मन की उथल-पुथल भारी
क्या जल्दी होगी कम
कब बदलेगा मौसम
क्या सर्द हवा से
राजनीति की गर्मी होगी कम
कब बदलेगा मौसम
कहीं बढ़े उल्लास राम से
कहीं बढ़ रहा ग़म
कब बदलेगा मौसम
गारंटी है एक बांटता
दूजा फोड़े उसपर बम
कब बदलेगा मौसम
अब विपक्ष की प्रत्याशा
इंडिया सके ना जम
कब बदलेगा मौसम
जैसे जैसे यात्रा बढ़ती
जन-रुचि जाती थम
कब बदलेगा मौसम
अब युवराज अधेड़ हुए
क्यों राह अगोरें हम
कब बदलेगा मौसम
भानमती के कुनबे में
नीतीश न पाते रम
कब बदलेगा मौसम
आँखों के आगे अंधेरा
फिर छाए ना मातम
कब बदलेगा मौसम
एक उड़ाये जेट विमान
दूजा हाँके टमटम
कब बदलेगा मौसम
गंगाजल को यह पूजे
और वो आबे-जमजम
कब बदलेगा मौसम
सीएम रहे साल पंद्रह
फिर उतना ही पीएम ?
कब बदलेगा मौसम
मकर राशि में सूरज आकर
सर्दी करे खतम
अब बदलेगा मौसम
नेताजी का अब चुनाव
वोटर दिखलाये दम
अब बदलेगा मौसम
टीवी चैनल लहालोट
ऐंकर करते बमबम
अब बदलेगा मौसम
मकर संक्रांति, 15 जनवरी 2024 :
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
‘सत्यार्थमित्र’
बुधवार, 17 जनवरी 2024
कब बदलेगा मौसम
मंगलवार, 6 जून 2023
अनछुए पहाड़ों की सुकून भरी सैर
आजकल छुट्टियाँ मनाने का सबसे लोकप्रिय ठिकाना पहाड़ों के बीच पसंद किया जा रहा है। मैदानी इलाकों की गर्मी से राहत पाने के लिए पर्यटक भारी संख्या में उत्तराखंड व हिमांचल के पहाड़ों की ओर रुख कर रहे हैं। मैं सहारनपुर में राज्य सरकार के आदेशानुसार विश्वविद्यालय व मेडिकल कॉलेज की नौकरी बजा रहा हूँ। यहाँ से देहरादून, मसूरी, ऋषिकेश, हरिद्वार, कोटद्वार, लैन्सडाउन आदि की दूरी बस इतनी ही है कि घर से नाश्ता करके निकलें तो वहाँ घूमघाम कर शाम तक वापस लौट आयें। लेकिन मेरे प्रकृतिप्रेमी मित्र प्रोफेसर संदीप का मानना है कि दूर देश से आने वाले पर्यटकों की भीड़ से इन स्थानों की रमणीयता व वातावरण की शुद्धता पर ग्रहण लग गया है। यहाँ की सड़कों पर लंबा ट्रैफिक जाम और होटलों व रेस्तराओं में ठसाठस भरी जनसंख्या देखकर पर्यावरणीय पर्यटन का आनंद नहीं रह जाता।
![]() | ![]() |
![]() | ![]() |
देहरादून जिले में ही चकराता क्षेत्र की पहाड़ियों पर बाहरी पर्यटकों का दबाव अपेक्षाकृत नहीं के बराबर है। पिछले 01 जनवरी को संदीप जी ने मुझे चकराता से ऊपर की ओर करीब 15 किलोमीटर चक्कर कटाते हुए एक जमी हुई झील पर उतार दिया था। यह पूरी तरह निर्जन और लगभग गोपनीय स्थल था जहाँ कोई व्यावसायिक गतिविधि नहीं थी।
