हमारी कोशिश है एक ऐसी दुनिया में रचने बसने की जहाँ सत्य सबका साझा हो; और सभी इसकी अभिव्यक्ति में मित्रवत होकर सकारात्मक संसार की रचना करें।
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मंगलवार, 22 सितंबर 2015

आने वाले धन को रोकती हैं आपकी ये ‘बुरी आदतें’

टाइम्स ऑफ़ इंडिया में आध्यात्मिक और धार्मिक संदर्भों पर रोचक आलेख प्रकाशित करने वाला नियमित स्तंभ स्पीकिंग ट्री अब ऑनलाइन उपलब्ध है और इसका हिंदी संस्करण भी आ गया है, जिसमें अनेक बार ज्योतिष और शास्त्र के नाम पर अंधविश्वास और टोना-टोटका वाली सामग्री भी दिख जाती है। ऐसे में इनपर आँख मूँदकर विश्वास नहीं किया जा सकता। लेकिन आज एक सामग्री ऐसी मिली जिसके मूल संदेश पर अमल किया जाना चाहिए। भले ही बताये गये परिणाम पर भरोसा न हो। वैसे ही जैसे कि शराब के नशे में धुत्त कोई व्यक्ति यह सीख दे कि शराब पीना अच्छी बात नहीं है, इसके जीवन बर्बाद होता है, परिवार नष्ट हो जाता है, तमाम बीमारियाँ शरीर में घर बना लेती हैं, आदि-आदि; तो उसे यह झिड़की दे्ने के बजाय कि पहले अपना उपदेश खुद पर लागू करो, उसकी बात को प्रत्यक्ष उदाहरण के आधार पर सही माना जा सकता है। आइए जानते हैं कुछ जीवनोपयोगी बाते-

(स्पीकिंग ट्री से साभार)

यदि आप शास्त्रों में विश्वास रखते हैं तो वाकई शास्त्रों में वर्णित निर्देशों का पालन करते होंगे। लेकिन क्या आप जानते हैं कि यदि आप हर समय, हर दिन शास्त्रीय नियमों का पालन करेंगे, तो लाइफ इतनी आसान हो जाएगी कि आप समझ भी नहीं पाएंगे। लेकिन यदि आपको विश्वास नहीं भी है, तब भी आप एक बार शास्त्रीय नियमों का पालन करके देखें, अच्छे परिणाम आप खुद महसूस करने लगेंगे।

शास्त्रों के अनुसार, शास्त्रीय नियमों का पालन करने वाले लोग भी अनजान होकर दिनभर ऐसी कई गलतियां करते हैं, जो उन्हें नहीं करनी चाहिए। ऐसी आदतें मनुष्य को अशुभ फल देती हैं, और उसके आने वाले समय पर हावी भी होती हैं। शास्त्रों के अनुसार हमें सुबह उठने के बाद रात सोने तक ऐसी किसी भी बुरी आदत को अपनाना नहीं चाहिए, जो हमारे लिए अशुभ फल लाए।

जैसे कि कुछ लोगों की आदत होती है कि सुबह नहाने के बाद बाथरूम को गंदा छोड़ने की। ऐसे लोग फर्श पर गिरे पानी को साफ करना तो दूर, अपने गंदे कपड़े भी बाथरूम में छोड़कर बाहर चले आते हैं। शास्त्रों के अनुसार ऐसा करने से जातक की कुंडली में चंद्र का स्थान बुरा होता चला जाता है। इसलिए इससे बचने के लिए हमेशा अपने बाथरूम की सफाई करें।

बाथरूम वाली बुरी आदत के साथ लोगों की एक और आदत भी बहुत बुरी है, खाने के बाद जूठी प्लेट वहीं छोड़ जाने की। कुछ लोग तो खाना प्लेट में ही छोड़ भी देते हैं। लेकिन शास्त्रों की मानें तो प्लेट में रखा एक-एक अन्न ग्रहण करना चाहिए और साथ ही स्वयं प्लेट लेकर उसे साफ करना चाहिए। ऐसी मान्यता है कि खाना खाने के बाद जूठे बर्तनों को सही स्थान पर रखा जाए तो शनि और चंद्र के दोष दूर होते हैं। साथ ही, लक्ष्मी की प्रसन्नता भी मिलती है। तो आज से आप ध्यान रखेंगे ना इस बात का?

इसके अलावा घर की साफ-सफाई का भी ध्यान रखना जरूरी है। शास्त्रों के मुताबिक कहीं भी चप्पलें उतार देना और बिस्तर की चद्दर को अव्यवस्थित रखना एक बुरी आदत है। इसके कारण व्यक्ति की सेहत खराब रहती है। इसलिए हमेशा बिस्तर को साफ रखें, उसकी चद्दर समय-समय पर झाड़ लें। खासतौर पर रात को सोने से पहले जरूर साफ करें।

शास्त्रों के अनुसार देर रात तक जागना भी नियमों के विरुद्ध है। इससे चंद्र का अशुभ फल मिलता है, जो व्यक्ति की मानसिक स्थिति पर भी गलत प्रभाव करता है। इसलिए हमेशा समय से सो जाएं और सुबह समय से उठ भी जाना चाहिए।

एक और नियम, जो ना केवल शास्त्रीय संदर्भ से मानना चाहिए, बल्कि अपने आसपास सुखद वातावरण बनाने के लिए भी इस नियम का पालन करना महत्वपूर्ण है। हमें कभी ऊंची आवाज़ में बात नहीं करनी चाहिए। इससे हमारे आसपास के लोग तो परेशान होते ही हैं, साथ ही हमारी सेहत पर भी इसका असर होता है।

ऊंचा बोलने के अलावा कुछ लोगों की बेवजह इधर-उधर थूकने की भी आदत होती है। यदि आप ऐसा करते हैं तो लक्ष्मी जी कभी आप पर कृपा नहीं करेंगी। इसीलिए इधर-उधर थूकने से बचना चाहिए, इस काम के लिए निर्धारित स्थान का ही उपयोग करना चाहिए।

