हमारी कोशिश है एक ऐसी दुनिया में रचने बसने की जहाँ सत्य सबका साझा हो; और सभी इसकी अभिव्यक्ति में मित्रवत होकर सकारात्मक संसार की रचना करें।
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मंगलवार, 8 अगस्त 2023

गृहस्थ, आश्रम और तीर्थ (भाग-3)

(... भाग 2 से आगे )

डाक बंगला में थोड़ा आराम करने के बाद अपने अभीष्ट के लिए हम समय से तैयार हुए। बनारस की भीड़-भाड़ भरी सड़कों पर अपनी कार से चलना वैसे ही मुश्किल था, उसपर मोहर्रम के ताजियों के जुलूस पूरे शहर की ट्रैफिक व्यवस्था को हाँफने पर मजबूर कर रहे थे। ऐसे में ट्रैफिक पुलिस में ही सेवारत हमारे प्रिय अनुज पंकज ने हमारी मुश्किल आसान कर दी। शहर की सड़कों का मकड़जाल भेदना उनके ड्राइवर अनवर के लिए बाएं हाथ का खेल था सो हम उनके साथ निकल पड़े भोलेबाबा का दर्शन करने।

ज्ञानवापी की सुरक्षा में तैनात सशस्त्र प्रहरी दिनरात मुस्तैदी से उस पुरातन ढाँचे की रक्षा कर रहे हैं जिसके अगल-बगल से गुजरते हुए लाखो शिवभक्त तीर्थयात्री विश्वेश्वर के दर्शन को आते-जाते हैं। मोदी जी ने काशी विश्वनाथ कॉरिडोर क्या बनवा दिया अब यह परिसर उत्साह, उमंग व आत्मविश्वास से भरे अपार जनसमूह के हर-हर महादेव के समवेत जयकारे से लगातार गूँजता रहता है। अब वो पुरानी तंग गलियाँ और उनमें अपने व्यवसाय के लिए आपको रोकते-टोकते दुकानदार और पंडा प्रजाति के लोग इतिहास में जा चुके है। अब दृश्य कुछ ऐसा है कि दर्शन-पूजन व जलाभिषेक से पहले और उसके बाद भी खुले आसमान के नीचे सफेद संगमरमर के लंबे चौड़े फर्श पर टहलते हुए और रुककर पूरे वातावरण को निहारते, अपनी आंखों में बसाते और धूप-चंदन की सुगंध मिश्रित वहाँ की हवा को अपने फेफड़ों में भरते हुए भारत के कोने-कोने से आने वाले तीर्थयात्री जितनी श्रद्धा व भक्ति के भाव से शिवलिंग को देखते और पूजते हैं उतनी ही वितृष्णा से भरी और कदाचित् श्राप देती दृष्टि उस ढाँचे की ओर भी जरूर डालते हैं जो आजकल न्यायालय में अपने अस्तित्व का परीक्षण करा रहा है।

कॉरिडोर के उत्तरी सिरे पर विशालकाय नंदी की अपलक दृष्टि उस वृहद शिवलिंग की ओर लक्षित है जो एक वजूखाने के उच्छिष्ट पानी में डूबा हुआ है। यह हिमालय की कंदराओं में ध्यानमग्न गहरी तपस्या में डूबे महादेव शिव की याद दिलाता है जिनकी तंद्रा को तोड़ने के लिए कामदेव को अपना उत्सर्ग करना पड़ा था। उनकी तीसरी आंख खुलते ही उसके तेज से कामदेव स्वाहा हो गये थे।

सनातन मान्यता के अनुसार गंगाधर शिव के त्रिशूल पर बसी काशी में उत्तर वाहिनी गंगा जी की अविरल धारा अब इस प्रांगण के पूर्वी द्वार के सामने से गुजरती दिखती है। इस घाट के बगल में ही मणिकर्णिका घाट पर अगणित चिताओं की लपट से उठते धूएँ का गुबार भी एक अटल सत्य की ओर इंगित करता है। मंदिर के गर्भगृह से गंगातट तक का नव निर्माण यहाँ आनेवालों के मन-मस्तिष्क पर जो प्रभाव छोड़ता है वह वर्णनातीत है। इसे यहाँ आकर ही महसूस किया जा सकता है। सुरक्षा कारणों से हमारा मोबाइल गाड़ी में ही अनवर के हवाले था, लेकिन प्रिय पंकज ने अपने सरकारी मोबाइल से कुछ ऐसी तस्वीरें खींच ली थीं जो प्रोटोकॉल में अनुमन्य थीं।

परिसर से बाहर आने का तो हमारा मन ही नहीं कर रहा था लेकिन शनिवार के दिन संकटमोचन मंदिर में रुद्रावतार बजरंग बली का दर्शन करने का लोभ हमें वहां से बाहर ले आया। ट्रैफिक जाम को लगभग चीरते हुए हम गोदौलिया चौराहे पर पहुँचे, ठंडाई पीकर प्यास बुझाई और संकटमोचन मंदिर की वह लंबी राह पकड़ी जो मोहर्रम के जुलूस से प्रायः अछूती थी। अंततः हमने अंतिम आरती से पहले ही "पवनतनय संकटहरन मंगल मूरति रूप" का दर्शन किया, तुलसीदल मिश्रित प्रसाद ग्रहण किया, लेकिन परिसर में पर्याप्त समय लेकर आये हुए असंख्य भक्तों की तरह वहाँ बैठकर हनुमान चालीसा या सुंदरकांड का पाठ नहीं कर सके। दर्शन मिल जाने के बाद हमारा ध्यान गर्मी, ऊमस व पसीने से भरी देह की ओर चला गया। हल्की बूंदाबांदी भी शुरू हो गयी थी। हमने प्रसाद का डिब्बा एक काउंटर पर जाकर वहां रखी सुतली से बांधा, जमा किये गए जूते-चप्पल वापस पहने और भागते हुए बाहर आ गए। यहां भी अंदर फोटो लेने का सुभीता नहीं था। बाहर की भीड़ में पंकज ने एक फोटो क्लिक की। गाड़ी खोजकर हम बैठे और राहत की सांस ली।

हमने प्यास से सूखे गले को तर करने के लिए एक नुक्कड़ पर रुककर गाढ़ी राबड़ी मिश्रित लस्सी पी। बनारस की स्वादिष्ट ठंडाई और मीठी लस्सी हर नुक्कड़ पर तैयार मिलती है। इसके शौकीनों की भी कोई कमी नहीं। मेरा मन तो बनारसी पान खाने का भी था लेकिन काफी देर हो चुकी थी। हमें 'डाक बंगला' पहुँच कर जल्दी से सोना भी था ताकि अगले दिन विंध्यवासिनी देवी के दर्शन के लिए समय से निकल सकें।

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(...जारी)

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रविवार, 6 अगस्त 2023

गृहस्थ, आश्रम और तीर्थ (भाग-2)

(... भाग 1 से आगे)

सुरम्य आश्रम सरीखे आवासीय परिसर 'मेघदूत' से जब हम विदा होने लगे तो DrArvind Mishra जी ने हमें सलाह दी कि बनारस से पहले जौनपुर से लगभग 12 किमी. आगे एक प्राचीन मंदिर है - त्रिलोचन महादेव, उसे भी देखते जाँय। इसप्रकार अपनी तीर्थयात्रा में हमने इस पवित्र स्थान को भी जोड़ लिया।

त्रिलोचन महादेव मंदिर का परिसर अभी सरकारी कृपा की बाट जोह रहा है। यहाँ श्रद्धालुओं की ठीक-ठाक भीड़ थी। ठेले-खोमचे व गुमटियों में विविध प्रकार की दुकानें सजी हुई थीं। एक ग्रामीण मेले का दृश्य उपस्थित था। श्रीमती जी ने एक ठेले पर गर्मागर्म जलेबी छनती देखकर कहा कि दर्शन के बाद इसे लिया जाएगा। हमने मंदिर के बरामदे से लगे असंख्य पुजारी गण की चौकियां देखीं जहाँ पूजन व जलाभिषेक के साधन उपलब्ध थे। बेलपत्र, भांग-धतूर व मंदार पुष्प की प्रधानता वाले पूजन सामग्री का दोना लेकर और माथे पर चंदन का औदार्यपूर्ण लेप व ॐ का तिलक लगवाकर हमने लोटे में जल भरा और मंदिर के गर्भगृह में जाकर शिवलिंग का दर्शन-पूजन किया। आशुतोष औघड़दानी को जल चढ़ाकर मैंने मन ही मन कहा कि मुझे जो चाहिए वह मुझसे बेहतर आप स्वयं जानते हैं इसलिए तदनुसार ही कृपा करें। ईश्वर की सदाशयता में पूरी आस्था रखना भक्तिभाव की पहली शर्त है।

बाहर आकर हमने कुछ सेल्फी ली जो मनचाही नहीं आ रही थी। एक वालंटियर तलाशना पड़ा। फिर हम जलेबी वाली जगह पर गए तो ठेला वहाँ से अंतर्ध्यान हो चुका था। शायद वहाँ की जलेबी पर हमारा नाम नहीं लिखा था। एक दूसरी दुकान पर कड़ाही चढ़ी तो थी लेकिन वहाँ की गंदगी देखकर श्रीमती जी का मूड बदल गया। हम फौरन बनारस की ओर चल पड़े।

बनारस में हम पूर्व निर्धारित गेस्ट-हाउस में रुके जिसे डाक-बंगला का नाम दिया गया है। छावनी क्षेत्र में स्थापित यह विशाल प्रांगण कदाचित् आजादी से पहले बना होगा। हरे-भरे लॉन और फलदार पेडों के बीच दूर-दूर बने सुइट्स का नामकरण विभिन्न नदियों के नाम पर किया गया है। हमें सरयू नामक कमरा मिला था। बगल में ही राप्ती और ताप्ती नामक कमरे थे। किचेन के सामने वाले लॉन में बारिश का पानी जमा था। इसमें सफेद बत्तखों का झुंड अठखेलियाँ कर रहा था। हम इस मनोरम दृश्य को कैमरे में कैद करने का लोभ संवरण नहीं कर सके। परिसर में दौड़ते एक सफेद खरगोश की तस्वीर हम नहीं खींच सके।

कमरे में सभी मौलिक सुविधाएं मौजूद थीं। करीब तीन सौ किमी. की ड्राइविंग करने के बाद आराम तो करना ही था। हमने जल्दी से लंच लिया। स्थानीय सहयोगी से वार्ता के बाद मंदिर जाने का कार्यक्रम शाम पांच बजे के लिए तय हुआ। इसमें अभी दो घंटे बाकी थे। इसलिए हम चादर तानकर सो गए।

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(...जारी)

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शनिवार, 5 अगस्त 2023

गृहस्थ, आश्रम और तीर्थ (भाग-1)

पिछले सप्ताहांत में दो दिन की छुट्टी थी- शनिवार को मोहर्रम फिर रविवार। सावन का महीना और एकादशी तिथि। मेरी धर्मपत्नी ने इसबार काशी विश्वनाथ के दर्शन का मन बनाया और हम दोनों प्राणी निकल पड़े एक छोटी मनभावन तीर्थयात्रा पर। वाहन-चालक का काम भी मैंने खुद ही सम्हाला। यह अनुभव इतना शानदार रहा कि पूछिए मत। जीवन संगिनी के साथ यात्रा किसी तीसरे व्यक्ति की उपस्थिति के बिना करने का आनंद ही कुछ और है।

