हमारी कोशिश है एक ऐसी दुनिया में रचने बसने की जहाँ सत्य सबका साझा हो; और सभी इसकी अभिव्यक्ति में मित्रवत होकर सकारात्मक संसार की रचना करें।
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शनिवार, 17 सितंबर 2022

सहारनपुर डेटलाइन प्रारंभ

मित्रों, मुझे सहारनपुर में नई तैनाती के पद पर कार्यभार ग्रहण किए हुए तीन महीने हो गए। लेकिन इन तीन महीनों पर ही जैसे ग्रहण लगा हुआ था जो अब छँटता दिख रहा है। माँ शाकंभरी देवी के पवित्र तीर्थ क्षेत्र में उन्हीं के नाम से राज्य सरकार द्वारा नव-स्थापित विश्वविद्यालय में प्रथम अधिकारी के रूप में पहले कुलपति जी, फिर कुलसचिव व उसके बाद वित्त अधिकारी के रूप में मेरी तैनाती हुई है। हम तीन पूर्ण कालिक अधिकारियों के अतिरिक्त जो लोग भी इस विश्वविद्यालय के लिए काम कर रहे हैं वे सभी या तो उधार के हैं, या बेगार के हैं या किसी ठेकेदार के हैं। सभी इस उम्मीद में हैं कि जल्द ही यह ग्रहण कटेगा, उम्मीद की किरण फूटेगी और शिक्षा के प्रसार का यह सूरज चमकेगा। माननीय मुख्यमंत्री जी की विशेष अभिरुचि इस विश्वविद्यालय को एक भव्य और उत्कृष्ट अध्ययन केंद्र बनाने में है। बेहद प्राथमिकता के साथ इस विश्वविद्यालय कि प्रगति समीक्षा निरंतर की जा रही है और इसके निर्माण व विकास के कार्य को गति प्रदान करने का भरपूर प्रयास किया जा रहा है।

विश्वविद्यालय की सर्वोच्च नियामक संस्था है - इसकी कार्यपरिषद (Executive Council) और वित्तीय व्यवस्था संबंधी निर्णय लेती है - वित्त समिति (Finance Committee) जिसकी संस्तुतियों का अनुमोदन कार्यपरिषद करती है। लंबी प्रतीक्षा के बाद कार्य परिषद का गठन होते ही इसकी प्रथम बैठक का कार्यक्रम तय हुआ और गत 14 सितंबर 2022 को जब सबलोग अपने-अपने तरीके से हिन्दी-दिवस का जश्न मना रहे थे तब हम लोग कार्य-परिषद से विश्वविद्यालय के लिए बजट स्वीकृत करा रहे थे और दूसरे तमाम नीतिगत फैसलों पर मुहर लगवा रहे थे। इस बैठक के सम्पन्न होने के साथ ही अब महत्वपूर्ण निर्णयों को क्रियान्वित करने का समय आ गया है। विश्वविद्यालय के लिए कार्मिक प्रबंधन से लेकर सम्बद्ध महाविद्यालयों में प्रवेश प्रक्रिया का संचालन, और परीक्षा कराने के लिए ली गई उधारी और बेगारी का भुगतान करने का समय भी आ गया है। मतलब अब थोड़ा व्यस्त रहने का समय है।

मेरा निजी अनुभव है कि लेखन या कोई भी रचनात्मक कार्य बिल्कुल बेकारी के समय करने का मन ही नहीं होता है। मैं अगर किसी सार्थक काम के अभाव में खाली बैठा रहता हूँ तो कोई शौकिया काम भी करने का उत्साह नहीं रह जाता है। इस दौरान मैं अपने ब्लॉग पर तो प्रायः निष्क्रिय रहा ही चटपट स्टैटस वाला फेसबुक भी अपडेट करने में मुझे आलस्य घेरे रहा है। नियमित योगासन, प्राणायाम और ध्यान की अपनी ऑनलाइन कक्षा की झलकियां तथा साइकिल से सैर के रोचक अनुभव भी आपसे साझा करने में कोताही हुई है। इस नई जगह पर कितने ही नए अनुभव हुए जिसपर मजेदार पोस्ट लिखी जा सकती थी। लेकिन पता नहीं क्यों मेरा मन कुंजी-पटल से दूर ही रहा। माँ शाकंभरी की शक्ति-पीठ का प्रसिद्ध मंदिर वह प्रथम स्थान था जहां मैं ज्वाइन करने के बाद दर्शन के लिए गया था। उसकी झलक तो दिखानी ही थी। सहारनपुर में एक किराये का घर खोजने का अनुभव, घर मिल जाने के बाद उसमें गृहस्थी बसाने का अनुभव, भोजन बनाने वाला या वाली को ढूँढने और अपने मन-माफिक भोजन पाने-न पाने के संघर्ष का अनुभव, पास के सुरम्य मंदिर प्रांगण के हरे-भरे लॉन में नियमित योगाभ्यास व पैरामाउंट ट्यूलिप कॉलोनी की सड़कों व पार्कों में साइकिल चलाते हुए बारिश में भींगने का अनुभव। क्या कुछ नहीं था इस अञ्चल में पसरा हुआ मेरे लिए बिल्कुल तारों-ताजा! लेकिन पता नहीं क्यों खलिहर बैठे रहने का स्थायी भाव मेरे भीतर तक इतनी गहरी पैठ बना चुका था कि मैं उसी का रसास्वादन करने लगा था। निठल्लेपन का सुख कैसा होता है इसकी थोड़ी अनुभूति मुझे इस दौर में हुई है।

पिछली तैनाती प्रयागराज में हुई तो लगा था कि ब्लॉगरी की यात्रा जहां से शुरू हुई थी वहाँ पहुंचकर सबकुछ फिरसे लहलहा उठेगा लेकिन करोना प्रतिबंधों से बाहर निकलकर दुबारा सामान्य दिनचर्या बहाल करते हुए आप सबसे सक्रियता से जुडने की तैयारी हो ही रही थी कि सरकार ने मेरी पदोन्नति कर दी और एक नए घोषित विश्वविद्यालय को धरातल पर उतारे जाने की प्रक्रिया का वित्तीय पक्ष सम्हालने की चुनौती देकर मुझे अपने परिवार से बहुत दूर और पैतृक गाँव से सर्वाधिक संभव दूरी के स्थान पर भेज दिया। आज्ञा शिरोधार्य करनी ही थी।

अब जबकि इस नए शहर में अपनी गृहस्थी प्रायः जम गई है और विश्वविद्यालय भी अपना आकार लेने लगा है तब एक बार फिर कुंजी-पटल (keyboard) से यारी हो जाने का उत्साह हिलोरें ले रहा है। इस हरे-भरे इलाके में घुमक्कड़ी करने और उसे लिपिबद्ध करने की अपार संभावनाएं हैं। कुछ नए अनुभव हो रहे हैं जिन्हें आप तक पहुंचाने का मन है। कोशिश होगी यहाँ कुछ नियमित आने की और अन्तर्जाल पर पुराने मित्रों से दुबारा जुड़ने की। आशा है आप सबका साथ मिलता ही रहेगा।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

www.satyarthmitra.com

 

शुक्रवार, 23 अगस्त 2013

अब कौन पढ़ाए…?

कोषागार में एक महत्वपूर्ण काम होता है सरकारी सेवा से रिटायर होने वाले कर्मचारियों, अधिकारियों और शिक्षकों इत्यादि को पेंशन का भुगतान करना। जब पहली बार पेंशन की शुरुआत होती है तो इसके लिए संबंधित पेंशनर को स्वयं कोषाधिकारी के समक्ष उपस्थित होना पड़ता है। कोषाधिकारी को पेंशन संबंधी अभिलेखों में दी गयी सूचना और फोटो इत्यादि का सत्यापन उस व्यक्ति से पूछताछ करके करना होता है जो उसकी पहचान से संतुष्ट होने के बाद पेंशन भुगतान करने के आदेश पर हस्ताक्षर करता है। इसके बाद प्रत्येक माह की पहली तारीख को उसकी पेंशन उसके बैंक खाते में ई-पेमेंट की प्रक्रिया से भेज दी जाती है। साल में केवल एक बार नवंबर-दिसंबर में उसे अपने ‘जीवित होने का प्रमाणपत्र’ देने के लिए कोषागार या बैंक में उपस्थित होना पड़ता है। जिस पेंशनर की मृत्यु हो जाती है उसकी सूचना लेकर उसकी पत्‍नी या पति (यदि जीवित हैं) को उपस्थित होना होता है जिनकी पहचान से संतुष्ट होने के बाद उन्हें पारिवारिक पेंशन का भुगतान प्रारंभ हो जाता है।

लगातार एक ही काम करते हुए यह सब इतना यंत्रवत होता रहता है कि मुझे इस काम में बोर हो जाना चाहिए। लेकिन मैं इसमें कभी बोर नहीं होता। कारण यह है कि इस काम को मैं एक विशिष्ट अवसर के रूप में प्रयोग करता हूँ। साठ साल की उम्र में जो लोग मेरे पास आते हैं उनके पास सरकारी काम करने का एक लंबा अनुभव होता है और उनके पास इस जीवन के बारे में अपने-अपने निष्कर्ष होते हैं। पारिवारिक पेंशन के लिए जो वयोवृद्ध महिलाएँ आती हैं उन सबकी आँखों में एक अलग कहानी झाँकती रहती है। कुछेक पुरुष जो अपनी नौकरीशुदा पत्‍नी की मृत्यु के बाद पारिवारिक पेंशन लेने आते हैं उनकी कहानी तो और भी उत्सुकता जगाती है। समय की उपलब्धता और उनकी प्राइवेसी की मर्यादा की रक्षा करते हुए मुझे उनसे बात-चीत करके जो कुछ जानने-समझने का अवसर मिलता है उसे मैं इस नौकरी की बहुत विशिष्ट उपलब्धि मानता हूँ। इन बुजुर्गों से दोस्ती करके एक अलग आनन्द आता है।

आप जानते ही होंगे कि शिक्षकों की सेवानिवृत्ति एक खास नियम के कारण प्रायः जून महीने की समाप्ति पर होती है। शिक्षा सत्र के बीच में चाहे जब भी उनकी सेवानिवृत्ति की आयु पूरी हो जाय उन्हें सत्र के अंत तक अपने विद्यार्थियों को पूरा कोर्स पढ़ाने के बाद सेवा से निवृत्त किया जाता है। इसे “सत्रान्त लाभ” कहते हैं। तो आजकल कोषागार में गुरूजी लोगों की आमद ज्यादा हो गयी है। जून में सेवानिवृत्त होने के बाद उनकी पेंशन का प्राधिकार पत्र सक्षम स्वीकर्ता अधिकारियों द्वारा कोषागार में भेजा जा रहा है और वे अपनी पहचान/ सत्यापन की औपचारिकता पूरी कराने कोषागार में आ रहे हैं।

पहचान के सत्यापन सम्बंधी कुछ वैधानिक प्रश्न पूछने के बाद मैं कुछ अनौपचारिक चर्चा उनके विद्यालय की दशा और दिशा के बारे में भी कर लेता हूँ। education crisisजैसे- आपके विद्यालय में किन-किन विषयों की पढ़ाई होती है। उन विषयों के अध्यापक उपलब्ध हैं कि नहीं? जो लोग रिटायर हो जा रहे हैं उनके स्थान पर नयी भर्तियाँ हो रही हैं कि नहीं? क्या बच्चे रेग्युलर कक्षाओं में पढ़ाई करने आते हैं? परीक्षाओं में नकल पर रोक लग पाती है कि नहीं? कितने प्रतिशत बच्चों में विषय का ज्ञान अर्जित करने की ललक होती है? ऐसे बच्चों को गुरुजन कितना संतुष्ट कर पाते हैं। पहले से अब की शिक्षा व्यवस्था में क्या परिवर्तन आये हैं? बच्चों को अपने स्कूल की कक्षा की पढ़ाई से काम चल जाता है या उन्हें प्राइवेट ट्यूशन करना पड़ता है? आदि-आदि।

इन प्रश्नों का जो उत्तर टुकड़ों-टुकड़ों में मिलता है उसे अपने अनुभवों की गोंद से जोड़ता हूँ तो एक ऐसी तस्वीर उभरती है जिसे देखकर कलेजा बैठ जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों व छोटे-छोटे कस्बों में पसरे इन विद्यालयों में कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाय तो पठन पाठन की दुरवस्था देखकर मन में घोर निराशा पाँव पसारने लगती है। जिनके ऊपर इस दिशा में कुछ कदम उठाने की जिम्मेदारी है उनकी चाल-ढाल देखकर मन में एक डर सा बैठ जाता है – इस समाज की नयी पीढ़ी का भविष्य कैसा होगा?