[उक्त छोटी-छोटी बातों का पालन करना एक सभ्य और संस्कारित व्यक्ति की पहचान होते हैं। इसलिए शास्त्र के नाम पर बिदकने वाले भी इसका पालन कर सकते हैं।]

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
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शनिवार, 20 जून 2015

गर्मी की छुट्टी में प्रोजेक्ट का बोझ

बच्चों के स्कूल की छुट्टियाँ अब समाप्त होने वाली हैं। लेकिन बच्चे छुट्टी का आनंद लेने के बजाय होमवर्क पूरा करने में लगे हैं।  जैसे-जैसे दिन नजदीक आ रहा है उनकी बेचैनी बढ़ती जा रही है। होमवर्क भी ऐसा जिसे अपने दम पर पूरा करना लगभग असंभव ही है। सभी विषयों में एक से एक बीहड़ प्रोजेक्ट पूरा करने हैं। इंटरनेट से सामग्री खोजकर कट-पेस्ट करने की तकनीक को छकाने के लिए ऐसे-ऐसे काम दे दिये गये हैं कि विद्यार्थी घर से बाहर निकलने को मजबूर हैं।
मेरी बेटी कई दिनों से सब्जी मंडी तक जाने की बात कर रही थी वह भी तब जब बाजार अपनी समाप्ति की ओर हो। पहले तो मैं समझ नहीं पाया लेकिन बाद में पता चला कि उसे इस बात का पता लगाना है कि सब्जी-मंडी में जो उच्छिष्ट पदार्थ बचते हैं, अर्थात्‌ फुटकर विक्रेता द्वारा आढ़त से थोक में लाकर सब्जियों की कटाई-छटाई करने के बाद जो कूड़ा बचता है उसका निस्तारण कैसे होता है। इसी प्रकार मोटर वर्कशॉप में जो गंदगी निकलती है उसका निपटान कैसे किया जाता है, यह जानने के लिए उसे किसी गैरेज़ में देखने जाना है। यह सब देखकर उसका आँखो देखा हाल बताने का काम दिया गया है। गनीमत है कि अस्पतालों और नर्सिंग होम्स के कूड़ेदानों की रिपोर्ट नहीं माँगी गयी है।
मैं तो इन पब्लिक स्कूल के शिक्षकों की कल्पनाशीलता का कायल हो गया हूँ जो ऐसे-ऐसे होमवर्क ईजाद कर डालते हैं कि बच्चे का पूरा घर इसे पूरा करने में लग जाता है। बड़ी दीदी, भैया, चाचा, बुआ, पड़ोस की आंटी, अंकल, जो मिल जाय मदद को उससे ही ले ली जाती है। यह एक अलग तरह की समाजिकता बढ़ा रहा है। महानगरों में तो प्रोजेक्ट पूरा करने के लिए प्रोफ़ेशनल दुकाने भी खुल गयी हैं। कोई मॉडल बनाना हो तो ऑर्डर कीजिए, तैयार मिलेगा। बस जेब में पर्याप्त पैसे होने चाहिए।
अपने दो-दो बच्चों का होमवर्क लिखने में थक चुकी मेरी एक पुरानी मित्र का कहना है कि एड्मिशन के समय जब बच्चे के माता-पिता का इंटरव्यू होता है तो उनकी योग्यता भी इसीलिए देखी जाती है कि वे अपने बच्चे का होमवर्क पूरा कर ले जाएंगे कि नहीं। न सिर्फ़ शैक्षिक योग्यता बल्कि आर्थिक मजबूती भी एक पैमाना होती है।
क्या कोई सरकार द्वारा एक ऐसा नियामक नियुक्त नहीं किया जा सकता जो इस मनमानी और बेतुकी व्यावसायिकता पर लगाम लगा सके और बच्चों की छुट्टियाँ घूमने-फिरने और मस्ती करने के लिए बचा सके?
मैं यहाँ आपको कुछ ऐतिहासिक सुल्तानों की पेंसिल-स्केच के साथ छोड़ जाता हूँ जो मेरी बेटी के एक अन्य प्रोजेक्ट का हिस्सा बने हैं। 

बहलोल लोदी

जलाल-उद्दीन ख़िलज़ी

क़ुतुब-उद्दीन ऐबक

तैमूर लंग

मुहम्मद बिन तुगलक
नोट :
इनकी चित्रों प्रमाणिकता उतनी ही है जितनी गूगलाचार्य के पिटारे में मौजूद है। बस वहाँ जो मिला उन्हें सामने रखकर हाथ से दुबारा बना दिया गया है। हो सकता है अब आगे कोई गूगल करे तो यहाँ से भी ये तस्वीरें उसके सामने आ जाँय।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
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शनिवार, 13 सितंबर 2014

बचपन के मीत का गीत…

आज मेरे बचपन के दोस्त संजय कुमार त्रिपाठी का जन्मदिन है। हम आठवीं से दसवीं कक्षा तक एक साथ पढ़े। उन तीन सालों में शायद ही कोई ऐसा दिन रहा हो जब कक्षा में हम एक साथ न बैठे हों। उस ग्रामीण विद्यालय में पढ़ने के लिए मैं अपने घर से दूर एक ‘क्‍वार्टर’ में रहता था जो वहाँ के इलाके में एक प्रतिष्ठित व्यक्ति के घर के बाहरी बरामदे का छोटा सा कमरा था। संजय अपने मामाजी के घर रहते थे जो बगल के गाँव में था। स्कूल के बाहर भी हम लोगों की पढ़ाई प्रायः एक दूसरे के संपर्क में रहते हुए ही होती थी। कभी-कभी मैं उनके मामाजी के घर जाकर रुक जाता था। कभी वे मेरे कमरे पर आ जाते थे; लेकिन रात में रुक नहीं सकते थे क्यों कि कमरा इतना बड़ा नहीं था। बोर्ड परीक्षा देने के लिए जब परीक्षा केन्द्र तीस किलोमीटर दूर निर्धारित हुआ तो वहाँ हम एक साथ रुके और परीक्षा में लगभग बराबर की सफलता प्राप्त करते हुए एक दूसरे से विदा हुए।

