हमारी कोशिश है एक ऐसी दुनिया में रचने बसने की जहाँ सत्य सबका साझा हो; और सभी इसकी अभिव्यक्ति में मित्रवत होकर सकारात्मक संसार की रचना करें।
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बुधवार, 17 जनवरी 2024

कब बदलेगा मौसम

मन की उथल-पुथल भारी

क्या जल्दी होगी कम

कब बदलेगा मौसम

क्या सर्द हवा से 

राजनीति की गर्मी होगी कम

कब बदलेगा मौसम

कहीं बढ़े उल्लास राम से

कहीं बढ़ रहा ग़म

कब बदलेगा मौसम

गारंटी है एक बांटता

दूजा फोड़े उसपर बम

कब बदलेगा मौसम

अब विपक्ष की प्रत्याशा

इंडिया सके ना जम

कब बदलेगा मौसम

जैसे जैसे यात्रा बढ़ती

जन-रुचि जाती थम

कब बदलेगा मौसम

अब युवराज अधेड़ हुए

क्यों राह अगोरें हम

कब बदलेगा मौसम

भानमती के कुनबे में

नीतीश न पाते रम

कब बदलेगा मौसम

आँखों के आगे अंधेरा

फिर छाए ना मातम

कब बदलेगा मौसम

एक उड़ाये जेट विमान

दूजा हाँके टमटम

कब बदलेगा मौसम

गंगाजल को यह पूजे

और वो आबे-जमजम

कब बदलेगा मौसम

सीएम रहे साल पंद्रह

फिर उतना ही पीएम ?

कब बदलेगा मौसम

मकर राशि में सूरज आकर

सर्दी करे खतम

अब बदलेगा मौसम

नेताजी का अब चुनाव

वोटर दिखलाये दम

अब बदलेगा मौसम

टीवी चैनल लहालोट

ऐंकर करते बमबम

अब बदलेगा मौसम 

मकर संक्रांति, 15 जनवरी 2024 :

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी

‘सत्यार्थमित्र’

 

 

 

 

 

 

मंगलवार, 6 जून 2023

अनछुए पहाड़ों की सुकून भरी सैर

आजकल छुट्टियाँ मनाने का सबसे लोकप्रिय ठिकाना पहाड़ों के बीच पसंद किया जा रहा है। मैदानी इलाकों की गर्मी से राहत पाने के लिए पर्यटक भारी संख्या में उत्तराखंड व हिमांचल के पहाड़ों की ओर रुख कर रहे हैं। मैं सहारनपुर में राज्य सरकार के आदेशानुसार विश्वविद्यालय व मेडिकल कॉलेज की नौकरी बजा रहा हूँ। यहाँ से देहरादून, मसूरी, ऋषिकेश, हरिद्वार, कोटद्वार, लैन्सडाउन आदि की दूरी बस इतनी ही है कि घर से नाश्ता करके निकलें तो वहाँ घूमघाम कर शाम तक वापस लौट आयें। लेकिन मेरे प्रकृतिप्रेमी मित्र प्रोफेसर संदीप का मानना है कि दूर देश से आने वाले पर्यटकों की भीड़ से इन स्थानों की रमणीयता व वातावरण की शुद्धता पर ग्रहण लग गया है। यहाँ की सड़कों पर लंबा ट्रैफिक जाम और होटलों व रेस्तराओं में ठसाठस भरी जनसंख्या देखकर पर्यावरणीय पर्यटन का आनंद नहीं रह जाता।

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देहरादून जिले में ही चकराता क्षेत्र की पहाड़ियों पर बाहरी पर्यटकों का दबाव अपेक्षाकृत नहीं के बराबर है। पिछले 01 जनवरी को संदीप जी ने मुझे चकराता से ऊपर की ओर करीब 15 किलोमीटर चक्कर कटाते हुए एक जमी हुई झील पर उतार दिया था। यह पूरी तरह निर्जन और लगभग गोपनीय स्थल था जहाँ कोई व्यावसायिक गतिविधि नहीं थी।

ऐसे में पिछले सप्ताहांत एडवेंचर टुरिज़म के शौकीन संदीप जी ने मुझे उसी पहाड़ी क्षेत्र की सैर करायी जिसे अभी तक पर्यटन व्यवसाय की नजर नहीं लगी है। पिछले सप्ताहांत मेरी बेटी भी दिल्ली से सहारनपुर आ गयी थी। उसने जब पहाड़ की सैर की इच्छा जताई तो हम प्रोफेसर संदीप के साथ विकासनगर होते हुए चकराता की ओर निकाल पड़े। लेकिन चकराता की मुख्य सड़क से अलग अचानक मुड़कर जब उन्होंने दूसरा पतला रास्ता चढ़ना शुरू किया तो हमारा रोमांच दिल की धड़कने बढ़ाने वाले एक डर में बदलना शुरू हो गया।

बायीं ओर ऊंचे पहाड़ और उनसे लटकते पेड़ों की लड़ी और दायीं ओर बहुत गहरी खाई के बीच रेंगती हुई सर्पीली सड़क पर कोई रेलिंग नहीं बनी थी। अनेक अंधे मोड़ और जगह-जगह गिरे हुए पहाड़ी मलबे को पार करते हुए हम लगातार ऊंचाई पर चढ़ते जा रहे थे। थोड़ी ही देर में हमें विश्वास हो गया कि गाड़ी की स्टेअरिंग ह्वील बहुत ही कुशल हाथों में है और डरने की बिल्कुल जरूरत नहीं है। आसपास की हरियाली और पहाड़ों में बिखरा प्राकृतिक सौन्दर्य हमें अपने जादुई आगोश में लेने लगा था। मनुष्य जाति के व्यावसायिक अतिक्रमण से बचा हुआ यह क्षेत्र वास्तव में नैसर्गिक सुख देने वाला है।

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एक से एक सुंदर पेड़ अपनी मस्ती में डूबे हुए मिले जिन्हें देश-दुनिया की जहरीली हवा ने नहीं छुआ है। इनके बीच घूमते-चरते इक्का-दुक्का चौपाये जानवर दिखे जिनका कद सामान्य से छोटा और डील-डौल बिल्कुल देसी। अंततः हम उतपालटा व परोडी नामक स्थानों के बीच एक मोड़ पर बने एक छज्जेदार चबूतरे पर जाकर रुके जो पहाड़ की चोटी से कुछ कदम ही नीचे था।

यहाँ से बैठकर हम देर तक निहारते रहे - ऊंचे-नीचे विशाल पहाड़ों की हरियाली, उनपर स्थानीय किसानों के हाथों बने सीढ़ीदार खेतों की दृश्यावली, आसमान में तैरते दूध जैसे सफेद बादलों की अठखेली, ठंडी हवा में झूमते चीड़, देवदार व अन्य असंख्य किस्म के पेड़ों व झाड़ियों की स्वर-लहरी। वहाँ लाल-बैगनी फूलों से लबरेज झाड़ियाँ थीं तो भजकटया के कटीले पौधों की कतार भी थी।

वहाँ से निकट ही लाल बॉर्डर वाले सफेद मकानों की एक कॉलोनी दिखाई दी जो शायद सेना का कोई छोटा सा परिसर था। हम टहलते हुए उसके पास तक गए लेकिन ज्यादा दरियाफ्त करना गैरजरूरी लगा तो लौट आए। उसी चबूतरे के पास इधर आने वाले हम जैसे घुमंतू लोग रुककर फोटो खिंचवाते हैं। हमने भी तस्वीरें लीं।