इस तस्वीर की कुछ बानगी देखिए-

  • स्कूलों में जितने बच्चों का नाम लिखा होता है उसके चौथाई बच्चे ही नियमित स्कूल आकर कक्षाओं में पढ़ने बैठते हैं। इन बच्चों को पढ़ाने के लिए आवश्यक जितने शिक्षकों का मानक निर्धारित है उनसे चौथाई संख्या में ही वास्तव में कक्षा में जाकर पढ़ाते है। इसका कारण लगातार बढ़ती रिक्तियों व शिक्षक समुदाय पर प्रशासनिक नियन्त्रण की कमी से लेकर शिक्षक संघ की राजनीति तक बहुत कुछ है। अब यह अनुमान लगाना कठिन है कि बच्चे कम आते हैं इसलिए शिक्षक कम पढ़ाते हैं या शिक्षक कम पढ़ाते हैं इसलिए बच्चे कम आते हैं।
  • सेवानिवृत्ति के फलस्वरूप जो पद  रिक्त हो जाते हैं उन पदों को समय से भरे जाने की कोई मुकम्मल व्यवस्था नहीं है। निजी प्रबंधतंत्र वाले विद्यालय शिक्षकों के वेतन के लिए  जब सरकारी अनुदान पाने लगते हैं तब स्टाफ की नियुक्ति का अधिकार सरकारी नियन्त्रण में चला जाता है। सरकार द्वारा शिक्षकों की भर्ती के लिए जो चयन-बोर्ड गठित किया गया वह पिछले दो-तीन सालों से कोई चयन की प्रक्रिया पूरी नहीं कर सका है। भ्रष्टाचार और अयोग्यता के दलदल में फँसकर यह प्रक्रिया लगभग दम तोड़ चुकी है। तीन साल पहले जब इस बोर्ड के माध्यम से शिक्षकों का चयन होता भी था तब कोई भी अभ्यर्थी अपनी योग्यता और मेरिट के भरोसे सफल होने की कल्पना नहीं कर पाता था। आवेदन डालने के साथ ही किसी जुगाड़ के फेर में पड़ जाता था। पक्षपात और धाँधली की शिकायतें बढ़ी और असफल अभ्यर्थी कोर्ट जाने लगे। कोर्ट-केस इतने बढ़ गये कि अब नयी भर्ती की प्रक्रिया लगभग बन्द ही हो गयी है।
  • जो अभ्यर्थी येन-केन प्रकार से सफल होकर इन विद्यालयों में पहुँचे उन्हें निजी प्रबन्ध तन्त्र ने अपनी शर्तों पर ज्वाइन कराया; या नहीं ज्वाइन करने दिया। एक शिक्षक ने तो बड़े गर्व से कहा कि मेरे विद्यालय में करीब आधा दर्जन लोग चयन बोर्ड से परवाना लेकर आये लेकिन मेरे मैनेजर साहब इतने मजबूत हैं कि किसी को ज्वाइन नहीं करने दिया। मैंने पूछा- तो फिर पढ़ाता कौन है वहाँ? वे बोले- सब व्यवस्था हो जाती है साहब। मैनेजर साहब ने बहुत लोगों को ‘ऐडहाक’ पर रख लिया है। आज नहीं तो कल वे रेगुलर हो ही जाएंगे। उनके विश्वास को देखकर मुझे वह बहस याद आ गयी जो मैंने अपनी  ट्रेनिंग के दौरान एक माननीय न्यायमूर्ति के साथ कर ली थी-
  • अज्ञानतावश तगड़े आत्मविश्वास का शिकार होकर मैंने हाईकोर्ट के पूर्व अधिवक्ता और तत्कालीन न्यायमूर्ति का लेक्चर सुनते हुए उनसे एक ऐसा तकलीफ़देह प्रश्न पूछ लिया था जिससे अवमानना का दोषी भी होने का खतरा उत्पन्न हो गया था। यह कि किसी निजी प्रबन्धतंत्र द्वारा भ्रष्टाचारी तरीका अपनाकर अनियमित रूप से किसी भाई-भतीजे को शिक्षक के रूप में नियुक्त कर लिया जाता है जिसका अनुमोदन सरकारी अधिकारी द्वारा नहीं किया जा सकता है। लेकिन वह जानबूझकर उसकी नियुक्ति रद्द करने का एक ऐसा आदेश पारित कर देता है  जिसमें पूरा प्रकरण युक्तियुक्त तरीके से उद्धरित नहीं होता है। उस आदेश को प्रबंधतंत्र कोर्ट में चुनौती देता है और माननीय न्यायमूर्तिगण आसानी से अन्तरिम स्थगनादेश (स्टे ऑर्डर) जारी कर देते हैं। कोर्ट का आदेश भले अस्थायी स्थगन का हो लेकिन उसका स्थायी लाभ उन गलत व्यक्तियों को मिल जाता है। मेरा प्रश्न था कि क्या कोर्ट के पास इस गलत कार्य में खुद एक सहयोगी पक्ष (पार्टी) बन जाने से बचने का कोई सूत्र नहीं है? मुझे कोई संतोषजनक उत्तर न तब मिला था न अबतक मिल पाया है। कोर्ट के स्टे के सहारे बहुत से लोग अपने गलत रास्ते पर आगे बढ़ने में सफल हो जाते हैं। अलबत्ता उनकी इस सफलता में कार्यपालिका के जिम्मेदार अधिकारी बड़े सहयोगी की भूमिका निभाते हैं।
  • यह स्थिति तो अशासकीय सहायता प्राप्त माध्यमिक विद्यालयों की थी। प्राथमिक शिक्षा विभाग में शिक्षकों की स्थिति और भयावह है। शिक्षा का अधिकार अधिनियम आ जाने के बाद प्राथमिक शिक्षा को मौलिक अधिकार बना दिया गया लेकिन वास्तविकता के धरातल पर उस अधिकार को जिस प्रकार उपलब्ध कराया जा रहा है वह किसी से छिपा नहीं है। शिक्षकों के जितने पद मानक के अनुसार जरूरी हैं उनमें आधे रिक्त हैं। इनकी भर्ती की प्रक्रिया तीन-चार साल से अटकी पड़ी है।  इसके पीछे भी प्रशासनिक अयोग्यता और भ्रष्टाचार का खेल काम कर रहा है। हम लाखों की संख्या में उपलब्ध योग्यताधारी अभ्यर्थियों में से जरूरी संख्या में प्राथमिक शिक्षकों का चयन कर पाने में असमर्थ हैं। आज स्थिति यह है कि प्रशासनिक अधिकारी नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू करने में घबरा रहे हैं। हाथ खड़े कर देते हैं। जैसे किसी आफ़त को दावत दे रहे हों। काम हो चाहे न हो लेकिन जिसने नियुक्ति का काम हाथ में लिया उसका फँसना तय है। आखिर हमने ऐसी भयावह स्थिति क्यों बन जाने दी है? कौन जिम्मेदार है इसके लिए?
  • राजकीय हाई-स्कूल व इंटर कॉलेजों में भी शिक्षक भर्ती की कमोबेश यही दशा है। राज्य लोक सेवा आयोग में जो उहापोह और अनिर्णय की स्थिति है वह हाल की घटनाओं के बाद सभी जान गये हैं। पूरा डेलिवरी सिस्टम चरमरा गया लगता है।
  • एक संस्कृत महाविद्यालय के सेवानिवृत्त शिक्षक ने तो ऐसी बात बतायी कि मैं सन्न रह गया। बता रहे थे कि वे अपने महाविद्यालय के अंतिम बचे हुए शिक्षक थे जो अब सेवानिवृत्त हो गये हैं। अब वहाँ एक भी शिक्षक नहीं है और प्रबंधतंत्र बहुत खुश है कि अब उसे संस्कृत महाविद्यालय बन्द करके उसके विशाल प्रांगण में निजी पब्लिक स्कूल चलाने की पूरी स्वतंत्रता मिल गयी है। यह व्यवसाय आजकल बहुत लाभकारी हो गया है क्योंकि कोई भी जागरूक गार्जियन अपने बच्चों को सरकारी प्राइमरी स्कूल में भरसक नहीं भेजना चाहता। संस्कृत पाठशालाओं व महाविद्यालयों को सरकारी अनुदान पर चलाने के लिए पिछले जमाने की सरकारों ने जब फैसला किया तब यह नहीं सोचा कि इन शिक्षकों की निरन्तरता कैसी बनायी जाएगी। जो पद खाली हो रहे हैं वे समाप्त होते जा रहे हैं और शनैः शनैः ये सभी विद्यालय भी काल के गाल में समा जाएंगे। जो विद्यालय चल भी रहे हैं उनके पठन-पाठन का स्तर देखकर लगता है कि वे यदि सुधर नहीं सकते तो उनका समाप्त हो जाना ही बेहतर है।
  • एक बार मुझे एक जिले में इन संस्कृत विद्यालयों के निरीक्षण का दायित्व मिला। इनकी दुर्दशा और गुरुजनों की अकर्मण्यता के बारे में जब मैंने खरी-खरी रिपोर्ट बनानी शुरू की तो मुझे समझाया गया कि आप लोग उर्दू मदरसों पर तो ऐसी कड़ाई नहीं करते। वहाँ भी तो किसी विषय की वस्तुनिष्ठ पढ़ाई नहीं होती। वहाँ भी तो नकल कराकर बच्चों को पास कराया जाता है। वहाँ भी तो मुफ़्त में सरकारी अनुदान की बन्दरबाँट होती है। वहाँ तो किसी की हिम्मत नहीं है जो जाँच कर ले। मैंने जब अपने काम से काम रखने पर बल दिया तो मेरे खिलाफ़ एक आन्दोलन सा खड़ा हो गया और उच्च अधिकारियों ने ‘समझदारी से’ बीच-बचाव करके मुझे उस काम से अलग कर दिया।

इन सारी दुर्व्यवस्थाओं के बीच एक आशा की किरण दिखती है तो वह सरकारी तंत्र से अलग निजी क्षेत्र में काम कर रहे कुछेक ऐसे शिक्षण संस्थानों में दिखती है जिन्होंने गुणवत्ता बनाये रखने के तमाम जतन कर रखे हैं। लेकिन उनके ऊँचे तोरण द्वारों के भीतर जाने का सुभीता कितने बच्चों के पास है?