मैंने उस ग्रामीण विद्यालय के खराब माहौल से तौबा कर ली और पिताजी से जिद करके राजकीय इंटर कॉलेज में पढ़ने गोरखपुर चला आया। गोरखपुर से इलाहाबाद विश्वविद्यालय और वहाँ से लोक सेवा आयोग की दी हुई सरकारी नौकरी बजा रहा हूँ। उधर संजय ने उसी जनता इंटर कालेज से इंटर पास किया, फिर बिहार से शिक्षक प्रशिक्षण (बी.टी.सी.) प्राप्त किया, और प्राथमिक शिक्षक बनने से पहले बी.ए. और एम.ए.(अंग्रेजी) की डिग्री गोरखपुर विश्वविद्यालय से अर्जित कर ली। आज वे बिहार के पश्चिमी चंपारण जिले में सरकारी जूनियर हाई स्कूल में एक आदर्श शिक्षक की नौकरी करते हुए अपनी छोटी सी गृहस्थी सम्हाल रहे हैं। उनके शिक्षण कार्य की कुशलता को देखते हुए उन्हें अन्य शिक्षकों को प्रशिक्षण देने का अतिरिक्त कार्य सौंप दिया गया है जिसे पूरा करने के लिए उन्हें रविवार की साप्ताहिक छुट्टी भी समर्पित करनी पड़ती है। इसके लिए मिलने वाला अतिरिक्त पारिश्रमिक उनके समक्ष मुंह खोले तमाम आर्थिक चुनौतियों का सामना करने हेतु कुछ अतिरिक्त संबल जरूर देता होगा लेकिन उनकी कर्मनिष्ठा में डूबी हुई दिनचर्या इतनी व्यस्त हो चुकी है कि नौकरी के बाहर के सारे काम ठप हो चुके हैं। इष्टमित्रों से मिलना-जुलना, रिश्तेदारों के घर आना-जाना, छुट्टियों में बच्चों को लेकर बाहर घूमने जाना या सोशल मीडिया पर स्टेटस डालने और बतकही करने का शौक पैदा ही नहीं हो सका।

संजय एक ऐसी दुनिया में रमे हुए हैं जो महानगरीय संस्कृति और उपभोक्ता वादी सामाजिकता से कोसों दूर है। निवास स्थान से बीस-पच्चीस किलोमीटर दूर की नौकरी बजाने के लिए अनिवार्य हो चुकी मोटरसाइकिल भी काफी प्रतीक्षा के बाद आ सकी और अदना सा मोबाइल उसके भी बाद में। कर्ज लेकर घर का ढाँचा तो खड़ा कर लिया लेकिन उसके खिड़की दरवाजे बनवाने में कई साल लग गये। बच्चों की छोटी-छोटी जरूरतों के लिए भी अपने साथ कई समझौते करने पड़े। लगभग पूरे वेतन पर ई.एम.आई. ने कब्जा कर रखा है लेकिन मजाल क्या कि इनके चेहरे पर कभी शिकन देखने में आयी हो। जब भी पडरौना जाता हूँ तो इनके घर मिलने जरूर जाता हूँ। वही प्रसन्नता से मुस्कराता चेहरा और अपनी गृहस्थी के प्रति सजगता और जिम्मेदारी से भरा, उत्साह से लबरेज जीवन्त व्यक्तित्व देखने को मिलता है।

बात-बात में ठहाके लगाते और गुदगुदाने वाले किस्से-कहानियों का लुत्फ़ लेते हुए संजय की कोई ऑनलाइन प्रोफाइल नहीं है। वर्षों पहले मैंने इनका एक जी-मेल खाता बना के दे दिया तो उसका पासवर्ड धरे-धरे गायब हो गया और मेल चला गया तेल लेने। इंटरनेट तक अपनी पहुँच बनाने की न तो इन्हें जरूरत महसूस हुई और न ही कोई सुभीता ही हुआ। मेरे झकझोरने पर आज जब किसी दूसरे के ई-मेल एकाउंट से इन्होंने मुझे अपनी एक हस्तलिखित रचना भेजी तो मैंने सोचा फोन के बजाय इस पोस्ट के माध्यम से इन्हें अपनी शुभकामनाएँ उनतक पहुँचाऊँ। 

Sanjay K Tripathi1

अपनो का हो साथ तो इक संबल मिलता है
जीवन नौका को खेने का बल मिलता है

सत्य और भ्रम का अंतर जो समझ सका है
श्रमजीवी होने का मतलब समझ सका है
मन में रखता है जो ऊँची अभिलाषाएँ
घोर निराशा में आशा के दीप जलाए

ऐसे ‘कर्मवीर’ को ही प्रतिफल मिलता है
अपनों का हो साथ तो इक संबल मिलता है

जीत हार का जिसपर कोई असर नहीं है
दुनियादारी की बातों का असर नहीं है
अन्तर्मन के निर्णय पर ही चलता जाये
यमदूतों के भय से भी जो ना घबराये

ऐसे को ही हर प्रश्नों का हल मिलता है
अपनों का हो साथ तो इक संबल मिलता है।

-संजय कुमार त्रिपाठी

मैं चाहता हूँ आधुनिकता की चकाचौंध से दूर दुर्गम ग्रामीण इलाकों में शिक्षा की ज्योति जलाने में लगे इस अहर्निश कर्मयोगी को उसके जन्मदिन (१३ सितंबर) पर आप भी शुभकामनाएँ देना चाहें।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
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रविवार, 31 अगस्त 2014

कूड़े के ढेर पर विद्यार्थी


बचपन में पंडित जी से विद्यार्थी के इन पाँच लक्षणों के बारे में सुना था

काकचेष्टा,वकोध्यानं ,श्वाननिद्रा,तथैव च।
अल्पाहारी,गृहत्यागी विद्यार्थी पंच सुलक्षणं॥

