प्रातःकालीन योगासन व प्राणायाम के ऑनलाइन सत्र के बाद साइकिल से सैर का मन हुआ। सहारनपुर का मौसम आजकल शानदार है। ठंड जा चुकी है और गर्मी अभी आयी नहीं है। बागों में वाकई बहार है। पूरा वसंत है। अमराइयों में अब मंजरी से आम के टिकोरे बनने का मंजर है। खेतों में गेहूं की फसल पकने की तैयारी में है। हरा-भरा खेत अब सुनहले रंग में बदलने लगा है। जैसे प्रौढ़ावस्था में सिर के काले बाल सफेदी की यात्रा शुरू करते हैं तो उनका रंग खिचड़ी सा हो जाता है वैसे ही इस समय गेहूं की अधपकी फसल हरे और सुनहले रंग की खिचड़ी सा कलेवर ले चुकी है। सरसो प्रायः पक चुकी है और काटी जाने को तैयार है। गन्ना अभी शैशवावस्था में है। इसकी निराई-गुड़ाई और सिंचाई का कार्य प्रगति पर है। पॉपलर की खेती यहाँ बहुत पॉपुलर है। खेत के खेत इसके सीधे खड़े लंबे-छरहरे पेड़ों से अटे पड़े हैं। प्लाईवुड उद्योग का कच्चा माल होता है पॉपलर। इन्हीं पॉपलर के खेतों में साथ-साथ गेहूं या गन्ना भी काट लिया जा रहा है।
सहारनपुर के देहात में उर्वरा भूमि
की हरियाली देखते ही बनती है। यहां ग्रामीण क्षेत्र में भी अधिकांश सड़कें पक्की
हैं। खेतों के बीच वाले चकरोडों पर भी प्रायः खड़ंजा लगा हुआ है। कच्ची सड़क कम ही
मिलती है। साइकिल से सैर के लिए मैं खेतों के बीच गुजरती कच्ची सड़क या पगडंडी की
तलाश में रहता हूँ। इस बार मैने विश्वविद्यालय परिसर से निकलकर पुंवारका से
सुंदलहेड़ी की राह पकड़ी। सुंदलहेड़ी को पार करके सद्दामाजरा होते हुए घड़कौली की ओर
जाने वाली पक्की सड़क पर पहले भी जा चुका हूँ। इस बाद सुंदलहेड़ी से आगे बढ़ा ही था
कि बायीं ओर खेतों की ओर जाता एक चौड़ा खड़ंजा मार्ग दिखा। मैने साइकिल उस ओर मोड़
ली। खेतों की घनी हरियाली और फसलों की भीनी सुगंध के बीच मैं मस्त चाल से चलने
लगा। यहां ताजा और शुद्ध ऑक्सीजन भरपूर थी।
पुराने खड़ंजे वाली इस सड़क पर
ट्रैक्टर ट्रॉली के आवागमन से दो समानांतर नालियों जैसी रचना बन चुकी थी। खड़ंजा
भी जहाँ तहाँ ऊबड़खाबड़ हो गया था। लेकिन साइकिल के लिए कोई खास दिक्कत नहीं थी।
इसी पर सावधानी से एक दो किलोमीटर तक हिचकोले भरी यात्रा करने के बाद मुझे एक ओर
पतली सड़क निकलती दिखाई दी। मैने फौरन उधर का रुख कर लिया।
इस चकरोड पर समकोण के मोड़ जल्दी
जल्दी आ रहे थे। तीन-चार मोड़ पार करने के बाद मैने देखा एक खेत के किनारे दो लोग
आग सुलगाकर बैठे हुए थे। मुझे आश्चर्य हुआ कि अच्छी-खासी धूप निकल चुकी है, फिर
भी ये लोग आग जला रहे हैं। मैने सोचा शायद कुछ पकाने की तैयारी हो रही होगी। अपनी
साइकिल को यथावत गति देता हुआ मैं आगे बढ़ गया। तिरछी नजरों से इतना देख पाया कि
वहाँ कोई रसोई नहीं बन रही थी। उन दोनों में से एक नुकीली दाढ़ी वाले प्रौढ़
गृहस्थ थे तो दूसरा एक नौजवान था। उन दोनों ने भी मुझे हैरत से देखा था। मुझे
अनुमान हुआ कि उनकी नजरें मेरा दूर तक पीछा करती रहीं। मैं उनकी आंखों से ओझल भी
नहीं हो पाया था कि करीब तीन सौ मीटर आगे जाकर एक खेत के कोने पर वह चकरोड समाप्त
हो गया। उसके आगे कच्ची पगडंडी थी जिसमें पानी भरा हुआ था। मजबूरन मुझे साइकिल
वापस मोड़नी पड़ी। वे दोनों पहले से ही जानते थे कि मैं वापस आऊंगा ही। मेरे उनके
पास आने पर नौजवान ने हास्य मिश्रित उत्साह से पूछा- कहां जाओगे जी?
मेरे पास इसका ठीक ठीक एक शब्द में
उत्तर नहीं था। मैने अपनी स्थिति स्पष्ट की - यूँ ही साइकिल से घूमने निकला था।
माँ शाकुंभरी यूनिवर्सिटी वापस जाने का रास्ता खोज रहा हूँ। इधर से लखनौती जाने
वाली सड़क पर जाना चाहता था। इसके लिए शायद थोड़ा आगे जाकर मुड़ना था। लेकिन मैं
पहले मुड़ गया और आप लोग मिल गए।
मैने गेहूं के हरे डंठल से बने
गट्ठर में सुलगती आग की ओर देखते हुए इशारे में इसका प्रयोजन पूछना चाहा। तभी
नौजवान ने एक पॉलीथिन आगे कर दी। इसमें शहद के छत्ते के छोटे-छोटे टुकड़े भरे हुए
थे। मुझे समझते देर न लगी कि इन लोगों ने मधुमक्खी के छत्ते तोड़कर शहद निकालने का
प्रयास किया है। हरे डंठल में आग सुलगाकर उसके धुएं से मधुमक्खियों को छत्ते से
भगाया गया होगा और फिर उनके आशियाने को तोड़कर शहद निकालने की कोशिश की गई होगी।
शहद का यह छत्ता खेत के कोने पर ट्यूबवेल की कोठरी के भीतर लगा हुआ था।
मुझे किसी अनुभवी की यह बात याद आई
कि शहद निकालने का सही समय कृष्णपक्ष की अमावस्या से पूर्व का होता है।
मधुमक्खियों द्वारा शुक्लपक्ष में शहद का ज्यादा उपभोग कर लिया जाता है क्योंकि
उजाले में उनके चोरी हो जाने की संभावना रहती है। इसी क्रम में मुझे बताया गया था
कि छत्ते में शहद की मात्रा कृष्णपक्ष में अधिक होती है और शुक्लपक्ष में कम। मैने
इस मान्यता की पुष्टि के लिए पूछा- बस इतना ही मिला क्या?
