हमारी कोशिश है एक ऐसी दुनिया में रचने बसने की जहाँ सत्य सबका साझा हो; और सभी इसकी अभिव्यक्ति में मित्रवत होकर सकारात्मक संसार की रचना करें।
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मंगलवार, 22 सितंबर 2015

आने वाले धन को रोकती हैं आपकी ये ‘बुरी आदतें’

टाइम्स ऑफ़ इंडिया में आध्यात्मिक और धार्मिक संदर्भों पर रोचक आलेख प्रकाशित करने वाला नियमित स्तंभ स्पीकिंग ट्री अब ऑनलाइन उपलब्ध है और इसका हिंदी संस्करण भी आ गया है, जिसमें अनेक बार ज्योतिष और शास्त्र के नाम पर अंधविश्वास और टोना-टोटका वाली सामग्री भी दिख जाती है। ऐसे में इनपर आँख मूँदकर विश्वास नहीं किया जा सकता। लेकिन आज एक सामग्री ऐसी मिली जिसके मूल संदेश पर अमल किया जाना चाहिए। भले ही बताये गये परिणाम पर भरोसा न हो। वैसे ही जैसे कि शराब के नशे में धुत्त कोई व्यक्ति यह सीख दे कि शराब पीना अच्छी बात नहीं है, इसके जीवन बर्बाद होता है, परिवार नष्ट हो जाता है, तमाम बीमारियाँ शरीर में घर बना लेती हैं, आदि-आदि; तो उसे यह झिड़की दे्ने के बजाय कि पहले अपना उपदेश खुद पर लागू करो, उसकी बात को प्रत्यक्ष उदाहरण के आधार पर सही माना जा सकता है। आइए जानते हैं कुछ जीवनोपयोगी बाते-

(स्पीकिंग ट्री से साभार)

यदि आप शास्त्रों में विश्वास रखते हैं तो वाकई शास्त्रों में वर्णित निर्देशों का पालन करते होंगे। लेकिन क्या आप जानते हैं कि यदि आप हर समय, हर दिन शास्त्रीय नियमों का पालन करेंगे, तो लाइफ इतनी आसान हो जाएगी कि आप समझ भी नहीं पाएंगे। लेकिन यदि आपको विश्वास नहीं भी है, तब भी आप एक बार शास्त्रीय नियमों का पालन करके देखें, अच्छे परिणाम आप खुद महसूस करने लगेंगे।

शास्त्रों के अनुसार, शास्त्रीय नियमों का पालन करने वाले लोग भी अनजान होकर दिनभर ऐसी कई गलतियां करते हैं, जो उन्हें नहीं करनी चाहिए। ऐसी आदतें मनुष्य को अशुभ फल देती हैं, और उसके आने वाले समय पर हावी भी होती हैं। शास्त्रों के अनुसार हमें सुबह उठने के बाद रात सोने तक ऐसी किसी भी बुरी आदत को अपनाना नहीं चाहिए, जो हमारे लिए अशुभ फल लाए।

जैसे कि कुछ लोगों की आदत होती है कि सुबह नहाने के बाद बाथरूम को गंदा छोड़ने की। ऐसे लोग फर्श पर गिरे पानी को साफ करना तो दूर, अपने गंदे कपड़े भी बाथरूम में छोड़कर बाहर चले आते हैं। शास्त्रों के अनुसार ऐसा करने से जातक की कुंडली में चंद्र का स्थान बुरा होता चला जाता है। इसलिए इससे बचने के लिए हमेशा अपने बाथरूम की सफाई करें।

बाथरूम वाली बुरी आदत के साथ लोगों की एक और आदत भी बहुत बुरी है, खाने के बाद जूठी प्लेट वहीं छोड़ जाने की। कुछ लोग तो खाना प्लेट में ही छोड़ भी देते हैं। लेकिन शास्त्रों की मानें तो प्लेट में रखा एक-एक अन्न ग्रहण करना चाहिए और साथ ही स्वयं प्लेट लेकर उसे साफ करना चाहिए। ऐसी मान्यता है कि खाना खाने के बाद जूठे बर्तनों को सही स्थान पर रखा जाए तो शनि और चंद्र के दोष दूर होते हैं। साथ ही, लक्ष्मी की प्रसन्नता भी मिलती है। तो आज से आप ध्यान रखेंगे ना इस बात का?

इसके अलावा घर की साफ-सफाई का भी ध्यान रखना जरूरी है। शास्त्रों के मुताबिक कहीं भी चप्पलें उतार देना और बिस्तर की चद्दर को अव्यवस्थित रखना एक बुरी आदत है। इसके कारण व्यक्ति की सेहत खराब रहती है। इसलिए हमेशा बिस्तर को साफ रखें, उसकी चद्दर समय-समय पर झाड़ लें। खासतौर पर रात को सोने से पहले जरूर साफ करें।

शास्त्रों के अनुसार देर रात तक जागना भी नियमों के विरुद्ध है। इससे चंद्र का अशुभ फल मिलता है, जो व्यक्ति की मानसिक स्थिति पर भी गलत प्रभाव करता है। इसलिए हमेशा समय से सो जाएं और सुबह समय से उठ भी जाना चाहिए।

एक और नियम, जो ना केवल शास्त्रीय संदर्भ से मानना चाहिए, बल्कि अपने आसपास सुखद वातावरण बनाने के लिए भी इस नियम का पालन करना महत्वपूर्ण है। हमें कभी ऊंची आवाज़ में बात नहीं करनी चाहिए। इससे हमारे आसपास के लोग तो परेशान होते ही हैं, साथ ही हमारी सेहत पर भी इसका असर होता है।

ऊंचा बोलने के अलावा कुछ लोगों की बेवजह इधर-उधर थूकने की भी आदत होती है। यदि आप ऐसा करते हैं तो लक्ष्मी जी कभी आप पर कृपा नहीं करेंगी। इसीलिए इधर-उधर थूकने से बचना चाहिए, इस काम के लिए निर्धारित स्थान का ही उपयोग करना चाहिए।

[उक्त छोटी-छोटी बातों का पालन करना एक सभ्य और संस्कारित व्यक्ति की पहचान होते हैं। इसलिए शास्त्र के नाम पर बिदकने वाले भी इसका पालन कर सकते हैं।]

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
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शनिवार, 13 सितंबर 2014

बचपन के मीत का गीत…

आज मेरे बचपन के दोस्त संजय कुमार त्रिपाठी का जन्मदिन है। हम आठवीं से दसवीं कक्षा तक एक साथ पढ़े। उन तीन सालों में शायद ही कोई ऐसा दिन रहा हो जब कक्षा में हम एक साथ न बैठे हों। उस ग्रामीण विद्यालय में पढ़ने के लिए मैं अपने घर से दूर एक ‘क्‍वार्टर’ में रहता था जो वहाँ के इलाके में एक प्रतिष्ठित व्यक्ति के घर के बाहरी बरामदे का छोटा सा कमरा था। संजय अपने मामाजी के घर रहते थे जो बगल के गाँव में था। स्कूल के बाहर भी हम लोगों की पढ़ाई प्रायः एक दूसरे के संपर्क में रहते हुए ही होती थी। कभी-कभी मैं उनके मामाजी के घर जाकर रुक जाता था। कभी वे मेरे कमरे पर आ जाते थे; लेकिन रात में रुक नहीं सकते थे क्यों कि कमरा इतना बड़ा नहीं था। बोर्ड परीक्षा देने के लिए जब परीक्षा केन्द्र तीस किलोमीटर दूर निर्धारित हुआ तो वहाँ हम एक साथ रुके और परीक्षा में लगभग बराबर की सफलता प्राप्त करते हुए एक दूसरे से विदा हुए।

मैंने उस ग्रामीण विद्यालय के खराब माहौल से तौबा कर ली और पिताजी से जिद करके राजकीय इंटर कॉलेज में पढ़ने गोरखपुर चला आया। गोरखपुर से इलाहाबाद विश्वविद्यालय और वहाँ से लोक सेवा आयोग की दी हुई सरकारी नौकरी बजा रहा हूँ। उधर संजय ने उसी जनता इंटर कालेज से इंटर पास किया, फिर बिहार से शिक्षक प्रशिक्षण (बी.टी.सी.) प्राप्त किया, और प्राथमिक शिक्षक बनने से पहले बी.ए. और एम.ए.(अंग्रेजी) की डिग्री गोरखपुर विश्वविद्यालय से अर्जित कर ली। आज वे बिहार के पश्चिमी चंपारण जिले में सरकारी जूनियर हाई स्कूल में एक आदर्श शिक्षक की नौकरी करते हुए अपनी छोटी सी गृहस्थी सम्हाल रहे हैं। उनके शिक्षण कार्य की कुशलता को देखते हुए उन्हें अन्य शिक्षकों को प्रशिक्षण देने का अतिरिक्त कार्य सौंप दिया गया है जिसे पूरा करने के लिए उन्हें रविवार की साप्ताहिक छुट्टी भी समर्पित करनी पड़ती है। इसके लिए मिलने वाला अतिरिक्त पारिश्रमिक उनके समक्ष मुंह खोले तमाम आर्थिक चुनौतियों का सामना करने हेतु कुछ अतिरिक्त संबल जरूर देता होगा लेकिन उनकी कर्मनिष्ठा में डूबी हुई दिनचर्या इतनी व्यस्त हो चुकी है कि नौकरी के बाहर के सारे काम ठप हो चुके हैं। इष्टमित्रों से मिलना-जुलना, रिश्तेदारों के घर आना-जाना, छुट्टियों में बच्चों को लेकर बाहर घूमने जाना या सोशल मीडिया पर स्टेटस डालने और बतकही करने का शौक पैदा ही नहीं हो सका।

संजय एक ऐसी दुनिया में रमे हुए हैं जो महानगरीय संस्कृति और उपभोक्ता वादी सामाजिकता से कोसों दूर है। निवास स्थान से बीस-पच्चीस किलोमीटर दूर की नौकरी बजाने के लिए अनिवार्य हो चुकी मोटरसाइकिल भी काफी प्रतीक्षा के बाद आ सकी और अदना सा मोबाइल उसके भी बाद में। कर्ज लेकर घर का ढाँचा तो खड़ा कर लिया लेकिन उसके खिड़की दरवाजे बनवाने में कई साल लग गये। बच्चों की छोटी-छोटी जरूरतों के लिए भी अपने साथ कई समझौते करने पड़े। लगभग पूरे वेतन पर ई.एम.आई. ने कब्जा कर रखा है लेकिन मजाल क्या कि इनके चेहरे पर कभी शिकन देखने में आयी हो। जब भी पडरौना जाता हूँ तो इनके घर मिलने जरूर जाता हूँ। वही प्रसन्नता से मुस्कराता चेहरा और अपनी गृहस्थी के प्रति सजगता और जिम्मेदारी से भरा, उत्साह से लबरेज जीवन्त व्यक्तित्व देखने को मिलता है।

बात-बात में ठहाके लगाते और गुदगुदाने वाले किस्से-कहानियों का लुत्फ़ लेते हुए संजय की कोई ऑनलाइन प्रोफाइल नहीं है। वर्षों पहले मैंने इनका एक जी-मेल खाता बना के दे दिया तो उसका पासवर्ड धरे-धरे गायब हो गया और मेल चला गया तेल लेने। इंटरनेट तक अपनी पहुँच बनाने की न तो इन्हें जरूरत महसूस हुई और न ही कोई सुभीता ही हुआ। मेरे झकझोरने पर आज जब किसी दूसरे के ई-मेल एकाउंट से इन्होंने मुझे अपनी एक हस्तलिखित रचना भेजी तो मैंने सोचा फोन के बजाय इस पोस्ट के माध्यम से इन्हें अपनी शुभकामनाएँ उनतक पहुँचाऊँ। 

Sanjay K Tripathi1

अपनो का हो साथ तो इक संबल मिलता है
जीवन नौका को खेने का बल मिलता है

सत्य और भ्रम का अंतर जो समझ सका है
श्रमजीवी होने का मतलब समझ सका है
मन में रखता है जो ऊँची अभिलाषाएँ
घोर निराशा में आशा के दीप जलाए

ऐसे ‘कर्मवीर’ को ही प्रतिफल मिलता है
अपनों का हो साथ तो इक संबल मिलता है

जीत हार का जिसपर कोई असर नहीं है
दुनियादारी की बातों का असर नहीं है
अन्तर्मन के निर्णय पर ही चलता जाये
यमदूतों के भय से भी जो ना घबराये

ऐसे को ही हर प्रश्नों का हल मिलता है
अपनों का हो साथ तो इक संबल मिलता है।

-संजय कुमार त्रिपाठी

मैं चाहता हूँ आधुनिकता की चकाचौंध से दूर दुर्गम ग्रामीण इलाकों में शिक्षा की ज्योति जलाने में लगे इस अहर्निश कर्मयोगी को उसके जन्मदिन (१३ सितंबर) पर आप भी शुभकामनाएँ देना चाहें।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
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गुरुवार, 19 जून 2014

मन कहे तो गुनगुनाइए

यह गीत उन तमाम सरकारी सेवकों को समर्पित है जिनकी दिनचर्या में हंसने, मुस्कराने और गुनगुनाने के लिए कोई अवसर नहीं मिल पाता। मुझे लगता है कि वे कोशिश करें तो अवसर जरूर मिलेगा। बस थोड़ी सोच बदलनी होगी।

मन कहे तो गुनगुनाइए

मन कहे तो गुनगुनाइए
मन कहे तो गुनगुनाइए
राग और छंद बिगड़ते हैं तो बिगड़े
दिल की बात लब पे लाइए।

बात आपकी सुने या अनसुना करे जहाँ
प्यार दे दुलार दे या छोड़ दे जहाँ तहाँ
खुद ही देखिए भला क्या मान अपमान है
फिक्र नहीं कीजिए क्या सोचता जहान है
कभी अपने से मुस्कुराइए
मन कहे तो गुनगुनाइए

संवेदना मन की हमको जगाये
अंतस की पहचान हमसे कराये
मन के सवालो की भरपाई करती
ओजस्वी आशा की प्राणवायु भरती
फिर निराशा न उपजाइए
मन कहे तो गुनगुनाइए

देश के प्रदेश के विकास के हरास की
मन में फ़िक्र होने लगे डूब रही आस की
इष्ट मित्र भाई बंधु टूटते समाज की
धर्म में अधर्म और जाति के रिवाज की
थोड़ी देर भूल जाइए
मन कहे तो गुनगुनाइए

कामकाज खोज रहे जीविका की चाह में
छोड़ दिए राग रंग जो भी मिले राह में
भौतिक सुख साधन से घर आँगन भरते
माया की खातिर जाने क्या क्या करते
थोड़ा खुद पे तरस खाइए
मन कहे तो गुनगुनाइए

29.05.2014
सत्यार्थमित्र
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बुधवार, 30 अप्रैल 2014

सोलहवें का सुरूर…

16th year आज सोलहवीं लोकसभा के लिए वोट डाल कर आया हूँ। चुनावी ड्यूटी की जिम्मेदारी थी इसलिए रायबरेली में बना रहना अनिवार्य था। वर्ना आज लखनऊ जरूर जाता। इसलिए कि आज उस घड़ी को याद करने का दिन भी है जब मेरे जीवन में युगान्तकारी परिवर्तन की शुरुआत हुई; जब मेरे मन पर और मेरी इच्छाओं पर स्थायी लगाम लगाने की ठोस व्यवस्था सुनिश्चित कर दी गयी थी। जी हाँ, आपने ठीक समझा। इसी तारीख को मेरी शादी हुई थी। पन्द्रह साल पहले। आज से मैं दांपत्य जीवन के सोलहवें साल में प्रवेश कर रहा हूँ।

मैं इस सालगिरह को चुनाव की भेंट चढ़ाने का दोष लेकर कैसे रह जाता…! इसलिए मैंने लखनऊ से श्रीमती जी और बच्चों को रायबरेली बुला लिया। एक तरफ़ नौकरी और दूसरी तरफ़ बच्चों की शिक्षा की जरूरतों को एक साथ साधने के लिए और साथ ही एक-दूसरे का साथ पाने के लिए हम दोनो के लिए लखनऊ और रायबरेली की दूरी नापते रहने की मजबूरी साथ लग गयी है। कुछ वैसे ही जैसे केन्द्र में सरकार चलाने के लिए दूसरे दलों से गठबंधन करने की मजबूरी होती है। इस मजबूरी की आगे भी जारी रहने की संभावना है, अगली सरकार की ही तरह। अपनी शादी के सोलहवें साल के बारे में सोचते-सोचते मुझे सोलहवी लोकसभा का ध्यान आ जाता है और कभी इसका उल्टा भी।

इस चुनाव के बाद ज्यादा संभावना यही है कि सत्ता की सेज पर जमे रहने के लिए सबसे बड़े दल को छोटे-छोटे दूसरे दलों के साथ गठबंधन करना पड़ेगा, उनके नखरे उठाने पड़ेंगे, अपना मैनीफेस्टो ताख पर रखकर उनके साथ न्यूनतम साझा कार्यक्रम तय करना पड़ेगा; और रोज-ब-रोज उनके मूड का ख्याल रखना पड़ेगा। ना जाने कौन सी बात उन्हें नागवार लगे और बिदककर समर्थन वापस ले लें। एक मदारी की तरह हाथ में लोकलुभावन घोषणाओं का बाँस लेकर संतुलन बनाते हुए आसमान में तनी हुई सत्ता की रस्सी पर चलना होगा। सारा ध्यान बस इसपर कि इस छोर से उस छोर तक सकुशल पहुँच सके।

शादी की सत्ता भी कुछ ऐसा ही कौशल मांगती है। यह भी ऐसा ही गठबंधन है कि अपनी छोड़ अपने पार्टनर के बारे में ज्यादा सोचना पड़ता है, सोलहवाँ साल आते-आते तो कुनबा बढ़कर ऐसा हो जाता है कि आप पूरी तरह अल्पमत में आ जाते हैं। आप की कोई नहीं सुनता और आपको सबकी सुननी पड़ती है। बच्चों से लेकर बड़े-बूढ़ों तक जो जैसा कहे आपको वैसा ही करना पड़ता है। बिल्कुल यूपीए-टू की तरह।  अभी एक मित्र ने फेसबुक पर स्टेटस डाला कि शादी के पहले तो सभी केजरीवाल होते हैं लेकिन बाद में मनमोहन बन जाना पड़ता है। ठीक ही कहा है, कमोबेश सबका अनुभव ऐसा ही होता होगा।

जीवन के सोलहवें साल का जो सुरूर होता है वह शादी के सोलहवें साल में शीर्षासन करता दीखता है। वह उमंग, वह उत्साह, वह क्रान्ति कर डालने का जज़्बा, कुछ भी कर डालने की ऊर्जा का एहसास लेकर जब सोलह साल की उम्र में हम स्कूल से कॉलेज पहुँचते हैं और अपने करियर की जद्दोजहद के बाद नौकरी और शादी का पायदान छू लेते हैं तो जीवन एक उत्सव लगने लगता है।

इस उत्सव को और आगे तक ले जाने के लिए हमें एक साथी मिलता है, जीवन भर साथ निभाने को। ऐसी घड़ी को याद करने और अच्छा महसूस करने का समय तो निकालना ही चाहिए। छोटी-छोटी खुशियों को सहेजकर ही हम जीवन में उमंग और उत्साह को बनाये रख सकते हैं और शादी की सत्ता का स्वाद लंबे समय तक ले सकते हैं। सोलहवें के सुरूर को जो जितनी दूर तक खींच कर ले जा सके वह उतना ही धन्य है। इष्टमित्रों व रिश्तेदारों की शुभकामनाएँ भी तो इसी लिए हैं।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
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शुक्रवार, 18 अप्रैल 2014

वृक्ष और बालक

child-climbing-treeबहुत पुरानी बात है। गाँव में एक विशाल आम का पेड़ था। बहुत घना और छायादार जो गर्मियों में फल से लदा रहता था। उसमें फलने वाले छोटे-छोटे देसी (बिज्जू) आम जो पकने पर पूरी तरह पीले हो जाते थे बहुत मीठे और स्वादिष्ट थे। निरापद इतने कि चाहे जितना खा लो नुकसान नहीं करते थे।

एक छोटा बच्चा उस पेड़ को बहुत पसंद करता था। वह रोज आकर उसके नीचे खेलता, उसके ऊपर तक चढ़ जाता, आम तोड़कर खाता और उसकी ठंडी छाँव में सोकर आराम करता। उसे पेड़ से बहुत प्यार था और पेड़ को भी उससे बहुत लगाव हो गया था।

कुछ साल बीत गये। बच्चा अब कुछ बड़ा हो गया था। अब वह पेड़ के नीचे खेलने नहीं आता था। पेड़ भी उसके दूर हो जाने से उदास रहता था। एक दिन  वह लड़का अचानक पेड़ के पास आया और बहुत बुझा-बुझा लग रहा था।

पेड़ ने उसे देखा तो बहुत खुश हुआ, चहककर बोला- “आओ-आओ, मेरे साथ खेलो।”

बच्चे ने जवाब दिया - “मैं अब छोटा बच्चा नहीं रहा जो पेड़ के आस-पास खेलता रहूँ। अब मुझे खेलने के लिए अच्छे खिलौने चाहिए। उसके लिए रूपयों की जरूरत पड़ती है और मेरे पास रूपये हैं ही नहीं...!”

पेड़ सोच में पड़ गया, फिर बोला, “ओह! लेकिन मेरे पास तो रूपये हैं नहीं जो तुम्हें दे सकूँ। अलबत्ता तुम मेरे सारे आम तोड़ सकते हो और उन्हें बाजार में बेच सकते हो। इससे तुम्हें रूपये मिल जाएंगे।”

यह सुनकर बच्चा खुशी से उछल पड़ा। उसने फौरन पेड़ के सारे आम तोड़ डाले और उन्हें लेकर बाजार की ओर चल पड़ा। उसके बाद लड़का फिर नहीं लौटा। पेड़ फिर से उदास रहने लगा।

कुछ साल बाद वही लड़का जो अब बड़ा होकर एक युवा आदमी बन चुका था, पेड़ के पास लौटकर आया। उसे देखकर पेड़ बहुत खुश हुआ। बोला- “आओ-आओ, मेरे साथ जी भरकर खेलो।”

“मेरे पास अब खेलने का समय नहीं है। मुझे अपने परिवार के पालन-पोषण के लिए काम करना पड़ता है। बहुत व्यस्त रहता हूँ। अभी हमें रहने के लिए एक घर बनाना है। क्या तुम इसमें हमारी कोई मदद कर सकते हो?”

पेड़ फिर सोच में पड़ गया और बोला, “ओह! लेकिन मेरे पास तो रूपये हैं नहीं जो तुम्हें दे सकूँ। अलबत्ता तुम मेरी शाखाओं को काटकर अपने घर के काम में ला सकते हो।”

युवक के मन की मुराद पूरी हो गयी। उसने बिना देर किये पेड़ की मोटी-मोटी शाखाओं को काट डाला और उन्हें ट्रक में लादकर ले गया। जाते समय युवक बहुत प्रसन्न था और पेड़ भी उसकी खुशी देखकर मुस्करा रहा था। युवक उसके बाद फिर कई साल तक नहीं लौटा। पेड़ अकेला उदास रहते हुए उसकी बाट जोहता रहता।

एक दिन भीषण गर्मी के दिन वह आदमी अचानक दिखायी पड़ा। पेड़ इतने सालों बाद उसे देखकर बहुत प्रसन्न हुआ।

“आओ-आओ, मेरे साथ खेलो।” पेड़ ने मुस्कराकर आमंत्रण दिया।

“नहीं-नहीं, अब मेरी वो उम्र नहीं रही। अब तो मैं देश भर की सैर करना चाहता हूँ। दुनिया देखना चाहता हूँ। छुट्टियों में घूमना चाहता हूँ। हाँ, इसके लिए मुझे एक नाव की जरूरत है। क्या तुम मेरी कोई सहायता कर सकते हो?” उस आदमी ने बेहद अनौपचारिक ढंग से कहा।

“हाँ-हाँ, क्यों नहीं। नाव बनाने के लिए तुम मेरे तने का प्रयोग कर सकते हो। इसमें इतनी लकड़ी निकल आएगी कि तुम्हारी नाव तैयार हो जाय। इससे तुम दूर-दूर तक घूमना और खुश रहना।” पेड़ ने उत्साह पूर्वक कहा।

इतना सुनकर आदमी ने मजदूर बुलाये और पेड़ का मोटा तना काटकर ले गया। उसने बड़ी सी नाव बनवायी और सैर पर निकल गया। कई साल तक उसका पता नहीं चला। कट चुके तने के बाद बेहाल पेड़ वहीं पड़ा रहा।

अन्त में कई साल बाद वह आदमी फिर एक दिन वहाँ लौटा। थका-हारा उदास चेहरा लेकर।

“ओह! मेरे बच्चे, लेकिन अब तो मेरे पास कुछ भी नहीं बचा है जो तुम्हें दे सकूँ। अब तो आम भी नहीं हैं।” पेड़ उसे देखते ही दुखी होकर बोला।

“कोई बात नहीं।” उस प्रौढ़ आदमी न कहा, “वैसे भी अब आम खाने लायक मैं नहीं रह गया हूँ। दाँत भी टूट चुके हैं और मधुमेह का रोगी अलग से हो गया हूँ।”

पेड़ बोला, “मेरा तो तना भी नहीं बच रहा और न ही शाखाएँ जिनपर तुम चढ़ सको।”

“वे होतीं तब भी मैं कैसे चढ़ पाता? अब बूढ़ा जो हो गया हूँ।” आदमी ने कैफ़ियत दी।

पेड़ रो रहा था। बोला- “असल में अब तुम्हें देने को मेरे पास कुछ भी नहीं बचा है। क्या करूँ अब? अब तो केवल ये जड़ें बची हैं; ये भी धीरे-धीरे सूख रही हैं।”

“मुझे आपसे अब कुछ चाहिए भी नहीं। बस आराम करने के लिए एक शान्त स्थान चाहिए। मैं भी इतने सालों की भाग-दौड़ में थक गया हूँ।” आदमी ने जवाब दिया।

“तब तो बहुत अच्छा है, पुराने पेड़ की मोटी जड़ टेक लेकर आराम करने के लिए बहुत सुविधाजनक होती है। आओ, मेरे पास बैठो और आराम करो।” आदमी वहाँ टेक लेकर बैठा तो बूढ़ा पेड़ प्रसन्न होकर मुस्कराने लगा। खुशी के आँसू छलक पड़े।child-and-tree1

***

यह कहानी यहीं खत्म होती है। लेकिन हमारे समाज में यह कहानी रोज दुहरायी जाती है। यह कहानी हम सबकी है। यह पेड़ हमारे माता-पिता ही तो हैं। बचपन में हमें उनकी गोद में खेलना अच्छा लगता है। जब हम बड़े हो जाते हैं तो उन्हें छोड़कर चले जाते हैं। जब हमें उनसे कुछ चाहिए होता है तभी लौटते हैं; या जब कोई संकट आता है। इसके बावजूद माता-पिता हमारे लिए, हमारी खुशियों के लिए हमेशा हाजिर रहते हैं; अपना सबकुछ सौंप देने को तैयार ताकि हम खुश रह सकें।

आप सोच सकते हैं कि इस कहानी में उस बच्चे ने उस पेड़ के साथ बहुत निर्दयता की; लेकिन हम भी शायद अपने माता-पिता के साथ कुछ ऐसा ही करते हैं। हम यह मानकर चलते हैं कि यह तो उनका काम ही है। वे हमारे लिए जो भी करते हैं उसका सम्मान करना, उसका महत्व समझना और उसे अपने व्यवहार से व्यक्त करना हम भूल जाते हैं। जब इसकी याद आती है तबतक बहुत देर हो चुकी होती है।

जिनके माता-पिता साथ हैं उन्हें इस अनमोल सौभाग्य के लिए ईश्वर को धन्यवाद देना चाहिए और श्रद्धा पूर्वक सेवा से उनको तमाम खुशियाँ देनी चाहिए। ऐसा न हो कि हमें उनका महत्व तब पता चले है जब वे हमें छोड़कर चले जाएँ।

(अनूदित)

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
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गुरुवार, 8 अगस्त 2013

खुद करके देखो...

