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रविवार, 6 अक्टूबर 2013

वीसी की सीवी : राजकिशोर

राजकिशोर पत्रकारिता के क्षेत्र में अच्छी प्रतिष्ठा रखते हैं। देश के लगभग सभी बड़े अखबारों में उनके आलेख और स्तंभ पाठकों द्वारा रुचिपूर्वक पढ़े जाते हैं। अप्रिय सत्य बोलने में माहिर इस यायावर ने स्वतंत्र लेखन का लंबा सफर तय करने के बाद जब वर्धा विश्वविद्यालय में आवासी लेखक (Writer-in-Residence) का प्रस्ताव स्वीकार किया तो कुछ हलकों में इसे हैरत से देखा गया। जिन्होंने वर्धा विश्वविद्यालय के बारे में कभी  “दरोगा का हरमजैसा जुमला इस्तेमाल किया था वे स्वयं जब उस परिसर में लेखक बनकर गये तो उनकी धारणा में आमूल परिवर्तन हो गया। उन्हें वर्धा परिसर इतना भाया कि एक कार्यकाल पूरा होने के बाद वहीं हिंदीसमय वेबसाइट के संपादक की नौकरी कर ली। यदि उम्र साथ देती तो शायद वे वर्धा से अपनी विदाई अभी भी नहीं होने देते। मूलतः स्वतंत्र प्रकृति के बेखौफ़ टिप्पणीकार राजकिशोर के तेवर का कायापलट कैसे हुआ इसका अनुमान दैनिक जागरण के विमर्श पृष्ठ पर प्रकाशित  उनके हाल के आलेख से मिलता है जो उन्होंने वर्धा विश्वविद्यालय से विदा लेने के बाद लिखा है। अंतर्जाल के पाठकों के लिए इसे अविकल रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ :

वर्धा के महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति विभूतिनारायण राय अगले महीने (अक्तूबर) की २८ तारीख को पदमुक्त हो रहे हैं। उस दिन या उसके दो-चार दिन पहले वहाँ उनका भव्य विदाई समारोह होना निश्चित है। स्वागत और विदाई समारोह झूठी प्रशंसा के प्रचंड ज्वालामुखी होते हैं। इस प्रशंसावली से कुछ व्यक्तियों की छाती फूल जाती है। वह अपने को दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति समझने लगते हैं। विभूति बाबू ऐसे नहीं हैं, वह तुरंत ताड़ जाते हैं कि कोई उनकी प्रशंसा या निंदा क्यों कर रहा है। अपने बारे में ऐसी तटस्थता मैंने कम ही देखी है। मार्क करने की बात यह है कि वे अपनी निन्दा में भी रस लेते हैं, अक्सर मुस्कराते हुए और कभी-कभी हँसते हुए यह बताते हैं कि क या ख उनके बारे में क्या कह रहा था। फिर उसी अन्दाज में बताने लगते हैं कि क या ख ने ऐसा क्यों किया होगा? काश हम सभी में यह खूबी विकसित हो पाती। तब हमारा जीना कितना आसान हो जाता।

किसी भी कुलपति का जीवन आसान नहीं होता। यूं समझिए कि उसे एक छोटी-मोटी सरकार चलानी होती है। जहाँ सरकार होगी वहाँ विपक्ष भी होगा। विश्वविद्यालय की सरकार भी पाँच वर्ष के लिए होती है। फिराक़ गोरखपुरी का एक शेर है-

सुना है जिंदगी है चार दिन की।
बहुत होते हैं यारों चार दिन भी।

बहुत से कुलपतियों के बारे में सुना है कि अपने कुछ लक्ष्य पूरे हो जाने के बाद वे अधेड़ बहादुर शाह ज़फर की तरह वक्त काटने लगते हैं। मुझे विश्वास है कि अपने कार्यकाल के अंतिम दिन भी विभूति बाबू सुबह की सैर पर निकलेंगे, तो जहाँ भी उन्हें कुछ कमी दिखायी देगी जैसे किसी पौधे को पानी नहीं दिया गया है, कहीं गंदगी जमा है, कहीं रास्ते में पत्थर पड़े हुए हैं या किसी साइनबोर्ड में वर्तनी की भूल है तो उसे दूर करने के लिए वह संबंधित व्यक्ति को जरूर चेताएंगे। विभूति बाबू को सफाई और व्यवस्था का एक तरह से एडिक्शन है।

