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सोमवार, 18 नवंबर 2024

नई दिशा में साइकिल से सैर

18 नवंबर, 2024

आज लंबे अंतराल के बाद साइकिल_से_सैर का संयोग बना। मुझे "अति सर्वत्र वर्जयेत" के संदेश का उल्लंघन करना भारी पड़ गया था। पिछली बार जब साइकिल लेकर निकला था तो आनंद के अति उत्साह में तय सीमा से अधिक दूर तक चला गया। लौटकर आने के कुछ घंटों बाद रीढ़ की सबसे निचली हड्डी (टेल-बोन) और आसपास की मांसपेशियों में दर्द महसूस होने लगा जो रुक रुककर महीनों तंग करता रहा। मजबूरन मुझे साइकिल छोड़कर जमीन पर आना पड़ा। योगासन, प्राणायाम, ध्यान की कक्षा के बाद 30-40 मिनट जिम में बिताने की दिनचर्या बन गई।

आज हुआ ये कि जिम में पहुंचा तो ट्रेनर महोदय नदारद थे। ऐसी स्थिति में अपनी डायरी देखकर खुद ही तय करना होता है कि किस अंग की मांसपेशी पर वजन डालना है -- यथा पीठ, छाती, पेट, कंधा, बाहें, जंघा, पिंडली, एड़ी, कलाई आदि, और किस प्रकार के वजन से क्या और कितनी क्रियाएं करनी हैं? इस सबका एक जटिल विधान है जिसे नए लड़के शायद याद रख लेते होंगे लेकिन मैं इसे याद रखने की कोशिश भी नहीं करता। किसी सुजान ने सबकुछ डायरी में लिखने की सलाह दी थी जिसका पूरी तरह पालन करता हूं। लेकिन आज मुझे डायरी खोलने का मन नहीं हुआ। ठंडे मौसम की आमद और सोमवार के कारण जिम में भीड़ भी बहुत थी। मन हुआ कि आज एक बार फिर से साइकिल से सैर की जाय। मैं फौरन बाहर निकला और मुख्य सड़क से पुंवारका गांव की ओर  चल पड़ा।

गांव में मुख्य सड़क एक नहर को काटती हुई सहारनपुर की ओर चली जाती है। इसी नहर की पटरी पर एक पक्की सड़क निकलती हुई दिखाई दी तो मैने मुख्य सड़क छोड़कर साइकिल उस ओर मोड़ ली। आज किसी नई सड़क पर जाने का मन था। यह ग्रामीण सड़क सुंदलहेड़ी गांव की ओर जाती है। सड़क के दोनों ओर समतल उपजाऊ खेतों की छटा दिखी। अधिकांश में धान की कटाई की जा चुकी थी और गेहूं बोए जाने का काम प्रगति पर था। कुछ खेतों में तो गेहूं के पौधे उग भी आए थे। वही कुछ खेतों में अभी धान की पराली खड़ी थी। एक खेत में पराली जलाकर छोड़ी हुई थी। कुछ खेतों में गन्ने की फसल तैयार खड़ी थी। खेती-किसानी के काम में मौसम और मिट्टी की गुणवत्ता के  साथ - साथ किसान की कर्मठता, निजी प्रयास और मजदूरों की उपलब्धता की बहुत बड़ी भूमिका है। अगल-बगल के दो खेतों की फसल की तुलना करने पर इसका स्पष्ट अंतर समझ में आता है।

बहरहाल मैं खेतों और उनकी मेड़ पर करीने से लगे पॉपलर के पेड़ों की छटा देखते देखते सुंदलहेड़ी गांव को पार करते हुए दूसरी छोर पर पहुंच गया। कुल 35 मिनट का टाइम सेट कर चुका था जिसमें 20 मिनट बीत गए थे। मैं वापस मुड़कर गांव के बीच से होता हुआ लौटने लगा। गांव के लोग सुबह की बेला में सड़क पर ही टहलते मिले। प्रायः सबके हाथ में मोबाइल था और हर दूसरा व्यक्ति मोबाइल पर सक्रिय था। फोनकॉल, चैटिंग, व्हाट्सएप, रील, फेसबुक, गेम आदि क्या - क्या नहीं है जो आपका स्क्रीन टाइम बढ़ाता ही जा रहा है।