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)     

रविवार, 30 सितंबर 2012

भ्रष्टाचार की संजीवनी तो जरूरी है

Corruptionलखनऊ से इलाहाबाद के लिए गंगा-गोमती एक्सप्रेस की यात्रा इस बार बहुत रोचक रही। लम्बी प्रतीक्षा के बाद पदोन्नति मिली तो उत्साह वश अपनी सेवा पुस्तिका पूरी कराकर मुख्यालय से संबंधित उस दफ़्तर तक इसे स्वयं पहुँचाने चल पड़ा था जहाँ से मेरी सेवा के क्लास-वन ऑफीसर्स की वेतन पर्ची जारी होती है। इसी बहाने इलाहाबाद के अपने कुछ मित्रों व सहकर्मियों से मिलने-जुलने की इच्छा भी पूरी हो जाती।

संयोग से अगले दिन इलाहाबाद में प्रदेश के सरकारी डिग्री कालेजों में प्रवक्ता पद की कोई परीक्षा होनी थी इसलिए पूरी गाड़ी के साथ-साथ उस ए.सी. चेयरकार में बहुत से परीक्षार्थी भी बैठे हुए थे। इनमें अधिकांश पी-एच.डी. कर चुके होंगे या कर रहे होंगे। यू.जी.सी. की नेट परीक्षा (National Eligibility Test)  तो सबने पास की ही होगी। ये बड़ी उम्र के लड़के-लड़कियाँ उच्च शिक्षा के क्षेत्र में अपना कैरियर बनाने का सपना लिये एक स्क्रीनिंग टेस्ट देने जा रहे थे। अधिकांश के हाथ में नोटबुक या कोई गाइडबुक थी जिसे वे अंतिम समय तक पढ़ने वाले थे। कुछ शादी-शुदा लड़कियाँ अपने पति, भाई या पिता के साथ जा रहीं थीं। इस टेस्ट में जो पास हो जाएंगे उनका साक्षात्कार होगा। साक्षात्कार में सफलता का जो मंत्र इन लोगों की चर्चा में सुनने को आया वह एक ऐसे तंत्र के बारे में था जो अभ्यर्थी की मेरिट और विषय में योग्यता के बजाय दूसरी क्षमताओं को चयन का आधार बनाता था। पैसा और पहुँच के बिना सफलता की आशा करने वाले न के बराबर थे। मुझे झटका लगा। चकित भाव से मैंने उन्हें अपने अनुभव के बारे में बताया कि कैसे एक साधारण परिवार से आकर बगैर किसी उत्कोच या सिफारिश के लोक सेवा आयोग द्वारा मैं एक राजपत्रित सेवा के लिए चयनित कर लिया गया था। इसपर उन्होंने यह माना कि आयोग में पी.सी.एस. की मुख्य परीक्षा तो लिखित होती है और साक्षात्कार पर सबकुछ निर्भर नहीं होता। इसलिए वहाँ अभी गनीमत है, लेकिन जहाँ सबकुछ इण्टरव्यू पर निर्भर है वहाँ हालत बहुत खराब है।

मैंने अशासकीय विद्यालयों के शिक्षकों के चयन के लिए माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड और  उच्च शिक्षा सेवा आयोग में धाँधली की बातें सुन रखी थीं लेकिन लोक सेवा आयोग में भी इस बीमारी ने पैर पसार रखे हैं यह सुनकर चिन्ता हुई। मैं सोचने लगा कि क्या इस संवैधानिक संस्था से भी अब मेहनतकश होनहार अभ्यर्थियों को निराशा ही हाथ लगेगी। आयोग के माननीय सदस्य क्या हमारे पतनोन्मुख समाज की प्रतिच्छाया बनते जा रहे हैं?

एक तरफ कुछ सरकारी महकमें के लोग बैठे थे जो सरकारी अफसरों की अलग-अलग श्रेणियों का बखान कर रहे थे। वे इन परीक्षार्थियों को यह समझा रहे थे कि केजरीवाल जैसे लोगों के बहकावे में मत आयें। सरकारी नौकरी करनी है तो प्रैक्टिकल एप्रोच अपनाएँ। नौकरी पाने के लिए आपको जो रास्ता अपनाना पड़ रहा है वही आगे भी काम आएगा। अन्तर यह है कि अभी आप बेरोजगार हो और मजबूर हो। नौकरी पाने के बाद आप प्रिविलेज्ड क्लास में शामिल हो जाओगे। …अन्ना जी आन्दोलन तो कर सकते हैं, भ्रष्टाचार के खिलाफ जनभावना भी  उभार सकते हैं लेकिन जब इसको मिटाने के लिए सही आदमी तलाशने जाओगे तो कोई नहीं मिलेगा।  …सरकारी सिस्टम में रहते हुए जो ईमानदारी की कोशिश करता है उसको इतनी अधिक समस्याएँ झेलनी पड़ती हैं कि वह अन्ततः टूटकर सरेन्डर कर देता है या समाज में उपेक्षित होकर डिप्रेसन का शिकार हो जाता है। कुछ नौजवान इस बात पर अविश्वास में सिर हिला रहे थे।

इसपर मुझे पिछले दिनों लखनऊ की एक घटना याद आ गयी जिसमें एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने अचानक अपने ऑफिस में मीडिया को बुलाकर कैमरे के सामने अपनी दर्द भरी दास्ताँ सुना दी थी कि कैसे उनके ऊपर उच्चाधिकारियों द्वारा गलत काम करने का दबाव बनाया जा रहा है और इन्कार करने पर भयंकर उत्पीड़न किया जा रहा है। मीडिया ने जब उस उच्चाधिकारी से दरियाफ़्त की तो पता चला कि उन्होंने इन्हें मानसिक अवसाद का शिकार बता दिया और उनको अस्पताल भेजने की सलाह दे डाली।

“भाई साहब यह प्रैक्टिकल एप्रोच क्या होता है?” पीछे से एक उम्रदराज दढ़ियल अभ्यर्थी ने अपनी कॉपी में से सिर उठाकर पूछा। महौल में ठहाके की आवाजें भर गयीं।

रिटायरमेन्ट के करीब लग रहे एक बुजुर्गवार ने अपने अनुभव की टोपी उतारते हुए मुड़कर देखा और बताने लगे- देखो भाई जब सरकारी नौकरी करोगे तो इसकी हर रोज जरूरत पड़ेगी। इसके बिना नौकरी कर ही नहीं पाओगे। प्रैक्टिकल एप्रोच नहीं रखोगे तो चारो ओर से परेशान रहोगे।

प्रश्नकर्ता अपनी सीट से उठकर इनके पास आ गया। इन्होंने आगे समझाया- एक सरकारी कर्मचारी को लोकसेवक कहा जाता है और उसके आचरण की एक नियमावली बनायी गयी है। इस नियमावली का पालन नहीं करने पर आपको चेतावनी से लेकर निन्दा प्रविष्टि तक दी जा सकती है और डिमोशन से लेकर बर्खास्तगी तक की जा सकती है। इससे बचने के लिए आपको आदर्श आचरण का पालन करना होता है; लेकिन केवल कागज में, क्योंकि असल व्यवहार में तो यह संभव ही नहीं है। जो असल में कोशिश करता है वह असल में ‘सस्पेन्ड’ हो जाता है। कारण यह है कि नियम से काम करने पर और अपने पद की सारी जिम्मेदारी पूरा करने पर आप बाकी सबलोगों के लिए परेशानी खड़ी कर देते हैं। दूसरों की लूट-खसोट पर ब्रेक लगाकर आप ज्यादा समय तक टिक नहीं सकते। इनका तगड़ा गिरोह आपको हिला देगा…।

इस प्रवचन के श्रोताओं की संख्या बढ़ती जा रही थी।

…आप बहुत अच्छा काम करेंगे तो बाकी नक्कारों की कलई खुलने लगेगी और वे आप के ऊपर नाराज हो जाएंगे। आपके ईमानदार होने से सिस्टम में थोड़ी बहुत हलचल तो हो सकती है लेकिन कोई बड़ा परिवर्तन नहीं हो पाएगा। …यह समाज भ्रष्टाचार का इतना आदती हो चुका है कि आपको ‘एलियन’ समझकर किनारे कर देगा। …आप जिनका खेल बिगाड़ेंगे वे आपको यूँही नहीं छोड़ देंगे। आपकी कुर्बानी ले ली जाएगी। …आपके बीबी-बच्चे आपको नकारा समझेंगे। आप उनके लिए महंगे खिलौने, कीमती कपड़े और भारी गहने नहीं खरीद पाएंगे तो आपको वे आदर्श पिता या पति नहीं समझेंगे। दूसरे रिश्तेदार भी आपको किसी काम लायक नहीं देखेंगे तो मुँह मोड़ लेंगे। …मैं यह नहीं कह रहा कि आप आकंठ भ्रष्टाचार में डूब जाएँ। लेकिन इससे बचकर रहना बहुत मुश्किल है। इसलिए आप भले ही किसी का गला न काटें, गबन और घोटाला न करें, गरीबों का हक न छीनें लेकिन सिस्टम के खिलाफ उल्टी धारा बहाने की कोशिश भी न करें। आपको चोरी नहीं करनी है तो न करें लेकिन दूसरों की राह का रोड़ा भी न बनें।

लेकिन प्रैक्टिकल एप्रोच क्या है श्रीमन्‍, यह तो क्लीयर कीजिए…! एक किशोर ने चुहल की।

आप अभी भी नहीं समझे? तो साफ-साफ जान लीजिए कि प्रैक्टिकल एप्रोच इस बात में विश्वास करना है कि बिना भ्रष्टाचार के यह वास्तविक दुनिया चलने वाली नहीं है। व्यावहारिक रूप से किसी न किसी रूप में भ्रष्टाचार को स्वीकारना पड़ेगा। इसके बिना जीवन चलाना असम्भव है। यह एक ऐसी संजीवनी है जो आदमी को जीने की राह दिखाती है, निराश व्यक्ति को सफलता के सूत्र पकड़ाती है, बेमौत मरने वाले को नया जीवन देती है और साधारण को असाधारण बना देती है। आप देखिए न एक साधारण सी कुरूप दलित स्त्री को महल की महारानी बनाकर तमाम ऐश्वर्य और सुख साधन की स्वामिनी बना दिया इस शक्ति ने।

वहाँ की चर्चा रोचक होती जा रही थी। एक विशेषज्ञ ने तो यहाँ तक कह दिया कि जो अधिकारी सुविधा शुल्क लेकर समय से सही काम कर दे वह उस कथित ईमानदार से बेहतर है जो पैसा तो नहीं लेता है लेकिन काम का निपटारा करने में भी कोई रुचि नहीं लेता है। इसपर लगभग एक राय बनती दिखी। इसपर एक गणित के विद्यार्थी ने अधिकारियों की ग्रेडिंग के लिए एक चार्ट बनाना शुरू कर दिया। पैसा लेने वाले, पैसा न लेने वाले, सही काम करने वाले या न करने वाले तथा गलत काम करने वाले या न करने वाले अधिकारियों के क्रमचय-संचय (permutation-combination) के द्वारा निम्न श्रेणियाँ निकलकर आयीं :

क्र.

पैसा लेना

सही काम करना

गलत काम करना

श्रेणी

1

N

Y

N

उत्कृष्ट

2

Y

Y

N

उत्तम

3

Y

Y

Y

भ्रष्ट/लोभी

4

Y

N

N

धुर्त/लतखोर

5

Y

N

Y

महाभ्रष्ट

6

N

Y

Y

मूर्ख

7

N

N

Y

महामूर्ख

8

N

N

N

निकृष्ट

इस प्रकार श्रेणियों की चर्चा में प्रत्येक श्रेणी के अधिकारियों के उदाहरण पेश किये जाने लगे। मैं सहमा सा चुपचाप सुनता रहा; और अपने आसपास के अधिकारियों में भी ऐसे उदाहरण खोजता रहा। मेरे पन्द्रह साल के सरकारी अनुभव में लगभग सभी प्रकार के अधिकारी और कर्मचारी देखने-सुनने को मिले हैं। इसी विचार मंथन में डूबा था कि अचानक प्रयाग स्टेशन पर गाड़ी रुकी और मैंने हड़बड़ाकर अपना बैग उठा लिया और बोगी से बाहर आ गया…।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

शुक्रवार, 7 जनवरी 2011

वर्धा परिसर के क्लब में झूमने का मजा…

 

वर्धा विश्वविद्यालय शहर से दूर एक वीरान स्थल पर बसाया गया था। पाँच निर्जन शुष्क पहाड़ी टीले इस संस्था को घर बनाने के लिए नसीब हुए। बड़े-बड़े पत्थर और कंटीली झाड़ियाँ चारो ओर पसरी हुई थीं। लेकिन मनुष्य की अदम्य ऊर्जा और निर्माण करने की अनन्य शक्ति के आगे प्रकृति को भी रास्ता देना पड़ता है। शुरू-शुरू में एक कागज पर अवतरित हुआ विश्वविद्यालय आज इस पंचटीला पर धड़कता हुआ एक सुंदर रूपाकार ले रहा है। पहाड़ी ढलान से तादात्म्य बनाती इमारतों की डिजाइन ऐसी बनी है कि प्राकृतिक सौंदर्य अक्षुण्ण बना रहे। यहाँ वृक्षारोपण और जल-संग्रहण के विशेष प्रयास किए गये हैं।

