रशंसा के नारे गढ़कर जश्न मनाते रहेंगे। दुनिया वालों हमारा क्या कल्लोगे...?

(सत्यार्थमित्र)
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मंगलवार, 31 दिसंबर 2013

कुछ अलग रहेगा नया साल

जीवन में जबसे कुछ सोचने समझने का सिलसिला शुरू हुआ शायद पहली बार ऐसा महसूस हो रहा है कि कैलेंडर की तारीख जब नये साल में प्रवेश करेगी तो हम एक बदले हुए भारत में पहुँच जाएंगे। अबतक तो यही मानता रहा हूँ कि इस अंग्रेजी कैलेंडर का साल बदलने से कुछ भी नहीं बदलता। लेकिन इस बार बात ही कुछ और है…

मन की आशा

अब तक चाहे जो रहा हाल, कुछ अलग रहेगा नया साल
आशावादी मन बोल रहा फिर लौट सकेगा स्वर्णकाल

तथाकथित आजादी में हमने सुख-दुख बहुतेरे देखे
संविधान की रचना देखी इसपर कलुष घनेरे देखे
लोकतंत्र की राजनीति के भीतर बसी गुलामी देखी
वोटों की ताकत के पीछे जाति-धर्म की खामी देखी

आशा प्रस्फुटित हुई मन में कटने वाला है विकट जाल
अब तक चाहे जो रहा हाल, कुछ अलग रहेगा नया साल

संप्रभु समाजवादी सेकुलर हो लोकतंत्र जनगण अपना
बलिदानी अमर शहीदों ने देखा था कुछ ऐसा सपना
बाबा साहब ने भेंट कर दिया देशप्रेम का धर्म ग्रंथ
हम रहे झगड़ते आपस में आधार बनाकर जाति पंथ

जनमानस बदल रहा अब जो लेगा इस दलदल से निकाल
अब तक चाहे जो रहा हाल, कुछ अलग रहेगा नया साल

भ्रष्टाचारी अपराधी जन अब राजनीति से दूर रहेंगे
जनता का हक खाने वाले जेलों में मजबूर रहेंगे
अब नहीं रहेंगी सरकारें बनकर जनता की माई-बाप
सच्‍चे त्यागी जनसेवक  की सेवा लेकर आ गये आप

रिश्वतखोरों को रंगे हाथ पकड़े जाने का बिछा जाल
अब तक चाहे जो रहा हाल, कुछ अलग रहेगा नया साल

बहू बेटियाँ घर की देहरी निर्भयता से पार करेंगी
अधिकारों से जागरूक समतामूलक व्यवहार करेंगी
शिक्षा के उजियारे से ही पिछड़ेपन का तिमिर मिटेगा
ज्ञान और विज्ञान बढ़ेगा नर-नारी का भेद घटेगा

चल रहा राष्ट्र निर्माण यज्ञ सब अपनी आहुति रहे डाल
अब तक चाहे जो रहा हाल, कुछ अलग रहेगा नया साल

मतदाता ने आंखे खोली अंतर्मन की सुनता बोली
अब इसे लुभा ना पाएगी झूठे वादों वाली झोली
गिर रहे पुराने मापदंड परिवारवाद है खंड-खंड
सत्ता लोलुप जो हार रहे तो टूट रहा उनका घमंड

सच्‍चे अच्छे जनसेवक को वोटर अब कर देगा निहाल
अब तक चाहे जो रहा हाल, कुछ अलग रहेगा नया साल

आप सबको नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी 
www.satyarthmitra.com 

सोमवार, 30 सितंबर 2013

चलो सितंबर सायोनारा…

सायोनारा सायोनारा, चलो सितंबर सायोनारा
अर्थनीति ने राजनीति का विकट नकाब उतारा
सायोनारा सायोनारा, चलो सितंबर सायोनारा…

चढ़ी जा रही प्याज अर्श पर, रुपया गिरता रहा फर्श पर
अर्थशास्त्र के बड़े धुरन्धर जमे रहे डालर विमर्श पर
डीजल और पेट्रोल ने मिलकर सबका पॉकेट मारा
सायोनारा सायोनारा, चलो सितंबर सायोनारा…

अब चुनाव की आहट होली, राजनीति में लगती बोली
कौड़ी में अब अन्न मिलेगा, वादों की खुल गयी झपोली
भ्रष्टतंत्र पर लोकतंत्र के प्रहरी करें प्रहार करारा
सायोनारा सायोनारा, चलो सितंबर सायोनारा…

पी.एम. इन वेटिंग बौराये, नेह निमंत्रण पर ना आये
नमो-नमो का गर्जन-तर्जन, सुनकर मनमोहन घबराये
जनसंघी सक्रियता से सेकुलर मोर्चा का चढ़ता पारा
सायोनारा सायोनारा, चलो सितंबर सायोनारा…

छेड़छाड़ ने पकड़ा तूल, शांति नष्ट हो गयी समूल
ढेर हुए कर्फ़्यू में तीस, नेता रहे निपोरे खींस
हुआ प्रशासन पंगु जिसे सेना ने दौड़ उबारा
सायोनारा सायोनारा, चलो सितंबर सायोनारा…

हिंदी दिवस मनाये बहुधा, फिर ब्‍लॉगर पहुँचे सब वर्धा
सोशल मीडिया की प्रभुताई, ब्‍लॉगिंग पर जमने ना पायी
हुई बहस घनघोर जिसे कुलपति ने खूब सँवारा
सायोनारा सायोनारा, चलो सितंबर सायोनारा…