[मेरे मेलबॉक्स में एक मित्र का भेजा एक सामूहिक मेल मिला। अंग्रेजी में। इसके अन्त में यह अपील थी कि इसे अधिक से अधिक लोगों तक फॉरवर्ड कीजिए। यह अपील यदि प्रारंभ में होती तो शायद मैंने बिना पढ़े ही इसे मिटा दिया होता। लेकिन पूरी कहानी पढ़ने के बाद स्थिति दूसरी हो गयी। मैंने इसे हिंदी में प्रसारित करने का निर्णय लिया। इसका मूल संदेश तो मेरे मन में बहुत पहले से बैठा हुआ था जिसे लेकर कई बार अपने घर में चर्चा कर चुका हूँ। लेकिन आज इसे बहुत सुन्दर तरीके से समझाता हुआ यह संदेश मिला तो मेरी पौ-बारह हो गयी। इसे देखिए फिर बताइए आप क्या सोचते है।]

यह कहानी भीतर तक कुरेदती है।

एक नौजवान ने एक बड़ी कंपनी में मैनेजर की पोस्ट के लिए आवेदन किया। प्रारंभिक चरण के साक्षात्कार में सफल होने के बाद अब उसे कंपनी के निदेशक से मिलना था – फाइनल इंटरव्यू के लिए।

निदेशक ने उसके आत्मवृत्त (सी.वी.) से जान लिया कि उसकी शैक्षणिक उपलब्धियाँ उत्कृष्ट कोटि की हैं। उसने पूछा- “क्या तुम्हें स्कूल में कोई छात्रवृत्ति मिलती थी?” नौजवान ने जवाब दिया- “नहीं”

“तो क्या तुम्हारी स्कूल फीस तुम्हारे पिताजी ने दी ?”

“मेरे पिताजी की मृत्यु बहुत पहले हो गयी थी, जब मैं मात्र एक वर्ष का था। ...मेरी फीस तो मेरी माँ देती है।” उसने जवाब दिया।

“तुम्हारी माँ कहाँ काम करती है?”

“मेरी माँ कपड़े धुलती है।”

निदेशक ने उससे अपने हाथ दिखाने को कहा। नौजवान ने अपने हाथ दिखाये जो बहुत कोमल और सुन्दर थे। बिल्कुल तराशे हुए दिखते थे।

“क्या तुमने कभी अपनी माँ के साथ कपड़े धोए हैं? कभी उनकी मदद की है?”

“कभी नहीं, मेरी माँ हमेशा चाहती थी कि मैं पढ़ाई करूँ, अधिक से अधिक किताबें पढ़ूँ। इसके अलावा मेरी माँ कपड़े बहुत जल्दी-जल्दी धो लेती है। मुझसे कहीं ज्यादा तेजी से।”

निदेशक ने कहा, “मेरा एक अनुरोध है। जब तुम आज घर जाना तो अपनी माँ के हाथ देखना और उन्हें खूब अच्छी तरह धोना। उसके बाद कल सुबह मुझसे मिलना।”

नौजवान को लगा कि अब उसे नौकरी शायद मिल ही जाएगी। घर लौटकर उसने अपनी माँ से कहा कि वह उसके हाथ धोना चाहता है। माँ को यह अजीब लगा। वह खुश तो थी लेकिन मन में मिश्रित भाव लिए उसने अपना हाथ बेटे के आगे कर दिया।

effort and experienceयुवक ने अपनी माँ का हाथ धीरे-धीरे धोना शुरू किया ...और उसकी आँखों ने रोना...। यह पहली बार था जब उसने देखा कि माँ के हाथों में कितनी झुर्रियाँ है और कितने घाव के निशान हैं। कुछ घाव तो इतने दर्द से भरे हुए थे कि जब वह छू रहा था तो माँ के मुँह से सिसकी निकल जाती। एक दबायी हुई कराह...।

यह पहली बार था जब उसे भान हुआ कि इन्ही चोटिल हाथों से उसकी माँ रोज कपड़े धोती है ताकि उसकी पढ़ाई के लिए फीस जमा कर सके। उसकी पढ़ाई के लिए, उसके स्कूल की दूसरी गतिविधियों के लिए और उसका भविष्य सँवारने के लिए उसकी माँ को जो कीमत चुकानी पड़ती थी वे उसके हाथों में रिसते घावो की पीड़ा ही थी।

माँ के हाथ धोने के बाद उस नौजवान ने चुपचाप वो सारे कपड़े धो डाले जो उसकी माँ को धोने थे।

उस रात माँ-बेटे बहुत देर तक आपस में बात करते रहे।

अगली सुबह वह निदेशक के कार्यालय में पहुँचा।

“अच्छा बताओ, कल तुमने अपने घर क्या किया और क्या सीखा?” निदेशक ने यह पूछने से पहले उस नौजवान की आँखों में तिर आयी नमी को देख लिया था।

उसने बताया, “मैंने अपनी माँ के हाथों को धोया और बाकी बचे सारे कपड़े भी धो डाले...”

“अब मैं जान गया हूँ कि दूसरों के काम का मूल्य समझना क्या होता है। मैं जो आज हूँ वह माँ के बिना नहीं बन सकता था। माँ का हाथ बँटाने के बाद मैंने आज ही जाना कि अपने आप अपने हाथ से कोई काम करना कितना कठिन और दुष्कर होता है। मुझे अब पता चला है कि अपने परिवार की देखभाल करने और उसे संभालने का काम कितना महत्वपूर्ण और मूल्यवान है।”

निदेशक ने कहा, “बस यही है जो मैं एक मैनेजर में देखना चाहता हूँ। मैं एक ऐसे व्यक्ति की भर्ती करना चाहता हूँ जो दूसरों की मदद का मोल समझ सके, जो यह जानता हो कि कोई काम करके देने में कितनी तक़लीफ उठानी पड़ती है, और जिसने जीवन में केवल धन कमाने का एकमात्र लक्ष्य नहीं निर्धारित किया हो।”

“अब तुम चुन लिये गये हो”

इस नौजवान ने कड़ी मेहनत से काम किया और अपने अधीनस्थों के लिए खूब आदर व सम्मान का पात्र बना। सभी कर्मचारियों ने एक टीम की तरह खूब परिश्रम किया। कंपनी के प्रदर्शन में गजब का उछाल आ गया।

एक ऐसा बालक जिसे खूब संरक्षण दिया गया हो और उसे सभी मनचाही चीजें आसानी से पा जाने की आदत पड़ गयी हो, उसके भीतर एक ‘हकदारी की मानसिकता’ (entitlement mentality) विकसित हो जाती है। वह अपने को ही सबसे पहले रखने का आदी हो जाता है। वह अपने माँ-बाप की कठिनाइयों और संघर्ष से पूरी तरह अन्‍जान होता है। जब वह काम करना शुरू करता है तो यह मानकर चलता है कि सबको उसकी बात सुननी ही चाहिए। जब वह एक मैनेजर बन जाता है तो वह अपने कर्मचारियों की कठिनाइयाँ जान ही नहीं पाता है और हमेशा उन्हें दोषी ठहराता रहता है।

इस प्रकार के लोग हो सकता है पढ़ाई में बहुत आगे रहे हों और कुछ समय के लिए सफल भी हो गये हों; लेकिन अन्ततः उन्हें जीवन में कुछ उपलब्धि पा लेने का एहसास नहीं हो पाता है। वे हमेशा कुढ़ते रहते हैं, विद्वेष से भरे होते हैं और अधिक से अधिक पाने के लिए लड़ते रहते हैं। यदि हम अपने बच्‍चों को इस प्रकार का अतिशय दुलार और संरक्षण दे रहे हैं तो सोचिए, क्या हम उन्हें वास्तव में प्यार कर रहे हैं कि उल्टे अपने ही हाथों उन्हें बर्बाद कर रहे हैं।

OLYMPUS DIGITAL CAMERA         यह ठीक है कि आप अपने बच्‍चे को रहने के लिए एक बड़ा घर दे सकते हैं, खाने के लिए अच्छा भोजन दे सकते हैं, पियानो सिखा सकते हैं और बड़ी स्क्रीन वाली टीवी देखने को दे सकते हैं, लेकिन जब आप लॉन में घास काट रहे हों तो उन्हें भी यह करने को प्रेरित कीजिए। उन्हें अच्छा अनुभव होगा। भोजन करने के बाद उन्हें भाई-बहनों के साथ अपनी जूठी थाली और कटोरियाँ धुलने दीजिए। फर्श पर कुछ गिर गया हो तो उसे साफ करने को कहिए।

यह इसलिए नहीं कि आपके पास कामवाली बाई रखने को पैसे नहीं है, बल्कि इसलिए कि आप को उन्हें एक सही तरीके से प्यार करना है। उन्हें यह समझाना है कि उनके माता-पिता चाहे जितने अमीर हों, एक दिन जरूर आयेगा जब उनके बाल भी सफेद हो जाएंगे जैसे उस नौजवान की बूढ़ी माँ के हो गये थे। सबसे महत्वपूर्ण बात उन्हें यह समझाना है कि कोई काम अपने हाथ से करने में जो कष्ट होता है उसका अनुभव होना जरूरी है और उसका मूल्य इन्हें समझना चाहिए। दूसरों के साथ मिलकर कोई काम कैसे पूरा किया जाता है यह योग्यता उन्हें सीखनी चाहिए।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

मंगलवार, 28 मई 2013

औरतों को पूरा बदल देना चाहते हैं चेतन भगत

chetan bhagatचेतन भगत ने अपने उपन्यासों से नौजवानों के बीच अपनी विशिष्ट पहचान बना ली है। एक बिन्दास, साहसी, स्पष्ट सोच रखने वाला और बातों का धनी नौजवान लेखक। सामाजिक मसलों पर खुली राय रखने के लिए उन्हें टीवी चैनेलों पर भी देखा जा सकता है और यत्र-तत्र अंग्रेजी अखबारों में भी। कुछ नया सोचने और पेश करने का सलीका उन्हें खूब आता है। हाल ही में महिला दिवस के मौके पर लिखे अपने एक छोटे से आलेख (ब्लॉग पोस्ट) में उन्होंने पहले तो वे बिन्दु गिनाये हैं जो महिलाओं के प्रति पुरुषों के व्यवहार में परिवर्तन की अपेक्षा करते हैं। इसे ईमानदारी से उन्होंने स्वीकार भी कर लिया; लेकिन उनकी चर्चा फिर कभी। यहाँ यह बताना है कि उस आलेख में उन्होंने यह सलाह दे डाली कि सभी महिलाओं को अपने भीतर निम्नलिखित पाँच मौलिक परिवर्तन करने की आवश्यकता है :

  1. दूसरी महिलाओं की अनावश्यक आलोचना करना बन्द करें। वे हमेशा दूसरी महिलाओं के बारे में अपना फैसला सुनाने को आतुर रहती हैं। यह फैसला प्रायः कठोर ही रहता है। वे अपने प्रति भी कठोर होती हैं लेकिन महिलाएं एक-दूसरे के प्रति तो कुछ ज्यादा ही कठोर होती हैं। खराब फिटिंग के पहनावे से लेकर बिगड़ गये पकवान तक। वे टिप्पणी करने से नहीं चूकतीं। भले ही वे जानती हैं कि कोई भी सर्वगुणसंपन्न नहीं होता।
  2. झूठा व्यवहार करना बन्द करें। महिलाओं में यह आम प्रवृत्ति होती है कि अगले को खुश करने के लिए, खासकर पुरुष-अहम्‌ को तुष्ट करने के लिए ऐसा कुछ करती हैं जो उन्हें खुद ही सही नहीं लगता। जैसे किसी बचकाने चुटकुले पर भी जबरदस्ती हँसना, बॉस द्वारा नाजायज काम सौंपने पर भी खुशी-खुशी स्वीकर कर लेना, किसी बड़बोले की आत्मश्लाघा को चुपचाप सुनते हुए उसे अपने से श्रेष्ठतर समझने देना। यह सब खुद के साथ अच्छा व्यवहार नहीं है।
  3. अपने संपत्ति संबंधी अधिकारों के लिए खड़ी हों। भारत में असंख्य महिलाएँ अपनी संपत्ति का अधिकार अपने भाइयों, पुत्रों या पतियों के हाथों लुटा देती हैं। इसके लिए उन्हें आगे बढ़कर अपना अधिकार प्रकट करना चाहिए।
  4. महत्वाकांक्षी बनें और बड़े सपनें देखें। भारत के सभी नौजवानों के सीने में एक आग होनी चाहिए। भारतीय समाज की जो संरचना है उसमें लड़कियों के लिए जो सपने देखे जाते हैं वे लड़कों से अलग हैं। लड़कियाँ उतनी महत्वाकांक्षा नहीं रख पातीं जितना लड़के। लड़कियों को खुद ही इस स्थिति को बदलना होगा।
  5. रिश्तों के नाटक में ज्यादा मत उलझें। रिश्ते बहुत जरूरी हैं, लेकिन इतने भी नहीं। एक अच्छी माँ होना, पत्नी होना, बहन होना, बेटी होना, दोस्त होना या एक अच्छी प्रेमिका होना बहुत ही महत्वपूर्ण है, लेकिन इन रिश्तों में पूरी तरह खो जाना ठीक नहीं है। आपके जिम्मे एक और रिश्ता है- स्वयं से। रिश्तों के नाम पर इतना त्याग न करें कि आप अपने आप का ही बलिदान कर दें।

यह पाँचो सदुपदेश देखने में बहुत आकर्षक हैं और फॉलो करने लायक हैं। मैं अपनी बेटी को जरूर सिखाऊंगा। लेकिन इसपर पाठकों की जो राय आयी है वह भी बहुत रोचक है और मंथन को प्रेरित करती है।

