हमारी कोशिश है एक ऐसी दुनिया में रचने बसने की जहाँ सत्य सबका साझा हो; और सभी इसकी अभिव्यक्ति में मित्रवत होकर सकारात्मक संसार की रचना करें।
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गुरुवार, 26 फ़रवरी 2015

अहा ! फरवरी कितनी प्यारी। (गीत)

अहा ! फरवरी कितनी प्यारी।
कड़ी ठण्ड से पीछा छूटा
सर्दी से गठ बंधन टूटा
अब अलाव है नहीं जरूरी
दूर हुई सबकी मज़बूरी
बच्चे अब भरते किलकारी
अहा ! फरवरी कितनी प्यारी।1।
बिस्तर से हट गयी रजाई
हीटर की हो गयी विदाई
कम्बल भी बक्से में सोया
सबने ऊनी स्वेटर धोया
अब सूती कपड़ों की बारी
अहा ! फरवरी कितनी प्यारी।2।
एक सूट खबरों में आया
लाखों जिसका दाम बताया
मचा मीडिया में कोहराम
फिर वो सूट हुआ नीलाम
दाम करोड़ों दें व्यापारी
अहा ! फरवरी कितनी प्यारी।3।
अच्छे दिन वाली सरकार
भरने लगी विजय हुंकार
आम आदमी ने रथ रोका
दिल्ली की जनता ने टोका
दम्भ पड़ गया इसको भारी
अहा ! फरवरी कितनी प्यारी।4।
बढ़ा शादियों का भी जोर
विकट बराती हैं चहुँ ओर
फागुन की मस्ती में झूमें
चाहें नर्तकियों को चूमें
लठ्ठम लठ्ठा गोली बारी
अहा ! फरवरी कितनी प्यारी।5।
बोर्ड परीक्षा शुरू हुई है
शुचिता जिसकी छुई मुई है
अजब नकलची गजब निरीक्षक
सॉल्वर बन बैठे हैं शिक्षक
दस्ता सचल करे बटमारी
अहा ! फरवरी कितनी प्यारी।6।
राजनीति में फँसा बिहार
लालू जी की टपकी लार
संख्या बल में इतनी खूबी
माझी की ही नैया डूबी
फिर नितीश को मिली सवारी
अहा ! फरवरी कितनी प्यारी।7।
संसद में घिरती सरकार
भूमि अधिग्रहण को तैयार
अन्ना जी फिर मंचासीन
धरना में फिर सीएम लीन
छुट्टी पर बेटा-महतारी
अहा ! फरवरी कितनी प्यारी।8।
क्रिकेट कुम्भ आरम्भ हुआ है
सौ करोड़ की यही दुआ है
टीम इंडिया रख ले लाज
बिश्व विजेता हो अंदाज
दिखती है अच्छी तैयारी
अहा ! फरवरी कितनी प्यारी।9।
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी) www.satyarthmitra.com

मंगलवार, 21 जनवरी 2014

माइक, कैमरा, एक्शन और आम आदमी

20-arvind-kejriwal-dharna-600भ्रष्टाचार के विरुद्ध अन्ना हजारे के मंच से अरविंद केजरीवाल के भाषण देश के नौजवानों में जोश भरने वाले होते थे। रामलीला मैदान हो या जन्तर-मन्तर, केजरीवाल जब भी माइक सम्हालते देश की मीडिया जुट जाती उसके कवरेज के लिए। न्यूज चैनेलों के माध्यम से दूर-दूर तक केजरीवाल की आवाज पहुँचाती वीडियो कैमरे और ओ.वी.वैन की सुविधा इन्हें ऐसी रास आयी कि आगे के सभी कार्यक्रमों में इनका पुख्ता इन्तजाम किया जाने लगा। आन्दोलन जब अपने चरम पर पहुँचा तो सोशल मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की ओर से राजनीति में सीधे हाथ आजमाने की चुनौती और सलाह पेश कर दी गयी। मजबूत कलेजे वाले केजरीवाल ने अन्ना जी को पीछे छोड़कर आम आदमी पार्टी का गठन किया और पहली ही परीक्षा में पास होते हुए दिल्ली विधान सभा चुनाव में मिली अप्रत्याशित सफलता के बाद मुख्य मंत्री की कुर्सी पर काबिज हो गये।

भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक मजबूत (जन) लोकपाल बनाने की मांग से प्रारंभ हुआ धरना-प्रदर्शन विभिन्न मुद्दों, बहसों और रोज बदलती घटनाओं के बीच आगे बढ़ता हुआ आज चार पुलिस वालों को निलंबित किये जाने की मांग को लेकर बदस्तूर जारी है। केजरीवाल पहले सड़क पर नारे लगाते और भाषण देते एक आम आदमी से बदलकर दिल्ली के मुख्यमंत्री बन गये; लेकिन यह अद्‌भुत बदलाव भी सड़क पर जारी आन्दोलन की निरन्तरता में बाधक नहीं बन पाया। भरपूर भीड़ के बीच मंच पर खड़ा होकर भाषण देने, नारे लगवाने और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को बाइट देने का जो नशा है वह उतरने का नाम ही नहीं ले रहा। मंत्रीमंडल का शपथ ग्रहण कार्यक्रम ही रामलीला मैदान में मंच सजाकर अपार भीड़ के बीच में किया गया। आम आदमी ने खूब जश्न मनाया था; लेकिन अब भी रोज़-ब-रोज़ दिल्ली के मंत्रीगण और मुख्यमंत्री जी बार-बार अपने दफ़्तर से बाहर निकलकर सड़क पर आने और माइक, कैमरा के सामने एक्शन दिखाने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहे हैं।

मुझे लगता था कि राज्य सत्ता में बैठे हुए मंत्रियों और उनके अधीन कार्यरत नौकरशाही द्वारा आम जनता के अधिकारों और जरूरी नागरिक सुविधाएँ मुहैया कराने में जो भ्रष्टाचार व्याप्त है उसे दूर करने के उद्देश्य से केजरीवाल जी ने यह आन्दोलन खड़ा किया है और इसी साध्य को साधने में उनका सहयोग करने के लिए देश का आम जनमानस और मीडिया भी आगे आया है। धरना प्रदर्शन का साधन कारगर भी लगने लगा था क्योंकि जनता ने उससे प्रभावित होकर उन्हें वोट भी दे दिया था, मुख्य मंत्री की कुर्सी भी मिल गयी और संसद ने लोकपाल अधिनियम भी बना दिया। फिलहाल जो लक्ष्य लेकर केजरीवाल जी चुनाव लड़े थे वह पूरा होता दिखायी दिया। इसके बाद उम्मीद थी कि वे लोग जमकर सचिवालय में बैठकर काम करेंगे और अबतक हुए घपलों घोटालों की खबर लेंगे और जनता को तमाम सहूलियतें देने का रास्ता निकालेंगे। लेकिन देख रहा हूँ कि मुख्य मंत्री जी ने शपथ ग्रहण करने के बाद भी सड़क पर आकर माइक, कैमरा, एक्शन का लुत्फ़ लेना जारी रखा हुआ है।

Kejriwal-dharna_जनता की अर्जी लेने के नाम पर ‘जनता दरबार’ (एक सामन्ती संज्ञा) लगा तो सड़क पर लगा, माइक-कैमरा-एक्शन के साथ। मुख्यमंत्री जी भीड़ के बीच कैमरे से ओझल होने लगे तो भागकर चारदीवारी पर चढ़ लिए। आम आदमी ने वहाँ भी नहीं छोड़ा तो छत पर पहुँचकर माइक सम्हाल लिया लेकिन कैमरा नीचे से मुस्तैद रहा। मंत्रीगण अपने सरकारी काम के लिए बाहर निकलते हैं तो माइक और कैमरा का इन्तजाम पहले से कर लेते हैं। यहाँ तक कि आधी रात को गश्त पर भी बिना माइक-कैमरा लिए नहीं जा पाते। पुलिस वालों से तू-तू मैं-मैं भी हुई तो माइक-कैमरा-एक्शन के साथ ताकि चैनेल वाले बुरा न मान जाँए।

लगता है जैसे यह ‘माइक-कैमरा-एक्शन’ कोई साधन नहीं है बल्कि अपने आप में एक साध्य हो गया है। इस साध्य को सिद्ध कर लेने के बाद अब आगे कुछ बचता ही नहीं। वो अठ्ठारह मुद्दे जो माइक-कैमरा-एक्शन के साथ मीडिया में गिनाये गये थे उनका कोई पुरसा हाल नहीं है। जिन मुद्दों पर काम करके वे आम दिल्लीवासियों को तत्काल राहत पहुँचा सकते थे वे पीछे हो गये। इनकी फाइलों पर कोई निर्णय लिये जाने हेतु धरना-रत मंत्रियों के सचिवालय में लौटने तक प्रतीक्षा करनी होगी।

