हमारी कोशिश है एक ऐसी दुनिया में रचने बसने की जहाँ सत्य सबका साझा हो; और सभी इसकी अभिव्यक्ति में मित्रवत होकर सकारात्मक संसार की रचना करें।

Tuesday, October 29, 2019

दीपावली का उपहार (अनूदित कहानी)

मुझे नहीं मालूम कि सबसे पहले यह विचार कैसे पैदा हुआ लेकिन एक बार मन में यह बात आ गयी तो मुझे बेचैन करने लगी। मानो एक अजीब सी शक्ति मेरे ऊपर हावी हो गई हो। मैं यह काम जल्द से जल्द पूरा करने के लिए व्यग्र हो उठा।

मैंने उस पैकेट को अपनी बगल में दबा लिया और अपनी मंजिल की ओर चल पड़ा। अपने दाएँ-बाएँ सतर्क निगाहों से मैं ऐसे देखता जा रहा था जैसे कोई गलत काम करने जा रहा हूँ।

दरअसल पिछली रात मुझे अचानक अंजली की तस्वीर मिल गई थी और जैसे ही मैंने उसकी तस्वीर देखी मुझे महसूस हुआ कि अब मुझे उससे मिलना ही चाहिए।

किसी आदमी का पहला प्यार उसके दिल में स्थायी घर बना लेता है।

दस साल। दस लंबे साल बीत गए हैं।

तब अंजली ने एक धनकुबेर से शादी कर ली थी। उसने एक रुतबे से शादी कर ली थी। मेरा दिल टूट गया था।

फिर भी मेरे मन में उसके प्रति कोई नफरत या गुस्सा नहीं है। कोई बदले की भावना भी नहीं। कभी होगी भी नहीं। कैसे हो सकती है? मैंने उसे सच्चा प्यार किया था। मैं उसे अभी भी प्यार करता हूँ। मैं उसे हमेशा प्यार करता रहूंगा। हमेशा, अपने मरने के दिन तक।

मैं उसपर अपना प्रभाव जमाने के लिए बिल्कुल उतावला हो रहा था। उसको कोई उपहार देने से तो यह बिल्कुल जाहिर हो जाने वाला था।

मुझे तो यह भी पता नहीं था कि उसने मेरे बारे में अपने पति को कितना बताया है… 'हमारे' बारे में कितना बताया है…?

उसके बच्चे शायद मेंरे बच्चों के उम्र के ही होंगे। हो सकता है थोड़े बड़े हों।

ऐसा कहा जाता है कि किसी भी शादीशुदा औरत के दिल में उतरने का रास्ता उसके बच्चों के माध्यम से होकर जाता है। मैंने अपने बगल में दबाया हुआ पैकेट फिर से देखा जो एक उपहार था।

जी हाँ, मेरी बाँह के नीचे दबा हुआ यह एक उपहार ही था - दीपावली का उपहार।

यह 'चिल्ड्रंस इनसाइक्लोपीडिया' का डीलक्स सेट था जिसे मैंने अपने बेटे और बेटी को दीपावली पर देने का कई सालों से  वादा किया था। मैं इसे पिछले तीन सालों से खरीद नहीं पाया था क्योंकि यह बहुत महंगा था। लेकिन आज इसी महंगे 'चिल्ड्रेन्स इनसाइक्लोपीडिया डीलक्स सेट' का दिवाली-गिफ्ट मैं अंजलि के बच्चों को देने जा रहा था - सिर्फ उसपर अपना प्रभाव जमाने के लिए।

मैंने दरवाजे की घंटी बजाई तो मेरे मन में आगे आने वाले दृश्य के बारे सोचकर एक भूचाल सा आ गया। अचानक मेरे ध्यान में आया कि मुझे यह भी नहीं पता कि अंजली मुझे देखकर खुश होगी भी या नहीं। ऐसा तो नहीं कि वह मुझे देखकर मुझे न पहचान पाने का बहाना कर दे या मुझे वास्तव में पहचान ही न पाए।

दरवाजा खुला। अंजली का शानदार व्यक्तित्व सामने था। वह बेहद आकर्षक रूप में खड़ी थी। उसने मुझे अपनी चमकीली मुस्कान से स्वागत किया और सच्ची प्रसन्नता के साथ मेरी अगवानी की।

ओह संजीव, तुम्हें देखकर बहुत अच्छा लग रहा है... इतने सालों बाद कितना खुशनुमा है तुमसे अचानक मिलना...! लेकिन तुम मुझे ढूंढ कैसे पाये?

हम दोनों एक दूसरे को देख रहे थे। अंजली पूरी तरह खिल गई थी। वह बेहद मोहक लग रही थी। इतनी उत्कृष्ट और इतनी उज्ज्वल दिख रही थी कि उसे देखकर मेरे भीतर जो गहरी भावुकता उमड़ रही थी उसको मैं शब्द नहीं दे सकता। मैं उसकी चमकती आंखों में देखता रहा। मैं बिल्कुल सम्मोहित हो गया था उसकी अद्भुत सुंदरता से।

"मुझे घूरना बंद करो" अंजली ने टोका। उसकी बड़ी-बड़ी शरारती आंखें नाच उठी थीं।

"तुम इतनी सुंदर और इतनी कमसिन लग रही हो कि..."