मुम्बई की स्निग्धा इन पाँचों का जवाब यूँ देती हैं :

    1. क्या मर्द हमारी आलोचना नहीं करते हैं। हमने यह उन्हीं से सीखा है।
    2. क्या आप कभी मर्दों की ओछी हरकतों के शिकार हुए हैं- ‘वाह क्या बॉडी है’ वाली मानसिकता के? इनसे बचने के लिए झूठा व्यवहार करना ही पड़ता है।
    3. संपत्ति के अधिकार के बारे में अब जागरुकता बढ़ रही है। लेकिन अभी कितनी ग्रामीण औरतें इसका नाम भी जानती हैं?
    4. अपनी महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए पैसा कहाँ से लाएँ। अच्छा, खुद कमाकर?
    5. रिश्ते ! हिलैरी क्लिंटन को भी पहले बिल क्लिंटन की पत्नी कहा जाता है और बाद में अमेरिका की विदेश मंत्री।

टिप्पणियाँ तो और भी करारी हैं लेकिन यहाँ केरल निवासी जी.पिल्लई की बातें संक्षेप में रखना चाहूँगा :

चेतन भगत ने अपने आलेख में एक गहरी समस्या के सतह को ही छुआ है। …पुरुष महिलाओं के साथ क्या करते हैं यह तो विचारणीय है ही, एक महिला दूसरी महिला के साथ क्या-क्या और कैसे-कैसे व्यवहार करती है यह भी सोचना होगा। …यह दुश्मनी गर्भ में कन्या भ्रूण के आते ही शुरू हो जाती है। भारत की कौन स्त्री बेटी के बजाय बेटा पैदा करना ज्यादा पसन्द नहीं करती होगी? …घर के भीतर रोज ही बेटे और बेटी में फर्क करने का काम उसकी माँ ही करती है। …कौन माँ अपने बेटे के लिए बड़ा दहेज पाने की कामना नहीं करती? …गोरी-चिट्टी और सुन्दर बहू किस माँ को नहीं चाहिए, भले ही उसका बेटा कुरूप और नकारा हो? इन सबके पीछे आपको एक धूर्त, निष्ठुर, स्वार्थी और लालची महिला दिखायी देगी जिसके मन में एक दूसरी ‘महिला’ के प्रति तनिक भी सहानुभूति नहीं है। …इसके लिए आपको दूर जाने की जरूरत नहीं है, अपने घर के भीतर ही झाँकिए, दिख जाएगा। …दहेज हत्या के मामले ही देख लीजिए। वास्तव में किसी भी औरत के जीवन में मिले कुल कष्टों में से जितने कष्ट दूसरी औरतों से मिलते हैं उतने मर्दों से नहीं।

इस बहस की लंबी सृंखला मूल आलेख में देखी जा सकती हैं। गंभीर बहस तो होती ही रहती है, होनी भी चाहिए। लेकिन मैं यहाँ अपनी बात माहौल को थोड़ा हल्का रखने की इच्छा से यूँ कहना चाहता हूँ :

पहली राय तो इनकी प्रकृति-प्रदत्त विशिष्टता (यू.एस.पी.) को ही तहस-नहस करने वाली है। क्या इसके बिना महिलाओं की अपनी दुनिया उतनी मजेदार रह जाएगी। टाइम-पास का इतना बढ़िया साधन उनके हाथ से छीन लेना थोड़ी ज्यादती नहीं है क्या? ऐसे तो निन्दारस का आनन्द ही विलुप्त हो जाएगा इस धराधाम से। पतिदेव के ऑफिस और बच्चों के स्कूल जाने के बाद जब कामवाली भी सब निपटाकर चली जाती है तो अकेले समय काटना कितना मुश्किल होता है! इस मुश्किल घड़ी में यही तो काम आता है। बालकनी से लटककर पड़ोसन से, या फोन पर अपनी दूर-दराज की दोस्त या बुआ-मौसी-दीदी से यह रसपान करने में घंटो का समय कम पड़ जाता है। सुनते हैं इसके बिना उनका खाना भी मुश्किल से पचता है।

झूठा व्यवहार मत कहिए इसे जी। यह तो दुनियादारी है। यह न करें तो क्या कदम-कदम पर आफ़त को न्यौता दें। रोज इन्हें एक से एक घामड़ और घोंचू भी मिलते हैं। उन्हें हल्का सा ‘फील-गुड’ करा देने से मैडम को सेफ़टी भी मिल जाती है और उस मूढ़ पर मन ही मन हँस लेने का मौका भी मिल जाता है। फालतू में बहादुरी दिखाने से तो टेंशन ही बढ़ता है।

संपत्ति के अधिकार ले तो लें लेकिन ससुराल और मायके को एक साथ सम्हालना कितना मुश्किल हो जाएगा। ऊपर से मायके से भाई-भाभी जो रोज हाल-चाल लेते हैं, कलेवा भेजते हैं, और अपने जीजाजी की दिल से जो आवभगत करते हैं वह सब बन्द न हो जाएगा। सावन का झूला झूलने और गृहस्थी के बोझ से थोड़ी राहत पाने वे किसके पास जाएंगी? बच्चों के लिए मामा-मामी का दुलार तो सपना हो जाएगा। दूसरी तरफ़ बुआ और फूफा जी तो फिल्मी खलनायक ही नजर आएंगे। जब बहन अपने भाई की जायदाद बाँट लेगी तो वह ससुराल में अपनी ननद को भी तो हिस्सा देगी। इस बाँट-बँटवार में हमारे रिश्ते तो बेमानी हो जाएंगे।

महत्वाकांक्षी बनने में कोई बुराई नहीं है। लेकिन इसके लिए खुद ही मेहनत भी करना होगा। एक फॉर्म भरकर रजिस्ट्री करने भर के लिए भैया या पापा का मुँह ताकने से काम नहीं चलेगा। निडर होकर बाहर निकलना पड़ेगा, मम्मी का कंधा छोड़ना होगा और कड़ी प्रतिस्पर्धा के लिए वह सब करना होगा जो लड़के कर रहे हैं। आरक्षण का भरोसा नहीं अपने उद्यम का सहारा लेना होगा। इसके लिए कितनी लड़कियाँ तैयार हैं? मुझे लगता है - बहुत कम। जो तैयार हैं उन्हें सलाम। लेकिन ज्यादा संख्या उनकी है जो सिर्फ़ इसलिए पढ़ रही हैं कि पापा को उनकी शादी के लिए अच्छे लड़के मिल सकें।

रिश्ते नाटक की चीज नहीं हैं। इनके बिना व्यक्ति का अस्तित्व किस प्रकार परिभाषित होगा? मैंने उन लोगों को पागल होते देखा है जिन लोगों ने सामाजिक व पारिवारिक रिश्तों की कद्र नहीं की। कुछ समय तो साहस और उत्साह बना रहता है लेकिन बाद में एक साथी की तलाश शुरू हो जाती है जिसमें विफलता व्यक्तित्व को मुरझा देती है। एकला चलो का नारा इन रिश्तों के बाहर नहीं भीतर ही प्रस्फुटित होना श्रेयस्कर है। अन्य  प्राणियों से मनुष्य भिन्न सिर्फ़ इसलिए है कि वह एक सामाजिक प्रामाणिक है। समाज का निर्माण ये रिश्ते ही करते हैं। इसमें महिलाएँ जानबूझकर उलझती नहीं हैं, बल्कि इनके बीच ही वे बड़ी होती हैं। रिश्तों का ख्याल महिलाएँ ज्यादा करती हैं तो इसके लिए उन्हें धन्यवाद दीजिए और उनका अधिक सम्मान करिए। हाँ, उन्हें इतनी जगह जरूर दीजिए कि वे अपने आप के साथ भी एक सुखी और गौरवशाली रिश्ता कायम कर सकें।

मैं तो ऐसा ही सोचता हूँ। आशा है आप अपने विचार यहाँ जरूर साझा करना चाहेंगे।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

गुरुवार, 31 जनवरी 2013

जनवरी के जाते-जाते...

कई दिनों से उधेड़बुन चल रही है। कई दिनों से नहीं बल्कि अब तो एक  महीना बीत गया है। दिसंबर की भयावह सर्दी में निर्भया की कहानी ने मन को उद्विग्न रखा। उससे जुड़ी तमाम खबरों को पढ़ने, देखने व सुनने के बाद कुछ भी लिखने की हिम्मत नहीं हुई। कुछ अवधि तो ऐसी थी कि खुद के पुरुष होने पर शर्म आने लगी थी। हमारे समाज में कुछ पुरुष इतने पतित और नृशंस हो सकते हैं यह सोचकर ही एक अपराध बोध सा हो गया था। नये साल का स्वागत करने और हर्ष व्यक्त करती शुभकामनाओं की भी कोई गुन्जाइश नहीं बची थी। बिल्कुल निःशब्द रहकर शान्ति की आतुरता के साथ जनवरी की शुरुआत हुई।
train journey
इसी बीच जनवरी की रिकॉर्ड ठंड के बीच लखनऊ से रायबरेली के लिए स्थानान्तरण हो जाने से पूरी दिनचर्या गड़बड़ा गयी। देश और समाज के बारे में चिन्तन को शब्द देने और इंटरनेट मीडिया की सैर का क्रम कुछ इस तरह टूटा कि अबतक ठीक से नहीं जुड़ पाया है। साल की शुरुआत में जब पारा 02-03 डिग्री को छू रहा था तब मुझे सुबह साढ़े पाँच बजे रजाई और कम्बल का त्याग करके जल्दी-जल्दी तैयार होकर रेलगाड़ी पकड़ने के लिए साढ़े छः बजे तक घर से निकलना पड़ रहा था। बल्कि अभी भी निकलना पड़ रहा है।  रेलवे स्टेशन पर जाकर उपलब्ध गाड़ियों में से उसका चुनाव करना कि कौन सी सबसे पहले रायबरेली पहुँच सकती है एक कठिन पहेली थी। मासिक सीजनल टिकट (MST) वाले यात्रियों से परिचय का दौर चला तो सही गाड़ी चुनने का शऊर भी आ गया। लेकिन रोज की रेलयात्रा मुझे अभी भी बेहद थकाऊ और समय की बर्बादी लग रही है। (शायद एक-दो सप्ताह तक यह क्रम बना रहेगा जब मेरा सरकारी आवास मरम्मत और रंग-रोगन के बाद तैयार हो जाएगा।)
ट्रेन पहुँचने के समय से ही ऑफिस पहुँचने की मजबूरी ने क्या नहीं किया! कभी इतना जल्दी ऑफिस पहुँचा दिया कि केवल जमादार ही  स्वागत करता मिला तो कभी ग्यारह बजे के बाद लेट-लतीफ़ कर्मचारियों की तरह मुँह छुपाये अन्दर जाना पड़ा। यह बात अलग है कि अपने ऑफिस का बॉस होने के कारण कोई पूछने या टोकने वाला नहीं है। लेकिन अपने अन्दर से ही खुद को बहुत झेंप महसूस होती है। इसी तरह वापसी के लिए भी चार बजते-बजते काम पर ध्यान कम और रेलवे इन्क्वायरी की साइट पर ध्यान अधिक जाने लगता है। किस गाड़ी के जल्दी आने की संभावना है इसी के फिराक में रहने लगे। कई कर्मचारी मेरी इस मनःस्थिति को जानते हैं तो वे लेटेस्ट अपडेट देते रहते हैं। साहब आज अर्चना (एक्सप्रेस) का दिन है, लेट भी है मिल जाएगी। आज पंजाब समय से निकल गयी नहीं मिल पाएगी। भोपाल मिल सकती है। इन्टरसिटी तो आठ बजे आएगी। जबसे इसे इलाहाबाद के बजाय विन्ध्याचल से चला रहे हैं तबसे यह हमेशा पिटती रहती है। गाड़ियों का नाम अब मुझे भी याद रहने लगा है। लेकिन कुहरे की वजह से रोज-ब-रोज लेट रहने वाली गाड़ियों में यात्रा करना बहुत दुखदायी हो गया है। अब तो पांच बजे की बस पकड़ने लगा हूँ।
घर पहुँचते-पहुँचते रात के नौ बज ही जाते हैं। मेरे दोनो बच्चे कॉलबेल बचते ही दौड़कर दरवाजा खोलते हैं। अन्दर से उनकी किलकती आवाज पहले ही आ जाती है- ''मम्मी..., डैडी आ गये।'' उनकी आँखों में खुशी की वह चमक मैंने लखनऊ में रहते हुए कम ही देखी थी। लेकिन 'मम्मी' तो मेरे पहुँचने पर भोजन की व्यवस्था में लग जाती हैं। मैं हाथ-मुँह धोकर सीधे खाने की मेज पर बैठ जाता हूँ। उसी दौरान दिनभर का हाल-चाल हो जाता है। बच्चों के स्कूल की इतनी बातें रहती हैं कि उन्हें शॉर्ट में कहने के लिए टोकना पड़ता है। श्रीमती जी किचेन से ही आ-जाकर बात कर पाती हैं। टीवी पर कोई समाचार चैनेल पहले ही खोल लेता हूँ। कोई रोचक चर्चा सुनने का लोभसंवरण नहीं कर पाने का खामियाजा़ सुबह अधूरी नींद से जागकर चुकाना पड़ता है। अर्नब गोस्वामी का न्यूज ऑवर भी मिस करना पड़ता है। थकान इतनी रहती है कि सोफे पर ही आँखें बन्द होने लगती हैं। श्रीमती जी टीवी बन्द करके याद दिलाती हैं कि कल फिर उसी समय निकलना है। इसके बाद बिस्तर पर पड़ते ही खर्राटे शुरू हो जाते हैं।
सबसे बेतुका परिवर्तन खान-पान में हुआ है। सुबह साढ़े-छः बजे श्रीमती जी गरम-गरम रोटियाँ और सब्जी बनाकर तो परोस देती हैं लेकिन न मुझे खाने का चाव होता है और न उन्हें खिलाने का संतोष। यह भी कोई समय है...! जैसे-तैसे ठूसकर निकल पड़ता हूँ। पैदल-ऑटो-रेल-जीप-बस आदि पर चढ़ता उतरता ऑफिस पहुँचना और वापस आना। धत है जी ..! सुबह और शाम के कुल छः घंटे यात्रा में बर्बाद करने के बाद ऐसी स्थिति नहीं रह जाती कि यहाँ कुछ रचनात्मक लिखा जा सके। बहुत कुछ कहने की इच्छा और बाँटने का उत्साह मन में दब कर रह जाता है। यदा-कदा फेसबुक पर कुछ सोसलगीरी हो लेती है। लेकिन सत्यार्थमित्र तो अव्यक्त ही रह जाता है। चिन्ता होने लगी है कि मेरे इस प्रिय अनुष्ठान का क्या होगा।
लेकिन मुझे इसकी चिन्ता अपेक्षया कम है। इससे बड़ी चिन्ता दूसरी है जो बहुत निजी है। इस  ब्‍लॉग से भी ज्यादा कोई और भी अव्यक्त रह जाता है, मेरी इस विकट दिनचर्या में। वो जिसने मेरी चुनौतियों में मुझे सम्बल देने का बीड़ा उठा रखा है। जिसने मेरे बच्चों का हौसला और उनके चेहरे पर मुस्कान बनाये रखने के लिए अपना निजी सुख और कैरियर ताख पर रख दिया है। जिसे दिनभर इसकी चिन्ता रहती है कि मैं सकुशल पहुँच गया कि  नहीं। कुछ खा लिया की नहीं। मुझे कोई कठिनाई तो नहीं है? मैं तो यह भी नहीं देख पा रहा कि लगातार गरम और गुनगुने पानी से जिस खांसी सर्दी का इलाज किया जा रहा है उसके लिए जरूरी दवा भी घर में आ पायी है कि नहीं। कितने व्रत और त्यौहार आये लेकिन उसकी जरूरी तैयारियाँ मेरे बिना कैसे हो पा रही हैं यह नहीं जान पा रहा हूँ। सबकुछ  इतवार के लिए छोड़ रखा है।
वह भी क्या दिन थे जब घर से बिना कुछ ग्रहण किए ऑफिस आ जाने पर वह नहारी लेकर सीधे ट्रेज़री चली आयी थीं। इस बात का जिक्र हाल ही में सतीश पंचम जी ने किया तो मेरा मन उस दौर की एक भावुक यात्रा कर गया। समय बदला, परिस्थितियाँ बदलीं लेकिन वो आज भी कहाँ बदली हैं? आज भी वही चिन्ता, वही फिक्र। ज्ञान जी ने अपनी टिप्पणी में जिस गहन अनुभूति की चर्चा की थी वह आज भी उतनी ही टटका है।
( सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