ऐसे में पिछले सप्ताहांत एडवेंचर टुरिज़म के शौकीन संदीप जी ने मुझे उसी पहाड़ी क्षेत्र की सैर करायी जिसे अभी तक पर्यटन व्यवसाय की नजर नहीं लगी है। पिछले सप्ताहांत मेरी बेटी भी दिल्ली से सहारनपुर आ गयी थी। उसने जब पहाड़ की सैर की इच्छा जताई तो हम प्रोफेसर संदीप के साथ विकासनगर होते हुए चकराता की ओर निकाल पड़े। लेकिन चकराता की मुख्य सड़क से अलग अचानक मुड़कर जब उन्होंने दूसरा पतला रास्ता चढ़ना शुरू किया तो हमारा रोमांच दिल की धड़कने बढ़ाने वाले एक डर में बदलना शुरू हो गया।
बायीं ओर ऊंचे पहाड़ और उनसे लटकते पेड़ों की लड़ी और दायीं ओर बहुत गहरी खाई के बीच रेंगती हुई सर्पीली सड़क पर कोई रेलिंग नहीं बनी थी। अनेक अंधे मोड़ और जगह-जगह गिरे हुए पहाड़ी मलबे को पार करते हुए हम लगातार ऊंचाई पर चढ़ते जा रहे थे। थोड़ी ही देर में हमें विश्वास हो गया कि गाड़ी की स्टेअरिंग ह्वील बहुत ही कुशल हाथों में है और डरने की बिल्कुल जरूरत नहीं है। आसपास की हरियाली और पहाड़ों में बिखरा प्राकृतिक सौन्दर्य हमें अपने जादुई आगोश में लेने लगा था। मनुष्य जाति के व्यावसायिक अतिक्रमण से बचा हुआ यह क्षेत्र वास्तव में नैसर्गिक सुख देने वाला है।

एक से एक सुंदर पेड़ अपनी मस्ती में डूबे हुए मिले जिन्हें देश-दुनिया की जहरीली हवा ने नहीं छुआ है। इनके बीच घूमते-चरते इक्का-दुक्का चौपाये जानवर दिखे जिनका कद सामान्य से छोटा और डील-डौल बिल्कुल देसी। अंततः हम उतपालटा व परोडी नामक स्थानों के बीच एक मोड़ पर बने एक छज्जेदार चबूतरे पर जाकर रुके जो पहाड़ की चोटी से कुछ कदम ही नीचे था।
यहाँ से बैठकर हम देर तक निहारते रहे - ऊंचे-नीचे विशाल पहाड़ों की हरियाली, उनपर स्थानीय किसानों के हाथों बने सीढ़ीदार खेतों की दृश्यावली, आसमान में तैरते दूध जैसे सफेद बादलों की अठखेली, ठंडी हवा में झूमते चीड़, देवदार व अन्य असंख्य किस्म के पेड़ों व झाड़ियों की स्वर-लहरी। वहाँ लाल-बैगनी फूलों से लबरेज झाड़ियाँ थीं तो भजकटया के कटीले पौधों की कतार भी थी।
वहाँ से निकट ही लाल बॉर्डर वाले सफेद मकानों की एक कॉलोनी दिखाई दी जो शायद सेना का कोई छोटा सा परिसर था। हम टहलते हुए उसके पास तक गए लेकिन ज्यादा दरियाफ्त करना गैरजरूरी लगा तो लौट आए। उसी चबूतरे के पास इधर आने वाले हम जैसे घुमंतू लोग रुककर फोटो खिंचवाते हैं। हमने भी तस्वीरें लीं।


इधर के स्थानीय घुमक्कड़ लोगों के लिए सस्ती सुविधा के रूप में खुली हुई एक गाड़ी सरपट दौड़ती मिली जिसमें खड़े होकर मुक्त आकाश में पहाड़ी हवाओं का आनंद लेते लड़के, लड़कियां, बच्चे, बूढ़े, औरतें और मर्द हँसते-खिलखिलाते चले जा रहे थे।
![]() | ![]() |
इतना आह्लादकारी व सुरम्य वातावरण था कि हमें वहाँ से लौटने का मन ही नहीं कर रहा था लेकिन मजबूरी थी। अंततः शाम ढलने से पहले हमें वहाँ से निकलना पड़ा। रास्ते में हम बुगयाल की एक ऐसी पहाड़ी के पास रुके जिसके ऊपर चढ़कर दोनों ओर की खाई देखी जा सकती थी। वहाँ भी अजीब आकर्षण था।
