हमारी कोशिश है एक ऐसी दुनिया में रचने बसने की जहाँ सत्य सबका साझा हो; और सभी इसकी अभिव्यक्ति में मित्रवत होकर सकारात्मक संसार की रचना करें।
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बुधवार, 28 फ़रवरी 2024

मतदाता जागरूकता गीत

आजकल भारत का चुनाव आयोग लोकसभा चुनाव 2024 की तैयारी में पूरी ताकत से लगा हुआ है। प्रशासनिक मशीनरी वोटर लिस्ट की तैयारी से लेकर विविध प्रकार के संसाधनों को जुटाने में लगी है। इसी क्रम में देश के मतदाताओं को उनके मताधिकार के बारे में जागरूक करने के लिए विशेष अभियान (SVEEP) भी चलाया जा रहा है। तमाम स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय, सामाजिक-सांस्कृतिक संस्थाएं, एन.जी.ओ., रंगकर्मी आदि इस कार्य में व्यस्त हैं।

जो नौजवान पहली बार वोटर बने हैं उन्हें हरहाल में पोलिंग बूथ तक आने को तैयार करना है। इसी सिलसिले में कुछ संस्थाओं कि मांग पर मैंने दस साल पहले रायबरेली में लिखे इस इस गीत के दूसरे और तीसरे अंतरे को दुबारा लिखा है। अब यह बिल्कुल नया सा हो गया है। आनंद लीजिए, गुनगुनाइए और पसंद आए तो प्रसारित कीजिए।  

 

मतदाता जागरूकता गीत

(धुन- आओ बच्चों तुम्हें दिखाएं झांकी हिंदुस्तान की ...)

वोट डालना अच्छा है जी, लगता इसमें दाम नहीं।

वोट डालकर आने से है, अच्छा कोई काम नहीं।।

जागो मतदाता, जागो मतदाता… जागो मतदाता, जागो मतदाता

लोकतंत्र की नींव बनेगी, मतदाता के वोटों से

लोकनीति भी नेक रहेगी, मतदाता के वोटों से

ऊंच-नीच का भेद मिटेगा, जाति-धर्म भी होगा दूर

हरगरीब का क्लेश कटेगा, मतदाता के वोटों से

वोटर के अधिकारों में है, भेद-भाव का नाम नहीं

वोट डालकर आने से है, अच्छा कोई काम नहीं

जागो मतदाता, जागो मतदाता… जागो मतदाता, जागो मतदाता

देशप्रेम की शान दिखाए लंबी लाइन वोटर की

बहुमत की सरकार बनाए लंबी लाइन वोटर की

सत्ता की कुंजी है इसमें कानूनों का उद् गम भी

सबसे बड़ी अदालत है ये लंबी लाइन वोटर की

जिम्मेदारी बहुत बड़ी, अब बिना वोट आराम नहीं

वोट डालकर आने से है, अच्छा कोई काम नहीं

जागो मतदाता, जागो मतदाता… जागो मतदाता, जागो मतदाता

अपनी संसद नयी बनी है भारतवासी हाथों से

फिर सरकार नयी चुननी है भारतवासी हाथों से

लोकतंत्र का धर्म हमें इस दुनिया को समझाना है

अब तकदीर नयी लिखनी है भारतवासी हाथों से

देना है संदेश शांति का इस पर लगे विराम नहीं

वोट डालकर आने से है, अच्छा कोई काम नहीं।।

जागो मतदाता, जागो मतदाता … जागो मतदाता, जागो मतदाता

वोट डालना अच्छा है जी, लगता इसमें दाम नहीं।

वोट डालकर आने से है, अच्छा कोई काम नहीं।।

जागो मतदाता, जागो मतदाता… जागो मतदाता, जागो मतदाता

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी ‘सत्यार्थमित्र’

बुधवार, 10 जनवरी 2024

राष्ट्रधर्म निर्वाह

 

आओ हमसब चुन लें अपने देशप्रेम की राह।

प्रण हो मानवता की सेवा राष्ट्र-धर्म निर्वाह।।

(1)