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इधर के स्थानीय घुमक्कड़ लोगों के लिए सस्ती सुविधा के रूप में खुली हुई एक गाड़ी सरपट दौड़ती मिली जिसमें खड़े होकर मुक्त आकाश में पहाड़ी हवाओं का आनंद लेते लड़के, लड़कियां, बच्चे, बूढ़े, औरतें और मर्द हँसते-खिलखिलाते चले जा रहे थे।

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इतना आह्लादकारी व सुरम्य वातावरण था कि हमें वहाँ से लौटने का मन ही नहीं कर रहा था लेकिन मजबूरी थी। अंततः शाम ढलने से पहले हमें वहाँ से निकलना पड़ा। रास्ते में हम बुगयाल की एक ऐसी पहाड़ी के पास रुके जिसके ऊपर चढ़कर दोनों ओर की खाई देखी जा सकती थी। वहाँ भी अजीब आकर्षण था।

संदीप जी से जब मैंने कहा कि यहाँ एक बहुत अच्छा पर्यटन केंद्र बन सकता है तो वे असहमत होते हुए जो बोले उसका आशय यह था कि प्रकृति के कुछ हिस्सों को मानव जाति की व्यावसायिक पहुँच से दूर ही रखना चाहिए। कुछ जगहें प्राचीन ऋषि मुनियों की तरह तपस्या करने व मूल प्रकृति के प्रेमियों के विचरण के लिए अक्षुण्ण रहनी चाहिए।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

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शनिवार, 17 सितंबर 2022

सहारनपुर डेटलाइन प्रारंभ

मित्रों, मुझे सहारनपुर में नई तैनाती के पद पर कार्यभार ग्रहण किए हुए तीन महीने हो गए। लेकिन इन तीन महीनों पर ही जैसे ग्रहण लगा हुआ था जो अब छँटता दिख रहा है। माँ शाकंभरी देवी के पवित्र तीर्थ क्षेत्र में उन्हीं के नाम से राज्य सरकार द्वारा नव-स्थापित विश्वविद्यालय में प्रथम अधिकारी के रूप में पहले कुलपति जी, फिर कुलसचिव व उसके बाद वित्त अधिकारी के रूप में मेरी तैनाती हुई है। हम तीन पूर्ण कालिक अधिकारियों के अतिरिक्त जो लोग भी इस विश्वविद्यालय के लिए काम कर रहे हैं वे सभी या तो उधार के हैं, या बेगार के हैं या किसी ठेकेदार के हैं। सभी इस उम्मीद में हैं कि जल्द ही यह ग्रहण कटेगा, उम्मीद की किरण फूटेगी और शिक्षा के प्रसार का यह सूरज चमकेगा। माननीय मुख्यमंत्री जी की विशेष अभिरुचि इस विश्वविद्यालय को एक भव्य और उत्कृष्ट अध्ययन केंद्र बनाने में है। बेहद प्राथमिकता के साथ इस विश्वविद्यालय कि प्रगति समीक्षा निरंतर की जा रही है और इसके निर्माण व विकास के कार्य को गति प्रदान करने का भरपूर प्रयास किया जा रहा है।

विश्वविद्यालय की सर्वोच्च नियामक संस्था है - इसकी कार्यपरिषद (Executive Council) और वित्तीय व्यवस्था संबंधी निर्णय लेती है - वित्त समिति (Finance Committee) जिसकी संस्तुतियों का अनुमोदन कार्यपरिषद करती है। लंबी प्रतीक्षा के बाद कार्य परिषद का गठन होते ही इसकी प्रथम बैठक का कार्यक्रम तय हुआ और गत 14 सितंबर 2022 को जब सबलोग अपने-अपने तरीके से हिन्दी-दिवस का जश्न मना रहे थे तब हम लोग कार्य-परिषद से विश्वविद्यालय के लिए बजट स्वीकृत करा रहे थे और दूसरे तमाम नीतिगत फैसलों पर मुहर लगवा रहे थे। इस बैठक के सम्पन्न होने के साथ ही अब महत्वपूर्ण निर्णयों को क्रियान्वित करने का समय आ गया है। विश्वविद्यालय के लिए कार्मिक प्रबंधन से लेकर सम्बद्ध महाविद्यालयों में प्रवेश प्रक्रिया का संचालन, और परीक्षा कराने के लिए ली गई उधारी और बेगारी का भुगतान करने का समय भी आ गया है। मतलब अब थोड़ा व्यस्त रहने का समय है।

मेरा निजी अनुभव है कि लेखन या कोई भी रचनात्मक कार्य बिल्कुल बेकारी के समय करने का मन ही नहीं होता है। मैं अगर किसी सार्थक काम के अभाव में खाली बैठा रहता हूँ तो कोई शौकिया काम भी करने का उत्साह नहीं रह जाता है। इस दौरान मैं अपने ब्लॉग पर तो प्रायः निष्क्रिय रहा ही चटपट स्टैटस वाला फेसबुक भी अपडेट करने में मुझे आलस्य घेरे रहा है। नियमित योगासन, प्राणायाम और ध्यान की अपनी ऑनलाइन कक्षा की झलकियां तथा साइकिल से सैर के रोचक अनुभव भी आपसे साझा करने में कोताही हुई है। इस नई जगह पर कितने ही नए अनुभव हुए जिसपर मजेदार पोस्ट लिखी जा सकती थी। लेकिन पता नहीं क्यों मेरा मन कुंजी-पटल से दूर ही रहा। माँ शाकंभरी की शक्ति-पीठ का प्रसिद्ध मंदिर वह प्रथम स्थान था जहां मैं ज्वाइन करने के बाद दर्शन के लिए गया था। उसकी झलक तो दिखानी ही थी। सहारनपुर में एक किराये का घर खोजने का अनुभव, घर मिल जाने के बाद उसमें गृहस्थी बसाने का अनुभव, भोजन बनाने वाला या वाली को ढूँढने और अपने मन-माफिक भोजन पाने-न पाने के संघर्ष का अनुभव, पास के सुरम्य मंदिर प्रांगण के हरे-भरे लॉन में नियमित योगाभ्यास व पैरामाउंट ट्यूलिप कॉलोनी की सड़कों व पार्कों में साइकिल चलाते हुए बारिश में भींगने का अनुभव। क्या कुछ नहीं था इस अञ्चल में पसरा हुआ मेरे लिए बिल्कुल तारों-ताजा! लेकिन पता नहीं क्यों खलिहर बैठे रहने का स्थायी भाव मेरे भीतर तक इतनी गहरी पैठ बना चुका था कि मैं उसी का रसास्वादन करने लगा था। निठल्लेपन का सुख कैसा होता है इसकी थोड़ी अनुभूति मुझे इस दौर में हुई है।