परिसर में अध्यापकों, अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों के परिवार भी आकर बसने लगे हैं। शहर से दूरी के कारण मौलिक जरूरतों की वस्तुओं को जुटाना कठिन है। अब धीरे धीरे दुकानें इस ओर सरकती आ रही है। आस-पास की जमीनें महँगी होने लगी हैं। यहाँ अब खेल और मनोरंजन की जरूरत पूरी करने का उपाय भी खोजा गया है। फैकल्टी एंड ऑफिसर्स क्लब का गठन हो गया है। वर्ष २०११ का आगमन हुआ तो उसी समय क्लब का विधिवत उद्‌घाटन किया गया। कुलपति जी की पत्नी पद्‍मा जी ने लाल फीता काटा। प्रतिकुलपति जी की पत्नी ने केक काटकर सबको बाँटा। बच्चों ने गुब्बारे फोड़ने की प्रतियोगिता खेली। बड़ों ने भी हाउज़ी का लुत्फ़ उठाया। खूब धूमधाम से नये साल का जश्न मना।

इसके पहले विश्वविद्यालय के १३वें स्थापना दिवस (२९ दिसंबर) को भी सबके परिवारों और विद्यार्थियों ने मिलजुलकर शाम को रंगारंग कार्यक्रम प्रस्तुत किया। क्रिकेट, वॉलीबाल और बैडमिंटन की प्रतियोगिताएँ हुईं। पाककला का प्रदर्शन भी हुआ। मेरे बच्चों की उम्र छोटी है, लेकिन बड़ों के साथ उन्हें फैशन परेड और नृत्य करते देखकर मेरा मन झूम उठा। यहाँ कुछ तस्वीरें लगा रहा हूँ।

 

 

 

 

स्थापना दिवस समारोह के रंगारंग कार्यक्रम को परिसर में रहने वाले परिवारों की महिलाओं व बच्चों ने छात्रावासी छात्र-छात्राओं के साथ मिलकर तैयार किया था। दीपाजी के निर्देशन में एक बांग्ला गीत पर नृत्य प्रस्तुत किया चार बेटियों ने जिसमें एक मेरी वागीशा भी थी।

स्थापना दिवस समारोह में बांग्ला नृत्य प्रस्तुत करती वागीशा की टीम

भीषण गर्मी और नीरस दिनचर्या की बातें नेपथ्य में चली गयी हैं। आजकल यहाँ एक से एक कार्यक्रमों की झड़ी लगी है। रिपोर्ट लगाना मुश्किल हो गया है। यहाँ के मौसम के क्या कहने…! सारा देश कड़ाके की ठंड से परेशान है और हमें दोपहर की धूप से बचने के लिए छाया तलाशनी पड़ती है। घर के भीतर हाफ स्वेटर से काम चल जाता है। इलाहाबाद से बाँध कर लायी हुई रजाइयाँ खुली ही नहीं। पतला कम्बल पर्याप्त है। मेरे जैकेट और सूट भी ड्राई क्लीनर के टैग के साथ बक्से में सो रहे हैं।

क्या कहा, …जलन हो रही है? अजी यहाँ कुछ कठिनाइयाँ भी हैं। लेकिन इस मजे के वक्त हम अपनी तकलीफ़ें क्यों बताएँ…!!!

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

सोमवार, 31 मई 2010

ये प्रतिभाशाली बच्चे घटिया निर्णय क्यों लेते हैं?

 

आजकल इण्टरमीडिएट परीक्षा और इन्जीनियरिंग कालेजों की प्रवेश परीक्षा के परिणाम घोषित हो रहे हैं। इण्टर में अच्छे अंको से उत्तीर्ण या इन्जीनियरिंग की प्रवेश परीक्षा में अच्छी रैंक से सफलता हासिल करने वाले प्रतिभाशाली लड़कों के फोटो और साक्षात्कार अखबारों में छापे जा रहे हैं। कोचिंग सस्थानों और माध्यमिक विद्यालयों द्वारा अपने खर्चीले विज्ञापनों में इस सफलता का श्रेय बटोरा जा रहा है। एक ही छात्र को अनेक संस्थाओं द्वारा ‘अपना’ बताया जा रहा है। व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा चरम पर है। इस माहौल में मेरा मन बार-बार एक बात को लेकर परेशान हो रहा है जो आपके समक्ष रखना चाहता हूँ।

मैंने इन सफल छात्रों के साक्षात्कारों में इनकी भविष्य की योजना के बारे में पढ़ा। कुछ अपवादों को छोड़कर प्रायः सभी का कहना है कि वे आई.आई.टी. या यू.पी.टी.यू. से बी.टेक. करने के बाद सिविल सर्विस की प्रतियोगिता में शामिल होंगे। कुछ ने बी.टेक. के बाद एम.बी.ए. करने के बारे में सोच रखा है। यानि कड़ी मेहनत के बाद इन्होंने इन्जीनियरिंग के पाठ्यक्रम में दाखिला लेने में जो सफलता पायी है उसका प्रयोग वे केवल इन्जीनियरिंग की स्नातक डिग्री पाने के लिए करेंगे। सरकार का करोड़ो खर्च कराकर वे इन्जीनियरिंग सम्बन्धी जो ज्ञान अर्जित करेंगे उस ज्ञान का प्रयोग वैज्ञानिक परियोजनाओं के निर्माण और क्रियान्वयन के लिए नहीं करेंगे। ये अपनी प्रतिभा का प्रयोग उत्कृष्ट शोध द्वारा आधुनिक मशीनों के अविष्कार, निर्माण और संचालन की दक्ष तकनीक विकसित करने में नहीं करेंगे। बल्कि इनकी निगाह या तो उस सरकारी प्रशासनिक कुर्सी पर है जिसपर पहुँचने की शैक्षिक योग्यता किसी भी विषय में स्नातक मात्र है,  या आगे मैनेजमेण्ट की पढ़ाई करके निजी क्षेत्र के औद्योगिक/व्यावसायिक घरानों मे मैनेजर बनकर मोटी तनख्वाह कमाने की ओर है जिसकी अर्हता कोई सामान्य कला वर्ग का विद्यार्थी भी रखता है।

साल दर साल हम देखते आये हैं कि आई.आई.टी. जैसे उत्कृष्ट संस्थानों से निकलकर देश की बेहतरीन प्रतिभाएं अपने कैरियर को दूसरी दिशा में मोड़ देती हैं। जिन उद्देश्यों से ये प्रतिष्ठित  संस्थान स्थापित किए गये थे उन उद्देश्यों में पलीता लगाकर देश के ये श्रेष्ठ मस्तिष्क `नौकरशाह’ या `मैनेजर’ बनने चल पड़ते हैं। यह एक नये प्रकार का प्रतिभा पलायन (brain drain) नहीं तो और क्या है?

क्या यह एक कारण नहीं है कि हमारे देश में एक भी मौलिक खोज या अविष्कार नहीं हो पाते जिनसे मानव जीवन को बेहतर बनाया जा सके और पूरी दुनिया उसकी मुरीद हो जाय? यहाँ का कोई वैज्ञानिक नोबेल पुरस्कार के लायक क्यों नहीं बन पाता? हमें राष्ट्र की रक्षा या वैज्ञानिक विकास कार्यों हेतु आवश्यक अत्याधुनिक तकनीकों के लिए परमुखापेक्षी क्यों बने रहना पड़ता हैं? साधारण मशीनरी के लिए भी विदेशों से महंगे सौदे क्यों करने पड़ते हैं? आखिर क्यों हमारे देश की प्रतिभाएं अपने वैज्ञानिक कौशल का प्रयोग यहाँ करने के बजाय अन्य साधारण कार्यों की ओर आकर्षित हो जाती है? क्या यह किसी राष्ट्रीय क्षति से कम है?

इस साल जो सज्जन आई.ए.एस. के टॉपर हैं उन्हें डॉक्टर बनाने के लिए सरकार ने कुछ लाख रुपये जरूर खर्च किए होंगे। लेकिन अब वे रोग ठीक करने का ज्ञान भूल जाएंगे और मसूरी जाकर ‘राज करने’ का काम सीखेंगे। क्या ऐसा नहीं लगता कि चिकित्सा क्षेत्र ने अपने बीच से एक बेहतरीन प्रतिभा को खो दिया?

इसके लिए यदि नौकरशाही को मिले अतिशय अधिकार और उनकी विशिष्ट सामाजिक प्रतिष्ठा को जिम्मेदार माना जा रहा है तो राष्ट्रीय नेतृत्व को यह स्थिति बदलने से किसने रोका है? इस धाँधली(farce) में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में क्या हम सभी शामिल नहीं हैं?

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

बुधवार, 5 मई 2010

वर्धा में अम्बेडकर को याद करने का तरीका अनूठा था…

 

मेरी वर्धा यात्रा की प्रथम, द्वितीय, और तृतीय रिपोर्ट आप यहाँ पढ़ चुके हैं। अब आगे…

विश्वविद्यालय गेस्ट हाउस से जब हम सेवाग्राम आश्रम के लिए निकले तो धूप चढ़ चुकी थी। यद्यपि यह आश्रम घूमने का सबसे अच्छा समय नहीं था, लेकिन हमारे पास कोई दूसरा विकल्प उपलब्ध भी नहीं था। हम वर्धा शहर के बीच से होकर ही गुजरे लेकिन रास्ते में कोई भीड़ भरी ट्रैफ़िक नहीं मिली। निश्चित ही गर्मी का असर सड़कों पर उतर आया था। हमें किसी मोड़, तिराहे या चौराहे पर रुककर सेवाग्राम का रास्ता पूछने के लिए गाड़ी से उतरकर किसी दुकानदार तक जाना पड़ता क्यों कि सड़क पर राहगीर नहीं मिल रहे थे। लेकिन हमें दो स्थानों पर इस कड़ी धूप को धता बताते लोग मिले जो पूरी सज-धज के साथ समूह में इकठ्ठा होकर किसी जश्न की तैयारी में जाते दिखायी दिए।

अम्बेडकर जयन्ती की धूम मैने नजदीक पहुँचकर देखा तो पता चला कि ये लोग बाबा साहब के जन्मदिन की शोभायात्रा निकाल रहे हैं। नीले अबीर का तिलक लगाकर एक दूसरे का अभिवादन करते लोगों में बड़े-बुजुर्ग, मर्द-औरतें, लड़के व लड़कियाँ, सभी मौजूद थे। एक अदम्य उत्साह और उमंग से लबरेज़ ये श्रद्धालु अपने नेता के प्रति सम्मान व्यक्त करने के लिए जिस स्वतः स्फूर्त भाव से इस आयोजन में शामिल हो रहे थे उसे देखकर सहज ही अनुमान किया जा सकता था कि डॉ.भीमराव अम्बेडकर ने किस प्रकार एक बहुत बड़े समाज को अपनी अस्मिता पर गौरव महसूस करने और सिर ऊँचा उठाकर जीने की प्रेरणा दे दी है।

एक पेट्रोल पंप के अहाते में जमा हो रहे समूह को पीछे छोड़कर जब हम सेवाग्राम में बापू के आश्रम के मुख्यद्वार पर पहुँचे तो वहाँ भी एक ऐसा ही जुलूस जश्न के उल्लास में डूबा हुआ मिला। एक खुली हुई गाड़ी पर बाबा साहब अम्बेडकर के आदमकद चित्र को सजाकर झाँकी तैयार की गयी थी जिसके सामने बड़ी संख्या में लड़के और वयस्क पुरुष नाच रहे थे। ढोल-नगाड़े और बैण्ड-बाजे की तेज ध्वनि पर उनके पाँव खुशी-खुशी तारकोल की गर्म सड़क पर भी सहजता से थिरक रहे थे। मैने गेट के किनारे गाड़ी खड़ी की और अपना कैमरा निकाल कर इस शोभा यात्रा की कुछ तस्वीरें लेनी चाही। लेकिन पहले स्नैप के बाद ही कैमरा स्वचालित तरीके से बन्द हो गया। स्क्रीन पर यह संदेश आया कि सीमा से अधिक गर्म हो जाने के कारण कैमरा बन्द हो रहा है। ए.सी. कार के डैश बोर्ड पर शीशे से छन कर आ रही धूप इस सोनी डिजिटल कैमरे की नाजुक कार्यप्रणाली को बन्द करने में सक्षम थी लेकिन अपने नेता के जन्मदिन को यादगार बनाने में जुटे उन लोगों के ऊपर कड़ी धूप का जरा भी असर नहीं दिखा। माथे पर नीली पट्टी बाँधे हुए दर्जनों नौजवान लड़के मोटरसाइकिलों पर फर्राटा भरते किसी बाराती का सा उत्साह लिए समूह में आ जा रहे थे।