सबसे बड़ी अदालत बोली, बाहर हो अब दागी टोली
पी.एम. अध्यादेश बनाये, महामहिम के पास पठाये
सहजादे की आँख खुल गयी, सेल्फ़-गोल दे मारा
सायोनारा सायोनारा, चलो सितंबर सायोनारा…

करे अदालत और कमाल, बैलट में दी NOTA डाल
अब वोटर कर लें संकल्प, अंतिम वाला चुने विकल्प
जाति-धर्म का खेल चुनावी हमको नहीं गँवारा
सायोनारा सायोनारा, चलो सितंबर सायोनारा…

अंतिम दिवस तुम्हारा आया, उनपर बनकर काली छाया
सत्रह साल न्याय की देर, फिर भी नहीं हुई अंधेर
गोबर बनकर निकल रहा जो छककर खाया चारा 
सायोनारा सायोनारा, चलो सितंबर सायोनारा…

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)     

सोमवार, 5 सितंबर 2011

सत्यकथा : अन्ना रे अन्ना…

 

उसे कभी किसी ने सराहा नहीं था। कभी मेहनत नहीं की थी उसने पढ़ाई में। न ही किसी दूसरे धन्धे में पसीना बहाया था। पिता ने कई जगह लगाना चाहा लेकिन कोई धन्धा कामयाब नहीं हो पाया। काम के प्रति निठल्लापन बार-बार बेरोजगार बना देता। बेरोजगारी का नतीजा - गरीबी। जीवन प्रायः अभावग्रस्त। लेकिन फक्कड़ हालात में भी उसे मौज करने के बहाने मिल ही जाते। संगीत का शौक था उसे। देवी जागरण के मंचों पर उसकी मांग थी। कुछ वाद्य यंत्र बजाना जानता था। भरती का कलाकार था। मुख्य गायक के आने से पहले खाली समय भरने के लिए उसे थोड़ी देर माइक पकड़ने को भी मिल जाता था। रेडियो स्टेशन में उसे लोकगीतों की रिकॉर्डिंग में गायकों  की संगत के लिए झाँझ बजाने का काम मिल जाया करता था। लेकिन वहाँ महीने दो महीने पर एकाध बार ही मौका मिलता।

सरकारी रेडियो के लिए वाद्य यंत्र बजाने वाले कैजुअल कलाकारों को अपनी बारी का बहुत इन्तजार करना पड़ता। इनकी संख्या बहुत अधिक थी और अवसर बहुत कम। मांग कम थी और आपूर्ति ज्यादा, इसलिए भाव गिरना तय था। एक रिकॉर्डिंग का सरकारी पारिश्रमिक था बाइस सौ रूपये, लेकिन अपनी बारी लगवाने के लिए उन्हें इसमें से कुछ कमीशन देना पड़ता। कमीशन देने की परंपरा काफी मजबूत हो चुकी थी। इतनी कि अब सबके लिए नियम बराबर ही था। चाहे जिसकी भी बारी आ जाये उसे पता होता था कि चेक लेने के लिए अपनी जेब में आठ सौ रूपये लेकर जाना होगा। फिर भी घंटे भर की रिकॉर्डिंग के लिए एक दिन का समय लगाकर चौदह सौ रुपये भी मिल जाय तो बुरा क्या है। बेकार ही तो बैठे रहते हैं। इसलिए यह डील स्थायी प्रकृति की हो चुकी थी।

अभी पिछले हफ्ते एक लोकगीत की रिकॉर्डिंग में शामिल होने का उसका नम्बर लगा। शाम को जब चेक लेने की बारी आयी तो कैशियर आदतन उसकी जेब की ओर देखने लगा। मामूल के मुताबिक उसे अपने चेक के लिए आठ सौ रूपये निकालने थे; लेकिन उसकी सुस्ती देखकर कैशियर ने टोका - जल्दी कर भैये, बहुत लोगों को चेक बाँटना है।

-जल्दी तो आपको करनी है भाई साहब, मैं तो कबका झाँझ बजाकर रिकॉर्डिंग पूरी करा चुका हूँ।

-मैंने भी तो कबका चेक तैयार कर लिया है। बस अब फटाफट निपटाओ।

-तो देते क्यों नहीं, देर किस बात की?

-अरे, देर तो तुम कर रहे हो… निकालो हमारा हक दस्तूर!

-यह क्या होता है?

-क्या मजाक कर रहे हो, तुम कोई नये आदमी तो हो नहीं… इतना भी नहीं जानते?

-ओहो…! माफ करिएगा… अब वो बात नहीं हो पाएगी!

-क्यों, चेक नहीं लेना है क्या?

-लेना क्यों नहीं है, लेकिन बिना रिश्वत दिए। हमने अन्ना हजारे से शपथ ली है।

-अन्ना हजारे से…?

-जी हाँ, अब मैं हक दस्तूर के नाम पर रिश्वत नहीं दे सकता।

-अच्छा ले भाई, जब तूने ऐसी शपथ ले ली है तो हम ही क्यों पापी बनें…! आज हम भी कमीशन नहीं लेंगे। ले जाओ भाइयों आज सबको चेक फ्री मिलेगा।

अन्ना रे अन्ना !!!

भक्त : हे भगवान, मेरा प्रोमोशन करवा देना। इक्यावन रुपया का भोग आपके चरणों में रख रहा हूँ।

भगवान : पागल मरवाएगा क्या? अन्ना देख रहा है…।

उपसंहार :  इस हृदय परिवर्तन की घटना के अगले ही दिन उसे एक विश्व बैंक परियोजना (सर्व शिक्षा अभियान) में कंप्यूटर चलाने की संविदा आधारित नौकरी मिल गयी। वह भी बिना कोई रिश्वत दिए।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)