पिछली तैनाती प्रयागराज में हुई तो लगा था कि ब्लॉगरी की यात्रा जहां से शुरू हुई थी वहाँ पहुंचकर सबकुछ फिरसे लहलहा उठेगा लेकिन करोना प्रतिबंधों से बाहर निकलकर दुबारा सामान्य दिनचर्या बहाल करते हुए आप सबसे सक्रियता से जुडने की तैयारी हो ही रही थी कि सरकार ने मेरी पदोन्नति कर दी और एक नए घोषित विश्वविद्यालय को धरातल पर उतारे जाने की प्रक्रिया का वित्तीय पक्ष सम्हालने की चुनौती देकर मुझे अपने परिवार से बहुत दूर और पैतृक गाँव से सर्वाधिक संभव दूरी के स्थान पर भेज दिया। आज्ञा शिरोधार्य करनी ही थी।

अब जबकि इस नए शहर में अपनी गृहस्थी प्रायः जम गई है और विश्वविद्यालय भी अपना आकार लेने लगा है तब एक बार फिर कुंजी-पटल (keyboard) से यारी हो जाने का उत्साह हिलोरें ले रहा है। इस हरे-भरे इलाके में घुमक्कड़ी करने और उसे लिपिबद्ध करने की अपार संभावनाएं हैं। कुछ नए अनुभव हो रहे हैं जिन्हें आप तक पहुंचाने का मन है। कोशिश होगी यहाँ कुछ नियमित आने की और अन्तर्जाल पर पुराने मित्रों से दुबारा जुड़ने की। आशा है आप सबका साथ मिलता ही रहेगा।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

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शुक्रवार, 29 अप्रैल 2022

हरियाली और ऑक्सीजन का खजाना

आज #साइकिल_से_सैर करते हुए मैं एक बार फिर चंद्रशेखर आजाद पार्क की ओर चला गया था। लेकिन हर बार यहाँ वही टटकापन महसूस होता है। जो लोग रात में देर तक जागते हैं और सबेरे देर तक सोते हैं वे बहुत कुछ मिस करते हैं। प्रकृति द्वारा सुबह सुबह मुफ्त की अमृत-वर्षा की जाती है। इसमें जागरूक लोग नहाते हैं। भोर का धुंधलका छटते ही सभी पेड़-पौधे उजाले की ऊर्जा लेकर भरपूर ऑक्सीजन का उत्पादन शुरू कर देते हैं। पक्षियों की चहचहाहट इसी बात की घोषणा तो करती है।   

सूरज निकला चिड़ियाँ बोलीं, कलियों ने भी आँखें खोलीं।

आसमान में छाई लाली, हवा बही सुख देने वाली।

न्हीं-नन्हीं किरणें आईं, फूल हँसे कलियाँ मुस्काईं।।

 278569653_10226910368095282_1670074207435678447_nअल्फ्रेड पार्क के गेट पर पहुंचते ही महसूस होता है कि भीतर हरियाली और ताजगी का खजाना है जिसे लूटने के लिए तमाम स्त्री, पुरुष, बच्चे व बुजुर्ग जमा हो गए हैं। प्रकृति की व्यवस्था ऐसी है कि इन सबको शुद्ध हवा और विटामिन-डी के लिए कोई धक्का मुक्की नहीं करनी पड़ती। बस हाजिर होते ही प्रचुर मात्रा में यह सबको सुलभ हो जाता है।     

लेकिन यहाँ सड़क पर लगे ठेले-खोमचे पर अंकुरित अनाज का दोना, खीरा-ककड़ी- फल सलाद, बेल शरबत, बन-मक्खन, चाय या नारियल पानी के लिए जरूर नंबर लगाना पड़ता है। मुझे इसका प्रत्यक्ष अनुभव हुआ जब मैं एक ठेले पर जमा भीड़ के पास पहुँचा। यहाँ अंकुरित चने में मूली, टमाटर, चुकंदर, पुदीना, गाजर, आदि की कतरन तथा अनेक चटपटे मसाले व नमक मिलाकर बरगद के पत्ते पर परोसा जा रहा था। चम्मच के बजाय पत्ते का एक टुकड़ा ही इसका काम भी कर रहा था। उस दोने में नीबू के रस का उदारतापूर्वक प्रयोग विशेष आकर्षण का केंद्र था।

स्टील के दो बर्तनों में सामग्री तैयार करके उसे दोने में भरने के लिए दो लड़के लगातार हाथ चला रहे थे लेकिन ग्राहकों को कुछ प्रतीक्षा करनी ही पड़ रही थी। नोट पकड़े हाथ आगे बढ़े हुए परस्पर प्रतिस्पर्धा कर रहे थे। कुछ लोग मोबाइल से क्यूआर कोड स्कैन करके डिजिटल भुगतान करने के बाद मोबाइल की स्क्रीन ही दिखा रहे थे। कई लोग अपने घर वालों के लिए तीन-तीन, चार-चार दोने पैक भी करा रहे थे। इसमें मेरे जैसे एकल दोने के ग्राहकों को लंबे धैर्य का परिचय देना पड़ रहा था।

मैंने इस प्रतीक्षा काल में आसपास की कुछ तस्वीरें उतार लीं। बहुत मोहक वातावरण दिखा मुझे। जब गेट के बाहर इतना अच्छा माहौल था तो भीतर की हरियाली से भरी पगडंडियों और रंग-बिरंगी क्यारियों से सजे टहल-पथ के क्या कहने। अपनी साइकिल लेकर मैं अंदर जा नहीं सकता था इसलिए अंदर जाते लोगों को ही देखकर संतोष करना पड़ा। आप भी इनका दर्शन लाभ लीजिए। इसका भौतिक लाभ तो तभी मिलेगा जब सुबह-सबेरे बिस्तर का मोह त्याग कर स्वयं सदेह पधारेंगे।

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(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

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रविवार, 8 अक्टूबर 2017

जी.एस.टी. के भ्रष्टाचारी अवरोध

“साहब, यह काम हो ही नहीं पाएगा।” एक सप्ताह की प्रतीक्षा के बाद पधारे ठेकेदार ने कार्यालय में घुसते ही अपनी असमर्थता जाहिर कर दी।
अरे, आप जैसा होशियार और सक्षम ठेकेदार ऐसी बात कैसे कह सकता है? मैंने तो सुना है आप बहुत बड़े-बड़े ठेके लेकर सरकारी काम कराते रहते हैं। तमाम सरकारी बिल्डिंग्स और दूसरे निर्माण और साज-सज्जा के काम आपकी विशेषज्ञता मानी जाती है।
“वो बात ठीक है, लेकिन अब सरकारी काम करना बड़ा मुश्किल है। इस जी.एस.टी. ने सबकुछ बर्बाद कर दिया है। आप बिना रसीद मांगे कैश पेमेन्ट कर दीजिए तो एक दिन में ही आपका काम करा दूंगा। लेकिन आपको पक्की बिल चाहिए तो कोई तैयार नहीं होगा।” यह सुनकर मेरा सिर चकरा गया। यशवन्त सिन्हा ‘शल्य’ की बातें इसके बाद मीडिया में आयीं तो मेरे कान खड़े हो गये।
अब जी.एस.टी. पर मचे घमासान और छोटे दुकानदारों, व्यापारियों और ठेकेदारों की त्राहि-त्राहि देखकर मन चिन्तित हो गया है। बड़े उद्योगपति शायद ज्यादा परेशान नहीं हैं। उन्हें इस नयी व्यवस्था के साथ तालमेल बिठाने में शायद कोई बड़ी दिक्कत नहीं है। मैं कोई अर्थशास्त्री नहीं हूँ। मुझे इस योजना की बारीक बातों की अच्छी समझ नहीं है। इसलिए इसके पक्ष या विपक्ष में तनकर खड़ा होने के बजाय मैं धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करना चाहूंगा। इस बीच मैंने अपने कार्यालय में बैठकर जी.एस.टी. के प्रभाव का जो रोचक अनुभव किया है उसे साझा कर रहा हूँ।
हुआ ये कि नये शहर के नये कार्यालय में काम शुरू करने पर मुझे कुछ अवस्थापना सुविधाओं को अपने हिसाब से संशोधित परिवर्द्धित करने की आवश्यकता महसूस हुई। कंप्यूटर, इन्टरनेट, कुर्सी, टेबल-ग्लास, स्टेशनरी इत्यादि की व्यवस्था तो थोड़ी-बहुत जद्दोजहद से सुदृढ हो गयी लेकिन मेरे कार्यालय कक्ष से सटे हुए विश्राम-कक्ष को मन-माफ़िक बनाने में मुझे सफलता नहीं मिल रही है। दरअसल एक ही बड़े हाल में स्थित इस कक्ष को कार्यालय से अलग करने के लिए एल्यूमिनियम के ढांचे में काँच या फ़ाइवर की शीट लगाकर दीवार नुमा घेरा बनाया गया है जो अर्द्ध-पारदर्शी है। इस दीवार के जिस ओर प्रकाश अधिक रहता है वह दूसरी ओर से साफ़ दिखायी देता है। अधिक प्रकाशित हिस्से में बैठने वाला दूसरी ओर नहीं देख सकता जबकि उसे दूसरी ओर से देखा जा सकता है। इस प्रकार उत्पन्न असहज स्थिति से बचने के लिए पूरे घेरे पर कपड़े के पर्दे लटकाये गये हैं। लेकिन इन पर्दों पर धूल बहुत जल्दी-जल्दी जमा होती है जिसे साफ़ करते रहना बहुत टेढ़ा काम है। धूल से एलर्जी होने के कारण मुझे इनके संपर्क में आते ही लगातार छींकना पड़ जाता है और नाक से पानी आने लगता है।
धीरे-धीरे मेरे भीतर इन पर्दों के प्रति असहिष्णुता का भाव पैदा हो गया है। पर्दों के स्थान पर मैंने इस काँच की दीवार पर अपारदर्शी वाल-पेपर लगवाने का मन बनाया है लेकिन जी.एस.टी. की व्यवस्था ऐसा होने नहीं दे रही है। ठेकेदार कह रहा है कि कोई भी दुकानदार वाल-पेपर की बिक्री ‘एक-नम्बर’ में करने को तैयार नहीं है। अर्थात वह इस बिक्री को अपने लेखा-बही में प्रदर्शित नहीं करना चाहता क्योंकि इसके लिए जरूरी पंजीकरण कराने व ऑनलाइन टैक्स जमा करने की प्रक्रिया से वह जुड़ा ही नहीं है। उसके पास जो माल है वह भी बिना रसीद के ही खरीदा गया है। इसलिए उसे इसपर कोई इनपुट टैक्स-क्रेडिट नहीं मिलने वाला। उसने बताया कि इस प्रकार के बहुत से काम हैं जो पूरी तरह कैश लेन-देन पर ही चलते हैं जो अब जी.एस.टी. के बाद अवैध हो गये हैं। अब कोई ठेकेदार भी उन सामानों को नगद खरीदकर सप्लाई नहीं कर सकता क्योंकि वह अपने लेखे में इसकी खरीद दिखाये बिना इसकी बिक्री या आपूर्ति को जायज नहीं ठहरा सकता।
इस बात से मुझे व्यापारिक गतिविधियों में निचले स्तर पर होने वाली बड़े पैमाने की टैक्स-चोरी की एक झलक दिखायी दे गयी जिसपर लगाम लगाने का ठोस उपाय शायद इस जी.एस.टी. में ढूँढ लिया गया लगता है। यह उपाय कुछ वैसा ही है जैसा नोटबन्दी और डिजिटल लेन-देन के माध्यम से कालेधन पर लगाम लगाने का उपाय किया गया था और जिसे अब प्रायः असफ़ल मान लिया गया है। जिनके पास अघोषित आय का नगद धन मौजूद था वे इसे बचाने के लिए किसी न किसी प्रकार इसे अपने या दूसरों के बैंक खातों में जमा कराने में सफ़ल हो गये। नोटबन्दी के राजमार्ग के किनारे जो चालू खाते, पेट्रोल-पम्प, विद्युत-देय, अन्य शुल्क-टैक्स आदि जमा करने के काउन्टर और दो लाख की सीमा वाली छूट के सर्विस-लेन बना दिये गये थे उसपर जोरदार ट्रैफ़िक चल पड़ी और अधिकांश कालाधन बैंकों में जाकर मुख्यधारा में शामिल हुआ और सफ़ेद हो गया। ऐसे बिरले ही मूर्ख और गये-गुजरे धनपशु होंगे जो अपना पुराना नगद नोट बदलकर नया नहीं कर पाये होंगे। नोटबन्दी की आलोचना करने वाले भी यह नहीं कह पा रहे थे कि इसने आयकर की चोरी पर लगाम लगाकर अच्छा नहीं किया।

साभार : http://news24online.com/know-why-implementing-gst-is-still-a-long-road-ahead-2/

ऐसे में यह निष्कर्ष निकलता है कि भ्रष्टाचार मिटाने और शुचिता बढ़ाने की अच्छी से अच्छी योजना भी क्रियान्वयन के स्तर पर जाकर उसी भ्रष्टाचार और बेईमानी की भेंट चढ़ जाती है जिसे यह रोकने चली थी। उल्टे उसमें छोटे व गरीब वर्ग का जीवन-यापन बुरी तरह प्रभावित हो जाता है। दिहाड़ी मजदूर या कामगार तो दिन में जो कमाता है वही रात में खाता है। यदि किसी दिन उसका काम रुक गया तो शाम को फ़ांके की नौबत आ जाती है। यही हाल छोटे व्यापारियों और दुकानदारों का जी.एस.टी. के लागू होने के बाद हो गया लगता है। वे साफ़-साफ़ यह तो कह नहीं सकते कि अबतक उनका धन्धा टैक्स की चोरी के कारण चोखा हुआ करता था जो चोरी अब मुश्किल हो गयी है, लेकिन नयी व्यवस्था से उपजे दर्द को वे दूसरे तरीकों से व्यक्त तो कर ही रहे हैं।
हमारे समाज में भ्रष्टाचार का रोग इतना सर्वव्यापी हो गया है कि इसे बुरी चीज बताने वाले भी अवसर मिलते ही इसका अवगाहन करने में तनिक देर नहीं लगाते। जबतक हम केवल दूसरों से ईमानदारी और सत्यनिष्ठा की अपेक्षा करते रहेंगे और स्वयं मनसा-वाचा-कर्मणा इसके लाभ उठाने को उद्यत रहेंगे तबतक हम किसी नोटबन्दी, जी.एस.टी. या अन्य कड़े उपायों से भी अपेक्षित फ़ल की प्राप्ति नहीं कर सकते।
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