जब वह शोभा यात्रा थोड़ी दूर चली गयी तो हम एक और महापुरुष की कर्मस्थली के प्रांगण में चले गये। यह था बापू का सेवाग्राम आश्रम। 

सन्‌ १९३४ मेंबापू यहाँ बैठकर काम करते गांधीजी को उनके प्रिय मित्र और प्रसिद्ध उद्योगपति जमनाबापू का दफ़्तरलाल बजाज ने वर्धा में निवास हेतु आमन्त्रित किया था। वर्धा के करीब शेगाँव (Shegaon) नामक ग्रामीण क्षेत्र में जंगली वनस्पतियों से हरे-भरे इलाके में बापू के रहने के लिए स्थानीय सामग्री के उपयोग से खपरैल की छत वाला जो मकान बना उसे अभी भी ज्यों का त्यों सजोकर रखा गया है।  सबसे पहले हम उसी ‘आदि निवास’ के बरामदे में पहुँचे।  हमने वहाँ उल्लिखित निर्देश के सम्मान में अपने पैर के जूते निकाल दिए। पूरे प्रांगण में पत्थर की छोटी गिट्टियों की परत बिछायी गयी थी जो धूप से गर्म तो हो ही चुकी थी, उनपर नंगे पाँव चलने से इनकी तीखी नोक से चुभन भी खूब हो रही थी। वहाँ कार्यरत एक बुजुर्ग महिला ने बताया कि इस स्थान पर साँप और बिच्छू बहुत निकलते हैं। इन गिट्टियों के बीच उनका चलना कठिन होता है इसलिए सुरक्षा की दृष्टि से यह गिट्टी डाली गयी है। एक्यूप्रेशर चिकित्सा में विश्वास करने वाले इन गिट्टियों पर नंगे पाँव चलना स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद मानते हैं। एक कक्ष में साँप पकड़ने का पिजरा भी रखा हुआ था जिसमें साँपों को पकड़कर दूर जंगल में छोड़ दिया जाता था।

बताते हैं कि बापू के कार्यकाल में निर्मित भवनों जैसे- आदि निवास, बा-कुटी, बापू- कुटी, आखिरी निवास, परचुरे कुटी, महादेव कुटी, किशोर निवास, रुस्तम भवन इत्यादि में से किशोर निवास को छोड़कर किसी भी भवन में पक्की ईंटों व सीमेण्ट का प्रयोग नहीं किया गया था। इस प्रांगण में गांधी जी द्वारा व्यक्तिगत रूप से उपयोग की गयी वस्तुओं को करीने से सजाकर आगन्तुकों के दर्शनार्थ रखा गया है। आश्रम में आकर मेरा कैमरा अबतक ठण्डा हो चुका था इसलिए हमने कुछ यादगार तस्वीरें उतार लीं।

 दवात बापू द्वारा उपयोग की गयी संग्रहित वस्तुएं तीन बन्दर और लकड़ी का करण्डक
बापू का टेलीफोन गांधी जी का सामान

  बापू का चश्मा 

 

बापू कुटी का परिचय देता यह बोर्ड हमारा ध्यान बरबस खींचता है। इसमें सात सामाजिक पातक (social sins) उल्लिखित हैं जो यंग इण्डिया से उद्धरित हैं। समाज को पतन की ओर ले जाने वाले जिन तत्वों की पहचान गांधी जी ने तब की थी वे आज हमारे सामने प्रत्यक्ष उपस्थित हैं और उनका वैसा ही प्रभाव होता भी दिखायी दे रहा है। बापू कुटी का परिचय और सात सामाजिक पातक सिद्धान्तहीन राजनीति, विवेकभ्रष्ट भोग-विलास, बिना श्रम के अर्जित सम्पत्ति, मानवीय मूल्यों से विहीन वैज्ञानिक विकास, अनैतिक बाणिज्य-व्यापार, त्याग और बलिदान से रहित पूजा-पाठ, और चरित्र निर्माण से रहित शिक्षा  जैसे घटक हमारे समाज को आज भी अन्धेरे की ओर ले जा रहे हैं। यदि हमारे देश के नीति नियन्ता राष्ट्रीय स्तर पर इन्हीं विन्दुओं को दृष्टिगत रखकर नीति निर्माण करें और उनके अनुपालन की कार्ययोजना तैयार करें तो बहुत कुछ सुधारा जा सकता है।

प्रांगण में अनेक छायादार और फलदार वृक्ष दिखे जिनका रोपण देश की महान विभूतियों ने किया था और उनकी नाम पट्टिकाएं वृक्षों पर लगी हुई थीं। भारतीय स्वतंत्रता संगाम के अन्तिम दशक में देश का ऐसा कोई भी महत्वपूर्ण व्यक्ति नहीं रहा होगा जो वर्धा के सेवाग्राम आश्रम तक न आया हो। गांधी जी ने अपने जीवन के अन्तिम भाग में अधिकांश समय यहीं बिताया। विभाजन के बाद उपजे साम्प्रदायिक दंगो से लड़ने के लिए बंगाल के नोआखाली के लिए प्रस्थान करने के बाद गांधी जी यहाँ नहीं लौट सके।

इस प्रांगण से बाहर आकर हमने खादी की दुकान से कुछ खरीदारी की। भूख और प्यास ने जब हमें नोटिस थमायी तो हमें बगल के प्राकृतिक आहार केन्द्र की ओर जाना पड़ा। इस रेस्तराँ को देखकर हम झूम उठे। डाइनिंग टेबल के स्थान पर यहाँ चौकोर चौकियाँ रखी हुई थीं जिनके बीच में तिपाये पर ठण्डे पानी से भरे मिट्टी के घड़े रखे हुए थे।प्राकृतिक आहार केन्द्र, सेवाग्राम हमने वहाँ किसी फूल के अर्क से तैयार किया हुआ ठंडा स्वादिष्ट शरबत लिया, कुछ तस्वीरें ली और अपनी गाड़ी की ओर बढ़ चले। गेस्ट हाउस की कैण्टीन में बना भोजन हमारा इन्तजार कर रहा था।

शाम को गेस्ट हाउस के चबूतरे पर आयोजित एक अद्भुत कार्यक्रम में शामिल होने का अवसर मिला। अम्बेडकर जयन्ती के अवसर पर विश्वविद्यालय के संस्कृति विभाग ने इस विशेष कार्यक्रम का  आयोजन किया था। विभाग के विशेष कार्याधिकारी (OSD) राकेश जी ने कार्यक्रम के प्रथम चरण में डॉ. अम्बेडकर की राजनैतिक आर्थिक दृष्टि और आज का समय विषय पर बोलने के लिए नागपुर से आमन्त्रित प्रोफ़ेसर श्रीनिवास खान्देवाले का परिचय दिया। अर्थशास्त्र के प्रतिष्ठित विद्वान प्रोफ़ेसर खान्देवाले ने करीब एक घण्टे के अपने भाषण में डॉ. भीमराव अम्बेडकर के जिस व्यक्तित्व से परिचित कराया उसे इतनी गहराई से हम पहले नहीं जान पाये थे। भारतीय संविधान के निर्माता और दलित समुदाय के मसीहा के रूप में अम्बेडकर की जो छवि हमारे मन में थी उसके दो रूप थे। एक रूप वह था जिसमें वे राजनैतिक रूप से जागरूक हो रहे एक खास सामाजिक जाति वर्ग के प्रेरणापुंज और उपास्य देवता थे जिनकी अन्धभक्ति में डूबे हुए लोग अपने समर्थक समूह से इतर प्रत्येक व्यक्ति को मनुवादी कहकर गाली देने का काम करते रहे हैं।

उनकी छवि का दूसरा रूप वह था जो अरुण शौरी जैसे लेखकों द्वारा ‘फर्जी भगवान’ के रूप में गढ़ा गया था- जिसके प्रति विद्वेष से भरे हुए लोगों द्वारा चौराहे पर लगी उनकी मूर्तियों को तोड़ने, अपमानित करने और एक जाति विशेष के लोगों के लिए अपशब्द प्रयोग करने और उत्पीड़ित करने का जघन्य कार्य किया जाता रहा है।  कदाचित्‌ डॉ. अम्बेडकर को एक खास राजनैतिक उद्देश्य से इस्तेमाल करने की होड़ में लगी पार्टियों ने इस प्रकार की परस्पर विरोधी छवियों का निर्माण कर रखा है। प्रो. खान्देवाले ने अपने वक्तव्य में अम्बेडकर की एक मध्यमार्गी छवि पेश की। उनका कहना था कि अम्बेडकर की दृष्टि सच्चे समाजवाद से ओतप्रोत थी। वे शान्तिपूर्ण ढंग से सामाजिक परिवर्तन लाने के हिमायती थे। उनकी राजनैतिक दृष्टि तो उनके द्वारा तैयार किये गये हमारे संविधान में परिलक्षित होती ही है, साथ में उनकी आर्थिक दृष्टि को भी संविधान के सूक्ष्म अध्ययन से समझा जा सकता है।रजिस्ट्रार, प्रतिकुलपति और कुलपति के साथ प्रो. श्रीनिवास खान्देवाले (सबसे दाएं)

समाज में फैली घोर आर्थिक विषमता को दूर करने के लिए सम्पत्ति का प्रवाह ऊपर से नीचे की ओर होना आवश्यक है लेकिन हो रहा है इसका उल्टा। गरीब मजदूर और किसान अपनी विकट परिस्थिति से हारकर आत्महत्या कर रहे हैं और पूँजीपति वर्ग लगातार अपनी सम्पत्ति बढ़ाता जा रहा है। आई.पी.एल. के अर्थशास्त्र का उदाहरण देकर उन्होंने बताया कि जबतक समाज के पिछ्ड़े तबके को आर्थिक उन्नति के उचित और न्यायपूर्ण अवसर नहीं प्राप्त होंगे तबतक सामाजिक समरसता नहीं पायी जा सकेगी। यही उचित अवसर दिलाने की लड़ाई शान्तिपूर्ण तरीके से लड़ने की राह डॉ.अम्बेडकर ने दिखायी। पारस्परिक विद्वेष को भुलाकर इस लड़ाई में समाज के सभी तबकों से बराबर का सहयोग करने का आह्वान भी प्रो. खान्देवाले ने वहाँ उपस्थित छात्रों, अध्यापकों और वि.वि. के पदाधिकारियों से किया।

कार्यक्रम के अगले चरण में लखनऊ से आयी संगीत मण्डली रवि नागर एण्ड ग्रुप ने कुछ बेहतरीन कविताओं का मोहक संगीतमय पाठ किया। इसमें सबसे पहले डॉ.दिनेश कुमार शुक्ल के कुछ दोहे गाकर सुनाये गये-

भाषा के सोपान से, शब्द लुढकते देख।

पढ़ा लिखा सब पोंछकर, लिखो नया आलेख॥

जीवन को अर्था रहा, गूंगा बहरा मौन।

किसने देखा राम को, रमता जोगी कौन॥

सीली-सीली है हवा, ठण्डी-ठण्डी छाँव।

सन्निपात का ज्वर बढ़ा, झुलस रहा है गाँव॥

यहाँ न सूर्योदय हुआ, यहाँ न फैली धूप।

कालरात्रि फैली रही, जैसे अन्धा कूप॥

काले भूरे खुरदुरे, ले अकाल के रंग।

गगन पटल पर लिख रहा, औघड़ एक अभंग॥

जंगलों में रहने वाले आदिवासी समुदाय के जीवन पर आधारित निर्मला पुतुल की कविता ‘तुम्हारे हाथों बने पत्तल पर भरते हैं पेट हजारो, पर हजारों पत्तल भर नहीं पाते पेट तुम्हारा’  के भावुक प्रस्तुतिकरण ने वातावरण बहुत मार्मिक बना दिया। इसके बाद अदम गोंडवी की प्रसिद्ध रचना चमारों की गली का गायन हुआ। आइए महसूस करिए जिन्दगी के ताप को। मैं चमारों की गली तक ले चलूंगा आपको॥