भौतिकता की चकाचौंध में नौजवान भरमाये,

मूल्यहीन पश्चिम की शिक्षा मनोरोग भी लाये।

वाम और दक्षिण के पथ जब इक-दूजे को काटें,

युगों-युगों का ज्ञान सनातन सच्ची राह दिखाये॥

मुखर हुई जनजन में अब अपने गौरव की चाह।

प्रण हो मानवता की सेवा राष्ट्र-धर्म निर्वाह॥

(2)

विद्या विनयशील कर दे जो दक्ष बनाये हमको,

अर्जित धन से धर्म करें जो सुख पहुँचाये सबको।

परहित सबसे बड़ा धर्म पर-पीड़ा है अधमाई,

भारत का संदेश यही पहुँचाना है इस जगको॥

युद्धों का उन्माद कर रहा कितने देश तबाह।

प्रण हो मानवता की सेवा राष्ट्रधर्म निर्वाह।।

(3)

राजनीति में जाति-पंथ की पैठ न बढ़ने पाये,

अच्छा सच्चा जनसेवक ही इसमें चुनकर आये।

लोकतंत्र में भाईचारा पर संकट मत डालो,

अज्ञानी, अपराधी, पापी से यह देश बचा लो॥

सांस्कृतिक उत्थान दे रहा सबको नेक सलाह।

कर लें मानवता की सेवा राष्ट्रधर्म निर्वाह।।

सत्यार्थमित्र

Rashtradharm

सांकेतिक चित्र : गूगल से साभार.

सोमवार, 19 सितंबर 2016

यही समय है आँखें खोलो (गीत)

एक अंग्रेजी व्हाट्सएप सन्देश से प्रेरित ताज़ी रचना
यही समय है आँखें खोलो
जब इस दुनिया से चल दूंगा, तुम रोओगे नहीं सुनूंगा
व्यर्थ तुम्हारे आँसू होंगे, तब उनको ना पोछ सकूंगा
बेहतर है तुम अभी यहीं पर मेरी खातिर जी भर रो लो
यही समय है आँखें खोलो
मेरे पीछे तुम भेजोगे गुलदस्तों में फूल सजाकर
उनकी महक व्यर्थ जाएगी, छू न सकूंगा हाथ बढ़ाकर
बेहतर है तुम अभी यहीं पर फूलों वाली खुशबू घोलो
यही समय है आँखें खोलो

जब न रहूँगा इस दुनिया में मुझपर अच्छी बात करोगे
वह सराहना सुन न सकूंगा चाहे जितने भाव भरोगे
बेहतर है तुम अभी यहीं पर मुझे सराहो मुझे भिगो लो
यही समय है आँखें खोलो

प्राण पखेरू उड़ जाने पर सारी गलती माफ़ करोगे
जान नहीं पाऊंगा वह सब जैसा भी इंसाफ करोगे
बेहतर है तुम अभी यहीं पर पाप मेरे निज मन से धो लो
यही समय है आँखें खोलो

जब न मिलूंगा आसपास तो कमी खलेगी तुमको मेरी
पर महसूस कहाँ होगा तब ढँक लेगी जब नींद घनेरी
बेहतर है तुम अभी यहीं पर मिस करते हो खुलकर बोलो
यही समय है आँखें खोलो

इस दुनिया से लेकर हमको चल देगा जब काल हमारा
पछताओगे कितना कम था मेरे संग जो समय गुजारा
बेहतर है तुम अभी यहीं पर साथ-साथ जीवन में हो लो
यही समय है आँखें खोलो

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
ये है मूल रचना
*"When I'll be dead.....,*
*Your tears will flow,..*
*But I won't know...*
*Cry for me now instead !*

*You will send flowers,..*
*But I won't see...*
*Send them now instead !*

*You'll say words of praise,..*
*But I won't hear..*
*Praise me now instead !*

*You'll forget my faults,..*
*But I won't know...*
*Forget them now, Instead !*

*You'll miss me then,...*
*But I won't feel...*
*Miss me now, instead*

*You'll wish...*
*You could have spent more time with me,...*
*Spend it now instead !!"*
Moral......
Spend time with every person you love,
Every one you care for.
Make them feel special,
For you never know when time will take them away from you......