"लेकिन संजीव, तुम तो बूढ़े लग रहे हो। देखो ना, तुम्हारे बाल भी सफेद होने लगे हैं..." यह कहते-कहते अंजली रुक गयी। उसे शायद अपने कहे पर पछतावा हो रहा था।

फिर अचानक अंजलि ने अपना हाथ मेरे हाथ की ओर बढ़ाया और बोली - मैं आज तुम्हें देख कर बहुत खुश हूँ। आओ, अंदर आओ संजीव...।

उसका घर बहुत बड़ा था... जरूरत से कहीं ज्यादा बड़ा। वहाँ धन और वैभव चारों तरफ बिखरा पड़ा था।

अंजली की चाल-ढाल बिल्कुल एक राजरानी की तरह थी। उसकी बातचीत का सलीका बेहद आत्मविश्वास से भरा हुआ और कुलीनों जैसा था।

किम् आश्चर्यम्...!

हमेशा किसी से जुड़े रहने की भावना उसके जीवन की प्रेरक शक्ति थी। दौलत, रुतबा, सामाजिक प्रतिष्ठा और सफलता -  उसने जीवन में जो कुछ भी चाहा उसे पा लिया था। मैं अपने मन में उठती ईर्ष्या और अपने असफलता-बोध को रोक नहीं पा रहा था।

"तुम्हें मेरा घर अच्छा लगा?" उसने पूछा। "बैठ जाओ, ...और तुम इतनी खोए-खोए क्यों लग रहे हो?"

मैं सोफे पर बैठ गया। मैंने बगल की मेज पर गिफ्ट वाला पैकेट रख दिया था - वही दीपावली का उपहार जो मैंने अंजली के बच्चों के लिए खरीदा था ताकि मैं उसे 'इंप्रेस' कर सकूँ।

अंजलि मेरे सामने बैठ गई।

"तुम्हें कैसे पता चला कि मैं यहाँ रहती हूँ? हम तो अभी एक महीना पहले ही मुंबई शिफ्ट किए हैं " उसने पूछा। मैंने अपनी जेब से एक बटुआ निकाला और उसे अंजलि को दे दिया। फिर मैंने उससे कहा, "यह तुम्हारे हसबैंड का पर्स है। मैंने इसमें तुम्हारी तस्वीर देखी।"

अंजली ने बटुआ खोला और उसमें रखी हुई चीजों को देखने लगी।

"तुम्हें पुलिस वालों पर यकीन नहीं है न?" मैंने मुस्कुराते हुए पूछा।

अंजलि झेंप गयी। उसने बटुए को मेज पर रख दिया।

उसकी आंखों में मेरे प्रति मुक्त प्रशंसा के भाव थे जब वह बोली,  "आईपीएस...?" "यह तो बहुत कमाल की बात है। ...मैंने कभी नहीं सोचा था कि तुम इतना अच्छा करोगे...!" "वैसे तुम अभी क्या हो? ...सुपरिंटेंडेंट? ...डिप्टी कमिश्नर?" अंजलि ने पूछा।

अब मेरे झेंपने की बारी थी।

"नहीं-नहीं, मैंने लजाते हुए होठ दबाते हुए कहा।

"मैं तो बस एक सब-इंस्पेक्टर हूँ।"

"ओह!..." उसने कहा।

वह अपनी निराशा छिपाने की कोशिश कर रही थी। लेकिन मैं उसकी आंखों की भाषा को पढ़ चुका था। यह बारीक भेद मुझसे छिप न सका।

अचानक उसके दृष्टिकोण में बदलाव आने लगा। मैं ठीक-ठीक उसके हावभाव को बदलते हुए देख पा रहा था।

"अच्छा बताओ, तुम्हारे हस्बैंड मि. जोशी घर पर हैं क्या?" मैंने पूछा।

"नहीं, वो अभी भी अपने ऑफिस में हैं..।" उसने बताया।

"ओहो, मुझे लगा वे घर पर आ गए होंगे..." मैंने कहा।

"मैं तुम्हारे लिए चाय बनाती हूँ।" इतना कहकर वह खड़ी होने लगी।

"प्लीज बैठ जाओ अंजली! चलो बातें करते हैं।" मैंने अपनी घड़ी की ओर देखते हुए कहा।

"अभी 6:30 बज चुके हैं। हम लोग मिस्टर जोशी की प्रतीक्षा कर लेते हैं। हो सकता है वे मुझे ड्रिंक ऑफर करें उसके बाद शायद डिनर भी..."

"मेरे हस्बैंड रात में बहुत देर से लौटते हैं।" अंजली ने कहा।

"वैसे भी, वे कम्पनी के मैनेजिंग डायरेक्टर हैं। इतना ज्यादा काम रहता है, तमाम कांफ्रेंसेज और इम्पोर्टेन्ट बिजनेस मीटिंग्स रहती हैं। वे कम्पनी के टॉप-बॉस हैं, बहुत ही सफल और बहुत ही व्यस्त आदमी हैं।"

अंजली ने जिस प्रकार मुझे समझाया वह बहुत ज्यादा स्पष्ट था। वह जो कहना चाहती थी मैंने उसे बिल्कुल ठीक-ठीक समझ लिया था। अब उसने विषय बदला और पूछा, "तुम्हे मेरे हस्बैंड का पर्स कहाँ मिला?"

"मेरे थाने में। कल शाम को इसे गुम-सामान वाले सेक्शन में कोई जमा कर गया था।" मैंने साफ झूठ बोला था।

अंजली ने कहा, "बड़ी अजीब बात है, उन्होंने इसके बारे में कुछ बताया नहीं मुझे...!"