बनारस पहुँचने से पहले हमारा पहला पड़ाव था- मेघदूत। बड़े भाई सा स्नेह देने वाले DrArvind Mishra का पैतृक आवास जो तेली-तारा राजस्व ग्राम में है। यह लखनऊ-वाराणसी हाईवे पर जौनपुर से कुछ पहले ही चुरावनपुर उर्फ चूड़ामणि पुर ग्राम पंचायत का अंग है। विज्ञान विषयों पर विशद लेखन करने और प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहने वाले, अनेक पुस्तकों के लेखक, और ब्लॉग व फेसबुक पर भी वैज्ञानिक चेतना की अलख जगाने वाले डॉ. मिश्र ने सेवानिवृत्ति के बाद अपने लिए ग्रामीण जीवन चुना है। यह बहुत प्रेरित करता है। प्राकृतिक हरियाली के बीच प्रचुर मात्रा में ऑक्सिजन और अपने खेत की साग-सब्जी, अनाज और फल-फूल का उपभोग करने का आनंद और कहाँ मिल सकता है। आदरणीया भाभी जी के साथ भाई साहब सपरिवार इतनी आत्मीयता से मिलते हैं कि वहाँ बार-बार जाने का मन करता है। छोटे भाई DrManoj Mishra को तो विश्वविद्यालय में प्रोफेसर की नौकरी भी मेघदूत से आ-जाकर कर पाने का सौभाग्य प्राप्त है। उनकी बेटी स्वस्तिका ने हम लोगों की तस्वीरें जिस दक्षता से क्लिक किया वह यादगार बन गया।

हमने यहाँ लगभग दो घंटे बिताए। किचन गार्डन के उत्पादों का आनंद लिया, पेड़ से आम, अमरूद और फूल तोड़े। विशालकाय कटहल का स्पर्श किया (क्यों कि उदरस्थ करने की क्षमता नहीं थी)। हरे-भरे आकर्षक चबूतरे मेघ-मंडपम् के साथ फोटो-शूट किया गया। Rachana ने स्वस्तिका की फरमाइश पर मुझे जूड़े में फूल लगाने का अवसर दिया। नई नई शादी के समय जो छूटा रह गया था वह इस सुरम्य आश्रम में घटित हो गया।

(...जारी)

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शुक्रवार, 15 अप्रैल 2022

गार्ड का डिब्बा

IMG_20220413_192410अगले दो दिन की छुट्टी और फिर सप्ताहांत अवकाश के कारण सरकारी कर्मचारियों को इस बार लंबी अवधि का आराम मिलना था। मैंने भी इस मौके का लाभ उठाने के लिए बच्चों के पास जाने का कार्यक्रम बनाया। बस की यात्रा में सात-आठ घंटे लग जाते इसलिए इंटरसिटी एक्सप्रेस से जाने का विचार बना। मैंने ए.सी.चेयरकार का वेटिंग टिकट तत्काल कोटे में बुक कराया जो दुर्भाग्य से कन्फर्म नहीं हो सका। आगे की छुट्टियों की वजह से इस दिन इस गाड़ी पर यात्रियों का लोड बहुत ज्यादा था। मुझे रेलयात्राओं में यथावश्यक सहयोग देते रहने वाले मेरे एक शुभेच्छु रेल अधिकारी ने इस ट्रेन में चलने वाले टीटीई से बात की तो उन्होंने हाथ खड़े कर दिए। उन्होंने फिर भी इसी ट्रेन से मुझे गंतव्य तक पहुँचवाने का भरोसा दिलाया और स्टेशन पहुँचने को कहा।

एक साधारण श्रेणी का टिकट खरीदने के लिए मैंने स्टेशन की टिकट खिड़की का रुख किया तो वहाँ पर लगी लंबी लाइन देख कर मेरे हाथ-पाँव फूल गए। दोपहर की गर्मी में पसीना चुआते टिकटार्थियों की बेचैनी भरी जद्दोजहद देखकर मुझे भी पसीना आ गया। इस बार गर्मी का आगमन कुछ जल्दी ही हो गया है। गाड़ी छूटने में केवल पाँच मिनट बचे थे और लाइन खत्म होने वाली नहीं थी। इसके फलस्वरूप टिकट के लिए मुझे विद्यार्थी जीवन की एक तकनीक अपनानी पड़ी। वहाँ महिलाओं की लाइन में सिर्फ दो बच्चियां खड़ी थीं। उनमें से एक ने मेरी समस्या पर सहानुभूति दिखाई और एक अतिरिक्त टिकट लेकर सहर्ष मुझे दे दिया।

टिकट पाकर प्रसन्न हुआ मैं जब प्लेटफार्म पर पहुँचा तो यात्रियों की भारी भीड़ देखकर ठिठक गया। अधिकांश तो विद्यार्थी ही थे जो तीन-चार दिन का ब्रेक लेने अपने गाँव-घर को जा रहे थे। गाड़ी के आने की उद्घोषणा हो गयी थी जो बस आने ही वाली थी। सभी अपना सामान उठाकर सीट कब्जाने की होड़ के लिए तैयार थे। इन बच्चों की तरह पिठ्ठू बैग के बजाय मेरे पास एक छोटा सा स्लिंग बैग ही था। मुझे भी लगा कि अब पच्चीस साल पहले वाली फुर्ती आजमाने का समय आ गया है। ए.सी. की आरक्षित सीट पर यात्रा करने की आदत पड़ जाए तो सामान्य श्रेणी की यात्रा कठिन लगने लगती है। मैंने सोचा की यह अच्छा ही है कि बीच-बीच में साधारण श्रेणी का स्वाद भी मिलता रहे ताकि इन बहुसंख्यक सहयात्रियों के अनुभव से दो-चार हुआ जा सके और अपनी काया भी प्राकृतिक हवा, धूप और गर्मी से जुड़ाव महसूस कर सके और तादात्म्य स्थापित कर सके।