शुक्रवार, 31 अगस्त 2012

प्रति-उपकार की कभी मत सोचें

कृतज्ञता

क्या आपको अपने जीवन में कभी दूसरों की मदद पाने की जरूरत पड़ी?
क्या आप को किसी ने ऐसे समय में आर्थिक सहायता की जब आपके पास जरूरी पैसे नहीं थे और कठिनाई में फँसे हुए थे?
क्या कभी आप बीमार पड़े और आपके किसी मित्र ने आपकी सेवा-सुश्रुषा की, डॉक्टर के पास ले गया?
क्या आपकी पत्नी या बच्चे के सड़क-दुर्घटना का शिकार हो जाने पर एक अपरिचित राहगीर ने उनकी सहायता की, मलहम-पट्टी करायी?
क्या आपका भाई झगड़े के पुलिस केस में फँसा तो किसी प्रभावशाली दोस्त ने अपने रसूख का प्रयोग करके उसे बचाया था?
क्या किसी तनाव के कारण जब आप मानसिक अवसाद के शिकार होते जा रहे थे तब आपके सहकर्मी ने अपना हाथ बढ़ाकर आपको सम्बल दिया था ?

यदि इन प्रश्नों का उत्तर ‘हाँ’ है तो ऐसे मददगारों के प्रति आपके मन में कृतज्ञता का भाव जरूर पैदा होता होगा। आप उनके उपकार के भार से दबा हुआ महसूस करते होंगे। आभारी होंगे उनके। यह आभार उनसे प्रदर्शित भी करते होंगे। थैंक्यू बोलकर मन कुछ हल्का हो जाता होगा। कृतज्ञता का यह भाव रखना कदाचित्‍ अच्छा माना जाता है।

लेकिन क्या आप ऐसे उपकार का बदला चुकाने के बारे में भी सोचते हैं?  क्या मन में ऐसी ख्वाहिश पालते हैं कि काश आपको भी ऐसा अवसर मिलता कि जिस व्यक्ति ने आपकी मदद की उसकी मदद आप भी कर सकें? आपके ऊपर जो एहसान किया गया है उसे याद रखते हुए क्या आप प्रति-उपकार के अवसर की तलाश में रहते हैं? क्या आप यह कामना करते हैं कि ईश्वर आपको इस लायक बनाये कि आप भी इनकी मदद कर सकें? और सबसे बढ़कर, क्या आप अपनी इस भावना से दूसरों को अवगत भी कराते हैं जिन्होंने आपकी मदद की है?

यदि इन प्रश्नों का आपका उत्तर ‘हाँ’ है तो सावधान हो जाइए। आप सही नहीं हैं। आप अन्जाने में अपने दोस्तों, मददगारों व हितैषियों का अहित कर रहे हैं। आपकी प्रति-उपकार की भावना उन्हें संकट में डाल सकती है। आप यदि ईश्वर से अपने लिए ऐसे अवसर की कामना कर रहे हैं जिसमें आप अपने ऊपर किये गये एहसान का बदला चुका सकें तो इस कामना में यह भी शामिल है कि भगवान उनके लिए कोई ऐसी परिस्थिति बनाये जिसमें उन्हें किसी की मदद की जरूरत पड़ जाय। यानि जाने-अनजाने आप उनके लिए बुरे दिनों की कामना कर रहे हैं। उन्हें आर्थिक बदहाली, बीमारी या दुर्घटना का सामना करने की नौबत आ जाय तभी आपकी वह इच्छा पूरी होगी जिसे आप उपकार का बदला चुकाना समझ रहे हैं।

इसलिए आप एहसान चुकाने की बात मत सोचें। कहीं आपकी इच्छा का मान रखने के लिए प्रकृति ऐसे उपाय न कर दे कि अगले को कठिनाई पैदा हो जाय। इसलिए बेलौस होकर अपने ऊपर किये गये एहसान का एकाउंट बनाना भूल जाइए। यह याद मत रखिए कि अमुक व्यक्ति ने आपके गाढ़े वक्त में मदद की थी। और मुझे भी उसके गाढ़े वक्त में….। ना बाबा ना…। कत्तई नहीं। छोड़ दीजिए उसे उसके हाल पर। ईश्वर उसे अच्छे कार्य का पुरस्कार देगा।

इसका एक दूसरा पहलू भी है जो आम तौर पर एक अन्य कारण से समझाया जाता है। वह यह कि आप किसी की कोई मदद करते हैं तो काम हो जाने के बाद उसे अवश्य भुला दीजिए। नेकी कर दरिया में डाल। यह भुला देना सबसे ज्यादा आपके लिए लाभदायक है। यदि आप बदले में कुछ अपेक्षा करते हैं तो नुकसान ही नुकसान है। अव्वल तो आपकी उम्मीद पूरी नहीं होने पर आप निराशा के शिकार हो जाएंगे और मानसिक त्रासदी झेलेंगे। लेकिन दूसरी महत्वपूर्ण बात यह होगी कि आप अन्जाने में  स्वयं अपने लिए बुरे वक्त को न्यौता देते रहेंगे। आप यदि चाह रहे हैं कि आपको भी अमुक व्यक्ति वैसी ही सहायता करे जैसी आपने की थी तो आप सबसे पहले अपने लिए वैसी विपरीत परिस्थिति की परिकल्पना कर रहे हैं।

इसलिए यदि अपना भला चाहते हैं तो अपनी उपलब्धियों के लिए केवल ईश्वर को धन्यवाद दीजिए और उससे प्रार्थना कीजिए कि वह आपको कभी भी एहसान का बदला चुकाने का मौका न दे; और न ही किसी दूसरे के मन में ऐसी भावना पैदा होने दे कि वे आपकी मदद करने की कामना पालें। एक बार इस दृष्टि से सोचकर देखिए आपके मन का बहुत सा असंतोष और भार पल भर में मिट जाएगा और आप बहुत हल्का महसूस करेंगे। करना ही है तो उनकी मदद कीजिए जिनसे आपको कोई रिटर्न लेने की गुन्जाइश नहीं है। फिर मस्त रहेंगे।

मैंने तो जबसे यह सूत्र पाया है बहुत मजे में हूँ। Smile
आप भी आजमाइए…। क्या ख्याल है?

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी - सत्यार्थमित्र)

शनिवार, 30 जून 2012

भ्रष्टाचारी का आत्मविश्वास तगड़ा है

क्या हमारा समाज सादा जीवन उच्‍च विचार का मंत्र भूलता जा रहा है?

ashok-chavan-adarsh-panel-295महाराष्ट्र के एक पूर्व मुख्यमंत्री एक बड़े और चर्चित घोटाले की जांच के लिए राज्य सरकार द्वारा गठित आयोग के समक्ष शनिवार को पेश हुए। आज शाम यह समाचार सभी चैनेलों पर वीडियो क्‍लिप के साथ आ रहा है। गाड़ी से उतरकर नेता जी बत्तीसो दाँत मुस्करा रहे हैं और अपने समर्थकों और “प्रशंसकों” से हाथ मिलाते हुए ऐसे आगे बढ़ रहे हैं जैसे दिल्‍ली में खाली हुए वित्तमंत्री के पद की शपथ लेने जा रहे हों। चेहरे पर ऐसा आत्मविश्वास सी.डब्ल्यू.जी. और थ्रीजी घोटाले के सरगनाओं  के चेहरे पर भी चस्पा रहता था जब चैनेल वाले उनके जेल से अदालत आने जाने की तस्वीरें दिखाते थे। ऐसा आत्मविश्वास देखकर मुझे पहले तो आश्चर्य होता था लेकिन अब अपनी सोच बदलने की जरूरत महसूस होने लगी है।

मैंने अपने समान विचारों वाले एक मित्र से चर्चा की तो उसने तपाक से कहा- मुझे तो इन सबको देखकर अपने भीतर हीनता का भाव पैदा होने लगा है। वह आगे बोलता गया और मैं समर्थन में सिर हिलाता हुआ हूँ-हूँ करता रहा - थोड़ी ईर्ष्या सी होती है इस मजबूती को देखकर। इधर तो इस आशंका में ही घुले जाते हैं कि सरकारी कुर्सी पर बैठने के कारण ही लोग जाने क्या-क्या सोचते होंगे। गलती से भी कोई गलत काम हो गया और बॉस ने स्पष्टीकरण मांग लिया तो क्या इज्‍जत रह जाएगी। समाज को क्या मुँह दिखाएंगे? बीबी बच्चों को कैसे समझाएंगे कि मैने कोई ऐसा-वैसा काम नहीं किया है, बस थोड़ी ग़लतफहमी पैदा हो गयी है जो जल्दी ही ठीक हो जाएगी। प्रत्तिष्ठा बचाने के चक्‍कर में बहुत नुकसान उठाना पड़ा। कई बार सुनहले मौके हाथ से चला जाने दिया। सहकर्मियों की लानत-मलानत झेलनी पड़ी। कितने बड़े लोगों से दोस्ती बनाने का अवसर चूक गया। बड़ी-बड़ी पार्टियाँ हमसे किनारा करती गयीं। सत्ता के गलियारों में पूछने वाला कोई नहीं रहा। कोई गॉडफादर नहीं मिला हमें। शायद मैं किसी काम नहीं आने वाला था। किसी ने हमपर दाँव नहीं लगाया। बार-बार ट्रान्सफर होता रहा।

मैं ऐसे तमाम लोगों को देखता रहता हूँ जिन्होंने मेरे साथ ही नौकरी शुरू की और देखते-देखते कहाँ से कहाँ पहुँच गये। बड़ी-बड़ी कोठियाँ खरीद लीं, कितने प्‍लॉट अपने घर-परिवार के नाम कर लिये, आलीशान कारें और विलासिता के तमाम साधन जुटा लिए। इनके आगे-पीछे प्रशंसकों और तीमारदारों की भीड़ लगी रहती है। तमाम लोग सेवा के लिए तत्पर रहते हैं। नौकरी में एक ही जगह लम्बे समय तक जमे रहे। किसी ने हटाने के लिए शिकायती चिठ्ठी नहीं लिखी। इनसे वे सभी लोग संतुष्ट और प्रसन्न रहे जो सत्ता के गलियारों में जाकर इनकी शिकायत कर सकते थे और नुकसान करा सकते थे। मुझमें यह कुशलता नहीं रही। मुझसे ऐसे लोग प्रायः नाराज ही रहे। सरकारी नियमों से डरा-सहमा सा मैं उनकी ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाने में चूक गया। बदले में मिली झूठी शिकायतें और सत्ता प्रतिष्ठान की उपेक्षा।

अबतक अपने मन को, अपने परिवार को और अपनी पत्‍नी को भी सफलता पूर्वक समझाता आया हूँ कि ग़लत तरीके से कमाया हुआ पैसा तमाम ग़लत रास्तों पर ले जाता है। ऐसे लोगों को अच्छी नींद नहीं आती। जीवन में वास्तविक सुख और आनन्द नहीं मिलता। भौतिक साधनों में अधिकतम की कोई सीमा नहीं होती। इसे और बढ़ाते जाने की लालसा लगातार बढ़ती ही जाती है। इसलिए हमें अपनी जरूरतों का न्यूनतम स्तर तय करना चाहिए और उनकी पूर्ति कर लेने भर से प्रसन्न रहना चाहिए। संतोष-धन को ही सबसे बड़ा धन मानना चाहिए।