इस एक घंटे की संगीतमय प्रस्तुति ने दलित शोषित समाज की जिस कष्टप्रद और शोचनीय परिस्थिति की जिन्दा तस्वीर पेश की उसको और गहनता से महसूस कराया कार्यक्रम के अगले चरण में प्रस्तुत नुक्कड़ नाटक ‘सात हजार छः सौ छियासी’ ने।

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प्रोबीर गुहा निर्देशित नुक्कड़ नाटक७६८६

विश्वविद्यालय के फिल्म व थिएटर विभाग के विद्यार्थी कलाकारों द्वारा इसे कोलकाता के नाट्य समूह ‘अल्टरनेटिव लिविंग थिएटर’ के प्रोबीर गुहा के नाट्य निर्देशन में प्रस्तुत किया गया। श्री गुहा वि.वि. के गेस्ट फैकल्टी हैं जो कुछ दिनों के लिए यहाँ आये हुए थे। महाराष्ट्र में कपास किसानों द्वारा बड़ी संख्या में की जा रही आत्महत्या के पीछे जो सामाजिक-आर्थिक कारण हैं उन्हें समझाने का यह बहुत ही प्रभावशाली प्रयास था।  भयंकर गरीबी के बीच नैसर्गिक जिजीविषा से प्रेरित किसान अपनी जमीन पर कपास उगाने में खाद, बीज और कीटनाशक के लिए आने वाली तमाम कठिनाइयों से लड़ता हुआ, पूँजीपतियों, ऋणदाता बैंको, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों, भ्रष्ट नौकरशाहों, विपरीत मौसम और पर्यावरण की तमाम समस्यायों से जूझता हुआ जब अपना तैयार माल बाजार में बेंचने ले जाता है तो वहाँ लालची दलालों के हाथों पड़कर अपना सर्वस्व लुटा देता है। ऐसे में जब यह रिपोर्ट आती है कि विदर्भ क्षेत्र में ७६८६ किसानों ने आत्महत्या कर ली तो मात्र कुछ दिनों के लिए हाहाकार मचता है। उसके बाद स्थिति जस की तस हो जाती है।

चौदह अप्रैल की वह शाम मेरे लिए अभूतपूर्व अनुभवों वाली साबित हुई। एक के बाद एक उम्दा कार्यक्रमों को देखने-सुनने का मौका पाकर मुझे वहाँ कुछ और दिन रुकने का मन हो चला लेकिन ये मुई सरकारी नौकरी इतने भर की छुट्टी भी बड़ी मुश्किल से देती है। हम अगले दिन विश्वविद्यालय के नवनिर्मित प्रशासनिक भवन, पुस्तकालय व विभिन्न विद्यापीठ देखने टीले के ऊपर गये। DSC02667 वित्त अधिकारी मो.शीस खान से मिलने के बाद हम अन्त में कुलपति जी के कार्यालय में गये। आधुनिक सुविधाओं और संचार साधनों  से लैस कार्यालय में कुर्ता पाजाम पहनकर श्री विभूति नारायण राय एक साथ दक्षता, सादगी और कर्मठता का परिचय दे रहे थे। इस शुष्क टीले को हरा-भरा करके उसपर स्थापित अनेक उत्कृष्ट विद्यापीठों में पठन-पाठन व शोध सम्बन्धी गतिविधियों को गति प्रदान करने का जो कार्य आपने शुरू किया है वह किसी भगीरथ प्रयत्न से कम नहीं है।

हमने उनकी मेज पर रखे कम्प्यूटर से अपने रेल टिकट का पी.एन.आर. स्टेटस जाँचा और टिकट कन्फ़र्म होने की खुशी का भाव लिए  उनसे विदा लेकर विनोद जी के साथ सेवाग्राम स्टेशन के लिए चल पड़े।

(समाप्त)

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

 

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सोमवार, 26 अप्रैल 2010

वर्धा में हमने जो देखा वह अद्‌भुत है…

 

सेवाग्राम स्टेशन का निकास द्वाररेलगाड़ी के ठण्डे कूपे से निकलकर बैशाख की चिलचिलाती धूप में जब हम सेवाग्राम स्टेशन पर उतरे तो पल भर में माथे पर पसीना आ गया। पत्थरों और कंक्रीट की इमारतों के बीच हरियाली बहुत विरल थी। तराई क्षेत्र का रहने वाला हूँ इसलिए यह इलाका कुछ ज्यादा ही उजाड़ और वीरान लग रहा था। गर्मी के कारण लोग खुले स्थानों पर प्रायः नहीं थे। स्टेशन से बाहर आकर हमें प्रतीक्षा करती गाड़ी मिल गयी जो काफी देर से धूप में खड़ी रहने के कारण भट्ठी जैसी गरम हो चुकी थी। स्टार्ट होने के बाद इसका ए.सी. चालू हुआ तो एक-दो मिनट में राहत मिल गयी।

सेवाग्राम से वर्धा विश्वविद्यालय की दूरी करीब छः किलोमीटर है। रास्ते में इक्का-दुक्का लोग ही दिखे। हमारे इलाहाबाद की तरह सड़क किनारे लगे लाई-चना-चुरमुरा के खोमचे, खीरा-ककड़ी बेचती औरतें, कच्चे आम का पना बेंचते ठेलेवाले या तरबूज-खरबूज के ढेर लगाकर बैठे कुजड़े वहाँ नहीं दिखे। वर्धा शहर को बायपास करती सड़क से होकर जब हम प्रायः निर्जन इलाके की ओर बढ़ चले तो मेरे मन में उत्सुकता का स्थान व्याकुलता ने ले लिया। गर्म हवा की लपटें सड़क पर दूर चमकते तारकोल से यूँ उठती दिख रही थीं जैसे नीचे किसी हवन कुण्ड में आग जल रही हो। आखिरी मोड़ पर जब गाड़ी मुड़ी तो एक ऊँचे से टीले की ढलान पर सफेद पेण्ट से “महात्मा गांधी अन्तर राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय-वर्धा” बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा हुआ दिखायी पड़ा। अपनी मंजिल के प्रथम साक्षात्कार का यह दृश्य अद्‍भुत लगा।

लेकिन यह शुष्क टीला अपनी तरह का अकेला नहीं था। आस-पास चार-पाँच टीले ऐसे ही दिखायी पड़े जो कदाचित्‌ प्रकृति के कृपापात्र नहीं हो पाये थे। प्रायः वनस्पति विहीन और पथरीले भूभाग पर उठे हुए ये नंगे-ठिगने पहाड़ प्रकृति पर मानव की सत्ता स्थापित होने की कहानी कह रहे थे। इनके शीर्षतल पर जाने के लिए चट्टानों को काटकर बनायी गयी सर्पिल सड़क के किनारे करीने से सजाये गये गमले, शिक्षा संकाय के लिए हाल ही में बने भव्य विद्यापीठ, पुस्तकालय व अन्य मानवनिर्मित भवनों को अन्तिम रूप देती मशीनें और मजदूर, बिजली के खम्भे और उनपर दौड़ती केबिल में प्रवाहित होती विद्युत धारा, निर्माणाधीन पानी की टंकी, पंक्तिबद्ध रोपे गये नये पौधे और उन्हें पानी देने के लिए मीलों दूर से लायी हुई पाइपलाइन  यह बता रही थी कि इस निर्जन पहाड़ पर मानव ने मेधा को तराशने का कारखाना बनाने का मन बना लिया है।


View Larger Map गूगल अर्थ की उपग्रह तस्वीर में पंचटीला(वर्धा) की पाँच साल पुरानी स्थिति जो अब बहुत बदल गयी है

भव्य तोरणद्वार से प्रवेश कर हमारी गाड़ी फादर कामिल बुल्के अन्तरराष्ट्रीय छात्रावास की सीढ़ियों के पास जाकर रुकी तो बाहर निकलने पर गर्म पत्थर से आँच निकलती सी महसूस हुई। सीढ़ियाँ चढ़कर हम ऊँचे चबूतरे पर पहुँचे। आधुनिक वास्तुकला का सुन्दर नमूना पेश करता हुआ यह भवन भी हाल ही में तैयार हुआ जान पड़ा क्योंकि गूगल अर्थ पर मैने इस प्रांगण को देखने की जो कोशिश की थी उसमें इसका कोई अता-पता नहीं था। इस छात्रावास को फिलहाल गेस्ट हाउस के रूप में भी प्रयोग किया जा रहा है।

दोपहर के दो बजे होंगे जब हम अपने लिए निर्धारित कमरे में पहुँचे। कूलर की ठण्डी हवा मिलते ही हम बिस्तर पर पसर तो गये, लेकिन लम्बी यात्रा के बाद स्नान किए बिना पड़े रहना रास नहीं आया। वहाँ का बाथरूम तो सुसज्जित था लेकिन छत पर रखी टंकी का पानी अपने क्वथनांक के करीब पहुँच चुका था। हमारे पास ‘स्टीम बाथ’ के अतिरिक्त कोई अन्य विकल्प भी नहीं था इसलिए हमने कम से कम पानी खर्च करने का पाठ तत्काल सीखते हुए उसपर अमल भी कर लिया और सज सवँरकर तैयार हो लिए। हमें बताया गया कि मनीषा जी एक-दो घण्टे के भीतर ही वापस आगरा के लिए निकलने वाली हैं। उनसे मिलना तो हमारे प्रमुख उद्देश्यों में से एक था।

हमने उनका फोन मिलाया तो पता चला कि इस इलाके में बी.एस.एन.एल. की सेवाएं बहुत अच्छी नहीं हैं। दूसरे सिरे पर स्थित व्यक्ति के अतिरिक्त दूसरी तमाम आवाजें आ रही थीं लेकिन मनीषा जी अन्त तक यह नहीं बता सकीं कि वे दस-पन्द्रह मिनट में गेस्ट हाउस पहुँचने वाली हैं। खैर, उनकी एक सहयोगी ने बताया कि वो बस आने ही वाली हैं। वन्दना मिश्रा, मनीषा कुलश्रेष्ठ और...मैं

मनीषा जी, यानि मनीषा कुलश्रेष्ठहिन्दीनेस्ट.कॉम की मालकिन और प्रतिष्ठित लेखिका, कवयित्री और सम्पादक। उनकी सहयोगी यानि वन्दना मिश्रा। लखनऊ में रहकर आपने तमाम पुस्तकों का प्रकाशन किया है। प्रसिद्ध लेखक और पत्रकार स्व. अखिलेश मिश्र जी की पुत्री वन्दना जी उस कोर ग्रुप की सदस्य हैं जो विश्वविद्यालय की साहित्यिक वेबसाइट हिन्दीसमय.कॉम की सामग्री के चयन और प्रकाशन के लिए उत्तरदायी है। इस कोर ग्रुप के तीसरे सदस्य अनहद नाद वाले अपने प्रिय ब्लॉगर आदरणीय प्रियंकर जी हैं जो उस समय कोलकाता से इस समिति की बैठक के लिए आये हुए थे। हिन्दी साहित्य के दस लाख पृष्ठ अन्तर्जाल में एक ही पते पर अपलोड करने की महत्वाकांक्षी योजना को कार्यरूप देने के लिए विश्वविद्यालय द्वारा इन विभूतियों को एक साथ सिर जोड़कर कार्य करने हेतु आमन्त्रित किया गया है। इतने कम समय में यह जालस्थल कितनी दूरी तय कर चुका है उसे आप वहाँ जाकर देख सकते हैं।

मनीषा जी अपनी सद्यःप्रकाशित पुस्तक शिग़ाफ लेकर आयी थीं। मैने उन्हें सत्यार्थमित्र की एक प्रति भेंट की। वन्दना जी का एक कविता संग्रह अनामिका प्रकाशन से छपकर शीघ्र ही आने वाला है। मेरे साथ अनामिका प्रकाशन के मालिक विनोद शुक्ला जी ही थे। उन्होंने वन्दना जी और मनीषा जी के साथ फटाफट मेरा फोटो सेशन करा दिया। पुस्तक प्रकाशन के बाजार से लेकर विश्वविद्यालय की अन्तर्जाल सम्बन्धी प्रकाशन योजना पर विस्तृत चर्चा हुई। कुछ देर में ट्रेन का समय नजदीक आया और हम मनीषा जी को विदा करके गेस्ट हाउस की कैण्टीन की ओर चाय लेने चल दिए।

शुद्ध दूध की गाढ़ी चाय बड़े से कप में लबालब भरी हुई आ गयी। वहाँ पहले से ही एक प्रोफ़ेसर साहब बैठकर चाय की चुस्कियाँ ले रहे थे। मुझे उनका चेहरा परिचित सा जान पड़ा। मैने दरियाफ़्त की तो पता चला कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय से सेवा निवृत्त अंग्रेजी के प्रो.सचिन तिवारी जी हैं। हम करीब पन्द्रह साल पहले मिले थे जब वे कैम्पस थियेटर चलाते थे और मैं पत्रकारिता का विद्यार्थी हुआ करता था। कैण्टीन में राजकिशोर जी मिलेइसी बीच एक छोटेकद के श्यामवर्ण वाले भयंकर बुद्धिजीवी टाइप दिखने वाले महाशय का पदार्पण हुआ। उन्होंने बैठने से पहले ही कैन्टीन के वेटर से कहा कि मुझे बिना चीनी की चाय देना और दूनी मात्रा में देना। यानि कप के बजाय बड़ी गिलास में भरकर। मुझे मन ही मन उनकी काया के रंग का रहस्य सूझ पड़ा और सहज ही उभर आयी मेरे चेहरे की मुस्कान पर उनकी नजर भी पड़ गयी। मैने झेंप मिटाते हुए उनका परिचय पूछ लिया।

वे तपाक से बोले- “मुझे राजकिशोर कहते हैं… दिल्ली से आया हूँ। आप कहाँ से…?”