आपदा में अवसर खोज निकालने की इस सोच पर आत्ममुग्ध हुआ मैं एक अलग तरह की चुनौती से भिड़ने के लिए खुद को तैयार करने लगा था तभी उन शुभेच्छु अधिकारी का फोन आ गया। उन्होंने बताया कि ट्रेन के गार्ड से बात हो गयी है। आप उनके कूपे में बैठकर जा सकते हैं। वहाँ ए.सी. तो नहीं है लेकिन भीड़भाड़ से अलग सुकून से बैठकर यात्रा हो सकती है। टॉयलेट की सुविधा भी अलग से है ही। मेरा मन पुनः प्रसन्न हो गया और मैं ट्रेन के आते ही उसके पिछले हिस्से की ओर लपक लिया। सफेद पैन्ट-शर्ट की यूनिफ़ॉर्म में गार्ड साहब मेरी प्रतीक्षा कर ही रहे थे। उन्होंने गर्मजोशी से मेरा स्वागत किया। मैंने भी कूपे में चढ़कर राहत की सांस ली और गाड़ी चल पड़ी।

आप सोच रहे होंगे कि अबतक जो हुआ उसमें कुछ भी आश्चर्यजनक नहीं था, फिर मैं यहसब क्यों बता रहा हूँ। दरअसल जो बताना चाहता हूँ वह इसके बाद हुआ। यह मेरे लिए एक नया अनुभव था।

IMG_20220413_191419मैंने इसके पहले कभी रेलगाड़ी के गार्ड का डिब्बा अंदर से नहीं देखा था। मेरे मन में रेलगाड़ी के गार्ड की छवि एक बेहद जिम्मेदार, सतर्क, जागरूक और लिखित मानक (एस.ओ.पी.) के अनुसार कार्य करने वाले अधिकारी की रही है। इसी छवि के अनुरूप इनकी सुविधाएं और पारिश्रमिक भी रेल विभाग देता होगा ऐसा मेरा मानना है। आज की इस छोटी सी मुलाकात में मुझे इस छवि को नजदीक से देखने का अवसर मिला। कार्य तो उनका वैसा ही है जैसा मेरा आकलन था। मैंने इन्हें बिल्कुल सजग, सतर्क, जिम्मेदार, उत्तरदायी और लिखित मानक के अनुसार निरंतर काम में व्यस्त रहते हुए ही देखा। अलबत्ता इस अधिकारी को प्राप्त सुविधाओं के बारे में मुझे अपनी धारणा को थोड़ा परिमार्जित करना पड़ा है। जब कूपे की आंतरिक सज्जा को मैंने देखा तो मन मसोस उठा।

इस कूपे में दोपहर की प्रचंड गर्मी से उत्पन्न लू को रोकने का कोई प्रबंध नहीं था। ए.सी. या कूलर की कौन कहे कूपे की छत के बीचोबीच लगे पंखे की हसटाकर अंदर की ओर रुख करके फिट की गयी थीं। हर गुजरते स्टेशन पर गार्ड साहब को दरवाजे या खिड़की से हाथ बाहर निकालकर वा जहाँ लग रही थी वहाँ बैठने के लिए कोई सीट ही नहीं थी। मात्र दो साधारण सीटें जो लगी थीं वे दोनों तरफ के दरवाजों से झंडी दिखानी होती है। इसलिए वे आवश्यकतानुसार इस या उस दरवाजे पर काम कर रहे होते हैं। इन्हें दरवाजे व खिड़कियां प्रायः खुली रखनी होती हैं और मौसमी बयार का अवगाहन करना ही होता है। जाहिर है कि कूपे में आजकल की गर्म लू के साथ धूल- मिट्टी का झोंका भी यदाकदा आता ही रहता है।

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गार्ड के बक्से और पोर्टर की साइकिल

रेल विभाग में प्रत्येक गार्ड का एक बक्सा होता है जिसमें वे अपना निजी सामान व ड्यूटी में प्रयोग हेतु जरूरी कागजात व उपकरण आदि रखते हैं। यह बक्सा लकड़ी या लोहे का बना होता है। वह ड्यूटी में उनके साथ चलता है जिसे लाकर लादने व उतारकर ले जाने के लिए एक कुली या पोर्टर की ड्यूटी होती है। आपने प्लेटफार्म पर पड़े ऐसे बक्से देखे होंगे। मैंने देखा कूपे के बीच छत में लगे एकमात्र पंखे के ठीक नीचे यही बक्सा रखा गया था| इसपर बैठकर ही ऊपर से बरसती हवा रूपी किरपा का लाभ लिया जा सकता था। गार्ड साहब ने इस बक्से पर रखे सामान समेटकर एक तरफ रख दिए और एक गमछा बिछाकर बड़े सम्मान से मुझे बैठने के लिए प्रस्तुत कर दिया। सुना है अब रेल विभाग इस बक्से के स्थान पर एक ट्रॉली बैग देने वाला है जिसे गार्ड साहब खुद ही लाएंगे और ले जाएंगे। उस स्थिति में पंखे के नीचे बैठने का यह सस्ता साधन भी चला जाएगा।