लेकिन यह सारी समझाइश कभी-कभी मुझे ही डाउट में डाल देती है।

देखता हूँ उनकी पूजा होते हुए जो माल कमाने और खर्च करने में प्रवीण हैं। उनकी हाई-सोसायटी में तगड़ी पकड़ है। सत्ता के ऊँचे गलियारों में गहरी पैठ है। देखता हूँ उनके घर-परिवार वाले उनसे बहुत खुश हैं, रिश्तेदार उन्हें घेरे रहते हैं। वे शादी-ब्याह और अन्य पार्टियों में अलग से बुलाये जाते हैं। बच्‍चे उन्हें कुछ ज्यादा ही मिस करते हैं। वे उनकी सभी फरमाइशें पूरी कर सकते हैं इसलिए बहुत अच्छे पापा और लविंग-हस्बैंड हैं। वे उन्हें देश-दुनिया की सैर कराने ले जाते हैं, मॉल, पिकनिक, सिनेमा, शॉपिंग आदि पर खूब खर्च कर सकते हैं। शायद वे अपने लिए ज्यादा खुशियाँ भी खरीद पा रहे हैं। समाज में उनकी इज्‍जत कुछ ज्यादा ही है।

हमारे समाज का नजरिया क्या कुछ बदल नहीं गया है? एक बार मैंने अपने एक अधिकारी मित्र से अपने किसी दूर के परिचित की सिफारिश कर दी। परिचित का काम बिल्कुल सही था लेकिन उक्त अधिकारी ने बिना उचित और पर्याप्त सुविधा शुल्क के काम करने से मना कर दिया था। मैने सिफारिश करने से पहले उक्त अधिकारी से ही यह कन्फर्म भी कर लिया कि काम सोलहो आने सही है, इसमें कोई कानूनी बाधा नहीं है। लेकिन जब मैंने काम कर देने के लिए सिफारिश कर दी तो उन्होंने बड़ी विनम्रता से काम करने से मना कर दिया। बोले- भले ही यह काम सही है लेकिन यदि मैंने आपके कहने पर यह काम बिना पैसा लिए कर दिया तो मेरा नुकसान तो होगा ही; आपको भी बहुत दिक्‍कत पेश आएगी।

उनकी आखिरी बात से मैं उलझन में पड़ गया। मेरे चेहरे पर तैरती जिज्ञासा को भाँपकर उन्होंने स्थिति स्पष्ट कर दी - बात सिर्फ़ इस केस की नहीं है, डर इस बात का है कि यदि फील्ड में यह बात फैल गयी कि मैंने आपके कहने पर बिना पैसा लिए काम कर दिया तो लोग आगे भी आपको एप्रोच करने लगेंगे। मैं यह कत्तई नहीं चाहता कि यह मेसेज जाय कि मै बिना पैसा लिए भी काम कर सकता हूँ।

उनकी बात का लब्बो-लुआब यह था कि उन्होंने बड़ी मेहनत से यह ख्याति अर्जित की थी कि बिना पैसा लिए वे अपने बाप की भी नहीं सुनते। इस ख्याति के साथ कुर्सी पर जमे रहने के लिए उन्हें “ऊपर” काफी मैनेज भी करना पड़ता था इसलिए मेरी सिफारिश ठुकरा देना उनकी भयानक मजबूरी थी जिसका उन्हें खेद था।

अब ऐसे अधिकारियों की संख्या बढ़ती जा रही है जो अपना प्रोमोशन जानबूझकर रुकवा देते हैं क्योंकि प्रोमोशन वाले पद की अपेक्षा वर्तमान पद ज्यादा मालदार है। ऐसा करने के लिए वे बाकायदा अपनी एसीआर खराब करवा लेते हैं, जानबूझकर सस्पेंड हो लेते हैं, या प्रोमोशन प्रक्रिया में खामी ढूंढकर अदालत से स्टे करा लेते हैं। यह सब करते हुए इन्हें कभी कोई शर्म नहीं आती। यह सब बड़े ही आत्मविश्वास से किया जाता है। शायद अदालते इस खेल को समझ नहीं पाती हैं या कैंसर वहाँ भी फैल चुका है... पता नहीं।

धन की लूट में यदि यदा-कदा ट्रैप कर लिये जाँय, एफ़.आई.आर. हो जाय, जेल जाना पड़ जाय तो भी जमानत कराकर लौटने के बाद चेहरे पर कोई मायूसी या झेंप का भाव नहीं रहता। बड़े आराम से दिनचर्या वापस उसी पटरी पर लौट आती है। वही हनक दुबारा फैल जाती है और वही आत्मविश्वास फिर से लौट आता है।

राष्ट्रीय पटल पर बड़े-बड़े घोटाले और उनमें शामिल हाई-प्रोफाइल घोटालेबाजों को मुस्कराते देखते हुए हमारे समाज में अब इन्हें ऐसी स्वीकृति मिल चुकी है कि निचले स्तर पर कदम-कदम पर भ्रष्टाचार से सामना होने पर हम कतई विचलित नहीं होते। फिर इनका आत्मविश्वास तगड़ा क्यों न हो भाई...!

(Satyarthmitra सत्यार्थमित्र)  

बुधवार, 4 अप्रैल 2012

बच्चों के लिए खुद को बदलना होगा…

पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी और उसके बाद या उसके बिना भी शादी तक का सफर पूरा कर लेने पर हमें लगता है कि अब इस जिन्दगी में हमें जैसा होना था वह हो लिए। जो मिलना था वह मिल गया। व्यक्तित्व के विकास का क्रम लगभग पूरा हो गया, अब इसमें किसी क्रान्तिकारी परिवर्तन की गुंजाइश नहीं बचती। नौकरी में कुछ पदोन्नति या बिजनेस में कुछ उन्नति पाकर हम अपनी आर्थिक या सामाजिक हैसियत भले ही बढ़ा लें लेकिन एक बार कैरियर और जीवन साथी मिल जाने के बाद  हमारे व्यक्तिगत आचरण का जो स्वरूप निर्धारित हो जाता है वह कमोबेश जीवन भर बना रहता है। मुझे अभी हाल तक ऐसा ही महसुस होता रहा है। लेकिन इस बीच कुछ ऐसे अनुभव हुए कि मुझे अपनी धारणा को बदलने और आप सबके बीच चर्चा करने का मन हुआ।

एक विद्यार्थी, एक प्रतियोगी परीक्षार्थी, सफल/असफल अभ्यर्थी और फिर  सामर्थ्य व भाग्य के मेल से मिलने वाला कैरियर बनाकर हम चल पड़ते हैं अपने जीवन की नैया को पार लगाने। जीवन संगिनी के साथ जो परिवार बसता है उसकी जिम्मेदारी उठाने में हमारी कार्यकुशलता का स्तर बहुत कुछ हमारे आर्थिक स्तर  पर टिका हुआ है, यह भी एक सामान्य धारणा मेरे मन में रहा करती थी। लेकिन अब मैं सोच रहा हूँ कि एक गृहस्थ के रूप में या बच्चों के अभिभावक के रूप में हमारी भूमिका केवल हमारी आर्थिक स्थिति से नहीं तय होती। हमे तमाम ऐसे काम करने हैं जिनका धन से कोई सरोकार नहीं है लेकिन वे बहुत ही महत्वपुर्ण हैं। इनमें से एक महत्वपुर्ण कार्य है अपने छोटे-छोटे बच्चों को समुचित शिक्षा देना। ऐसी शिक्षा जो उन्हें एक योग्य, कर्तव्यपरायण, ईमानदार और मूल्यपरक जीवन जीने वाला खुशहाल नागरिक बना सके। बड़ी से बड़ी फीस चुकाकर भी हम किसी स्कूल से  इन बातों की गारंटी नहीं ले सकते। ऐसे सद्‍गुण विकसित होने की जो उम्र है वह ज्यादा बड़ी नहीं है। बच्चा जब अपने दो पैरों पर खड़ा  होकर दौड़ने लगता है स्फुट शब्दों का प्रयोग करके अपनी बात माँ तक पहुँचाने लगता है अपनी उम्र के बच्चों के साथ खेलने लगता है तभी उसके सीखने और व्यक्तित्व का स्वरूप निर्धारित होने की प्रक्रिया भी शुरू हो जाती है। कहते तो हैं कि बहुत से गुण-अवगुण आनुवांशिक भी होते हैं लेकिन जिसपर हमारा कोई वश नहीं उसकी क्या बात की जाय। हम तो उस वातावरण की ही बात करेंगे जिसे हम एक सीमा तक  बदल पाने का प्रयास कर सकते हैं।

एक अभिभावक के रूप में बच्चे की परवरिश करते समय हमें किन बातों का ध्यान रखना चाहिए इसपर एक छोटी सी पुस्तिका मेरे हाथ लगी है। सिटी मॉन्टेसरी स्कूल के संस्थापक डॉ.जगदीश गाँधी और उनकी विदुषी पत्नी डॉ. (श्रीमती) भारती गाँधी द्वारा तैयार की गयी इस पुस्तिका में बहुत सी सीखने लायक बातें लिखी गयी हैं। यहाँ सबकुछ तो नहीं दिया जा सकता लेकिन जिन वाक्यों ने मुझे यह सब लिखने को प्रेरित किया उन्हें संक्षेप में उद्धरित कर रहा हूँ :