प्रमेय- विद्यार्थी की उपर्युक्त परिभाषा गलत है, आइए सिद्ध करके देखें-

मैंने अपने छात्रजीवन में इन गुणों को आत्मसात करने का बहुत प्रयास किया लेकिन शत प्रतिशत सफलता कभी नहीं मिली। अपने बच्चों को भी यह सूक्ति सुनाता रहता हूँ लेकिन आज की बदली परिस्थितियों में उन्हें भी इस साँचे में ढालना अपने हाथ में नहीं लगता। इन न्यूनताओं के बावजूद मेरे या मेरे बच्चों के विद्यार्थी होने में कोई संदेह नहीं है।

लेकिन हमारे समाज में एक बड़ी संख्या ऐसे बच्चों की है जिनके भीतर ये सभी गुण अनायास ही विद्यमान हैं जबकि उन्हें विद्यार्थी के रूप में स्कूल जाने, किताब-कॉपी के साथ पढ़ने-लिखने और आगे बढ़ने के प्रायः सभी रास्ते बन्द हैं।

rag-pickers-kids-in indiaपीठ पर बस्ते की तरह टँगा है बोरा,
ड्रेस भी तो है उनकी,
एक पैण्ट जिसकी जेबें फ़टी है,
चेन टूटी है,शर्ट पर लगी है,कालिख की ढेर
और पैर में टूटा हुआ प्लास्टिक का चप्पल,
साथ में ही घूमते हैं,ठीक विद्यार्थियों की तरह बतियाते हुए
पर अपने लक्ष्य के प्रति सचेष्ट।
तो क्या वे विद्यार्थी हैं?
नहीं, वे कूड़ा बीनने वालें हैं
अल्पाहारी शौकिया नहीं मजबूरी में
गृहत्यागी शिक्षा के लिये नहीं, प्लास्टिक के लिये
ध्यान बगुलें का है सीखने के लिये नहीं,अपितु,
बीनने के लिये,
काकचेष्टा दूसरे से आगे होने के लिये,
और,
श्वाननिद्रा तो इसलिये कि,
भूखे पेट,नंगे शरीर,
खुले छ्त के नीचे,नींद आती ही नहीं।

(१) अल्पाहारी-

वे गरीब हैं जो दोनों जून मिला कर भी नहीं पाते एक वक्त का भोजन।

(२) गॄहत्यागी -

घर छोड़ देने से ही तो चलता है उनका जीवन रोज ही घर से बहुत दूर तक चले जाते हैं वे, अपने लक्ष्य की तलाश के लिये।

(३) बको-ध्यानम्‌-

बगुलों जैसे एकाग्रचित्त। ध्यान तो उनका बगुलों से भी तेज है जो सामने पड़ी हर वस्तु की उपयोगिता बस एक ही नजर में परख लेते हैं।

(४) काकचेष्टा-

कौए जैसी चपल और तेज क्रियाशीलता। यही तो आधार है उनकी सफ़लता का। जिसमें जितनी काकचेष्टा, सफ़लता उतनी ही अधिक; यानि उसका बोरा उतना अधिक भरा हुआ।

(५) श्वाननिद्रा -

कुत्ते जैसी नींद। शायद नींद उन्हें आती ही नही, जब पुकारो जागते मिलेंगे, आहट हुई नहीं की उठ बैठे।

इन कूड़ा बीनकर पेट पालने वालों को यदि आप विद्यार्थी कहना चाहें तो यह भी कहना पड़ेगा कि विद्यार्थी कूड़े के ढेर पर बैठा कष्ट भोगता एक मनुष्य होता है।

इस प्रकार विद्यार्थी की यह आदिकालीन परिभाषा त्रुटिपूर्ण सिद्ध होती है।

(इति सिद्धम्‌)

(लगभग री-ठेल)

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
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बुधवार, 29 जनवरी 2014

यह रिपोर्ट विचलित करती है

आज के अखबार में ये विचलित करने वाले आंकड़े देखने को मिले- भारत में गरीब घरों के वे बच्चे जो लगातार चार साल स्कूल जाते रहे उनमें से 90 प्रतिशत बच्चे साक्षर ही नहीं हो सके। यही नहीं पाँच से छः साल तक स्कूल जाने के बावजूद 30 प्रतिशत बच्चों को अक्षर ज्ञान नहीं हो सका। ग्रामीण क्षेत्रों में कक्षा-पाँच में पढ़ने वाले महाराष्ट्र के 44% विद्यार्थियों और तमिलनाडु के 53% विद्यार्थियों को दो अंको का जोड़-घटाना नहीं आता। बाकी राज्यों में भी हालत खराब ही है। ग्रामीण भारत की गरीब लड़कियों को शतप्रतिशत साक्षर बनाने में अभी 66 साल और लगेंगे। ssa-logo

ये शर्मनाक आंकड़े काल्पनिक नहीं हैं और न ही किसी पार्टी विशेष को लक्ष्य करके तैयार किये गये हैं। भारत सहित दुनिया के तमाम देशों में संचालित सर्व शिक्षा अभियान को अरबो रूपये की आर्थिक मदद देने वाली संस्था यूनेस्को की 11वीं ग्लोबल मॉनीटरिंग रिपोर्ट में ये आंकड़े बताये गये हैं। स्वतंत्र एजेन्सियों द्वारा किये गये सर्वेक्षण पर आधारित ये आंकड़े हमारी प्रशासनिक असफलता और शिक्षा के प्रति लापरवाह दृष्टिकोण को उजागर करते हैं।

यह रिपोर्ट बताती है कि सर्व शिक्षा अभियान के जो लक्ष्य तय किये गये थे उनमें से अधिकांश 2015 तक पूरे नहीं किये जा सकेंगे। यह भी कि दक्षिण-पश्चिम एशिया के देशों में प्राथमिक, जूनियर हाईस्कूल व हाईस्कूल स्तर पर गरीब और वंचित वर्ग के शत प्रतिशत बच्चों को साक्षर और शिक्षित करने की रफ़्तार बहुत ज्यादा धीमी है। भारत में आर्थिक रूप से संपन्न घरों की लड़कियाँ तो शत प्रतिशत साक्षर हो गयी हैं लेकिन गरीब घरों की लड़कियों को शत प्रतिशत साक्षर करने का लक्ष्य सन्‌ 2080 से पहले पूरा होता नहीं दिखता।

इस रिपोर्ट में यह विश्लेषण भी किया गया है कि समाज के हाशिये पर रहने वाले बच्चों को अच्छी गुणवत्ता की शिक्षा देने के लिए सरकारे पर्याप्त खर्च नहीं कर पा रही हैं। एक बच्चे पर खर्च की जाने वाली औसत राशि की तुलना उसे अच्छी शिक्षा देने के लिए आवश्यक राशि से की गयी तो स्थिति बहुत खराब पायी गयी। भारत के आंकड़ों के अनुसार अपेक्षाकृत धनी राज्य केरल में प्रति बालक 685 डालर खर्च किये गये जबकि बिहार में प्रति बालक मात्र 100 डालर की ही व्यवस्था की जा सकी।

इस रिपोर्ट के मुताबिक सभी बच्चों को स्कूल तक पहुँचा देने के लक्ष्य को हासिल करने में भारत अग्रणी रहा है लेकिन स्कूल में उन्हें प्राथमिक स्तर की शिक्षा वास्तव में मिल भी जाय इसकी ओर जैसे कोई ध्यान ही नहीं गया। पूरी दुनिया के करीब 25 करोड़ बच्चे स्कूल जाने के बावजूद निरक्षर हैं और इनमें से एक तिहाई दक्षिण-पश्चिम एशिया के देशों में हैं। इस बेहद निराशाजनक स्थिति में भारत प्रमुख रूप से सम्मिलित है।

ssaशैक्षिक स्तर में प्रगति अत्यन्त धीमी है, खासकर वंचित वर्ग के बालको में। गणित में तो उनकी हालत बहुत ही खराब है। ग्रामीण क्षेत्रों के अध्ययन में यह बात स्पष्त रूप से सामने आयी कि आर्थिक रूप से संपन्न राज्यों में शिक्षा का स्तर गरीब राज्यों की अपेक्षा बहुत बेहतर है। लेकिन महाराष्ट्र और तमिलनाडु जैसे संपन्न राज्यों में भी गरीब घरों की लड़कियाँ शैक्षिक रूप से बहुत पिछड़ी हुई हैं।

बच्चों द्वारा कक्षा-पाँच में पहुँचने से पहले ही स्कूल छोड़ देने का प्रतिशत सीधे तौर पर गरीबी से जुड़ा है। गरीब राज्यों से और गरीब परिवारों के बच्चे स्कूल में टिके रहना ज्यादा कठिन पाते हैं। उत्तर प्रदेश में ऐसे ड्रॉप-ऑउट्स की संख्या 70% और मध्य प्रदेश में 85% पायी गयी।

प्रथमिक स्तर पर शिक्षा के इस संकट का सबसे बड़ा कारण शिक्षकों पर कुशल प्रशासन का अभाव बताया गया है। स्कूल से गैरहाजिर रहने वाले अध्यापकों का प्रतिशत संपन्न राज्यों में 15% (महाराष्ट्र) और 17% (गुजरात) से लेकर विपन्न राज्यों में 38% (बिहार) और 42% (झारखंड) तक है।

इन आंकड़ों को देखकर यह सुनिश्चित जान पड़ता है कि दुनिया चाहे जितनी कोशिश कर ले, हम भारत के लोग विकसित होने को कतई तैयार नहीं हैं। हमें जो भी अवसर मिलेगा हम उसे अपनी मक्कारी, जाहिली और क्षुद्र स्वार्थों की भ्रष्ट बलि-बेदी पर चढ़ा देंगे और झूठी आत्मप्रशंसा के नारे गढ़कर जश्न मनाते रहेंगे। दुनिया वालों हमारा क्या कल्लोगे...?

(सत्यार्थमित्र)
www.satyarthmitra.com

मंगलवार, 31 दिसंबर 2013

कुछ अलग रहेगा नया साल

जीवन में जबसे कुछ सोचने समझने का सिलसिला शुरू हुआ शायद पहली बार ऐसा महसूस हो रहा है कि कैलेंडर की तारीख जब नये साल में प्रवेश करेगी तो हम एक बदले हुए भारत में पहुँच जाएंगे। अबतक तो यही मानता रहा हूँ कि इस अंग्रेजी कैलेंडर का साल बदलने से कुछ भी नहीं बदलता। लेकिन इस बार बात ही कुछ और है…

मन की आशा

अब तक चाहे जो रहा हाल, कुछ अलग रहेगा नया साल
आशावादी मन बोल रहा फिर लौट सकेगा स्वर्णकाल

तथाकथित आजादी में हमने सुख-दुख बहुतेरे देखे
संविधान की रचना देखी इसपर कलुष घनेरे देखे
लोकतंत्र की राजनीति के भीतर बसी गुलामी देखी
वोटों की ताकत के पीछे जाति-धर्म की खामी देखी

आशा प्रस्फुटित हुई मन में कटने वाला है विकट जाल
अब तक चाहे जो रहा हाल, कुछ अलग रहेगा नया साल

संप्रभु समाजवादी सेकुलर हो लोकतंत्र जनगण अपना
बलिदानी अमर शहीदों ने देखा था कुछ ऐसा सपना
बाबा साहब ने भेंट कर दिया देशप्रेम का धर्म ग्रंथ
हम रहे झगड़ते आपस में आधार बनाकर जाति पंथ

जनमानस बदल रहा अब जो लेगा इस दलदल से निकाल
अब तक चाहे जो रहा हाल, कुछ अलग रहेगा नया साल