मैंने दबी जुबान से कहा, ''हो सकता है उन्होंने ध्यान न दिया हो।" "वैसे भी वे इतने बड़े आदमी हैं, इतने व्यस्त रहते हैं कि पर्स जैसी छोटी-मोटी चीज के खो जाने के बारे में क्या ध्यान देंगे...!

"हाँ, ये भी सही है..." अंजलि ने एक रूखी सी दृष्टि डालते हुए कहा।

अंजलि ने पर्स को एक बार फिर खोला और उसमें के क्रेडिट कार्ड और ड्राइविंग लाइसेंस को बारीकी से चेक करने लगी।

पहले तो वह बहुत कंफ्यूज दिखी। फिर उसने मेरी तरफ बहुत कड़ी निगाह से देखा लेकिन कहा कुछ भी नहीं। लंबे समय तक एक सन्नाटा बना रहा। बहुत ख़राब लगने वाली चुप्पी थी। अंजली मुझे लगातार घूरती जा रही थी - बिल्कुल मेरी आंखों में देखते हुए। जैसे उसे नफरत हो गई थी मुझसे। भयंकर नाराजगी और उपेक्षा से भरी हुई दृष्टि थी उसकी। अब मैं बेहद असहज महसूस करने लगा।

अचानक मुझे उस उपहार वाले पैकेट की याद आ गई जो मैंने अंजली के बच्चों के लिए खरीदा था। मैंने बड़े उत्साह से आश्चर्य करने वाली भंगिमा बनाकर पूछा, "अंजली! तुम्हारे बच्चे कहाँ है? ...मैंने उनके लिए ये दिवाली-गिफ्ट ले रखा है ...बस उनके लिए एक छोटा सा उपहार..."

यह सुनने के बाद अंजली के चेहरे पर जो भाव उभरे वह देखते ही मुझे तुरंत अंदाजा हो गया कि मैंने भयानक रूप से गलत बात कह दी थी। सहसा उसकी आंखों में आँसू उमड़ आए थे। अचानक अंजली बहुत अकिंचन, कमजोर और असुरक्षित सी दिखने लगी।

उसकी सच्चाई जानने के बाद बहुत गहरा पश्चाताप मेरे मन के भीतर घर कर गया। बिना बताए ही मैं समझ गया कि अंजली के कोई बच्चे नहीं थे। मैं यह भी समझ गया कि मैंने उसके जख्मों पर नमक रगड़ दिया है। मैं बिल्कुल असहाय होकर उसकी ओर देखने लगा। अपनी अज्ञानता की दुहाई देकर भी कोई फायदा नहीं होने वाला था।

शायद भविष्य में कभी अंजली मेरी इस हरकत को समझ पाए। लेकिन उस क्षण तो समझाने की कोशिश करने में भी कोई उम्मीद नहीं थी।

उसकी चोट बहुत गहरी थी और इसे शांत रहकर गुजर जाने देने के अलावा मेरे पास कोई चारा नहीं था। हम वहाँ बिल्कुल शांत बैठे थे। हमें समझ में नहीं आ रहा था कि क्या बात करें।

कानों को बिल्कुल सुन्न कर देने वाली शांति थी - एक अवांछित, बेढब शांति।

कितना अजीब है न कि आपने  जिस क्षण के लिए खूब रिहर्सल किया हो उसका अंजाम इतना अलग हो जाए। अब मैं इसे बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था।

मैं फौरन सोफे से उठ खड़ा हुआ और तेज कदमों से दरवाजे की ओर बढ़ने लगा। अचानक मुझे लगा कि मैंने दीपावली के उपहार वाला पैकेट वहीं छोड़ दिया है जो मैंने अंजली के अस्तित्वहीन बच्चों के लिए खरीदा था। लेकिन मैं पीछे नहीं मुड़ा। पता नहीं क्यों...!

अचानक मैंने अपने पीछे अंजली की आवाज सुनी, "संजीव, मत जाओ! मैं तुमसे बात करना चाहती हूँ।" बहुत ठंडे स्वर में अंजली ने बोला था। मैं वहीं रुक गया। मैं अंजली के कदमों की आवाज साफ-साफ सुन सकता था। मैं पीछे मुड़ा ताकि उसका सामना कर सकूँ। अब वो थोड़ी सामान्य हो चुकी थी।

"तुमने मुझसे झूठ बोला संजीव!" अंजली ने कहा, "मैं सच जानना चाहती हूँ कि तुमने मेरे हस्बैंड का पर्स कहाँ पाया था।"

मैं नहीं सोच पा रहा था कि क्या कहूँ। मैंने उसकी ओर से आँखें चुरा लेने की कोशिश की।

"बोलो संजीव!" अंजली ने फिर कहा। "प्लीज मुझे बताओ, तुमने मेरे हस्बैंड का पर्स कहाँ पाया!"

जब मैं उलझन में होता हूँ तो सच ही बोल पाता हूँ। इसलिए मैंने अंजली से कहा, "कल हमने एक अड्डे पर छापा मारा था। ऊँचे लोगों के एक कॉलगर्ल रैकेट के अड्डे पर कल रात..."

मैं इसके आगे नहीं बोल पाया। लगभग माफी मांगते हुए मैंने कहा, "आइ एम सॉरी, मुझे नहीं पता था...!"

"हाँ, तुम्हें नहीं पता था - लेकिन मैं जानती हूँ - मुझे हमेशा से संदेह था - और अब, जबकि तुमने उस रंडीखाने में मेरे पति का पर्स पाया है तो मेरा शक सही साबित हो गया।" उसने एक तरह से मजाक उड़ाते हुए कहा।

मैं बिल्कुल शांत बना रहा। समझ में नहीं आ रहा था कि क्या कहूँ। फिर अचानक अंजली चिल्लाने लगी। नामर्द... नीच... उन वेश्याओं के पास जा रहा है अपनी मर्दानगी सिद्ध करने!

ऐसे ही कुछ शब्दों से अंजली ने अपनी शादी के राज की बातें उजागर कर दी। मैंने उसकी ओर सहमी हुई नजरों से देखा। अब उसके हाव-भाव संयत और आवेगहीन हो गए थे। लेकिन उसकी आंखों में जो गुस्सा था वह साफ झलक रहा था।

मैं संज्ञा शून्य हो गया था। किंकर्तव्यविमूढ़। फिर अचानक मेरे मुंह से निकल पड़ा - "चिंता मत करो, अंजली! मैंने सारे आरोप खत्म कर दिए हैं। मैं इसे देख लूंगा। सब दबा दूंगा।"

मुझे अभी भी नहीं पता कि मैंने ये शब्द क्यों कहे लेकिन इन शब्दों को सुनने के बाद अंजली में एक बहुत बड़ा परिवर्तन होता दिखाई देने लगा।

अंजली अचानक पागल सी हो गई। इतनी खंड-खंड, व्यथित और गुस्से में दिखाई देने लगी कि मैं बिल्कुल डर सा गया।

मुझे डर लगने लगा कि अंजली इस पागलपन में कुछ भी गड़बड़ कर सकती है - और मुझे मार भी सकती है - शायद वह मुझे चाटा ही रसीद कर दे - वह कुछ भी हिंसक काम कर सकती थी। यह सब सोचते ही मैं अपने आप पीछे हट गया।

लेकिन अंजली अचानक मुड़ी और कमरे से बाहर आ गई। मैंने थोड़ा इंतजार किया। थोड़ी देर के लिए बिल्कुल जड़वत हो गया था मैं - किसी पत्थर की मूर्ति जैसा।

थोड़ी देर बाद जब मैं सहज हो पाया तो मैंने तय किया कि अब चलना चाहिए। मैं दरवाजे की ओर बढ़ने लगा।

"रुको…!" अंजली की चिल्लाहट मेरे कानों में पड़ी। मैं फिर रुक गया और पीछे मुड़ा। वह मेरी ओर तेज कदमों से आ रही थी। उसने अपना दाहिना हाथ मेरी और बढ़ाया। उसके हाथों में पांच सौ के नोट वाले बंडल थे। वह मेरे ऊपर बरस पड़ी - "अच्छा! तो तुम इसके लिए मेरे पास आए थे! है ना? …तुम मुझसे रिश्वत लेना चाहते थे और केस को दबाना चाहते थे… मुझसे भी? कुत्ते... कमीने... मुझे उम्मीद नहीं थी कि तुम इतना नीचे गिर जाओगे। लो ये पैसे लो और मेरे घर से दफा हो जाओ! अभी मेरे घर में इतना ही कैश है, तुम्हें अगर और चाहिए तो तुमको पता है मेरे हस्बैंड कहां मिलेंगे। पता है या नहीं?"

"बस करो अंजली!" मैं बोल पड़ा, "प्लीज, ऐसा मत सोचो…"

"नीच!" अंजली गुस्से में थी और उसके चेहरे पर तिरस्कार का भाव था। "बहुत घटिया और नीच हो तुम… पहले से ही ऐसे थे! …चलो अब मेरे घर से निकल जाओ, गंदे ब्लैकमेलर! और आगे से कभी मैं तुम्हारा मुँह नहीं देखना चाहती…!"

उसने करेंसी नोटों का बंडल मेरे ऊपर दे मारा।  बंडल से मेरे सीने पर चोट लगी और वे छिटककर जमीन पर गिर पड़े। नोट मेरे पैरों के आस-पास चारो ओर बिखर गए।

"मैं तुम्हें प्यार करता हूँ अंजली!" मैंने कहा। मैं उसे अपनी सच्ची भावना दिखाना चाहता था।

"प्यार…?" उसने आश्चर्य दिखाते हुए कहा। उसकी आग उगलती आंखों से गुस्सा टपक रहा था। "तो तुम यहाँ यह देखने आए थे कि तुम्हारे बुझ गये प्यार की लौ अब कितनी समृद्ध हो गयी है! है न?"

अंजली थोड़ा रुकी और फिर व्यंगपूर्वक बोली -  "तब तो तुम बहुत खुश हुए होगे… मेरी 'सक्सेस' देखकर…?"

उसके शब्दों में जो कुटिलता थी और जो उपहास था - कि उसके दुर्भाग्य पर मैं प्रसन्न होउंगा - इसका मुझे सर्वाधिक दुख हुआ। मेरे दिल को बहुत चोट लगी।

मैं पीछे मुड़ा और अंजली के घर से बाहर निकल आया। जब मैं गेट के पास पहुँचा तो मेरी पीठ पर किसी चीज से चोट लगी। मैं दर्द से कराह उठा। चिल्ड्रेन्स इनसाइक्लोपीडिया के तीनों भाग जमीन पर गिरकर फैले हुए थे। रुपहले रंग का गिफ्ट-रैपर फट गया था।

जी हाँ, वह दीपावली का उपहार - जो मैंने अंजली के उन बच्चों के लिए खरीदा था जो कभी थे ही नहीं - जो मैंने उसे इंप्रेस करने के लिए खरीदा था - चिल्ड्रंस इनसाइक्लोपीडिया के तीन भाग - सभी जमीन पर बिखर गये थे। उनका रुपहला रैपर चिथड़ा हो गया था।