अब मुद्दा वह चुना गया है जो राज्य सरकार के पास है ही नहीं। मुद्दा यही है कि क्यों नहीं है राज्य सरकार के पास - पुलिस पर नियन्त्रण? आजादी के इतने साल बाद भी दिल्ली पुलिस को राज्य सरकार के हाथ में नहीं दिया गया। केंन्द्र और दिल्ली में परस्पर विरोधी सरकारें भी रहीं फिर भी यह मुद्दा कभी इतना भारी नहीं हुआ। राष्ट्रीय राजधानी होने के कारण दिल्ली की पुलिस निगरानी बहुत आसान है भी नहीं। हो सकता है कि पहले की राज्य सरकारें इस झंझट से जानबूझकर दूरी बनाये रखना चाहती हों।

पुलिस का काम अपराध को रोकना और अपराध करने वाले को दंडित कराना है। इसके लिए पुलिस को पर्याप्त अधिकार दिये गये हैं और जिम्मेदारी भी। पुलिस यदि इन अधिकारों का ठीक-ठीक प्रयोग करे तो भी अपनी जिम्मेदारी पूरी तरह नहीं निभा सकती; कुछ न कुछ अपराध होते ही रहेंगे। लेकिन यदि पुलिस वाले अपराधियों के साथ नरमी बरतने और पैसे के बदले आँख मूंद लेने के लिए सहज ही तैयार हो जाँय तब तो स्थिति भयावह हो जाएगी। एक दक्ष और समर्पित पुलिस समाज में छोटे-मोटे अपराध होने से तो रोक ही सकती है; लेकिन ये छोटे-मोटे अपराध ही पुलिसवालों की कमाई का साधन बन जाँय तो क्या कीजिएगा? केजरीवाल ने पुलिस के मगरूर रवैये के खिलाफ खड़ा होकर कुछ गलत नहीं किया है; लेकिन उन्होंने जो तरीका चुना है वह उन्हें अपने दायित्वों से विचलित करने वाला है।

kejriwal on streetपुलिस व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए जो विरोध और आन्दोलन करना है उसे वे अपने कार्यकर्ताओं के जिम्मे कर सकते थे; लेकिन मुख्यमंत्री होने के नाते उनके पास दूसरे सांस्थानिक तरीके भी उपलब्ध थे। विधानसभा की विशेष बैठक बुलाकर बहस कराने, राज्य सरकार की ओर से औपचारिक विरोध दर्ज कराते हुए केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजने का विकल्प चुनना चाहिए था। पहले वे शांति पूर्वक गृहमंत्री, प्रधानमंत्री और आवश्यक होने पर राष्ट्रपति से समय लेकर मुलाकात करते और अपनी भावनाओं से अवगत कराते हुए ठोस मांग रखते। पूरे देश में तब भी चर्चा होती और शायद कोई रास्ता भी निकलता। लेकिन बात-बात पर सड़क पे आ जाना, अनशन करना और धरना देना काम के प्रति एक स्टेट्समैन की गंभीरता को नहीं दिखाता।

जिस सोशल मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने उन्हें आँखों पर बिठाया वही उनका उपहास करने लगी है। मुद्दा विचारणीय होने के बावजूद आज चर्चा मुद्दे पर कम हो रही है और उनके छूठे दंभ, अनावश्यक आक्रामकता, और पदीय दायित्वों से भटक जाने की अधिक हो रही है। जिन लोगों की छाती पर मूंग दलते हुए उनका काफिला सत्ता के गलियारों तक पहुँचकर कुर्सी पर कब्जा जमा बैठा वे ही इस तमाशे को देखकर जैसे दुबारा जिन्दा हो गये हैं। डॉ. हर्षवर्धन की दमित इच्छा भी मानो अब कुलाँचे मारने लगी है। आम आदमी पार्टी की विरुदावली गाने वाले अब इसका उपसंहार लिखने बैठ गये हैं। यह उन करोड़ों लोगों के लिए निराशा का क्षण है जिन्होंने इस बदलाव की बयार से बहुत उम्मीदें लगा ली थीं। कदाचित्‌ मैं भी उनमें सम्मिलित हूँ।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
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सोमवार, 16 दिसंबर 2013

दहलीज़ पे बैठा है कोई दीप जलाकर (तरही ग़जल)

इस मिसरे को तरही ग़जल के लिए तय करने वाले उस्ताद शायर ने इसके मीटर की कई बारीकियाँ नोट करायी थीं, जो मुझे भूल गयीं। सच कहूँ तो वह सब मुझे समझ में ही नहीं आया था। मुशायरे की तय तारीख नजदीक आने की याद दिलायी गयी तो मैंने अपनी फेसबुक टाइमलाइन खोलकर देखा और यह ग़जलनुमा कविता/ तुकबन्दी रच डाली। प्यार-मोहब्बत की ‘बातें करने’ में थोड़ा कमजोर हूँ; बल्कि प्यार मोहब्बत ही कर लेना बेहतर समझता हूँ इसलिए मुझे पूरा शक है कि उस मुशायरे में पता नहीं दाद मिले या न मिले। ऐसी स्थिति में यहाँ इस पृष्ठ का नियंत्रक होने का लाभ तो उठा ही सकता हूँ; तो पेश है मेरी ताजा रचना :

(पुनश्च : बड़े भाई सतीश सक्सेना जी और नवगीतकार ओमधीरज जी की सलाह  पर संशोधित/ संपादित/ परिवर्द्धित।)

दहलीज़ पे बैठा है कोई दीप जलाकर

(१)

लो बोल गया काग भी मुंडेर पे आकर
परदेस से लौटेगा कोई आज कमाकर

गौरैया चहकती रही अब सांझ ढल गयी
दहलीज़ पे बैठा है कोई दीप जलाकर

बेफिक्र हुए सो रहे अपने घरों में हम
मुस्तैद है सरहद पे कोई जान लगाकर

मासूम ने आंचल का किनारा पकड़ लिया 
वह लोरियाँ सुनाये प्रेम गीत भुलाकर

दस्तक हुई वो आ गये माँ ने बिठा लिया
तहज़ीब से रुक जाय सिमट जाय लजाकर

बस चंद रोज़ फैलेगी जीवन में चाँदनी
बस चंद रोज़ चमकेगा आंगन में दिवाकर

रह जाएगी फिर साथ में बैरन सी अमावस
उस नौकरी सौतन के साथ बैठ न जाकर

(२)

दंगों में मुलव्विस रहे जो लोग मुसल्सल
अब सुर्खियाँ बटोरते इमदाद दिलाकर

क्या खूब तमाशा किया जनता के वोट ने
वो फर्श पे अब आ गये हैं अर्स गँवाकर

जब आप को सरकार बनाना ही नहीं था
नाहक में लिया वोट बेवकूफ़ बनाकर

ये शर्त है या गर्त में जाने का है पैग़ाम
वो पूछ रहे आप की चिठ्ठी को दिखाकर

वो दिन हवा हुए जो बिकाऊ थे रहनुमा
उलटी बही बयार है इस दौर में आकर

इस गहरी मोहब्बत से यूँ न देख मेरे यार
रोका है अदालत ने इसे जुर्म बताकर

हर एक ने अपना अलग बनाया लोकपाल
“सत्यार्थमित्र” देख रहे आस लगाकर

 

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी 
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बुधवार, 30 अक्टूबर 2013

लोकतंत्र के गुनहगार हमलोग

आजकल जहाँ देखिए वहाँ नेताओं को गाली देती पब्लिक मिल जाएगी और उन गालियों पर ताली बजाती भीड़ भी। कांग्रेस का वंशवाद हो या भाजपा का संप्रदायवाद, समाजवादियों का मुस्लिम तुष्टिकरण हो या शिवसैनिकों का संकुचित क्षेत्रवाद, वामपंथी पार्टियों का मार्क्सवाद के नाम पर खोखला पाखंड हो या दक्षिणपंथियों का धूर्त राष्ट्रवाद। ये सभी बुराइयाँ बदस्तूर जीवित है और लहलहा रही हैं तो यह निश्चित है कि इनके लिए आवश्यक उर्वरक और खाद-पानी हमारे समाज से ही मिल रहा है।

Mobocracyएक राजनैतिक दल का घोषित और जायज लक्ष्य होता है राजनैतिक सत्ता पाने के लिए चुनाव लड़ना और सत्ता मिल जाने पर उसे बरकरार रखना। इसी लक्ष्य को पाने के लिए पार्टी का गठन होता है, इसके संगठन को मजबूत किया जाता है, इसके लिए लोकप्रिय समर्थन जुटाने का प्रयास किया जाता है। एक खास विचारधारा और राजनैतिक सिद्धान्त का पालन करते हुए मतदाताओं के बीच अपनी स्वीकार्यता का आधार बढ़ाया जाता है और उनके वोट पाकर सत्ता की कुर्सी पायी जाती है। चुनाव लड़ना और सरकार बनाना राजनीतिक दलों का काम ही है। इसमें सफलता पाने के लिए उन्हें जो करना चाहिए वे करते हैं। यदि उन्हें लगता है कि जनता हमें वोट तब देगी जब हम किसी एक खास जाति एक खास धर्म या एक खास इलाके के पक्ष में काम करेंगे या कम से कम करने का वादा करेंगे तो वे ऐसा करने लगते हैं। इसे यूं भी कह सकते हैं कि वे ऐसा करते हैं क्योंकि उन्हें ऐसा लगता है कि जनता इसी आधार पर उन्हें वोट देगी। अब उन्हें ऐसा लगता है तो इसमें कुछ सच्चाई जरूर होगी।

अगर कांग्रेस के एक से एक प्रतिभाशाली नेता अपनी योग्यता और अनुभव को नेपथ्य में रखकर सोनिया गांधी और राहुल गांधी की अति साधारण बुद्धि और वैयक्तिक योग्यता पर वाह-वाह करते रहना और चारण धर्म का पालन करना बेहतर समझ रहे हैं तो निश्चित रूप से उन्हें यह विश्वास है कि जनता का वोट पाने के लिए उनकी अपनी योग्यता और अनुभव से ज्यादा कारगर नेहरू खानदान का नाम है। यह विश्वास इस जनता ने ही तो दिया है। कांग्रेस का साठ साल का शासन चाहे जितना भ्रष्ट और नकारा रहा हो लेकिन हर पाँच साल बाद उसे कुर्सी पर जनता ने वोट देकर पहुँचाया है। यह कोई सद्दाम हुसेन या कर्नल गद्दाफी के लंबे शासन काल की तरह बन्दूक की ताकत से नहीं चला है। जब बहुसंख्यक जनता इस वंश को अपना शासक मानने के लिए तैयार है तो आप शिकायत कैसे कर सकते हैं?

