हमारी कोशिश है एक ऐसी दुनिया में रचने बसने की जहाँ सत्य सबका साझा हो; और सभी इसकी अभिव्यक्ति में मित्रवत होकर सकारात्मक संसार की रचना करें।
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मंगलवार, 26 दिसंबर 2017

पाकिस्तान की विकलांग न्यायपालिका

पाकिस्तान के सबसे प्रतिष्ठित अखबार डॉन में छपे एक आलेख को पढ़कर मेरा मन दुखी हो गया। इस अभागे देश के नागरिक किस दुर्दशा के शिकार हैं यह जानकर मन काँप उठता है। भारत में रहते हुए हमने सरकार के तीन अंगो कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के बीच जो शक्ति-सन्तुलन देखा है उसकी तुलना में पाकिस्तान की भयावह स्थिति का दर्शन इस लेख में किया जा सकता है। स्तम्भकार बासिल नबी मलिक पाकिस्तान में कराची की एक वादकारी फर्म में कार्यरत हैं। मूल आलेख अंग्रेजी में है जिसका भावानुवाद यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ :-

judicial-Indपाकिस्तान में जो कुछ भी गलत हो रहा है उसके लिए यहाँ के न्यायाधीशों को दोषी ठहराना एक राष्ट्रीय खेल जैसा हो गया है। दुर्भाग्य से अभियोजन पक्ष के गलत व्यवहार, जाँच एजेन्सियों की ढीली-ढाली विवेचना और कानून में निहित कमजोरियों से लेकर कार्यपालिका की (अपराधियों से) दुरभि-सन्धि तक जो कुछ भी इस तन्त्र में गड़बड़ है उस सबके लिए पाकिस्तान के न्यायमूर्तियों को जिम्मेदार मान लिया जाता है।

न्यायाधीशों की ओर उंगली उठाने वाले यह भूल जाते हैं कि न्यायतंत्र के विशाल पहिए में न्यायाधीश सिर्फ़ एक तीली के समान हैं। इस विशाल तन्त्र में दूसरे अनेक भागीदार भी दाँव पर लगे हैं जिसमें कानून बनाने वाली विधायिका व उन्हें लागू कराने के लिए जिम्मेदार कार्यपालिका शामिल है; और हाँ, वे वकील साहब लोग तो हैं ही। इसके हर स्तर पर भयावह असफ़लता दिखायी देती है जिसका यह परिणाम है कि पूरे तन्त्र को ही लकवा मार गया है।

उदाहरण के लिए संघीय विधायिका (नेशनल असेम्बली) इस बात के लिए कुख्यात हो चुकी है कि यह (धार्मिक) अल्पसंख्यकों के साथ भेद-भाव बरतने वाले कानून ही बनाती है और जो भी उनकी आस्था है उसके अनुसार उन्हें जीवन निर्वाह करने के सभी अधिकारों से वंचित कर देती है। उसने ऐसे कानून पारित कर दिये हैं जो चुनाव लड़ने की योग्यता खो चुके नेताओं को भी किसी बड़ी पार्टी का अध्यक्ष बनने का अधिकार दे देता है। इसने ऐसे कलंकित कानून भी बना दिये हैं जो किसी हत्यारे द्वारा पीड़ित परिवार को रूपये देकर सजा से बच जाने की सुविधा देते हैं। कुछ राज्यों ने तो ऐसे कानून बना दिये हैं जिससे एक स्पष्ट राजनैतिक निष्ठा रखने वाले व्यक्ति को दुबारा सरकारी नौकरी में भी रखा जा सकता है जो पहले किसी अपकृत्य के सिद्ध होने के आधार पर पदच्युत किया जा चुका हो।

ऐसे में भले ही न्यायमूर्ति महोदय इन कानूनों से सहमत न हों लेकिन उन्हें इन कानूनों के अनुसार फैसला देना ही पड़ता है। यद्यपि उन्हें इन कानूनों के न्यायिक पुनरावलोकन का अधिकार है लेकिन इस अधिकार की अपनी सीमाएं भी हैं जो किसी न्यायाधीश को विधि-व्याख्याता के बजाय विधि-निर्माता की भूमिका निभाने से रोकती हैं।

एफ.आई.ए. (संघीय जाँच एजेन्सी) और एन.ए.बी. (राष्ट्रीय जवाबदेही ब्यूरो) जैसी अनुसन्धान संस्थाओं और यहाँ तक कि पुलिस की हालत भी अच्छी नहीं है। उनकी अयोग्यता का प्रमाण-पत्र स्वयं सुप्रीम कोर्ट दे चुका है। चाहे वह बेनजीर भुट्टो की हत्या के मामले में विवेचना के (अल्प) सामर्थ्य की बात हो, एन.ए.बी. द्वारा बड़ा माल बटोरने की लालच में अपनी दलीलों का मोलभाव करने में इसकी स्पष्ट अभिरुचि हो या इसके द्वारा आरोपी से अपराध  की फ़र्जी स्वीकारोक्ति हासिल कर लेने की कोशिश हो; ये संस्थाएं अपनी अयोग्यता या अपराधियों से साठ-गाँठ के कारण अभियोजन को नीचा दिखाने की दोषी हैं। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि अपर्याप्त सबूत के कारण न्यायाधीश आरोपी पक्ष को दोषमुक्त करने पर मजबूर हो जाते हैं।

इसके अलावा न्यायालय के फ़ैसलों को लागू कराने की जिम्मेदारी पुलिस व अन्य विधि-प्रवर्तन संस्थाओं की है। जब कोर्ट कोई फ़ैसला सुनाता है तो सरकार को उसे अनिवार्य रूप से लागू कराना चाहिए। न्यायपालिका के पास अपने फ़ैसलों को लागू कराने के लिए अपनी कोई प्रवर्तन शाखा नहीं होने के कारण उसे इसके लिए पूरी तरह कार्यपालिका पर निर्भर होना पड़ता है। यदि फ़ैसला लागू ही नहीं हो सकता तो इन आदेशों की शुचिता, न्यायपालिका की गरिमा, कानून के राज, और संस्थाओं के प्रति सम्मान में क्रमशः गिरावट आती जाएगी जिससे इसका उल्लंघन करने वालों का हौसला बढ़ता जाएगा और पीड़ित पक्ष हताश हो जाएगा।

दुर्भाग्य से (पाकिस्तान में) यही सब हो रहा है। आये दिन न्यायाधीश फ़ैसले सुनाते हैं – भू-माफ़िया के खिलाफ, धोखेबाज बिल्डरों के खिलाफ, कोर्ट के आदेशों की अवमानना करने वालों के खिलाफ़ और दूसरे बदमाशों के खिलाफ़। लेकिन, इन फ़ैसलों को लागू करने में प्रवर्तन एजेन्सी के सहयोग की कमी के कारण ये निष्प्रभावी हो जाते हैं या बहुत देर से लागू होने के कारण इन फ़ैसलों का उद्देश्य पूरा नहीं हो पाता।

इसके साथ ही यहाँ का वृहत्तर न्यायतन्त्र उन वकीलों के ऊपर पलता है जो न सिर्फ़ अपने मुवक्किल की पैरवी करते हैं बल्कि एक विरोधाभास के रूप में कोर्ट के भी अधिकारी होते हैं। किसी भी मुकदमें में सही कानूनी स्थिति तक पहुँचने के लिए कोर्ट की मदद करना और उसके फ़ैसले को अंगीकृत करना उनकी जिम्मेदारी होती है। इसके लिए उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे न्यायाधीश के सामने भली-भाँति अध्ययन करने के बाद सटीक कानूनी तर्क प्रस्तुत करें, अपने मुवक्किल को कानून का पालन करने की सीख और सलाह दें और यह भी कि यदि उनके या उनके मुवक्किल के खिलाफ़ कोई फ़ैसला हो जाता है तो उसे निष्फल करने की कोशिश न करें।

लेकिन सच्चाई इससे बिल्कुल अलग है। पाकिस्तान में वकील समुदाय के भीतर भाँति-भाँति के लोग पाये जाते हैं जिसमें वे भी शामिल हैं जो खुलेआम कानून के राज को धता बताने में (अपराधियों का) साथ देते रहते हैं। वे अपने मुवक्किल को कानून तोड़ने में मदद करके ऐसा कर सकते हैं, कोर्ट के समक्ष गलत प्रतिवेदन प्रस्तुत करके अपने मुवक्किल के लिए फ़ायदे का इन्तजाम कर सकते हैं, जमानत नहीं मिल पाने पर अपने मुवक्किल को न्यायालय-कक्ष से भाग जाने में मदद कर सकते हैं, अथवा मनमाफ़िक फ़ैसला पाने के लिए जज को डराने-धमकाने की चाल चल सकते हैं। यदि और कुछ नहीं तो वे अपने मुवक्किल को कोर्ट के आदेश की अवहेलना करने की सलाह ही दे सकते हैं, उनसे यह कह सकते हैं कि न्यायालय की अवमानना के दोष को बाद में एक माफ़ीनामा देकर खत्म किया जा सकता है।

संक्षेप में कहें तो वर्तमान न्याय-व्यवस्था की वर्तमान दुरवस्था के लिए केवल न्यायाधीशों को दोषी ठहराना उचित नहीं है। यदि न्यायपालिका को अधिक सुदृढ और शक्तिसम्पन्न बनाना है तो सभी पक्षों को साथ मिलकर काम करते हुए इन न्यायाधीशों का सहयोग और समर्थन करना होगा। इस प्रकार के तालमेल और ऐसी एकता के बिना पाकिस्तान में दूसरी सभी बातों की तरह ही ये न्यायाधीश भी जनता से सरोकार रखने वाले एक प्रभावी और न्यायपूर्ण तन्त्र की तलाश में धीरे-धीरे घिसटते हुए सैनिकों की एक अकेली पड़ गयी टुकड़ी की तरह इतिहास की गर्त में समा जाएंगे।

अनुवाद एवं प्रस्तुति : सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
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बुधवार, 29 जून 2016