संदीप जी से जब मैंने कहा कि यहाँ एक बहुत अच्छा पर्यटन केंद्र बन सकता है तो वे असहमत होते हुए जो बोले उसका आशय यह था कि प्रकृति के कुछ हिस्सों को मानव जाति की व्यावसायिक पहुँच से दूर ही रखना चाहिए। कुछ जगहें प्राचीन ऋषि मुनियों की तरह तपस्या करने व मूल प्रकृति के प्रेमियों के विचरण के लिए अक्षुण्ण रहनी चाहिए।
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
शनिवार, 17 सितंबर 2022
सहारनपुर डेटलाइन प्रारंभ
मित्रों, मुझे सहारनपुर में नई तैनाती के पद पर कार्यभार ग्रहण किए हुए तीन महीने हो गए। लेकिन इन तीन महीनों पर ही जैसे ग्रहण लगा हुआ था जो अब छँटता दिख रहा है। माँ शाकंभरी देवी के पवित्र तीर्थ क्षेत्र में उन्हीं के नाम से राज्य सरकार द्वारा नव-स्थापित विश्वविद्यालय में प्रथम अधिकारी के रूप में पहले कुलपति जी, फिर कुलसचिव व उसके बाद वित्त अधिकारी के रूप में मेरी तैनाती हुई है। हम तीन पूर्ण कालिक अधिकारियों के अतिरिक्त जो लोग भी इस विश्वविद्यालय के लिए काम कर रहे हैं वे सभी या तो उधार के हैं, या बेगार के हैं या किसी ठेकेदार के हैं। सभी इस उम्मीद में हैं कि जल्द ही यह ग्रहण कटेगा, उम्मीद की किरण फूटेगी और शिक्षा के प्रसार का यह सूरज चमकेगा। माननीय मुख्यमंत्री जी की विशेष अभिरुचि इस विश्वविद्यालय को एक भव्य और उत्कृष्ट अध्ययन केंद्र बनाने में है। बेहद प्राथमिकता के साथ इस विश्वविद्यालय कि प्रगति समीक्षा निरंतर की जा रही है और इसके निर्माण व विकास के कार्य को गति प्रदान करने का भरपूर प्रयास किया जा रहा है।
विश्वविद्यालय की सर्वोच्च नियामक संस्था है - इसकी कार्यपरिषद (Executive Council) और वित्तीय व्यवस्था संबंधी निर्णय लेती है - वित्त समिति (Finance Committee) जिसकी संस्तुतियों का अनुमोदन कार्यपरिषद करती है। लंबी प्रतीक्षा के बाद कार्य परिषद का गठन होते ही इसकी प्रथम बैठक का कार्यक्रम तय हुआ और गत 14 सितंबर 2022 को जब सबलोग अपने-अपने तरीके से हिन्दी-दिवस का जश्न मना रहे थे तब हम लोग कार्य-परिषद से विश्वविद्यालय के लिए बजट स्वीकृत करा रहे थे और दूसरे तमाम नीतिगत फैसलों पर मुहर लगवा रहे थे। इस बैठक के सम्पन्न होने के साथ ही अब महत्वपूर्ण निर्णयों को क्रियान्वित करने का समय आ गया है। विश्वविद्यालय के लिए कार्मिक प्रबंधन से लेकर सम्बद्ध महाविद्यालयों में प्रवेश प्रक्रिया का संचालन, और परीक्षा कराने के लिए ली गई उधारी और बेगारी का भुगतान करने का समय भी आ गया है। मतलब अब थोड़ा व्यस्त रहने का समय है।