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मंगलवार, 29 अगस्त 2017

इन्दिरानगर में बारिश के बीच साइकिल से सैर

शहरीकरण की प्रक्रिया तेज होने का मुख्य कारण विकसित शहरों में उपलब्ध वे अवसर और सुविधाएं हैं जो जीवन की गुणवत्ता बढ़ाने और उन्हें बनाये रखने के लिए आवश्यक हैं। जीविकोपार्जन के लिए जरूरी रोजगार मिलने के अतिरिक्त बच्‍चों के लिए अच्छे शिक्षण व प्रशिक्षण संस्थान, बड़े-बुजुर्गों की देखभाल के लिए बेहतर अस्पताल व स्वास्थ्य सुविधाएं, घर-परिवार के उपभोग की वस्तुओं के लिए बड़े बाजार, मॉल, रेस्टोरेंट व मनोरंजन के लिए क्लब, मल्टीप्लेक्स व थीम-पार्क इत्यादि भी शहरों में ही हैं। सबका साथ सबका विकास के नारे के बावजूद ये सुविधाएं ग्रामीण क्षेत्रों में नहीं के बराबर मिलती हैं। यहाँ तक कि ग्रामीण क्षेत्र में पैदा होने वाली हरी सब्जी, फल व दूध इत्यादि भी अच्छी कीमत की तलाश में शहरों की ओर ही चले आते हैं। 
इस शहरी जीवन की मांग को पूरा करने के लिए सरकार की ओर से आवास विकास परिषद व बड़े शहरों में विकास प्राधिकरण लगातार नयी कालोनियां बसा रहे हैं और इन कालोनियों में अनेक अवस्थापना सुविधाएं भी बढ़ा रहे हैं। निजी क्षेत्र में भी 'रियल एस्टेट' का धंधा खूब फल-फूल रहा है।
लखनऊ में इंदिरानगर आवासीय कॉलोनी बहुत पहले बसायी गयी थी। इसमें प्रायः सभी आय वर्ग के लोगों के लिए अलग-अलग स्तर के आवासीय प्लॉट हैं, उपभोक्ता बाजार हैं, मंदिर-मस्जिद हैं, स्कूल-कॉलेज़ हैं, गोल चौराहे हैं, फल और सब्जी की मंडियाँ हैं और छोटे-बड़े अनेक पार्क हैं जिसमें खूब हरियाली है। मुंशी पुलिया चौराहा पहले लखनऊ शहर के बाहर से जाने वाले फैज़ाबाद-सीतापुर बाईपास (रिंग रोड) पर स्थित था लेकिन कालांतर में इस कॉलोनी के वृहद विस्तार के बाद यह इंदिरानगर के लगभग बीचोबीच में आ गया है जिसके चारों ओर घनी बसावट है। यह कॉलोनी इतनी पुरानी तो हो ही गयी है कि इसमें प्लॉट लेकर घर बनाने वाले अधिकांश लोग सेवानिवृत्त हो चुके हैं और उनकी अगली पीढ़ी जवान होकर गृहस्थी की कमान सम्हाल रही है। 
जो नये लोग इंदिरानगर में बसने आ रहे हैं वे या तो किसी अपार्टमेंट में आ रहे हैं या कॉलोनी के सीमावर्ती क्षेत्रों में निजी क्षेत्र द्वारा विकसित आवासीय कॉलोनियों में आ रहे हैं। मैंने मुंशी पुलिया से सात-आठ किलोमीटर पूरब व उत्तर दिशा में विकसित होने वाली नयी कॉलोनियों के साइन बोर्ड पर उनका पता मुंशीपुलिया इंदिरानगर के नाम पर लिखा हुआ देखा है। लखनऊ मेट्रो की रेलपटरी का पूर्वी सिरा मुंशीपुलिया चौराहे के पास बन रहे स्टेशन पर समाप्त होगा। मेट्रो स्टेशन के नाम पर यहाँ से आठ-दस किलोमीटर दूर तक की जमीनें महंगी हो गयी हैं। लेकिन शहरीकरण की आकर्षक सुविधाओं की कीमत चुकाने को लोग तैयार हो रहे हैं।
आवास विकास परिषद द्वारा मुंशीपुलिया चौराहे के पूरब अरविंदो पार्क व पश्चिम तरफ स्वर्णजयंती पार्क विकसित किये गये हैं जो खूब हरे-भरे व सुसज्जित हैं। सुबह-शाम टहलने वाले बुजुर्गों और उम्रदराज औरतों व आदमियों की अच्छी संख्या दिखती है तो दिन में किशोर व नयी उम्र के लड़के-लड़कियाँ व प्रेमी युगल यहाँ की शोभा बढ़ाते हैं। अरविंदो पार्क में भारतीय योग संस्थान के बैनर तले निःशुल्क योग शिविर का आयोजन होता है। सुबह पांच बजे ही योग के आचार्य और निष्ठावान साधक अपना आसन जमा लेते हैं। हरी मुलायम घास पर सबसे नीचे प्लास्टिक शीट, उसके ऊपर हल्की दरी और उसके ऊपर सफेद चादर डालकर आसन बनता है। इस आसन पर बैठकर, खड़े होकर और लेटकर साधक स्त्री-पुरुष योगासन, प्राणायाम और ध्यान का अभ्यास कुशल व प्रशिक्षित आचार्यों के दिशानिर्देशन में करते हैं। 
मैं जब भी लखनऊ में सुबह आँखें खोलता हूँ तो इस योग कार्यक्रम में सम्मिलित होने का प्रयास करता हूँ। बाकी दिनों में जहाँ भी रहता हूँ अपने कमरे में 'शिक्षक संहिता' नामक पुस्तिका की सहायता से यहाँ सीखे हुए सारे अभ्यास करने की कोशिश करता हूँ। लेकिन सामूहिक रूप से किये जाने वाले योगासन-प्राणायाम-ध्यान का आनंद ही कुछ और है।
इस सप्ताहांत सुबह पाँच बजे तैयार होकर ऍपार्टमेन्ट से बाहर निकला तो हल्की बूंदा-बांदी हो रही थी। मैंने आसन की सामग्री वाला बैग साइकिल के कैरियर पर इस प्रकार दबाया कि प्लास्टिक शीट वाला हिस्सा सबसे ऊपर रहे और मोबाइल, पर्स और पुस्तक वाला सबसे नीचे ताकि बारिश की बूंदों से कोई नुकसान न हो। आज मेरे मन में यह जानने की उत्सुकता थी कि इस खराब मौसम में ये साधक अपने कार्यक्रम कैसे करते होंगे।
घर से चलकर मैं पार्क के प्रवेश द्वार पर आया। जब मैं साइकिल खड़ी कर रहा था तो हल्की बूँदें मेरे प्रयास पर प्रश्नचिह्न लगाती जा रही थीं। वहाँ टिकट काउंटर में सिर छिपाये बैठा संतरी बाहर निकल आया। उसने मुझे ऐसे देखा जैसे पूछ रहा हो - अजीब अहमक आदमी हो, इस बारिश में कैसे आ गये इधर? मैंने उसके इस भाव को थोड़ी और हवा देते हुए पूछ लिया - वो योगासन वाले कोई आये हैं क्या? उसने घड़ी देखा जिसमें सवा पांच बजे रहे होंगे, फिर एक तरह की मौज लेते हुए बोला- अंदर जाकर देख लीजिए।