साइकिल के साथ तैराकी का लुत्फ़

रायबरेली के नेहरू स्टेडियम में स्विमिंग पूल चालू हुआ तो मैंने अपनी साइकिल से सैर का कार्यक्रम इस तरण-ताल से जोड़ दिया। पिछले महीने भर से मेरी रायबरेली में सुबह की चर्या प्रायः एक जैसी हो गयी है। अब साइकिल से इधर-उधर घूमने के बजाय मैं तैराकी की तैयारी से निकलता हूँ, जेलरोड से चलकर स्टेडियम तक साइकिल से जाता हूँ। रास्ते में रोज ही वही चेहरे दिखायी देते हैं। बुजुर्ग और प्रौढ़ टहलते हुए, सड़क किनारे बने झोंपड़ों की औरतें घर के सामने झाड़ू-बुहारू और बर्तन मांजते हुए, घोषियों के बाड़े में गायों और भैंसों की सेवा में लगी लड़कियाँ और औरतें गोबर निकालती हुई और पुरुष दूध दुहते हुए, अपने डिब्बों के साथ कुछ लोग दूध नपवाने की प्रतीक्षा करते हुए और चाय की दुकान वाले भठ्ठी में कोयला भरते और आग सुलगाते हुए मिलते हैं।
सड़क की पटरी पर कुछ छोटी झोपड़ियां ऐसी भी हैं जिनके बाहर पड़ी खटिया पर कुछ बच्चे-बच्चियां और मर्द गहरी नींद में सोये मिलते हैं जैसे रात में गर्मी और ऊमस ने सोने न दिया हो और भोर की ठंडी हवा मिलने के बाद चैन की नींद आयी हो। खटिया के पास ही घर की औरत जमीन पर बैठकर सब्जी काटती या खाना बनाने की तैयारी करती दिख जाती है। एक दो तांगे भी मुंह ऊपर किए खड़े नज़र आते हैं जिनमें जुतने वाले घोड़े या घोड़ियां छुट्टा घूमते और जेल के सामने वाली खाली जमीन में घास चरते दिख जाते हैं। इन्हीं झोपड़ियों के सामने कुछ ठेले भी खड़े मिलते हैं जिनपर चमकदार सजावट और रंगीन बोतलें देखकर लगता है कि ये शहर के अलग अलग नुक्कड़ों पर रंगीन बर्फ़ वाला पानी, शर्बत और दूसरी चीजें बेचने के लिए जाते होंगे।
पेट्रोल पंप से आगे बढ़ने पर साई के स्पोर्ट्स हॉस्टल के प्रांगण में बने चबूतरे पर कुछ बुजुर्ग योग और प्राणायाम करते दिख जाते हैं तो स्टेडियम के गेट से लडके-लड़कियाँ, औरतें और मर्द अपने-अपने स्वास्थ्य की जरूरतों व पसंद के हिसाब से दौड़ने, टहलने, गप्पें लड़ाने, टाइम पास करने, हवा खाने या क्रिकेट, बैडमिंटन, वॉलीबॉल, फुटबॉल, हॉकी आदि खेलने के लिए आते या वापस जाते मिल जाते हैं। मैं अपनी साइकिल लेकर जब भी गेट के भीतर घुसता हूँ तो बैडमिंटन कोर्ट के सामने कोई न कोई साथी मिल जाता है। 
मुस्कान और अभिवादन के बाद सीधे स्विमिंग पूल के चैनेल गेट की और बढ़ जाता हूँ- रोज यह सोचता हुआ कि स्टेडियम के भीतर की यह सड़क जो अब गढ्ढों में बिखरे कंकड़-पत्थर के ढेर में तब्दील हो चुकी है वह कब किसी विकास योजना की कृपा प्राप्त करेगी। इस सड़क की दोनो तरफ अशोक के पेड़ जो बत्तीस साल पहले यहाँ के चौकीदार/चपरासी/माली रामनरेश ने लगाये थे वे बढ़कर आसमान से बातें करने लगे हैं, लेकिन सड़क का निरंतर ह्रास होता गया है। प्रकृति की देखभाल पाकर पेड़ों ने तो आसमान छू लिया लेकिन मनुष्य के भरोसे रहने वाली सड़क उसका भार ही ढोती रही और दुर्दशा से ग्रस्त हो गयी।

तरण ताल का निर्धारित समय साढ़े-पाँच से साढ़े-छः का है लेकिन मैं पन्द्रह-बीस मिनट देर से ही पहुँचता हूँ। वहाँ पहले से शुरू कर चुके ढेर सारे किशोरों और बड़ी उम्र के शौकिया तैराकों के बीच डाइव लगाकर पहुँचता हूँ और हरे पानी से भरे ताल में तैरने का अभ्यास करता हूँ। कोच की सीटी बजने के बाद सभी बाहर निकलते हैं। सबसे अंत में मैं निकलता हूँ ताकि बाथरूम में धक्का-मुक्की से बचा रहूँ।
आज-कल मानसून की पहली बारिश के बाद मौसम सुहाना लगने लगा है। धूल, गर्मी और पसीने से राहत मिल गयी है और घर से बाहर निकलना अच्छा लग रहा है। आज जब हमलोग तैर रहे थे तो आसमान में अचानक काले बादलों का एक पहाड़ ऊपर से गुजरा। लगभग अँधेरा छा गया। कुछ बच्चे तो चिल्ला-चिल्लाकर कहने लगे- कोच अंकल, लाइट जलवा दीजिए। लेकिन दो-तीन मिनट में ही हवा ने बादलों को परे धकेल दिया और रोशनी बढ़ गयी। एक बच्चे का जन्मदिन भी मनाया जा रहा था। बेचारे को पूल में सभी तंग कर रहे थे। फिर फोटुएं भी खींची गयीं।

आज जब मैं तैराकी के बाद बाथरूम में घुसा तो अगले बैच के बच्चे तैराकी के लिए जमा हो चुके थे। कोच द्वारा उनसे तैराकी के पहले कुछ वार्मअप एक्सरसाइज करायी जा रही थी। लेकिन दो तीन बच्चे बाथरूम एरिया में छिपे हुए कानाफूसी कर रहे थे। उनका आशय यह था कि अभी कसरत से बचा रहा जाय और जब पानी में उतरने की बारी आये तब बाहर निकला जाय। मैं यह हरकत भी प्रायः रोज देखता रहा हूँ। आज मैंने कोच को बता दिया। कोच ने उन बच्चों को डांटा और पूल का चक्कर तो लगवाया ही, मुझे बताया कि उनमें से एक के पापा यह शिकायत भी कर रहे थे कि दो महीने से तैरने के बावजूद उसका वजन क्यों नहीं घट रहा है।
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी) www.satyarthmitra.com

शनिवार, 31 मई 2014

कितना रौशन रौशन उसका चेहरा है

चुनावी कार्यक्रम की जिम्मेदारियों से निवृत्त होने के बाद तरही नसिश्त के संयोजक से मुलाकात हुई। उन्होंने कहा कि अगली बैठक में तो आना ही पड़ेगा। मैंने पूछा मिसरा क्या है तो बोले – “कितना रौशन-रौशन उसका चेहरा है।” फिर क्या था मेरे भीतर शायरी का कीड़ा कुलबुलाने लगा। इसके बाद जो कुछ अवतरित हुआ है वह आपकी नज़र करता हूँ :

कितना रौशन रौशन उसका चेहरा है

(भाग-१)

कितना रौशन रौशन उसका चेहरा है
बैठा उस पर काले तिल का पहरा है

आँखें अपलक देख रहीं हैं सूरत को
दिल भी मेरा उसी ठाँव पर ठहरा है

प्यारी सूरत से ही प्यार हुआ है जो
प्यार का तूने सीखा नहीं ककहरा है

जिसने सूरत से बेहतर सीरत समझा
उसके सर पर सजता सच्चा सेहरा है

चक्कर खा गिर पड़े अचानक अरे मियाँ
बस थोड़ा सा उसका आँचल लहरा है

 

(भाग-२)

वह पुकारती रही सांस थम जाने तक
उसे पता क्या यह निजाम ही बहरा है

अच्छे दिन आने की आस लगी मुझको
मुस्तकबिल उनके संग बड़ा सुनहरा है

वो आये तो अन्धकार मिट जाएगा
ऐतबार इस चमत्कार पर गहरा है

नौजवान उठ खड़ा हुआ तो ये समझो
छंटने वाला बदअमनी का कोहरा है

जिसके सर तोहमद है कत्लो गारद की
गुनहगार वो असल नहीं बस मोहरा है

बदल गयी है बात चुनावी मौसम की
राजनीति का यह चरित्र ही दोहरा है

बैरी ने हमको जब भी ललकारा है
उसके सर पे सदा तिरंगा फहरा है

 

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
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सोमवार, 31 मार्च 2014

वोट नहीं डालोगे तो लानत है तुमपर

  आगामी लोकसभा चुनावों की सबसे उत्साहजनक तस्वीर यह होने जा रही है कि इस बार वोट देने वालों की संख्या अबतक की सर्वाधिक होगी। जनसंख्या वृद्धि इसका एक कारण तो है ही लेकिन मैं जिस वृद्धि की बात कर रहा हूँ वह मतदान प्रतिशत की है; जो इस बार पिछले सारे रिकार्ड तोड़ने वाला है।

SVEEP Poster1अभी तक होता यह रहा है कि मतदाता सूची में जितने लोगों का नाम होता था उसमें से आधे से कुछ ही अधिक लोग वोट डालते थे, शेष या तो उस स्थान पर रहते ही नहीं थे या रहते हुए भी वोट डालना बेकार का काम समझते थे। इसका कुफल यह हुआ कि राजनीतिक दलों ने अपनी जीट के लिए पन्द्रह से बीस प्रतिशत मतदाताओं को खुश करने के आसान फॉर्मूले खोजने शुरू कर दिए। जाति और धर्म के आधार पर गोलबन्दी होने लगी, अगड़े-पिछड़े-दलित-अल्पसंख्यक वर्ग के लोग अपनी जातीय या सांप्रदायिक पहचान के आधार पर एकजुट होकर अपने को एक वोटबैंक के रूप में देखने लगे और प्रत्याशियों को चुनने के लिए उनकी जातीय या सांप्रदायिक पहचान को अपने मत का आधार बनाने लगे।

इसका परिणाम यह हुआ कि संकीर्ण क्षेत्रीयता और जातीयता का पोषण करने वाली पार्टियों को चुनावों में सफलता मिलने लगी और सत्ता मिलने के साथ ही एक नये प्रभु वर्ग का उदय हो गया जिसके बारे में घोटालों और भ्रष्टाचार की खबरे ज्यादा और जनहित के लिए काम करने की बातें कम सुनायी देती रहीं। हमारी चुनावी पद्धति ऐसी है कि प्रत्याशी को जीत के लिए आधे वोटों की भी जरूरत नहीं पड़ती इसलिए वह सच्चे बहुमत के बारे में सोचने की जरूरत ही नही समझता।

SVEEP Posterभारत के चुनाव आयोग ने ठीक ही अपना कर्तव्य समझा कि सच्चे अर्थों में लोकतंत्र तभी स्थापित होगा जब वास्तव में बहुमत से चुने हुए प्रतिनिधि देश की संसद और विधान सभाओं में जायें। इसके लिए एक सुविचारित रणनीति बनायी गयी है। यह एक कोशिश है देश की जनता को जगाने की, यह समझाने की कि वोट देना कितना जरूरी है। देश के प्रत्येक वयस्क नागरिक को यह कर्तव्यबोध कराने की कि दुनिया का तथाकथित सबसे बड़ा लोकतंत्र असफल हो जाएगा यदि देश की जनता के आलस्य और उदासीनता के कारण दोयम दर्जे के नेता देश की बागडोर सम्हालते रहेंगे।

इस अभियान की सफलता के लिए युद्ध स्तर पर प्रयास किये गये हैं। यह सुनिश्चित किया जाना है कि देश का संविधान जिस व्यक्ति को वोट देने का अधिकार देता है वह इस अधिकार का प्रयोग भी जरूर करे। इस अभियान को नाम दिया गया है– स्वीप; अर्थात्‌ Systematic Voters’ Education and Electoral Participation (SVEEP).

चुनाव आयोग ने यह महसूस किया कि देश की जनता को उसके मताधिकार के प्रति जागरूक करना जितना जरूरी है उससे ज्यादा जरूरी यह है कि वोट डालने की राह में आने वाली उन सभी बाधाओं को दूर किया जाय जो जागरूक वोटर को भी पोलिंग बूथ तक जाने से रोकती हैं।

देश के एक आम नागरिक को मतदाता के रूप में जो ज्ञान रखना चाहिए और वह वास्तव में जितना जानता है  इन दोनो में बड़ा अन्तर है। इस अन्तर को पाटने के लिए आयोग ने गंभीर प्रयास किये हैं। मतदाता पंजीकरण कैसे होगा, फोटोयुक्त मतदाता पहचान पत्र (EPIC) कैसे बनेगा, दूसरे पहचान-पत्र क्या हो सकते है, आपका मतदान केन्द्र कहाँ है, बूथ कौन सा है, ई.वी.एम. का प्रयोग कैसे करना है, चुनाव के दिन क्या करना है और क्या नहीं करना है, प्रत्याशी के लिए आदर्श आचार संहिता क्या है, धन-बल का प्रयोग करने वालों की क्या दवा है, समाज के कमजोर और असहाय तबकों का चुनाव के दौरान भयादोहन कैसे किया जा सकता है, और इसे रोकने  क्या उपाय हैं; इन सभी प्रश्नों का समुचित उत्तर बताने के लिए चुनाव आयोग ने बाकायदा एक कार्य योजना बनाकर जिम्मेदार अधिकारियों की फौज इसके क्रियान्वयन के लिए लगा रखी है।

आयोग ने कम मतदान प्रतिशत के लिए मोटे तौर पर जिन कारणों की पहचान की है वे हैं- त्रुटिपूर्ण व अधूरी मतदाता सूची, शहरी वर्ग की उदासीनता, लैंगिक विभेद, युवाओं की बेपरवाही इत्यादि। इनके निवारण के लिए मतदाताओं को शिक्षित करने, जागरूक करने और चुनाव संबंधी प्रशासनिक तंत्र को दक्ष बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाये गये हैं।

SVEEP Poster2 मतदाता सूची में अनेक फर्जी और गैरहाजिर लोगों के नाम भरे रहते थे जिन्हें गहन समीक्षा करते हुए निकाल दिया जा रहा है, घर से बाहर रहकर रोजी-रोटी कमाने वालों या सरकारी नौकरी करने वालों का नाम गाँव की सूची से निकालकर उनके सामान्य निवास के स्थान पर जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। ऑनलाइन पंजीकरण की सुविधा तो है ही, सभी बूथॊं के लिए स्थानीय रूप से उपलब्ध एक-एक समर्पित कर्मचारी (BLO) की नियुक्ति करके उसे जिम्मेदारी दी गयी है कि वह उस बूथ से संबंधित मुहल्लों में घर-घर जाकर वैध मतदाताओं की सूची तैयार करेगा, उनके पंजीकरण का फॉर्म भरवाएगा, जो मर चुके हैं या कहीं बाहर चले गये हैं उनका नाम सूची से हटवाएगा और वैध व सच्ची मतदाता सूची तैयार करेगा। इस प्रकार तैयार की गयी अद्यतन सूची की प्रतियाँ बूथ के नोटिस बोर्ड पर लगायी जाएंगी, मतदाताओं की चौपाल लगाकर मतदाता सूची को त्रुटिरहित बनाया जाएगा।

सभी मतदाताओं का फोटोयुक्त पहचानपत्र तैयार कराकर घर-घर ले जाकर प्राप्त कराने तक की जिम्मेदारी इस बी.एल.ओ. को दी गयी है। अपने बूथ के प्रायः सभी मतदाताओं को यह व्यक्तिगत रूप से पहचान सकेगा। मतदान के दिन से तीन-चार दिन पहले ही सभी मतदाताओं को वोटर-पर्ची बनाकर उनके घर पर दे आने का जिम्मा भी यह कर्मचारी उठाएगा। अब पार्टियों की स्टॉल लगाकर पर्ची बाँटने के काम से छुट्टी कर दी गयी है।

लाखों की संख्या में जो सरकारी कर्मचारी, पुलिस और अर्द्ध सैनिक बलों के लोग चुनाव की ड्यूटी होने के कारण अपना वोट नहीं डाल पाते थे उनका वोट भी हर हाल में डलवाने की व्यवस्था कर ली गयी है। पोस्टल बैलेट से लेकर ड्यूटी वाले बूथ पर ही उनका वोट डलवाने के विकल्प खोले गये हैं। यह अभियान ‘पल्स पोलियो अभियान’ या ‘सर्व शिक्षा अभियान’ की याद दिलाता है जिसका नारा है- “एक भी बच्चा छूटने न पाये।” चुनाव आयोग भी चाह रहा है कि “एक भी वोटर छूटने न पाये।”

चुनाव आयोग मानो कह रहा है कि हे वोटर महोदय, इतनी कृपा कीजिए कि बूथ तक पहुँचकर अपना वोट डाल दीजिए। लोकतंत्र के मंदिर में वोटर को भगवान बनाने की यह मुहीम रंग लाने वाली है। प्रिन्ट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में, बौद्धिक सेमिनारों में और गाँव-गाँव की गली-गली तक इस संदेश को पहुँचाने की पुरजोर कोशिश की जा रही है। यह सब देखकर बस यही कहने का मन करता है कि इसके बावजूद यदि आप अपने मताधिकार का प्रयोग नहीं करते हैं तो लानत है।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

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सोमवार, 16 दिसंबर 2013

दहलीज़ पे बैठा है कोई दीप जलाकर (तरही ग़जल)

इस मिसरे को तरही ग़जल के लिए तय करने वाले उस्ताद शायर ने इसके मीटर की कई बारीकियाँ नोट करायी थीं, जो मुझे भूल गयीं। सच कहूँ तो वह सब मुझे समझ में ही नहीं आया था। मुशायरे की तय तारीख नजदीक आने की याद दिलायी गयी तो मैंने अपनी फेसबुक टाइमलाइन खोलकर देखा और यह ग़जलनुमा कविता/ तुकबन्दी रच डाली। प्यार-मोहब्बत की ‘बातें करने’ में थोड़ा कमजोर हूँ; बल्कि प्यार मोहब्बत ही कर लेना बेहतर समझता हूँ इसलिए मुझे पूरा शक है कि उस मुशायरे में पता नहीं दाद मिले या न मिले। ऐसी स्थिति में यहाँ इस पृष्ठ का नियंत्रक होने का लाभ तो उठा ही सकता हूँ; तो पेश है मेरी ताजा रचना :

(पुनश्च : बड़े भाई सतीश सक्सेना जी और नवगीतकार ओमधीरज जी की सलाह  पर संशोधित/ संपादित/ परिवर्द्धित।)

दहलीज़ पे बैठा है कोई दीप जलाकर

(१)

लो बोल गया काग भी मुंडेर पे आकर
परदेस से लौटेगा कोई आज कमाकर

गौरैया चहकती रही अब सांझ ढल गयी
दहलीज़ पे बैठा है कोई दीप जलाकर

बेफिक्र हुए सो रहे अपने घरों में हम
मुस्तैद है सरहद पे कोई जान लगाकर

मासूम ने आंचल का किनारा पकड़ लिया 
वह लोरियाँ सुनाये प्रेम गीत भुलाकर

दस्तक हुई वो आ गये माँ ने बिठा लिया
तहज़ीब से रुक जाय सिमट जाय लजाकर

बस चंद रोज़ फैलेगी जीवन में चाँदनी
बस चंद रोज़ चमकेगा आंगन में दिवाकर

रह जाएगी फिर साथ में बैरन सी अमावस
उस नौकरी सौतन के साथ बैठ न जाकर

(२)