इस बक्सासन पर लम्बवत बैठकर मुझे आत्म गौरव का भाव घेरते ही जा रहा था कि कुछ देर में कमर ने कहीं टेक लेने की गुहार लगा दी। मैंने उसे कुछ देर तो अनसुना किया लेकिन कुछ देर बाद मेरी पीठ भी उसके सुर में सुर मिलाने लगी। फिर गर्दन की बारी आयी और उसके साथ सिर भी कोई आश्रय खोजने लगा। अंततः मैं खड़ा हो गया। इसपर रजिस्टर भरने में व्यस्त गार्ड साहब ने सिर उठाकर मेरी ओर प्रश्नवाचक निगाह से देखा। मैंने कहा - टॉयलेट यूज़ कर लूँ क्या? उन्होंने प्रसाधन कक्ष की ओर इशारा किया। मैंने हैंडल घुमाकर दरवाजा खोला और अंदर झांक कर देखा।

अत्यंत छोटे से कोटरनुमा प्रसाधन कक्ष के एक कोने में वाश-बेसिन था जिसमें पानी की टोटी लगी थी। दूसरे कोने में वेस्टर्न कमोड लगा था जो बिल्कुल सूखा हुआ था। अर्थात् पिछली सफाई किए जाने के बाद यह प्रयोग नहीं किया गया था। बल्कि अंदर जमी धूल बता रही थी कि इसका प्रयोग लंबे समय से नहीं किया गया था। मैंने एक कदम भीतर बढ़ाकर उसके नीचे की व्यवस्था का मुआयना किया। आशा के विपरीत वहाँ कोई टोटी, चेन वाला डिब्बा या जेटस्प्रे की व्यवस्था नहीं दिखी। यानि यदि यहाँ किसी को ‘दीर्घशंका’ मिटानी पड़ जाय तो उसके बाद प्रक्षालन की क्रिया के लिए वाश-बेसिन की टोटी से ही पानी भरना पड़ेगा। उसके लिए किसी पात्र की व्यवस्था भी अपने व्यक्तिगत स्रोत से करनी होगी तथा हैंडवाश लिक्विड की बोतल भी साथ रखनी होगी। मैंने किसी प्रकार की शंका के निवारण का विचार तत्काल स्थगित कर दिया और दरवाजा भिड़ाकर वापस आ गया।

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गार्ड का डिब्बा कभी-कभी प्लेटफॉर्म की सीमा के बाहर भी खड़ा हो जाता है।

गार्ड साहब ने इशारे से ही पूछा कि मैंने टॉयलेट यूज़ क्यों नहीं किया? मैंने कहा कि अभी कोई खास जरूरत नहीं है। वैसे भी इतनी गर्मी है कि शरीर का पानी पसीना बनकर ही उड़ा जा रहा है। फिर कुछ देर बाद मैंने थोड़े संकोच से बताया कि कमोड के आसपास पानी का कोई पॉइंट नहीं है। वे झंडी दिखाकर निवृत्त हुए तो अंदर जाकर देखने लगे फिर बताया कि कमोड वाले कोने में पीछे की ओर एक पाइप है जिसमें लगे नॉब को दबाने पर सीट में पानी फ्लश हो जाता है। मैंने जब प्रक्षालन की व्यवस्था न होने की ओर ध्यान दिलाया तो उन्होंने मुस्कराते हुए कहा कि यह छोटी दूरी की ट्रेन है। इसमें ‘उसकी’ जरूरत पड़ती ही नहीं है। मैंने हाँ में सिर हिलाया लेकिन यह जोड़ दिया – “फिर भी आपात कालीन स्थिति के लिए इसकी व्यवस्था तो होनी ही चाहिए... आपको अपनी डायरी या शिकायत पुस्तिका में इसका उल्लेख कर देना चाहिए।’’ गार्ड साहब के चेहरे से टपकती सज्जनता यह बता रही थी कि वे ऐसी कोई शिकायत दर्ज नहीं करने वाले हैं।

बहरहाल जब आधे घंटे बाद अगले स्टेशन पर गाड़ी रुकी तो बड़ी संख्या में लोकल यात्री ट्रेन से उतरे। मैंने सोचा कि अब साधारण डिब्बे में निश्चित ही कुछ सीटें खाली हो गयी होंगी जिनपर गद्दी भी लगी होगी, ऊपर पंखा भी चल रहा होगा और पीठ को टेक लेने का सुभीता भी होगा। मैंने गार्ड साहब को अपनी मंशा बतायी, उनकी सदाशयता के लिए धन्यवाद दिया और अपना बैग उठाकर नीचे उतर गया। पीछे का डिब्बा अपेक्षया कम भीड़ वाला था। मुझे आसानी से खिड़की वाली एकल सीट खाली मिल गयी। सूर्य देवता भी अपनी हेकड़ी छोड़कर अस्ताचल में डूब जाने की चिंता में लग गए थे।

जब ट्रेन आगे बढ़ी तो दोनों किनारे फैली हरियाली से छनकर आती हवाओं ने शरीर से चिपके पसीने को चलता कर दिया। इतना सुकून पाकर हमने अपना मोबाइल खोल लिया और आपको यह किस्सा सुनाने के लिए नोटपैड पर लिखना शुरू कर दिया। मेरे शुभेच्छु रेल अधिकारी ने तो नहीं ही सोचा होगा कि उनकी इस सदाशयी अहेतुक सहायता ने मुझे एक अभूतपूर्व अनुभव का लाभ दे दिया। बल्कि मुझे डर है कि इसे एक असुविधा समझकर वे असहज न महसूस करें। मैं तो इस सदाशयता के लिए उन्हें हृदय से धन्यवाद ही दूंगा।