  • बालक को सीखने की तीव्र प्रक्रिया होती है। उसके सामने सब कुछ सही-सही कीजिए।
  • विश्वविद्यालय की डिग्रियाँ ही शिक्षित होने का प्रमाण नही अपितु उसकी शिक्षा का पता तो उसके व्यवहार से चलता है।
  • बालक की कर्तव्य पालन की शिक्षा देने से पूर्व माता-पिता स्वंय बालक के आज्ञाकारी सेवक बनें।
  • आप अपने बच्चे को कभी छोटा न समझिये, वह आपके अच्छे-बुरे कार्यों को समझता और सीखता है।
  • एक सफल माँ वह है जो बच्चे की उस माँग को पहचानती है जिसे हम रोना कहते हैं।
  • एक सफल पति-पत्नि को बच्चों के सामने कोई ऐसा काम नहीं करना चाहिंए जो बालक को गलत सीख दे।
  • आप जैसा भी करते हैं बच्चा उसी का नकल करता है।
  • आपकी जरा सी शाबाशी से बच्चे का मन प्रसन्नता से बल्लियों उछल पड़ता है।
  • बच्चों को वही खिलौना खरीद कर दीजिए जिससे बच्चा कुछ सीख सके।
  • खेलते हुए बच्चे को कोई आदेश न दीजिए वह आपकी आज्ञा का उल्लंघन कर सकता है।
  • बच्चे जिज्ञासु होते हैं। उन्हें किसी बात के लिए मना न कीजिए अन्यथा वे वैसा ही करेंगे।
  • बालक पैदा होते ही माँ के स्कूल में दाखिला पा लेता है और फिर सोते-जागते, खेलते-खाते, उठते-बैठते हर पल उसकी कक्षाएँ लगी रहती है।
  • माता-पिता अपने बच्चों पर धन तो खर्च करते हैं पर समय नहीं खर्च करते।
  • बच्चे को खेल-तमाशा दिखाने साथ ले जाइये और उससे सम्बन्धित प्रश्नों का उत्तर दीजिए यह भी शिक्षा है।
  • आप आस्तिक हैं और पूजा करना चाहते हैं तो बालक से अच्छा कौन होगा जिसकी पूजा की जाय।
  • बच्चों को घर में प्रतिदिन काम आने वाली वस्तुओं से परिचय अवश्य करा देना चाहिए।
  • बच्चों को पालतू पशुओं और पक्षियों से भी परिचय करा देना चाहिए।
  • बच्चों को कहानियाँ सुनाकर उनमें त्याग, सेवा, आज्ञाकारिता के गुणों को सरलता से भर सकते हैं।
  • पाठशालाओं में माताओं को बराबर आते रहना चाहिए जिससे बच्चा यह महसूस करें कि पाठशाला भी घर का एक अंग है।
  • आप चाहते हैं कि बच्चा सच बोले तो स्वयं सच बोलना शुरू कर दीजिए।
  • बालक को अनुशासित रखना चाहते हो तो स्वयं अनुशासित रहो।
  • प्रायः चार वर्ष की अवस्था का बालक कहानियाँ सुनने को बड़ा उत्सुक रहता है।
  • बच्चों को कहानियाँ इतनी प्रिय होती हैं कि वे कुछ देर के लिए भूख प्यास भी भूल जाते हैं।
  • बच्चे कहानी के पात्रों पर नहीं बल्कि नायक की सफलता और असफलता पर अधिक ध्यान देते हैं।
  • बच्चों को सच्ची कहानियाँ ही सुनानी चाहिंए जिससे बड़े होने पर वे माता-पिता पर अविश्वास न करने लगे।
  • चार वर्ष का शिशु पशु पक्षियों, परियों और चाँद की कहानियाँ पसन्द करता है।
  • बच्चों को राजा रानी की बहादुरी की कहानियाँ सुनाकर माताएँ बच्चों को बहादुर बना सकती हैं।
  • संसार के अनेक महापुरूषों को कहानियाँ द्वारा ही बचपन में संस्कार और प्रेरणा मिली है।
  • माँ ही अपने बच्चे की एक सफल अध्यापिका हो सकती है।
  • बालक माता-पिता या अभिभावकों के कटु व्यवहार, घर की असंतोषजनक स्थिति के कारण ही घर से भगता है।
  • अपने बच्चे को जासूसी और सस्ते किस्म की पुस्तकों से बचाइये।
  • बच्चों को सुधारने से पूर्व माता-पिता या अभिभावकों को अपने बुनियादी बुराइयाँ दूर करनी चाहिंए।
  • जो माता-पिता या अभिभावक स्वभाव से क्रोधी और चिड़-चिड़े हैं वे मेहरबानी करके बच्चों पर तरस खायें उन्हें इन दुर्गणों से दूर रखें।
  • बच्चा अपनी वाणी में ही नहीं वरन् वह आपके हृदय एवं आँखों में भी स्नेह खोजता है।
  • कौन जानता है कि आँगन में खेलने वाला कौन शिशु कल का कवि, डाक्टर, इंजीनियर, दार्शनिक, जनसेवक या कुशल प्रशासक होगा।
  • यह नन्हीं बालिकाएं ही तो कल की सरोजनी नायडू, लक्ष्मीबाई, अहिल्याबाई आदि नारी रत्ना है।
  • देश का भविष्य इन नन्हें मुन्नों के निर्माण में है, इस उत्तरदायित्व से भागने वाले राष्ट्रदोही हैं।
  • बच्चों को निर्दयता से पीटना एक जघन्य पाप एवं अपराध है।
  • प्रसन्नता और मनोरंजन ही आपके बच्चे का जीवन है।
  • बालक को कभी झिड़किये नही अन्यथा वह निरूत्साही एवं भीरू बन जायेगा।
  • बालक को बात-बात पर शाबाशी दीजिए उसका साहस दुगुना हो जायेगा।
  • बालक को ईश्वर का स्वरूप मानकर उसके समक्ष मेहरबानी करके कोई गलत काम न कीजिए।
  • बच्चा जन्मजात अहिंसक होता है।
  • यह मत भूलिये कि 2 वर्ष का शिशु आपकी सारी आदतें सीख रहा है।
  • मेरी मानिये तो मैं कहूँगी कि 2 वर्ष से 5 वर्ष के बच्चों को शिशु विहारों में पुस्तक पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि केवल खेलने के लिए भेजिए।
  • बच्चो को कभी ऐसे पड़ोसियों, मित्रों एवं सम्बन्धियों से न मिलने दें जो असंयम का व्यवहार करते हों।
  • आप पर कितनी ही, परेशानियॅा या आपत्ति क्यों न हों, आप बच्चों के सामने मुस्कराते रहें।
  • बच्चों को श्रेष्ठात्मायें समझ कर उनके प्रति उत्तरदायित्व को पूर्णता से निभाना चाहिए।
  • बच्चों में सहयोग एवं मिलजुल कर कार्य करने की भावना को जाग्रत कीजिए।
  • बच्चों को अपना खाना मिल बाँटकर खाना चाहिंए।
  • माता-पिता या अभिभावक जब समय-समय पर बच्चे की पढ़ाई, उसके विद्यालय के सांस्कृतिक कार्यक्रमों, उन्नति, अवनति आदि के प्रति रूचि दिखाते हैं तो बालक में आत्मविश्वास की भावना पैदा होती है।
  • वे माता-पिता धन्य हैं जो बालक के प्रत्येक कार्य में रूचि लेते हैं और सदैव बालक को आगे बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करते रहते हैं।
  • आज के विद्यार्थी के गुमराह होने का एकमात्र कारण है-माता पिता या अभिभावक द्वारा उसकी उपेक्षा।
  • कभी-कभी माता-पिता प्रायः मोह के वशीभूत होकर उसकी प्रगति में बाधक बन बैठते हैं।
  • चतुर माता पिता ज्वर ग्रस्त शिशु के लाख रोने पर भी उसे लड्डू नहीं खिलायेंगें।
  • माता पिता बालक पर अपनी रूचि न थोपे बल्कि बालक की ही रूचि के अनुसार उसका मार्गदर्शन करते रहें।
  • बच्चे को सदैव अपने से अधिक बुद्धिमान मानते हुए उसकी प्रत्येक बात का सम्मान करना चाहिंए।
  • यह कोरी भूल और अपराध है कि बालक का सुधार डंडे से किया जाय।
  • आप बच्चे की बुराई नहीं स्वयं अपने दोषों का बखान कर रहे हैं, जिसकी छाप बच्चे पर पड़ी है।
  • बच्चे को सदैव क्रियाशील खेलों में लगाइयें।
  • शिशुओं के लिए चिडि़याखाने व अजायबघर जैसे स्थान जिज्ञासा बढ़ाने के लिए बड़े उपयुक्त होते हैं, अवश्य साथ ले जाइये।
  • जो माँ बालक की मूक भाषा नहीं समझ पाती वह अनपढ़ है भले ही उसने कितनी ही डिग्रियाँ प्राप्त कर ली हों।
  • आप लट्टू नहीं नचा सकते तो बालक को नचाने से न रोकिए। उसका मन प्रसन्नता से नाचने लगेगा।
  • बालक एक सफल चितेरा होता है उसकी फेरी हुई प्रत्येक टेढ़ी-मेढ़ी रेखा में कला का पुट होता है।
  • यदि आप बच्चों से विनोद नहीं कर सकते, उसे हॅंसा नही सकते, तो आप उसे पढ़ा भी नहीं सकते।
  • बच्चे की कोई वस्तु गिर जाय तो तुरन्त आप पर आदर के साथ उठाकर बालक को दे दीजिए।
  • बालक के स्कूल जाते समय उसे दरवाजे तक अवश्य छोड़ने जाइये।
  • बच्चों की देखभाल कीजिए कि वे बाजार की खुली चीजें न खायें।
  • बच्चों को पहाड़ों और नदियों की खूब सैर कराईये इससे हृदय की विशालता और करूणा की भावना उत्पन्न होती है।
  • रात में छत या आँगन से बच्चे को चन्दा मामा दिखाइये, उसे प्रसन्नता होगी।

मैने जब इन बातों की कसौटी पर खुद को परखा तो अनेक मुद्दों पर सुधार की आवश्यकता दिखी। आशा है मेरी ही तरह इनमें से कुछ बातें आपका ध्यान जरूर खींचेगी जिनमें आप गलती कर रहे थे।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

गुरुवार, 22 मार्च 2012

पाकिस्तान में ऑनर किलिंग की रिपोर्ट क्या कहती है?

पाकिस्तान के राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने कहा है कि वहाँ पिछले साल कम से कम 945 औरतों व लड़कियों की हत्या इसलिए कर दी गयी कि उन्होंने परिवार की इज्जत लुटा देने का दुस्साहस किया। वृहस्पतिवार को जो आँकड़े प्रस्तुत किये गये हैं उनसे पता चलता है कि रूढ़िवादी पाकिस्तानी समाज में औरतों के ऊपर हिंसा के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। यहाँ  औरतों के साथ दोयम दर्जे के नागरिकों की तरह व्यवहार किया जा रहा है। सबसे बड़ी चिन्ता की बात यह है कि इस देश में घरेलू हिंसा को रोकने के लिए कोई कानून ही नहीं है।

पाकिस्तान के प्रतिष्ठित राष्ट्रीय अखबार डान में छपी रिपोर्ट में कहा गया है कि मानवाधिकार समूहों के अनुसार महिलाओं के अधिकारों की रक्षा की स्थिति पहले से बेहतर होने के बावजूद सरकार द्वारा अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। अभी हालत यह है कि पुलिस द्वारा अधिकांश घटनाओं को निजी पारिवारिक मामला बताकर रफ़ा-दफ़ा कर दिया जाता है।

my feudal lord

इस रिपोर्ट को देखकर तहमीना दुर्रानी की चर्चित पुस्तक माई फ़्यूडल लॉर्ड की याद आ गयी। अभी भी यहाँ के समाज में सामन्ती मानसिकता की पैठ बहुत गहराई तक बनी हुई है।

अपनी वार्षिक रिपोर्ट में आयोग ने लिखा है कि कम से कम 943 महिलाओं की हत्या इज्जत की रखवाली के नाम पर की गयी। इनमें से 93 अल्पवयस्क बच्चियाँ थीं। इस हत्या की शिकार महिलाओं में सात ईसाई और दो हिंदू संप्रदाय से संबंधित थीं।

आयोग द्वारा वर्ष 2010 में इज्जत के नाम पर की गयी हत्याओं की संख्या 791 बतायी गयी थी। वर्ष 2011 में जिन महिलाओं की हत्या हुई उनमें 595 के ऊपर अवैध संबंध रखने का आरोप था और 219 पर बिना अनुमति के विवाह कर लेने का दोष लगाया गया था। आयोग की रिपोर्ट के अनुसार कुछ पीड़िताओं की हत्या करने से पहले उनके साथ बलात्कार अथवा सामूहिक दुष्कर्म भी किया गया। अधिकांश महिलाओं की हत्या उनके भाइयों अथवा पति द्वारा की गयी थी।

आयोग ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि जिन 943 महिलाओं की हत्या हुई उनमें से मात्र 43 को मृत्यु से पहले चिकित्सा सहायता से बचाने की कोशिश की गयी थी। इसका मतलब यह है कि जिनसे जान बचाने की उम्मीद की जा सकती थी उन्होंने ही जान से मार देने का काम किया था।

अखबार कहता है कि इज्जत के नाम पर हत्या के (ज्ञात) मामलों में वृद्धि पाये जाने के बावजूद मानवाधिकार कार्यकर्ताओं द्वारा संसद की इस बात के लिए प्रशंसा की गयी है कि उसने महिलाओं को उत्पीड़न से बचाने के लिए कानून पारित किया है। फिर भी मानवाधिकार समूहों का मानना है कि हिंसा, दुष्कर्म और भेदभाव के खिलाफ महिलाओं को सुनिश्चित न्याय दिलाने के लिए सरकार को अभी बहुत कुछ करना होगा।

पिछले साल बेल्जियम की एक अदालत ने एक पाकिस्तानी परिवार के चार सदस्यों को जेल भेज दिया था क्योंकि उन्होंने अपनी बेटी की हत्या इसलिए कर दी थी कि उसने परिवार द्वारा तय की गयी शादी करने से मना कर दिया था और उनकी मर्जी के खिलाफ़ एक बेल्जियाई व्यक्ति के साथ रहने लगी थी।

क्या हमारे पड़ोसी देश की यह  खबर हमारे बहुत आस-पास की नहीं लगती? इज्जत के नाम पर अपनी बेटी-बहू की हत्या क्या हमारे समाज के कथित इज्जतदार लोग नहीं करते? क्या हमारे बीच निरुपमा पाठक के हत्यारे मौजूद नहीं हैं? अलबत्ता हमारे देश का मीडिया इसकी रिपोर्ट बहुत बढ़-चढ़कर करता है। फेसबुक, ट्‌विटर और ब्‌लॉग पर बतकही भी शायद कुछ ज्यादा हो जाती है लेकिन समस्या के समाधान की राह कहाँ से निकलेगी यह अभी दिखायी नहीं दे रहा।

आइए इसपर सिर जोड़कर सोचें। सिर्फ़ एक खबर नहीं एक प्रश्न के रूप में इसपर विचार करें।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

मंगलवार, 2 अगस्त 2011

‘निर्वासन’ में स्त्री विमर्श - प्रेमचंद

      पिछली पोस्ट में मैने वादा किया था कि आपको प्रेमचंद की एक विलक्षण कहानी पढ़वाऊंगा। लीजिए, कहानी पढ़िए जिसका शीर्षक है – निर्वासन। यह पूरी कहानी संवाद शैली में लिखी गयी है। कहानीकार ने अपनी ओर से कुछ भी नहीं बताया है; लेकिन इस बात-चीत से तत्कालीन समाज में स्त्री की नाजुक स्थिति का जैसा चित्र उभर कर आया है वह मन को विदीर्ण कर देता है। हम उस परंपरा को ढो रहे हैं जिसमें अग्निपरीक्षा देने के बावजूद सीता को जंगल में निर्वासित जीवन बिताना पड़ा। आज भी स्थितियाँ बहुत नहीं सुधरी हैं। क्या आधुनिक स्त्री-विमर्श इस मानसिकता को बदल पाएगा?

निर्वासन

कहानी- प्रेमचंद

   परशुराम- वहीं-वहीं, दालान में ठहरो!

   मर्यादा- क्यों, क्या मुझमें कुछ छूत लग गयी?

   परशुराम- पहले यह बताओ तुम इतने दिनों कहाँ रहीं, किसके साथ रहीं, किस तरह रहीं और फिर यहाँ किसके साथ आयीं? तब, तब विचार... देखी जायगी।

   मर्यादा- क्या इन बातों के पूछने का यही वक्त है; फिर अवसर न मिलेगा?

   परशुराम- हाँ, यही बात है। तुम स्नान करके नदी से तो मेरे साथ ही निकली थीं। मेरे पीछे-पीछे कुछ देर तक आयीं भी; मैं पीछे फिर-फिरकर तुम्हें देखता जाता था, फिर एकाएक तुम कहाँ गायब हो गयीं?

   मर्यादा- तुमने देखा नहीं, नागा साधुओं का एक दल सामने से आ गया। सब आदमी इधर-उधर दौड़ने लगे। मैं भी धक्के में पड़कर जाने किधर चली गयी। जरा भीड़ कम हुई तो तुम्हें ढूँढ़ने लगी। बासू का नाम ले-लेकर पुकारने लगी, पर तुम न दिखायी दिये।

   परशुराम- अच्छा तब?

   मर्यादा- तब मैं एक किनारे बैठकर रोने लगी, कुछ सूझ ही न पड़ता कि कहाँ जाऊँ, किससे कहूँ, आदमियों से डर लगता था। संध्या तक वहीं बैठी रोती रही।

   परशुराम- इतना तूल क्यों देती हो? वहाँ से फिर कहाँ गयीं?

   मर्यादा- संध्या को एक युवक ने आकर मुझसे पूछा, तुम्हारे घर के लोग खो तो नहीं गये हैं? मैंने कहा- हाँ। तब उसने तुम्हारा नाम, पता ठिकाना पूछा। उसने सब एक किताब पर लिख लिया और मुझसे बोला- मेरे साथ आओ, मैं तुम्हें तुम्हारे घर भेज दूँगा।

   परशुराम- वह आदमी कौन था?

   मर्यादा- वहाँ की सेवा-समिति का स्वयंसेवक था।

   परशुराम- तो तुम उसके साथ हो लीं?

   मर्यादा- और क्या करती ? वह मुझे समिति के कार्यालय में ले गया। वहाँ एक शामियाने में एक लम्बी दाढ़ीवाला मनुष्य बैठा हुआ कुछ लिख रहा था। वही उन सेवकों का अध्यक्ष था। और भी कितने ही सेवक वहाँ खड़े थे। उसने मेरा पता-ठिकाना रजिस्टर में लिखकर मुझे एक अलग शामियाने में भेज दिया, जहाँ और भी कितनी खोयी हुई स्त्रियाँ बैठी हुई थीं।

   परशुराम- तुमने उसी वक्त अध्यक्ष से क्यों न कहा कि मुझे पहुँचा दीजिए?