भ्रष्टाचारी अपराधी जन अब राजनीति से दूर रहेंगे
जनता का हक खाने वाले जेलों में मजबूर रहेंगे
अब नहीं रहेंगी सरकारें बनकर जनता की माई-बाप
सच्‍चे त्यागी जनसेवक  की सेवा लेकर आ गये आप

रिश्वतखोरों को रंगे हाथ पकड़े जाने का बिछा जाल
अब तक चाहे जो रहा हाल, कुछ अलग रहेगा नया साल

बहू बेटियाँ घर की देहरी निर्भयता से पार करेंगी
अधिकारों से जागरूक समतामूलक व्यवहार करेंगी
शिक्षा के उजियारे से ही पिछड़ेपन का तिमिर मिटेगा
ज्ञान और विज्ञान बढ़ेगा नर-नारी का भेद घटेगा

चल रहा राष्ट्र निर्माण यज्ञ सब अपनी आहुति रहे डाल
अब तक चाहे जो रहा हाल, कुछ अलग रहेगा नया साल

मतदाता ने आंखे खोली अंतर्मन की सुनता बोली
अब इसे लुभा ना पाएगी झूठे वादों वाली झोली
गिर रहे पुराने मापदंड परिवारवाद है खंड-खंड
सत्ता लोलुप जो हार रहे तो टूट रहा उनका घमंड

सच्‍चे अच्छे जनसेवक को वोटर अब कर देगा निहाल
अब तक चाहे जो रहा हाल, कुछ अलग रहेगा नया साल

आप सबको नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी 
www.satyarthmitra.com 

शुक्रवार, 23 अगस्त 2013

अब कौन पढ़ाए…?

कोषागार में एक महत्वपूर्ण काम होता है सरकारी सेवा से रिटायर होने वाले कर्मचारियों, अधिकारियों और शिक्षकों इत्यादि को पेंशन का भुगतान करना। जब पहली बार पेंशन की शुरुआत होती है तो इसके लिए संबंधित पेंशनर को स्वयं कोषाधिकारी के समक्ष उपस्थित होना पड़ता है। कोषाधिकारी को पेंशन संबंधी अभिलेखों में दी गयी सूचना और फोटो इत्यादि का सत्यापन उस व्यक्ति से पूछताछ करके करना होता है जो उसकी पहचान से संतुष्ट होने के बाद पेंशन भुगतान करने के आदेश पर हस्ताक्षर करता है। इसके बाद प्रत्येक माह की पहली तारीख को उसकी पेंशन उसके बैंक खाते में ई-पेमेंट की प्रक्रिया से भेज दी जाती है। साल में केवल एक बार नवंबर-दिसंबर में उसे अपने ‘जीवित होने का प्रमाणपत्र’ देने के लिए कोषागार या बैंक में उपस्थित होना पड़ता है। जिस पेंशनर की मृत्यु हो जाती है उसकी सूचना लेकर उसकी पत्‍नी या पति (यदि जीवित हैं) को उपस्थित होना होता है जिनकी पहचान से संतुष्ट होने के बाद उन्हें पारिवारिक पेंशन का भुगतान प्रारंभ हो जाता है।

लगातार एक ही काम करते हुए यह सब इतना यंत्रवत होता रहता है कि मुझे इस काम में बोर हो जाना चाहिए। लेकिन मैं इसमें कभी बोर नहीं होता। कारण यह है कि इस काम को मैं एक विशिष्ट अवसर के रूप में प्रयोग करता हूँ। साठ साल की उम्र में जो लोग मेरे पास आते हैं उनके पास सरकारी काम करने का एक लंबा अनुभव होता है और उनके पास इस जीवन के बारे में अपने-अपने निष्कर्ष होते हैं। पारिवारिक पेंशन के लिए जो वयोवृद्ध महिलाएँ आती हैं उन सबकी आँखों में एक अलग कहानी झाँकती रहती है। कुछेक पुरुष जो अपनी नौकरीशुदा पत्‍नी की मृत्यु के बाद पारिवारिक पेंशन लेने आते हैं उनकी कहानी तो और भी उत्सुकता जगाती है। समय की उपलब्धता और उनकी प्राइवेसी की मर्यादा की रक्षा करते हुए मुझे उनसे बात-चीत करके जो कुछ जानने-समझने का अवसर मिलता है उसे मैं इस नौकरी की बहुत विशिष्ट उपलब्धि मानता हूँ। इन बुजुर्गों से दोस्ती करके एक अलग आनन्द आता है।

आप जानते ही होंगे कि शिक्षकों की सेवानिवृत्ति एक खास नियम के कारण प्रायः जून महीने की समाप्ति पर होती है। शिक्षा सत्र के बीच में चाहे जब भी उनकी सेवानिवृत्ति की आयु पूरी हो जाय उन्हें सत्र के अंत तक अपने विद्यार्थियों को पूरा कोर्स पढ़ाने के बाद सेवा से निवृत्त किया जाता है। इसे “सत्रान्त लाभ” कहते हैं। तो आजकल कोषागार में गुरूजी लोगों की आमद ज्यादा हो गयी है। जून में सेवानिवृत्त होने के बाद उनकी पेंशन का प्राधिकार पत्र सक्षम स्वीकर्ता अधिकारियों द्वारा कोषागार में भेजा जा रहा है और वे अपनी पहचान/ सत्यापन की औपचारिकता पूरी कराने कोषागार में आ रहे हैं।