दंगों में मुलव्विस रहे जो लोग मुसल्सल
अब सुर्खियाँ बटोरते इमदाद दिलाकर

क्या खूब तमाशा किया जनता के वोट ने
वो फर्श पे अब आ गये हैं अर्स गँवाकर

जब आप को सरकार बनाना ही नहीं था
नाहक में लिया वोट बेवकूफ़ बनाकर

ये शर्त है या गर्त में जाने का है पैग़ाम
वो पूछ रहे आप की चिठ्ठी को दिखाकर

वो दिन हवा हुए जो बिकाऊ थे रहनुमा
उलटी बही बयार है इस दौर में आकर

इस गहरी मोहब्बत से यूँ न देख मेरे यार
रोका है अदालत ने इसे जुर्म बताकर

हर एक ने अपना अलग बनाया लोकपाल
“सत्यार्थमित्र” देख रहे आस लगाकर

 

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी 
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रविवार, 12 फ़रवरी 2012

आशा जगाती एक सार्थक पहल (KGBV)

भारत सरकार या उत्तर प्रदेश सरकार की चर्चा आजकल अच्छे संदर्भ में कम ही हो रही है। टू-जी स्पेक्ट्रम से लेकर काले धन की चर्चा हो या भ्रष्ट मंत्रियों के चुनाव से पूर्व बर्खास्तगी से लेकर एन.आर.एच.एम. घोटाले की जाँच का मामला हो; रोज ही हम सरकारी महकमे की एक खराब छवि ही देखते-गुनते रहते हैं। ऐसे में तमाम अच्छी बातें लोगों तक नहीं पहुँच पाती जो सरकार के माध्यम से चलाये जा रहे कार्यक्रमों से संभव हो रही हैं। कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालय (KGBV)  की योजना एक ऐसी ही लाभकारी योजना है जो अनेक परिवारों में फैली गरीबी, कुपोषण, अशिक्षा और पिछड़ेपन की व्याधियों से ग्रस्त लड़कियों के जीवन का अंधकार एक साथ दूर करने में चमत्कारिक रूप से सक्षम है।

प्राथमिक शिक्षा को संविधान में मौलिक अधिकार का दर्जा मिल जाने के क्रम में भारत सरकार द्वारा सबके लिए अनिवार्य शिक्षा का अधिनियम पारित कर दिये जाने के बाद इस योजना के अंतर्गत अधिकाधिक आवासीय विद्यालय खोले जाने का काम किया जा रहा है। दस से चौदह वर्ष की गरीब निराश्रित लड़कियों को स्कूली शिक्षा के साथ-साथ उनके पालन-पोषण की जिम्मेदारी भी सरकार द्वारा उठायी जा रही है। उन्हें स्कूल के हॉस्टेल में सरकारी खर्चे पर रखा जाता है। उनका भोजन, कपड़ा, बिस्तर, साबुन, तेल, टूथब्रश, मंजन सबकुछ सरकार के खर्चे पर उपलब्ध कराया जाता है। प्रशिक्षित वार्डेन और शिक्षिकाओं द्वारा न सिर्फ़ उनको उनकी कक्षा का पाठ्यक्रम पढ़ाया जाता है बल्कि उनके व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास के लिए खेल-कूद, गीत-संगीत, कला-संस्कृति, रोजगारपरक प्रशिक्षण इत्यादि की व्यवस्था भी सरकार द्वारा की जाती है।

यह सबकुछ होता है भारत सरकार द्वारा वित्त पोषित और प्रदेश सरकारों द्वारा चलाये जा रहे ‘सर्व शिक्षा अभियान’ के अंतर्गत। सर्व शिक्षा अभियान परियोजना पर यूँ तो हजारो करोड़ रूपये खर्च हो रहे हैं जिनसे प्राथमिक शिक्षा का ढाँचा विकसित करने, शिक्षकों व शिक्षामित्रों की नियुक्ति करने, स्कूलों के भवन बनवाने व अन्य स्थापना सुविधाएँ जुटाने का काम हो रहा है, लेकिन समाज के सबसे पिछड़े वर्ग के लिए जो उपादेयता ‘कस्तूरबा विद्यालय’ की है वह कहीं और नहीं। एक लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा इस विद्यालय मे आकर साकार रूप लेती दिखती है।

हाल ही में मैं भारत सरकार की ओर से गठित एक अध्ययन टीम के सदस्य के रूप में राजस्थान के एक ऐसे ही कस्तूरबा विद्यालय (KGBV) को देखने गया। वहाँ रहने वाली बच्चियों को देखकर लगा कि सरकार ने वास्तव में बहुत ही सार्थक योजना का प्रारम्भ किया है।

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हमने स्कूल और छात्रावास के सम्मिलित प्रांगण में लगभग दो घंटे बिताया। वहाँ की छात्राओं, शिक्षिकाओं व अन्य कर्मचारियों से बात की। निश्चित रूप से हमारे वहाँ जाने की पूर्व सूचना उन्हें थी; और उन्होंने इस बावत विस्तृत तैयारी भी कर रखी थी; लेकिन हमने सच्चाई जानने के लिए छात्राओं से अलग से भी बात किया। कर्मचारियों से सवाल पूछे। सूक्ष्म निरीक्षण करते हुए प्रांगण के कोने-कोने में गये। रसोई घर से लेकर क्लासरूम तक और हॉस्टल के हॉलनुमा कमरों से लेकर आँगन में बने छोटे से मंदिर तक। कम संसाधनों के बावजूद सबकुछ यथासम्भव सुरुचिपूर्वक ढंग से व्यवस्थित किया गया था। सामान्य मानवीय कमजोरियाँ तो सबजगह होती हैं लेकिन उनके बावजूद वहाँ जाकर हमें बड़ा संतोष मिला। प्रायः निराश्रित लायी गयी उन लड़कियों को इस शिक्षा मंदिर के प्रांगण में हँसते-खिलखिलाते, उछलते-कूदते, जीवन के पाठ सीखते और शिक्षा का प्रकाश बटोरते देखकर हम धन्य हुए।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

मंगलवार, 11 जनवरी 2011

क्या अखबार का पाठक चिरकुट है…?


राष्ट्रीय संगोष्ठी में बहस का मुद्दा बना एक प्रबंध संपादक का बयान

देश की प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के प्रतिनिधि इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में जुटे थे। विश्वविद्यालयों में पत्रकारिता की शिक्षा देने वाले प्रोफ़ेसर, बड़े अखबारों के संपादक और न्यूज चैनेल्स के एंकर सिर जोड़कर वर्धा विश्वविद्यालय के पत्रकारिता के छात्रों और अकादमिकों को मीडिया की असली दुनिया से परिचित करा रहे थे। मिशनरी पत्रकारिता पर बहस चल रही थी। मीडिया द्वारा मिशन छोड़कर व्यावसायिकता की ओर मुड़ जाने पर चिंता व्यक्त की जा रही थी। मीडिया और राडिया के अंतर्सम्बन्ध खंगाले जा रहे थे। तभी एक प्रतिष्ठित अखबार के प्रबंध संपादक ने यह मंतव्य रखा कि जब एक साबुन की टिकिया के लिए लोग अपना अखबार बदल देते हैं तो उनसे प्रतिबद्धता की उम्मीद क्या की जाय। दो-ढाई रूपये देकर क्या उन्होंने अखबार के मालिक को खरीद लिया है जो उससे मिशन और नैतिकता की अपेक्षा करते हैं?

पाठकों को उक्त प्रकार से चिरकुट बताने से पहले उन्होंने पत्रकारों को भी उनकी औकात बताने की कोशिश की। बोले- आप इस भ्रम में मत रहिएगा कि यह राज-काज आपके भरोसे चल रहा है। आपकी स्थिति उस छिपकली जैसी है जो छत से चिपककर यह भ्रम पाल बैठी है कि इसे उसी ने रोक रखा है; या हाथी की पीठ पर बैठी उस मक्खी की तरह है जो उसे छोड़कर अकेले जंगल में इसलिए नहीं जाने देती कि उसके बिना इसकी (हाथी की) रक्षा नहीं हो सकेगी।

उनके पहले के वक्ताओं ने “मिशनरी पत्रकारिता- संदर्भ और प्रासंगिकता” नामक विषय पर बोलते हुए देश में लगातार बढ़ रहे भ्रष्टाचार, माफ़ियागीरी, घोटालों, इत्यादि के परिप्रेक्ष्य में मीडिया की भूमिका पर अनेक सुंदर व्याख्यान दिए थे और भविष्य के मीडियाकर्मियों को उनकी बढ़ती जिम्मेदारियों का बोध कराने का प्रयास किया था। चहुँओर निराशा के घने बादलों के बीच आशा का एक मात्र सूरज समाज के चौथे स्तंभ को बताया गया था। तब प्रबंध सम्पादक जी ने अपनी बात की शुरुआत एक रोचक कहानी से की थी-

बताने लगे- एक वृद्ध मौलवी लैंप पोस्ट के नीचे सड़क पर बहुत देर से कुछ ढूँढ रहा था।  एक नौजवान को उसकी परेशानी देखी नहीं गयी। सहायता करने की गर्ज़ से पूछा- बाबा क्या खोज रहे हो?