मैंने साइकिल में ताला लगाकर बैग कंधे से लटकाया और अंदर जाकर टहलने के लिए बनी लाल पत्थरों वाली पगडंडी पर तेज कदमों से चलने लगा। भीतर कुछ जिद्दी टाइप बुजुर्ग टहलबाज छाता लगाकर टहलते मिले। लेकिन उस स्थान पर कोई नहीं मिला जहाँ योग की कक्षा चलती है। वहाँ आसनों के नीचे दबी रहने वाली हरी दूब की पत्तियाँ आज तन कर खड़ी हो गयी थीं बारिश की जो गोल-गोल बूँदें उनके ऊपर की छोर पर पड़ती तो वे एक ओर झुक जाती फिर बूंदें धीरे-धीरे नीचे की ओर सरकती जाती और पत्तियां शनैः शनैः पूर्वावस्था में खड़ी हो जातींइस प्रकार लगभग अर्द्ध चंद्रासन की मुद्रा बनाती और फिर सीधी हो जाती पत्तियों पर योग-कक्षा का पूरा प्रभाव दिख रहा था।
पार्क के टहल-पथ पर एक चक्‍कर लगाने के बाद मैं बाहर आ गया। बौछारें अब तेज़ हो गयी थीं। घर लौटते-लौटते मैं भीग ही जाता। इसलिए बारिश में दिल खोलकर भींग लेने का विचार उछल पड़ा। मैंने बैग को फिर से उल्टा करके कैरियर में दबा दिया। सबसे नीचे वाली जेब में मोबाइल व बटुआ, उसके ऊपर पुस्तिका, उसके ऊपर तह की हुई चादर, फिर दरी और सबसे ऊपर प्लास्टिक शीट की पच्चीस परतें। मैं आश्वस्त था कि बैग में जरूरी सामान सुरक्षित रहेगा। मैंने साइकिल को घर के रास्ते से उल्टी दिशा में बढ़ा दिया। सेक्टर-11 की ओर जाने वाली चौड़ी सड़क बिल्कुल खाली थी। बिजली के खंभों पर पीले प्रकाश वाले हेलोजन बल्ब जल रहे थे जिनकी रोशनी गीली सड़क से परावर्तित हो रही थी। सड़क पर गिरती बूंदों से उठते छींटे इस पीले प्रकाश के साथ मिलकर अद्भुत छटा बिखेर रहे थे। जैसे केसर की घाटी में मोती उछल रहे हों।
तभी सामने से एक औरत पुराने पड़ चुके एक छेदहे छाते में अपना सिर ढके चली आ रही थी। उसके पीछे एक मरियल कुत्ता भी टांगों में पूंछ घुसाये हुए, सिर ऊपर-नीचे करता चला आ रहा था। निश्चित ही उधर कोई गरीब बस्ती होगी जहाँ से निकलकर यह कामवाली अमीरों के घर झाड़ू-पोछा-बर्तन या कपड़े धोने का काम करने जा रही होगी। रात भर का भूखा कुत्ता भी इन घरों से निकलने वाले सुबह के कूड़े से अपना पेट भरने की फिराक़ में ही निकला होगा, वर्ना मुँह-अंधेरे बारिश के मौसम में कौन अपनी नींद में खलल डालना चाहेगा।
दोनो तरफ सीधी लाइन में खड़े पक्‍के मकानों के भीतर की मद्धिम रोशनी और सड़क पर पसरे सन्नाटे से तो यही पता चल रहा था कि अधिकांश लोग या तो सो रहे हैं या जागकर भी बिस्तर पर लेटे हुए बारिश की बूंदों की टप-टप और रिमझिम का संगीत सुन रहे हैं। मैं तो अपनी नयी-नवेली बिल्कुल शांत साइकिल पर चलता हुआ न सिर्फ बारिश का संगीत सुन रहा था बल्कि आसमान से गिरती बूंदों का नृत्य भी देख रहा था। मेरे चेहरे को गुदगुदाती-सहलाती बूंदें, पेड़ों की कोमल पत्तियों से चिपककर आलिंगन करती बूंदें, बिजली के पोल से सरककर नीचे आती बूँदें, क्‍की सड़क के तारकोल को चमकाती बूंदें, संगमरमर लगी मुंडेर पर गिरकर दूर तक छिटकती बूंदे और टिन की छत पर गिरकर समूह में इकठ्ठा हो नीचे गिरती धाराप्रवाह बूंदें। इन सबका नृत्य अलग-अलग था। कुछ बूंदे मिट्टी, गोबर या कींचड़ में गिरकर तिरोहित हो जाती तो कुछ सौभाग्यशाली ऐसी भी थीं जो फूलों के बीचोबीच जाकर उनकी सुगन्ध के बीच धन्य हो जाती। मेरा मन कुछ तस्वीरें लेने को ललच रहा था लेकिन बारिश इतनी तेज थी कि मोबाइल को बाहर निकालना सुरक्षित नहीं जान पड़ा।
चौड़ी सड़क के अंतिम छोर पर पहुँचकर मैं आगे की पतली सड़क पर मुड़ कर बसावट के भीतर चला गया। आगे निम्न व दुर्बल आय वर्ग वाले मकान थे। बहुत कम जमीन में बने इन घरों के दोनो किनारों की दीवारें पड़ोसी के घर से बिल्कुल चिपकी हुई होती हैं। बीस-पच्‍चीस साल पहले बने इन अधिकांश मकानों के आगे अब मारुति-ऍल्टो-आईटेन या नैनो जैसे चार पहिया वाहन खड़े हो गये हैं। लेकिन नके लिए छत वाली पार्किंग की जगह नहीं है। निश्चित रूप से यहाँ की दीवारों पर आर्थिक विकास की कहानी लिखी हुई दिख रही थी। एक गली से दूसरी गली में होता हुआ मैं वापसी का रास्ता तलाशने लगा। तभी एक गली अचानक समाप्त हो गयी जिसके आगे खाली जमीन थी। जमीन में गोबर और पानी के मिश्रण से बना कीचड़ और उसमें पगुराती खड़ी भैसों को बारिश का आनंद लेते देखकर मैं वापस मुड़ गया। एक दूसरी गली से तीसरी गली में होता हुआ मैं आगे बढ़ता गया तो अचानक डिवाइडर वाली चौड़ी सड़क पर निकल आया। एक बोर्ड से पता चला कि यह अमर शहीद कैप्टन मुकेश श्रीवास्तव मार्ग है।
यहाँ से मुझे घर वापस लौटने का रास्ता पता था। सेक्टर-17 में आकर मुझे एक ऐसा स्थान मिल ही गया जहाँ खड़े होकर अपनी साइकिल की सेल्फी ले सकता था। वहीं एक परचून की दुकान की टिन की छत से बरसाती धारा गिर रही थी। आसपास कोई बच्‍चा होता तो वह इसके नीचे खड़ा होकर जरूर नहाने का मजा लेता। लेकिन बच्‍चे अभी बिस्तर में होंगे। बहुत सबेर थी अभी। स्ट्रीट-लैंप की पीली रोशनी दिन के उजाले पर अभी भी भारी थी। अब आप तस्वीरें देखिए और मुझे इजाजत दीजिए। मैं घर पहुँचकर अपने कपड़े बदलता हूँ। ज्यादा देर तक भींगा रह गया तो... सुना है शहर में स्वाइन-फ्लू अपने पाँव पसार रहा है।
सेक्टर-16 इन्दिरानगर की डूबी सड़क

बैग मे सुरक्षित योगासन सामग्री के साथ नहाती साइकिल

हम भी अगर बच्चे होते तो पीछे टिन की छत से गिरती जलधारा का मजा लेते 

बारिश के पानी से सराबोर हमारी बालकनी से दिखती सड़क

साइकिल जब नयी-नयी आयी थी तब मौसम बहुत अच्छा था।
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
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बुधवार, 9 अगस्त 2017

बच्चों की बड़ी बातें


डैडी - बेटा, कबतक सोते रहोगे? उठो, आठ बजने वाले हैं...
बेटा - जगा तो हूँ डैडी...!
डैडी - ऐसे जगने का क्या फ़ायदा? बिस्तर पर आँख मूँदे पड़े हुए हो।
मम्मी - देखिए, साहबजादे एक आँख खोलकर मुस्कराये और फ़िर करवट बदलकर सो गये।
डैडी - हाँ जी देखो न, इन दोनों की आदत बिगड़ गयी है। छुट्टी के दिन दोनो पड़े रहते हैं।
मम्मी - कम से कम उठकर ब्रश कर लेते और दूध ही पी लेते... कब से गिलास का दूध बनाकर टेबल पर रख आयी हूँ।
डैडी - आज तो राखी भी है न!
मम्मी – तो क्या, दोनो जानते हैं कि मूहूर्त ग्यारह बजे के बाद का है।
डैडी - अच्छा, तो अभी बेटी भी सो रही है ?
मम्मी - हाँ और क्या,  ... लेकिन वो रात को देरतक पढ़ रही थी।
डैडी - यह भी कोई अच्छी बात नहीं है। सोने का और जागने का समय फ़िक्स्ड होना चाहिए। अगले दिन छुट्टी हो या पढ़ाई, कोई फ़र्क नहीं पड़ना चाहिए। ये लोग तो हर दिन अलग प्लान लेकर चलते हैं। ...सब तुम्हारे लाड़-प्यार ने बिगाड़ा है...!
मम्मी – लीजिए, तो अब आप शुरू हो गये...!
डैडी – शुरू क्या हो गये, मैंने भी पढ़ाई की है। लेकिन इस तरह अनिश्चित दिनचर्या कभी नहीं रही मेरी। सुबह सोकर उठने, नहाने-धोने और पढ़ने का समय हमेशा एक ही रहा।
मम्मी – तो सिखा क्यों नहीं देते...? किसने रोका है...!
डैडी – मेरी बातें सुनें तब न..! मुझे तो समझ में नहीं आता कि ‘मेरे’ बच्‍चे इतने आलसी कैसे हो गये। मैं तो कभी भी ऐसा अनऑर्गनाइज्ड नहीं रहा। दिशाहीन, अनफ़ोकस्ड...
मम्मी - बेटा, सुन रहे हो न...? ठीक है मेरी बेइज्जती करा लो!
बेटा - (लेटे हुए ही) अरे डैडी, वो मैथ्स में पढ़े हो न... माइनस माइनस मिलकर प्लस होता है। दीदी और हम दोनो माइनस हैं तभी तो तुम प्लस हो।
डैडी – क्या मतलब ?
बेटा – अरे डैडी, इतनी सिम्पल बात नहीं समझे...। हम दोनो आलसी हैं क्योंकि तुम नहीं हो... J
मम्मी – देखिए, दूसरी आलसी भी आ गयी। अब दोनो को समझाइए..!
डैडी – समझाऊँ क्या, पता नहीं इन सबों को क्या मिलता है यूँ ही पड़े रहने में...!
बेटी – डैडी, तुम नहीं जानते? ओह, कैसे बताऊँ कि क्या मिलता है...? बस ये समझ लो कि ‘पड़े रहना’ एक कला है। इट्स‍ प्योर आर्ट।
डैडी – वाह, क्या बात है बेटी, शाबास...! क्या खासियत है इस कला की?
बेटी – यह बहुत कठिन है डैडी। पूरी तरह थॉटलेस होना पड़ता है। कुछ भी अगर दिमाग में चल रहा है तो वह ‘पड़े रहना’ नहीं होता। कुछ करने के बारे में सोचना तो दूर की बात है, अगर इतना सा भी सोच रहे हैं कि खाली दिमाग पड़े हुए हैं तो इस कला में कमी रह जाएगी। इसमें कुछ भी नहीं सोचना होता है। सोचने के बारे में भी नहीं और न सोचने के बारे में भी नहीं। बहुत बड़ी तपस्या है यह... जो इसमें एक्सपर्ट हो जाय वही इसका आनन्द महसूस कर सकता है।
मम्मी – सुन लिए न...! बताइए, आप तो फिलॉस्फी पढ़े हैं। कहीं सुने थे ऐसी ‘कला’ के बारे में...?
बेटा – अरे मम्मी, डैडी को चैलेन्ज मत करो... जरूर जानते होंगे यह सब।
डैडी - सारी चिन्ता से मुक्त होना तो संभव है लेकिन चिन्तन से मुक्त होना तो सही में परम सिद्ध योगी ही कर सकते हैं। महर्षि पतन्जलि के अष्टांगिक योगमार्ग में एक चरण ऐसा आता है।
बेटा – अच्छा डैडी, अब उसे छोड़ो। यह बताओ कि तुम अपने हाथ से कपड़ा क्यों प्रेस कर रहे हो? धोबी को क्यों नहीं दे देते?
डैडी – मुझे यह काम आसान लगता है। बचपन से आदत है। खाली बैठने से अच्छा है इस स्किल का फ़ायदा उठा लिया जाय।
बेटी – लेकिन कपड़ा जलने का डर भी तो रहता है। मम्मी अपनी साड़ी जला चुकी हैं। अभी देखो, वहाँ की चादर लाल हो गयी है। JJ
डैडी – अच्छा, क्या गारन्टी है कि धोबी अच्छा प्रेस कर ही दे? किसी से भी जल सकता है। सबको उतनी ही सावधानी बरतनी पड़ती है।
बेटा – अच्छा डैडी, ये बताओ अगर धोबी तुम्हारा कोई नया कपड़ा जला दे तो क्या करोगे?
डैडी – क्या कर सकता हूँ? अपना ही माथा ठोंक लूंगा। वह बेचारा तो वैसे ही घबरा जाएगा। कोई जानबूझकर तो जलाएगा नहीं। ऐसे में उसे कुछ भी भला-बुरा कहने से कोई फ़ायदा नहीं होगा। हाँ उसे यह बताया जा सकता है कि आगे से उसे प्रेस के लिए कपड़ा नहीं मिलेगा।
बेटा – हाँ, ताकि वह आगे से लापरवाही नहीं करेगा। ...लेकिन मन में तो उसके खिलाफ़ खूब खराब वाली फ़ीलिंग आयेगी न...?
बेटी – ऑफ़कोर्स आयेगी...! कोई उसकी आरती थोड़े ही न उतारेगा। लेकिन... यू हैव टु कन्ट्रोल योर फ़ीलिंग्स मेनी टाइम्स...!
बेटा – हाँ, सही है। मन के भीतर जैसी-जैसी फ़ीलिंग्स पैदा होती हैं अगर सबको बाहर कर दिया जाय तो यह दुनिया ढह जाएगी। अपनी टीचर, क्लास टीचर, बस ड्राइवर, कोच, सीनियर भैया लोग, दीदी लोग, बगल वाले अंकल-आन्टी. काम वाली दीदी, गार्ड अंकल...
डैडी – बाहर वाले ही क्यों, घर के भीतर भी तो बताओ...! मम्मी, डैडी, दीदी, बाबाजी, दादी जी, ताई-ताऊ, आदि-आदि...
बेटी – अब रहने दो डैडी, यह सोचना भी ठीक नहीं है। पड़े रहने दो...

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बुधवार, 29 जून 2016

साइकिल के साथ तैराकी का लुत्फ़

रायबरेली के नेहरू स्टेडियम में स्विमिंग पूल चालू हुआ तो मैंने अपनी साइकिल से सैर का कार्यक्रम इस तरण-ताल से जोड़ दिया। पिछले महीने भर से मेरी रायबरेली में सुबह की चर्या प्रायः एक जैसी हो गयी है। अब साइकिल से इधर-उधर घूमने के बजाय मैं तैराकी की तैयारी से निकलता हूँ, जेलरोड से चलकर स्टेडियम तक साइकिल से जाता हूँ। रास्ते में रोज ही वही चेहरे दिखायी देते हैं। बुजुर्ग और प्रौढ़ टहलते हुए, सड़क किनारे बने झोंपड़ों की औरतें घर के सामने झाड़ू-बुहारू और बर्तन मांजते हुए, घोषियों के बाड़े में गायों और भैंसों की सेवा में लगी लड़कियाँ और औरतें गोबर निकालती हुई और पुरुष दूध दुहते हुए, अपने डिब्बों के साथ कुछ लोग दूध नपवाने की प्रतीक्षा करते हुए और चाय की दुकान वाले भठ्ठी में कोयला भरते और आग सुलगाते हुए मिलते हैं।
सड़क की पटरी पर कुछ छोटी झोपड़ियां ऐसी भी हैं जिनके बाहर पड़ी खटिया पर कुछ बच्चे-बच्चियां और मर्द गहरी नींद में सोये मिलते हैं जैसे रात में गर्मी और ऊमस ने सोने न दिया हो और भोर की ठंडी हवा मिलने के बाद चैन की नींद आयी हो। खटिया के पास ही घर की औरत जमीन पर बैठकर सब्जी काटती या खाना बनाने की तैयारी करती दिख जाती है। एक दो तांगे भी मुंह ऊपर किए खड़े नज़र आते हैं जिनमें जुतने वाले घोड़े या घोड़ियां छुट्टा घूमते और जेल के सामने वाली खाली जमीन में घास चरते दिख जाते हैं। इन्हीं झोपड़ियों के सामने कुछ ठेले भी खड़े मिलते हैं जिनपर चमकदार सजावट और रंगीन बोतलें देखकर लगता है कि ये शहर के अलग अलग नुक्कड़ों पर रंगीन बर्फ़ वाला पानी, शर्बत और दूसरी चीजें बेचने के लिए जाते होंगे।
पेट्रोल पंप से आगे बढ़ने पर साई के स्पोर्ट्स हॉस्टल के प्रांगण में बने चबूतरे पर कुछ बुजुर्ग योग और प्राणायाम करते दिख जाते हैं तो स्टेडियम के गेट से लडके-लड़कियाँ, औरतें और मर्द अपने-अपने स्वास्थ्य की जरूरतों व पसंद के हिसाब से दौड़ने, टहलने, गप्पें लड़ाने, टाइम पास करने, हवा खाने या क्रिकेट, बैडमिंटन, वॉलीबॉल, फुटबॉल, हॉकी आदि खेलने के लिए आते या वापस जाते मिल जाते हैं। मैं अपनी साइकिल लेकर जब भी गेट के भीतर घुसता हूँ तो बैडमिंटन कोर्ट के सामने कोई न कोई साथी मिल जाता है। 
मुस्कान और अभिवादन के बाद सीधे स्विमिंग पूल के चैनेल गेट की और बढ़ जाता हूँ- रोज यह सोचता हुआ कि स्टेडियम के भीतर की यह सड़क जो अब गढ्ढों में बिखरे कंकड़-पत्थर के ढेर में तब्दील हो चुकी है वह कब किसी विकास योजना की कृपा प्राप्त करेगी। इस सड़क की दोनो तरफ अशोक के पेड़ जो बत्तीस साल पहले यहाँ के चौकीदार/चपरासी/माली रामनरेश ने लगाये थे वे बढ़कर आसमान से बातें करने लगे हैं, लेकिन सड़क का निरंतर ह्रास होता गया है। प्रकृति की देखभाल पाकर पेड़ों ने तो आसमान छू लिया लेकिन मनुष्य के भरोसे रहने वाली सड़क उसका भार ही ढोती रही और दुर्दशा से ग्रस्त हो गयी।

तरण ताल का निर्धारित समय साढ़े-पाँच से साढ़े-छः का है लेकिन मैं पन्द्रह-बीस मिनट देर से ही पहुँचता हूँ। वहाँ पहले से शुरू कर चुके ढेर सारे किशोरों और बड़ी उम्र के शौकिया तैराकों के बीच डाइव लगाकर पहुँचता हूँ और हरे पानी से भरे ताल में तैरने का अभ्यास करता हूँ। कोच की सीटी बजने के बाद सभी बाहर निकलते हैं। सबसे अंत में मैं निकलता हूँ ताकि बाथरूम में धक्का-मुक्की से बचा रहूँ।
आज-कल मानसून की पहली बारिश के बाद मौसम सुहाना लगने लगा है। धूल, गर्मी और पसीने से राहत मिल गयी है और घर से बाहर निकलना अच्छा लग रहा है। आज जब हमलोग तैर रहे थे तो आसमान में अचानक काले बादलों का एक पहाड़ ऊपर से गुजरा। लगभग अँधेरा छा गया। कुछ बच्चे तो चिल्ला-चिल्लाकर कहने लगे- कोच अंकल, लाइट जलवा दीजिए। लेकिन दो-तीन मिनट में ही हवा ने बादलों को परे धकेल दिया और रोशनी बढ़ गयी। एक बच्चे का जन्मदिन भी मनाया जा रहा था। बेचारे को पूल में सभी तंग कर रहे थे। फिर फोटुएं भी खींची गयीं।

आज जब मैं तैराकी के बाद बाथरूम में घुसा तो अगले बैच के बच्चे तैराकी के लिए जमा हो चुके थे। कोच द्वारा उनसे तैराकी के पहले कुछ वार्मअप एक्सरसाइज करायी जा रही थी। लेकिन दो तीन बच्चे बाथरूम एरिया में छिपे हुए कानाफूसी कर रहे थे। उनका आशय यह था कि अभी कसरत से बचा रहा जाय और जब पानी में उतरने की बारी आये तब बाहर निकला जाय। मैं यह हरकत भी प्रायः रोज देखता रहा हूँ। आज मैंने कोच को बता दिया। कोच ने उन बच्चों को डांटा और पूल का चक्कर तो लगवाया ही, मुझे बताया कि उनमें से एक के पापा यह शिकायत भी कर रहे थे कि दो महीने से तैरने के बावजूद उसका वजन क्यों नहीं घट रहा है।
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी) www.satyarthmitra.com