   मर्यादा- मैंने एक बार नहीं सैकड़ों बार कहा; लेकिन वह यही कहते रहे, जब तक मेला न खत्म हो जाय और सब खोयी हुई स्त्रियाँ एकत्र न हो जायँ, मैं भेजने का प्रबन्ध नहीं कर सकता। मेरे पास न इतने आदमी हैं, न इतना धन।

   परशुराम- धन की तुम्हें क्या कमी थी, कोई एक सोने की चीज बेच देती तो काफी रुपये मिल जाते।

   मर्यादा- आदमी तो नहीं थे।

   परशुराम- तुमने यह कहा था कि खर्च की कुछ चिंता न कीजिए, मैं अपना गहना बेचकर अदा कर दूँगी?

   मर्यादा- नहीं, यह तो मैंने नहीं कहा।

   परशुराम- तुम्हें उस दशा में भी गहने इतने प्रिय थे?

   मर्यादा- सब स्त्रियाँ कहने लगीं, घबरायी क्यों जाती हो? यहाँ किस बात का डर है। हम सभी जल्द से जल्द अपने घर पहुँचना चाहती हैं; मगर क्या करें? तब मैं भी चुप हो रही।

   परशुराम- और सब स्त्रियाँ कुएँ में गिर पड़तीं तो तुम भी गिर पड़तीं?

   मर्यादा- जानती तो थी कि यह लोग धर्म के नाते मेरी रक्षा कर रहे हैं, कुछ मेरे नौकर या मजूर नहीं हैं, फिर आग्रह किस मुँह से करती? यह बात भी है कि बहुत-सी स्त्रियों को वहाँ देखकर मुझे कुछ तसल्ली हो गयी।

   परशुराम- हाँ, इससे बढ़कर तस्कीन की और क्या बात हो सकती थी? अच्छा, वहाँ कै दिन तस्कीन का आनन्द उठाती रहीं? मेला तो दूसरे ही दिन उठ गया होगा?

   मर्यादा- रात-भर मैं स्त्रियों के साथ उसी शामियाने में रही।

   परशुराम- अच्छा, तुमने मुझे तार क्यों न दिलवा दिया?

   मर्यादा- मैंने समझा, जब यह लोग पहुँचाने को कहते ही हैं तो तार क्यों दूँ?

   परशुराम- खैर, रात को तुम वहीं रहीं। युवक बार-बार भीतर आते-जाते रहे होंगे।

   मर्यादा- केवल एक बार एक सेवक भोजन के लिए पूछने आया था, जब हम सबों ने खाने से इनकार कर दिया तो वह चला गया और फिर कोई न आया। मैं रात-भर जागती ही रही।

   परशुराम- यह मैं कभी न मानूँगा कि इतने युवक वहाँ थे और कोई अंदर न गया होगा। समिति के युवक आकाश के देवता नहीं होते। खैर, वह दाढ़ीवाला अध्यक्ष तो जरूर ही देखभाल करने गया होगा?

   मर्यादा- हाँ, वह आते थे; पर द्वार पर से पूछ-पूछकर लौट जाते थे। हाँ, जब एक महिला के पेट में दर्द होने लगा था तो दो-तीन बार दवाएँ पिलाने आये थे।

   परशुराम- निकली न वही बात! मैं इन धूर्तों की नस-नस पहचानता हूँ। विशेषकर तिलक-मालाधारी दढ़ियलों को मैं गुरुघंटाल ही समझता हूँ। तो वह महाशय कई बार दवाएँ देने गये? क्यों, तुम्हारे पेट में तो दर्द नहीं होने लगा था?

   मर्यादा- तुम एक साधु पर आक्षेप कर रहे हो। वह बेचारे एक तो मेरे बाप के बराबर थे, दूसरे आँखें नीची किये रहने के सिवाय कभी किसी पर सीधी निगाह नहीं करते थे।

   परशुराम- हाँ, वहाँ सब देवता ही देवता जमा थे। खैर, तुम रात-भर वहाँ रहीं। दूसरे दिन क्या हुआ?

   मर्यादा- दूसरे दिन भी वहीं रही। एक स्वयंसेवक हम सब स्त्रियों को साथ लेकर मुख्य-मुख्य पवित्र स्थानों का दर्शन कराने गया। दोपहर को लौट कर सबों ने भोजन किया।

   परशुराम- तो वहाँ तुमने सैर-सपाटा भी खूब किया, कोई कष्ट न होने पाया। भोजन के बाद गाना-बजाना हुआ होगा?

   मर्यादा- गाना-बजाना तो नहीं; हाँ, सब अपना-अपना दुखड़ा रोती रहीं। शाम तक मेला उठ गया तो दो सेवक हम लोगों को लेकर स्टेशन पर आये।

   परशुराम- मगर तुम तो आज सातवें दिन आ रही हो और वह भी अकेली?

   मर्यादा- स्टेशन पर एक दुर्घटना हो गयी।

   परशुराम- हाँ, यह तो मैं समझ ही रहा था। क्या दुर्घटना हुई?

   मर्यादा- जब सेवक टिकट लेने जा रहा था, तो एक आदमी ने आकर उससे कहा- यहाँ गोपीनाथ की धर्मशाला में एक बाबूजी ठहरे हुए हैं, उनकी स्त्री खो गयी है, उनका भला-सा नाम है, गोरे-गोरे लम्बे-से खूबसूरत आदमी हैं, लखनऊ मकान है, झबाई टीले में। तुम्हारा हुलिया उसने ऐसा ठीक बयान किया कि मुझे उस पर विश्वास आ गया। मैं सामने आकर बोली, तुम बाबू जी को जानते हो? वह हँसकर बोला, जानता नहीं हूँ तो तुम्हें तलाश क्यों करता फिरता हूँ। तुम्हारा बच्चा रो-रोकर हलाकान हो रहा है। सब औरतें कहने लगीं, चली जाओ, तुम्हारे स्वामीजी घबरा रहे होंगे। स्वयंसेवक ने उससे दो-चार बातें पूछकर मुझे उसके साथ कर दिया। मुझे क्या मालूम था कि मैं किसी नर-पिशाच के हाथों में पड़ी जाती हूँ। दिल में खुशी थी कि अब बासू को देखूँगी, तुम्हारे दर्शन करूँगी। शायद इसी उत्सुकता ने मुझे असावधान कर दिया।

   परशुराम- तो तुम उस आदमी के साथ चल दीं? वह कौन था?

   मर्यादा- क्या बतलाऊँ कौन था? मैं तो समझती हूँ, कोई दलाल था?

   परशुराम- तुम्हें यह न सूझी कि उससे कहतीं, जाकर बाबूजी को भेज दो?

   मर्यादा- अदिन आते हैं तो बुध्दि भ्रष्ट हो जाती है।

   परशुराम- कोई आ रहा है।

   मर्यादा- मैं गुसलखाने में छिपी जाती हूँ।

   परशुराम- आओ भाभी, क्या अभी सोयी नहीं, दस तो बज गये होंगे।

   भाभी- वासुदेव को देखने को जी चाहता था भैया, क्या सो गया?

   परशुराम- हाँ, वह तो अभी रोते-रोते सो गया है।

   भाभी- कुछ मर्यादा का पता मिला? अब पता मिले तो भी तुम्हारे किस काम की। घर से निकली हुई स्त्रियाँ थान से छूटी हुई घोड़ी है जिसका कुछ भरोसा नहीं।

   परशुराम- कहाँ से कहाँ मैं उसे लेकर नहाने गया।

   भाभी- होनहार है भैया, होनहार! अच्छा तो मैं जाती हूँ।

   मर्यादा- (बाहर आकर) होनहार नहीं है, तुम्हारी चाल है। वासुदेव को प्यार करने के बहाने तुम इस घर पर अधिकार जमाना चाहती हो।

   परशुराम- बको मत! वह दलाल तुम्हें कहाँ ले गया?

   मर्यादा- स्वामी, यह न पूछिए, मुझे कहते लज्जा आती है।

   परशुराम- यहाँ आते तो और भी लज्जा आनी चाहिए थी।

   मर्यादा- मैं परमात्मा को साक्षी देती हूँ, कि मैंने उसे अपना अंग भी स्पर्श नहीं करने दिया।

   परशुराम- उसका हुलिया बयान कर सकती हो?

   मर्यादा- साँवला-सा छोटे डील का आदमी था। नीचा कुरता पहने हुए था।

   परशुराम- गले में ताबीजें भी थीं?

   मर्यादा- हाँ, थीं तो।

   परशुराम- वह धर्मशाले का मेहतर था। मैंने उससे तुम्हारे गुम हो जाने की चर्चा की थी। उस दुष्ट ने उसका वह स्वाँग रचा।

   मर्यादा- मुझे तो वह कोई ब्राह्मण मालूम होता था।

   परशुराम- नहीं मेहतर था। वह तुम्हें अपने घर ले गया?

   मर्यादा- हाँ, उसने मुझे ताँगे पर बैठाया और एक तंग गली में, एक छोटे-से मकान के अंदर ले जाकर बोला, तुम यहीं बैठो, तुम्हारे बाबूजी यहीं आयेंगे। अब मुझे विदित हुआ कि मुझे धोखा दिया गया। रोने लगी। वह आदमी थोड़ी देर के बाद चला गया और एक बुढ़िया आकर मुझे भाँति-भाँति के प्रलोभन देने लगी। सारी रात रोकर काटी। दूसरे दिन दोनों फिर मुझे समझाने लगे कि रो-रोकर जान दे दोगी, मगर यहाँ कोई तुम्हारी मदद को न आयेगा। तुम्हारा एक घर छूट गया। हम तुम्हें उससे कहीं अच्छा घर देंगे जहाँ तुम सोने के कौर खाओगी और सोने से लद जाओगी। जब मैंने देखा कि यहाँ से किसी तरह नहीं निकल सकती तो मैंने कौशल करने का निश्चय किया।

   परशुराम- खैर,सुन चुका। मैं तुम्हारा ही कहना मान लेता हूँ कि तुमने अपने सतीत्व की रक्षा की, पर मेरा हृदय तुमसे घृणा करता है, तुम मेरे लिए फिर वह नहीं हो सकती जो पहले थीं। इस घर में तुम्हारे लिए स्थान नहीं है।

   मर्यादा- स्वामीजी, यह अन्याय न कीजिए, मैं आपकी वही स्त्री हूँ जो पहले थी। सोचिए, मेरी क्या दशा होगी?

   परशुराम- मैं यह सब सोच चुका और निश्चय कर चुका। आज छ: दिन से यही सोच रहा हूँ। तुम जानती हो कि मुझे समाज का भय नहीं है। छूत-विचार को मैंने पहले ही तिलांजलि दे दी, देवी-देवताओं को पहले ही विदा कर चुका; पर जिस स्त्री पर दूसरी निगाहें पड़ चुकीं, जो एक सप्ताह तक न-जाने कहाँ और किस दशा में रही, उसे अंगीकार करना मेरे लिए असम्भव है। अगर यह अन्याय है तो ईश्वर की ओर से है, मेरा दोष नहीं।

   मर्यादा- मेरी विवशता पर आपको जरा भी दया नहीं आती?

   परशुराम- जहाँ घृणा है वहाँ दया कहाँ? मैं अब भी तुम्हारा भरण-पोषण करने को तैयार हूँ। जब तक जीऊँगा, तुम्हें अन्न-वस्त्र का कष्ट न होगा। पर तुम मेरी स्त्री नहीं हो सकतीं।

   मर्यादा- मैं अपने पुत्र का मुँह न देखूँ अगर किसी ने मुझे स्पर्श भी किया हो।

   परशुराम- तुम्हारा किसी अन्य पुरुष के साथ क्षण-भर भी एकांत में रहना तुम्हारे पतिव्रत को नष्ट करने के लिए बहुत है। यह विचित्र बंधन है, रहे तो जन्म-जन्मांतर तक रहे; टूटे तो क्षण-भर में टूट जाय। तुम्हीं बताओ, किसी मुसलमान ने जबरदस्ती मुझे अपना उच्छिष्ट भोजन खिला दिया होता तो तुम मुझे स्वीकार करतीं?

   मर्यादा- वह...वह...तो दूसरी बात है।

   परशुराम- नहीं, एक ही बात है। जहाँ भावों का संबंध है, वहाँ तर्क और न्याय से काम नहीं चलता। यहाँ तक कि अगर कोई कह दे कि तुम्हारे पानी को मेहतर ने छू लिया है तब भी उसे ग्रहण करने से तुम्हें घृणा आयेगी। अपने ही दिल से सोचो कि तुम्हारे साथ न्याय कर रहा हूँ या अन्याय?

   मर्यादा- मैं तुम्हारी छुई हुई चीजें न खाती, तुमसे पृथक् रहती, पर तुम्हें घर से तो न निकाल सकती थी। मुझे इसीलिए न दुत्कार रहे हो कि तुम घर के स्वामी हो और समझते हो कि मैं इसका पालन करता हूँ।

   परशुराम- यह बात नहीं है। मैं इतना नीच नहीं हूँ।

   मर्यादा- तो तुम्हारा यह अंतिम निश्चय है?

   परशुराम- हाँ, अंतिम।

   मर्यादा- जानते हो इसका परिणाम क्या होगा?

   परशुराम- जानता भी हूँ और नहीं भी जानता।

   मर्यादा- मुझे वासुदेव को ले जाने दोगे?

   परशुराम- वासुदेव मेरा पुत्र है।

   मर्यादा- उसे एक बार प्यार कर लेने दोगे?

   परशुराम- अपनी इच्छा से नहीं, तुम्हारी इच्छा हो तो दूर से देख सकती हो।

   मर्यादा तो जाने दो, न देखूँगी। समझ लूँगी कि विधवा भी हूँ और बाँझ भी। चलो मन! अब इस घर में तुम्हारा निबाह नहीं। चलो जहाँ भाग्य ले जाय!

 

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)