“बेटा, मैं अपनी टोपी सी रहा था, अचानक सुई हाथ से गिर गयी। वही ढूँढ रहा हूँ लेकिन मिल नहीं रही है” मौलवी ने तफ़सील से बताया।

“अच्छा बताइए टोपी कहाँ सिल रहे थे और सूई ठीक कहाँ गिरी? मैं खोजता हूँ।” युवक ने सहानुभूति दिखायी।

“बेटा सुई तो मस्ज़िद में गिरी थी लेकिन वहाँ बहुत अंधेरा है इसलिए यहाँ रोशनी में ढूँढ रहा हूँ।”

हाल में ठहाका लगना तय था ही। तालियाँ थमीं तो उक्त वक्ता ने बताया कि आज यहाँ की चर्चा भी कुछ इसी प्रकार की हो रही है। समस्या की असली जड़ जहाँ है उसे कोई नहीं देखना चाहता। सबका समाधान मीडिया से कराना चाहता है। देश की सरकारें भ्रष्ट है, संसद अपना काम नहीं कर पा रही। न्यायालय भी संदेह से परे नहीं रह गये हैं। उद्योगपति तेजी से अपना पैसा बढ़ा रहे हैं। गुप्त गठबंधन हो रहे हैं। हर आदमी लाभ कमाने के उद्यम में लगा है, लेकिन मीडिया को नैतिकता और मिशन का पाठ पढ़ाया जाता है। जब हम मीडिया में प्रोफ़ेशनलिज़्म की बात करते हैं तो इसे गाली समझा जाता है। आजादी से पहले अखबारों ने एक मिशन के साथ काम किया था- देश को गुलामी से मुक्त कराने का मिशन। लेकिन आज स्थिति वैसी नहीं है। आज यह अन्य प्रोफेशन्स की तरह एक पेशा के रूप में क्यों नहीं पहचाना जाना चाहिए? अख़बार या टीवी चैनेल का जो मालिक करोड़ो रुपये का पूँजी निवेश करता है उसे लाभ कमाने के बारे में क्यों नहीं सोचना चाहिए? मात्र दो रूपये में चालीस पृष्ठ का अखबार आपके दरवाजे पर पहुँचाने का प्रबंध करने वाला अखबार मालिक आपके बारे में कितना सोचे जब आप दो रुपये की साबुन की टिकिया पाने के लिए अपना वर्षों पुराना अखबार बदल देते हैं। आपकी कोई प्रतिबद्धता नहीं है तो अखबार चलाने वालों से आप क्या अपेक्षा रखते हैं?

उन्होंने अखबार पहुँचाने वाले हॉकर के प्रति पाठकों के रूखे व्यवहार का वर्णन भी किया कि कैसे वह विपरीत मौसम में भी सुबह छः बजे घर पर अखबार पहुँचाता है और कभी देर हो जाने पर सुबह की चाय का स्वाद खराब कर देने का दोषी बन जाता है। बिना नागा किए तीस दिन अखबार देने के बाद जब वह पैसा लेने पहुँचता है तो महानुभावों को  ‘आज नहीं कल’ का जवाब देते देर नहीं लगती। “ऐसे लोग जब बिना जाने समझे अखबार के मालिक, अखबार के सम्पादक और अखबार के रिपोर्टर पर आरोप लगाते हैं तो मुझे आपत्ति होती है।”

कोई भी व्यवसाय जब प्रारम्भ किया जाता है तो उसकी प्रगति का लक्ष्य निर्धारित किया जाता है। लाभ कमाना एक सर्वमान्य लक्ष्य है। उसके लिए जरूरी उपाय तलाशे जाते हैं और उन्हें अपनाया जाता है। स्वतंत्रता मिलने के बाद पत्रकारिता भी किसी अन्य  व्यवसाय की तरह कुछ लक्ष्यों की पूर्ति के उद्देश्य से आगे बढ़ी। समय के साथ तालमेल बिठा कर चलने वाले सफल हुए। यह कार्य आज भी एक मिशन बना हुआ है, लेकिन इसका स्वरूप बदल गया है। आज पत्रकारिता ‘स्वांतः सुखाय’ नहीं है।

धारा प्रवाह बोलते हुए उन्होंने एक-दो और चुटकुले और आख्यान सुनाये और बोले- यह अजीब स्थिति है कि प्रायः सभी पत्रकार अपने प्रबंधन को कोसते रहते हैं। उनके अनैतिक कार्यों और शोषक प्रवृत्तियों का रोना रोते हैं। लेकिन वे ही जब स्वयं प्रबंधक अर्थात्‌ मालिक बन जाते हैं तो वे सारी मिशनरी बातें हवा हो जाती हैं और वे सभी बुराइयाँ अपना लेते हैं जिन्हें कोसते इनका समय बीता है। फिर उन्होंने जोड़ा कि इन सारी बातों के बावजूद आज भी जब देशहित का मुद्दा उठता है तो देश की पूरी मीडिया एकजुट होकर आवाज उठाती है। उन्होंने इसके कई उदाहरण भी गिना डाले।

अपने को एक अदना सा पत्रकार बताते हुए उन्होंने ‘छोटे-छोटे प्रयासों का महत्व’ रेखांकित करने के लिए उस गिलहरी की कथा सुनायी जिसने समुद्र पर रामसेतु के निर्माण की प्रक्रिया में योगदान कर्ताओं की सूची में अपना नाम लिखाने के लिए बार-बार तट पर लोटपोट कर शरीर में रेत बटोरने और पुल पर जाकर शरीर झाड़ देने का उद्यम किया था। ताकि भविष्य में इतिहास लिखने वाले यह न लिखें कि जब सारा  बानर समाज पुल बना रहा था तो वहाँ मौजूद एक गिलहरी कुछ नहीं कर रही थी। अस्तु कुछ न कुछ यथा सामर्थ्य करते रहना चाहिए। इसके बाद उन्होंने एक जोरदार वीररस की कविता सुनायी। मैं एक ही पंक्ति नोट कर पाया क्योंकि उन्होंने दुहराया नहीं था। हाल को गुँजाने वाली तालियाँ बजीं और अगले वक्ता बुलाये गये।

यहाँ तक तो सब ठीक-ठाक रहा लेकिन जब प्रश्न-उत्तर का दौर चला तो प्रबंध-संपादक महोदय को उठकर सफाई देनी पड़ी। छात्र श्रोताओं के तीखे प्रहार वाकई बेचैन करने वाले थे। अंततः कुलपति जी को अध्यक्षीय भाषण में इस मसले पर अंतिम बात कहनी पड़ी। वह बहुत ही मार्मिक और सजग करने वाली बात थी। लेकिन उसकी चर्चा अगली कड़ी में। अभी तो आप उस वीररस की कविता का आनंद लेते हुए इस ‘चिरकुटई के आरोप’ का जवाब दीजिए।

गूगल महराज ने उस एक लाइन का ‘जामन’ लेकर पल भर में अपने क्षीर सागर के भंडार से पूरी कविता की दही परोस कर रख दी।

वह लाइन थी-

हम वो कलम नहीं हैं जो बिक जाती हों दरबारों में
हम शब्दों की दीप- शिखा हैं अंधियारे चौबारों में

इस लंबी कविता के मूल कवि हैं डॉ. हरिओम पवार। इसके आगे पीछे की कुछ और लाइनें यहाँ आपके लिए। पूरी कविता यहाँ है।

इन्कलाब के गीत सुनाते जायेंगे

कोई रूप नहीं बदलेगा सत्ता के सिंहासन का
कोई अर्थ नहीं निकलेगा बार-बार निर्वाचन का
एक बड़ा ख़ूनी परिवर्तन होना बहुत जरुरी है
अब तो भूखे पेटों का बागी होना मजबूरी है

जागो कलम पुरोधा जागो मौसम का मजमून लिखो
चम्बल की बागी बंदूकों को ही अब कानून लिखो
हर मजहब के लम्बे-लम्बे खून सने नाखून लिखो
गलियाँ- गलियाँ बस्ती-बस्ती धुआं-गोलियां खून लिखो

हम वो कलम नहीं हैं जो बिक जाती हों दरबारों में
हम शब्दों की दीप- शिखा हैं अंधियारे चौबारों में
हम वाणी के राजदूत हैं सच पर मरने वाले हैं
डाकू को डाकू कहने की हिम्मत करने वाले हैं

जब तक भोली जनता के अधरों पर डर के ताले हैं
तब तक बनकर पांचजन्य हम हर दिन अलख जगायेंगे
बागी हैं हम इन्कलाब के गीत सुनाते जायेंगे

अगवानी हर परिवर्तन की भेंट चढ़ी बदनामी की
हमने बूढ़े जे.पी. के आँसू की भी नीलामी की
परिवर्तन की पतवारों से केवल एक निवेदन था
भूखी मानवता को रोटी देने का आवेदन था

अब भी रोज कहर के बादल फटते हैं झोपड़ियों पर
कोई संसद बहस नहीं करती भूखी अंतड़ियों पर
अब भी महलों के पहरे हैं पगडण्डी की साँसों पर
शोकसभाएं कहाँ हुई हैं मजदूरों की लाशों पर

निर्धनता का खेल देखिये कालाहांडी में जाकर
बेच रही है माँ बेटी को भूख प्यास से अकुलाकर
यहाँ बचपना और जवानी गम में रोज बुढ़ाती हैं
माँ , बेटे की लाशों पर आँचल का कफ़न उढाती है

जब तक बंद तिजोरी में मेहनतकश की आजादी है
तब तक हम हर सिंहासन को अपराधी बतलायेंगे
बाग़ी हैं हम इन्कलाब के गीत सुनाते जायेंगे

 

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

शुक्रवार, 7 जनवरी 2011

हिंदी में लिखा जा रहा साहित्य प्रायः प्रासंगिक नहीं है

प्रोफेसर गंगा प्रसाद विमल ने ‘शुक्रवारी’ में रखी बेबाक राय...