मेरा निजी अनुभव है कि लेखन या कोई भी रचनात्मक कार्य बिल्कुल बेकारी के समय करने का मन ही नहीं होता है। मैं अगर किसी सार्थक काम के अभाव में खाली बैठा रहता हूँ तो कोई शौकिया काम भी करने का उत्साह नहीं रह जाता है। इस दौरान मैं अपने ब्लॉग पर तो प्रायः निष्क्रिय रहा ही चटपट स्टैटस वाला फेसबुक भी अपडेट करने में मुझे आलस्य घेरे रहा है। नियमित योगासन, प्राणायाम और ध्यान की अपनी ऑनलाइन कक्षा की झलकियां तथा साइकिल से सैर के रोचक अनुभव भी आपसे साझा करने में कोताही हुई है। इस नई जगह पर कितने ही नए अनुभव हुए जिसपर मजेदार पोस्ट लिखी जा सकती थी। लेकिन पता नहीं क्यों मेरा मन कुंजी-पटल से दूर ही रहा। माँ शाकंभरी की शक्ति-पीठ का प्रसिद्ध मंदिर वह प्रथम स्थान था जहां मैं ज्वाइन करने के बाद दर्शन के लिए गया था। उसकी झलक तो दिखानी ही थी। सहारनपुर में एक किराये का घर खोजने का अनुभव, घर मिल जाने के बाद उसमें गृहस्थी बसाने का अनुभव, भोजन बनाने वाला या वाली को ढूँढने और अपने मन-माफिक भोजन पाने-न पाने के संघर्ष का अनुभव, पास के सुरम्य मंदिर प्रांगण के हरे-भरे लॉन में नियमित योगाभ्यास व पैरामाउंट ट्यूलिप कॉलोनी की सड़कों व पार्कों में साइकिल चलाते हुए बारिश में भींगने का अनुभव। क्या कुछ नहीं था इस अञ्चल में पसरा हुआ मेरे लिए बिल्कुल तारों-ताजा! लेकिन पता नहीं क्यों खलिहर बैठे रहने का स्थायी भाव मेरे भीतर तक इतनी गहरी पैठ बना चुका था कि मैं उसी का रसास्वादन करने लगा था। निठल्लेपन का सुख कैसा होता है इसकी थोड़ी अनुभूति मुझे इस दौर में हुई है।
पिछली तैनाती प्रयागराज में हुई तो लगा था कि ब्लॉगरी की यात्रा जहां से शुरू हुई थी वहाँ पहुंचकर सबकुछ फिरसे लहलहा उठेगा लेकिन करोना प्रतिबंधों से बाहर निकलकर दुबारा सामान्य दिनचर्या बहाल करते हुए आप सबसे सक्रियता से जुडने की तैयारी हो ही रही थी कि सरकार ने मेरी पदोन्नति कर दी और एक नए घोषित विश्वविद्यालय को धरातल पर उतारे जाने की प्रक्रिया का वित्तीय पक्ष सम्हालने की चुनौती देकर मुझे अपने परिवार से बहुत दूर और पैतृक गाँव से सर्वाधिक संभव दूरी के स्थान पर भेज दिया। आज्ञा शिरोधार्य करनी ही थी।
अब जबकि इस नए शहर में अपनी गृहस्थी प्रायः जम गई है और विश्वविद्यालय भी अपना आकार लेने लगा है तब एक बार फिर कुंजी-पटल (keyboard) से यारी हो जाने का उत्साह हिलोरें ले रहा है। इस हरे-भरे इलाके में घुमक्कड़ी करने और उसे लिपिबद्ध करने की अपार संभावनाएं हैं। कुछ नए अनुभव हो रहे हैं जिन्हें आप तक पहुंचाने का मन है। कोशिश होगी यहाँ कुछ नियमित आने की और अन्तर्जाल पर पुराने मित्रों से दुबारा जुड़ने की। आशा है आप सबका साथ मिलता ही रहेगा।
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
शुक्रवार, 29 अप्रैल 2022
हरियाली और ऑक्सीजन का खजाना