(भावानुवाद : सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

सोमवार, 23 मार्च 2015

कुछ अच्छा सा कर जाएँ हम

अमर शहीद भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव को याद करते हुए आज एक मेला लगा है, मुंशीगंज- रायबरेली में। वर्ष 1921 के मुंशीगंज गोलीकांड को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के ‘दूसरे जालियाँवाला बाग’ का ऐतिहासिक महत्व प्राप्त है। इन शहीदों के अमर बलिदान के सम्मान में यहाँ सई नदी के तट पर एक भव्य शहीद स्मारक स्थापित है। एक गैर सरकारी संस्था के संयोजन में स्थानीय लोगों द्वारा प्रतिवर्ष २३ मार्च से तीन दिनों का शहीद स्मृति मेला लगता है। शहीदों को पुष्पांजलि, और गणमान्य अतिथियों के उद्‍बोधन के साथ-साथ इस दौरान अनेक सांस्कृतिक कार्यक्रम, खेल-कूद प्रतियोगिताएँ, किसान मेला, प्रदर्शनी, स्वास्थ्य शिविर इत्यादि आयोजित होते हैं। रायबरेली में तैनाती के फलस्वरूप इस वर्ष मुझे भी यहाँ आयोजित कवि-सम्मेलन का रसास्वादन करने का अवसर मिला है।
आज सुबह इसकी तैयारी करते-करते मन में जो कुछ घूम रहा था उसे शब्दों में जोड़ने का अवसर लखनऊ से रायबरेली की यात्रा के दौरान मिल गया (मार्च महीने में कोषागार में कार्याधिक्य की व्यस्तता के कारण ऐसा ही समय ब्लॉगरी और फेसबुक के लिए मिल पाता है)। इस गीत को वहाँ मंच पर सुनाने का मौका मिलेगा ही लेकिन यहाँ अपने ब्लॉग पर इसे और प्रतीक्षा नहीं करा सकता-
कुछ अच्छा सा कर जाएँ हम

रोज़ शिकायत इनकी-उनकी
अस्त-व्यस्त से जन-जीवन की
देख पराये काले धन की
पीड़ा सहलाते निज मन की
इन सब से बाहर आएँ हम
कुछ अच्छा सा कर जाएँ हम।1।



हमने नेक समाज बनाया
इसमें है हम सब की छाया
अंग-अंग जब स्वस्थ रहेगा
तभी निरोग रहेगी काया
अपने हिस्से काम मिला जो
पूरा करें, सँवर जाएँ हम
कुछ अच्छा सा कर
जाएँ हम।2।


बेटा हँसता, बिटिया रोती
वह पढ़ता वो घर को ढोती
अधिकारों में भेदभाव क्यों
क्षमता में तो समता होती
पढ़ें बेटियां, बढ़ें बेटियां
कर दें सिद्ध सुधर जाएँ हम
कुछ अच्छा सा कर जाएँ हम।3।


देशप्रेम से बड़ा प्रेम क्या
राष्ट्रधर्म से बड़ा धर्म क्या
निर्मल स्वच्छ बनायें भारत
इससे सुन्दर और कर्म क्या
नहीं हाथ पर हाथ धरेंगे
कस के कमर उतर जाएँ हम
कुछ अच्छा सा कर जाएँ हम।4।


अपने संविधान को जानें
अधिकारों को हम पहचानें
लोकतंत्र में शक्ति तभी है
जब हम कर्तव्यों को मानें
धर्म-जाति की छुआ-छूत को
तजकर अपने घर जाएँ हम
कुछ अच्छा सा कर जाएँ हम।5।



सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
www.satyarthmitra.com

गुरुवार, 26 फ़रवरी 2015

अहा ! फरवरी कितनी प्यारी। (गीत)