शुक्रवारी चर्चा आजकल जबर्दस्त फॉर्म में है। माहिर लोग जुटते जा रहे हैं और हम यहाँ बैठे लपक लेते हैं उनके विचार और उद्‌गार। इस विश्वविद्यालय की किसी कक्षा में मैं नहीं गया ; क्योंकि न यहाँ का विद्यार्थी हूँ और न ही शिक्षक हूँ। लेकिन एक से एक आला अध्यापकों को सुनने का मौका मिल रहा है जो देश और विदेश के अलग-अलग विश्वविद्यालयों और दूसरे शिक्षा केंद्रों में लंबे समय तक पढ़ाते रहे हैं। विषय भी देश की नब्ज टटोलने वाले। पिछले दिन अशोक चक्रधर जी आये तो कंप्यूटर और इंटरनेट पर हिंदी की दशा और दिशा पर अपने तीस-चालीस साल के अनुभव बताकर गये। पूरी तरह अपडेटेड लग रहे थे। रिपोर्ट यहाँ है। उसके पहले विनायक सेन को हुई सजा के बहाने नक्सलवादी आंदोलन के हिंसक स्वरूप और मानवाधिकार संबंधी मूल्यों की चर्चा गांधी हिल के मुक्तांगन में हुई। राजकिशोर जी ने अपनी कविता के साथ विनायक सेन का भरपूर समर्थन व्यक्त किया तो कुलपति विभूतिनारायण राय ने स्पष्ट किया कि उनके साथ सहानुभूति रखते हुए भी हम इतना जरूर याद दिलाना चाहेंगे कि आज के जमाने में राजसत्ता को हिंसा के भय से दबाया नहीं जा सकता। किसी हिंसक आंदोलन को समर्थन देना उचित नहीं है। हाँ, मनुष्यता की रक्षा के लिए जरूरी है कि विनायक सेन जैसे लोग जेल से बाहर रहें और स्वतंत्र होकर समाज के दबे-कुचले लोगों के लिए कार्य कर सकें।

इस बार शुक्रवारी के संयोजक राजकिशोर जी ने चर्चा का विषय रखा था- वर्तमान समय में साहित्य की प्रासंगिकता; और बिशिष्ट वक्ता के रूप में बुलाया था प्रो. गंगा प्रसाद विमल को।

प्रो.गंगा प्रसाद विमल जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से सेवानिवृत्त हो चुके हैं। इसके पहले वे केंद्रीय हिंदी निदेशालय में निदेशक पद पर भी कार्यरत थे। आप एक सुपरिचित कवि और उपन्यासकार के रूप में जाने जाते हैं। विमल जी के एक उपन्यास ‘मृगांतर’ पर हॉलीवुड में एक फिल्म भी बन चुकी है और इसका जर्मन भाषा में अनुवाद भी छप चुका है। चाय की चुस्कियों के बीच आपने हल्के मूड में जो बातें कहीं वो बहुत गम्भीर किस्म की थीं।

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बाएँ से:राजकिशोर,ए.अरविंदाक्षन,विमल

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बोले- साहित्य की प्रासंगिकता सदा से रही है। आज भी बनी हुई है। इसका सबूत यह है कि आज भी साहित्य का डर मौजूद है। समाज का प्रभु वर्ग आज भी साहित्य के प्रभाव के प्रति सतर्क रहता है। एक अमेरिकी लेखक ने उपन्यास लिखा- ‘पैलेस ऑफ़ मिरर्स’। इसमें उन्होंने चार बड़े अमेरिकी व्यावसायिक घरानों की पोल पट्टी खोल कर रख दी थी।  इसपर उनके प्राण संकट में पड़ गये। उन्हें मार डालने के लिए माफ़िया ने सुपारी दे दी। किताब का प्रकाशक बहादुर और जिम्मेदार निकला। लेखक को पाताल में छिपा दिया। उनकी रॉयल्टी पाबंदी से भेज देता है और सुरक्षा जरूरतों को पूरा करता है। लेखक गुमनाम और भूमिगत है, लेकिन उसका रचा साहित्य खलबली मचा रहा है।

सलमान रुश्दी की किताब का नाम भी उन्होंने लिया। बोले- इसके चालीस पृष्ठ पढ़कर मैने छोड़ दिया था। कलात्मक दृष्टि से मुझे यह उपन्यास बहुत घटिया लगा। इसके रूपक भद्दे और बेकार लगे। फिर जब इसकी चर्चा बहुत हो ली तो मैने ‘मनुष्य जाति को इस्लाम का योगदान’ विषयक एम.एन.रॉय की पुस्तक पढ़ने के बाद इसे दुबारा पढ़ा। तब मुझे यह किताब कुछ समझ में आनी शुरू हुई। उन्होंने इस पुस्तक में बहुत बारीकी से मनुष्यता विरोधी विचारण को निरूपित किया है। यह विचारण किसी धर्म की रचना नहीं कर सकता। जिन लोगों ने उसे अपने धर्म का दुश्मन मान लिया वे मूर्ख हैं। वे ऐसे लोग हैं जो सत्य से डरते हैं। सलमान रुश्दी मनुष्यता का दुश्मन नहीं है बल्कि मूर्खों को उससे दुश्मनी है।

ये उदाहरण बताते हैं कि साहित्य कितना बड़ा प्रभाव छोड़ सकता है। लेकिन हिंदी के साहित्य जगत पर दृष्टिपात करें तो निराशा ही हाथ लगती है। यहाँ ऐसी प्रासंगिक रचनाये प्रायः नहीं लिखी जा रही हैं। मनुष्यता के जो सही सवाल हैं उन्हें ठीक से नहीं उठाया जा रहा है। यह साहित्य पढ़कर मन में बेचैनी नहीं उठती। कोई एक्सटेसी महसूस नहीं होती। यहाँ प्रायोजित लेखन अधिक हो रहा है। एक खास समूह और वर्ग में रहकर उसके अनुकूल साहित्य रचा जा रहा है। पुरस्कारों के लिए लिखा जा रहा है। आपकी साहित्यिक प्रतिभा का मूल्यांकन इस या उस गुट की सदस्यता के आधार पर किया जा रहा है।

यहाँ भी शोषक और शोषित का समाजशास्त्र विकसित हो चुका है। जो लोग सबसे अधिक दबे-कुचले वर्ग की बात करते हैं वे ही मौका मिलने पर शोषक वर्ग में शामिल हो जाते हैं। केरल और पश्चिम बंगाल में सबसे पहले वामपंथी सरकारें बनी। बंगाल में तो एक अरसा हो गया। लेकिन विडम्बना देखिए कि आज भी कलकत्ते में हाथगाड़ी पर ‘आदमी को खींचता आदमी’ मिल जाएगा। मार्क्स का नाम जपने वाले वामपंथी सत्ता प्राप्त करने के बाद कांग्रेस की तरह व्यवहार करने लगे और पूँजीपतियों को लाभ पहुँचाने वाली नीतियाँ बनाने लगे। यह दो-मुँहापन यहीं देखने को मिलता है। साहित्य जगत में भी ऐसी ही प्रवृत्तियाँ व्याप्त हैं।

ऐसी निराशाजनक स्थिति हिंदी साहित्य के क्षेत्र में खूब मिलती है। विरोधी खेमे को घेरकर चारो ओर से हमला किया जाता है। लेकिन यूरोप में स्थिति दूसरी है। फ्रांस में द’ गाल के शासनकाल में सार्त्र द्वारा उनका विरोध बड़े आंदोलन का रूप ले रहा था। सार्त्र को जेल में डाल देने की सलाह पर द’ गाल ने कहा कि मैं फ्रांस को गिरफ़्तार नहीं कर सकता। विरोधी विचार का सम्मान करना हिंदी पट्टी ने नहीं सीखा है। यहाँ पार्टी लाइन पर चलकर जो विरोध होता है वह भोथरे किस्म का होता हैं। तलवार की धार कुंद हो चुकी है। गदा जैसा प्रहार हो रहा है। प्राणहीन सा। हिंदी में जो कृतियाँ आ रही हैं वे निष्प्राण सी हैं। मन को उद्वेलित करने वाला कुछ नहीं आ रहा है।

वे पूछते हैं कि क्या स्वतंत्रता के बाद के साठ साल में ऐसी कोई घटना नहीं हुई जिसपर उत्कृष्ट साहित्य रचा जा सके। इंदिरा गांधी द्वारा लगाया गया आपात काल हो या पाकिस्तान के साथ लड़े गये युद्ध हों; या चीन के साथ हुआ संघर्ष। इन घटनाओं ने हिंदी साहित्यकारों को उद्वेलित नहीं किया। इनपर कोई बड़ी कृति सामने नहीं आयी। सुनामी जैसी प्राकृतिक विपदा भी मनुष्यता के पक्ष में साहित्यकारों को खड़ा नहीं कर सकी। क्या कारण है कि बड़ी से बड़ी घटनाएँ हमें विचलित नहीं करती। कड़वे यथार्थ से तालमेल बिठाने में हिंदी साहित्य असफल सा रहा है।

इतनी निराशा भरी बातें कहने के बाद उन्होंने पहलू बदला और बोले कि ऐसा नहीं है कि अच्छी प्रतिभाएँ हमारे बीच नहीं है। मुश्किल बस ये है कि उनका लिखा सामने नहीं आ पाता। आलोचना के जो बड़े मठ हैं वे इसे आने नहीं देते। उनकी देहरी पर माथा टेकने वाला ही पत्र-पत्रिकाओं में स्थान पाता है। समीक्षा उसी की हो पाती है जो उस परिवार का अंग बनने को तैयार होता है। राजकिशोर जी ने गुटबंदी की बात का समर्थन करते हुए विनोदपूर्वक कहा कि ‘यदि आप हमारे किरायेदार हैं तो आप सच्चे साहित्यकार हैं; यदि आप दूसरे के घर में हैं या अपना स्वतंत्र घर जमाने की कोशिश में हैं तो आपका साहित्य दो कौड़ी का भी नहीं है। एक खास विचारधारा का पोषण यदि आप नहीं करते तो आप अप्रासंगिक हैं।

मीडिया ने भी साहित्य जगत का और हिंदी भाषा का बड़ा नुकसान किया है। शब्द बदल गये हैं, शैली दूषित हो गयी है, वाक्य रचना अंग्रेजी की कार्बन कॉपी जैसी हो गयी है। कृतियों पर अंग्रेजी प्रभाव होता जा रहा है। नकल के आरोप भी खुलकर आ रहे हैं। मौलिकता समाप्त सी होती जा रही है।

