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रविवार, 14 जून 2026

शुभ-विदा सहारनपुर

         प्रयागराज में कार्यभार ग्रहण करने के बाद वापस सहारनपुर आया था अपना बोरिया-बिस्तर बांधकर ले जाने के लिए। गृहस्थी का सामान ट्रक पर लदवाकर अपने नए आशियाने तक भेजने का काम विशेषज्ञ पैकर्स एंड मूवर्स एजेंसी के सहयोग से हुआ। यहां मेरे सहायक रहे सभी कर्मचारियों ने साथ लगकर मुझे किसी भी श्रम से दूर रखा।

कुलपति सभागार में एकत्रित होकर माननीया कुलपति जी, कुल सचिव व परीक्षा-नियंत्रक ने विश्वविद्यालय परिवार के साथ मेरी औपचारिक विदाई की। सबने अच्छी-अच्छी बातें की। भावुक क्षण के बीच मैंने भी कृतज्ञता ज्ञापित किया। मां शाकुंभरी की शानदार तस्वीर भेंट में मिली। परीक्षा नियंत्रक ने बैडमिंटन खेलने और बुला-बुलाकर खिलाने की मेरी जिद को याद किया जिसे अब मैं भी मिस करूंगा। मेरे अज़ीज़ स्पोर्ट्स ऑफिसर प्रोफेसर संदीप गुप्ता ने अलग से एक खूबसूरत कोलाज भेंट किया जो चकराता की बर्फ से ढकी पहाड़ियों पर हमारी अनेक यात्राओं और मौज-मस्ती की याद दिलाता रहेगा। सबकी आत्मीयता मुझे अभिभूत कर गई।

आज नौचंदी एक्सप्रेस से प्रयागराज जाने से पहले सुबह-सुबह एक योग कार्यक्रम में जाने का अवसर भी मिला। सहारनपुर के उद्यमियों की संस्था चैंबर ऑफ इंडस्ट्रीज एंड सर्विसेज द्वारा कंपनीबाग में आयोजित इस भव्य कार्यक्रम में पद्मश्री योगाचार्य भारतभूषण जी ने योग साधना का अभ्यास कराया और इसके महत्व पर प्रकाश डाला। हमारी कुलपति जी भी इस अवसर पर प्रमुखता से उपस्थित रहीं। योगाचार्य जी अपने उद्बोधन में यह बताना नहीं भूले कि मां शाकुंभरी विश्वविद्यालय के कुलगीत के रचयिता त्रिपाठी जी इस अवसर पर उपस्थित हैं। उन्होंने मुझे खड़ा होकर सबकी तालियों से अभिवादन स्वीकार करने का निर्देश दिया। हाथ जोड़कर खड़ा हुआ मैं पुनः अभिभूत हो गया।

सीआईएस के अध्यक्ष मृगलानी जी ने अपनी टीम के साथ मुझे जो सम्मान दिया उसके लिए मैं कृतज्ञ हूँ। इसी समय नगर विधायक राजीव गुंबर जी से भी अच्छी भेंट हुई। सबने मेरी नई पारी के लिए शुभकामनाएं व्यक्त की।

मोदी जी की प्रेरणा से नए स्टार्टअप्स को इनक्यूबेट करने के लिए विश्वविद्यालय में एमएसयू एकेडमिक फाउंडेशन की स्थापना मेरे कार्यकाल में हुई थी। इसके होनहार सीईओ अभिनव पुण्डीर ने यह ख्याल रखा कि कुर्सी छोड़ने के बाद भी यहां के प्रवास में मुझे कोई असुविधा न हो। अभिनव बहुत कुशल प्रबंधक साबित हो रहे हैं। फाउंडेशन के उद्देश्यों को नई ऊंचाई तक ले जाने में उनकी सफलता के लिए हार्दिक शुभकामनाएं।

सहारनपुर का कार्यकाल मुझे बहुत कुछ नया सीखने और करने का अवसर दे गया। इसकी अमिट छाप मुझे आगे भी खुशियां देती रहेगी। शुभविदा सहारनपुर। 🙏🏻💐

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी

वित्त अधिकारी

                                प्रोफेसर राजेंद्र सिंह (रज्जू भय्या) विश्वविद्यालय प्रयागराज




















रविवार, 31 मई 2026

विश्वविद्यालय परिसर का मोहपाश

आज रविवार को माँ शाकुंभरी विश्वविद्यालय परिसर में सन्नाटा पसरा रहा। छुट्टी के दिन मैं अकेला ही था। अपने आवास में बिस्तर पर लेटा हुआ लखनऊ से किसी समाचार की प्रतीक्षा में था। हाथ में टीवी का रिमोट लेकर  ओटीटी पर विचरण करता रहा। आज मध्यरात्रि को स्थानांतरण की समय सीमा भी समाप्त हो रही है। कल शायद कोई आदेश मिल जाय। इस परिसर में मेरे लिए कुछ ही दिन शेष बचे हैं। सूरज ढल गया तो घर से बाहर निकला। 

आज शाम को परिसर में अकेले टहलते हुए मुझे एक मोहपाश में बंध जाने की अनुभूति हुई। स्वच्छ वातावरण, प्रदूषण रहित भरपूर ऑक्सीजन, नवरोपित पेड़-पौधों की हरियाली में खिलखिलाता उनका बचपन, भीड़भाड़ से बिल्कुल अछूता यह प्रांगण कुछ ही दिनों में मेरे लिए दुर्लभ हो जाएगा। सबकुछ बहुत याद आएगा। 

जब मैंने यहाँ ज्वाइन किया था तो यहां के भवनों की नींव खोदी जा रही थी। लगभग चार साल बाद आज इस परिसर ने एक मोहक छवि प्राप्त कर ली है। प्रशासनिक और अकादमिक भवन, कुलपति आवास के साथ टाइप 5, 4, 3 के आवास बन गए हैं और प्रायः बस भी गये हैं। पक्की सड़कों के किनारे स्ट्रीट लाइट, सोलर लाइट और हाईमास्ट लाइट की सीधी पंक्तियां सूर्यास्त के समय यहां की स्काईलाइन को बेहद आकर्षक रूप दे रही हैं। इसे शब्दों में वर्णन करना कठिन है। आप आज की ताजा तस्वीरों का आनंद लीजिए।
























सोमवार, 6 अप्रैल 2026

प्रयागराज अत्यंत प्रिय है मुझे

पिछले दिनों एक व्यक्तिगत प्रयोजन से मुझे प्रयागराज जाना हुआ। इस शहर की तासीर मुझे एक जादुई मोहपाश में बांध लेती है। मुझे लगता है कि मैंने अपने जीवन में जो कुछ भी अर्जित किया है वह इस तीर्थराज प्रयाग की ही देन है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक व परास्नातक की शिक्षा के बाद अल्पकालिक पत्रकारिता और फिर प्रतियोगी परीक्षा के माध्यम से राजकीय सेवा में चयन का गौरव इसी पावन भूमि पर मिला। कोषाधिकारी के रूप में यहाँ तैनाती हुई तो एक बार फिर लिखने-पढ़ने का सिलसिला नए सिरे से परवान चढ़ने लगा। ब्लॉगरी का नशा ऐसा चढ़ा कि देखते-देखते महाजाल के बड़े लिख्खाड़ों से परिचय हो गया। कई राष्ट्रीय स्तर के सेमिनार आयोजित करने का सौभाग्य मिला और हिंदुस्तानी एकेडमी के सौजन्य से मेरे ब्लॉग के भीतर से एक किताब भी छपकर आ गई। यह सब चमत्कार इसी प्रयागराज ने किया।

अस्तु आज भी जब मुझे प्रयागराज जाना होता है तो मैं यहाँ बहने वाली सरस्वती की धारा से एक तुष्टिकारक आचमन करने का लोभ संवरण नहीं कर पाता। इस बार भी मैं अत्यंत संक्षिप्त अवधि के बावजूद दो विभूतियों से मिला।

यूट्यूब पर सनातन संस्कृति और राष्ट्रवादी विचारधारा के प्रबल पैरोकार के रूप में प्रतिष्ठित अनुपम मिश्रा जी अपनी निष्पक्ष और निडर टिप्पणियों के लिए जाने जाते है। 'घूमता आइना' (@GhoomtaAaina_AnupamMishra) नाम से इनका बेहद लोकप्रिय यूट्यूब चैनल अपने दर्शकों से कोई सहयोग राशि नहीं मांगता। इसी चैनल पर रोज शाम को साढ़े आठ से नौ बजे के आसपास आप एक लाइव शो लेकर आते हैं जिसका नाम है - लोकतंत्र का नृत्य। राष्ट्रीय राजनीति से लेकर अंतरराष्ट्रीय घटनाओं तक और फिल्मों से लेकर खेल और मनोरंजन तक के विषयों की जैसी ज्ञानवर्धक और सरल समीक्षा आप करते हैं वह मंत्रमुग्ध कर देती है। अच्छे को अच्छा और बुरे को बुरा कहने का साहस आप में कूट-कूट कर भरा है। पॉलिटिकल करेक्टनेस का पाखंड आप नहीं पालते। वोकिज्म और सेकुलरिज्म का कीड़ा आपको बहुत खतरनाक लगता है जिससे बचने की सलाह आप देते रहते हैं। @scribe9104 ट्विटर (अब X ) पर आप की टिप्पणियाँ अक्सर वायरल हो जाती हैं। अनुपम जी से मात्र बीस-बाईस मिनट की भेंट ही मुझे समृद्ध कर गई।

रेलवे स्टेशन पर मैं गाड़ी आने से दस मिनट पहले ही पहुंच गया। यहाँ मुझे Hitesh Kumar Singh जी से मिलने की उम्मीद थी। अपनी रेलवे की व्यस्त नौकरी के साथ साथ वे साहित्य साधना में लगे रहते हैं। प्रयाग-पथ नाम से 'साहित्यिक कला और संस्कृति का संचयन' संपादित और प्रकाशित करते हैं। कुल पांच मिनट की भेंट में उन्होंने मुझे दिसंबर-२०२५ में प्रकाशित प्रयाग-पथ का कृष्णा सोबती पर केंद्रित जन्मशती विशेषांक भेंट किया। इसमें विभूतिनारायण राय का कृष्णा सोबती जी के संबंध में रोचक आलेख प्रमुखता से छपा है। दूसरे संस्मरण और समीक्षाएं भी है। एक संग्रहणीय अंक मेरे हाथ लगा है। आप भी इसे खोजकर पढ़िए। 

इन दो यादगार मुलाकातों की तस्वीर भी लगा देता हूँ। 'अहा इलाहाबाद' से 'प्रिय प्रयाग' तक मेरे लिए जादू है जादू।

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी