हमारी कोशिश है एक ऐसी दुनिया में रचने बसने की जहाँ सत्य सबका साझा हो; और सभी इसकी अभिव्यक्ति में मित्रवत होकर सकारात्मक संसार की रचना करें।
यादें लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
यादें लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 16 फ़रवरी 2022

अनामिका प्रकाशन की पुस्तकें मिलीं

प्रयागराज में 15 साल पहले जब हम कोषाधिकारी की नौकरी करने गए और अपने पठन-पाठन के शहर में जाते ही जब हमें ब्लॉगरी का चस्का लगा तो उसी सिलसिले में अनेक प्रतिष्ठित ब्लॉगर्स से संपर्क हुआ। ज्ञानदत्त पांडे, अनूप शुक्ल, डॉ कविता वाचक्नवी, डॉ अरविंद मिश्र और हर्षवर्धन त्रिपाठी जैसे शीर्षस्थ ब्लॉगर्स ने मेरे घर तक आकर मुझे धन्य किया। आदरणीया कविता जी को लेकर प्रकाश त्रिपाठी आए थे जो शहर के प्रतिष्ठित अनामिका प्रकाशन से जुड़े थे। फिर इस प्रकाशन के कर्णधार विनोद कुमार शुक्ल जी से मुलाकात हुई जिनसे बाद में पारिवारिक मित्रता हो गयी। विनोद जी अनेक नामी व स्थापित साहित्यकारों की कृतियां तो छापते ही हैं उनके द्वारा नवोदित लेखकों, कवियों, शोधार्थियों और शौकिया रचनाकारों को भी प्रकाशित किया जाता रहा है। कालांतर में प्रयागराज से स्थानांतरण के बाद भी विनोद जी से हमारा संपर्क निरंतर बना रहा है।

अभी जब प्रयागराज में मेरी दुबारा तैनाती हुई तो एक दिन मैं बेधड़क विनोद जी के घर चाय पीने पहुंच गया। वे बेहद आत्मीयता से मिले। फिर मेरी उत्सुकता को शांत करने के लिए वे एक के बाद एक प्रकाशित नायाब पुस्तकें दिखाते रहे। विषय का वैविध्य और पुस्तकों के आकार-प्रकार व डिज़ाइन के आकर्षण में मैं खोता गया। पुस्तक प्रकाशन के क्षेत्र में पिछले दस वर्षों में हुई उनकी प्रगति देखकर मेरा मन अत्यंत प्रसन्न हो गया। इस अद्भुत उत्थान को देखकर मैंने आश्चर्यवश पूछा - आप ने अकेले यह कैसे कर लिया? कॅरोना लॉक-डाउन की लंबी बाधा के बावजूद? उसपर अब तो प्रकाश जी भी वर्धा चले गए हैं?

विनोद जी ने बताया कि प्रकाशन व्यवसाय की कमान अब उनकी अगली पीढ़ी के मानस ने संभाल ली हैं। वही मानस जिसे हमने पहले एक नटखट छोटे बच्चे के रूप में ढेर सारी रोचक बातें करते हुए आनंद से देखा था। नोएडा के एक प्रतिष्ठित संस्थान से एमबीए करने के बाद मानस ने अब अपने पिताजी के इस भावनात्मक व शौकिया उपक्रम को प्रोफेशनल तरीके से विकसित किया है। अत्याधुनिक सूचना प्रौद्योगिकी, ऑनलाइन कम्प्यूटर तकनीकी व विशेषज्ञ नियोजन के माध्यम से अनामिका प्रकाशन का कायाकल्प अब मानस प्राइवेट लि. कम्पनी के रूप में हो चुका है। विनोद जी कदाचित अब पुस्तकों के संपादक की भूमिका में आ गए है। पुस्तकों की साज-सज्जा व मुद्रण का कार्य दिल्ली में अधुनातन पद्धति से और अधिकांश बिक्री अमेजन जैसे ऑनलाइन माध्यमों से होने के कारण व्यावसायिक दक्षता भी बेहतरीन हो गयी है। किताबें धड़ाधड़ छप व बिक रही हैं।

जब मेज पर सद्यःप्रकाशित व प्रकाशन को तैयार ढेर सारी पुस्तकों का अंबार लग गया तो मैंने बड़े संकोच के साथ उनमें से तीन दुबली- पतली क़िताबों को अपने लिए अलग किया। इससे अधिक इसलिए भी नहीं कि पहले ही घर में अनेक अनपढ़ी किताबें अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रही हैं। नौकरी की व्यस्तता से अलग टीवी की चुनावी चकल्लस, व्हाट्सएप ज्ञान-भंडार के अविरल प्रवाह और ओटीटी की वृहद सामग्री ने इन पुस्तकों के लिए समय की किल्लत पैदा कर दी है।

बहरहाल, विनोद जी ने इन तीनो पुस्तकों को मुझे सहर्ष भेंट किया। मानस ने हमें बढ़िया अदरक वाली चाय पिलायी और हमने इस नौजवान व होनहार उद्यमी की सफलता पर बधाई दी और भविष्य में खूब प्रगति के लिए शुभकामनाएं दीं।

IMG_20220214_202330__01 IMG_20220214_202258__01 IMG_20220214_202147__01
तथ्यों के आलोक में डॉ अंबेडकर - शूद्र कौन थे, अवलोकन और समीक्षा।
लेखक - डॉ त्रिभुवन सिंह
मूल्य- रू. 300 मात्र
पंडित दीन दयाल उपाध्याय, द्रष्टा दृष्टि और दर्शन।
लेखक - हृदय नारायण दीक्षित
मूल्य- रू. 350 मात्र
कबीर हैं कि मरते नहीं।
लेखक - सुभाष चंद्र कुशवाहा
मूल्य- रू. 150 मात्र
Anamika Prakashan IMG_20220214_224150__01__01 IMG_20220214_223935__01__01

डॉ त्रिभुवन सिंह ने अपनी पुस्तक में अंबेडकर की बहु-प्रचारित पुस्तक में स्थापित मान्यताओं की शोधपरक पड़ताल करते हुए अनेक सार्थक प्रश्न उठाए हैं और इस विषय पर नए सिरे से सोचने को मजबूर किया है। हृदय नारायण दीक्षित की पुस्तक में दीनदयाल उपाध्याय के व्यक्तित्व व कृतित्व पर कुछ नई बात बताई गयी है। सुभाष चंद्र कुशवाहा ने अपनी शोधपरक पुस्तक में कबीर के जीवन व उनके सामाजिक प्रभाव को नितांत विपरीत परिस्थितियों व विरोध के बावजूद दुर्दमनीय बताते हुए उसके युग-प्रवर्तक महत्व को रेखांकित किया है।

इन तीन पुस्तकों के शीर्षक व इनकी विषय-वस्तु से यह सहज ही विश्वास हो जाता है कि इंटरनेट व इलेक्ट्रॉनिक गजेट्स के इस जमाने में भी कागज पर छपी पुस्तकों का महत्व अभी भी कम नहीं हुआ है। छात्र-छात्राओं, अध्येताओं, मनीषियों व सामान्य पाठकों की रुचि का पेट भरने के लिए और तमाम लेखकों, कवियों, साहित्यकारों व नवोदित कलमकारों की बौद्धिक कृतियों को उनके अभीष्ट तक पहुंचाने के लिए अभी भी पुस्तकें अपरिहार्य हैं।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

रविवार, 6 अक्टूबर 2013

वीसी की सीवी : राजकिशोर

राजकिशोर पत्रकारिता के क्षेत्र में अच्छी प्रतिष्ठा रखते हैं। देश के लगभग सभी बड़े अखबारों में उनके आलेख और स्तंभ पाठकों द्वारा रुचिपूर्वक पढ़े जाते हैं। अप्रिय सत्य बोलने में माहिर इस यायावर ने स्वतंत्र लेखन का लंबा सफर तय करने के बाद जब वर्धा विश्वविद्यालय में आवासी लेखक (Writer-in-Residence) का प्रस्ताव स्वीकार किया तो कुछ हलकों में इसे हैरत से देखा गया। जिन्होंने वर्धा विश्वविद्यालय के बारे में कभी  “दरोगा का हरमजैसा जुमला इस्तेमाल किया था वे स्वयं जब उस परिसर में लेखक बनकर गये तो उनकी धारणा में आमूल परिवर्तन हो गया। उन्हें वर्धा परिसर इतना भाया कि एक कार्यकाल पूरा होने के बाद वहीं हिंदीसमय वेबसाइट के संपादक की नौकरी कर ली। यदि उम्र साथ देती तो शायद वे वर्धा से अपनी विदाई अभी भी नहीं होने देते। मूलतः स्वतंत्र प्रकृति के बेखौफ़ टिप्पणीकार राजकिशोर के तेवर का कायापलट कैसे हुआ इसका अनुमान दैनिक जागरण के विमर्श पृष्ठ पर प्रकाशित  उनके हाल के आलेख से मिलता है जो उन्होंने वर्धा विश्वविद्यालय से विदा लेने के बाद लिखा है। अंतर्जाल के पाठकों के लिए इसे अविकल रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ :

वर्धा के महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति विभूतिनारायण राय अगले महीने (अक्तूबर) की २८ तारीख को पदमुक्त हो रहे हैं। उस दिन या उसके दो-चार दिन पहले वहाँ उनका भव्य विदाई समारोह होना निश्चित है। स्वागत और विदाई समारोह झूठी प्रशंसा के प्रचंड ज्वालामुखी होते हैं। इस प्रशंसावली से कुछ व्यक्तियों की छाती फूल जाती है। वह अपने को दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति समझने लगते हैं। विभूति बाबू ऐसे नहीं हैं, वह तुरंत ताड़ जाते हैं कि कोई उनकी प्रशंसा या निंदा क्यों कर रहा है। अपने बारे में ऐसी तटस्थता मैंने कम ही देखी है। मार्क करने की बात यह है कि वे अपनी निन्दा में भी रस लेते हैं, अक्सर मुस्कराते हुए और कभी-कभी हँसते हुए यह बताते हैं कि क या ख उनके बारे में क्या कह रहा था। फिर उसी अन्दाज में बताने लगते हैं कि क या ख ने ऐसा क्यों किया होगा? काश हम सभी में यह खूबी विकसित हो पाती। तब हमारा जीना कितना आसान हो जाता।

किसी भी कुलपति का जीवन आसान नहीं होता। यूं समझिए कि उसे एक छोटी-मोटी सरकार चलानी होती है। जहाँ सरकार होगी वहाँ विपक्ष भी होगा। विश्वविद्यालय की सरकार भी पाँच वर्ष के लिए होती है। फिराक़ गोरखपुरी का एक शेर है-

सुना है जिंदगी है चार दिन की।
बहुत होते हैं यारों चार दिन भी।

बहुत से कुलपतियों के बारे में सुना है कि अपने कुछ लक्ष्य पूरे हो जाने के बाद वे अधेड़ बहादुर शाह ज़फर की तरह वक्त काटने लगते हैं। मुझे विश्वास है कि अपने कार्यकाल के अंतिम दिन भी विभूति बाबू सुबह की सैर पर निकलेंगे, तो जहाँ भी उन्हें कुछ कमी दिखायी देगी जैसे किसी पौधे को पानी नहीं दिया गया है, कहीं गंदगी जमा है, कहीं रास्ते में पत्थर पड़े हुए हैं या किसी साइनबोर्ड में वर्तनी की भूल है तो उसे दूर करने के लिए वह संबंधित व्यक्ति को जरूर चेताएंगे। विभूति बाबू को सफाई और व्यवस्था का एक तरह से एडिक्शन है।

जागरण सेमुझे अपने ऑफिस का पहला दिन कभी नहीं भूलेगा। आम तौर पर कोई भी कुलपति यह देखने नहीं आता कि किसी अधिकारी को जो कक्ष आबंटित किया गया है, उसकी हालत कैसी है। उसे अपने को देखने से ही फुरसत नहीं मिलती। हिंदीसमयडॉटकॉम के संपादक के रूप में जब मुझे अपना कमरा वर्जीनिया वुल्फ का अपना कमरा नहीं मिला, तब स्वयं विभूति बाबू मेरे साथ आये और जांच करने लगे कि कहीं कोई खामी तो नहीं है। छत के एक कोने में जाले लगे हुए थे। उनकी निगाह उधर गयी तो तुरंत उन्होंने सफाई कर्मचारी को बुलवाकर उसे हटवाया। उनका यही दृष्टिकोण विश्वविद्यालय के कण-कण के प्रति रहा है। शायद ही कोई कुलपति अपने विश्वविद्यालय को उतनी बारीकी से जानता होगा जितना विभूति नारायण राय अपने विश्वविद्यालय को जानते हैं। वह जुनूनी आदमी हैं और जुनूनी आदमियों को प्यार करते हैं। भीतर से हर आदमजाद जटिल होता है। विभूति बाबू भी होंगे, लेकिन यह उनकी अपनी दुनिया है। दूसरों को पाला तो उनकी सरलता से ही पड़ता है।