आज हम सबका दायित्व है कि हम हिंदी में लिखे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य को सामने लायें। मनुष्यता के मुद्दे उठाने वाली रचनाओं को तलाशें। संकुचित सोच के दायरे से बाहर आकर विराट धरातल पर विचार करें। मैं हद दर्जे का आशावादी भी हूँ। कुछ लोग बहुत अच्छा कार्य कर रहे हैं। लेकिन उनकी संख्या अत्यल्प है। इसे कैसे बढ़ाया जाय इसपर विचार किया जाना चाहिए।

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विमल जी की बात समाप्त होने के बाद प्रश्न उत्तर का दौर चला। कई लोगों ने कई कारण गिनाए। मैंने पिछले दिनों श्रीप्रकाश जी की शुक्रवारी वार्ता के हवाले से बताया कि अच्छी रचना तब निकल कर आती है जब कोई बड़ा आंदोलन चल रहा हो। क्रांति का समय हो। शांतिकाल में तो साधारण बैद्धिक जुगाली ही होती रहती है। मुद्दों को तलाशना पड़ता है। इसपर जर्मनी से आये एक हिंदी अध्यापक ने अनेक ताजा मुद्दे गिनाये। दलित और स्त्री संबंधी विमर्श की चर्चा की। प्रायः सबने इसका समर्थन किया। लेकिन इन मुद्दों पर भी अच्छी रचनाओं की दरकार से प्रायः सभी सहमत थे। विदेशी मेहमान ने यह भी बताया कि यूरोप में हिंदी रचनाओं को ‘पश्चिम की नकल’ पर आधारित ही माना जाता है।

विमल जी ने हिंदी साहित्य के पाठकों की भी कमी के प्रति चिंता जाहिर की। बोले कि अब अच्छी रचनाओं के लिए भी पाठक नहीं मिलते। जेब से पैसा खर्च करके हिंदी की किताबें खरीदने और पढ़ने वालों की संख्या बहुत कम है। इसके लिए वे ‘अध्यापक समाज’ को दोषी ठहराते हैं। कह रहे थे कि आजकल के अध्यापक न तो अपना पैसा खर्च करके किताबें खरीदते हैं, न पढ़ते हैं और न ही अपने छात्रों व दूसरे लोगों को पढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं। उन्होंने बताया कि यदि उन्हें कोई अच्छी किताब मिल जाती है तो कम से कम सौ लोगों को उसे पढ़ने के लिए बताते हैं।

अन्य के साथ राजकिशोर जी ने अच्छी रचनाओं की कमी होने की बात का प्रतिवाद किया। बोले- मैं आपको हिंदी की कुछ मौलिक कृतियों का नाम बताता हूँ। आप इनके मुकाबले खड़ा हो सकने लायक एक भी अंग्रेजी पुस्तक का नाम बता पाइए तो बोलिएगा...। उन्होंने नाम बताने शुरू किए जिसमें दूसरे लोगों ने भी जोड़ा- श्रीलाल शुक्ल की `राग दरबारी’, रेणु का `मैला आँचल’, रांगेय राघव का `कब तक पुकारूँ’, यशपाल की `दिव्या’, अज्ञेय का `नदी के द्वीप’, अमृतलाल नागर का `बूँद और समुद्र’, भगवतीचरण वर्मा की `चित्रलेखा’, हजारी प्रसाद द्विवेदी की `बाणभट्ट की आत्मकथा’, आदि-आदि। किसी ने चुनौती देते हुए जोड़ा कि निराला की कविता ‘राम की शक्तिपूजा’ यदि नकल पर आधारित है तो इसका असल अंग्रेजी रूप ही दिखा दीजिए। इसकी पहली पंद्रह पंक्तियों का अनुवाद ही करके कोई दिखा दे। इसके बाद और भी अनेक रचनाओं का नाम लिया जाने लगा।

अंततः मुझे विमल जी से उनके प्रारम्भिक वक्तव्य की पुष्टि करानी पड़ी। उन्होंने माना कि अपनी इस बात को स्वीकार करने के अलावा उनके पास कोई चारा नहीं है कि साहित्य की प्रासंगिकता बनी हुई है लेकिन हिंदी में जो लिखा जा रहा है उसमें अधिकांश प्रासंगिक नहीं है। उन्होंने पहले यह भी बताया था कि वे एक नियमित स्तंभ लिखते रहे हैं जिसका नाम है ‘अप्रासंगिक’।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

रविवार, 21 नवंबर 2010

बुरे फँसे दिल्ली में... आपबीती

delhi trafic police

दिल्ली के भीतर गति-सीमा में कार चलाना एक अद्‍भुत कला है…

सरकारी अफसर बनकर नौकरी में आते ही सबसे पहले मुझे किसी ने नेक सलाह दी कि गाड़ी चलाना जरूर सीख लो नहीं तो ड्राइवर पर आश्रित रहने पर कभी-कभी मुश्किल पेश आ जाती है। यदि कभी कोई बदमाश ड्राइवर मिल गया तो ऐन वक्त पर दाँव दे सकता है और बॉस के आगे फजीहत की नौबत आ सकती है। मैने सोचा कि यदि ऐसी बात न भी होने वाली हो तो भी आज के जमाने में कार चलाना आना ही चाहिए। वैसे भी एल.एम.वी. ड्राइविंग लाइसेंस जो पहले ही बन चुका था उसे औचित्य प्रदान करने के लिए वास्तव में ड्राइविंग सीख लेना जरूरी था।

देहाती क्षेत्रों के सरकारी दौरे पर जाते समय मौका देखकर मैंने अपने ड्राइवर से सीट अदल-बदलकर गाड़ी चलाना सीख लिया। जल्दी ही शहरी भीड़-भाड़ में भी सरकारी जीप चलाने लगा। फिर जब घर में कार आयी तो ड्राइवर नहीं ढूँढना पड़ा। पत्नी और बच्चों के साथ प्राइवेसी एन्जॉय करते हुए घूमना और ड्राइवर से संबंधित अनेक लफ़ड़ों से मुक्त रहने का आनंद वही जान पाएंगे जिन्होंने गाड़ी चलाना सीख रखा हो। अब जबकि दस-बारह साल से गाड़ी चलाते हुए मैं अपने आपको एक्सपर्ट और बेदाग ड्राइवर समझने लगा था, अच्छी बुरी सभी सड़कों पर कार चलाने का पर्याप्त अनुभव इकठ्ठा कर चुका था, तेज गति के साथ भी संतुलित और नियंत्रित ड्राइविंग कर लेने का दावा करने लगा था और मौके-बेमौके नौसिखिए लोगों को ड्राइविंग के गुर सिखाने लगा था तभी मुझे एक नये ज्ञान की प्राप्ति हो गयी।

हुआ यूँ कि मुझे दिल्ली आकर अपनी श्रीमती जी के साथ उनके भाई के घर रुकने का अवसर प्राप्त हुआ। हमें दिल्ली से बाहर करीब पचास-साठ किलोमीटर की यात्रा लगातार पाँच-छः दिन करने की जरूरत पड़ी। इसके पहले भी एक बार दिल्ली आना हुआ था और करीब दस दिनों तक टैक्सी का सहारा लेना पड़ा था। पिछले अनुभव के आधार पर इस बार मैं बेहतर विकल्प तलाश रहा था।

dtp2पिछली बार यह अनुभव मिला था कि गेस्ट-हाउस से गंतव्य तक टैक्सी से यात्रा करना काफी खर्चीला और उबाऊ तो था ही, प्राइवेसी और निश्चिंतता के लाले भी पड़ गये थे। यात्रा के दौरान अपनी ही पत्नी और बच्चे से सँभल-सँभलकर बात करनी पड़ती थी या बिल्कुल चुपचाप यात्रा करनी पड़ती थी। टैक्सी वाले को घंटों खड़ा रखने का किराया ही हजारों में देना पड़ा था। इतना ही नहीं उसकी ड्राइविंग का ढंग देखकर कोफ़्त भी बहुत होती थी। दायें-बायें से दूसरी गाड़ियाँ ओवरटेक करती रहतीं और यह सबको साइड देता रहता। ‘लेन-जंपिंग’ के उस्ताद ड्राइवर अचानक इसके आगे आ जाते और यह आराम से ब्रेक लगाता रहता। कदम-कदम पर रेड-लाइट के सिग्नल भी मात्र कुछ सेकेंड से पिछड़ जाने के कारण रास्ता रोक देते। फिर वह आराम से इंजन बंद कर देता और हरी बत्ती जल जाने के बाद ही इंजन स्टार्ट करता, गियर लगाता और धीरे-धीरे आगे बढ़ता। इस बीच पीछे की अनेक गाड़ियाँ आगे हो लेतीं।  मुझे यह लिजलिजी ड्राइविंग बोर करती। सोचता कि काश कोई ‘स्मार्ट’ ड्राइवर मिला होता।

इस बार जब मुझे आना हुआ तो मेरे नजदीकी व प्रिय रिश्तेदार ने मेरी समस्या समझते हुए अपने घर पर ही ठहरने का प्रबंध किया और अपनी निजी कार मेरी सेवा में लगा दी। पहले दिन एक दैनिक भाड़े का ड्राइवर बुला लिया गया ताकि मैं उसके साथ चलकर रास्ते की पहचान कर सकूँ। यात्रा शुरू होते ही मैने उसके बगल में बैठकर अपना लैपटॉप खोल लिया और गूगल अर्थ का पेज खोलकर दिल्ली को जूम-इन करते हुए सभी गलियों और सड़कों के लेवेल का नक्शा सेट कर लिया। अपने गंतव्य तक का रूट चिह्नित कर उससे वास्तविक मार्ग का मिलान करता रहा। वापसी में भी पूरे रास्ते का मानचित्र दिमाग में बैठाता रहा।