गांव के प्रायः सभी मकान पक्के थे। गांव में किराने के साथ साथ मोबाइल रिचार्ज व एक्सेसरी  की दुकानें थीं और एक जनसेवा केंद्र भी था। पंचायत भवन पर प्रधान पुष्पा देवी और सचिव का नाम लिखा हुआ था। मुख्य सड़क पर ही प्रधान जी की भव्य कोठी भी आकर्षित कर रही थी। इसे रंगीन कपड़ों की लंबी झालर से सजाया गया था जो संकेत कर रहा था कि किसी विशेष उत्सव का आयोजन होने वाला है या हाल ही में हो चुका है।

कई व्यक्ति मुझ जैसे एक अपरिचित को वहां साइकिल पर देखकर आश्चर्य और कौतूहल से लगभग घूरते हुए अपनी नजरों से ही पीछा करते दिखे। लेकिन किसी ने टोका नहीं तो मैं भी सिर झुकाए गांव से बाहर निकल आया। अबतक मोबाइल कैमरा निकालने का विचार कई बार सिर उठा चुका था जिसे मैं दबाता रहा था। लेकिन अंततः जब गांव से स्कूल के लिए निकल रहे बच्चों का क्रम शुरू हुआ तो मुझे इस दृश्य ने मोह लिया। पुंवारका में हमारा विश्वविद्यालय तो अभी खुला है लेकिन यहां नर्सरी स्कूल से लेकर डिग्री कॉलेज तक  बहुत पहले से स्थापित है। वे बच्चे श्री मंगल सिंह मेमोरियल इंटर कॉलेज पुंवारका की ओर जा रहे थे जिसका मुख्य द्वार नहर की पटरी पर ही है। 

कुछ बच्चे पैदल निकले थे जो पीछे मुड़ मुड़कर किसी संभावित लिफ्ट की तलाश कर रहे थे। मेरे सामने ही एक बाइक वाले को रोककर दो बच्चे बैठ गए। तीसरा बच्चा हे! हे! की पुकार करता रहा कि उसे क्यों छोड़ दिया। लेकिन बाइक वाला यह बड़बड़ाते हुए चलता बना कि अगली सवारी/ लिफ्ट की प्रतीक्षा करो। कुछ लड़के और लड़कियां अपनी साइकिल से भी जा रही थीं। एक स्कूटी पर फर्राटे भरती लड़की कदाचित् अपने छोटे भाई को बिठाकर जा रही थी।

कुछ लड़कियां समूह में पैदल जा रही थीं लेकिन उन्हें किसी लिफ्ट की तलाश नहीं थीं। प्रायः सिर झुकाए या आपस में बात करती, किसी अपरिचित से निगाहें बचाती अपना बस्ता सम्हाले चली जा रही थीं। यह अंतर प्रकृति प्रदत्त लिंग भेद है या समाज द्वारा सृजित स्वाभाविक व्यवहार है? इसका निर्णय आप पर छोड़ता हूँ।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)












बुधवार, 17 मई 2023

नहर की पटरी पर साइकिल से सैर

आम के बाग में साइकिल से सैर (भाग –2)

आज आज साइकिल_से_सैर के लिए निकला तो मेडिकल कॉलेज गेट से निकलकर बायीं तरफ़ यानि शहर की ओर मुड़ गया। थोड़ी देर बाद एक नहर मिली जिसकी पटरी पर पक्की सड़क थी। उस सड़क पर स्कूली विद्यार्थियों की टोली आ-जा रही थी। मैंने साइकिल को नहर की पटरी पर मोड़ लिया और दक्षिण-पश्चिम दिशा की ओर चल पड़ा। पीठ पर सूर्य देवता की ताजा किरणों की बौछार हो रही थी।

मेरी दाहिनी ओर नहर पर क्रम से दो-तीन पुलिया ऐसी बनी हुई मिलीं जिनके उस पार कोई सड़क नहीं दिख रही थी। बल्कि खेत और उनके बीच की पगडंडियां ही नमूदार थीं। शायद नक्शे में वहां चकरोड रहा हो जो कालांतर में अगल-बगल के खेतों में समा गया हो।

पटरी पर आगे बढ़ा तो एक पुलिया ऐसी मिली जिसकी दूसरी ओर पक्की सड़क जा रही थी। मैंने साइकिल को पुलिया पार करके गांव की ओर जाती उस सड़क पर दौड़ा लिया। पुलिया पार करते ही सड़क के दोनों ओर बिल्कुल सीधी रेखा में किए गए वृक्षारोपण की सुंदर पंक्तियां दिखाई दीं। मैंने एक क्षण को साइकिल रोक ली और एक-दो तस्वीरें ली। इसमें गांव की ओर से आता हुआ एक लड़का भी दिखा जो एक कुत्ते की डोर थामें उसे टहला रहा था।