सोच रहा हूँ अंग्रेजों ने गार्ड का डिब्बा जैसा डिजायन किया होगा उसमें आजादी के बाद शायद कोई बड़ा सुधार नहीं किया गया है। इसके पीछे शायद मूल मंत्र यह रहा हो कि अधिक आरामदायक व्यवस्था पाकर गार्ड साहब को कहीं झपकी आ गयी तो गड़बड़ हो जाएगी। रेल के जानकार इसपर बेहतर प्रकाश डाल सकते हैं।

(सत्यार्थमित्र)

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गुरुवार, 14 जुलाई 2016

तकरोही और अमराई गाँव, इंदिरानगर

14.07.2016
तकरोही और अमराई गाँव, इंदिरानगर
आज की सुबह लखनऊ में हुई और साइकिल से सैर भी वहीं हो ली। इधर मेरे अपार्टमेंट में एक साथ तीन नयी साइकिलें आ गयी हैं। स्कूल, दफ्तर या दूसरे रोजगार को जाने के लिए नहीं बल्कि शौकिया चलाने या व्यायाम के लिए। मुझे आसानी से एक बढ़िया साइकिल उधार मिल गयी। भगवान करे यह रुझान और बढ़े, फूले-फले।
मुंशीपुलिया चौराहे से तकरोही के लिए विक्रम ऑटो वाले सवारियाँ ढोने में काफी व्यस्त रहते हैं। आज मैंने उसी रास्ते पर साइकिल बढ़ा दी। सुबह रास्ता सुनसान था। कुछ टहलने वाले लोग घरों से निकलकर आसपास के पार्कों की ओर जा रहे थे। सेक्टर-11 से होकर तकरोही मोड़ तक जाने वाली सड़क तो आवास विकास परिषद द्वारा विकसित इंदिरानगर योजना का भाग है। यह सड़क चौड़ी भी है और सरल रेखा की तरह सीधी है। यह चौराहों या तिराहों पर समकोण बनाती है। लेकिन पुराने बसे गाँव और अब भीड़ भरी बाजार बन चुके तकरोही की ओर मुड़ते ही सड़क टेढ़ी-मेढ़ी और पतली होती हुई ऊबड़-खाबड़ पथरीली गली में बदल जाती है। यहाँ सड़क के दोनो ओर पुराने जमाने की शक्ल वाली दुकानें हैं। घरेलू जरुरत के सामान, साड़ी-कपड़ा, लोहा, बर्तन, आटा-चक्की, तेल पेराई, मसाला पिसाई, रुई धुनाई, मोबाइल रिपेयर, चाय-पकौड़ी, दवा, आयुर्वेद, होमियोपैथी, लोहे के बॉक्स, आलमारी, एटीएम, बैंक, आदि सभी प्रकार की दुकाने कंधे से कंधा मिलाती दो-तीन सौ मीटर लंबे बाजार में अटी पड़ी हैं। इतनी सुबह अधिकांश दुकानें बंद थीं। केवल चायवाले और उनके बगल में पान और गुटखा की पुड़िया बेचने वाले धंधा शुरू कर चुके थे। हार्डवेयर की एक दुकान भी खुली थी जहाँ प्लम्बर और मिस्त्री जुटने वाले थे।
इस बाजार की सड़क पर हिचकोले खाने के बाद जब मैं आगे निकल गया तो बिना गढ्ढे वाली पिचरोड फिर मिल गयी। इसकी चौड़ाई तो ज्यादा नहीं थी लेकिन यह आसपास की जमीन से काफी ऊँची करके नयी बनायी गयी सड़क लगती थी। इसी बीच पीले रंग की एक ही शक्ल-सूरत की कई स्कूल वैन्स का काफिलानुमा मेरे पीछे से आया और आगे अलग-अलग गलियों में घुस गया। एक वैन पर जयपुरिया स्कूल लिखा हुआ था। इनके पीछे धूल का ऐसा गुबार उठा कि मुझे साइकिल रोककर नाक पर रुमाल की छननी लगानी पड़ी।
आगे बढ़ा तो इस सड़क पर भी "फ्रीहोल्ड प्लॉट उपलब्ध है" वाले अनेक साइनबोर्ड मोबाइल नंबर के साथ दिखने लगे। एक बोर्ड पर तो लिखा था - इन्वेस्टमेंट परपज़ के लिए भी संपर्क करें। यानि यदि आपने अपनी जरुरत से ज्यादा धन इकठ्ठा कर लिया है तो उसे यहाँ लगा दीजिए। उसके काला या सफेद होने के बारे में कुछ भी पूछे बिना आपको निवेश के लिए जमीन दे दी जाएगी।
मुझे इस सड़क पर पीपल और बरगद के दो घने पेड़ों ने बहुत आकर्षित किया। पीपल तो सड़क पर ही था - राहगीरों को रुककर सुस्ताने के लिए बेहद मुफ़ीद। इसकी तस्वीर लेते समय अचानक एक जवान सिर्फ जीन्स पहने नंगे बदन बगल के खेत से उचककर सड़क पर चढ़ आया जिसके हाथ में एक लीटर वाला इंजिन आयल का खाली डिब्बा था। वह स्वच्छता कार्यक्रम को ठेंगा दिखाता हुआ आया था और पूरे जोश में बाजार की ओर जा रहा था। पेड़ के नीचे ही स्कूली बच्चों को ले जाता एक बैटरी चालित रिक्शा भी दिखा जो पर्यावरण को धुँआ-रहित बनाने में बहुत योगदान कर सकता है। इसी रोड पर विक्रम-ऑटो वाले काला धुँआ उगलते बेखौफ़ चलते रहते हैं।
बरगद का पेड़ सड़क से बीस-पच्चीस मीटर हटकर एक खाली जमीन में था। यह अभी बहुत पुराना नहीं था लेकिन पत्तियां खूब हरी और मस्त छायादार थीं। हाल में वट-सावित्री की पूजा में सुहागिनों द्वारा इस पेड़ के तने में लपेटे गये रक्षासूत्र अभी भी कायम थे। लेकिन वहाँ से पवित्रता भाग खड़ी हुई थी। पेड़ के नीचे बरसात से उत्पन्न गन्दगी का बोलबाला तो था ही उसके तने के पास ही एक लड़का शौचक्रिया में मशगूल था। फिर भी इस सुन्दर पेड़ के साथ सेल्फी लेने का लोभसंवरण मैं नहीं कर सकता था। मैंने सोचा कि वापस लौटकर फोटो ले लूंगा, तबतक यह बच्चा निपट चुका होगा। लेकिन वापसी के समय भी एक दूसरे लड़के ने मैदान टेक-ओवर कर लिया था। लेकिन इस बार मैंने मोबाइल कैमरा खोल ही लिया।
मैं आगे अमराई गाँव तक गया था जहाँ रामदीन का पुरवा दिखा। उधर से लौटते समय कुछ घोषियों (दुग्ध व्यवसायी) के घर दिखे। वहाँ भैसों की बहुतायत थी, गायें कम थीं। एक लड़की गोबर निकाल रही थी और उसके घर की खुली छत पर छोटे-छोटे बच्चे नंगे होकर आधे भीगे हुए उछल-कूद कर रहे थे। उन्हें एक औरत ठीक से नहलाने के लिए पुकार रही थी लेकिन वे हाथ नहीं आ रहे थे। दृश्य बड़ा रोचक और नयनाभिराम था लेकिन फोटो लेने का विचार पैदा होने से पहले ही मैंने उनकी निजता का ख्याल करते हुए दबा दिया।
मुझे एक कॉमन बात सब जगह दिख रही है। पशुओं के बाड़े से गोबर साफ करने और उनकी देखभाल का काम प्रायः घर की लड़कियां या औरतें ही करती हैं। मर्दों ने चारा खरीद कर लाने, दूध दूहने और बेचने का काम अपने हाथ में ले रखा है। पता नहीं यह कार्य विभाजन कितना ठीक है या नहीं है। शिक्षा का अभाव भी इन घरों में साफ़ दिखता है।