अहा ! फरवरी कितनी प्यारी।
कड़ी ठण्ड से पीछा छूटा
सर्दी से गठ बंधन टूटा
अब अलाव है नहीं जरूरी
दूर हुई सबकी मज़बूरी
बच्चे अब भरते किलकारी
अहा ! फरवरी कितनी प्यारी।1।
बिस्तर से हट गयी रजाई
हीटर की हो गयी विदाई
कम्बल भी बक्से में सोया
सबने ऊनी स्वेटर धोया
अब सूती कपड़ों की बारी
अहा ! फरवरी कितनी प्यारी।2।
एक सूट खबरों में आया
लाखों जिसका दाम बताया
मचा मीडिया में कोहराम
फिर वो सूट हुआ नीलाम
दाम करोड़ों दें व्यापारी
अहा ! फरवरी कितनी प्यारी।3।
अच्छे दिन वाली सरकार
भरने लगी विजय हुंकार
आम आदमी ने रथ रोका
दिल्ली की जनता ने टोका
दम्भ पड़ गया इसको भारी
अहा ! फरवरी कितनी प्यारी।4।
बढ़ा शादियों का भी जोर
विकट बराती हैं चहुँ ओर
फागुन की मस्ती में झूमें
चाहें नर्तकियों को चूमें
लठ्ठम लठ्ठा गोली बारी
अहा ! फरवरी कितनी प्यारी।5।
बोर्ड परीक्षा शुरू हुई है
शुचिता जिसकी छुई मुई है
अजब नकलची गजब निरीक्षक
सॉल्वर बन बैठे हैं शिक्षक
दस्ता सचल करे बटमारी
अहा ! फरवरी कितनी प्यारी।6।
राजनीति में फँसा बिहार
लालू जी की टपकी लार
संख्या बल में इतनी खूबी
माझी की ही नैया डूबी
फिर नितीश को मिली सवारी
अहा ! फरवरी कितनी प्यारी।7।
संसद में घिरती सरकार
भूमि अधिग्रहण को तैयार
अन्ना जी फिर मंचासीन
धरना में फिर सीएम लीन
छुट्टी पर बेटा-महतारी
अहा ! फरवरी कितनी प्यारी।8।
क्रिकेट कुम्भ आरम्भ हुआ है
सौ करोड़ की यही दुआ है
टीम इंडिया रख ले लाज
बिश्व विजेता हो अंदाज
दिखती है अच्छी तैयारी
अहा ! फरवरी कितनी प्यारी।9।
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी) www.satyarthmitra.com

बुधवार, 21 जनवरी 2015

एक रुबाई एक ग़ज़ल (तरही नशिस्त से)

रुबाई
हर शाख हरी भरी महकते हैं फूल
जो साथ मिले तेरा चहकते हैं फूल 
लहरा जो गयी हवा तेरा आँचल सुर्ख
पाकर के जवाँ अगन दहकते हैं फूल
ग़ज़ल
आज ये हादसा हो गया
प्यार मेरा जुदा हो गया
बंदगी कर न पाया कभी
यार मेरा ख़ुदा हो गया
आप ने तो जिसे छू लिया
वो ही सोना खरा हो गया
सूखता जा रहा था शजर
तुमने देखा हरा हो गया
आदमी ख़्वाब में उड़ रहा
जागना बेमज़ा हो गया
भाइयों की जुदा ज़िन्दगी
दरमियाँ फासला हो गया
गोद में जिसने पाला कभी
आज वो भी ख़फा हो गया
उसकी उंगली पकड़ के चले
बस यही हौसला हो गया
जब सियासत में रक्खा क़दम
देखिये क्या से क्या हो गया
है सियासत बड़ी बेवफ़ा
दोस्त बैरी बड़ा हो गया
राजधानी में छायी किरन
केजरी क्या हवा हो गया

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
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सोमवार, 22 दिसंबर 2014

फासले बढ़ रहे जिंदगी में (तरही ग़जल)

(बह्‍र : फाइलुन फाइलुन फाइलुन फ‍अ)

फासले बढ़ रहे जिंदगी में
दूरियाँ हो गयीं आदमी में

चल पड़े हैं कहीं से कहीं हम 
ज़ानेजाँ बस तिरी आशिक़ी में

इश्क में डूबने की न पूछो
हुस्न देखा किया चाँदनी में

फूल भी, ख़ार भी मोतबर हैं
हुस्न पोशीदा है हर किसी में

नाज़-नख़रे उठाये बहुत से
फ़र्क़ आया नहीं बेरुख़ी में

बेख़ुदी में सनम उठ गए हैं
ये क़दम अब तिरी आशिक़ी में

काम था तो बड़ा मुख़्तसर ही
हो न पाया मगर काहिली में

आदमी आम कहता था खु़द को
सादगी तो न थी सादगी में

या इलाही बचा पाक दामन
जिस्म को घूरती देहलवी में

तू सितमगर अगर हो गया तो
ख़ुद भी तड़पेगा बेचारगी में

वाह रे जिंदगी की कहानी
तिश्‍नगी ही बची ज़िन्दगी में

हर किसी को बराबर न समझो
फर्क है आदमी आदमी में

शायरी में सितम है रुबाई
बह्‍र में या बधें हथकड़ी में

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
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शुक्रवार, 19 दिसंबर 2014

रुबाई की आजमाइश

तरही नशिस्त में उस्ताद जी ने चुनौती दी रुबाई कहने की। शायरी में रुबाई छंद कठिन माना जाता है। इसमें बीस-बीस मात्राओं की चार लाइनें कहनी होती हैं जिनकी पहली, दूसरी और चौथी लाइन की तुक (काफिया) समान होता है। सभी लाइ्नों में मात्राओं का क्रम (बह्‍र) एक समान रखना होता है और चारो लाइनों में अभीष्ठ बात पूरी (मुकम्मल) करनी होती है। उस्ताद द्वारा उदाहरण स्वरूप एक लाइन (मिसरा) समस्या के रूप में दे दी जाती है। उसी रूप और गुण वाली चार लाइने तैयार करके रुबाई पूरी होती है। मुझे जो मिसरा मिला उसकी बहर और उनके घटक (औजान) भी बताये गये जो निम्नवत्‍ है-

कुछ लोग बुरा भला मुझे कहते हैं
मफ़ऊल मफाइलुन मफाईलुन फअ
फलफूल सुफूलफल सुफलफलफल फल

इसके आधार पर जो रुबाई मेरे द्वारा कही गयी उसे उस्ताद ने पास कर दिया है। लीजिए आप भी शौक फरमाइए -

-1-
कमज़ोर सदा नज़र झुकी रखते हैं
कमज़र्फ बहुत सितम किया करते हैं
इक रोज बड़ी सज़ा मिलेगी उनको
जो लोग बुरा भला इन्हे कहते हैं

*
-2-
इक नजर तिरी उथल पुथल करती है
पुरजोर कशिश महक महक जाती है
सब लोग चकित पलट पलट तकते हैं
जो आग बुझी लहक लहक उठती है

**

-3-
वह रोज बहुत मरा मरा कहता था
प्रभु नाम वही जपे चला जाता था
यह बात हुई कि जो कभी रहजन था
वह संत बना अमर कथा रचता था

***

मुझे पता है कि आप हौसला आफ़जाई तो करेंगे ही। नया-नया फितूर है। आपकी दाद से ही यह परवान चढ़ेगा। Smile

(इस मौके पर जो ग़जल कही गयी वह अगली पोस्ट में।)

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
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शनिवार, 15 नवंबर 2014

जिन्दगी अपनी बनाते हैं बनाने वाले (तरही ग़जल)

उस्ताद ने इस बार जब मिसरा दिया था तो मैं उपस्थित नहीं था। किसी और ने जब फोन पर बताकर नोट कराया तो इसकी बहर गलत समझ ली गयी और पूरी ग़जल गलत बहर में कह दी गयी। बाद में ऐन वक्त पर नशिस्त से पहले गलती का पता चला तो काट-छांट करके और कुछ मलहम पट्टी लगाकर शेर खड़े किये गये। अब यहाँ ब्लॉग पर तो अपनी मिल्कियत है। सो इस अनगढ़ को भी ठेल देता हूँ। साथ में एक कठिन बहर की रुबाई भी बनाने को दी गयी थी जिसे मैंने डरते-डरते आजमाया। 

रुबाई

हरगिज न करूँ कभी कहीं ऊल जुलूल
अब बाँध लिया गिरह तिरा पाक उसूल
हर रोज किया करूँ मैं सजदा तेरा
कर ले तू खुदा मेरी इबादत को कुबूल

ग़जल

बदगुमाँ होते हैं क्यूँ हार के जाने वाले
जिंदगी अपनी बनाते हैं बनाने वाले

मत करें प्यार का इजहार गरज़मंदी में
बेगरज़ होके रहें प्यार जताने वाले

गुल खिलाती है हवा धूप की गर्मी लेकर
प्यार के जश्न हुए दिल को खिलाने वाले

प्यार गहरा हो तो बढ़ जाती है ताकत दिल की
साहसी होते बहुत दिल से निभाने वाले

चूम लेने का हुनर आया अदा में कुछ यूँ
लब बिना बोले बहुत कुछ हैं बताने वाले

प्यार के रंग बने जैसे कि ये शेरो सुखन
यकबयक बनते नहीं बनने बनाने वाले

एक मुस्कान से शुरुआत भली होती है
प्यार की राह यही लब हैं बताने वाले

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

सत्यार्थमित्र
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सोमवार, 22 सितंबर 2014

जुगनू अपना फर्ज़ निभाते रहते है (तरही ग़जल)

तरही नशिस्त के सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए इस बार उस्ताद ने जो मिसरा दिया उसने मुझे बहुत परेशान किया। लेकिन आखिर कुछ तुकबन्दियाँ बन ही गयीं। आप भी समाद फरमाइए :

जुगनू अपना फर्ज़ निभाते रहते हैं


पूंजीपति के मॉल सजीले बनते हैं
श्रमजीवी बदहाल वहीं पे रहते हैं

सरकारों ने दिये बहुत उपहार उन्हें
खोज रहा हूँ गाँव जहाँ वे मिलते हैं

जंग जीतता सूरज सदा अँधेरे से
जुगनू अपना फर्ज़ निभाते रहते है

बीज डालने की फितरत कुछ लोगों की
कुछ हैं जो बस फसल काटते रहते है

छोटे से छोटे को छोटा मत समझो
बूंदों से ही पत्थर चिकने बनते हैं

मर्दों ने तामीर मकानों की कर ली
औरत के हाथों ही वे घर बनते हैं

मन में हो तूफान मगर मत घबराना
अक्सर मंद समीर बाद में बहते हैं

अच्छी फसलें बहुत सजोनी पड़ती हैं
खर पतवार बिना बोये ही उगते हैं

सदाचार सच्‍चाई की है राह कठिन
झूठे रस्ते अनायास खुल पड़ते हैं

-सत्यार्थमित्र

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
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गुरुवार, 19 जून 2014

मन कहे तो गुनगुनाइए

यह गीत उन तमाम सरकारी सेवकों को समर्पित है जिनकी दिनचर्या में हंसने, मुस्कराने और गुनगुनाने के लिए कोई अवसर नहीं मिल पाता। मुझे लगता है कि वे कोशिश करें तो अवसर जरूर मिलेगा। बस थोड़ी सोच बदलनी होगी।

मन कहे तो गुनगुनाइए

मन कहे तो गुनगुनाइए
मन कहे तो गुनगुनाइए
राग और छंद बिगड़ते हैं तो बिगड़े
दिल की बात लब पे लाइए।

बात आपकी सुने या अनसुना करे जहाँ
प्यार दे दुलार दे या छोड़ दे जहाँ तहाँ
खुद ही देखिए भला क्या मान अपमान है
फिक्र नहीं कीजिए क्या सोचता जहान है
कभी अपने से मुस्कुराइए
मन कहे तो गुनगुनाइए

संवेदना मन की हमको जगाये
अंतस की पहचान हमसे कराये
मन के सवालो की भरपाई करती
ओजस्वी आशा की प्राणवायु भरती
फिर निराशा न उपजाइए
मन कहे तो गुनगुनाइए

देश के प्रदेश के विकास के हरास की
मन में फ़िक्र होने लगे डूब रही आस की
इष्ट मित्र भाई बंधु टूटते समाज की
धर्म में अधर्म और जाति के रिवाज की
थोड़ी देर भूल जाइए
मन कहे तो गुनगुनाइए

कामकाज खोज रहे जीविका की चाह में
छोड़ दिए राग रंग जो भी मिले राह में
भौतिक सुख साधन से घर आँगन भरते
माया की खातिर जाने क्या क्या करते
थोड़ा खुद पे तरस खाइए
मन कहे तो गुनगुनाइए

29.05.2014
सत्यार्थमित्र
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