सुबह सुबह कुत्ता टहलाने का यह नजारा गांव में देख कर मुझे महसूस हुआ कि शहरी सभ्यता अब गाँव में भी पैर पसार रही है। विकास के बढ़ते कदमों की आहट आगे भी सुनाई दे रही थी जब मैं सड़क के घुमाव को फॉलो करते हुए गांव के भीतर पहुँच गया। वहाँ सुबह-सुबह घरों से बाहर बैठे चाय-पानी करते लोग और जानवरों की सेवा-टहल करते लोग तो मिले ही, गांव के भीतर की सीमेंटेड सड़क के किनारे खुली दुकानों पर पान मसाले के पाउच की लड़ियाँ भी लटकती मिलीं, कुरकुरे और अंकल चिप्स के पैकेट भी थे और ब्रेड मक्खन भी था। मोबाइल सिम और एक्सेसरी के साथ रिचार्ज की दुकान भी थी।

गाँव के भीतर की मोटी-पतली गलियां पकड़ कर आगे बढ़ता हुआ मैं इस विश्वास से चला जा रहा था कि गांव के उस पार पहुंचकर मुझे मुख्य सड़क तो मिल ही जाएगी। मुझे इस बीच एक पतली गली मिली तो वह किसी के घर के अहाते में जाकर समाप्त हो गई। वापस मुड़कर दूसरी तरफ गया तो वहां भी डेड-एंड मिला। मजबूर होकर मुझे करीब 50 मीटर वापस मुड़ना पड़ा। गलियों के तिराहे पर लौटकर जब मैं दूसरी ओर बढ़ा तो गाँव के मुहाने पर बने सामुदायिक शौचालय को देखकर पता चला कि यह वही इस्माइलपुर गांव है जिसकी दूसरी ओर से मैंने पिछले दिनों इसी रास्ते पर प्रवेश किया था। फिर तो मैंने वह राह उल्टी ओर से पकड़ ली जिस पर मुझे पिछली बार खड़ंजा लगाने के लिए ईटों का ढेर, ट्यूबवेल का पानी, बेल का पेड़ और अमराइयाँ मिली थीं।

खड़ंजे का कार्य आगे बढ़ चुका था। ईंटों के कुछ नए ढेर रास्ते में जमा थे। दुपहिया वाहन वालों ने सड़क से उतरकर खेतों में बाईपास बना लिया था। मैंने भी इस ऊबड़-खाबड़ बाईपास में साइकिल लहराते हुए बाधा पर की और उस ट्यूब वेल पर रुका। पिछली बार की दमित इच्छा की पूर्ति इस बार कर ही दिया। जमीन के भीतर से निकलते शीतल जल को चेहरे पर छपकारने का लोभ संवरण करने की जरूरत नहीं महसूस हुई।

आगे बढ़कर मुझे आम के टिकोरों से लदे अनेक पेड़ मिले। खेतों में सीमेंट की मजबूत बाड़ लगाने की तैयारी में खड़े खंबो की पंक्ति मिली और खुले मैदान में एकाकी खड़ा एक ऐसा वृक्ष भी मिला जिसने मुझे बरबस रोक लिया। आम के फल से लदे इस गोल-मटोल पेड़ के साथ मेरी साइकिल ने भी फोटो खिंचाया। आसपास कोई प्रहरी नहीं दिखा। फिर भी हमने उसकी शान में कोई गुस्ताख़ी नहीं की।

हमने पूरे सम्मान से इस सजीले पेड़ को विदा की नमस्ते कही, मन ही मन 'फिर मिलेंगे' का वादा किया और कच्ची पगडंडी पर चलकर पहले एक खड़ंजे पर पहुँचे फिर पक्की सड़क पर निकलते ही मेडिकल कॉलेज का गेट सामने आ गया।

आज की मोहक तस्वीरें दरपेश हैं।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

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शनिवार, 4 जून 2022

ऐतिहासिक वटवृक्ष की छाया में योग-अभ्यास

282685911_10227128851037219_5303430858485102274_nइलाहाबाद विश्वविद्यालय, प्रयागराज के कला संकाय की सड़कों व पगडंडियों पर #साइकिल_से_सैर करने व मच्छरों के साये में योगकक्षा में प्रतिभाग करने का पहला दिन जैसे हड़बड़ी में गड़बड़ी वाले अनुभव दे गया उसका किस्सा बता चुका हूँ। इस अनुभव के आधार पर मैंने अगले दिन की तैयारी में ध्यान रखा कि घर से थोड़ा और पहले निकल लूँ ताकि ऑनलाइन योगकक्षा के प्रारंभ होने से पहले ही उपयुक्त स्थान पर पहुँचकर अपना आसन जमा लूँ। परिसर का वह प्रवेश द्वार भी चुनना था जिसपर किसी बाड़ की बाधा का सामना किए बिना साइकिल सहित अंदर जा सकूँ। परिसर के पूरब की ओर खुलने वाला यह गेट डब्ल्यू.एच. की ओर से करीब पड़ता है। मुझे तो यहाँ बिल्कुल विपरीत दिशा से पहुँचना था। मच्छरों के संभावित हमले से बचाव के लिए मैंने पूरे पैर को ढंकने वाला लोवर और कॉलर वाली टी-शर्ट पहन लिया, पैरों में मोजे डाल लिए और शेष खुली त्वचा पर ऑडोमॉस क्रीम का लेपन भी कर लिया।

इस प्रकार पूर्व नियोजित तैयारी के साथ मैं ठीक समय पर उस विशाल वट-वृक्ष के नीचे पहुँच गया। मैंने जब अपनी साइकिल को उसके चौकोर चबूतरे से टिकाकर खड़ा किया तो मन में कुछ ऐसे भाव पैदा हो गए कि फौरन साइकिल को अलग हटाकर उसकी लंगड़ी के सहारे खड़ा कर दिया। दोनों हाथ अनायास प्रणाम की मुद्रा में जुड़ गए। 286088687_10227128850797213_2148969932489192006_n

सूर्य देवता ने अभी क्षितिज से झाँकना प्रारम्भ ही किया था। इसलिए इस ऊँचे और विशाल घेरे वाले पेड़ की घनी छाया हरी दूब से ढँके मैदान पर दूर-दूर तक फैली हुई थी। इस सुरम्य वातावरण में कुछ विद्यार्थी अपने-अपने पिठ्ठू बैग के साथ एकल या समूह में बैठकर अध्ययन रत थे। कुछ लड़के लड़कियाँ व्यायाम भी कर रहे थे। कुछ बड़ी उम्र के स्त्री-पुरुष किनारे-किनारे टहलते हुए बातें कर रहे थे।

मैंने इस वट वृक्ष के विशाल तने के ठीक सामने पूर्वाभिमुख होकर अपना आसन जमा लिया और मोबाइल खोलकर गूगल-मीट एप्प पर 'आरोग्यम ध्यान योग केंद्र आगरा' की ऑनलाइन योगकक्षा में लॉगिन करके मोबाइल को सामने स्टैंड पर स्थिर रख दिया। इसके बाद योग-गुरू डॉ. आर.के.एस. राठौर जी के निर्देशानुसार क्रमशः मंत्रोच्चार, सूक्ष्म व्यायाम, सूर्यनमस्कार, योगासन, प्राणायाम व ध्यान की क्रिया में सन्नद्ध हो गया। प्रतिदिन किये जाने वाले आसनों के साथ इस दिन डॉक्टर साहब रीढ़रज्जु की काल्पनिक रेखा पर नीचे से ऊपर स्थित सात चक्रों को संतुलित कराने वाले आसनों का अभ्यास करा रहे थे।285748806_10227128845117071_8397330393272350840_n

मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्धि, आज्ञा व सहस्त्रार नामक सातो चक्रों की क्रमिक स्थिति, इन चक्रों का आकार व रंग-रूप, इनमें पंखुड़ियों की संख्या, इनके अंतर्निहित तत्व- क्रमशः पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, प्रकाश आदि और इनसे संबंधित बीज मंत्रों के उच्चारण का परिचय देते हुए सातो चक्रों के संतुलन के लिए अलग-अलग सात आसन कराए गए।

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मूलाधर चक्र के संतुलन के लिए सेतुबंध आसन, स्वाधिष्ठान चक्र के लिए भुजंगासन, मणिपुर चक्र के लिए धनुरासन, अनाहत चक्र के लिए उष्ट्रासन, विशुद्धि चक्र के लिए मत्स्यासन, आज्ञा चक्र के लिए योगमुद्रा व सहस्त्रार चक्र के लिए यथा-सामर्थ्य शीर्षासन या अर्द्ध शीर्षासन का अभ्यास कराते हुए उन्होंने इन चक्रों के संतुलन से प्राप्त होने वाले लाभ भी बताए। ये चक्र क्रमशः अच्छा स्वास्थ्य (health), प्रसन्नता (happiness), शक्ति (power), करुणा (compassion), वाक्-कला (communication), अन्तःप्रज्ञा (intuition), व परमानंद (bliss) प्रदान करने वाले हैं।

सहस्त्रार चक्र को सभी तत्वों से परे बताया गया है जिसमें एक हजार पंखुड़ियाँ होती हैं। यह सिर के सबसे ऊपरी भाग में ब्रह्मरंध्र के साथ अवस्थित है। इसके संतुलित व जागृत होने पर व्यक्ति को परमानंद की प्राप्ति होती है। इसके लिए शीर्षासन का अभ्यास सर्वोत्तम बताया गया है। किंतु यदि शरीर इसकी अनुमति नहीं दे तो अर्द्ध शीर्षासन या सर्वांगासन भी किया जा सकता है।

उपर्युक्त आसनों द्वारा इन सात चक्रों को संतुलित करने के बाद इन्हें जागृत करने का अभ्यास भी बताया गया। इसके लिए ध्यानात्मक आसन में बैठकर दोनों हाथों से क्रमशः सात प्रकार की अलग-अलग मुद्राएं बनानी होती हैं और उनके बीजाक्षर का जप करना होता है। क्रमशः पृथ्वी मुद्रा, वरुण मुद्रा, अग्नि मुद्रा, वायु मुद्रा, आकाश मुद्रा, शंख मुद्रा व षडमुखी मुद्रा द्वारा इन सात चक्रों का जागरण होता है। इसप्रकार शरीर रूपी यंत्र के साथ मंत्र और तंत्र के सम्मिलित प्रयोग द्वारा व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास की परिकल्पना को साकार करने का साप्ताहिक प्रयास इस विशेष दिन की कक्षा में किया जाता है। इसके पहले वाले दिन रीढ़ की समस्याओं से मुक्ति पाकर इसे मजबूत करने वाले आसन बताए गए थे।

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इस योगकक्षा में जितने साधक सम्मिलित होते हैं उनमें कुछ लोग ही शीर्षासन का अभ्यास करते हैं। उम्र व शारीरिक सीमा के कारण शेष लोगों को अर्द्ध शीर्षासन या सर्वांगासन की ही अनुमति दी जाती है। मैंने जब इस वटवृक्ष के समक्ष शीर्षासन की तैयारी की तो इस ऐतिहासिक देशकाल व वातावरण के अविस्मरणीय क्षण को सहेजने का मन हुआ। थोड़ी दूर पर व्यायाम कर रहे एक विद्यार्थी को मैंने इशारे से बुलाया और उन्हें मोबाइल कैमरा थमाते हुए अनुरोध किया कि मेरे शीर्षासन की तस्वीर खींच लें। उन्होंने सहर्ष मुझे उपकृत किया। मेरी अपेक्षा से भी आगे जाकर क्रमवार अनेक मुद्राओं व अनेक कोणों से मेरे शीर्षासन की अच्छी फोटुएं खींच डाली। इसके लिए मैने हृदय से आभार व्यक्त किया। इसलिए भी कि वे चित्र कदाचित् यहाँ पहुँचकर अनेक मित्रों की प्रसन्नता बढ़ा देंगे।

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मैंने आप लोगों के लिए उस स्थल के जो चित्र सहेज लिए थे उनमें से कुछ यहाँ छोड़ जाता हूँ। आनंद लीजिए। शेष किस्सा यूँ ही समय-समय पर जारी रहेगा।

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(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