2010 के जून महीने में एक दिन अचानक उनका फोन आया था कि आप आवासी लेखक के रूप में वर्धा आ जाइए। इतनी सरलता से कोई काम मुझे कभी नहीं मिला था और जमाने की रंगतें देखकर दावा कर सकता हूँ कि अब न कभी मिलेगा। बाद में इसी सरलता से उन्होंने मुझे हिंदीसमय के संपादक के लिए चुन लिया। अन्य क‍इयों के लिए उन्होंने ऐसा ही किया है। सबसे बड़ी बात यह है कि वह इसकी कीमत वसूल नहीं करते। अपने सभी शुभचिंतकों को, जिन्हें मैंने देखा भी नहीं पर जो मेरे चरित्र पर हमेशा निगाह रखते हैं, मैं आश्वस्त करना चाहता हूँ कि वर्धा में मैं किसी के हरम में नहीं रहा, न इसके लिए कभी आमंत्रित किया गया। सचमुच किसी के हरम में कोई पाँव रखता है तो अपनी मर्जी से रखता है। पतन के लिए कोई किसी को बाध्य नहीं कर सकता।

वर्धा प्रवास में जिन दिलचस्प व्यक्तियों से मुलाकात हुई, उनमें आलोकधन्वा और रामप्रसाद सक्सेना का स्थान सबसे ऊपर है। दोनों में कुछ प्रवृत्तियाँ कॉमन हैं। दोनो ही से दस मिनट से ज्यादा बात करते रहने के लिए गहरा प्रेम और अपरिमित धैर्य चाहिए। आलोकधन्वा अत्यन्त प्रतिभाशाली कवि रहे हैं। वक्ता भी वह गजब के हैं। सक्सेना जी भाषा विज्ञान की बारीकियों के जानकार हैं। वह स्वगत बोलने के आदी हैं। मजाल है कि उनके सामने कोई जी और हाँ के अलावा कुछ और बोल सके। यह विभूति बाबू की विलक्षणता है कि उन्होंने न केवल कविवर को पौने दो साल तक प्रेमपूर्वक झेला, बल्कि भाषाविज्ञानी को एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी, जिसका ठीक से निर्वाह न होने पर भी उसे सादर सहते रहे, लेकिन दोनो ही मामले में अन्ततः यही साबित हुआ कि सब्र की भी सीमा होती है।

जो जितना सरल होता है, वह उतना ही अधिक उपलब्ध रहता है। जब मैं कलकत्ता विश्वविद्यालय में पढ़ता था, तब मुझे वहाँ के वीसी और प्रो-वीसी को देखने का एक भी अवसर नहीं मिला। हम सभी के लिए वह सिर्फ़ नाम या तख्ती थे। वर्धा विश्वविद्यालय में जो व्यक्ति मिलने के लिए सबसे ज्यादा उपलब्ध था, वह स्वयं वीसी थे। वह अफसर थे और जरूरत पड़ने पर अफसरी भी दिखाते थे, पर उनकी अफसरी में यह शामिल नहीं था कि उनसे मिलने के लिए किसी की सिफारिश लगानी पड़े।

कोई टोक सकता है कि मैं विभूति नारायण राय की तारीफ पर तारीफ क्यों किये जा रहा हूँ, क्या मुझे उनकी कमियाँ दिखायी नहीं देतीं? निवेदन है कि मैं यहां उनकी समीक्षा करने नहीं बैठा हूँ। यह काम चित्रगुप्तों का है। मैं तो वही बातें लिखना चाहता हूँ जो वीसी की सीवी में जोड़ने लायक हैं। हर समाज में ऐसे अनेक व्यक्ति होते हैं जिनकी सीवी का कुछ हिस्सा दूसरों को अवश्य लिखना चाहिए।

-राजकिशोर

राजकिशोर जी से मेरी पहली भेंट (अप्रैल-2010)
कैण्टीन में राजकिशोर जी मिले
सभ्यता का भविष्य बताते राजकिशोर जी

पुनश्च : राजकिशोर जी से मेरी पहली भेंट तब हुई थी जब वे अप्रैल-2010 में वर्धा परिसर में ‘सभ्यता का भविष्य’ विषय पर अपना व्याख्यान देने आये थे और मैं अपनी प्रतिनियुक्ति के प्रस्ताव पर निर्णय लेने से पूर्व विश्वविद्यालय परिसर के साक्षात्‌ दर्शन कर लेने के उद्देश्य से तीन दिन के लिए वर्धा की यात्रा पर गया हुआ था। वहाँ से लौटकर लिखे गये अपने यात्रा वृत्तान्त में मैंने राजकिशोर जी की चर्चा यों की थी-

…इसी बीच एक छोटेकद के श्यामवर्ण वाले भयंकर बुद्धिजीवी टाइप दिखने वाले महाशय का पदार्पण हुआ। उन्होंने बैठने से पहले ही कैन्टीन के वेटर से कहा कि मुझे बिना चीनी की चाय देना और दूनी मात्रा में देना। यानि कप के बजाय बड़ी गिलास में भरकर। मुझे मन ही मन उनकी काया के रंग का रहस्य सूझ पड़ा और सहज ही उभर आयी मेरे चेहरे की मुस्कान पर उनकी नजर भी पड़ गयी। मैने झेंप मिटाते हुए उनका परिचय पूछ लिया।

वे तपाक से बोले- “मुझे राजकिशोर कहते हैं… दिल्ली से आया हूँ। आप कहाँ से…?”

मेरे यह बताने पर कि मैं इलाहाबाद से आया हूँ और वहाँ कोषाधिकारी हूँ, उन्होंने सीधा सवाल दाग दिया- “अच्छा, ये बताइए कि ट्रेजरी में भ्रष्टाचार की स्थिति अब कैसी है?”

पूरा वाकया पढ़ने के लिए यहाँ चटका लगाइए।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)   

मंगलवार, 23 जुलाई 2013

खो गया बटुआ मिल गयी चिठ्ठी : कितनी मिठ्ठी

[A Letter in a lost wallet] (http://piqmug.blogspot.in  से अनूदित व साभार)

करीब तीस साल पुरानी बात है। कड़कड़ाती सर्दी की एक शाम जब मैं ऑफ़िस से अपने घर की ओर जा रहा था तो रास्ते पर एक बटुआ पड़ा देखकर रुक गया। शायद किसी की जेब से गिर गया होगा। मैंने उसे उठा लिया और इसे खोलकर देखने लगा कि इसमें शायद इसके मालिक का कोई अता-पता मिल जाय; या शायद कोई नम्बर ही मिल जाय तो उसे फोन करके बता दूँ। लेकिन उस बटुए में सिर्फ़ तीन डॉलर के नोट थे और एक मुड़ा-तुड़ा पत्र था जो देखने में लगता था कि कई सालों से इसी में पड़ा हुआ है।

walletवह पत्र जिस लिफाफे में था वह काफी घिस चुका था और उसपर लिखा हुआ प्रायः सबकुछ मिट चुका था, केवल प्रेषक का पता बचा हुआ था जो मुश्किल से पढ़ा जा सकता था। मैंने पत्र को खोलना शुरू किया। इसमें शायद कोई सुराग मिल जाय। तभी मैंने पत्र की तारीख देखी- 1924। इसका मतलब यह पत्र तबसे करीब साठ साल पहले लिखा गया था।

पत्र की लिखावट बहुत सुन्दर थी जो किसी कन्या द्वारा लिखी जान पड़ती थी। हल्के नीले रंग के आकर्षक कागज के ऊपरी बायें कोने पर एक छोटा सा सुन्दर फूल बना हुआ था। पत्र को पढ़ने से यह पता चला कि यह किसी ‘प्रिय जॉन’ को लिखा गया था जिसका नाम माइकल रहा होगा। पत्र लिखने वाली अब उसे आगे से नहीं मिलने वाली थी क्योंकि उसकी माँ ने उसे मना कर दिया था। इसके बावजूद, उसने लिखा था कि वह उसे हमेशा प्यार करती रहेगी।

नीचे जो हस्ताक्षर थे उसमें नाम था – हना।

पत्र बहुत ही बढ़िया था। लेकिन उसके पाने वाले के नाम ‘माइकल’ के अलावा उसमें ऐसी कोई भी सूचना नहीं थी जिससे इसके मालिक की पहचान की जा सके। मैंने सोचा कि क्यों न प्रेषक का जो पता लिखा हुआ है उसके बारे में पता किया जाय। शायद उस पते का कोई फोन नंबर ही मिल जाय। मैंने टेलीफोन सूचना विभाग में फोन लगा दिया।

“मैडम ऑपरेटर” मैंने धैर्य से समझाते हुए कहा, “मैं आपसे एक विचित्र अनुरोध कर रहा हूँ। ...मुझे रास्ते में पड़ा एक बटुआ मिला है। मैं इसके मालिक का पता लगाने की कोशिश कर रहा हूँ। ...इसमें एक पत्र मिला है जिसपर एक पता लिखा है। क्या आप किसी तरह यह बता सकती हैं कि इस पते से संबंधित कोई फोन नंबर है या नहीं...?”

उसने मुझे सलाह दी कि मैं उसके सुपरवाइजर से बात कर लूँ। सुपरवाइजर ने थोड़ी हिचकिचाहट के बाद कहा, “हाँ ठीक है, ...उस पते पर एक फोन नंबर तो है लेकिन उसे मैं आपको नहीं दे सकती।” उसने कहा कि वह मेरी इतनी मदद कर सकती है कि वह स्वयं उन लोगों से बात कर ले और यदि वे इजाजत दें तो मेरी बात उन लोगों से करा दे। मैंने कुछ ही मिनट प्रतीक्षा की होगी कि वह दुबारा फोन लाइन पर आ गयी, “लीजिए, कोई आपसे बात करना चाहता है।”

फोन पर दूसरी ओर जो महिला मिलीं उनसे मैंने पूछा कि क्या वे किसी हना नाम की लड़की को जानती हैं। थोड़ी देर वो अचंभित सी चुप रहीं, फिर बोलीं, “ओह, हम लोगों ने जिस परिवार से यह मकान खरीदा था उनकी एक बेटी थी - हना नाम की। लेकिन यह तीस साल पहले की बात है।”

मैंने पूछा- “क्या आपको पता है कि वे लोग इस समय कहाँ मिल सकते हैं?”

“मुझे हना के बारे में इतना याद है कि कुछ साल पहले उसे अपनी माँ को एक नर्सिंग होम में रखना पड़ा था।” उस महिला ने बताया। “हो सकता है यदि आप उस नर्सिंग होम वालों से संपर्क करें तो शायद उनसे हना के बारे में कुछ पता चल सके।”

उन्होंने मुझे नर्सिंग होम का पता दिया और मैंने वहाँ फोन मिला दिया। उन लोगों ने बताया कि वहाँ भर्ती बुजुर्ग महिला कुछ साल पहले गुजर गयी; लेकिन उनके पास एक फोन नंबर जरूर था जिसकी मदद से उसकी बेटी तक पहुँचा जा सकता था। कम से कम ऐसा उनका अनुमान था।

मैंने उन्हें धन्यवाद दिया और उस नंबर पर फोन मिलाया। जिस औरत ने फोन उठाया उसने बताया कि हना अब खुद ही एक नर्सिंग होम में रहती है।

अब मैं सोचने लगा कि मुझसे यह कितनी बड़ी बेवकूफ़ी हो रही है। आखिर मैं यह क्यों कर रहा हूँ..? सड़क पर पड़े मिले एक साधारण से पर्स के मालिक का पता लगाकर ऐसा क्या बड़ा तीर मार लूंगा जिसमें पड़े हैं केवल तीन डॉलर और एक चिठ्ठी जो लगभग साठ साल पुरानी है...?

ऐसा सोचते हुए भी मैंने उस नर्सिंग होम को फोन मिला ही दिया जिसमें हना के निवास करने की आशा थी। जिस आदमी ने फोन उठाया उसने बताया, “जी हाँ, हना जी हमारे साथ ही रहती हैं।”

हाँलाकि तबतक रात के दस बज चुके थे फिर भी मैंने पूछ लिया कि क्या मैं उनसे मिलने वहाँ आ सकता हूँ।

“ठीक है...,” उसने सकुचाते हुए कहा- “यदि आप कोशिश करना चाहते हैं तो आइए, हो सकता है अभी वे दिन वाले कमरे (डे-रूम) में बैठकर टीवी देख रही हों।”

मैंने उन्हें धन्यवाद दिया और गाड़ी लेकर उस नर्सिंग होम में पहुँच गया। रात्रिकालीन ड्यूटी नर्स और सिक्यूरिटी गार्ड ने दरवाजे पर मेरा अभिवादन किया। हम इस विशाल इमारत की तीसरी मंजिल पर गये। डे-रूम में नर्स ने मेरा परिचय हना से कराया।

चेहरे पर ताजी मुस्कान और आँखों में अनोखी चमक लिए चाँदी से चमकते बालों वाली वह पुराने जमाने की एक खूबसूरत महिला थीं।

मैंने उन्हें बटुए के बारे में बताया और उसमें रखी वह चिठ्ठी दिखायी। जिस क्षण उन्होंने उस हल्के नीले रंग के लिफाफे और उसके कोने पर बने छोटे से फूल को देखा, उन्होंने एक गहरी साँस भरी और बोल पड़ी, “नौजवान, माइकल के साथ मेरा आखिरी संपर्क इस चिठ्ठी से ही हुआ था।”

वे थोड़ी देर के लिए मुँह घुमाकर गहरी सोच में डूब गयीं। उसके बाद बहुत कोमल आवाज में बताने लगीं, “मैं उसे बहुत प्यार करती थी। लेकिन तब मैं केवल सोलह साल की थी और मेरी माँ को लगा कि मैं बहुत छोटी हूँ। ...ओह, वह बेहद खूबसूरत इन्सान था। ...वह अभिनेता सीन कोनेरी की तरह दिखता था।”

“हाँ...” वे बोलती जा रही थीं, “माइकल गोल्डस्टीन अनोखा आदमी था। यदि तुमसे मिले तो उससे कहना कि मैं अभी भी उसके बारे में सोचती हूँ। और...” थोड़ी देर के लिए वे सकुचाकर रुक गयीं, फिर अपने होंठ लगभग काटते हुए बोलीं, “उससे कहना कि मैं अभी भी उससे प्यार करती हूँ... और...” वे एक ओर मुस्करा रही थीं और दूसरी ओर उनकी आँखों से बड़ी-बड़ी बूँदे टपकती जा रहीं थीं, “मैंने कभी शादी नहीं की...। मैं समझती हूँ कि माइकल जैसा दूसरा कोई था ही नहीं...”

मैंने हना जी को धन्यवाद कहा और विदा ली। लिफ़्ट से पहली मंजिल पर उतर आया। वहाँ जो गार्ड खड़ा था उसने पूछा- “क्या उस बूढ़ी महिला ने आपकी कोई मदद की?”

मैंने उसे बताया कि उन्होंने मुझे एक सूत्र दिया है। “अब मुझे कम से कम इसके मालिक का पूरा नाम पता चल गया है। लेकिन मुझे लगता है कि अब मैं इसे यूँ ही कुछ समय तक रहने दूँगा। मैंने लगभग पूरा दिन इसके मालिक का पता लगाने में खर्च कर दिया है।”

इस बीच मैंने उस बटुए को बाहर निकाल लिया था जो कत्थई रंग के चमड़े का एक साधारण सा बटुआ था जिसके किनारों पर लाल रंग के गोटे लगे थे। जब गार्ड ने उसे देखा तो बोल पड़ा- “अरे, एक मिनट रुकिए तो! यह तो गोल्डस्टीन साहब का बटुआ है। मैं तो इसे कहीं भी पहचान सकता हूँ। इसमें जो चमकता हुआ लाल गोटा लगा है उससे। वे इसे हमेशा खो देते हैं। मैंने इस बटुए को कम से कम तीन बार तो यहाँ के हालों में ही गिरा हुआ पाया है।”

“ये गोल्डस्टीन साहब कौन हैं?” यह पूछते हुए मेरे हाथ काँपने लगे।

“वे आठवीं मंजिल पर रहने वाले बुजुर्गों में से एक हैं। यह निश्चित रूप से माइकल गोल्डस्टीन साहब का ही बटुआ है। जरूर उन्होंने टहलते समय इसे गिरा दिया होगा।”

मैंने गार्ड को शुक्रिया कहा और लगभग दौड़ते हुए नर्स के ऑफिस में घुस गया। मैंने उसे गार्ड की कही बात बतायी। हम लिफ़्ट तक गये और अन्दर चढ़ गये। मैं मन ही मन प्रार्थना करता रहा कि ऊपर श्री गोल्डस्टीन मिल जाँय।

आठवीं मंजिल की नर्स ने बताया, “मुझे लगता है कि वे अभी भी डे-रूम में ही हैं। वे रात को पढ़ना पसन्द करते हैं। वे बहुत प्यारे बुजुर्ग हैं।

हम उस एकमात्र कमरे में पहुँच गये जहाँ कोई बत्ती जल रही थी और एक आदमी किताब पढ़ रहा था। नर्स उनके पास तक गयी और पूछा- क्या आपका बटुआ खो गया है? श्री गोल्डस्टीन ने हैरत से सिर ऊपर उठाकर देखा, अपना हाथ पीछे की जेब पर रखकर टटोला और बोले, “ओह, यह तो गायब है।”

“इन सज्जन को रास्ते में एक बटुआ पड़ा मिला है और हमें आश्चर्य है कि यह आपका हो सकता है...।”

मैंने श्री गोल्डस्टीन को वह बटुआ थमा दिया। उन्होंने उसे देखते ही राहत महसूस की और मुस्कराकर कहा, “हाँ, यही है! जरूर आज शाम को मेरी जेब से यह गिर गया होगा। मैं आपको कुछ ईनाम देना चाहता हूँ।”

“जी नहीं, धन्यवाद,” मैंने इन्कार करते हुए कहा। “लेकिन मुझे आपसे कुछ कहना है। मैंने वह चिठ्ठी पढ़ डाली... इस आशा में कि शायद इस बटुए के मालिक का पता लग जाय।”

उनके चेहरे की मुस्कान अचानक गायब हो गयी, “तुमने चिठ्ठी पढ़ डाली?”

“मैंने चिठ्ठी पढ़ ही नहीं डाली, मुझे हना जी का वर्तमान पता भी मालूम हो गया है।”

अब उनका चेहरा पीला पड़ गया। “हना...? तुम जानते हो कि वह कहाँ है? कैसी है वो? क्या वह अभी भी उतनी ही सुन्दर है जैसी पहले थी? प्लीज, ....प्लीज मुझे बताओ...।” उन्होंने याचना की।

“वो ठीक हैं... बिल्कुल वैसी ही सुन्दर जैसी आप को मालूम है।” मैंने धीरे से कहा।

वे बुजुर्ग किसी प्रत्याशा में मुस्कराये और पूछने लगे, “बताइए न, कहाँ है वो? मैं उससे बात करना चाहता हूँ।” उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया और बोले, “महोदय, आप कुछ जानते हैं, मैं उस लड़की से इतना प्यार करता था कि जब वह चिठ्ठी आयी तो मेरी जिन्दगी सच में खत्म हो गयी। ...मैंने कभी शादी नहीं की। ...मुझे लगता है कि मैं हमेशा उसे ही प्यार करता रहा हूँ।”

“श्री गोल्डस्टीन जी, मेरे साथ आइए।” मैंने कहा।

हम लिफ़्ट से तीसरी मंजिल पर उतर आये। गलियारे में अंधेरा था। एक-दो नाइट लैंप जल रहे थे जिनके सहारे हम डे-रूम तक आ गये जहाँ हना जी अकेली बैठी टीवी देख रही थीं। नर्स उनके पास तक गयी।

“हना जी,” उसने फुसफुसाते हुए बुलाया। दरवाजे के पास मेरे साथ खड़े प्रतीक्षा कर रहे माइकल की ओर इशारा करते हुए उसने पूछा, “क्या आप इस आदमी को जानती हैं?”

उन्होंने अपना चश्मा ठीक किया, थोड़ी देरे तक उधर देखा लेकिन कुछ बोला नहीं। माइकल ने हल्के से फुसफुसाकर कहा, “हना, मैं हूँ माइकल...। क्या मैं याद हूँ तुम्हें?”

वह अचानक धक्‌ से रह गयी, “माइकल! मुझे विश्वास नहीं हो रहा। माइकल! यह तुम्हीं हो! मेरे माइकल!” वे धीरे–धीरे उनकी ओर आगे बढ़े और आलिंगन कर लिया। नर्स और मैं, दोनो अपने चेहरों पर आँसू बहाते बाहर आ गये।

“देखो, ” मैंने कहा। “देखो ईश्वर की कैसी लीला है...! होनी को कोई टाल नहीं सकता। उसके घर देर है अन्धेर नहीं है।”

करीब तीन सप्ताह बाद मुझे अपने ऑफ़िस में एक फोन आया, “आप रविवार को आयोजित एक विवाह समारोह में सादर आमंत्रित हैं। आयु. हना और चि. माइकल वैवाहिक गठबंधन में बँधने जा रहे हैं।

यह बहुत ही सुन्दर वैवाहिक समारोह था। नर्सिंग होम के सभी लोग आकर्षक परिधान में सज-धजकर जश्‍न में हिस्सा ले रहे थे। हना ने हल्के कत्थई रंग का जोड़ा पहन रखा था और बेहद आकर्षक लग रही थी। माइकल ने गहरे नीले रंग का सूट पहना था जो दूर से ही पहचाना जा रहा था। मुझे उन लोगों ने सबसे अधिक तवज्जो दी।

हॉस्पिटल ने उन दोनो को एक अलग कमरा दे दिया। यदि आपको किशोर उम्र की तरह चहकती-महकती छिहत्तर साल की दुल्हन और उन्यासी साल का दूल्हा देखना हो तो यह जोड़ा ही देखने लायक होगा। लगभग साठ साल लंबे प्रेम-प्रसंग का ऐसा आदर्श पटाक्षेप और कहाँ।

(अनुवाद : सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

मूल पोस्ट : http://piqmug.blogspot.in/2013/07/a-letter-in-lost-wallet.html

गुरुवार, 22 दिसंबर 2011

ठंड में यूँ याद आया बचपन…

 

camp-fireलखनऊ की ठंड भी कंपाने वाली है। ऑफिस से लौटने के बाद आग तापने से अच्छा कुछ भी नहीं लगता। अपार्टमेंट फ़्लैट की लाइफ में आंगन में अलाव जलाकर तापने का सुख तो नहीं मिल पाता लेकिन हमने उसकी भरपाई कुछ ऐसे कर ली। अंगारे बड़े प्यारेलोहे का पोर्टेबल ‘हवनकुंड’ लकड़ी और कोयले की आग जलाकर तापने के काम आ रहा है। पड़ोसियों से मेल मुलाकात का बहाना भी।

 

 

 

***  ***  ***

child-hood days 001आज पुराने कागज टटोलते हुए एक मुड़ा-तुड़ा पन्ना हाथ लगा तो मन खुश हो गया। बात उन दिनों की है जब कम्प्यूटर से भेंट नहीं थी लेकिन कुछ तुकबन्दी जोड़ लेने का शगल फिर भी आता-जाता रहता था। ऐसे में कागज पर लिखा हुआ आइटम जेब में कुछ दिनों साथ घूमता, फिर जब आसपास के सबलोग पढ़-सुन लेते तो बासी अखबार की तरह कहीं कोने में पड़ रहता। बचपन की देहरी लाँघते हुए जब तरुणाई की ओर कदम बढ़ रहे थे उन्ही दिनो ननिहाल में ये भाव उपजे थे। एक मौसी का जन्मदिन था। माँ की फुफेरी बहन थीं और हमउम्र थी इसलिए ‘नीलूमोछी’ कहा करते थे। “हैप्पी बर्डे” कहने का शऊर सीखा नहीं था इसलिए ‘सुखी और चिरायु होने की शुभकामनाएँ’ देने के लिए यह कविता रच डाली थी। इसमें शुभकामना कहाँ छिपी है यह आप खोजिए, मैं तो कविता ठेलता हूँ।

मेरे मन कर वन्दन प्रभु से अब सबकुछ मंगलकारी हो।

रीते दिन बीतें अब अपनी एक हरी भरी फुलवारी हो॥

नील गगन में पंछी सा उड़ने को मन ललचाता है।

लूटे थे जो सुख बचपन में उन सबकी याद दिलाता है॥

मोहक नानी के घर की सारी बातें प्यार लड़ाई की।

छीना-झपटी का खेल और चुपके से मिली मिठाई की॥

सब धमा-चौकड़ी लुका-छिपी फिर भोली-भाली किलकारी।

दैनिक जीवन निश्चिन्त अहा, अल्हणता कैसी थी प्यारी॥

वह खेल-कबड्डी, गुल्ली-डंडा, भाग-दौड़ वह अठखेली।

सुबके रोये भी वहाँ और मुस्कान खिली भी अलबेली॥

खींच चुकी है मन में गहरी अमिट रेख उन यादों की।

हों विस्मृत कैसे वे पल-छिन वे घड़ियाँ मीठे वादों की॥

चिरकाल हमारे जीवन में सब रचा-बसा रह जाएगा।

राहें जीवन की जहाँ मिलें सबकुछ पहचाना जाएगा॥

युग बचपन का बीता, आयी तरुणाई तो अपनाएंगे।

होंठों पर हो मुस्कान अमिट ईश्वर से यही मनाएंगे॥

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

-सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी         

शुक्रवार, 21 मई 2010

ऎ बहुरिया साँस लऽ, ढेंका छोड़ि दऽ जाँत लऽ

 

आज गिरिजेश भैया ने अपनी पोस्ट से गाँव की याद दिला दी। गाँव को याद तो हम हमेशा करते रहते हैं लेकिन आज वो दिन याद आये जब हम गर्मी की छुट्टियों में वहाँ बचपन बिताया करते थे। अपनी ताजी पोस्ट में उन्होंने पुरानी दुपहरी के कुछ बिम्ब उकेरे हैं। एक बिम्ब देखकर सहसा मेरे सामने वह पूरा दृश्य उपस्थित हो गया जो वैशाख-जेठ की दुपहरी में सास-बहू की तू-तू मैं-मैं से उत्पन्न हो सकता है। ये रहा उनकी कविता में रेखांकित बिम्ब और उसके आगे है उसकी पड़ताल-

हुई रड़हो पुतहो
घर में सास पतोहू लड़ीं।
भरी दुपहरी
मर्दों को अगोर रही
दुआरे खटिया खड़ी


इसके पीछे की कहानी यह रही--


धर दिया सिलबट पर
टिकोरा को छीलकर
सास बोल गई
लहसुन संग पीस दे पतोहू
मरिचा मिलाय दई
खोंट ला पुदीना...