अगले दिन मैंने गाड़ी की कमान खुद संभाल ली। ड्राइवर की छुट्टी कर दी गयी। सीट बेल्ट बाँधते ही मेरी स्थिति थोड़ी असहज हो गयी। इस प्रकार बाँधे जाने के बाद शरीर का हिलना-डुलना काफी मुश्किल सा हो गया। लेकिन मैंने अपनेआप को समझाया कि यह नियम तो फायदे के लिए ही बना होगा। हाथ और पैर तो खुले हुए थे ही। ड्राइविंग तो मजे में की जा सकती है। फिर दोनो तरफ़ के ‘साइड-मिरर’ खोलकर सही कोण पर सेट किए गये। इससे पहले मैने केवल सिर के उपर लगे बैक-मिरर का ही प्रयोग किया था। इन बगल के शीशों में झाँकने पर ऐसा लगा कि दोनो तरफ़ से आने वाली गाड़ियाँ बस मेरे ही पीछे पड़ी हैं और उनका एकमात्र लक्ष्य मेरी गाड़ी को ठोंकना ही है। मैंने एक-दो बार पीछे मुडकर उनकी वास्तविक स्थिति देखा और आश्वस्त हुआ कि मेरा भय निराधार है।

सुबह-सुबह घर से निकलते हुए सड़क पर ट्रैफिक कम देखकर मन प्रसन्न हो गया। रिंग रोड पर भी गाड़ियों की संख्या ज्यादा नहीं थी। ऑफ़िस और स्कूल-कालेज जाने वालों का समय अभी नहीं हुआ था। चार-छः लेन की इतनी चौड़ी सड़क पर प्रायः सन्नाटा दे्खकर मेरे मन से रहा-सहा डर भी समाप्त हो गया और मैने गाड़ी को टॉप गियर में डाल दिया। बड़े-बड़े फ़्लाई ओवर बनाकर लेवेल-क्रॉसिंग्स की संख्या बहुत कम करने की कोशिश की गयी है। जहाँ तिराहे या चौराहे हैं वहाँ स्वचालित ट्रैफिक सिग्नल की व्यवस्था है। दूर से ही लाल, हरी, व पीली बत्तियाँ दिख जाती हैं। सेकेंड्स की उल्टी गिनती करती डिजिटल घड़ियाँ यह भी बताती हैं कि अगली बत्ती कितनी देर में जलने वाली है। मेट्रो रेल की लाइनें तो इन फ़्लाई ओवर्स के भी ऊपर से गुजारी गयी हैं। ...दिल्ली का मेट्रो-सिस्टम मानव निर्मित चंद अद्भुत रचनाओं में से एक है। इसकी चर्चा फिर कभी।

dtpइन सारी स्वचालित व्यवस्थाओं को समझते-बूझते और अपनी गाड़ी को रिंग रोड की चिकनी सतह पर भगाता हुआ मैं एक फ्लाई ओवर से उतर रहा था तभी अचानक करीब आधा दर्जन वर्दी धारी जवान सड़क के बीच में आकर मुझे रुकने का इशारा करने लगे। वर्दी देखकर मुझे यह तो समझ में आ गया कि ये ट्रैफिक पुलिस के सिपाही हैं लेकिन मेरी गाड़ी को रोके जाने का क्या कारण है यह समझने में मुझे कुछ देर लगी। उनका अचानक प्रकट हो जाना और मेरी गाड़ी को लगभग घेर लेना मुझे कुछ क्षणों के लिए एक ‘मेंटल शॉक’ दे गया। सहसा मुझे अपने रिश्तेदार की उस बात का ध्यान आया कि यहाँ गति को मापने के लिए कई जगह खुफ़िया कैमरे लगे हैं जो कम्प्यूटर तकनीक से पल भर में ट्रैफिक पुलिस को बता देते हैं कि अमुक नंबर की गाड़ी निर्धारित गति से इतना तेज चल रही है और इतने मिनट में फलाँ ट्रैफिक बूथ पर पहुँचने वाली है।

जब एक इंस्पेक्टर ने मेरा ड्राइविंग लाइसेंस माँगते हुए यह बताया कि मैं 76 किमी. प्रति घंटे की रफ़्तार से चल रहा था जो निर्धारित सीमा से सोलह किमी/घं. अधिक है तो मेरी आशंका सही साबित हुई। घबराहट की मात्रा मुझसे अधिक मेरी धर्मपत्नी के चेहरे पर थी। मुझे उस ट्रैफिक वाले से अधिक श्रीमती जी के कोप की चिंता सताने लगी जो यहाँ से निकलने के बाद फूटने वाला था। मेरी गति को लेकर उनका बार-बार टोकना और मेरा अपने आत्मविश्वास को लेकर उन्हें बार-बार आश्वस्त करते रहना एक नियमित बात थी जो हमारे बीच चलती रहती थी। इस समय उनका पलड़ा पर्याप्त भारी हो चुका था और मेरा उसके नीचे दबना अवश्यंभावी था।

यह सब एक पल में मैं सोच गया क्योंकि उससे ज्यादा समय उस सिपाही ने दिया ही नहीं। वह मेरा ड्राइविंग लाइसेंस माँगता रहा और मैं उसे अपने पर्स में तलाशता रहा। चौदह साल पहले गोरखपुर में बनवाये जाने के बाद आजतक किसी पुलिस वाले ने इसे चेक नहीं किया था। इसका प्रयोग केवल परिचय व पते के सबूत के तौर पर एक-दो बार ही हुआ होगा वह भी जहाँ पैन-कार्ड पर्याप्त न समझा गया हो। मेरी घबराहट को देखते हुए ड्राइविंग लाइसेंस ने मिलने से मना कर दिया। मैंने हैरानी से अपने पर्स के सभी खाने दो-दो बार तलाश लिए। पीछे खड़े सिपाही आपस में बात करने लगे कि इसके पास डी.एल. भी नहीं है। सामने खड़ा इंस्पेक्टर भी ड्राइविंग लाइसेंस मिलता न देखकर मेरा नाम पूछने लगा। तभी मुझे ध्यान आया कि पर्स में सामने की ओर मैंने जहाँ बजरंग बली की तस्वीर लगा रखी है उसी के नीचे कार्डनुमा डी.एल. भी कभी फिट कर दिया था। मैंने फ़ौरन बजरंग बली को प्रणाम कर उनकी तस्वीर बाहर निकाली और उसके नीचे से डी.एल.कार्ड भी नमूदार हो गया।

अब वहाँ खड़े सिपाहियों की रुचि मेरे केस में कम हो गयी। केवल चालान काटने वाला इंस्पेक्टर मेरे ब्यौरे नोट करने लगा। चार सौ रूपये की रसीद काटकर उसने मुझे थमाया और मैने सहर्ष रूपये देकर  जिम्मा छुड़ाया। ‘सहर्ष’ इसलिए कि मुझे आशंका थी कि सरकारी फाइन कुछ हजार में हो सकती थी या किसी मजिस्ट्रेट के ऑफिस का चक्कर लगाना पड़ सकता था, या मेरा कोई कागज जब्त हो सकता था। इन सब खतरों को दूर करते हुए कानूनी रूप से कुछ शुल्क अदा करके मुझे छुट्टी मिल रही थी।

dtp1इसके बाद जब मैं आगे बढ़ा तो इंस्पेक्टर से पूछता चला कि यदि आगे यही गलती फिर हुई तो फिर चार सौ देने पड़ेंगे क्या? उसने थोड़ी देर तक मुझे अर्थपूर्ण मुस्कराहट के साथ देखा और कहा कि ‘आज की डेट में आप इस चालान से काम चला सकते हैं। वैसे धीमे चलिए तो आपकी ही सुरक्षा रहेगी।’ उसके बाद मेरी निगाह आगे की ट्रैफ़िक पर कम और अपने डैशबोर्ड पर अधिक रहने लगी। गतिमापक की सुई साठ से ऊपर न चली जाय इस चिंता में ही अधिकांश सफ़र कट गया। एक्सीलरेटर पर दाहिने पैर के दबाव को दुबारा सेट करना पड़ा ताकि रफ़्तार निर्धारित सीमा में ही बनी रहे। अब खाली सड़क देखकर अंधाधुंध स्पीड में चलते चले जाने के बजाय सुई को साठ पर स्थिर रखने की कला सीखनी पड़ी। पूर्वी उत्तर प्रदेश के शहरों व देहात में आगे की गाड़ी को केवल उसकी दाहिनी ओर से ओवरटेक करना होता था लेकिन यहाँ दोनो तरफ़ से पार करने के विकल्प खुले हुए हैं। हाँ, लेन-जंप करने में पीछे से आने वाली गाड़ियों पर ध्यान रखना जरूरी होता है।

अब मुझे दिल्ली में गाड़ी चलाने का पाँच दिन का अनुभव हो चुका है। मैंने देखा है अनेक बड़ी लग्जरी गाड़ियों को अस्सी-सौ पर फ़र्राटा भरते हुए, रेड सिग्नल को पार करते हुए और फिर भी न पकड़े जाते हुए। उसी स्पॉट पर सुबह-सुबह रोज  मेरे जैसे कुछ नये लोगों का चालान कटते हुए और गरीब टैक्सी ड्राइवरों को जुर्माना भरते हुए भी देखता हूँ। कारों की लम्बी कतारों के बीच लगातार लेन बदलने वाले बाइक सवारों के रोमांचक और खतरनाक करतब भी देखता हूँ और पैदल सड़क पार करने वालों की साहसी चाल भी देखता हूँ जिन्हें बचाने के लिए बड़ी सवारियों का काफ़िला एकाएक ठहर जाता है। 

मैं इस सबके आधार पर कह सकता हूँ कि दिल्ली के भीतर गति-सीमा जोन में कार चलाना एक अद्‍भुत कला है। आपका क्या ख़्याल है?

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

स्थान:  वहीं जहाँ कॉमन वेल्थ खेलों के कारण सड़कों की हालत काफी अच्छी हो गयी हैं लेकिन खेल कराने वालों की हालत नाजुक चल रही है।

समय: जब मेरे मेजबान के घर पर सभी लोग सो चुके हैं, सड़क से ट्रैफिक की आवाज आनी  प्रायः बंद हो गयी है और मुहल्ले का चौकीदार डंडा फटकारते हुए अपना पहला राउंड अभी-अभी लगाकर जा चुका है।