मेरे यह बताने पर कि मैं इलाहाबाद से आया हूँ और वहाँ कोषाधिकारी हूँ, उन्होंने सीधा सवाल दाग दिया- “अच्छा, ये बताइए कि ट्रेजरी में भ्रष्टाचार की स्थिति अब कैसी है?”

यदि मैं शुद्ध सरकारी अधिकारी होता तो शायद इसका जवाब देना थोड़ा कठिन होता लेकिन समाज के दूसरे पढ़े-लिखे वर्ग से भी सम्पर्क में होने के कारण मैने इसका कुछ दार्शनिक सा उत्तर दे दिया। मैने यह भी बताया कि कम्प्यूटर और सूचना प्रौद्यौगिकी के प्रयोग से अब मनुष्य के हाथ का बहुत सा काम मशीनों को दे दिया गया है इसलिए भ्रष्टाचार करने के अवसर ट्रेजरी में कम होते गये हैं। फिर भी जहाँ अवसर उपलब्ध है वहाँ प्रयास जारी है। लेकिन इस मानवसुलभ प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने के प्रयास भी साथ-साथ जारी हैं।

राजकिशोर जी ने इस चर्चा का उपसंहार यह कहते हुए कर दिया कि अब इस मुद्दे को छोड़िए, इसमें कोई दम नहीं बचा है, महंगाई बहुत बढ़ गयी है। मुझे तबतक यह पता चल चुका था कि आज शाम छः बजे गांधी हिल्स पर राजकिशोर जी ‘सभ्यता के भविष्य’ पर अपने विचार व्यक्त करने वाले हैं। गांधीजी की प्रिय बकरीयह सुखद संयोग ही था कि जिनके लेख हम चोखेर बाली और हिन्दी भारत जैसे जालस्थलों पर तथा अनेक पत्र पत्रिकाओं में पढ़ते आ रहे थे उन्हें सजीव सुनने का अवसर मिलने जा रहा था। वार्ता का समय होने तक हम कैण्टीन में ही बात करते रहे और फिर गाड़ी हमें टीले की चोटी पर ले जाने के लिए आ गयी। 

मुख्य टीले पर जाने के लिए जो घुमावदार सड़क बनी हुई है उससे ऊपर पहुँचने पर सड़क की बायीं ओर विकसित किये जा रहे उद्यान में एक बकरी की सुन्दर अनुकृति स्थापित की गयी है। कदाचित्‌ वहाँ गांधी जी के प्रिय पात्रों और उनके उपयोग की वस्तुओं को जुटाने का प्रयास किया गया है। वहीं थोड़ा आगे बढ़ने पर गांधी जी की आदमकद प्रतिमा उनके तीन प्रिय बन्दरों के साथ स्थापित है। हमारे पास उन सबको देखने का समय उस समय नहीं था। हमने सभास्थल पर पहुँचकर विश्वविद्यालय के कुलपति जी से मुलाकात की। कुशल-क्षेम के बाद हम राजकिशोरजी की वार्ता सुनने के लिए गोलाकार सीढ़ीनुमा चबुतरे पर बैठ गये। अर्द्धवृत्ताकार दर्शकदीर्घा के ठीक सामने खड़े लैम्प-पोस्ट के नीचे वार्ताकार का चबूतरा बना था। खुले आकाश के नीचे टीले की चोटी पर बना यह मुक्त गोष्ठी स्थल महानगरीय सभ्यता की शोरगुल भरी भागमभाग जिन्दगी से बिल्कुल अलग एक सुरम्य वातावरण सृजित कर रहा था। इस स्थान पर बैठकर ‘सभ्यता के भविष्य’ के बारे में चिन्तन करते लोग मुझे बहुत भले लगे।

सभ्यता का भविष्ययद्यपि अपनी वार्ता में राजकिशोर जी ने जिस कम्यून पद्धति की ओर लौटने की बात की और वर्तमान उदारवादी लोककल्याणकारी जनतंत्रात्मक राज्य को पूँजीवादी सत्ता करार देते हुए पूरी तरह नकारने योग्य ठहराने का प्रयास किया उससे मैं सहमत नहीं हो सका लेकिन देश के कुछ बड़े बुद्धिजीवियों द्वारा विश्वविद्यालय के छात्रों के बीच बैठकर इस प्रकार की चर्चा करना बहुत सुखद और आशाजनक लगा। उस छोटी सी दर्शक दीर्घा में कुलपति विभूति नारायण राय के साथ दिल्ली से पधारे हिन्दी के प्रतिष्ठित हस्ताक्षर प्रो. अब्दुल बिस्मिल्लाह, हैदराबाद के प्रो. सुवास कुमार, और विश्वविद्यालय संकाय के प्रो.सूरज पालीवाल व अन्य अनेक आचार्यगण मौजूद थे। राजकिशोर जी ने अपने विशद अध्ययन और दुनियाभर के अनुभवों को यहाँ बाँटते हुए बहुत सी बाते बतायीं जो जन संचार और पत्रकारिता के विद्यार्थियों का दृष्टिकोण प्रभावित करने वाली थी। एक छात्र द्वारा पूरी वार्ता की वीडियो रिकॉर्डिंग भी की गयी जो उनके लिए प्रायोगिक प्रशिक्षण के तौर पर अपेक्षित था।सभ्यता का भविष्य बताते राजकिशोर जी

शाम को कुलपति जी ने हमें डिनर साथ लेने के लिए आमन्त्रित किया। वहाँ पर एक बार फिर बौद्धिक चर्चा शुरू हो गयी। साहित्य, समाज, राजनीति, कला,और शेरो शायरी से भरी हुई वह चर्चा रिकॉर्ड करने लायक थी लेकिन मैं उसके लिए पहले से तैयारी नहीं कर सका था। इसी बीच मशहूर शायर और गीतकार शहरयार का फोन कई बार आता रहा और वहाँ उन्हें आज के जमाने का सबसे बड़ा शायर बताया जाता रहा। प्रो. अब्दुल बिस्मिल्लाह से प्रो. सचिन तिवारी ने सलमान रुश्दी की किताब शैतानी आयते (satanic verses) के बारे में कुछ सवाल किए। उनके जवाब पर काफ़ी देर तक बहस होती रही। पूरा ब्यौरा यहाँ देना सम्भव नहीं है, लेकिन उस परिचर्चा में शामिल होकर हमें बहुत आनन्द आया। अन्त में यह कड़ी समाप्त करने से पहले अब्दुल बिस्मिल्लाह जी द्वारा सुनाये और समझाए गये एक शेर की चर्चा करना चाहता हूँ।

वर्धा में सूर्योदय (१४ अप्रैल,२०१०)बुझा जो रौजने जिन्ना तो हमने समझा है

कि तेरी मांग सितारों से भर गयी होगी।

चमक उठे जो सलासिल तो हमने जाना है

कि अब सहर तेरे रुख पर बिखर गयी होगी॥

हमारे अनेक सुधी पाठक इस शेर से परिचित होंगे। यदि कोई अपनी टिप्पणी के माध्यम से इसके शायर का नाम बताते हुए इसका सन्दर्भ-प्रसंग बताना चाहे तो मुझे बहुत खुशी होगी। अगली कड़ी में इसकी चर्चा के बाद मैं बताऊंगा कि अगले दिन अम्बेडकर जयन्ती के अवसर पर मुझे वहाँ क्या कुछ चमत्कृत करने वाले अनुभव हुए। अभी इतना ही… प्रतीक्षा कीजिए अगली कड़ी का।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी) 

रविवार, 24 मई 2009

ब्लॉगिंग कार्यशाला: पाठ-5 (कुछ गुरुमन्त्र : ज्ञानदत्त पाण्डेय)

जब हमने इमरान प्रतापगढ़ी के साथ इस कार्यशाला के आयोजन की योजना बनायी थी तो हमारे प्रयास का सबसे बड़ा सम्बल आदरणीय ज्ञानदत्त पाण्डेय जी का इलाहाबाद में उपस्थित होना था। फिर भी जब हम उनकी सहमति लेने उनके आवास पर पहुँचे तो पाँच मिनट के भीतर जो बात हुई उससे हमारा ‘भव्य आयोजन’ खटाई में पड़ता दिखा। उन्होंने कहा कि मैं तो चाहता हूँ कि केवल चुने हुए पच्चीस लोग ही रहें जिनसे सहज ढंग से बातों का आदान-प्रदान किया जा सके। बड़ी सी भीड़ जुटाकर भाषण दिलाना हो तो मुझे घटाकर ही योजना बनाइए।

इमरान ने मुझसे फुसफुसाकर कहा कि सर इतने तो कार्यकर्ता ही हो जाएंगे। मैंने उन्हें मनाते हुए पचास की संख्या पर राजी कर लिया। इसमें आदरणीया रीता भाभी का पूरा सपोर्ट हमारे पक्ष में रहा।

 गुरुमन्त्र

कार्यक्रम के निर्धारित समय से दो मिनट पहले अपने लैपटॉप के साथ पहुँचकर उन्होंने हमें आश्वस्त कर दिया कि सबकुछ अच्छा ही होने वाला है। सबसे वरिष्ठ होने के कारण स्वाभाविक रूप से उन्हें कार्यक्रम के अध्यक्ष की कुर्सी सम्हालनी पड़ी और इसी के फलस्वरुप उन्हे अपनी बात कहने का अवसर सबसे अन्त में मिला। मजे की बात यह रही कि जब कार्यक्रम अपने उत्स पर था तो निराला सभागार ठसाठस भरा हुआ था, लेकिन जब अन्त में ब्लॉगिंग के गुरुमन्त्र जानने की बारी आयी तो हाल में वही पच्चीस-तीस धैर्यवान श्रोता बैठे हुए थे जितने की इच्छा गुरुदेव ने जाहिर की थी।

समर्पित श्रोता  

पीछे की कुर्सियों से उन्हें आगे बुलाया गया और लैप टॉप के की-बोर्ड पर अंगुलिया फिराते हुए ‘पॉवर प्वाइण्ट’ के माध्यम से उन्होंने अपनी सूत्रवत बातें बतानी शुरू कीं। जो सज्जन डॉ. अरविन्द मिश्रा जी की प्रस्तुति अंग्रेजी में होने पर प्रश्न उठा चुके थे वे इस सुन्दर हिन्दीमय झाँकी को देखने के लिए नहीं रहे।

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व्यर्थ का झंझट तो कतई नहीं...  लाभ का आशय अलग-अलग है

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   अपेक्षा के हिसाब से समय और प्रतिभा का निवेश भी जरूरी है।

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   शुरू करना बहुत आसान है लेकिन नियमित बने रहना मुश्किल 

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टिप्पणी पाने के लिए टिप्पणी देना भी जरूरी... वह भी पढ़कर:)

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एक गुरू जरूर तलाश लें ...समस्या कभी भी आ सकती है।

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निराला सभागार में यह अंश फास्ट-फॉर्वर्ड का शिकार हुआ

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यही तो यू.एस.पी. है एक सफल ब्लॉगर का

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सबको जानने की कोशिश करें, तब सभी आपको जान पाएंगे

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   भविष्य उज्ज्वल है... और क्या... !?