नौजवान ने वहां रखी खाली बाल्टी
दिखाते हुए कहा - मैं तो यह लाया था शहद ले जाने को लेकिन बहुत थोड़ा ही मिला। इस
पन्नी में ही आ गया। फिर उसने पूछा - आप टेस्ट करोगे? उसने
पॉलीथिन से एक टुकड़ा शहद का छत्ता निकाला और ध्यान से देखते हुए आश्वस्त किया कि
इसमें कोई अंडा-बच्चा नहीं है। शुद्ध शहद ही है। इसे चूसकर देखो।
इस शहद भरे टुकड़े को मुँह में
रखकर चूसने का मेरा पहला अनुभव बड़ा ही मीठा रहा। बहुत देर तक मुंह में शुद्ध शहद
का स्वाद बना रहा। बाजार में बिकने वाले डिब्बाबंद शहद से बिल्कुल अलग।
उन लोगों ने पूरा परिचय जानने के बाद मुझे गाँव में चलने की दावत दी लेकिन मुझे तो अब लौटना था। समय से तैयार होकर ऑफिस में पहुंचना भी जरूरी था। मैने उनसे वापसी का रास्ता समझा और आगे बढ़ चला। आगे मुझे वह सीधी-सपाट और कच्ची सड़क मिली जो अल्हेड़ी गांव के बगल से होकर लखनौती जाने वाली पक्की सड़क पर पहुंचाती है। पक्की सड़क पर पहुंचते ही मुझे एक जनसेवा केंद्र जैसा कुछ दिखा जिसका साइनबोर्ड बता रहा था कि यहां से विदेश यात्रा संबंधी दस्तावेज बनवाने की सुविधा/ सेवा उपलब्ध कराई जाती है। कदाचित पासपोर्ट और बीजा बनवाने वाले कुछ लोग वहां जमा भी थे।
पक्की और गड्ढामुक्त सड़क मिली तो मेरी चाल भी तेज हो गई। आगे जो गांव मिला उसका नाम था- दतौली मुग़ल। इसके मुहाने पर आते ही सड़क की चौड़ाई आधी हो गई। थोड़ा और आगे बढ़ा तो बनारस की गलियां याद आने लगीं। थोड़ी ही देर में मुझे साइकिल रोकनी पड़ी क्योंकि आगे का रास्ता बेहद संकरा और किसी के घर में जाता हुआ जान पड़ा। वहीं एक घर से लोहे का गेट खोलकर एक लड़का निकला। बिना पूछे ही उसने मुझे उत्तर दिया - आप गलत आ गए हैं। पीछे लौटिए और उस टंकी के बगल से गांव के बाहर-बाहर होकर जाइए तो लखनौती की सड़क फिर मिल जाएगी।
मैने गांव के बाहरी सिरे पर खड़ी
पानी की विशाल टंकी को लक्ष्य किया और उस संकरी गली से निकलकर चौड़ी सड़क पर आ
गया। टंकी के पास ही बड़ा सा सोलर प्लांट भी लगा हुआ था और बिल्डिंग मटेरियल की
बड़ी सी दुकान भी थी। खच्चर जुती हुई एक बग्घी पर सीमेंट की बोरियां लादी जा रही
थीं। मैने झटपट टंकी के साथ एक सेल्फी ली। रुककर और फोटो खींचने का विचार मैने
त्याग दिया। देर तो हो ही रही थी। इस गांव में अजनबी के रूप में गली - गली भटकते
हुए मुझे कई नजरों ने देखा था। अब गांव की हलचल की फोटो खींचते देखकर कोई कुछ गलत
समझ बैठे इससे पहले ही निकल लेना मुझे उचित लगा। खामखां रेकी करने का इल्ज़ाम
क्यों लगवाता मैं।
हरे-भरे झूमते खेतों और आम के
बागों के बीच दौड़ती सड़क से चलकर अंततः मैं लखनौती गांव के तिराहे पर आ गया।
चायपान और किराना दुकानों की हलचल और ट्रैक्टर-ट्रॉली, मिनी
ट्रक, ऑटोरिक्शा, ई-रिक्शा, बाइक, ठेला, खोमचा आदि की
चिल्ल-पों और धूल धक्कड़ के बीच लौटकर मुझे लगा जैसे अचानक दुनिया ही बदल गई। तभी
मुझे तीन-चार जोरदार छींकें आईं। उनसे पार पाकर नाक पोंछते हुए मैं अपने
विश्वविद्यालय की ओर जाने वाले स्टेट हाईवे पर मुड़ गया।
घर पहुंचने पर दो जोड़ी चिंतातुर
आंखे मेरी प्रतीक्षा करती मिलीं। चलते समय श्रीमती जी ने चेताया था कि तीन-चार
किलोमीटर से ज्यादा मत चलाइएगा। लेकिन लौटने पर मेरी स्मार्ट वॉच ने 13.6 किलोमीटर
का आंकड़ा दर्ज किया था।
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)