(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
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बुधवार, 13 जुलाई 2016

इब्राहिमपुर से आगे मछेछर

बरसात का मौसम शुरू होने के बाद स्विमिंग पूल में उतरने से बेहतर है साइकिल चलाना। जल जनित बीमारियों से बचना जरूरी है। ऐसे मौसम में एक सुरक्षित व्यायाम भी है साइकिल चलाना। शहर से बाहर निकल कर प्राकृतिक हरियाली से आँखों को तरोताजा करने का अच्छा माध्यम है साइकिल चलाना।
साइकिल से सैर के लिए मैं रायबरेली पुलिस लाइन्स के बगल से गुजरने वाली मटिहा रोड पर दूसरी बार गया। पहली बार गया था तो मई की भीषण गर्मी थी। पानी के लिए त्राहि-त्राहि मची हुई थी। जिला प्रशासन सूखे हुए तालाबों में पानी भरवा रहा था और स्कूली बच्चे परीक्षा परिणाम के बाद गर्मी की छुट्टी का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे। इस बार शहर से बाहर निकलते ही हरियाली का साम्राज्य फैला हुआ दिखा। सड़क के दोनो तरफ पेड़-पौधे, घास-फूस, और खर-पतवार का एक विस्तृत कोलाज़ बना हुआ था। इसका थीम कलर हरा था और सन्देश था - "सुबह-शाम की हवा - लाखों रूपये की दवा।"
गोड़ियन का पुरवा, मटिहा और इब्राहिमपुर से गुजरते हुए मुझे इस बार धरती का रंग पूरी तरह बदला हुआ दिखा। जिस तालाब में डीएम साहब ने तब पानी भरवाया था उसमें पानी के ऊपर हरे रंग की काई की मोटी परत जम गयी थी। वैसे ही जैसे गरम दूध को खुला छोड़ देने पर कुछ देर में उसकी सतह मोटी मलाई से ढक जाती है। ऐसा लगा जैसे किसी ने भी तालाब का पानी प्रयोग नहीं किया था। तालाब के किनारे आम के पेड़ों पर फल चमक रहे थे और खटिया पर बैठकर उनकी निगरानी करने वाली आँखे भी।
थोड़ी दूर आगे जो दूसरा तालाब था उसमें कुछ हलचल थी। काई का नामोनिशान नहीं था। तीन-चार लोग उसके किनारे बैठे हुए कटिया लगाकर मछली पकड़ने की कोशिश कर रहे थे। पानी की सतह पर उठते-गिरते बुलबुलों से पता चला कि इस तालाब में मछलियों का बसेरा है और इसीलिए हलचल भी है।
इब्राहिमपुर गाँव तो बबूल के घने जंगल के पीछे पूरी तरह छिप गया दिखता है। जंगल के बीच की पगडंडी से पिचरोड पर आकर दूसरी ओर जाते पुरुष और स्त्रियों को देखकर ही पता चल पाता है कि उधर कोई बसावट है जिसका निकास-पइसार इस सड़क की ओर से सई नदी तक है। मैंने सड़क किनारे साइकिल खड़ी करके तस्वीरें लेनी शुरू की तो एक सज्जन बोतल लटकाये लौटते दिखे। मुझे ही थोड़ी झेंप हुई। सोचते होंगे कि सुबह-सुबह यहाँ साइकिल खड़ी करके मैं कर क्या रहा हूँ। लघुशंका के उपक्रम का अभिनय करते हुए मैंने एक मिनट बिताया और उनके पीठ पीछे होते ही साइकिल भगाकर नदी के पुलपर चला आया।
पुल के नीचे एक ओर पानी थोड़ा बढ़ा हुआ था जिसमें मछलियाँ किलोल कर रहीं थी। दूर पूरब की ओर कुछ लड़के भी नदी के किनारे खड़े होकर किल्लोल कर रहे थे। नदी किनारे नित्यक्रिया से निपटने के बाद उनके हाव-भाव में जो मस्ती उभर आयी थी वह इतनी दूर से देखी और सुनी तो जा सकती थी लेकिन कैमरे में सहेजना संभव नहीं हुआ। पुल के दूसरी ओर नदी की सतह अभी भी जलकुम्भी और दूसरे खर-पतवार से पूरी तरह ढकी हुई थी। निश्चित ही उसके नीचे बह रहे पानी का दम घुटता होगा। शायद बरसात का पानी थोड़ा और बढ़े, बहाव तेज हो तो इस हरे और घने जाल को काटकर नदी की धारा स्वतंत्र हो सके। पुल पर यह नजारा देख रहे दूसरे लड़कों को वहीं छोड़कर मैंने थोड़ा और आगे जाने का निश्चय किया।
पुल से सड़क की ढलान पर सरपट भागती साइकिल पर बैठा हुआ मैं सामने कम और दायें-बायें ज्यादा देख रहा था। कारण यह कि समतल सड़क पर सवारियाँ न के बराबर थीं और आसपास के खेतों की हरियाली छटा देखते ही बनती थी। कुछ ही मिनटों में मैं मछेछर गाँव में पहुँच गया। सबसे पहले मुझे गायों और भैसों का बाड़ा मिला। एक पक्के मकान के बगल में खड़े छप्पर के नीचे बंधे दुधारू पशुओं के बीच बैठी एक युवती गोबर उठा रही थी। घर के बरामदे में चौकी पर बैठे दो-तीन पुरुष चाय पी रहे थे। एक महिला फर्श पर बैठकर कोई अनाज साफ कर रही थी। वहीं एक बल्ब दिन के उजाले में भी बहुत तेज चमक रहा था जिसे बन्द कर देने का ध्यान किसी को नहीं था। शायद उसे प्रकाश के लिए नहीं बल्कि बिजली आने-जाने का सूचक यन्त्र समझा जाता होगा।
पक्की सड़क पर बसे इस गाँव में कुछ परचून की दुकानें, चाय-पानी की भट्ठियां, पंक्चर बनाने वाले साइकिल मिस्त्री और रिचार्ज करने वाली गुमटियां दिखीं। गाँव में एक बड़ा सा परिसर सरकारी प्राइमरी स्कूल का भी दिखा। मैंने बिना रुके इस गाँव को भी पार कर लिया और एक सूखी हुई नहर की पुलिया पर रुका। वहीं खेतों के बीच से एक लड़का नमूदार हुआ तो मैंने उससे नहर में पानी नहीं होने के बारे में पूछा। उसे कुछ खास पता नहीं था। बोला- कभी-कभी पानी आता है। सड़क के दूसरी ओर एक टापू नुमा ऊँचा खेत दिखा जिसके चारो ओर टेढ़ा-मेढ़ा नाला खुदा हुआ था। लड़के ने बताया कि इस नाले में गंगनहर से सप्ताह में एक बार पानी छोड़ा जाता है। इस समय खेत में कोई फसल नहीं थी।
मैं वहीं से लौट आया। लौटते समय दो जगह रुकना पड़ा। एक जगह पिचरोड से निकलने वाली एक नई भरी गयी कच्ची सड़क मिली जिसकी पीली रेखा चारो ओर फैली हरियाली के बीच कंट्रास्ट बना रही थी उसकी तस्वीर खींचने रुका तो एक कुत्ता भी साथ लग लिया। दूसरी जगह एक झोपड़ी नुमा आकृति मिली जो लबे-सड़क वीराने में खड़ी थी। लग रहा था जैसे किसी फ़िल्म की शूटिंग के लिए सेट बनाया गया हो। यह आश्रय बनाने के लायक तो कतई नहीं थी, लेकिन फोटो लेने के लिए बरबस आकर्षित करती थी।
वहाँ से आगे बढ़ा तो कमलेश मिले जो खटर-खटर करती साइकिल पर भागे जा रहे थे। मैंने भी अपनी गति बढ़ा कर उनसे बराबरी की। बीए पार्ट-3 के विद्यार्थी थे। बछरावां के डिग्री कॉलेज में नाम लिखाया है। क्लास करने नहीं जाना पड़ता, केवल परीक्षा देना पड़ता है। इसलिए लगे हाथों एसएससी की तैयारी भी कर रहे हैं। रायबरेली में कोचिंग करते हैं। आठ सौ महीने के लगते हैं। छः महीने का कोर्स है। अलग-अलग विषय का कोचिंग महंगा पड़ता है। कम्बाइन में सस्ता पड़ता है। गणित, विज्ञान, रीजनिंग, इंग्लिश, जनरल नॉलेज पढ़ाया जाता है। घर पर रहकर पढ़ाई नहीं हो पाती। कोचिंग में ठीक रहता है।
यह सब बात करते हुए हम रायबरेली पहुँच गये। कमलेश कैनाल रोड की ओर कोचिंग लेने चले गये और मैं जेलरोड होते हुए अपने घर आ गया हूँ।


















(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)