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बुधवार, 10 नवंबर 2021

लखनऊ के जनेश्वर मिश्र पार्क में साइकिल से सैर

लखनऊ में हैं तो जनेश्वर मिश्र पार्क में जरूर जाइए।

#साइकिल_से_सैर

बहुत दिनों हुए मुझसे साइकिल छूटी हुई थी। नए शहर में नौकरी प्रारम्भ हो गयी लेकिन घर का सामान अभी पुराने शहर में पड़ा है। मेरी साइकिल भी वहीं कमरे में बंद मेरी प्रतीक्षा कर रही होगी। इधर मौसम इतना गुलाबी हो गया है कि मन बरबस प्रकृति की गोद में अठखेलियां करने का हो जाता है। दीपावली के स्वागत के लिए उसदिन हम लखनऊ में थे। मेरे बेटे ने छुट्टी का लाभ उठाने के लिए गोमतीनगर विस्तार स्थित जनेश्वर मिश्र पार्क में अपने फुटबाल-मित्रों के साथ अभ्यास करने का मन बनाया और मुझे सुबह छः बजे गेट नंबर-चार पर छोड़ देने को कहा। मैंने अपनी गूगल मीट पर चलने वाली ऑनलाइन योगासन, प्राणायाम व ध्यान की कक्षा को नमस्कार किया और बेटे को छोड़ने यहाँ आ गया। n

मेरे बेटे की इच्छा होती है कि वह अपने अन्य साथियों की तरह स्कूटी से स्वयं यहाँ आया- जाया करे लेकिन 14-15 साल की उम्र में अभी इसकी इजाज़त देना कत्तई संभव नहीं है। वह दूसरे बच्चों के माता-पिता की 'उदारता' से मेरी 'भीरुता' की तुलना करता है और मैं उनके 'दुस्साहस' की आलोचना करते हुए 'कानून के अनुपालन' की बात करता हूँ। इस बहस का अंत इस सहमति पर होता है कि मैं उसे गेट के पास छोड़कर तुरंत वापस चला जाऊं ताकि उसके साथियों को दिखाई न दूँ। असल में मुझे उसकी निगरानी करते देखकर उसके साथी उसे 'छोटा बच्चा' समझते होंगे; ऐसा सोचकर उसे मन ही मन झेंप सी होती है। हो भी क्यों न; इस उम्र में ही उसकी लंबाई मुझसे तीन-चार इंच बड़ी और उन सब दोस्तों की औसत लंबाई से ज्यादा जो हो गयी है।

आज मेरा मन भी हरे-भरे विस्तृत पार्क की शुद्ध और खुली हवा में सांस लेने का हुआ तो मैंने अपने समझौते की काट ढूंढ ली। उसे छोड़कर मैं उसके सामने वापस तो हो गया लेकिन एक किलोमीटर चलकर यू-टर्न लेते हुए वापस आ गया और गाड़ी पार्क करने के बाद गेट नम्बर चार से ही अंदर आ गया। यहाँ साइकिल से सैर के शौकीन लोगों के लिए किराए पर साइकिलें उपलब्ध हैं। एक घंटे के लिए मात्र 20 रुपया चुकाकर पार्क के भीतर बने लगभग चार किलोमीटर के ट्रैक पर साइकिल चलाते हुए तथा हरे-भरे वातावरण में अपने फेफड़ों को प्रचुर ऑक्सीजन की खुराक देते हुए यहाँ के मनोरम दृश्य के बीच समय बिताने का आनंद अनुपम है।

उसदिन मैंने यह आनंद भरपूर उठाया और रास्ते में मिले अन्य टहलने वाले, जॉगिंग करने वाले, दौड़ने वाले, साइकिल चलाने वाले, कसरत करने वाले, क्रिकेट- फुटबाल- बैडमिंटन- आदि खेलने वाले या बेंचो पर बैठकर मोबाइल में डूबे रहने वाले या समूह में कहकहे लगाने वाले लड़के, लड़कियों, स्त्री, पुरुष व वरिष्ठ उम्र के स्वस्थ लोगों को देखकर उनके भाग्य को सराहता रहा जिन्हें प्रतिदिन इस बहुविध स्वास्थ्यवर्धक आनंद का उपभोग करने का अवसर प्राप्त है।मुझे यह आनंद कभी-कभी ही मिलता है इसलिए यहाँ के मनोरम दृश्य को समेट लेने के लिए मेरी जेब में रखा इलेक्ट्रॉनिक साथी भी कुलबुलाने लगा था। अस्तु मेरी साइकिल अनेक स्थानों पर बरबस ही रुकती रही। काफी तस्वीरें लेने के बावजूद न मोबाइल कैमरे का मन भरा, न मेरा।

  कुछ तस्वीरें आप भी देखिए और संभव हो तो इस बेहतरीन मौसम में जनेश्वर मिश्र पार्क की सैर का कार्यक्रम जरूर बनाइए।

  (सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)