आज #साइकिल_से_सैर करते हुए मैं एक बार फिर चंद्रशेखर आजाद पार्क की ओर चला गया था। लेकिन हर बार यहाँ वही टटकापन महसूस होता है। जो लोग रात में देर तक जागते हैं और सबेरे देर तक सोते हैं वे बहुत कुछ मिस करते हैं। प्रकृति द्वारा सुबह सुबह मुफ्त की अमृत-वर्षा की जाती है। इसमें जागरूक लोग नहाते हैं। भोर का धुंधलका छटते ही सभी पेड़-पौधे उजाले की ऊर्जा लेकर भरपूर ऑक्सीजन का उत्पादन शुरू कर देते हैं। पक्षियों की चहचहाहट इसी बात की घोषणा तो करती है।
सूरज निकला चिड़ियाँ बोलीं, कलियों ने भी आँखें खोलीं।
आसमान में छाई लाली, हवा बही सुख देने वाली।
नन्हीं-नन्हीं किरणें आईं, फूल हँसे कलियाँ मुस्काईं।।
अल्फ्रेड पार्क के गेट पर पहुंचते ही महसूस होता है कि भीतर हरियाली और ताजगी का खजाना है जिसे लूटने के लिए तमाम स्त्री, पुरुष, बच्चे व बुजुर्ग जमा हो गए हैं। प्रकृति की व्यवस्था ऐसी है कि इन सबको शुद्ध हवा और विटामिन-डी के लिए कोई धक्का मुक्की नहीं करनी पड़ती। बस हाजिर होते ही प्रचुर मात्रा में यह सबको सुलभ हो जाता है।
लेकिन यहाँ सड़क पर लगे ठेले-खोमचे पर अंकुरित अनाज का दोना, खीरा-ककड़ी- फल सलाद, बेल शरबत, बन-मक्खन, चाय या नारियल पानी के लिए जरूर नंबर लगाना पड़ता है। मुझे इसका प्रत्यक्ष अनुभव हुआ जब मैं एक ठेले पर जमा भीड़ के पास पहुँचा। यहाँ अंकुरित चने में मूली, टमाटर, चुकंदर, पुदीना, गाजर, आदि की कतरन तथा अनेक चटपटे मसाले व नमक मिलाकर बरगद के पत्ते पर परोसा जा रहा था। चम्मच के बजाय पत्ते का एक टुकड़ा ही इसका काम भी कर रहा था। उस दोने में नीबू के रस का उदारतापूर्वक प्रयोग विशेष आकर्षण का केंद्र था।
स्टील के दो बर्तनों में सामग्री तैयार करके उसे दोने में भरने के लिए दो लड़के लगातार हाथ चला रहे थे लेकिन ग्राहकों को कुछ प्रतीक्षा करनी ही पड़ रही थी। नोट पकड़े हाथ आगे बढ़े हुए परस्पर प्रतिस्पर्धा कर रहे थे। कुछ लोग मोबाइल से क्यूआर कोड स्कैन करके डिजिटल भुगतान करने के बाद मोबाइल की स्क्रीन ही दिखा रहे थे। कई लोग अपने घर वालों के लिए तीन-तीन, चार-चार दोने पैक भी करा रहे थे। इसमें मेरे जैसे एकल दोने के ग्राहकों को लंबे धैर्य का परिचय देना पड़ रहा था।
मैंने इस प्रतीक्षा काल में आसपास की कुछ तस्वीरें उतार लीं। बहुत मोहक वातावरण दिखा मुझे। जब गेट के बाहर इतना अच्छा माहौल था तो भीतर की हरियाली से भरी पगडंडियों और रंग-बिरंगी क्यारियों से सजे टहल-पथ के क्या कहने। अपनी साइकिल लेकर मैं अंदर जा नहीं सकता था इसलिए अंदर जाते लोगों को ही देखकर संतोष करना पड़ा। आप भी इनका दर्शन लाभ लीजिए। इसका भौतिक लाभ तो तभी मिलेगा जब सुबह-सबेरे बिस्तर का मोह त्याग कर स्वयं सदेह पधारेंगे। ![]()
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
रविवार, 8 अक्टूबर 2017