बहू जम्हियाय
उठ के न आय


तो...
वहीं शुरू हुआ
रड़हो-पुतहो

धनकुट्टी की टिक टिक हमने भी सुनी है, धान कुटाने को साइकिल के बीच में बोरा लादकर गये भी हैं। ये बात दीगर है कि बहुत छोटी उम्र के कारण हमें धान कुटाने के लिए शारीरिक श्रम नहीं करना पड़ता। दरवाजे पर का आदमी  साथ होता। हम तो केवल उस मशीनी गतिविधि को देखने जाते थे। इंजन की आवाज इतनी तेज कि सभी एक दूसरे से इशारे में ही बात कर पाते। लेकिन वह एक बहुत बड़ी सुविधा थी जो आम गृहस्थ के घर की औरतों को ढेंका और जाँत से मुक्त होने की राह दिखा रही थी। इन्जन मशीन से चलने वाली चक्की और ‘हालर’ ने गाँव की रंगत बदल दी। अब तो हमारी भाषा से कुछ चुटीले मुहावरे इस मशीनी क्रान्ति की भेंट चढ़ गये लगते हैं। आइए देखें कैसे…!

पहले हर बड़े घर में एक ढेंकाघर होता था। ढेंका से कूटकर धान का चावल बनाया जाता था। असल में यह कूटने की क्रिया ही इस यन्त्र से निकली हुई है। आजकल धान की ‘कुटाई’ तो होती ही नहीं। अब तो धान को ‘रगड़कर’ उसकी भूसी छुड़ाई जाती है। ढेंका के रूप में लकड़ी का एक लम्बा सुडौल बोटा दो खूंटों के बीच क्षैतिज आलम्ब पर टिका होता था जो लीवर के सिद्धान्त पर काम करता था। इसके एक सिरे पर मूसल जड़ा होता था जिसका निचला सिरा धातु से मढ़ा हुआ होता था। इस मूसल के ठीक नीचे जमीन की सतह पर ओखली का मुँह होता। आलम्ब के दूसरी ओर ढेंका का छोटा हिस्सा होता जिसपर पैर रखकर नीचे दबाया जाता था। नीचे दबाने पर इसका अगला हिस्सा ऊपर उठ जाता और छोड़ देने पर मूसल तेजी से ओखली में चोट करता। ओखली में रखे धान पर बार-बार के प्रहार से चावल और भूसी अलग-अलग हो जाते। इसे बाद में निकाल कर सूप से फटक लिया जाता।

मूसल के अग्र भाग को थोड़ा भोथरा रखते हुए इसी ढेंका से चिउड़ा कूटने का काम भी हो जाता था। धान को कुछ घण्टॆ पानी में भिगोकर निकाल लिया जाता है। फिर उसे कड़ाही में भूनकर गर्म स्थिति में ही ओखली में डालकर कूट लिया जाता है। चलते हुए मूसल के साथ ताल-मेल बनाकर ओखली के अनाज को चलाते रहना भी एक कमाल का कौशल मांगता है। मूसल की चोट से नौसिखिए की अंगुलियाँ कट जाने या टूट जाने की दुर्घटना प्रायः होती रहती थी। ओखली से अनाज बाहर निकालते समय ढेंका को ऊपर टिकाए रखने के लिए एक मुग्‌दर जैसी लकड़ी का प्रयोग होता था जिसे उसके नीचे खड़ा कर उसीपर ढेंका टिका दिया जाता था।

गेंहूँ से आटा बनाने के लिए भी हाथ से चलने वाली चक्की अर्थात्‌ ‘जाँता’ का प्रयोग किया जाता था। जाँता की मुठिया पकड़कर महिलाएं भारी भरकम चक्की को घुमातीं और गेंहूँ इत्यादि ऊपर बने छेद से डालते हुए उसका आटा तैयार करती। चक्की से बाहर निकलते आटे को सहेजने के लिए कच्ची मिट्टी का घेरा बना होता था। इसे बनाने के लिए दक्ष औरतों द्वारा तालाब की गीली मिट्टी से इसकी आकृति तैयार कर धूप में सुखा लिया जाता था। जाँता चलाते हुए इस अवसर पर पाराम्परिक लोकगीत भी गाये जाते जिन्हें जँतसार कहते थे। पं. विद्यानिवास मिश्र ने इन गीतों का बहुत अच्छा संकलन अपनी एक पुस्तक में किया है।

ढेंका-जाँत

ये दोनो यन्त्र गृहस्थी के बहुत जरूरी अंग हुआ करते थे। जिन गरीब घरों में ये उपलब्ध नहीं थे उन्हें अपने पड़ोसी से इसकी सेवा निःशुल्क मिल जाती थी। घर की बड़ी बूढ़ी औरतें इन यन्त्रों की देखभाल करती। बहुओं को भी बहुत जल्द इनका प्रयोग करना सीखना पड़ता था। जिन घरों में नौकर-चाकर होते उन घरों में यह काम वे ही करते। यहाँ तक आते-आते मेरी ही तरह आप के दिमाग में भी दो-तीन मुहावरे और लोकोक्तियाँ आ ही गयी होंगी। नयी पीढ़ी के बच्चों को शायद यह किताब से रटना पड़े कि ‘ओखली में सिर दिया तो मूसलॊं से क्या डरना’ का मतलब क्या हुआ। लेकिन जिसने ओखली में धुँआधार मूसल गिरते देखा हो उसे कुछ समझाने की जरूरत नहीं। गेंहूँ के साथ घुन भी कैसे पिस जाते हैं यह समझाने की जरूरत नहीं है।

कबीर दास जी ने यही चक्की देखी थी जब वे इस संसार की नश्वरता पर रो पड़े थे।

चलती चाकी देखकर दिया कबीरा रोय।

दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय॥

आपको अपने आस-पास ऐसे लोग मिल जाएंगे जो कोई भी काम करने में कमजोरी जाहिर कर देते हैं। किसी काम में लगा देने पर बार-बार उसके समाप्त होने की प्रतीक्षा करते हैं और ऐसे उपाय अपनाते हैं कि कम से कम मेहनत में काम पूरा हो जाय। ऐसे लोगों के लिए एक भोजपुरी कहावत है- “अब्बर कुटवैया हाली-हाली फटके” अब इस लोकोक्ति का अर्थ तभी जाना जा सकता है जब ढेंका से धान कूटने की प्रक्रिया पता हो। ढेंका चलाने में काफी मेहनत लगती है। कमजोर आदमी लगातार इसे नहीं चला सकता, इसलिए वह सुस्ताने के लिए धान से भूसी फटक कर अलग करने का काम जल्दी-जल्दी यानि कम अन्तराल पर ही करता रहता है।

आपने सौ प्याज या सौ जूते खाने की बोधकथा सुनी होगी। इसका प्रयोग तब होता है जब दो समान रूप से कठिन विकल्पों में से एक चुनने की बात हो और यह तय करना मुश्किल हो कि कौन वाला विकल्प कम कष्टदायक है। ऐसे में हश्र यह होता है कि अदल-बदलकर दोनो काम करने पड़ते हैं। इसी सन्दर्भ में हमारे ग्रामीण वातावरण में यह कहावत पैदा हुई होगी जब बहू को बहुत देर से ढेंका चलाते हुए देखकर उसकी सास प्यार से कहती है कि ऐ बहू, थोड़ा ब्रेक ले लो। तुम थक गयी होगी इसलिए ढेंका चलाना छोड़ दो और जाँता चलाना शुरू कर दो यानि धान कूटने के बजाय गेंहूँ पीस डालो।

ऎ बहुरिया साँस लऽ, ढेंका छोड़ि दऽ जाँत लऽ

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

बुधवार, 5 मई 2010

वर्धा में अम्बेडकर को याद करने का तरीका अनूठा था…

 

मेरी वर्धा यात्रा की प्रथम, द्वितीय, और तृतीय रिपोर्ट आप यहाँ पढ़ चुके हैं। अब आगे…

विश्वविद्यालय गेस्ट हाउस से जब हम सेवाग्राम आश्रम के लिए निकले तो धूप चढ़ चुकी थी। यद्यपि यह आश्रम घूमने का सबसे अच्छा समय नहीं था, लेकिन हमारे पास कोई दूसरा विकल्प उपलब्ध भी नहीं था। हम वर्धा शहर के बीच से होकर ही गुजरे लेकिन रास्ते में कोई भीड़ भरी ट्रैफ़िक नहीं मिली। निश्चित ही गर्मी का असर सड़कों पर उतर आया था। हमें किसी मोड़, तिराहे या चौराहे पर रुककर सेवाग्राम का रास्ता पूछने के लिए गाड़ी से उतरकर किसी दुकानदार तक जाना पड़ता क्यों कि सड़क पर राहगीर नहीं मिल रहे थे। लेकिन हमें दो स्थानों पर इस कड़ी धूप को धता बताते लोग मिले जो पूरी सज-धज के साथ समूह में इकठ्ठा होकर किसी जश्न की तैयारी में जाते दिखायी दिए।

अम्बेडकर जयन्ती की धूम मैने नजदीक पहुँचकर देखा तो पता चला कि ये लोग बाबा साहब के जन्मदिन की शोभायात्रा निकाल रहे हैं। नीले अबीर का तिलक लगाकर एक दूसरे का अभिवादन करते लोगों में बड़े-बुजुर्ग, मर्द-औरतें, लड़के व लड़कियाँ, सभी मौजूद थे। एक अदम्य उत्साह और उमंग से लबरेज़ ये श्रद्धालु अपने नेता के प्रति सम्मान व्यक्त करने के लिए जिस स्वतः स्फूर्त भाव से इस आयोजन में शामिल हो रहे थे उसे देखकर सहज ही अनुमान किया जा सकता था कि डॉ.भीमराव अम्बेडकर ने किस प्रकार एक बहुत बड़े समाज को अपनी अस्मिता पर गौरव महसूस करने और सिर ऊँचा उठाकर जीने की प्रेरणा दे दी है।

एक पेट्रोल पंप के अहाते में जमा हो रहे समूह को पीछे छोड़कर जब हम सेवाग्राम में बापू के आश्रम के मुख्यद्वार पर पहुँचे तो वहाँ भी एक ऐसा ही जुलूस जश्न के उल्लास में डूबा हुआ मिला। एक खुली हुई गाड़ी पर बाबा साहब अम्बेडकर के आदमकद चित्र को सजाकर झाँकी तैयार की गयी थी जिसके सामने बड़ी संख्या में लड़के और वयस्क पुरुष नाच रहे थे। ढोल-नगाड़े और बैण्ड-बाजे की तेज ध्वनि पर उनके पाँव खुशी-खुशी तारकोल की गर्म सड़क पर भी सहजता से थिरक रहे थे। मैने गेट के किनारे गाड़ी खड़ी की और अपना कैमरा निकाल कर इस शोभा यात्रा की कुछ तस्वीरें लेनी चाही। लेकिन पहले स्नैप के बाद ही कैमरा स्वचालित तरीके से बन्द हो गया। स्क्रीन पर यह संदेश आया कि सीमा से अधिक गर्म हो जाने के कारण कैमरा बन्द हो रहा है। ए.सी. कार के डैश बोर्ड पर शीशे से छन कर आ रही धूप इस सोनी डिजिटल कैमरे की नाजुक कार्यप्रणाली को बन्द करने में सक्षम थी लेकिन अपने नेता के जन्मदिन को यादगार बनाने में जुटे उन लोगों के ऊपर कड़ी धूप का जरा भी असर नहीं दिखा। माथे पर नीली पट्टी बाँधे हुए दर्जनों नौजवान लड़के मोटरसाइकिलों पर फर्राटा भरते किसी बाराती का सा उत्साह लिए समूह में आ जा रहे थे।

जब वह शोभा यात्रा थोड़ी दूर चली गयी तो हम एक और महापुरुष की कर्मस्थली के प्रांगण में चले गये। यह था बापू का सेवाग्राम आश्रम। 

सन्‌ १९३४ मेंबापू यहाँ बैठकर काम करते गांधीजी को उनके प्रिय मित्र और प्रसिद्ध उद्योगपति जमनाबापू का दफ़्तरलाल बजाज ने वर्धा में निवास हेतु आमन्त्रित किया था। वर्धा के करीब शेगाँव (Shegaon) नामक ग्रामीण क्षेत्र में जंगली वनस्पतियों से हरे-भरे इलाके में बापू के रहने के लिए स्थानीय सामग्री के उपयोग से खपरैल की छत वाला जो मकान बना उसे अभी भी ज्यों का त्यों सजोकर रखा गया है।  सबसे पहले हम उसी ‘आदि निवास’ के बरामदे में पहुँचे।  हमने वहाँ उल्लिखित निर्देश के सम्मान में अपने पैर के जूते निकाल दिए। पूरे प्रांगण में पत्थर की छोटी गिट्टियों की परत बिछायी गयी थी जो धूप से गर्म तो हो ही चुकी थी, उनपर नंगे पाँव चलने से इनकी तीखी नोक से चुभन भी खूब हो रही थी। वहाँ कार्यरत एक बुजुर्ग महिला ने बताया कि इस स्थान पर साँप और बिच्छू बहुत निकलते हैं। इन गिट्टियों के बीच उनका चलना कठिन होता है इसलिए सुरक्षा की दृष्टि से यह गिट्टी डाली गयी है। एक्यूप्रेशर चिकित्सा में विश्वास करने वाले इन गिट्टियों पर नंगे पाँव चलना स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद मानते हैं। एक कक्ष में साँप पकड़ने का पिजरा भी रखा हुआ था जिसमें साँपों को पकड़कर दूर जंगल में छोड़ दिया जाता था।

बताते हैं कि बापू के कार्यकाल में निर्मित भवनों जैसे- आदि निवास, बा-कुटी, बापू- कुटी, आखिरी निवास, परचुरे कुटी, महादेव कुटी, किशोर निवास, रुस्तम भवन इत्यादि में से किशोर निवास को छोड़कर किसी भी भवन में पक्की ईंटों व सीमेण्ट का प्रयोग नहीं किया गया था। इस प्रांगण में गांधी जी द्वारा व्यक्तिगत रूप से उपयोग की गयी वस्तुओं को करीने से सजाकर आगन्तुकों के दर्शनार्थ रखा गया है। आश्रम में आकर मेरा कैमरा अबतक ठण्डा हो चुका था इसलिए हमने कुछ यादगार तस्वीरें उतार लीं।

 दवात बापू द्वारा उपयोग की गयी संग्रहित वस्तुएं तीन बन्दर और लकड़ी का करण्डक
बापू का टेलीफोन गांधी जी का सामान

  बापू का चश्मा 

 

बापू कुटी का परिचय देता यह बोर्ड हमारा ध्यान बरबस खींचता है। इसमें सात सामाजिक पातक (social sins) उल्लिखित हैं जो यंग इण्डिया से उद्धरित हैं। समाज को पतन की ओर ले जाने वाले जिन तत्वों की पहचान गांधी जी ने तब की थी वे आज हमारे सामने प्रत्यक्ष उपस्थित हैं और उनका वैसा ही प्रभाव होता भी दिखायी दे रहा है। बापू कुटी का परिचय और सात सामाजिक पातक सिद्धान्तहीन राजनीति, विवेकभ्रष्ट भोग-विलास, बिना श्रम के अर्जित सम्पत्ति, मानवीय मूल्यों से विहीन वैज्ञानिक विकास, अनैतिक बाणिज्य-व्यापार, त्याग और बलिदान से रहित पूजा-पाठ, और चरित्र निर्माण से रहित शिक्षा  जैसे घटक हमारे समाज को आज भी अन्धेरे की ओर ले जा रहे हैं। यदि हमारे देश के नीति नियन्ता राष्ट्रीय स्तर पर इन्हीं विन्दुओं को दृष्टिगत रखकर नीति निर्माण करें और उनके अनुपालन की कार्ययोजना तैयार करें तो बहुत कुछ सुधारा जा सकता है।

प्रांगण में अनेक छायादार और फलदार वृक्ष दिखे जिनका रोपण देश की महान विभूतियों ने किया था और उनकी नाम पट्टिकाएं वृक्षों पर लगी हुई थीं। भारतीय स्वतंत्रता संगाम के अन्तिम दशक में देश का ऐसा कोई भी महत्वपूर्ण व्यक्ति नहीं रहा होगा जो वर्धा के सेवाग्राम आश्रम तक न आया हो। गांधी जी ने अपने जीवन के अन्तिम भाग में अधिकांश समय यहीं बिताया। विभाजन के बाद उपजे साम्प्रदायिक दंगो से लड़ने के लिए बंगाल के नोआखाली के लिए प्रस्थान करने के बाद गांधी जी यहाँ नहीं लौट सके।

इस प्रांगण से बाहर आकर हमने खादी की दुकान से कुछ खरीदारी की। भूख और प्यास ने जब हमें नोटिस थमायी तो हमें बगल के प्राकृतिक आहार केन्द्र की ओर जाना पड़ा। इस रेस्तराँ को देखकर हम झूम उठे। डाइनिंग टेबल के स्थान पर यहाँ चौकोर चौकियाँ रखी हुई थीं जिनके बीच में तिपाये पर ठण्डे पानी से भरे मिट्टी के घड़े रखे हुए थे।प्राकृतिक आहार केन्द्र, सेवाग्राम हमने वहाँ किसी फूल के अर्क से तैयार किया हुआ ठंडा स्वादिष्ट शरबत लिया, कुछ तस्वीरें ली और अपनी गाड़ी की ओर बढ़ चले। गेस्ट हाउस की कैण्टीन में बना भोजन हमारा इन्तजार कर रहा था।

शाम को गेस्ट हाउस के चबूतरे पर आयोजित एक अद्भुत कार्यक्रम में शामिल होने का अवसर मिला। अम्बेडकर जयन्ती के अवसर पर विश्वविद्यालय के संस्कृति विभाग ने इस विशेष कार्यक्रम का  आयोजन किया था। विभाग के विशेष कार्याधिकारी (OSD) राकेश जी ने कार्यक्रम के प्रथम चरण में डॉ. अम्बेडकर की राजनैतिक आर्थिक दृष्टि और आज का समय विषय पर बोलने के लिए नागपुर से आमन्त्रित प्रोफ़ेसर श्रीनिवास खान्देवाले का परिचय दिया। अर्थशास्त्र के प्रतिष्ठित विद्वान प्रोफ़ेसर खान्देवाले ने करीब एक घण्टे के अपने भाषण में डॉ. भीमराव अम्बेडकर के जिस व्यक्तित्व से परिचित कराया उसे इतनी गहराई से हम पहले नहीं जान पाये थे। भारतीय संविधान के निर्माता और दलित समुदाय के मसीहा के रूप में अम्बेडकर की जो छवि हमारे मन में थी उसके दो रूप थे। एक रूप वह था जिसमें वे राजनैतिक रूप से जागरूक हो रहे एक खास सामाजिक जाति वर्ग के प्रेरणापुंज और उपास्य देवता थे जिनकी अन्धभक्ति में डूबे हुए लोग अपने समर्थक समूह से इतर प्रत्येक व्यक्ति को मनुवादी कहकर गाली देने का काम करते रहे हैं।

उनकी छवि का दूसरा रूप वह था जो अरुण शौरी जैसे लेखकों द्वारा ‘फर्जी भगवान’ के रूप में गढ़ा गया था- जिसके प्रति विद्वेष से भरे हुए लोगों द्वारा चौराहे पर लगी उनकी मूर्तियों को तोड़ने, अपमानित करने और एक जाति विशेष के लोगों के लिए अपशब्द प्रयोग करने और उत्पीड़ित करने का जघन्य कार्य किया जाता रहा है।  कदाचित्‌ डॉ. अम्बेडकर को एक खास राजनैतिक उद्देश्य से इस्तेमाल करने की होड़ में लगी पार्टियों ने इस प्रकार की परस्पर विरोधी छवियों का निर्माण कर रखा है। प्रो. खान्देवाले ने अपने वक्तव्य में अम्बेडकर की एक मध्यमार्गी छवि पेश की। उनका कहना था कि अम्बेडकर की दृष्टि सच्चे समाजवाद से ओतप्रोत थी। वे शान्तिपूर्ण ढंग से सामाजिक परिवर्तन लाने के हिमायती थे। उनकी राजनैतिक दृष्टि तो उनके द्वारा तैयार किये गये हमारे संविधान में परिलक्षित होती ही है, साथ में उनकी आर्थिक दृष्टि को भी संविधान के सूक्ष्म अध्ययन से समझा जा सकता है।रजिस्ट्रार, प्रतिकुलपति और कुलपति के साथ प्रो. श्रीनिवास खान्देवाले (सबसे दाएं)

समाज में फैली घोर आर्थिक विषमता को दूर करने के लिए सम्पत्ति का प्रवाह ऊपर से नीचे की ओर होना आवश्यक है लेकिन हो रहा है इसका उल्टा। गरीब मजदूर और किसान अपनी विकट परिस्थिति से हारकर आत्महत्या कर रहे हैं और पूँजीपति वर्ग लगातार अपनी सम्पत्ति बढ़ाता जा रहा है। आई.पी.एल. के अर्थशास्त्र का उदाहरण देकर उन्होंने बताया कि जबतक समाज के पिछ्ड़े तबके को आर्थिक उन्नति के उचित और न्यायपूर्ण अवसर नहीं प्राप्त होंगे तबतक सामाजिक समरसता नहीं पायी जा सकेगी। यही उचित अवसर दिलाने की लड़ाई शान्तिपूर्ण तरीके से लड़ने की राह डॉ.अम्बेडकर ने दिखायी। पारस्परिक विद्वेष को भुलाकर इस लड़ाई में समाज के सभी तबकों से बराबर का सहयोग करने का आह्वान भी प्रो. खान्देवाले ने वहाँ उपस्थित छात्रों, अध्यापकों और वि.वि. के पदाधिकारियों से किया।

कार्यक्रम के अगले चरण में लखनऊ से आयी संगीत मण्डली रवि नागर एण्ड ग्रुप ने कुछ बेहतरीन कविताओं का मोहक संगीतमय पाठ किया। इसमें सबसे पहले डॉ.दिनेश कुमार शुक्ल के कुछ दोहे गाकर सुनाये गये-

भाषा के सोपान से, शब्द लुढकते देख।

पढ़ा लिखा सब पोंछकर, लिखो नया आलेख॥

जीवन को अर्था रहा, गूंगा बहरा मौन।

किसने देखा राम को, रमता जोगी कौन॥

सीली-सीली है हवा, ठण्डी-ठण्डी छाँव।

सन्निपात का ज्वर बढ़ा, झुलस रहा है गाँव॥

यहाँ न सूर्योदय हुआ, यहाँ न फैली धूप।

कालरात्रि फैली रही, जैसे अन्धा कूप॥

काले भूरे खुरदुरे, ले अकाल के रंग।

गगन पटल पर लिख रहा, औघड़ एक अभंग॥

जंगलों में रहने वाले आदिवासी समुदाय के जीवन पर आधारित निर्मला पुतुल की कविता ‘तुम्हारे हाथों बने पत्तल पर भरते हैं पेट हजारो, पर हजारों पत्तल भर नहीं पाते पेट तुम्हारा’  के भावुक प्रस्तुतिकरण ने वातावरण बहुत मार्मिक बना दिया। इसके बाद अदम गोंडवी की प्रसिद्ध रचना चमारों की गली का गायन हुआ। आइए महसूस करिए जिन्दगी के ताप को। मैं चमारों की गली तक ले चलूंगा आपको॥

इस एक घंटे की संगीतमय प्रस्तुति ने दलित शोषित समाज की जिस कष्टप्रद और शोचनीय परिस्थिति की जिन्दा तस्वीर पेश की उसको और गहनता से महसूस कराया कार्यक्रम के अगले चरण में प्रस्तुत नुक्कड़ नाटक ‘सात हजार छः सौ छियासी’ ने।

clip_image001 clip_image002
clip_image003 clip_image004

प्रोबीर गुहा निर्देशित नुक्कड़ नाटक७६८६

विश्वविद्यालय के फिल्म व थिएटर विभाग के विद्यार्थी कलाकारों द्वारा इसे कोलकाता के नाट्य समूह ‘अल्टरनेटिव लिविंग थिएटर’ के प्रोबीर गुहा के नाट्य निर्देशन में प्रस्तुत किया गया। श्री गुहा वि.वि. के गेस्ट फैकल्टी हैं जो कुछ दिनों के लिए यहाँ आये हुए थे। महाराष्ट्र में कपास किसानों द्वारा बड़ी संख्या में की जा रही आत्महत्या के पीछे जो सामाजिक-आर्थिक कारण हैं उन्हें समझाने का यह बहुत ही प्रभावशाली प्रयास था।  भयंकर गरीबी के बीच नैसर्गिक जिजीविषा से प्रेरित किसान अपनी जमीन पर कपास उगाने में खाद, बीज और कीटनाशक के लिए आने वाली तमाम कठिनाइयों से लड़ता हुआ, पूँजीपतियों, ऋणदाता बैंको, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों, भ्रष्ट नौकरशाहों, विपरीत मौसम और पर्यावरण की तमाम समस्यायों से जूझता हुआ जब अपना तैयार माल बाजार में बेंचने ले जाता है तो वहाँ लालची दलालों के हाथों पड़कर अपना सर्वस्व लुटा देता है। ऐसे में जब यह रिपोर्ट आती है कि विदर्भ क्षेत्र में ७६८६ किसानों ने आत्महत्या कर ली तो मात्र कुछ दिनों के लिए हाहाकार मचता है। उसके बाद स्थिति जस की तस हो जाती है।

चौदह अप्रैल की वह शाम मेरे लिए अभूतपूर्व अनुभवों वाली साबित हुई। एक के बाद एक उम्दा कार्यक्रमों को देखने-सुनने का मौका पाकर मुझे वहाँ कुछ और दिन रुकने का मन हो चला लेकिन ये मुई सरकारी नौकरी इतने भर की छुट्टी भी बड़ी मुश्किल से देती है। हम अगले दिन विश्वविद्यालय के नवनिर्मित प्रशासनिक भवन, पुस्तकालय व विभिन्न विद्यापीठ देखने टीले के ऊपर गये। DSC02667 वित्त अधिकारी मो.शीस खान से मिलने के बाद हम अन्त में कुलपति जी के कार्यालय में गये। आधुनिक सुविधाओं और संचार साधनों  से लैस कार्यालय में कुर्ता पाजाम पहनकर श्री विभूति नारायण राय एक साथ दक्षता, सादगी और कर्मठता का परिचय दे रहे थे। इस शुष्क टीले को हरा-भरा करके उसपर स्थापित अनेक उत्कृष्ट विद्यापीठों में पठन-पाठन व शोध सम्बन्धी गतिविधियों को गति प्रदान करने का जो कार्य आपने शुरू किया है वह किसी भगीरथ प्रयत्न से कम नहीं है।

हमने उनकी मेज पर रखे कम्प्यूटर से अपने रेल टिकट का पी.एन.आर. स्टेटस जाँचा और टिकट कन्फ़र्म होने की खुशी का भाव लिए  उनसे विदा लेकर विनोद जी के साथ सेवाग्राम स्टेशन के लिए चल पड़े।

(समाप्त)

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

 

Technorati Tags: ,

सोमवार, 26 अप्रैल 2010

वर्धा में हमने जो देखा वह अद्‌भुत है…

 

सेवाग्राम स्टेशन का निकास द्वाररेलगाड़ी के ठण्डे कूपे से निकलकर बैशाख की चिलचिलाती धूप में जब हम सेवाग्राम स्टेशन पर उतरे तो पल भर में माथे पर पसीना आ गया। पत्थरों और कंक्रीट की इमारतों के बीच हरियाली बहुत विरल थी। तराई क्षेत्र का रहने वाला हूँ इसलिए यह इलाका कुछ ज्यादा ही उजाड़ और वीरान लग रहा था। गर्मी के कारण लोग खुले स्थानों पर प्रायः नहीं थे। स्टेशन से बाहर आकर हमें प्रतीक्षा करती गाड़ी मिल गयी जो काफी देर से धूप में खड़ी रहने के कारण भट्ठी जैसी गरम हो चुकी थी। स्टार्ट होने के बाद इसका ए.सी. चालू हुआ तो एक-दो मिनट में राहत मिल गयी।

सेवाग्राम से वर्धा विश्वविद्यालय की दूरी करीब छः किलोमीटर है। रास्ते में इक्का-दुक्का लोग ही दिखे। हमारे इलाहाबाद की तरह सड़क किनारे लगे लाई-चना-चुरमुरा के खोमचे, खीरा-ककड़ी बेचती औरतें, कच्चे आम का पना बेंचते ठेलेवाले या तरबूज-खरबूज के ढेर लगाकर बैठे कुजड़े वहाँ नहीं दिखे। वर्धा शहर को बायपास करती सड़क से होकर जब हम प्रायः निर्जन इलाके की ओर बढ़ चले तो मेरे मन में उत्सुकता का स्थान व्याकुलता ने ले लिया। गर्म हवा की लपटें सड़क पर दूर चमकते तारकोल से यूँ उठती दिख रही थीं जैसे नीचे किसी हवन कुण्ड में आग जल रही हो। आखिरी मोड़ पर जब गाड़ी मुड़ी तो एक ऊँचे से टीले की ढलान पर सफेद पेण्ट से “महात्मा गांधी अन्तर राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय-वर्धा” बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा हुआ दिखायी पड़ा। अपनी मंजिल के प्रथम साक्षात्कार का यह दृश्य अद्‍भुत लगा।

लेकिन यह शुष्क टीला अपनी तरह का अकेला नहीं था। आस-पास चार-पाँच टीले ऐसे ही दिखायी पड़े जो कदाचित्‌ प्रकृति के कृपापात्र नहीं हो पाये थे। प्रायः वनस्पति विहीन और पथरीले भूभाग पर उठे हुए ये नंगे-ठिगने पहाड़ प्रकृति पर मानव की सत्ता स्थापित होने की कहानी कह रहे थे। इनके शीर्षतल पर जाने के लिए चट्टानों को काटकर बनायी गयी सर्पिल सड़क के किनारे करीने से सजाये गये गमले, शिक्षा संकाय के लिए हाल ही में बने भव्य विद्यापीठ, पुस्तकालय व अन्य मानवनिर्मित भवनों को अन्तिम रूप देती मशीनें और मजदूर, बिजली के खम्भे और उनपर दौड़ती केबिल में प्रवाहित होती विद्युत धारा, निर्माणाधीन पानी की टंकी, पंक्तिबद्ध रोपे गये नये पौधे और उन्हें पानी देने के लिए मीलों दूर से लायी हुई पाइपलाइन  यह बता रही थी कि इस निर्जन पहाड़ पर मानव ने मेधा को तराशने का कारखाना बनाने का मन बना लिया है।


View Larger Map गूगल अर्थ की उपग्रह तस्वीर में पंचटीला(वर्धा) की पाँच साल पुरानी स्थिति जो अब बहुत बदल गयी है

भव्य तोरणद्वार से प्रवेश कर हमारी गाड़ी फादर कामिल बुल्के अन्तरराष्ट्रीय छात्रावास की सीढ़ियों के पास जाकर रुकी तो बाहर निकलने पर गर्म पत्थर से आँच निकलती सी महसूस हुई। सीढ़ियाँ चढ़कर हम ऊँचे चबूतरे पर पहुँचे। आधुनिक वास्तुकला का सुन्दर नमूना पेश करता हुआ यह भवन भी हाल ही में तैयार हुआ जान पड़ा क्योंकि गूगल अर्थ पर मैने इस प्रांगण को देखने की जो कोशिश की थी उसमें इसका कोई अता-पता नहीं था। इस छात्रावास को फिलहाल गेस्ट हाउस के रूप में भी प्रयोग किया जा रहा है।

दोपहर के दो बजे होंगे जब हम अपने लिए निर्धारित कमरे में पहुँचे। कूलर की ठण्डी हवा मिलते ही हम बिस्तर पर पसर तो गये, लेकिन लम्बी यात्रा के बाद स्नान किए बिना पड़े रहना रास नहीं आया। वहाँ का बाथरूम तो सुसज्जित था लेकिन छत पर रखी टंकी का पानी अपने क्वथनांक के करीब पहुँच चुका था। हमारे पास ‘स्टीम बाथ’ के अतिरिक्त कोई अन्य विकल्प भी नहीं था इसलिए हमने कम से कम पानी खर्च करने का पाठ तत्काल सीखते हुए उसपर अमल भी कर लिया और सज सवँरकर तैयार हो लिए। हमें बताया गया कि मनीषा जी एक-दो घण्टे के भीतर ही वापस आगरा के लिए निकलने वाली हैं। उनसे मिलना तो हमारे प्रमुख उद्देश्यों में से एक था।

हमने उनका फोन मिलाया तो पता चला कि इस इलाके में बी.एस.एन.एल. की सेवाएं बहुत अच्छी नहीं हैं। दूसरे सिरे पर स्थित व्यक्ति के अतिरिक्त दूसरी तमाम आवाजें आ रही थीं लेकिन मनीषा जी अन्त तक यह नहीं बता सकीं कि वे दस-पन्द्रह मिनट में गेस्ट हाउस पहुँचने वाली हैं। खैर, उनकी एक सहयोगी ने बताया कि वो बस आने ही वाली हैं। वन्दना मिश्रा, मनीषा कुलश्रेष्ठ और...मैं

मनीषा जी, यानि मनीषा कुलश्रेष्ठहिन्दीनेस्ट.कॉम की मालकिन और प्रतिष्ठित लेखिका, कवयित्री और सम्पादक। उनकी सहयोगी यानि वन्दना मिश्रा। लखनऊ में रहकर आपने तमाम पुस्तकों का प्रकाशन किया है। प्रसिद्ध लेखक और पत्रकार स्व. अखिलेश मिश्र जी की पुत्री वन्दना जी उस कोर ग्रुप की सदस्य हैं जो विश्वविद्यालय की साहित्यिक वेबसाइट हिन्दीसमय.कॉम की सामग्री के चयन और प्रकाशन के लिए उत्तरदायी है। इस कोर ग्रुप के तीसरे सदस्य अनहद नाद वाले अपने प्रिय ब्लॉगर आदरणीय प्रियंकर जी हैं जो उस समय कोलकाता से इस समिति की बैठक के लिए आये हुए थे। हिन्दी साहित्य के दस लाख पृष्ठ अन्तर्जाल में एक ही पते पर अपलोड करने की महत्वाकांक्षी योजना को कार्यरूप देने के लिए विश्वविद्यालय द्वारा इन विभूतियों को एक साथ सिर जोड़कर कार्य करने हेतु आमन्त्रित किया गया है। इतने कम समय में यह जालस्थल कितनी दूरी तय कर चुका है उसे आप वहाँ जाकर देख सकते हैं।

मनीषा जी अपनी सद्यःप्रकाशित पुस्तक शिग़ाफ लेकर आयी थीं। मैने उन्हें सत्यार्थमित्र की एक प्रति भेंट की। वन्दना जी का एक कविता संग्रह अनामिका प्रकाशन से छपकर शीघ्र ही आने वाला है। मेरे साथ अनामिका प्रकाशन के मालिक विनोद शुक्ला जी ही थे। उन्होंने वन्दना जी और मनीषा जी के साथ फटाफट मेरा फोटो सेशन करा दिया। पुस्तक प्रकाशन के बाजार से लेकर विश्वविद्यालय की अन्तर्जाल सम्बन्धी प्रकाशन योजना पर विस्तृत चर्चा हुई। कुछ देर में ट्रेन का समय नजदीक आया और हम मनीषा जी को विदा करके गेस्ट हाउस की कैण्टीन की ओर चाय लेने चल दिए।

शुद्ध दूध की गाढ़ी चाय बड़े से कप में लबालब भरी हुई आ गयी। वहाँ पहले से ही एक प्रोफ़ेसर साहब बैठकर चाय की चुस्कियाँ ले रहे थे। मुझे उनका चेहरा परिचित सा जान पड़ा। मैने दरियाफ़्त की तो पता चला कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय से सेवा निवृत्त अंग्रेजी के प्रो.सचिन तिवारी जी हैं। हम करीब पन्द्रह साल पहले मिले थे जब वे कैम्पस थियेटर चलाते थे और मैं पत्रकारिता का विद्यार्थी हुआ करता था। कैण्टीन में राजकिशोर जी मिलेइसी बीच एक छोटेकद के श्यामवर्ण वाले भयंकर बुद्धिजीवी टाइप दिखने वाले महाशय का पदार्पण हुआ। उन्होंने बैठने से पहले ही कैन्टीन के वेटर से कहा कि मुझे बिना चीनी की चाय देना और दूनी मात्रा में देना। यानि कप के बजाय बड़ी गिलास में भरकर। मुझे मन ही मन उनकी काया के रंग का रहस्य सूझ पड़ा और सहज ही उभर आयी मेरे चेहरे की मुस्कान पर उनकी नजर भी पड़ गयी। मैने झेंप मिटाते हुए उनका परिचय पूछ लिया।

वे तपाक से बोले- “मुझे राजकिशोर कहते हैं… दिल्ली से आया हूँ। आप कहाँ से…?”

मेरे यह बताने पर कि मैं इलाहाबाद से आया हूँ और वहाँ कोषाधिकारी हूँ, उन्होंने सीधा सवाल दाग दिया- “अच्छा, ये बताइए कि ट्रेजरी में भ्रष्टाचार की स्थिति अब कैसी है?”

यदि मैं शुद्ध सरकारी अधिकारी होता तो शायद इसका जवाब देना थोड़ा कठिन होता लेकिन समाज के दूसरे पढ़े-लिखे वर्ग से भी सम्पर्क में होने के कारण मैने इसका कुछ दार्शनिक सा उत्तर दे दिया। मैने यह भी बताया कि कम्प्यूटर और सूचना प्रौद्यौगिकी के प्रयोग से अब मनुष्य के हाथ का बहुत सा काम मशीनों को दे दिया गया है इसलिए भ्रष्टाचार करने के अवसर ट्रेजरी में कम होते गये हैं। फिर भी जहाँ अवसर उपलब्ध है वहाँ प्रयास जारी है। लेकिन इस मानवसुलभ प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने के प्रयास भी साथ-साथ जारी हैं।

राजकिशोर जी ने इस चर्चा का उपसंहार यह कहते हुए कर दिया कि अब इस मुद्दे को छोड़िए, इसमें कोई दम नहीं बचा है, महंगाई बहुत बढ़ गयी है। मुझे तबतक यह पता चल चुका था कि आज शाम छः बजे गांधी हिल्स पर राजकिशोर जी ‘सभ्यता के भविष्य’ पर अपने विचार व्यक्त करने वाले हैं। गांधीजी की प्रिय बकरीयह सुखद संयोग ही था कि जिनके लेख हम चोखेर बाली और हिन्दी भारत जैसे जालस्थलों पर तथा अनेक पत्र पत्रिकाओं में पढ़ते आ रहे थे उन्हें सजीव सुनने का अवसर मिलने जा रहा था। वार्ता का समय होने तक हम कैण्टीन में ही बात करते रहे और फिर गाड़ी हमें टीले की चोटी पर ले जाने के लिए आ गयी। 

मुख्य टीले पर जाने के लिए जो घुमावदार सड़क बनी हुई है उससे ऊपर पहुँचने पर सड़क की बायीं ओर विकसित किये जा रहे उद्यान में एक बकरी की सुन्दर अनुकृति स्थापित की गयी है। कदाचित्‌ वहाँ गांधी जी के प्रिय पात्रों और उनके उपयोग की वस्तुओं को जुटाने का प्रयास किया गया है। वहीं थोड़ा आगे बढ़ने पर गांधी जी की आदमकद प्रतिमा उनके तीन प्रिय बन्दरों के साथ स्थापित है। हमारे पास उन सबको देखने का समय उस समय नहीं था। हमने सभास्थल पर पहुँचकर विश्वविद्यालय के कुलपति जी से मुलाकात की। कुशल-क्षेम के बाद हम राजकिशोरजी की वार्ता सुनने के लिए गोलाकार सीढ़ीनुमा चबुतरे पर बैठ गये। अर्द्धवृत्ताकार दर्शकदीर्घा के ठीक सामने खड़े लैम्प-पोस्ट के नीचे वार्ताकार का चबूतरा बना था। खुले आकाश के नीचे टीले की चोटी पर बना यह मुक्त गोष्ठी स्थल महानगरीय सभ्यता की शोरगुल भरी भागमभाग जिन्दगी से बिल्कुल अलग एक सुरम्य वातावरण सृजित कर रहा था। इस स्थान पर बैठकर ‘सभ्यता के भविष्य’ के बारे में चिन्तन करते लोग मुझे बहुत भले लगे।

सभ्यता का भविष्ययद्यपि अपनी वार्ता में राजकिशोर जी ने जिस कम्यून पद्धति की ओर लौटने की बात की और वर्तमान उदारवादी लोककल्याणकारी जनतंत्रात्मक राज्य को पूँजीवादी सत्ता करार देते हुए पूरी तरह नकारने योग्य ठहराने का प्रयास किया उससे मैं सहमत नहीं हो सका लेकिन देश के कुछ बड़े बुद्धिजीवियों द्वारा विश्वविद्यालय के छात्रों के बीच बैठकर इस प्रकार की चर्चा करना बहुत सुखद और आशाजनक लगा। उस छोटी सी दर्शक दीर्घा में कुलपति विभूति नारायण राय के साथ दिल्ली से पधारे हिन्दी के प्रतिष्ठित हस्ताक्षर प्रो. अब्दुल बिस्मिल्लाह, हैदराबाद के प्रो. सुवास कुमार, और विश्वविद्यालय संकाय के प्रो.सूरज पालीवाल व अन्य अनेक आचार्यगण मौजूद थे। राजकिशोर जी ने अपने विशद अध्ययन और दुनियाभर के अनुभवों को यहाँ बाँटते हुए बहुत सी बाते बतायीं जो जन संचार और पत्रकारिता के विद्यार्थियों का दृष्टिकोण प्रभावित करने वाली थी। एक छात्र द्वारा पूरी वार्ता की वीडियो रिकॉर्डिंग भी की गयी जो उनके लिए प्रायोगिक प्रशिक्षण के तौर पर अपेक्षित था।सभ्यता का भविष्य बताते राजकिशोर जी

शाम को कुलपति जी ने हमें डिनर साथ लेने के लिए आमन्त्रित किया। वहाँ पर एक बार फिर बौद्धिक चर्चा शुरू हो गयी। साहित्य, समाज, राजनीति, कला,और शेरो शायरी से भरी हुई वह चर्चा रिकॉर्ड करने लायक थी लेकिन मैं उसके लिए पहले से तैयारी नहीं कर सका था। इसी बीच मशहूर शायर और गीतकार शहरयार का फोन कई बार आता रहा और वहाँ उन्हें आज के जमाने का सबसे बड़ा शायर बताया जाता रहा। प्रो. अब्दुल बिस्मिल्लाह से प्रो. सचिन तिवारी ने सलमान रुश्दी की किताब शैतानी आयते (satanic verses) के बारे में कुछ सवाल किए। उनके जवाब पर काफ़ी देर तक बहस होती रही। पूरा ब्यौरा यहाँ देना सम्भव नहीं है, लेकिन उस परिचर्चा में शामिल होकर हमें बहुत आनन्द आया। अन्त में यह कड़ी समाप्त करने से पहले अब्दुल बिस्मिल्लाह जी द्वारा सुनाये और समझाए गये एक शेर की चर्चा करना चाहता हूँ।

वर्धा में सूर्योदय (१४ अप्रैल,२०१०)बुझा जो रौजने जिन्ना तो हमने समझा है

कि तेरी मांग सितारों से भर गयी होगी।

चमक उठे जो सलासिल तो हमने जाना है

कि अब सहर तेरे रुख पर बिखर गयी होगी॥

हमारे अनेक सुधी पाठक इस शेर से परिचित होंगे। यदि कोई अपनी टिप्पणी के माध्यम से इसके शायर का नाम बताते हुए इसका सन्दर्भ-प्रसंग बताना चाहे तो मुझे बहुत खुशी होगी। अगली कड़ी में इसकी चर्चा के बाद मैं बताऊंगा कि अगले दिन अम्बेडकर जयन्ती के अवसर पर मुझे वहाँ क्या कुछ चमत्कृत करने वाले अनुभव हुए। अभी इतना ही… प्रतीक्षा कीजिए अगली कड़ी का।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी) 

सोमवार, 15 फ़रवरी 2010

बुद्धू सा खड़ा मैं…।

 

ब्लॉग जगत की हलचल से अलग रहते हुए अपनी सरकारी नौकरी बजाने में ही हलकान हो जाने पर मैने मन को समझा लिया कि इसमें बहुत परेशान होने की जरूरत नहीं है। ऑफ़िस से लौटकर घर आने के बाद शर्ट की बटन खोलने के पहले कम्प्यूटर का बटन ऑन करने की आदत पड़ गयी थी। उसे बड़े जतन से बदल लिया है। आलसी की कुर्सी खाली देख उसे ही हथिया लिया है मैंने।

अहा, निष्क्रियता के भी क्या मजे हैं…! क्या हुआ जो नयी पोस्ट डाले हफ़्ते से ज्यादा हो गये…? क्या फ़र्क पड़ता है जो गूगल रीडर में सैकड़ों पोस्टें पढ़े जाने का इन्तजार कर रहीं हैं…?  मेरी श्रीमती जी जो कम्प्यूटर से मेरी इस बढ़ती दूरी से मन ही मन प्रसन्न रहने लगी थीं, उन्होंने भी लम्बे ब्रेक के लिए टोक दिया तो क्या हुआ..!  मैं तो बस आराम से आराम करने की जिद पर अड़ा अकर्मण्यता के मजे ले रहा था।

मेरा बेटा जो बैट-बॉल के खेल में मुझे अनायास पाकर हर्षित हो रहा था उसने भी अन्ततः मुझे ‘कम्प्यूटर पर पढ़ाई’ करने की सलाह दे डाली। बेटी की परीक्षा की तैयारियों में मेरी अचानक बढ़ती रुचि से वह भी हैरत में पड़ गयी- “डैडी, तुम्हें अब कुछ पोस्ट नहीं करना है?”  लेकिन मैं तो अपने मस्तिष्क को कोई कष्ट देने के मूड में ही नहीं था। ऑफिस के काम से ही दिमाग का दही बन जाय तो घर पर उसकी लस्सी घोंटने की हिम्मत कहाँ बचती है? सोच रहा था कि अब मार्च बीतने तक ऐसा ही रहने वाला है।

अब हम ज्ञान जी जैसी खोजी शक्ति से सम्पन्न तो हैं नहीं कि जहाँ नजर उठायी वहीं से एक पोस्ट का माल जुटा लिया। कुछ अच्छा और नया लिखने के लिए जो पैनी नजर, सृजनात्मकता और घ्राण शक्ति चाहिए वह तो मुझमें  सीमित ही है। केवल उत्साह के दम पर कबतक आस-पास की सर्वविदित बातें ठेलते रहेंगे? हिन्दी चिट्ठों पर भाई लोग कितना कुछ तो लिख रहे हैं। मेरे लिए कुछ छोड़ें तब न…। मन को यही सब समझा-बुझाकर अपनी निष्क्रियता के आनन्द सागर में गोते लगाते हुए मैं दिन काट रहा था तभी ये मुंआ वेलेन्टाइन आ धमका…।

एक दिन पहले से ही तार टूट जाने से मेरे सरकारी मुहल्ले की बिजली गुल थी। किसी ने कॅम्प्लेन्ट नहीं दर्ज करायी क्योंकि साहब लोगों के घर बिजली का आना जाना जल्दी पता ही नहीं चलता। जब रात में इन्वर्टर जवाब दे गया तो पता चला कि बिजली दस घण्टे से गुल थी। कम्प्यूटर भी घूल धूल से नजदीकियाँ बढ़ा रहा था।

सुबह सुबह जब मोबाइल पर ‘एसेमेस’ आने लगे तो हम उन्हें मिटाने लगे। कई तो बिना पढ़े ही। फिर एक फोन आया- एक पुरानी साथी का था।

“हैप्पी वेलेन्टाइन डे”

“थैंक्यू- सेम टू यू…” मैने अचकाते हुए कहा फिर झेंप मिटाते हुए बोला, “अरे, बहुत दिन बाद… अचानक आज के दिन? सब खैरियत तो है?”

“क्यों, ऐसे क्यों पूछ रहे हैं… विश नहीं कर सकते क्या?”

“क्यों नहीं, जरूर करिए… अधिक से अधिक लोगों को कर डालिए, प्यार तो बहुत अच्छी चीज है…”

सामने से मुस्कराती हुई श्रीमती जी ने पूछा किसका फोन है। मेरे जवाब देने से पहले उधर से लाइन कट गयी। फिर मैं यूनिवर्सिटी के दिनों की बातें बताने लगा। कई बार बता चुका था फिर भी नये सन्दर्भ में बताना पड़ा। अब दिनभर सण्डे टाइप काम-धाम होते रहे। तेल में तली हुई लज्जतदार बाटी और आलू-बैगन-टमाटर का भर्ता व चने की तड़का दाल बनी। चटखारें ले-लेकर खाया गया। बनाने वाली की बड़ाई की गयी।

शाम को एक भाभी जी का मेसेज आया। वही भगत सिंह को फाँसी दिए जाने की तिथि को भुलाकर वेलेण्टाइन मनाने को लानत भेंजने वाली। श्रीमती जी ने मुझे दिखाया। मुझे बात खटक गयी। उस समय भौतिकी के एक सेवा निवृत्त प्रोफ़ेसर मेरे घर आये हुए थे। उनसे चर्चा हुई। मैने याद करके बताया कि फाँसी मार्च में हुई थी। उन्होंने समर्थन किया। यह भी कि गान्धी जी को इसके बाद लाहौर जाते समय रास्ते में बहुत गालियाँ पड़ी थी कि उन्होने लॉर्ड इर्विन से समझौते के समय फाँसी की माफी नहीं मांगी। मैने रचना से कहा कि नेट खोलकर चेक कर लो। ये नेट पर तो आयीं लेकिन अपनी ताजी पोस्ट की टिप्पणियाँ देखने लगीं।

जी-मेल पर गिरिजेश भैया मिल गये। चैट पर उनसे ही सवाल दाग दिया- भगत सिंह को फाँसी कब हुई? जवाब आया- २३ मार्च। उसके बाद ‘धन्यवाद’ टाइप करने के बजाय इन्होंने गलती से ‘0’ छाप दिया। भइया ने समझा कि परीक्षा में उन्हें शून्य अंक मिला है। उन्होंने लिखा- मुझे तो यही पता है, सही जवाब आप बताइए।

इसी समय प्रोफ़ेसर साहब को विदा करके मैं कमरे में आया। चैट की कमान मैने सम्हाल ली और विकीपीडिया से कॉपी-पेस्ट किया-  सरदार भगत सिंह (28 सितंबर 1907 - 23 मार्च 1931) और बात बिगड़ने से बच गयी, नहीं तो आज जेठ-भवइ के बीच कालिदास और विद्योत्तमा का शास्त्रार्थ शुरू होने वाला था। :)

उसके बाद मैने उन भाभी जी को फोन किया और उस मेसेज को दुरुस्त करने की सलाह दी। उन्होंने उस डॉक्टर मित्र को लानत भेंजी जिसने उन्हें यह मेसेज किया था और अधिकाधिक लोगों तक फॉर्वर्ड करने को भी कहा था। मैंने बाद में जब यही कुछ मानसिक हलचल पर देखा तो हैरान रह गया कि किसी एक खुराफ़ाती दिमाग ने कितने भले लोगों की वॉट लगा दी है।

बात ही बात में उन भाभी जी ने मुझे एक संकट में डाल दिया। पूछ लिया कि ‘आपने किसी को वेलेण्टाइन विश किया कि नहीं…।’ मैने झटसे ईमानदारी पूर्वक कह दिया – ‘नहीं’ और यह भी जोड़ दिया कि ‘मेरी तो कोई वेलेण्टाइन है ही नहीं’

लीजिए साहब, सामने खड़ी श्रीमती जी की गहरी मुस्कराहट देखकर मैं घक्‌ से रह गया। मेरी इस सपाटबयानी को जरूर निराशापूर्ण अर्थ में ग्रहण कर लिया गया होगा। सोचने लगा- अब इन्हें कैसे समझाऊँगा…???

तभी भाभी जी ने यह पूछ कर मेरा काम आसान कर दिया- “क्यों? आपकी इतनी अच्छी पत्नी हैं …उन्हें?”

DSC00245 “वो मेरी वेलेण्टाइन कैसे हुई? वो तो मेरी मलकाइन (मालकिन) हैं। उनकी जो हैसियत है उसके पासंग भर भी कोई वेलेण्टाइन नहीं हो सकती… आप सागर  की तुलना एक छोटे तालाब से कर रही हैं। …हम उनसे जो पाते हैं वह कोई वेलेन्टाइन क्या दे पाएगा? …हम एक दिन के चोंचले में विश्वास नहीं करते, हम तो रोज उस अन्दाज में जीते हैं जिसकी आज के दिन पार्कों और क्लबों में घूमने वाले तमाम कृत्रिम जोड़े कल्पना भी नहीं कर सकते।” इस बीच रचना चाय के खाली कप समेटकर वहाँ से जा चुकी थीं।

शाम को मुझे कम्प्यूटर पर बैठने की प्रेरणा हुई। सफ़ेद घर पर बाल्टिआन बाबा को कड़ाही चढ़ायी जा रही थी। गुरुदेव की पोस्ट पर भगत सिंह की फाँसी का मेसेज चिठ्ठाजगत में भी खुराफ़ात करता दिखायी पड़ा। लेकिन उनकी पोस्टेरस की नयी उड़ान और मोबाइल ब्लॉगिंग की हाइटेक शुरुआत की बात पढ़कर मुझे हीनता ग्रन्थि ने घेरना शुरू कर दिया। उसके बाद मैं पहुँचा- आलसी के चिट्ठे पर।

यहाँ जो लिखा हुआ पाया उसे पढ़ने के बाद तो मेरा कान गरम हो गया। रे सिद्धार्थ, लानत है तुझपर। देख, अपनी जीवन संगिनी को देखने का सही ढंग। उस चलते फिरते स्तम्भ को तू क्यों न देख पाया? बड़ा अपने को शब्दशिल्पी समझता रहा। दूसरे भी तुम्हारी शब्दसम्पदा की प्रशंसा करते रहे… लेकिन तुम तो पाजी निकले। तुमसे यह सब क्यों न लिखा गया?

मैने यहाँ लौटकर बहुत कोशिश की कुछ लिखने की। अपने हृदय की गहराइयों में बहुत नीचे तक उतरकर उसे पकड़ने की कोशिश की लेकिन मैं उसे बाहर निकाल नहीं पाया। शब्द बेगाने होकर साथ छोड़ गये हैं। पिछले ग्यारह साल के साथ को याद करके उसकी गर्माहट और आश्वस्ति महसूस तो कर सकता हूँ लेकिन चाह कर भी लिख नहीं पा रहा। जैसे मूढ़मति होकर बहती हुई गंगा की धारा के बीच आँखें बन्द किए खड़ा हूँ। बुद्धू सा।

किनारे एक बड़ा सा बोर्ड लगा है- गंगे तव दर्शनार्थ मुक्तिः।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

शनिवार, 19 सितंबर 2009

ब्लॉगिंग का राष्ट्रीय सेमिनार जो आज हो न सका...

 

यदि तिथि बदली न होती और कार्यक्रम अपरिहार्य परिस्थितियों में टला न होता तो मैं आज १९ सितम्बर को इलाहाबाद में देश के अनेक मूर्धन्य चिठ्ठाकारों का दर्शन लाभ पाकर अभिभूत हो रहा होता। हिन्दी दिवस, हिन्दी सप्ताह, हिन्दी पखवारा, और हिन्दी मास की चर्चा-गोष्ठियों में आजकल जो कुछ हम पढ़-सुन रहे हैं उनमें इस महागोष्ठी की खूब चर्चा हो रही होती।

हिन्दी ब्लॉगों में जो बहसें आजकल नमूँदार हुई हैं उन्हें देखकर मन में अभी से लड्डू फूट रहे हैं। जब पुनः निर्धारित तिथि पर वाकई सेमिनार होगा तब इन महानुभावों के मुखारविन्दु से साक्षात्‌ ऐसी बातें सुनकर कैसा लगेगा? क्या एक दूसरे के बारे में हम वैसा ही कह-सुन पाएंगे जैसा इस आभासी संसार में अपने घर के भीतर बैठे-बैठे दूसरों के बारे में टिप्पणी या पोस्ट के माध्यम से ठेल देते हैं? बेनामी महात्माओं द्वारा जो घटियागीरी यहाँ दिखायी जाती है या फर्जी नाम वाले जैसी खरी-खरी यहाँ कह जाते हैं, क्या वहाँ भी साक्षात्‌ उपस्थित होकर मुँह खोलेंगे?

यहाँ अपने-अपने ज्ञान की शेखी बघारने वाले भी हैं, दूसरों को मूर्ख और पाजी समझने वाले भी हैं, भाषा को अपनी स्वतंत्र इच्छा का दास बनाने की चाह रखने वाले भी हैं, अपने लिखे को पत्थर की लकीर मानकर अड़े रहने वाले भी हैं, दूसरों की मौज लेने के फेर में अपनी मौज लुटाने वाले भी हैं, गलाफाड़ हल्ला मचाने के बाद धीरे-धीरे अनसुना कर दिए जाने के कारण अपना बोरिया-बिस्तर समेटकर दूसरे व्यापार में लग जाने वाले भी हैं, दूसरे की लकुटी-कमरिया लेकर इस घमासान में नये सिरे से बहादुरी दिखलाने वाले भी है, तुरत-फुरत कविता रचकर वाह-वाह कहलाने वाले भी हैं और रोज़बरोज़ पोस्ट का मसाला जुगाड़ने के लिए डिजिटल कैमरा लेकर मुँह अन्धेरे नदी-तट की सैर को निकल जाने वाले भी हैं। बहुत से धीर-गम्भीर साहित्यानुरागी, हिन्दी सेवी, कविहृदय, सामाजिक चिन्तक, व्यंग्यकार, विज्ञान अन्वेषी, तकनीक के जानकार सुधीजन भी हैं जो इस माध्यम को समृद्ध कर रहे हैं।

ऐसी रंगीन दुनिया के सितारे जब आज के दिन अपने स्थूल शरीर और सूक्ष्म मस्तिष्क के साथ एक छत के नीचे एक साथ बैठकर आपस में बातचीत करते तो नजारा क्या होता? लन्च और डिनर के बर्तन साथ खड़काते तो क्या आनन्द आता?

यूँ तो इस सेमिनार के विषय पहले ही तय किये जा चुके थे, और कई ख्यातिनाम चिठ्ठाकारों को उन विषयों को प्रस्तुत करने की तैयारी करके आने के लिए भी बोल दिया गया था, लेकिन ऐन मौके पर कौन क्या बोलना शुरू कर दे इसका कोई ठिकाना न होने से मन में अनिश्चय का भाव भी बना ही हुआ था। इससे मिलने वा्ले सुख का रोमान्च भी कम न था। अब तो प्रतीक्षा आगे बढ़ गयी है।

कुछ विचारणीय शीर्षक जो सत्र विशेष और वार्ताकार विशेष के लिए आदरणीय अनूप जी, अरविन्द जी और दूसरे आदरणीयों से विचार-विमर्श के बाद निर्धारित किए गये थे-

  1. हिन्दी चिठ्ठाकारी का  इतिहास, स्वरूप और तकनीक
  2. हिन्दी चिठ्ठाकारी की दिशाएं: विज्ञान, राजनीति, समाज, धर्म/दर्शन, मनोरंजन
  3. अन्तर्जाल पर हिन्दी साहित्य और इसकी पठनीयता : कविता, कहानी, व्यंग्य, रेखाचित्र, रिपोर्ताज, संस्मरण और आपबीती
  4. अन्तर्जाल पर हिन्दी भाषा के कुशल प्रयोग के औंजार, ब्लॉग बनाने और तकनीकी प्रबन्धन के तरीके
  5. हिन्दी ब्लॉग जगत की प्रमुख प्रवृत्तियाँ-
  • बहस के सामान्य मुद्दे
  • ब्लॉगिंग की  भाषा में शुद्धता बनाम सम्प्रेषणीयता
  • ब्लॉगजगत में गुटबन्दी और गिरोहबन्दी
  • अभिव्यक्ति की उन्मुक्तता और इसमें निहित खतरे
  • समूह ब्लॉगों की उपादेयता
  • चिठ्ठाकारी में समय प्रबन्धन
  • सामाजिक मुद्दों पर ब्लॉगजगत की प्रतिक्रियाएं
  • ब्लॉगजगत के कुंठासुर/बेनामी या छद्‍मनामी टिप्पणीकार
  • ब्लॉगजगत का आभासी परिवार और आन्तरिक गतिविधियाँ, ब्लॉगर कैम्प आदि।

ये सारी बातें मैं भूतकाल में कर रहा हूँ तो इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि सब कुछ खत्म हो गया।  आज यह सब मैं इस लिए बता रहा हूँ कि जो कार्यक्रम आज नहीं हो सका वह आगामी २४-२५ अक्टूबर को आयोजित किए जाने का निर्णय लिया जा चुका है।

महात्मा गान्धी अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा के कुलपति श्री विभूतिनारायण राय जी ने स्वयं इस सेमिनार की परिकल्पना करते हुए इसके आयोजन का प्रस्ताव रखा था। इलाहाबाद स्थित हिन्दुस्तानी एकेडेमी के साथ मिलकर इस राष्ट्रीय स्तर के आयोजन की रूपरेखा बनायी जा चुकी थी। अतिथि वार्ताकारों और प्रतिभागियों के नाम तय किए जा चुके थे, बस निमन्त्रण पत्र भेंजने की तैयारी हो रही थी तभी कुलपति जी को कतिपय अपरिहार्य परिस्थितियों ने कार्यक्रम की तिथि आगे बढ़ाने पर मजबूर कर दिया। उनका खेद प्रकाश प्राप्त करने के बाद हम कुछ समय के लिए हतप्रभ हो गये थे। लेकिन उन्होंने तत्समय ही अगली तिथि भी निर्धारित कर दी।

MGAHV-logo प्रतीक चिह्न

हमारा उत्साह फिर कम नहीं हुआ है। हम तो अगली निर्धारित तिथि की प्रतीक्षा कर रहे हैं, जब ऊपर गिनाए गये विषयों पर जोरदार सजीव बहस सुनने और देखने को मिलेगी। ब्लॉगजगत के अनेक भूतपुर्व और अभूतपूर्व लिक्खाड़ों से गलबहिंया डाले फोटू खिंचाने का मौका हाथ लगेगा। एक तरफ पारम्परिक साहित्य के पुरोधा होंगे तो दूसरी तरफ़ अन्तर्जाल पर बाइट बहाने और बटोरने वाले बटोही होंगे। आदरणीय कुलपति जी के औदार्य से कार्यक्रम का वित्तीय परिव्यय विश्वविद्यालय द्वारा वहन किया जाएगा तो हिन्दुस्तानी एकेडेमी का प्रांगण जो अबतक हिन्दी भाषा और साहित्य से जुड़ी प्रायः सभी भूतकालीन और वर्तमान विभूतियों का प्रत्यक्षदर्शी रहा है, अपनी गौरवशाली परम्परा और अहर्निश आतिथेय की भूमिका में पूरी निष्ठा से लगा होगा।

आप सभी अपनी रुचि के अनुसार मन ही मन तैयारी कर लीजिए। कार्यक्रम की सूक्ष्म रूपरेखा तैयार हो जाने और धनराशि का परिव्यय स्वीकृत हो जाने के बाद इसकी विधिवत घोषणा हिन्दुस्तानी एकेडेमी द्वारा अन्तर्जाल पर की जाएगी। मेरी तो इच्छा है कि जिस प्रकार इलाहाबाद के कुम्भमेला में सारा हिन्दुस्तान उमड़ पड़ता है उसी प्रकार यह कार्यक्रम भी एक विशाल ब्लॉगर महाकुम्भ साबित हो जाय। अन्तर्जाल की धारा में अपने-अपने घाट पर डुबकी लगाने वाले विविध चिठेरे प्रयाग की धरती पर आकर अपना अनुभव एक दूसरे से बाँटें और बाकी दुनिया को यह भी बतायें कि इक्कीसवीं सदी में संचार के क्षेत्र में जो तकनीकी क्रान्ति आयी है उसे हिन्दी सेवियों ने भी आत्मसात किया है और अब इस देवनागरी की पहुँच दुनिया के कोने-कोने में होने लगी है।

जब से यह कार्यक्रम टला मुझे निराशा ने ऐसा घेरा कि कुछ लिखते न बना। अब आज जब यह दिन भी बीत गया है तो इसकी चर्चा से ही बात शुरु कर सका हूँ। अभी इतना ही...।

आप सबको शारदीय नवरात्र की हार्दिक शुभकामनाएं और ईद मुबारक।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)