मैं जानता था की अंजली दरवाजे पर खड़ी होकर मेरी ओर देख रही होगी। लेकिन पीछे मुड़कर देखने की मेरी हिम्मत नहीं हुई। मैंने किताबों को इकट्ठा किया और बाहर के अंधेरे की ओर चल पड़ा।

उपसंहार :

जब शराब का नशा कम हुआ और मैं होश में आया तो मुझे यह अंदाजा हुआ कि मैं अपने घर के बिस्तर में हूँ। यद्यपि कमरे में धूप छनकर आ रही थी लेकिन मुझे सबकुछ धुंधला नजर आ रहा था। फिर धीरे-धीरे चीजें स्पष्ट होने लगीं। मेरी बेटी बिस्तर पर मेरे पास बैठी थी। उसने धीरे से मेरा हाथ छुआ। उसकी आँखों में आँसू थे।

मेरा बेटा बिस्तर के दूसरी ओर अलग-थलग खड़ा था। उसकी आँखें डरी हुई थीं।

मेरी पत्नी मेरी ओर प्रेम व दयाभाव से निहार रही थी। उसने मुझसे कहा- "इतने प्यारे दीवाली-गिफ्ट के लिए बच्चे आपको थैंक-यू कहना चाहते हैं। वे बहुत ज्यादा खुश हैं..."

उसने अपने हाथों में वही इनसाइक्लोपीडिया का सेट थाम रखा था - वही 'कीमती' इनसाइक्लोपीडिया - जो मैंने अंजली के बच्चों के लिए दीवाली-गिफ्ट के रूप में खरीदा था - ताकि मैं अंजली पर प्रभाव जमा सकूँ।

मैंने बस सिर हिलाकर अपनी पत्नी को जवाब दिया। फिर मैंने बच्चों की ओर देखा। मेरे बच्चे अपनी माँ के हाथों में रखी इनसाइक्लोपीडिया को देख रहे थे।

उसके बाद मेरे बच्चों ने मेरी ओर बहुत प्यार और कृतज्ञता  के भाव से देखा। मैं मुस्करा दिया और उनकी और बढ़ा। बच्चों ने मेरा हाथ पकड़ लिया और मेरी ओर देखकर मुस्कराने लगे। मैंने उनकी आँखों में विशुद्ध दोषरहित प्रसन्नता देखी। यह ऐसा प्यार था जो मैंने पहले कभी भी महसूस नहीं किया था। खुशी के आँसू मेरी आँखों से छलक पड़े।

मुझे प्यार के बारे में पता चल चुका था। जी हाँ, मैं प्यार का असली मतलब अब जान पाया था।

इस दीपावली के दिन मुझे 'प्यार का उपहार' मिला था।

(इति)

मूल अंग्रेजी कथाकार : विक्रम कर्वे
http://karvediat.blogspot.in/2016/10/diwali-gift-story.html

हिंदी रूपांतर - सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
www.satyarthmitra.com

Tuesday, December 26, 2017

पाकिस्तान की विकलांग न्यायपालिका

पाकिस्तान के सबसे प्रतिष्ठित अखबार डॉन में छपे एक आलेख को पढ़कर मेरा मन दुखी हो गया। इस अभागे देश के नागरिक किस दुर्दशा के शिकार हैं यह जानकर मन काँप उठता है। भारत में रहते हुए हमने सरकार के तीन अंगो कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के बीच जो शक्ति-सन्तुलन देखा है उसकी तुलना में पाकिस्तान की भयावह स्थिति का दर्शन इस लेख में किया जा सकता है। स्तम्भकार बासिल नबी मलिक पाकिस्तान में कराची की एक वादकारी फर्म में कार्यरत हैं। मूल आलेख अंग्रेजी में है जिसका भावानुवाद यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ :-

judicial-Indपाकिस्तान में जो कुछ भी गलत हो रहा है उसके लिए यहाँ के न्यायाधीशों को दोषी ठहराना एक राष्ट्रीय खेल जैसा हो गया है। दुर्भाग्य से अभियोजन पक्ष के गलत व्यवहार, जाँच एजेन्सियों की ढीली-ढाली विवेचना और कानून में निहित कमजोरियों से लेकर कार्यपालिका की (अपराधियों से) दुरभि-सन्धि तक जो कुछ भी इस तन्त्र में गड़बड़ है उस सबके लिए पाकिस्तान के न्यायमूर्तियों को जिम्मेदार मान लिया जाता है।

न्यायाधीशों की ओर उंगली उठाने वाले यह भूल जाते हैं कि न्यायतंत्र के विशाल पहिए में न्यायाधीश सिर्फ़ एक तीली के समान हैं। इस विशाल तन्त्र में दूसरे अनेक भागीदार भी दाँव पर लगे हैं जिसमें कानून बनाने वाली विधायिका व उन्हें लागू कराने के लिए जिम्मेदार कार्यपालिका शामिल है; और हाँ, वे वकील साहब लोग तो हैं ही। इसके हर स्तर पर भयावह असफ़लता दिखायी देती है जिसका यह परिणाम है कि पूरे तन्त्र को ही लकवा मार गया है।

उदाहरण के लिए संघीय विधायिका (नेशनल असेम्बली) इस बात के लिए कुख्यात हो चुकी है कि यह (धार्मिक) अल्पसंख्यकों के साथ भेद-भाव बरतने वाले कानून ही बनाती है और जो भी उनकी आस्था है उसके अनुसार उन्हें जीवन निर्वाह करने के सभी अधिकारों से वंचित कर देती है। उसने ऐसे कानून पारित कर दिये हैं जो चुनाव लड़ने की योग्यता खो चुके नेताओं को भी किसी बड़ी पार्टी का अध्यक्ष बनने का अधिकार दे देता है। इसने ऐसे कलंकित कानून भी बना दिये हैं जो किसी हत्यारे द्वारा पीड़ित परिवार को रूपये देकर सजा से बच जाने की सुविधा देते हैं। कुछ राज्यों ने तो ऐसे कानून बना दिये हैं जिससे एक स्पष्ट राजनैतिक निष्ठा रखने वाले व्यक्ति को दुबारा सरकारी नौकरी में भी रखा जा सकता है जो पहले किसी अपकृत्य के सिद्ध होने के आधार पर पदच्युत किया जा चुका हो।

ऐसे में भले ही न्यायमूर्ति महोदय इन कानूनों से सहमत न हों लेकिन उन्हें इन कानूनों के अनुसार फैसला देना ही पड़ता है। यद्यपि उन्हें इन कानूनों के न्यायिक पुनरावलोकन का अधिकार है लेकिन इस अधिकार की अपनी सीमाएं भी हैं जो किसी न्यायाधीश को विधि-व्याख्याता के बजाय विधि-निर्माता की भूमिका निभाने से रोकती हैं।

एफ.आई.ए. (संघीय जाँच एजेन्सी) और एन.ए.बी. (राष्ट्रीय जवाबदेही ब्यूरो) जैसी अनुसन्धान संस्थाओं और यहाँ तक कि पुलिस की हालत भी अच्छी नहीं है। उनकी अयोग्यता का प्रमाण-पत्र स्वयं सुप्रीम कोर्ट दे चुका है। चाहे वह बेनजीर भुट्टो की हत्या के मामले में विवेचना के (अल्प) सामर्थ्य की बात हो, एन.ए.बी. द्वारा बड़ा माल बटोरने की लालच में अपनी दलीलों का मोलभाव करने में इसकी स्पष्ट अभिरुचि हो या इसके द्वारा आरोपी से अपराध  की फ़र्जी स्वीकारोक्ति हासिल कर लेने की कोशिश हो; ये संस्थाएं अपनी अयोग्यता या अपराधियों से साठ-गाँठ के कारण अभियोजन को नीचा दिखाने की दोषी हैं। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि अपर्याप्त सबूत के कारण न्यायाधीश आरोपी पक्ष को दोषमुक्त करने पर मजबूर हो जाते हैं।

इसके अलावा न्यायालय के फ़ैसलों को लागू कराने की जिम्मेदारी पुलिस व अन्य विधि-प्रवर्तन संस्थाओं की है। जब कोर्ट कोई फ़ैसला सुनाता है तो सरकार को उसे अनिवार्य रूप से लागू कराना चाहिए। न्यायपालिका के पास अपने फ़ैसलों को लागू कराने के लिए अपनी कोई प्रवर्तन शाखा नहीं होने के कारण उसे इसके लिए पूरी तरह कार्यपालिका पर निर्भर होना पड़ता है। यदि फ़ैसला लागू ही नहीं हो सकता तो इन आदेशों की शुचिता, न्यायपालिका की गरिमा, कानून के राज, और संस्थाओं के प्रति सम्मान में क्रमशः गिरावट आती जाएगी जिससे इसका उल्लंघन करने वालों का हौसला बढ़ता जाएगा और पीड़ित पक्ष हताश हो जाएगा।

दुर्भाग्य से (पाकिस्तान में) यही सब हो रहा है। आये दिन न्यायाधीश फ़ैसले सुनाते हैं – भू-माफ़िया के खिलाफ, धोखेबाज बिल्डरों के खिलाफ, कोर्ट के आदेशों की अवमानना करने वालों के खिलाफ़ और दूसरे बदमाशों के खिलाफ़। लेकिन, इन फ़ैसलों को लागू करने में प्रवर्तन एजेन्सी के सहयोग की कमी के कारण ये निष्प्रभावी हो जाते हैं या बहुत देर से लागू होने के कारण इन फ़ैसलों का उद्देश्य पूरा नहीं हो पाता।

इसके साथ ही यहाँ का वृहत्तर न्यायतन्त्र उन वकीलों के ऊपर पलता है जो न सिर्फ़ अपने मुवक्किल की पैरवी करते हैं बल्कि एक विरोधाभास के रूप में कोर्ट के भी अधिकारी होते हैं। किसी भी मुकदमें में सही कानूनी स्थिति तक पहुँचने के लिए कोर्ट की मदद करना और उसके फ़ैसले को अंगीकृत करना उनकी जिम्मेदारी होती है। इसके लिए उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे न्यायाधीश के सामने भली-भाँति अध्ययन करने के बाद सटीक कानूनी तर्क प्रस्तुत करें, अपने मुवक्किल को कानून का पालन करने की सीख और सलाह दें और यह भी कि यदि उनके या उनके मुवक्किल के खिलाफ़ कोई फ़ैसला हो जाता है तो उसे निष्फल करने की कोशिश न करें।