बाबरी मस्जिद टूट जाने के बाद दुनिया भर में भारत की किरकिरी भले ही हुई हो लेकिन उसके बाद हुए चुनावों में इस देश की जनता ने उन लोगों को ही वोट दे दिया जो इस कारनामें के लिए जिम्मेदार माने गये। मजहबी खूँरेजी बढ़ती गयी और चुनाव दर चुनाव इनका वोट-प्रतिशत। अब जनता की ऐसी प्रकृति और प्रवृत्ति देखकर क्यों न नेता कोशिश करेंगे ऐसा माहौल बनाने की? वोटर को पोलराइज करने का प्रयास कोई कर रहा है, तो क्यो? इसलिए कि जनता पोलराइज होने की ताक में बैठी है।

भ्रष्टाचार के नित नये कीर्तिमान बनाती सरकारों को कई राज्यों में बारी-बारी से मौका देते रहने का गर्हित कार्य यह “जनता-जनार्दन” लगातार करती आ रही है। चारा घोटाले की खबर पूरी तरह चर्चित और प्रचारित हो जाने के बाद भी लालू प्रसाद यादव को जनता ने दूसरे दलों पर तरजीह देते हुए तीसरी बार जिता दिया था; जिसकी उम्मीद शायद वे खुद ही नहीं कर रहे थे। तमिलनाडु में बारी-बारी नागनाथ और साँपनाथ का दुष्चक्र खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है – वह भी पूरे लोकतांत्रिक तरीके से।

लोकतंत्र के नाम पर वोट के माध्यम से लिया गया हर फैसला परम पवित्र और सर्वोत्कृष्ट माना जाता है लेकिन उच्च स्तरीय मानवीय मूल्यों की कसौटी पर तौलने बैठिए तो जनता द्वारा किये हुए बहुत से फैसले गले से नहीं उतरते। समानता, स्वतंत्रता, भाईचारा, धर्म निरपेक्षता, न्याय, मानवाधिकार आदि के मूल्य सेमिनारों और अकादमिक बहसों में तो स्थान पा जाते हैं लेकिन भारत का वोटर जब हाथ पर अमिट स्याही लगवाकर गोपनीय घेरे में वोट डालने के लिए घुसता है तो ये मूल्य जाने कहाँ पीछे छूट जाते हैं और उसे केवल अपनी जाति, अपना धर्म, अपना संकुचित समाज और अपना निजी स्वार्थ याद रहता है; और याद रहती है सदियों से चली आ रही रूढ़िवादी, दकियानूसी, गुलामी की विरासत में पगी पिछड़ी सोच का प्रतिनिधित्व करती अधोचेतना।

आप कह सकते हैं कि पार्टियों और नेताओं ने हमें कोई बेहतर विकल्प दिया ही नहीं तो क्या करें? जो विकल्प उपलब्ध हैं उन्हीं में से तो चुनेंगे। लेकिन यह प्रश्न तो वैसा ही है जैसा “पहले मुर्गी कि पहले अंडा?” विकल्प भी तो इस जनता को ही देना था।  इस जनता के हाथों अरविन्द केजरीवाल की जो गति होने जा रही है वह एक बड़ा सबक बनकर उभरने वाला है। बस देखते जाइए। अन्ना हजारे और रामदेव का हश्र तो सामने है ही।

इसलिए अब मैंने किसी बड़े परिवर्तन की आस लगभग छोड़ ही दी है। लगता है सबकुछ ऐसे ही चलता रहेगा। थोड़ा बहुत इधर या उधर पैबन्द लगाकर। सिद्धान्त और व्यवहार में भयंकर अंतर बना रहेगा। दौड़ की रेखा सबसे पहले छूने वाले (First Past the Post) को ही विजेता घोषित करने वाली चुनाव की प्रक्रिया में आमूल-चूल परिवर्तन तो होने से रहा। आम आदमी की आदर्श छवि इस धरा-धाम पर हकीकत बनकर आने से रही। भले ही इस नाम की टोपियाँ लगाने वालों की संख्या बढ़ती रहे। अतः एक नागरिक होने के नाते मैं खुद को भारतीय लोकतंत्र का गुनहगार मानता हूँ… आपको भी… और आपको भी…।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
satyarthmitra.com

शुक्रवार, 30 नवंबर 2012

सुधार की जरूरत है क्या?

हमारा समाज बेईमानी, भ्रष्टाचार व अकर्मण्यता के प्रति उदासीन क्यों है?

चार साल पहले लिखी एक पोस्ट में मैंने पूछा था कि यह सरकारी ‘असरकारी’ क्यों नहीं है? तब मैंने जिलों में अपनी तैनाती के अनुभव के आधार पर यह प्रश्न रखा था। पिछले चार साल में इस निराशाजनक स्थिति से उबरने का कोई रास्ता तो मुझे नहीं दिखायी दिया लेकिन सरकारी तंत्र में मुख्यालय स्तर पर कार्य करने के बाद मुझे यह विश्वास हो गया है कि मेरी वह चिन्ता ही बेकार थी। यहाँ तो सरकारी तंत्र को असरकारी बनाने की कोई खास आवश्यकता ही नहीं महसूस की जा रही है। फिर तो कोई गंभीर कोशिश किये जाने का प्रश्न ही बेमानी है। इस स्थिति में कोई सकारात्मक सुधार होने की सम्भावना तो मृग मरीचिका सी हो गयी है।

मैंने फील्ड स्तर पर देखा था कि गाँव-गाँव में खोले गये प्राथमिक स्तर के सरकारी स्कूलों की तुलना गली-गली में उग आये प्राईवेट नर्सरी स्कूलों या तथाकथित साधारण ‘कान्वेन्ट स्कूलों’ से भी करने पर भारी अंतर मिलता है। महानगरों में संचालित उत्कृष्ट पब्लिक स्कूलों की तो बात ही अलग है। एक सरकारी प्राथमिक स्कूल के अध्यापक को जो वेतन और भत्ते (२० से ४० हजार) सरकार दे रही है उसमें किसी साधारण निजी नर्सरी स्कूल के आठ-दस अध्यापक रखे जा सकते हैं। लेकिन एक सरकारी प्राथमिक शिक्षक एक माह में कुल जितने घंटे वास्तविक शिक्षण का कार्य करता है, प्राईवेट शिक्षक को उससे आठ से दस गुना अधिक समय पढ़ाना होता है। विडम्बना यह है कि सरकारी स्कूलों में उन्ही की नियुक्ति होती है जो निर्धारित मानक के अनुसार शैक्षिक और प्रशिक्षण की उचित योग्यता रखते हैं; कहने को मेरिट के आधार पर चयन होता है; लेकिन उनका ‘आउटपुट’ प्राइवेट स्कूलों के अपेक्षाकृत कम योग्यताधारी शिक्षकों से कम होता है। ऐसा क्यों?
उच्च प्राथमिक और माध्यमिक स्तर के जिन निजी विद्यालयों के वेतन बिल का भुगतान सरकारी अनुदान से होने लगता है, वहाँ शैक्षणिक गतिविधियों में गिरावट दर्ज होने लगती है। स्कूल के निजी श्रोतों से वेतन पाने वाले और निजी प्रबन्धन के अधीन कार्य करने वाले जो शिक्षक पूरे अनुशासन (या मजबूरी) के साथ अपनी ड्यूटी किया करते थे, सुबह से शाम तक स्कूल में छात्र-संख्या बढ़ाने के लिए जी-तोड़ मेहनत किया करते थे; वे ही सहसा बदल जाते हैं। सरकार द्वारा अनुदान स्वीकृत हो जाने के बाद सरकारी तनख्वाह मिलते ही उनकी मौज आ जाती है। पठन-पाठन गौण हो जाता है। उसके बाद संघ बनाकर अपनी सुविधाओं को बढ़ाने और बात-बात में हड़ताल और आन्दोलन करने की कवायद शुरू हो जाती है। मुझे हैरत होती है कि एक ही व्यक्ति प्राइवेट के बाद ‘सरकारी’ होते ही इतना बदल कैसे जाता है। उसकी दक्षता कहाँ चली जाती है?
इनकी तुलना में, या कहें इनके कारण ही निजी क्षेत्र के संस्थान जबर्दस्त प्रगति कर रहे हैं। यह प्रगति शैक्षणिक गुणवत्ता की दृष्टि से चाहे जैसी हो लेकिन मोटी फीस और दूसरे चन्दों की वसूली से मुनाफ़ा का ग्राफ ऊपर ही चढ़ता रहता है। बढ़ती जनसंख्या और शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ने के साथ-साथ प्राइवेट स्कूल-कॉलेज का धन्धा बहुत चोखा तो हो ही गया है; लेकिन सरकारी तन्त्र में जगह बना चुके चन्द ‘भाग्यशाली’ (?!) लोगों की अकर्मण्यता और मक्कारी ने इस समानान्तर व्यवस्था को एक अलग रंग और उज्ज्वल भविष्य दे दिया है।
आई.आई.टी., आई.आई.एम. और कुछ अन्य प्रतिष्ठित केन्द्रीय संस्थानों को छोड़ दिया जाय तो सरकारी रोटी तोड़ रहे अधिकांश शिक्षक और कर्मचारी-अधिकारी अपनी कर्तव्यनिष्ठा, परिश्रम, और ईमानदारी को ताख पर रखकर मात्र सुविधाभोगी जीवन जी रहे हैं। इनके भ्रष्टाचार और कर्तव्य से पलायन के नित नये कीर्तिमान सामने आ रहे हैं। जो नयी पीढ़ी जुगाड़ और सिफारिश के बल पर यहाँ नियुक्ति पाकर दाखिल हो रही है, वह इसे किस रसातल में ले जाएगी उसकी सहज कल्पना की जा सकती है।
corruption in vote
(India Against Corruption से साभार)
इस माहौल को नजदीक से देखते हुए भी मैं यह समझ नहीं पाता कि वह कौन सा तत्व है जो एक ही व्यक्ति की मानसिकता को दो अलग-अलग प्रास्थितियों (status) में बिलकुल उलट देता है। अभावग्रस्त आदमी जिस रोजी-रोटी की तलाश में कोई भी कार्य करने को तैयार रहता है, उसी को वेतन की गारण्टी मिल जाने के बाद वह क्यों कार्य के प्रति दृष्टिकोण में यू-टर्न ले लेता है?
प्रशासनिक तंत्र के उच्च सोपानों पर स्थिति और भी दहलाने वाली है। जनता का वोट और विश्वास पाकर सत्ता में केबिनेट मंत्री बनने के बाद अथवा लोक सेवा आयोग की कठिन परीक्षा में उत्कृष्ट प्रदर्शन से चयनित होने के बाद ब्यूरोक्रेसी के तमाम बड़े ओहदेदार अपने अधिकार को धन कमाने के अवसर के रूप में प्रयोग करते देखे जा रहे हैं। जनसेवा को प्रेरित करने वाली संवेदना और पिछड़े तबके का विकास करने की इच्छाशक्ति जैसी बातें अब खोखली और हास्यास्पद सी लगने लगी हैं। राष्ट्रीय सामाचारों में ऐसे लोग लगातार अपनी जगह बना रहे हैं जो उच्च पदो पर रहते हुए सीधे जेल चले जा रहे हैं। केबिनेट मंत्री के स्टेटस से सीधे फरार अपराधी के स्टेटस में परिवर्तन फेसबुक स्टेटस से भी तेज होने लगा है। राज्य अल्पसंख्यक आयोग का अध्यक्ष रहते हुए हत्या की वारदात में धरा जाना कितना शर्मनाक है? राष्ट्रीय समाचार चैनेल के संपादकों का एक उद्योगपति से  कथित डील करने के चक्कर में जेल चले जाना क्या बताता है? यह हमारी पॉलिटी के बारे में बहुत ही खतरनाक संकेत देता है।
सी.ए.जी. जैसी संस्थाओं द्वारा गलती पकड़े जाने पर गलती का सुधार करने के बजाय सी.ए.जी. को घेरने की ही कोशिश की जाती है। खतरे का संदेश समझने और सही राह चुनने के बजाय संदेशवाहक को ही चुप करा देने की कुटिल चाल (shooting the messenger) पूरे राजनीतिक तंत्र की शैली हो गयी है। अरविन्द केजरीवाल जैसे उत्साही नायक कुछ करना भी चाहते हैं तो पूरा तंत्र अपनी पार्टी लाइन छोड़कर एकजुट हमलावर हो जाता है। अन्ना हजारे समस्याएँ तो गिनाते हैं लेकिन समाधान की राह पर चलने में संकोच करते हैं और भ्रष्टाचार की लड़ाई बीच में ही अटक कर रह जाती है।
राज्य सरकारों की नीतियों पर पोन्टी चढ्ढा जैसे कुटिल कारोबारियों का प्रभाव तो आम जनश्रुति हो गयी है लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर जो नीतियाँ बनायी जा रही हैं उनका छिछलापन भी सहज ही उजागर हो जाता है। गरीबों को नगद सब्सिडी देने की योजना के पीछे जो तर्क दिये जा रहे हैं उनका व्यावहारिक धरातल पर कोई दर्शन नहीं होने वाला। लोगों का मानना है कि तमाम गरीबोन्मुखी सरकारी योजनाओं की तरह हमारा भ्रष्ट तंत्र इसपर भी डाका डालने से बाज नहीं आएगा। आखिर ऐसा क्यों है?
क्या हम मान चुके हैं कि हम जैसे हैं वैसे ही रहेंगे? हमें सुधरने की कोई जरूरत नहीं है। यह प्रकृति-प्रदत्त तो नहीं है। फिर क्या हम अभिशप्त हैं, एंवेई…?
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

रविवार, 30 सितंबर 2012

भ्रष्टाचार की संजीवनी तो जरूरी है

Corruptionलखनऊ से इलाहाबाद के लिए गंगा-गोमती एक्सप्रेस की यात्रा इस बार बहुत रोचक रही। लम्बी प्रतीक्षा के बाद पदोन्नति मिली तो उत्साह वश अपनी सेवा पुस्तिका पूरी कराकर मुख्यालय से संबंधित उस दफ़्तर तक इसे स्वयं पहुँचाने चल पड़ा था जहाँ से मेरी सेवा के क्लास-वन ऑफीसर्स की वेतन पर्ची जारी होती है। इसी बहाने इलाहाबाद के अपने कुछ मित्रों व सहकर्मियों से मिलने-जुलने की इच्छा भी पूरी हो जाती।

संयोग से अगले दिन इलाहाबाद में प्रदेश के सरकारी डिग्री कालेजों में प्रवक्ता पद की कोई परीक्षा होनी थी इसलिए पूरी गाड़ी के साथ-साथ उस ए.सी. चेयरकार में बहुत से परीक्षार्थी भी बैठे हुए थे। इनमें अधिकांश पी-एच.डी. कर चुके होंगे या कर रहे होंगे। यू.जी.सी. की नेट परीक्षा (National Eligibility Test)  तो सबने पास की ही होगी। ये बड़ी उम्र के लड़के-लड़कियाँ उच्च शिक्षा के क्षेत्र में अपना कैरियर बनाने का सपना लिये एक स्क्रीनिंग टेस्ट देने जा रहे थे। अधिकांश के हाथ में नोटबुक या कोई गाइडबुक थी जिसे वे अंतिम समय तक पढ़ने वाले थे। कुछ शादी-शुदा लड़कियाँ अपने पति, भाई या पिता के साथ जा रहीं थीं। इस टेस्ट में जो पास हो जाएंगे उनका साक्षात्कार होगा। साक्षात्कार में सफलता का जो मंत्र इन लोगों की चर्चा में सुनने को आया वह एक ऐसे तंत्र के बारे में था जो अभ्यर्थी की मेरिट और विषय में योग्यता के बजाय दूसरी क्षमताओं को चयन का आधार बनाता था। पैसा और पहुँच के बिना सफलता की आशा करने वाले न के बराबर थे। मुझे झटका लगा। चकित भाव से मैंने उन्हें अपने अनुभव के बारे में बताया कि कैसे एक साधारण परिवार से आकर बगैर किसी उत्कोच या सिफारिश के लोक सेवा आयोग द्वारा मैं एक राजपत्रित सेवा के लिए चयनित कर लिया गया था। इसपर उन्होंने यह माना कि आयोग में पी.सी.एस. की मुख्य परीक्षा तो लिखित होती है और साक्षात्कार पर सबकुछ निर्भर नहीं होता। इसलिए वहाँ अभी गनीमत है, लेकिन जहाँ सबकुछ इण्टरव्यू पर निर्भर है वहाँ हालत बहुत खराब है।

मैंने अशासकीय विद्यालयों के शिक्षकों के चयन के लिए माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड और  उच्च शिक्षा सेवा आयोग में धाँधली की बातें सुन रखी थीं लेकिन लोक सेवा आयोग में भी इस बीमारी ने पैर पसार रखे हैं यह सुनकर चिन्ता हुई। मैं सोचने लगा कि क्या इस संवैधानिक संस्था से भी अब मेहनतकश होनहार अभ्यर्थियों को निराशा ही हाथ लगेगी। आयोग के माननीय सदस्य क्या हमारे पतनोन्मुख समाज की प्रतिच्छाया बनते जा रहे हैं?

एक तरफ कुछ सरकारी महकमें के लोग बैठे थे जो सरकारी अफसरों की अलग-अलग श्रेणियों का बखान कर रहे थे। वे इन परीक्षार्थियों को यह समझा रहे थे कि केजरीवाल जैसे लोगों के बहकावे में मत आयें। सरकारी नौकरी करनी है तो प्रैक्टिकल एप्रोच अपनाएँ। नौकरी पाने के लिए आपको जो रास्ता अपनाना पड़ रहा है वही आगे भी काम आएगा। अन्तर यह है कि अभी आप बेरोजगार हो और मजबूर हो। नौकरी पाने के बाद आप प्रिविलेज्ड क्लास में शामिल हो जाओगे। …अन्ना जी आन्दोलन तो कर सकते हैं, भ्रष्टाचार के खिलाफ जनभावना भी  उभार सकते हैं लेकिन जब इसको मिटाने के लिए सही आदमी तलाशने जाओगे तो कोई नहीं मिलेगा।  …सरकारी सिस्टम में रहते हुए जो ईमानदारी की कोशिश करता है उसको इतनी अधिक समस्याएँ झेलनी पड़ती हैं कि वह अन्ततः टूटकर सरेन्डर कर देता है या समाज में उपेक्षित होकर डिप्रेसन का शिकार हो जाता है। कुछ नौजवान इस बात पर अविश्वास में सिर हिला रहे थे।

इसपर मुझे पिछले दिनों लखनऊ की एक घटना याद आ गयी जिसमें एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने अचानक अपने ऑफिस में मीडिया को बुलाकर कैमरे के सामने अपनी दर्द भरी दास्ताँ सुना दी थी कि कैसे उनके ऊपर उच्चाधिकारियों द्वारा गलत काम करने का दबाव बनाया जा रहा है और इन्कार करने पर भयंकर उत्पीड़न किया जा रहा है। मीडिया ने जब उस उच्चाधिकारी से दरियाफ़्त की तो पता चला कि उन्होंने इन्हें मानसिक अवसाद का शिकार बता दिया और उनको अस्पताल भेजने की सलाह दे डाली।

“भाई साहब यह प्रैक्टिकल एप्रोच क्या होता है?” पीछे से एक उम्रदराज दढ़ियल अभ्यर्थी ने अपनी कॉपी में से सिर उठाकर पूछा। महौल में ठहाके की आवाजें भर गयीं।

रिटायरमेन्ट के करीब लग रहे एक बुजुर्गवार ने अपने अनुभव की टोपी उतारते हुए मुड़कर देखा और बताने लगे- देखो भाई जब सरकारी नौकरी करोगे तो इसकी हर रोज जरूरत पड़ेगी। इसके बिना नौकरी कर ही नहीं पाओगे। प्रैक्टिकल एप्रोच नहीं रखोगे तो चारो ओर से परेशान रहोगे।

प्रश्नकर्ता अपनी सीट से उठकर इनके पास आ गया। इन्होंने आगे समझाया- एक सरकारी कर्मचारी को लोकसेवक कहा जाता है और उसके आचरण की एक नियमावली बनायी गयी है। इस नियमावली का पालन नहीं करने पर आपको चेतावनी से लेकर निन्दा प्रविष्टि तक दी जा सकती है और डिमोशन से लेकर बर्खास्तगी तक की जा सकती है। इससे बचने के लिए आपको आदर्श आचरण का पालन करना होता है; लेकिन केवल कागज में, क्योंकि असल व्यवहार में तो यह संभव ही नहीं है। जो असल में कोशिश करता है वह असल में ‘सस्पेन्ड’ हो जाता है। कारण यह है कि नियम से काम करने पर और अपने पद की सारी जिम्मेदारी पूरा करने पर आप बाकी सबलोगों के लिए परेशानी खड़ी कर देते हैं। दूसरों की लूट-खसोट पर ब्रेक लगाकर आप ज्यादा समय तक टिक नहीं सकते। इनका तगड़ा गिरोह आपको हिला देगा…।

इस प्रवचन के श्रोताओं की संख्या बढ़ती जा रही थी।

…आप बहुत अच्छा काम करेंगे तो बाकी नक्कारों की कलई खुलने लगेगी और वे आप के ऊपर नाराज हो जाएंगे। आपके ईमानदार होने से सिस्टम में थोड़ी बहुत हलचल तो हो सकती है लेकिन कोई बड़ा परिवर्तन नहीं हो पाएगा। …यह समाज भ्रष्टाचार का इतना आदती हो चुका है कि आपको ‘एलियन’ समझकर किनारे कर देगा। …आप जिनका खेल बिगाड़ेंगे वे आपको यूँही नहीं छोड़ देंगे। आपकी कुर्बानी ले ली जाएगी। …आपके बीबी-बच्चे आपको नकारा समझेंगे। आप उनके लिए महंगे खिलौने, कीमती कपड़े और भारी गहने नहीं खरीद पाएंगे तो आपको वे आदर्श पिता या पति नहीं समझेंगे। दूसरे रिश्तेदार भी आपको किसी काम लायक नहीं देखेंगे तो मुँह मोड़ लेंगे। …मैं यह नहीं कह रहा कि आप आकंठ भ्रष्टाचार में डूब जाएँ। लेकिन इससे बचकर रहना बहुत मुश्किल है। इसलिए आप भले ही किसी का गला न काटें, गबन और घोटाला न करें, गरीबों का हक न छीनें लेकिन सिस्टम के खिलाफ उल्टी धारा बहाने की कोशिश भी न करें। आपको चोरी नहीं करनी है तो न करें लेकिन दूसरों की राह का रोड़ा भी न बनें।

लेकिन प्रैक्टिकल एप्रोच क्या है श्रीमन्‍, यह तो क्लीयर कीजिए…! एक किशोर ने चुहल की।

आप अभी भी नहीं समझे? तो साफ-साफ जान लीजिए कि प्रैक्टिकल एप्रोच इस बात में विश्वास करना है कि बिना भ्रष्टाचार के यह वास्तविक दुनिया चलने वाली नहीं है। व्यावहारिक रूप से किसी न किसी रूप में भ्रष्टाचार को स्वीकारना पड़ेगा। इसके बिना जीवन चलाना असम्भव है। यह एक ऐसी संजीवनी है जो आदमी को जीने की राह दिखाती है, निराश व्यक्ति को सफलता के सूत्र पकड़ाती है, बेमौत मरने वाले को नया जीवन देती है और साधारण को असाधारण बना देती है। आप देखिए न एक साधारण सी कुरूप दलित स्त्री को महल की महारानी बनाकर तमाम ऐश्वर्य और सुख साधन की स्वामिनी बना दिया इस शक्ति ने।

वहाँ की चर्चा रोचक होती जा रही थी। एक विशेषज्ञ ने तो यहाँ तक कह दिया कि जो अधिकारी सुविधा शुल्क लेकर समय से सही काम कर दे वह उस कथित ईमानदार से बेहतर है जो पैसा तो नहीं लेता है लेकिन काम का निपटारा करने में भी कोई रुचि नहीं लेता है। इसपर लगभग एक राय बनती दिखी। इसपर एक गणित के विद्यार्थी ने अधिकारियों की ग्रेडिंग के लिए एक चार्ट बनाना शुरू कर दिया। पैसा लेने वाले, पैसा न लेने वाले, सही काम करने वाले या न करने वाले तथा गलत काम करने वाले या न करने वाले अधिकारियों के क्रमचय-संचय (permutation-combination) के द्वारा निम्न श्रेणियाँ निकलकर आयीं :

क्र.