पहचान के सत्यापन सम्बंधी कुछ वैधानिक प्रश्न पूछने के बाद मैं कुछ अनौपचारिक चर्चा उनके विद्यालय की दशा और दिशा के बारे में भी कर लेता हूँ। education crisisजैसे- आपके विद्यालय में किन-किन विषयों की पढ़ाई होती है। उन विषयों के अध्यापक उपलब्ध हैं कि नहीं? जो लोग रिटायर हो जा रहे हैं उनके स्थान पर नयी भर्तियाँ हो रही हैं कि नहीं? क्या बच्चे रेग्युलर कक्षाओं में पढ़ाई करने आते हैं? परीक्षाओं में नकल पर रोक लग पाती है कि नहीं? कितने प्रतिशत बच्चों में विषय का ज्ञान अर्जित करने की ललक होती है? ऐसे बच्चों को गुरुजन कितना संतुष्ट कर पाते हैं। पहले से अब की शिक्षा व्यवस्था में क्या परिवर्तन आये हैं? बच्चों को अपने स्कूल की कक्षा की पढ़ाई से काम चल जाता है या उन्हें प्राइवेट ट्यूशन करना पड़ता है? आदि-आदि।

इन प्रश्नों का जो उत्तर टुकड़ों-टुकड़ों में मिलता है उसे अपने अनुभवों की गोंद से जोड़ता हूँ तो एक ऐसी तस्वीर उभरती है जिसे देखकर कलेजा बैठ जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों व छोटे-छोटे कस्बों में पसरे इन विद्यालयों में कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाय तो पठन पाठन की दुरवस्था देखकर मन में घोर निराशा पाँव पसारने लगती है। जिनके ऊपर इस दिशा में कुछ कदम उठाने की जिम्मेदारी है उनकी चाल-ढाल देखकर मन में एक डर सा बैठ जाता है – इस समाज की नयी पीढ़ी का भविष्य कैसा होगा?

इस तस्वीर की कुछ बानगी देखिए-

  • स्कूलों में जितने बच्चों का नाम लिखा होता है उसके चौथाई बच्चे ही नियमित स्कूल आकर कक्षाओं में पढ़ने बैठते हैं। इन बच्चों को पढ़ाने के लिए आवश्यक जितने शिक्षकों का मानक निर्धारित है उनसे चौथाई संख्या में ही वास्तव में कक्षा में जाकर पढ़ाते है। इसका कारण लगातार बढ़ती रिक्तियों व शिक्षक समुदाय पर प्रशासनिक नियन्त्रण की कमी से लेकर शिक्षक संघ की राजनीति तक बहुत कुछ है। अब यह अनुमान लगाना कठिन है कि बच्चे कम आते हैं इसलिए शिक्षक कम पढ़ाते हैं या शिक्षक कम पढ़ाते हैं इसलिए बच्चे कम आते हैं।
  • सेवानिवृत्ति के फलस्वरूप जो पद  रिक्त हो जाते हैं उन पदों को समय से भरे जाने की कोई मुकम्मल व्यवस्था नहीं है। निजी प्रबंधतंत्र वाले विद्यालय शिक्षकों के वेतन के लिए  जब सरकारी अनुदान पाने लगते हैं तब स्टाफ की नियुक्ति का अधिकार सरकारी नियन्त्रण में चला जाता है। सरकार द्वारा शिक्षकों की भर्ती के लिए जो चयन-बोर्ड गठित किया गया वह पिछले दो-तीन सालों से कोई चयन की प्रक्रिया पूरी नहीं कर सका है। भ्रष्टाचार और अयोग्यता के दलदल में फँसकर यह प्रक्रिया लगभग दम तोड़ चुकी है। तीन साल पहले जब इस बोर्ड के माध्यम से शिक्षकों का चयन होता भी था तब कोई भी अभ्यर्थी अपनी योग्यता और मेरिट के भरोसे सफल होने की कल्पना नहीं कर पाता था। आवेदन डालने के साथ ही किसी जुगाड़ के फेर में पड़ जाता था। पक्षपात और धाँधली की शिकायतें बढ़ी और असफल अभ्यर्थी कोर्ट जाने लगे। कोर्ट-केस इतने बढ़ गये कि अब नयी भर्ती की प्रक्रिया लगभग बन्द ही हो गयी है।
  • जो अभ्यर्थी येन-केन प्रकार से सफल होकर इन विद्यालयों में पहुँचे उन्हें निजी प्रबन्ध तन्त्र ने अपनी शर्तों पर ज्वाइन कराया; या नहीं ज्वाइन करने दिया। एक शिक्षक ने तो बड़े गर्व से कहा कि मेरे विद्यालय में करीब आधा दर्जन लोग चयन बोर्ड से परवाना लेकर आये लेकिन मेरे मैनेजर साहब इतने मजबूत हैं कि किसी को ज्वाइन नहीं करने दिया। मैंने पूछा- तो फिर पढ़ाता कौन है वहाँ? वे बोले- सब व्यवस्था हो जाती है साहब। मैनेजर साहब ने बहुत लोगों को ‘ऐडहाक’ पर रख लिया है। आज नहीं तो कल वे रेगुलर हो ही जाएंगे। उनके विश्वास को देखकर मुझे वह बहस याद आ गयी जो मैंने अपनी  ट्रेनिंग के दौरान एक माननीय न्यायमूर्ति के साथ कर ली थी-
  • अज्ञानतावश तगड़े आत्मविश्वास का शिकार होकर मैंने हाईकोर्ट के पूर्व अधिवक्ता और तत्कालीन न्यायमूर्ति का लेक्चर सुनते हुए उनसे एक ऐसा तकलीफ़देह प्रश्न पूछ लिया था जिससे अवमानना का दोषी भी होने का खतरा उत्पन्न हो गया था। यह कि किसी निजी प्रबन्धतंत्र द्वारा भ्रष्टाचारी तरीका अपनाकर अनियमित रूप से किसी भाई-भतीजे को शिक्षक के रूप में नियुक्त कर लिया जाता है जिसका अनुमोदन सरकारी अधिकारी द्वारा नहीं किया जा सकता है। लेकिन वह जानबूझकर उसकी नियुक्ति रद्द करने का एक ऐसा आदेश पारित कर देता है  जिसमें पूरा प्रकरण युक्तियुक्त तरीके से उद्धरित नहीं होता है। उस आदेश को प्रबंधतंत्र कोर्ट में चुनौती देता है और माननीय न्यायमूर्तिगण आसानी से अन्तरिम स्थगनादेश (स्टे ऑर्डर) जारी कर देते हैं। कोर्ट का आदेश भले अस्थायी स्थगन का हो लेकिन उसका स्थायी लाभ उन गलत व्यक्तियों को मिल जाता है। मेरा प्रश्न था कि क्या कोर्ट के पास इस गलत कार्य में खुद एक सहयोगी पक्ष (पार्टी) बन जाने से बचने का कोई सूत्र नहीं है? मुझे कोई संतोषजनक उत्तर न तब मिला था न अबतक मिल पाया है। कोर्ट के स्टे के सहारे बहुत से लोग अपने गलत रास्ते पर आगे बढ़ने में सफल हो जाते हैं। अलबत्ता उनकी इस सफलता में कार्यपालिका के जिम्मेदार अधिकारी बड़े सहयोगी की भूमिका निभाते हैं।
  • यह स्थिति तो अशासकीय सहायता प्राप्त माध्यमिक विद्यालयों की थी। प्राथमिक शिक्षा विभाग में शिक्षकों की स्थिति और भयावह है। शिक्षा का अधिकार अधिनियम आ जाने के बाद प्राथमिक शिक्षा को मौलिक अधिकार बना दिया गया लेकिन वास्तविकता के धरातल पर उस अधिकार को जिस प्रकार उपलब्ध कराया जा रहा है वह किसी से छिपा नहीं है। शिक्षकों के जितने पद मानक के अनुसार जरूरी हैं उनमें आधे रिक्त हैं। इनकी भर्ती की प्रक्रिया तीन-चार साल से अटकी पड़ी है।  इसके पीछे भी प्रशासनिक अयोग्यता और भ्रष्टाचार का खेल काम कर रहा है। हम लाखों की संख्या में उपलब्ध योग्यताधारी अभ्यर्थियों में से जरूरी संख्या में प्राथमिक शिक्षकों का चयन कर पाने में असमर्थ हैं। आज स्थिति यह है कि प्रशासनिक अधिकारी नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू करने में घबरा रहे हैं। हाथ खड़े कर देते हैं। जैसे किसी आफ़त को दावत दे रहे हों। काम हो चाहे न हो लेकिन जिसने नियुक्ति का काम हाथ में लिया उसका फँसना तय है। आखिर हमने ऐसी भयावह स्थिति क्यों बन जाने दी है? कौन जिम्मेदार है इसके लिए?
  • राजकीय हाई-स्कूल व इंटर कॉलेजों में भी शिक्षक भर्ती की कमोबेश यही दशा है। राज्य लोक सेवा आयोग में जो उहापोह और अनिर्णय की स्थिति है वह हाल की घटनाओं के बाद सभी जान गये हैं। पूरा डेलिवरी सिस्टम चरमरा गया लगता है।
  • एक संस्कृत महाविद्यालय के सेवानिवृत्त शिक्षक ने तो ऐसी बात बतायी कि मैं सन्न रह गया। बता रहे थे कि वे अपने महाविद्यालय के अंतिम बचे हुए शिक्षक थे जो अब सेवानिवृत्त हो गये हैं। अब वहाँ एक भी शिक्षक नहीं है और प्रबंधतंत्र बहुत खुश है कि अब उसे संस्कृत महाविद्यालय बन्द करके उसके विशाल प्रांगण में निजी पब्लिक स्कूल चलाने की पूरी स्वतंत्रता मिल गयी है। यह व्यवसाय आजकल बहुत लाभकारी हो गया है क्योंकि कोई भी जागरूक गार्जियन अपने बच्चों को सरकारी प्राइमरी स्कूल में भरसक नहीं भेजना चाहता। संस्कृत पाठशालाओं व महाविद्यालयों को सरकारी अनुदान पर चलाने के लिए पिछले जमाने की सरकारों ने जब फैसला किया तब यह नहीं सोचा कि इन शिक्षकों की निरन्तरता कैसी बनायी जाएगी। जो पद खाली हो रहे हैं वे समाप्त होते जा रहे हैं और शनैः शनैः ये सभी विद्यालय भी काल के गाल में समा जाएंगे। जो विद्यालय चल भी रहे हैं उनके पठन-पाठन का स्तर देखकर लगता है कि वे यदि सुधर नहीं सकते तो उनका समाप्त हो जाना ही बेहतर है।
  • एक बार मुझे एक जिले में इन संस्कृत विद्यालयों के निरीक्षण का दायित्व मिला। इनकी दुर्दशा और गुरुजनों की अकर्मण्यता के बारे में जब मैंने खरी-खरी रिपोर्ट बनानी शुरू की तो मुझे समझाया गया कि आप लोग उर्दू मदरसों पर तो ऐसी कड़ाई नहीं करते। वहाँ भी तो किसी विषय की वस्तुनिष्ठ पढ़ाई नहीं होती। वहाँ भी तो नकल कराकर बच्चों को पास कराया जाता है। वहाँ भी तो मुफ़्त में सरकारी अनुदान की बन्दरबाँट होती है। वहाँ तो किसी की हिम्मत नहीं है जो जाँच कर ले। मैंने जब अपने काम से काम रखने पर बल दिया तो मेरे खिलाफ़ एक आन्दोलन सा खड़ा हो गया और उच्च अधिकारियों ने ‘समझदारी से’ बीच-बचाव करके मुझे उस काम से अलग कर दिया।

इन सारी दुर्व्यवस्थाओं के बीच एक आशा की किरण दिखती है तो वह सरकारी तंत्र से अलग निजी क्षेत्र में काम कर रहे कुछेक ऐसे शिक्षण संस्थानों में दिखती है जिन्होंने गुणवत्ता बनाये रखने के तमाम जतन कर रखे हैं। लेकिन उनके ऊँचे तोरण द्वारों के भीतर जाने का सुभीता कितने बच्चों के पास है?

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)