जागरण सेमुझे अपने ऑफिस का पहला दिन कभी नहीं भूलेगा। आम तौर पर कोई भी कुलपति यह देखने नहीं आता कि किसी अधिकारी को जो कक्ष आबंटित किया गया है, उसकी हालत कैसी है। उसे अपने को देखने से ही फुरसत नहीं मिलती। हिंदीसमयडॉटकॉम के संपादक के रूप में जब मुझे अपना कमरा वर्जीनिया वुल्फ का अपना कमरा नहीं मिला, तब स्वयं विभूति बाबू मेरे साथ आये और जांच करने लगे कि कहीं कोई खामी तो नहीं है। छत के एक कोने में जाले लगे हुए थे। उनकी निगाह उधर गयी तो तुरंत उन्होंने सफाई कर्मचारी को बुलवाकर उसे हटवाया। उनका यही दृष्टिकोण विश्वविद्यालय के कण-कण के प्रति रहा है। शायद ही कोई कुलपति अपने विश्वविद्यालय को उतनी बारीकी से जानता होगा जितना विभूति नारायण राय अपने विश्वविद्यालय को जानते हैं। वह जुनूनी आदमी हैं और जुनूनी आदमियों को प्यार करते हैं। भीतर से हर आदमजाद जटिल होता है। विभूति बाबू भी होंगे, लेकिन यह उनकी अपनी दुनिया है। दूसरों को पाला तो उनकी सरलता से ही पड़ता है।

2010 के जून महीने में एक दिन अचानक उनका फोन आया था कि आप आवासी लेखक के रूप में वर्धा आ जाइए। इतनी सरलता से कोई काम मुझे कभी नहीं मिला था और जमाने की रंगतें देखकर दावा कर सकता हूँ कि अब न कभी मिलेगा। बाद में इसी सरलता से उन्होंने मुझे हिंदीसमय के संपादक के लिए चुन लिया। अन्य क‍इयों के लिए उन्होंने ऐसा ही किया है। सबसे बड़ी बात यह है कि वह इसकी कीमत वसूल नहीं करते। अपने सभी शुभचिंतकों को, जिन्हें मैंने देखा भी नहीं पर जो मेरे चरित्र पर हमेशा निगाह रखते हैं, मैं आश्वस्त करना चाहता हूँ कि वर्धा में मैं किसी के हरम में नहीं रहा, न इसके लिए कभी आमंत्रित किया गया। सचमुच किसी के हरम में कोई पाँव रखता है तो अपनी मर्जी से रखता है। पतन के लिए कोई किसी को बाध्य नहीं कर सकता।

वर्धा प्रवास में जिन दिलचस्प व्यक्तियों से मुलाकात हुई, उनमें आलोकधन्वा और रामप्रसाद सक्सेना का स्थान सबसे ऊपर है। दोनों में कुछ प्रवृत्तियाँ कॉमन हैं। दोनो ही से दस मिनट से ज्यादा बात करते रहने के लिए गहरा प्रेम और अपरिमित धैर्य चाहिए। आलोकधन्वा अत्यन्त प्रतिभाशाली कवि रहे हैं। वक्ता भी वह गजब के हैं। सक्सेना जी भाषा विज्ञान की बारीकियों के जानकार हैं। वह स्वगत बोलने के आदी हैं। मजाल है कि उनके सामने कोई जी और हाँ के अलावा कुछ और बोल सके। यह विभूति बाबू की विलक्षणता है कि उन्होंने न केवल कविवर को पौने दो साल तक प्रेमपूर्वक झेला, बल्कि भाषाविज्ञानी को एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी, जिसका ठीक से निर्वाह न होने पर भी उसे सादर सहते रहे, लेकिन दोनो ही मामले में अन्ततः यही साबित हुआ कि सब्र की भी सीमा होती है।

जो जितना सरल होता है, वह उतना ही अधिक उपलब्ध रहता है। जब मैं कलकत्ता विश्वविद्यालय में पढ़ता था, तब मुझे वहाँ के वीसी और प्रो-वीसी को देखने का एक भी अवसर नहीं मिला। हम सभी के लिए वह सिर्फ़ नाम या तख्ती थे। वर्धा विश्वविद्यालय में जो व्यक्ति मिलने के लिए सबसे ज्यादा उपलब्ध था, वह स्वयं वीसी थे। वह अफसर थे और जरूरत पड़ने पर अफसरी भी दिखाते थे, पर उनकी अफसरी में यह शामिल नहीं था कि उनसे मिलने के लिए किसी की सिफारिश लगानी पड़े।

कोई टोक सकता है कि मैं विभूति नारायण राय की तारीफ पर तारीफ क्यों किये जा रहा हूँ, क्या मुझे उनकी कमियाँ दिखायी नहीं देतीं? निवेदन है कि मैं यहां उनकी समीक्षा करने नहीं बैठा हूँ। यह काम चित्रगुप्तों का है। मैं तो वही बातें लिखना चाहता हूँ जो वीसी की सीवी में जोड़ने लायक हैं। हर समाज में ऐसे अनेक व्यक्ति होते हैं जिनकी सीवी का कुछ हिस्सा दूसरों को अवश्य लिखना चाहिए।

-राजकिशोर

राजकिशोर जी से मेरी पहली भेंट (अप्रैल-2010)
कैण्टीन में राजकिशोर जी मिले
सभ्यता का भविष्य बताते राजकिशोर जी

पुनश्च : राजकिशोर जी से मेरी पहली भेंट तब हुई थी जब वे अप्रैल-2010 में वर्धा परिसर में ‘सभ्यता का भविष्य’ विषय पर अपना व्याख्यान देने आये थे और मैं अपनी प्रतिनियुक्ति के प्रस्ताव पर निर्णय लेने से पूर्व विश्वविद्यालय परिसर के साक्षात्‌ दर्शन कर लेने के उद्देश्य से तीन दिन के लिए वर्धा की यात्रा पर गया हुआ था। वहाँ से लौटकर लिखे गये अपने यात्रा वृत्तान्त में मैंने राजकिशोर जी की चर्चा यों की थी-

…इसी बीच एक छोटेकद के श्यामवर्ण वाले भयंकर बुद्धिजीवी टाइप दिखने वाले महाशय का पदार्पण हुआ। उन्होंने बैठने से पहले ही कैन्टीन के वेटर से कहा कि मुझे बिना चीनी की चाय देना और दूनी मात्रा में देना। यानि कप के बजाय बड़ी गिलास में भरकर। मुझे मन ही मन उनकी काया के रंग का रहस्य सूझ पड़ा और सहज ही उभर आयी मेरे चेहरे की मुस्कान पर उनकी नजर भी पड़ गयी। मैने झेंप मिटाते हुए उनका परिचय पूछ लिया।

वे तपाक से बोले- “मुझे राजकिशोर कहते हैं… दिल्ली से आया हूँ। आप कहाँ से…?”

मेरे यह बताने पर कि मैं इलाहाबाद से आया हूँ और वहाँ कोषाधिकारी हूँ, उन्होंने सीधा सवाल दाग दिया- “अच्छा, ये बताइए कि ट्रेजरी में भ्रष्टाचार की स्थिति अब कैसी है?”

पूरा वाकया पढ़ने के लिए यहाँ चटका लगाइए।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)