पैसा लेना

सही काम करना

गलत काम करना

श्रेणी

1

N

Y

N

उत्कृष्ट

2

Y

Y

N

उत्तम

3

Y

Y

Y

भ्रष्ट/लोभी

4

Y

N

N

धुर्त/लतखोर

5

Y

N

Y

महाभ्रष्ट

6

N

Y

Y

मूर्ख

7

N

N

Y

महामूर्ख

8

N

N

N

निकृष्ट

इस प्रकार श्रेणियों की चर्चा में प्रत्येक श्रेणी के अधिकारियों के उदाहरण पेश किये जाने लगे। मैं सहमा सा चुपचाप सुनता रहा; और अपने आसपास के अधिकारियों में भी ऐसे उदाहरण खोजता रहा। मेरे पन्द्रह साल के सरकारी अनुभव में लगभग सभी प्रकार के अधिकारी और कर्मचारी देखने-सुनने को मिले हैं। इसी विचार मंथन में डूबा था कि अचानक प्रयाग स्टेशन पर गाड़ी रुकी और मैंने हड़बड़ाकर अपना बैग उठा लिया और बोगी से बाहर आ गया…।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

गुरुवार, 31 मई 2012

पारा चढ़ता जाये रे…

आज मई माह का आखिरी दिन है। यह सबसे गर्म रहने वाला महीना है। ज्येष्ठ मास का आखिरी मंगल जिसे यहाँ लखनऊ में ‘बड़ा मंगल’ के रूप में मनाया जाता है वह भी बीत चुका है। बजरंग बली को खुश करने लिए भक्तजन इस महीने के सभी मंगलवारों को पूरे शहर में नुक्कड़ों और चौराहों पर भंडारा लगाते हैं। खान-पान के आधुनिक पदार्थों का मुफ़्त वितरण प्रसाद के रूप में होता है। कम से कम मंगलवार के दिन शहर में कोई भी व्यक्ति भूखा-प्यासा नहीं रहने पाता। गरीब से गरीब परिवार के सदस्य भी छक कर प्रसाद ग्रहण करते हैं। लेकिन गर्मी का मौसम जब उफ़ान पर हो तो एक दिन की राहत से क्या हो सकता है। पारा तो चढ़ता ही जा रहा है। देखिए इस ताजे गीत में :

ग्रीष्म-गीत

  पारा चढ़ता जाये रे, आतप बढ़ता जाये रे...
बैठ बावरा मन सिर थामे गीत बनाये रे...Confused smile

हवा आग से भरी हुई नाजुक तन को झुलसाये
छुई-मुई कोमल काया अब कैसे बाहर जाये
रिक्शे तांगे बाट जोहते काश सवारी आये
निठुर पेट की आग बड़ी जो देह थपेड़े खाये
भीतर बाहर धधकी ज्वाला कौन बुझाए रे...
                      पारा चढ़ता जाये रे, आतप बढ़ता जाये रे...Sick smile

भारत की सरकार चल रही देखो राम भरोसे
प्रतिपक्षी की बात कहें क्या सहयोगी भी कोसे
सत्यनिष्ठ बेदाग छवि हुई बे-पेंदी का लोटा
खरे स्वर्ण का धोखा था जो अब जाहिर है खोटा
विविध स्वार्थ के रंग पगड़िया रंगती जाये रे... 
                       पारा चढ़ता जाये रे, आतप बढ़ता जाये रे...Ninja

भ्रष्टाचारी मायावी इक राज हटा तो क्या है
है पतवार नये हाथों में माझी नया-नया है
चाचा-ताऊ वही पुराने अपनी टेक जमाये
पासा पलटा नागनाथ का साँपनाथ जी आये
रंगदारी का बढ़ा हौसला धूम मचाये रे... 
                       पारा चढ़ता जाये रे, आतप बढ़ता जाये रे...Hot smile

अन्ना जी की लुटिया डूबी फूट रहे सहयोगी
कुनबे में ही मची रार अब कौन लड़ाई होगी
लोकपाल नेपथ्य में गया भ्रष्टाचारी आगे
काले धन का झंडा लेकर रामदेव जी भागे
बियावान में आम आदमी खड़ा ठगाये रे... 
                       पारा चढ़ता जाये रे, आतप बढ़ता जाये रे...Steaming mad

गया चुनावी मौसम तो फिर कूद पड़ी महँगाई
कपटनीति खुल गयी तेल ने भारी चोट लगाई
आई.पी.एल. का बुखार लो जा बैठा कलकत्ते
ममता दीदी मेहरबान हो फेंक रही हैं पत्ते
भारत बन्द कराये नेता बहुत सताये रे ...
                        पारा चढ़ता जाये रे, आतप बढ़ता जाये रे...Flirt female

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

       इस गीत को लिखने की प्रेरणा एक खूबसूरत किताब देखकर मिली जिसमें ढेर सारे गीत हैं। आदरणीय सतीश सक्सेना जी ने अपने गीतों का संकलन मुझे भेंट किया। इस पुस्तक की भूमिका ने भावुक कर दिया। इसमें सतीश जी ने अपने हृदय के भाव उड़ेल कर रख दिये हैं। वाह…!

mere geet 002 mere geet 001

मेरे गीत - सतीश सक्सेना

ज्योतिपर्व प्रकाशन

99, ज्ञान खंड-3, इन्दिरापुरम

गाजियाबाद : 201012

सत्यार्थमित्र

रविवार, 1 जनवरी 2012

जाओ जी, अच्छा है…

 

happy_new_year_2012_by_abu_hany-d4ksy1k_largeअच्छा जी, जाओ !

बड़ी राहत मिलेगी शायद
तुमने एक साल तक हमें परेशान रखा
कितने करोड़
नहीं, कितने अरब
या उससे भी कहीं ज्यादा
चोर उड़ा ले गये

चोर नहीं, डकैत कहना चाहिए
सबकी आँखों के सामने ही तो लूट होती रही
मीडिया जानती थी
टीवी पर रोज डिबेट होती थी
पत्रकार रपट देते थे
सी.ए.जी. की ऑडिट बताती थी
बाबा भी चिल्‍लाते रहे
अन्ना भी अनशन करते रहे
लेकिन तुमने सब हो जाने दिया
नामाकूल !

संसद की दीवारों के भीतर 
लोकतंत्र को कैद करने की कोशिश
फिलहाल सफल हो जाने दी तुमने
रामलीला मैदान और जंतर मंतर  की हुंकार
बन गयी
नक्कारखाने में तूती की आवाज
भ्रष्टतंत्र को तुमने जीत जाने दिया 
तुमने थका दिया इतना कि
लोकतंत्र को बुखार आ गया
थोड़ी सहानुभूति के शब्द सुनाकर तुम भी चलते बने
कुछ लोगों के साथ

मामूल के मुताबिक
तुम्हारी विदाई पर जश्न का माहौल है
लेकिन किसी खुशफहमी में मत रहना
दर‍असल यह तुम्हारे उत्तराधिकारी के आगमन का जश्न है
तुम्हारे जाने से हम भावुक होकर दुखी हो जाएंगे
ऐसा नहीं है
तुम्हारा तो जल्दी से जल्दी चला जाना ही अच्छा है
बुरा मत मानना
लेकिन यह बता देना जरूरी है
तुमने बहुत दुखी किया

बस एक खुशी मिली थी
जब अठ्ठाइस साल बाद एक वर्डकप दिलाया था तुमने
लेकिन इस खेल की एक किंवदन्ती को नहीं दिला सके
एक अदद शतक जो हो सकता था महाशतक
पाजी कहीं के !

तुमसे निजात पाकर
हम नये सिरे से आशा कर सकते हैं
शायद इस बार बिल पास हो जाय
उस कानून का जन्म हो जाय
जिसके लिए एक फकीर ने देश को जगाने का प्रयास किया
शायद उसे इस बार सफलता मिल जाय

लेकिन डर भी है
कौन जाने
तुम्हारे पीछे तुमसे भी ज्यादा
धुर्त और पाज़ी आ रहा हो

इसी लिए हम प्रार्थना कर रहे हैं
अब जो आये वह अच्छा ही आये
नया साल शुभ हो

!!! हार्दिक शुभकामनाएँ !!!

(चित्रांकन : http://weheartit.com/entry/20302771 से साभार)

बुधवार, 28 सितंबर 2011

रेलयात्रा हमें सहिष्णु बनाती है…

हमें स्कूल में भारतीय संस्कृति की विशेषताएँ विषय पर निबन्ध रटाया गया था। इसमें एक विशेषता थी- सहिष्णुता। इस विशेषता को लेकर मेरे मन में कौतूहल होता रहा है। भूख, भय, बेरोजगारी, प्राकृतिक आपदा या किसी दुर्घटना  से उत्पन्न दुख व विपत्ति को सहन कर लेने की क्षमता यदि हमारे भीतर प्रचुर मात्रा में है तो अच्छा ही है। हमें उस विपरीत परिस्थिति से बाहर निकलने में मदद मिलती है। लेकिन यदि इस फेर में हमें कुछ भी सह लेने की आदत पड़ जाय तो वही होता है जो भारत के साथ हुआ है। इतिहास बताता है कि किस तरह हमने विदेशी लुटेरों और आक्रान्ताओं को भी आराम से सहन कर लिया। घर बुलाकर मेहमान बनाया और फिर मालिक बनाकर देश की राजगद्दी सौंप दी। एक के बाद एक भ्रष्टाचारी कीर्तिमान हमारी आँखों के सामने बनते जाते हैं और हम मूक दर्शक बनकर या “अन्ना हजारे जिन्दाबाद” का नारा लगाकर घर बैठ जाते हैं। हमारे भीतर अन्याय, अत्याचार, शोषण, और भ्रष्टाचार के प्रति गजब की सहनशक्ति विकसित हो चुकी है। इस उपलब्धि के पीछे हमारी भारतीय रेल का भी थोड़ा हाथ है इसका विचार मेरे मन में पिछली यात्रा के दौरान प्रकट हुआ।