लेकिन सच्चाई इससे बिल्कुल अलग है। पाकिस्तान में वकील समुदाय के भीतर भाँति-भाँति के लोग पाये जाते हैं जिसमें वे भी शामिल हैं जो खुलेआम कानून के राज को धता बताने में (अपराधियों का) साथ देते रहते हैं। वे अपने मुवक्किल को कानून तोड़ने में मदद करके ऐसा कर सकते हैं, कोर्ट के समक्ष गलत प्रतिवेदन प्रस्तुत करके अपने मुवक्किल के लिए फ़ायदे का इन्तजाम कर सकते हैं, जमानत नहीं मिल पाने पर अपने मुवक्किल को न्यायालय-कक्ष से भाग जाने में मदद कर सकते हैं, अथवा मनमाफ़िक फ़ैसला पाने के लिए जज को डराने-धमकाने की चाल चल सकते हैं। यदि और कुछ नहीं तो वे अपने मुवक्किल को कोर्ट के आदेश की अवहेलना करने की सलाह ही दे सकते हैं, उनसे यह कह सकते हैं कि न्यायालय की अवमानना के दोष को बाद में एक माफ़ीनामा देकर खत्म किया जा सकता है।

संक्षेप में कहें तो वर्तमान न्याय-व्यवस्था की वर्तमान दुरवस्था के लिए केवल न्यायाधीशों को दोषी ठहराना उचित नहीं है। यदि न्यायपालिका को अधिक सुदृढ और शक्तिसम्पन्न बनाना है तो सभी पक्षों को साथ मिलकर काम करते हुए इन न्यायाधीशों का सहयोग और समर्थन करना होगा। इस प्रकार के तालमेल और ऐसी एकता के बिना पाकिस्तान में दूसरी सभी बातों की तरह ही ये न्यायाधीश भी जनता से सरोकार रखने वाले एक प्रभावी और न्यायपूर्ण तन्त्र की तलाश में धीरे-धीरे घिसटते हुए सैनिकों की एक अकेली पड़ गयी टुकड़ी की तरह इतिहास की गर्त में समा जाएंगे।

अनुवाद एवं प्रस्तुति : सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
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Sunday, October 8, 2017

जी.एस.टी. के भ्रष्टाचारी अवरोध

“साहब, यह काम हो ही नहीं पाएगा।” एक सप्ताह की प्रतीक्षा के बाद पधारे ठेकेदार ने कार्यालय में घुसते ही अपनी असमर्थता जाहिर कर दी।
अरे, आप जैसा होशियार और सक्षम ठेकेदार ऐसी बात कैसे कह सकता है? मैंने तो सुना है आप बहुत बड़े-बड़े ठेके लेकर सरकारी काम कराते रहते हैं। तमाम सरकारी बिल्डिंग्स और दूसरे निर्माण और साज-सज्जा के काम आपकी विशेषज्ञता मानी जाती है।
“वो बात ठीक है, लेकिन अब सरकारी काम करना बड़ा मुश्किल है। इस जी.एस.टी. ने सबकुछ बर्बाद कर दिया है। आप बिना रसीद मांगे कैश पेमेन्ट कर दीजिए तो एक दिन में ही आपका काम करा दूंगा। लेकिन आपको पक्की बिल चाहिए तो कोई तैयार नहीं होगा।” यह सुनकर मेरा सिर चकरा गया। यशवन्त सिन्हा ‘शल्य’ की बातें इसके बाद मीडिया में आयीं तो मेरे कान खड़े हो गये।
अब जी.एस.टी. पर मचे घमासान और छोटे दुकानदारों, व्यापारियों और ठेकेदारों की त्राहि-त्राहि देखकर मन चिन्तित हो गया है। बड़े उद्योगपति शायद ज्यादा परेशान नहीं हैं। उन्हें इस नयी व्यवस्था के साथ तालमेल बिठाने में शायद कोई बड़ी दिक्कत नहीं है। मैं कोई अर्थशास्त्री नहीं हूँ। मुझे इस योजना की बारीक बातों की अच्छी समझ नहीं है। इसलिए इसके पक्ष या विपक्ष में तनकर खड़ा होने के बजाय मैं धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करना चाहूंगा। इस बीच मैंने अपने कार्यालय में बैठकर जी.एस.टी. के प्रभाव का जो रोचक अनुभव किया है उसे साझा कर रहा हूँ।
हुआ ये कि नये शहर के नये कार्यालय में काम शुरू करने पर मुझे कुछ अवस्थापना सुविधाओं को अपने हिसाब से संशोधित परिवर्द्धित करने की आवश्यकता महसूस हुई। कंप्यूटर, इन्टरनेट, कुर्सी, टेबल-ग्लास, स्टेशनरी इत्यादि की व्यवस्था तो थोड़ी-बहुत जद्दोजहद से सुदृढ हो गयी लेकिन मेरे कार्यालय कक्ष से सटे हुए विश्राम-कक्ष को मन-माफ़िक बनाने में मुझे सफलता नहीं मिल रही है। दरअसल एक ही बड़े हाल में स्थित इस कक्ष को कार्यालय से अलग करने के लिए एल्यूमिनियम के ढांचे में काँच या फ़ाइवर की शीट लगाकर दीवार नुमा घेरा बनाया गया है जो अर्द्ध-पारदर्शी है। इस दीवार के जिस ओर प्रकाश अधिक रहता है वह दूसरी ओर से साफ़ दिखायी देता है। अधिक प्रकाशित हिस्से में बैठने वाला दूसरी ओर नहीं देख सकता जबकि उसे दूसरी ओर से देखा जा सकता है। इस प्रकार उत्पन्न असहज स्थिति से बचने के लिए पूरे घेरे पर कपड़े के पर्दे लटकाये गये हैं। लेकिन इन पर्दों पर धूल बहुत जल्दी-जल्दी जमा होती है जिसे साफ़ करते रहना बहुत टेढ़ा काम है। धूल से एलर्जी होने के कारण मुझे इनके संपर्क में आते ही लगातार छींकना पड़ जाता है और नाक से पानी आने लगता है।
धीरे-धीरे मेरे भीतर इन पर्दों के प्रति असहिष्णुता का भाव पैदा हो गया है। पर्दों के स्थान पर मैंने इस काँच की दीवार पर अपारदर्शी वाल-पेपर लगवाने का मन बनाया है लेकिन जी.एस.टी. की व्यवस्था ऐसा होने नहीं दे रही है। ठेकेदार कह रहा है कि कोई भी दुकानदार वाल-पेपर की बिक्री ‘एक-नम्बर’ में करने को तैयार नहीं है। अर्थात वह इस बिक्री को अपने लेखा-बही में प्रदर्शित नहीं करना चाहता क्योंकि इसके लिए जरूरी पंजीकरण कराने व ऑनलाइन टैक्स जमा करने की प्रक्रिया से वह जुड़ा ही नहीं है। उसके पास जो माल है वह भी बिना रसीद के ही खरीदा गया है। इसलिए उसे इसपर कोई इनपुट टैक्स-क्रेडिट नहीं मिलने वाला। उसने बताया कि इस प्रकार के बहुत से काम हैं जो पूरी तरह कैश लेन-देन पर ही चलते हैं जो अब जी.एस.टी. के बाद अवैध हो गये हैं। अब कोई ठेकेदार भी उन सामानों को नगद खरीदकर सप्लाई नहीं कर सकता क्योंकि वह अपने लेखे में इसकी खरीद दिखाये बिना इसकी बिक्री या आपूर्ति को जायज नहीं ठहरा सकता।
इस बात से मुझे व्यापारिक गतिविधियों में निचले स्तर पर होने वाली बड़े पैमाने की टैक्स-चोरी की एक झलक दिखायी दे गयी जिसपर लगाम लगाने का ठोस उपाय शायद इस जी.एस.टी. में ढूँढ लिया गया लगता है। यह उपाय कुछ वैसा ही है जैसा नोटबन्दी और डिजिटल लेन-देन के माध्यम से कालेधन पर लगाम लगाने का उपाय किया गया था और जिसे अब प्रायः असफ़ल मान लिया गया है। जिनके पास अघोषित आय का नगद धन मौजूद था वे इसे बचाने के लिए किसी न किसी प्रकार इसे अपने या दूसरों के बैंक खातों में जमा कराने में सफ़ल हो गये। नोटबन्दी के राजमार्ग के किनारे जो चालू खाते, पेट्रोल-पम्प, विद्युत-देय, अन्य शुल्क-टैक्स आदि जमा करने के काउन्टर और दो लाख की सीमा वाली छूट के सर्विस-लेन बना दिये गये थे उसपर जोरदार ट्रैफ़िक चल पड़ी और अधिकांश कालाधन बैंकों में जाकर मुख्यधारा में शामिल हुआ और सफ़ेद हो गया। ऐसे बिरले ही मूर्ख और गये-गुजरे धनपशु होंगे जो अपना पुराना नगद नोट बदलकर नया नहीं कर पाये होंगे। नोटबन्दी की आलोचना करने वाले भी यह नहीं कह पा रहे थे कि इसने आयकर की चोरी पर लगाम लगाकर अच्छा नहीं किया।

साभार : http://news24online.com/know-why-implementing-gst-is-still-a-long-road-ahead-2/

ऐसे में यह निष्कर्ष निकलता है कि भ्रष्टाचार मिटाने और शुचिता बढ़ाने की अच्छी से अच्छी योजना भी क्रियान्वयन के स्तर पर जाकर उसी भ्रष्टाचार और बेईमानी की भेंट चढ़ जाती है जिसे यह रोकने चली थी। उल्टे उसमें छोटे व गरीब वर्ग का जीवन-यापन बुरी तरह प्रभावित हो जाता है। दिहाड़ी मजदूर या कामगार तो दिन में जो कमाता है वही रात में खाता है। यदि किसी दिन उसका काम रुक गया तो शाम को फ़ांके की नौबत आ जाती है। यही हाल छोटे व्यापारियों और दुकानदारों का जी.एस.टी. के लागू होने के बाद हो गया लगता है। वे साफ़-साफ़ यह तो कह नहीं सकते कि अबतक उनका धन्धा टैक्स की चोरी के कारण चोखा हुआ करता था जो चोरी अब मुश्किल हो गयी है, लेकिन नयी व्यवस्था से उपजे दर्द को वे दूसरे तरीकों से व्यक्त तो कर ही रहे हैं।
हमारे समाज में भ्रष्टाचार का रोग इतना सर्वव्यापी हो गया है कि इसे बुरी चीज बताने वाले भी अवसर मिलते ही इसका अवगाहन करने में तनिक देर नहीं लगाते। जबतक हम केवल दूसरों से ईमानदारी और सत्यनिष्ठा की अपेक्षा करते रहेंगे और स्वयं मनसा-वाचा-कर्मणा इसके लाभ उठाने को उद्यत रहेंगे तबतक हम किसी नोटबन्दी, जी.एस.टी. या अन्य कड़े उपायों से भी अपेक्षित फ़ल की प्राप्ति नहीं कर सकते।
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

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