जी.एस.टी. के भ्रष्टाचारी अवरोध
![]() |
| साभार : http://news24online.com/know-why-implementing-gst-is-still-a-long-road-ahead-2/ |
मंगलवार, 29 अगस्त 2017
इन्दिरानगर में बारिश के बीच साइकिल से सैर
![]() |
| सेक्टर-16 इन्दिरानगर की डूबी सड़क |
![]() |
| बैग मे सुरक्षित योगासन सामग्री के साथ नहाती साइकिल |
![]() |
| हम भी अगर बच्चे होते तो पीछे टिन की छत से गिरती जलधारा का मजा लेते |
![]() |
| बारिश के पानी से सराबोर हमारी बालकनी से दिखती सड़क |
![]() |
| साइकिल जब नयी-नयी आयी थी तब मौसम बहुत अच्छा था। |
www.satyarthmitra.com
बुधवार, 9 अगस्त 2017
बच्चों की बड़ी बातें
बुधवार, 29 जून 2016
साइकिल के साथ तैराकी का लुत्फ़
रायबरेली के नेहरू स्टेडियम में स्विमिंग पूल चालू हुआ तो मैंने अपनी साइकिल से सैर का कार्यक्रम इस तरण-ताल से जोड़ दिया। पिछले महीने भर से मेरी रायबरेली में सुबह की चर्या प्रायः एक जैसी हो गयी है। अब साइकिल से इधर-उधर घूमने के बजाय मैं तैराकी की तैयारी से निकलता हूँ, जेलरोड से चलकर स्टेडियम तक साइकिल से जाता हूँ। रास्ते में रोज ही वही चेहरे दिखायी देते हैं। बुजुर्ग और प्रौढ़ टहलते हुए, सड़क किनारे बने झोंपड़ों की औरतें घर के सामने झाड़ू-बुहारू और बर्तन मांजते हुए, घोषियों के बाड़े में गायों और भैंसों की सेवा में लगी लड़कियाँ और औरतें गोबर निकालती हुई और पुरुष दूध दुहते हुए, अपने डिब्बों के साथ कुछ लोग दूध नपवाने की प्रतीक्षा करते हुए और चाय की दुकान वाले भठ्ठी में कोयला भरते और आग सुलगाते हुए मिलते हैं।
मुस्कान और अभिवादन के बाद सीधे स्विमिंग पूल के चैनेल गेट की और बढ़ जाता हूँ- रोज यह सोचता हुआ कि स्टेडियम के भीतर की यह सड़क जो अब गढ्ढों में बिखरे कंकड़-पत्थर के ढेर में तब्दील हो चुकी है वह कब किसी विकास योजना की कृपा प्राप्त करेगी। इस सड़क की दोनो तरफ अशोक के पेड़ जो बत्तीस साल पहले यहाँ के चौकीदार/चपरासी/माली रामनरेश ने लगाये थे वे बढ़कर आसमान से बातें करने लगे हैं, लेकिन सड़क का निरंतर ह्रास होता गया है। प्रकृति की देखभाल पाकर पेड़ों ने तो आसमान छू लिया लेकिन मनुष्य के भरोसे रहने वाली सड़क उसका भार ही ढोती रही और दुर्दशा से ग्रस्त हो गयी।
तरण ताल का निर्धारित समय साढ़े-पाँच से साढ़े-छः का है लेकिन मैं पन्द्रह-बीस मिनट देर से ही पहुँचता हूँ। वहाँ पहले से शुरू कर चुके ढेर सारे किशोरों और बड़ी उम्र के शौकिया तैराकों के बीच डाइव लगाकर पहुँचता हूँ और हरे पानी से भरे ताल में तैरने का अभ्यास करता हूँ। कोच की सीटी बजने के बाद सभी बाहर निकलते हैं। सबसे अंत में मैं निकलता हूँ ताकि बाथरूम में धक्का-मुक्की से बचा रहूँ।