मेरा अनुभव कुछ नया नहीं है। आप सबको इस स्थिति का सामना आये दिन होता होगा। एक आम भारतीय के लिए रेलगाड़ी से यात्रा करना अपनेआप में एक मजबूरी है। एक मात्र सस्ता और टिकाऊ विकल्प यही है, सुन्दर भले ही न हो। a-crowded-passenger-trainलम्बी दूरी की गाड़ियो के जनरल डिब्बे किस प्रकार जीवित मानव देह की लदान करते हैं; और जायज टिकट वालों को भी किसप्रकार थप्पड़ खानी पड़ती है और अंटी ढीली करनी पड़ती है, यह वर्णनातीत है। मैं उस चरम स्थिति की चर्चा नहीं कर रहा हूँ। मैं तो अपेक्षाकृत अधिक सुविधा सम्पन्न श्रेणियों में यात्रा करने वालों में से एक होकर उससे प्राप्त अनुभव के आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि रेलयात्रा हमें सहिष्णु बनाती है और इस प्रकार भारतीय संस्कृति की रक्षा में अनुपम योगदान दे रही है।Open-mouthed smile

हाल ही में मुझे अपनी माता जी के खराब स्वास्थ्य की चिन्ता से गोरखपुर जाना हुआ। वहाँ से लखनऊ वापसी की यात्रा रविवार 25 जुलाई, 2011 को अवध एक्सप्रेस से करनी थी जिसका निर्धारित समय दोपहर 1:15 का था। गाड़ी पकड़ने से पहले मुझे अम्मा को हड्डी के डॉक्टर से दिखाना था। अलस्सुबह उठकर मैंने डॉक्टर के यहाँ नम्बर लगाया, क्‍लिनिक खुलने पर लाइन लगाया, डॉक्टर ने प्रारम्भिक जाँच के बाद डिजिटल एक्स-रे के लिए अन्यत्र भेजा। वहाँ एक घंटे लगे। वापस आकर उन्होंने रिपोर्ट देखी और दवाएँ लिखने के बाद दो अन्य विशेषज्ञ चिकित्सकों (न्यूरोलॉजिस्ट और गैस्ट्रोइंटेरोलॉजिस्ट) को रेफ़र कर दिया। दोनो जगह जाने पर पता चला कि रविवार होने से इनके क्‍लिनिक बन्द थे। मेरे बड़े भैया ने कहा कि वे अम्मा को अगले दिन दिखा देंगे। यानि मुझे अब लखनऊ की गाड़ी पकड़ने के लिए स्टेशन जाना चाहिए। मैं यह सब दौड़-धूप करता हुआ लगातार मोबाइल से गाड़ी के प्रस्थान समय की सूचना ले रहा था।

गाड़ी 50 मिनट लेट होने की कम्प्यूटरीकृत सूचना मोबाइल पर एक बार शुरू हुई तो अन्ततक रिकार्ड बदला नहीं गया। मैं उसी के अनुसार स्टेशन पहुँचा तो पू्छताछ केन्द्र पर लगा बोर्ड गाड़ी के 30 मिनट देरी से  7-नम्बर प्‍ले‍टफॉर्म पर आने की सूचना दे रहा था। मेरे हाथ पाँव फूल गये। दौड़ता-भागता हुआ मैं ओवरब्रिज पर चढ़कर प्‍ले‍टफॉर्म नम्बर-7 पर उतरा। एक दिक्कत यह भी हुई कि ओवरब्रिज से प्‍ले‍टफॉर्मों पर उतरने वाली सीढ़ियों के पास प्‍ले‍टफॉर्म संख्या दर्शाने वाले बोर्ड नदारद थे। मुझे एक मिनट रुककर पहले नम्बर से गिनती करते हुए सातवें नम्बर का अनुमान लगाना पड़ा।

प्‍ले‍टफॉर्म पर अधिकांश यात्री अपना सामान हाथ में संभाले गाड़ी आने की दिशा की ओर देख रहे थे। मुझे आश्वस्ति हुई कि अभी गाड़ी आयी नहीं है, बल्कि कुछ ही देर में आने वाली है। दस-पन्द्रह मिनट बीते और गाड़ी नहीं आयी तो सबने अपने हाथ में टँगा सामान नीचे रखना शुरू किया और अपनी जगह पर वापस आने लगे। कुछ देर खड़ा रहने के बाद मैं भी थकान के कारण बैठने की जगह खोजने लगा। सारी बेन्चें क्षमता से अधिक भार से लदी हुई थीं। रेलगाड़ी चलाने वाले गार्ड्स के उपयोग हेतु बने लकड़ी या लोहे के बक्से बड़ी मात्रा में वहीं बिखरे पड़े थे। उनपर भी यात्रियों ने कब्जा जमा रखा था। एक जगह बक्से एक के ऊपर एक रखे हुए थे जो ऊँचे हो जाने के कारण खाली थे। मैं उचककर ऐसे ही एक बक्से पर बैठ गया। निचले बक्से के कोने की टिन फटी हुई थी जिसमें मेरे पैंट की मोहरी उलझ गयी लेकिन संयोग से कोई चीरा नहीं लगा।

मोबाइल पर कम्प्यूटरीकृत सूचना अभी भी वास्तविक आगमन समय 13:55 और वास्तविक प्रस्थान समय 14:00 बजे का बता रही थी जबकि सवा दो बज चुके थे और गाड़ी का कुछ पता नहीं था। कुछ देर बाद सात नम्बर प्‍ले‍टफॉर्म पर ही दूसरी दिशा से (लखनऊ की ओर से) एक गाड़ी आकर रुकी। इस पर भी अवध एक्सप्रेस लिखा था। कुछ लोग इसपर चढ़ने का उपक्रम करने लगे। ये वो थे जिन्हें अपने गन्तव्य की सही दिशा का ज्ञान नहीं था। गनीमत थी कि यह इस गाड़ी का आखिरी स्टेशन था और यात्रियों के उतरने के बाद रेलकर्मी इसकी खिड़कियाँ और दरवाजे बन्द करने लगे। मुझे अब यह चिन्ता हुई कि इस गाड़ी के प्‍ले‍टफॉर्म खाली करने में कम से कम आधे घंटे तो लगेंगे ही, इसलिए मेरी गाड़ी अभी आधे घंटे और नहीं आ सकेगी। तभी घोषणा हुई कि अवध एक्सप्रेस थोड़ी ही देर में दूसरी ओर प्‍ले‍टफॉर्म नम्बर-6 पर आ रही है। सभी यात्री अपना सामान उठाकर उसी प्‍ले‍टफॉर्म पर एक तरफ़ से दूसरी तरफ़ हो लिए।

three_tier_air_conditioned_करीब सवा तीन बजे गाड़ी नमूदार हुई। हम थके-हारे अपना ए.सी. थर्ड कोच नम्बर-B2 ढूँढकर उसके बर्थ संख्या-11 पर पहुँचे। यह सबसे ऊपर की बर्थ मैंने जानबूझकर ली थी ताकि दिन में भी आराम से लेटकर यात्रा की जा सके। थकान इतनी थी कि तुरन्त सो जाने का मन हुआ। मैंने अटेन्डेन्ट को खोजकर तत्काल बेडरोल ले लेने का सोचा लेकिन वह अपने स्थान पर नहीं मिला। मैं अपनी बर्थ पर लौट आया और यूँ ही लेट गया। सामने की बर्थ से पहले से प्रयोग की जा चुकी एक तकिया लेकर अपने सिर को आराम दे दिया। गाड़ी चल चुकी थी। पन्द्रह-बीस मिनट बाद जब टीटीई साहब आये तो मुझे नींद लग चुकी थी। उनके जगाने पर मैंने आँखें मूँदे हुए ही जेब से टिकट और फोटो आईडी (PAN Card) निकाला और उनकी ओर बढ़ाते हुए अनुरोध किया कि बेडरोल वाले को चादर के साथ भेज दें। उनके आश्वासन से सन्तुष्ट होकर मैं करवट बदलकर सो गया।

करीब एक घंटे बाद एक स्टेशन पर कुछ और यात्री चढ़े। उनका टिकट देखने टीटीई साहब दुबारा आये तो मैंने उठकर बेडरोल की बात याद दिलायी। वे चकित होकर बोले- मैंने तो उससे तभी कह दिया था, क्या अभी तक नहीं दिया उसने? यह कहते हुए वे तत्परता से किनारे की ओर गये और थोड़ी देर में एक लड़के के साथ वापस आये। यह कोच अटेन्डेन्ट था। टीटीई ने उससे कहा कि इन्हें बताओ कि मैंने तुमसे बेडरोल के लिए कहा था कि नहीं। वह बोला- अच्छा, दे देंगे। उसकी लापरवाह शैली से मुझे झुँझलाहट हुई। मैंने अधीर होकर पूछा- कबतक दे दोगे। लखनऊ पहुँच जाने के बाद? इस पर वह तैश में आ गया और बोला- जाओ, नहीं दूँगा (मानो कह रहा था- क्या कल्लोगे!) मैं हतप्रभ सा हो गया। टीटीई साहब को भी यह बहुत बुरा लगा। वे उसे डाँटने जैसा कुछ कहने लगे। उसमें यह बात भी शामिल थी  कि उस लड़के के साथ ही अक्सर ऐसा लफड़ा हो जाता है। मैंने उनसे पूछा- क्या आपके पास इसकी शिकायत दर्ज करने का कोई अधिकार नहीं है? आप मेरी ओर से लिखित शिकायत दर्ज कर लीजिए और उच्चाधिकारियों के संज्ञान में लाइए।

मेरी इस बात पर टीटीई साहब थोड़े संजीदा हो गये। सकुचाते हुए बोले- अरे साहब, यह बात किसको नहीं पता है! जबसे यह काम प्राइवेट ठेकेदारों के हाथ में दे दिया गया है तबसे कोई कंट्रोल नहीं रह गया है। ये किसी की नहीं सुनते। इन्हें कोई डर ही नहीं है। मैं अगर शिकायत करना चाहूँ तो मुझे तमाम कागज बनाने पड़ेंगे, कई बार ऑफिस के चक्कर लगाने पड़ेंगे और परिणाम फिर भी कुछ नहीं मिलेगा। मैंने पूछा- अगर मैं शिकायत करना चाहूँ तो किसे लिखना होगा? वे बोले- वेबसाइट पर देखिएगा। यह गाड़ी (19040/AVADH EXP) पश्चिम रेलवे की है। ठेकेदार भी उन्ही का है। यहाँ से उनके खिलाफ़ कुछ नहीं हो पाता है। आप वहीं शिकायत कीजिए। मैंने तय किया कि घर पहुँचकर रेलवे में उस लापरवाह केयरटेकर की शिकायत ऑनलाइन दर्ज कराऊंगा।

इस कहासुनी के दस-पन्द्रह मिनट बाद उसने मुझे दो चादरें व एक तकिया लाकर दे दिया। कम्बल सामने की बर्थ पर मौजूद था जिसकी जरूरत नहीं थी, और छोटा तौलिया वह किसी को दे ही नहीं रहा था।

मैं अपनी बर्थ पर लेटे हुए इस परिदृश्य पर विचार करता रहा। काश रेलवे का कोई सक्षम अधिकारी बिना किसी पूर्व सूचना के ऐसे यात्री डिब्बों में चुपचाप यात्रा करता और बाद में दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्यवाही करता! wishful thinking!!! मैंने देखा तो यह है कि जब किसी ट्रेन में कोई बड़ा रेल अधिकारी अपने सैलून में चल रहा होता है तो वह ट्रेन भी समय से चलती है और दूसरी यात्री सुविधाएँ भी जैसे- भोजन व जलपान आदि  बेहतर हो जाती हैं। बाकी समय में रेल हमारी सहिष्णुता भरी छाती पर मूँग दलते ही चलती है।

मैं उस डिब्बे में चल रहे अन्य यात्रियों के दृष्टिकोण को परखने की कोशिश करने लगा। मैंने महसूस किया कि रेलवे द्वारा टिकट के पैसों में इस सुविधा के लिए अलग से शुल्क वसूलकर भी इसको वास्तव में उपलब्ध कराने में की जा रही लापरवाही के प्रति लोगों में प्रायः उदासीनता है। जो चिन्तित करने वाली बात है। मैंने देखा कि जिन्हें बेडरोल की तुरन्त जरूरत थी वे कोच के एक सिरे तक जाते और वहाँ उस लड़के से अनुरोध करके अपने लिए चादर वगैरह खुद ले आते। मैंने देखा कि वह लड़का जाने कहाँ से आये अपने साथियों के साथ ताश खेलने में व्यस्त रहा। उसने न तो कोई यूनीफॉर्म पहन रखा था और न ही नाम का कोई बिल्ला लगा रखा था कि उसे पहचाना जा सके। यात्री आपस में भुनभुनाते हुए उसके प्रति असंतोष तो व्यक्त कर रहे थे लेकिन उससे उलझने या उसको टोकने की जरूरत किसी ने नहीं समझी। शायद वे रात में सोने का समय होने की प्रतीक्षा कर रहे थे। शायद तबतक उन्हें बेडरोल अपनेआप ही मिल जाता। लेकिन रात दस बजे लखनऊ पहुँचने तक लगभग सात घंटे की यात्रा में मैंने एक भी बर्थ पर उसे अपनेआप बेडरोल पहुँचाते नहीं देखा।

घर वापस आकर मैं अपनी गृहस्थी और नौकरी में व्यस्त हो गया हूँ। शिकायत दर्ज करने की इच्छा धीरे-धीरे दम तोड़ रही है। तीन दिन बीत जाने के बाद यह हाल आपको बता पाने का मौका पा सका हूँ। यात्रा की तिथि, स्थान, समय व अन्य विवरण वास्तविक रूप से इसलिए उद्धरित कर दिया है कि शायद रेल महकमें का कोई जिम्मेदार अधिकारी इसे पढ़कर कोई स्वतः स्फूर्त कार्यवाही कर डाले। हमें तो परिस्थितिजन्य सहिष्णुता ने घेर लिया है। Confused smile

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

सोमवार, 5 सितंबर 2011

सत्यकथा : अन्ना रे अन्ना…

 

उसे कभी किसी ने सराहा नहीं था। कभी मेहनत नहीं की थी उसने पढ़ाई में। न ही किसी दूसरे धन्धे में पसीना बहाया था। पिता ने कई जगह लगाना चाहा लेकिन कोई धन्धा कामयाब नहीं हो पाया। काम के प्रति निठल्लापन बार-बार बेरोजगार बना देता। बेरोजगारी का नतीजा - गरीबी। जीवन प्रायः अभावग्रस्त। लेकिन फक्कड़ हालात में भी उसे मौज करने के बहाने मिल ही जाते। संगीत का शौक था उसे। देवी जागरण के मंचों पर उसकी मांग थी। कुछ वाद्य यंत्र बजाना जानता था। भरती का कलाकार था। मुख्य गायक के आने से पहले खाली समय भरने के लिए उसे थोड़ी देर माइक पकड़ने को भी मिल जाता था। रेडियो स्टेशन में उसे लोकगीतों की रिकॉर्डिंग में गायकों  की संगत के लिए झाँझ बजाने का काम मिल जाया करता था। लेकिन वहाँ महीने दो महीने पर एकाध बार ही मौका मिलता।

सरकारी रेडियो के लिए वाद्य यंत्र बजाने वाले कैजुअल कलाकारों को अपनी बारी का बहुत इन्तजार करना पड़ता। इनकी संख्या बहुत अधिक थी और अवसर बहुत कम। मांग कम थी और आपूर्ति ज्यादा, इसलिए भाव गिरना तय था। एक रिकॉर्डिंग का सरकारी पारिश्रमिक था बाइस सौ रूपये, लेकिन अपनी बारी लगवाने के लिए उन्हें इसमें से कुछ कमीशन देना पड़ता। कमीशन देने की परंपरा काफी मजबूत हो चुकी थी। इतनी कि अब सबके लिए नियम बराबर ही था। चाहे जिसकी भी बारी आ जाये उसे पता होता था कि चेक लेने के लिए अपनी जेब में आठ सौ रूपये लेकर जाना होगा। फिर भी घंटे भर की रिकॉर्डिंग के लिए एक दिन का समय लगाकर चौदह सौ रुपये भी मिल जाय तो बुरा क्या है। बेकार ही तो बैठे रहते हैं। इसलिए यह डील स्थायी प्रकृति की हो चुकी थी।

अभी पिछले हफ्ते एक लोकगीत की रिकॉर्डिंग में शामिल होने का उसका नम्बर लगा। शाम को जब चेक लेने की बारी आयी तो कैशियर आदतन उसकी जेब की ओर देखने लगा। मामूल के मुताबिक उसे अपने चेक के लिए आठ सौ रूपये निकालने थे; लेकिन उसकी सुस्ती देखकर कैशियर ने टोका - जल्दी कर भैये, बहुत लोगों को चेक बाँटना है।

-जल्दी तो आपको करनी है भाई साहब, मैं तो कबका झाँझ बजाकर रिकॉर्डिंग पूरी करा चुका हूँ।

-मैंने भी तो कबका चेक तैयार कर लिया है। बस अब फटाफट निपटाओ।

-तो देते क्यों नहीं, देर किस बात की?

-अरे, देर तो तुम कर रहे हो… निकालो हमारा हक दस्तूर!

-यह क्या होता है?

-क्या मजाक कर रहे हो, तुम कोई नये आदमी तो हो नहीं… इतना भी नहीं जानते?

-ओहो…! माफ करिएगा… अब वो बात नहीं हो पाएगी!

-क्यों, चेक नहीं लेना है क्या?

-लेना क्यों नहीं है, लेकिन बिना रिश्वत दिए। हमने अन्ना हजारे से शपथ ली है।

-अन्ना हजारे से…?

-जी हाँ, अब मैं हक दस्तूर के नाम पर रिश्वत नहीं दे सकता।

-अच्छा ले भाई, जब तूने ऐसी शपथ ले ली है तो हम ही क्यों पापी बनें…! आज हम भी कमीशन नहीं लेंगे। ले जाओ भाइयों आज सबको चेक फ्री मिलेगा।

अन्ना रे अन्ना !!!

भक्त : हे भगवान, मेरा प्रोमोशन करवा देना। इक्यावन रुपया का भोग आपके चरणों में रख रहा हूँ।

भगवान : पागल मरवाएगा क्या? अन्ना देख रहा है…।

उपसंहार :  इस हृदय परिवर्तन की घटना के अगले ही दिन उसे एक विश्व बैंक परियोजना (सर्व शिक्षा अभियान) में कंप्यूटर चलाने की संविदा आधारित नौकरी मिल गयी। वह भी बिना कोई रिश्वत दिए।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)