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बहुत बहुत धन्यवाद...:)

और नमस्कार मेरी ओर से भी... आपने इतने धैर्य से इसे पढ़ने, जानने और समझने के लिए समय निकाला...।

ये शब्द थे दृश्यकला विभाग के मुखिया और इलाहाबादी बकबक नामक ब्लॉग के प्रणेता धनन्जय चोपड़ा जी के जिनके जिम्मे कार्यक्रम के अतिथियों, वार्ताकारों, श्रोताओं, पत्रकारों, कार्यकर्ताओं और माइक-मंच-फर्नीचर के व्यस्थापकों को धन्यवाद देने का जिम्मा सौंपा गया था।

ज्ञान जी की हड़बड़ प्रस्तुति के बाद जो प्रश्नोत्तर काल निर्धारित था उसमें एक बड़ा मौलिक सवाल किया गया- “आखिर ब्लॉग बनाएं कैसे?” सभी पैनेलिस्ट इसका आसान तरीका और गूगल की साइट का पता बताने लगे। तभी धनन्जय जी ने माइक सम्हाल लिया और बोले-

“गूगल सर्च में टाइप करो blog, एक खिड़की खुलेगी, एक जगह लिखा मिलेगा create new blog, उसे चटकाओ और जो-जो कहे करते जाओ। ब्लॉग बन गया।”

“हाँ इसके पहले जी-मेल का खाता होना जरूरी है। यदि नहीं है तो गूगल सर्च में gmail टाइप करो। एक खिड़की खुलेगी, एक जगह लिखा मिलेगा create new account , उसे चटकाओ और जो-जो कहे करते जाओ। खाता दो मिनट में बन जाएगा।”

(समाप्त)

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

बुधवार, 20 मई 2009

ब्लॉगिंग कार्यशाला: पाठ-४ डॉ.कविता वाचक्नवी (हिन्दी कम्प्यूटिंग) प्रथम भाग

 

“हिन्दी ब्लॉगिंग की दुनिया” के बारे में जो कार्यशाला इलाहाबाद में हुई उसकी तस्वीरें, विषय-प्रवर्तन, अखबारी चर्चा, अनूप शुक्ल जी की कथा-वार्ता और डॉ. अरविन्द मिश्रा जी की साइंस ब्लॉगिंग सम्बन्धी वार्ता के बारे में आप पिछली कड़ियों में देख और पढ़ चुके है। अब आगे...

आशीर्वाद मुख्य अतिथि का... इमरान ने बड़े आदर पूर्वक यह बताया कि ब्लॉगिंग की चर्चा को एक ब्रेक देना पड़ेगा क्योंकि हमारे मुख्य अतिथि महोदय को किसी जरूरी कार्य से जाना पड़ रहा है। इसलिए उनके हिस्से की औपचारिकता बीच में ही पूरी करनी पड़ेगी। प्रदेश के पुलिस मुख्यालय में अपर पुलिस महानिदेशक के पद की जिम्मेदारियाँ निभाने वाले एस.पी.श्रीवास्तव जी ने इस कार्यक्रम से इतना भावुक जुड़ाव महसूस किया कि उन्होंने अपनी घोर व्यस्तता के बावजूद उपस्थित श्रोताओं को करीब बीस मिनट तक आशीर्वाद दिया।

मुख्य अतिथि जी बताने लगे कि ब्लैक बेरी पर अंग्रेजी में बहुत दिनों से ब्लॉग लिखते रहे हैं।

“आज का यह कार्यक्रम देखकर मुझे यह ज्ञान हुआ है कि हिन्दी में भी ब्लॉगिंग की जा सकती है। मैं आज ही अपना हिदी ब्लॉग बना डालूंगा और नियमित रूप से लिखता रहूंगा।”

स्मृति चिह्नउन्होंने कम्प्यूटर और इन्टरनेट के बारे में अनेक गूढ़ बातें बतायी। मुख्य अतिथि महोदय कविता के क्षेत्र में भी बड़ा दखल रखते हैं, लेकिन समय ने इसकी इजाजत नहीं दी। उन्होंने वार्ता समाप्त करने के बाद सभी अन्य वक्ताओं को स्मृति चिह्न प्रदान किए जिसे इमरान ने बड़ी मेहनत और शौक से तैयार कराया था।

मुख्य अतिथि जी को आदर पूर्वक विदा करने के बाद इमरान ने अगली वार्ताकार डॉ. कविता वाचक्नवी जी को आमन्त्रित किया। वे यह बताना नहीं भूले कि आप स्त्री विमर्श की विशेषज्ञ हैं। आपका इन्टरनेट पर बहुत बड़ा पाठक वर्ग है। "हिन्दी भारत", वागर्थ, पीढियाँ, स्वर - चित्रदीर्घा, ब्लॉगरबस्ती (BLOGGER BUSTI), "बालसभा", हिन्दुस्तानी एकेडेमी
चिट्ठा चर्चा, Beyond The Second Sex (स्त्रीविमर्श), *रामायण- संदर्शन
आदि अनेक ब्लॉग हैं जिनमें आप अकेले या सामूहिक रूप से लेखन का कार्य करती है।

कार्यशाला में यद्यपि ब्लॉगिंग की ही चर्चा की जानी थी और किसी सामाजिक - राजनैतिक मुद्दे पर भटकने की इजाजत नहीं थी लेकिन इमरान उनसे स्त्री विमर्श पर कुछ सुनने का लोभ संवरण नहीं कर सके। उन्हें यह छूट प्रदान कर दिया कि वे अपनी पसन्द से जो बोलना चाहें बोल सकती हैं। लेकिन कविता जी ने कार्यशाला के उद्देश्यों को महत्व देते हुए अन्तर्जाल पर हिन्दी के अनुप्रयोग और हिन्दी टूल्स के बारे में ही चर्चा करना उचित समझा।

कविता वाचक्नवी कविता जी ने अपनी बात की शुरुआत इस ओर ध्यान आकृष्ट करते हुए किया कि भारत में हिन्दी का बहुत बड़ा प्रयोक्ता समाज है। (वैसे तो बाहर भी कम नहीं है।) हिन्दी का प्रसार हो रहा है। लेकिन कम्प्यूटर में अभी हिन्दी के अनुप्रयोगों में बहुत कुछ किया जाना शेष है। यह एक वैज्ञानिक तथ्य है कि देवनागरी लिपि में लिखी हुई संस्कृत भाषा कम्प्यूटर के लिए सबसे उपयुक्त भाषा है। लेकिन अंग्रेजी का प्रयोग अभी भी इण्टरनेट पर इतना छाया हुआ है कि हम अंग्रेजी में काम करने के आदी हो गये हैं। यदि हमारा ब्राउजर अंग्रेजी में काम करता है तो हिन्दी पढ़ने-लिखने के बावजूद हम अंग्रेजी प्रयोक्ता ही कहलाएंगे। इसलिए जरूरी है कि हम अपनी हिन्दी को सर्वथा कम्प्यूटर-समर्थ बनाएं। इस दिशा में अनेक लोगों ने व्यक्तिगत स्तर पर बड़े प्रयास किए हैं। किसी बड़ी संस्था की मदद के बिना भी अनेक उत्साही हिन्दी-सेवियों ने हिन्दी अनुप्रयोगों की विशाल पूँजी इकठ्ठा कर दी है।

कुछ महत्वपूर्ण हिन्दी सुविधाएं निम्नवत्‌ हैं:

१.शब्दकोश (Dictionary):

अब आपको कागज पर छपे शब्दकोश के पन्ने पलटने की आवश्यकता नहीं है। दुनिया की अच्छी से अच्छी डिक्शनरी ऑन लाइन उपलब्ध है। मॉउस की एक क्लिक के साथ ही आप किसी भी शब्द का अर्थ सहज ही जान सकते हैं। अब हिन्दी का वृहत् शब्दकोश समानान्तर कोश के नाम से उपलब्ध है।

२. अनुवाद (Translation):

अब ऐसे सॉफ़्टवेयर उपलब्ध हैं कि आप किसी भी आलेख को दुनिया की किसी भी भाषा का तत्क्षण अनूदित कर सकते हैं। अन्तर्जाल पर विचरण करते हुए यदि आप को मिसाल के तौर पर स्कैन्डिनेवियाई भाषा में कोई रोचक सामग्री प्राप्त होती है तो आप उसे एक माउस की क्लिक से अपनी मनचाही भाषा में बदल सकते हैं। अपना हिन्दी में लिखा लेकर उसका दूसरी भाषाओं में अनुवाद भी करा सकते हैं। हाँलाकि इस क्षेत्र में अभी बहुत कुछ अपेक्षित है। उदाहरणार्थ साहित्यिक रचनाओं का उचित अनुवाद मशीन द्वारा किया जाना सम्भव नहीं लगता है।

३. पारिभाषिक शब्दावली:

कुछ स्वप्रेरित लोगों के परिश्रम से विविध विषयों से सम्बन्धित पारिभाषिक शब्दों का संकलन तैयार हुआ है। इनका उपयोग भाषा के मानकीकरण में बहुत सहायक है।

४. लिप्यान्तरण (transliteration):

इस सुविधा का प्रयोग उन सभी लोगों द्वारा बड़े पैमाने पर किया जा रहा है जिन्हें हिदी टाइपिंग की कोई जानकारी नहीं है। रोमन अक्षरों को की-बोर्ड पर देखकर टाइप करते हुए उनका हिन्दी प्रतिरूप प्राप्त किया जा सकता है। यानि ‘kavita’ टाइप करके ‘कविता’ पाया जा सकता है। यह सुविधा गूगल सहित अन्य अनेक साइट्स पर निःशुल्क ऑन लाइन’ उपलब्ध हैं। barahaIME इसके ‘ऑफ़ लाइन’ संस्करण निःशुल्क उपलब्ध कराती है जो इन्टरनेट से दो मिनट में डाउनलोड करके अपने कम्प्यूटर पर इन्स्टाल किया जा सकता है।

५. यूनीकोड:

इन्टरनेट पर सहज प्रयोग के लिए यूनिकोड फ़ॉण्ट की पद्धति लागू की गयी है। विश्व की सभी भाषाओं के समस्त वर्णों (अक्षरों) के लिए एक युनीक कोड निर्धारित कर दिया गया है तथा सभी कम्प्यूटर निर्माता कम्पनियों के लिए यह अनिवार्य कर दिया गया है कि सभी कम्प्यूटर इस सुविधा से अनिवार्य रुप से लैस हों। देवनागरी लिपि के वर्णों को भी यूनीकोड फ़ॉण्ट में स्थान प्राप्त है। इससे दुनिया में कहीं भी हिन्दी नेट के माध्यम से लिखी और पढ़ी जा सकती है।

६. पारिभाषिक तकनीकी शब्दावली:

आप ज्ञान के जिस भी क्षेत्र में कार्य कर रहे हों उस क्षेत्र से सम्बन्धित मानक शब्दों की सर्वमान्य परिभाषा अत्यन्त आवश्यक होती है। हिन्दी सेवियों ने अन्तर्जाल पर इस विषय पर भी कठोर परिश्रम किया है। और विपुल मात्रा में तकनीकी शब्दकोशों की रचना कर डाली है।

७. कविता कोश:

अमीर खुसरो से लेकर आधुनिक भारत के वर्तमान कवियों तक की करीब ६०००० कविताओं को अन्तर्जाल पर कविता कोश में अपलोड कर दिया गया है। यह पूँजी अभी भी लगातार बढ़ रही है।

...क्रमशः

 कविता जी के श्रोता [कविता जी की वार्ता कुछ लम्बी ही थी। पूरे विषय को एक कड़ी में समेटना मुश्किल हो रहा है। उन्होंने अपनी पाठ्य सामग्री से सम्बन्धित लिंक्स देने को कहा था, जो अभी प्रतीक्षित है। अगली कड़ी में इसे पूरा करने की कोशिश की जाएगी।]

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी