बुधवार, 9 अगस्त 2017
बच्चों की बड़ी बातें
रविवार, 8 मई 2016
साइकिल से सैर में साप्ताहिक विराम
साइकिल से सैर में साप्ताहिक विराम
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गुरुवार, 31 जुलाई 2014
वाह जुलाई के क्या कहने…!
भाग-एक
अब तिहवारी मौसम आया, सबने ईद उल फित्र मनाया
स्कूलों की घंटी बोली, बच्चों की लो निकली टोली
भारी बस्ते चढ़े पीठ पर, फिर भी करते हँसी ठिठोली
नौनिहाल को हैं सब सहने, वाह जुलाई के क्या कहने ॥१॥
आयी तीज लिए हरियाली, मंगल व्रत करती घरवाली
राखी चुनने निकली बहनें, वाह जुलाई के क्या कहने ॥२॥सूखे की आहट से टूटे, यह किसान की दुनिया लूटे
मानसून ने कर दी देर, लिया विकट चिन्ता ने घेर
तभी लगी पुरवाई बहने, वाह जुलाई के क्या कहने॥३॥आम दशहरी, चौसा- लगड़ा, अल्फान्सो का रुतबा तगड़ा
हफ़्तेभर तक जामुन आया मधुरोगी ने छककर खाया
हरित वसन धरती ने पहने, वाह जुलाई के क्या कहने ॥४॥शिव शंकर का सावन आया, भक्तजनों का मन हर्षाया
सांई पर उखड़े आचार्य भूले संत सरीखे कार्य
ऐसे कैसे धर्म निबहने? वाह जुलाई के क्या कहने ॥५॥भाग-दो
बजट बिगाड़ा महंगाई ने, रेट बढ़ा डाला बाई ने
दूर पकौड़ी, प्याज रुलाये, हरी मिर्च भी आंख दिखाये
घर में नहीं टमाटर रहने, वाह जुलाई के क्या कहने ॥६॥सबसे पहले रेल किराया, बोले बरसों बाद बढ़ाया
पेश बजट तो ऊँचा शोर, संसद बहस करे घनघोर
किले हवाई लगते ढहने, वाह जुलाई के क्या कहने॥७॥लॉर्ड्स जीतकर मारा तुक्का, अगले टेस्ट में खाया धक्का
कॉमनवेल्थ पदक की होड़, भारत की कुश्ती बेजोड़
जीत लिए सोने के गहने, वाह जुलाई के क्या कहने ॥८॥नटवर करे प्रहार करारा, त्याग नहीं नाटक था सारा
सहजादे ने रोकी राह, भीतर ही दब गयी कराह
चाटुकार अब लगे बहकने, वाह जुलाई के क्या कहने ॥९॥कैसा अंगरेजी आयोग, अजब गजब का करे प्रयोग
प्रतियोगी हैं जन्तर-मन्तर, अंग्रेजी भारी है सबपर
निकल पड़े कुछ फिरसे जलने वाह जुलाई के क्या कहने ॥१०॥(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
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मंगलवार, 28 मई 2013
औरतों को पूरा बदल देना चाहते हैं चेतन भगत
चेतन भगत ने अपने उपन्यासों से नौजवानों के बीच अपनी विशिष्ट पहचान बना ली है। एक बिन्दास, साहसी, स्पष्ट सोच रखने वाला और बातों का धनी नौजवान लेखक। सामाजिक मसलों पर खुली राय रखने के लिए उन्हें टीवी चैनेलों पर भी देखा जा सकता है और यत्र-तत्र अंग्रेजी अखबारों में भी। कुछ नया सोचने और पेश करने का सलीका उन्हें खूब आता है। हाल ही में महिला दिवस के मौके पर लिखे अपने एक छोटे से आलेख (ब्लॉग पोस्ट) में उन्होंने पहले तो वे बिन्दु गिनाये हैं जो महिलाओं के प्रति पुरुषों के व्यवहार में परिवर्तन की अपेक्षा करते हैं। इसे ईमानदारी से उन्होंने स्वीकार भी कर लिया; लेकिन उनकी चर्चा फिर कभी। यहाँ यह बताना है कि उस आलेख में उन्होंने यह सलाह दे डाली कि सभी महिलाओं को अपने भीतर निम्नलिखित पाँच मौलिक परिवर्तन करने की आवश्यकता है :
- दूसरी महिलाओं की अनावश्यक आलोचना करना बन्द करें। वे हमेशा दूसरी महिलाओं के बारे में अपना फैसला सुनाने को आतुर रहती हैं। यह फैसला प्रायः कठोर ही रहता है। वे अपने प्रति भी कठोर होती हैं लेकिन महिलाएं एक-दूसरे के प्रति तो कुछ ज्यादा ही कठोर होती हैं। खराब फिटिंग के पहनावे से लेकर बिगड़ गये पकवान तक। वे टिप्पणी करने से नहीं चूकतीं। भले ही वे जानती हैं कि कोई भी सर्वगुणसंपन्न नहीं होता।
- झूठा व्यवहार करना बन्द करें। महिलाओं में यह आम प्रवृत्ति होती है कि अगले को खुश करने के लिए, खासकर पुरुष-अहम् को तुष्ट करने के लिए ऐसा कुछ करती हैं जो उन्हें खुद ही सही नहीं लगता। जैसे किसी बचकाने चुटकुले पर भी जबरदस्ती हँसना, बॉस द्वारा नाजायज काम सौंपने पर भी खुशी-खुशी स्वीकर कर लेना, किसी बड़बोले की आत्मश्लाघा को चुपचाप सुनते हुए उसे अपने से श्रेष्ठतर समझने देना। यह सब खुद के साथ अच्छा व्यवहार नहीं है।
- अपने संपत्ति संबंधी अधिकारों के लिए खड़ी हों। भारत में असंख्य महिलाएँ अपनी संपत्ति का अधिकार अपने भाइयों, पुत्रों या पतियों के हाथों लुटा देती हैं। इसके लिए उन्हें आगे बढ़कर अपना अधिकार प्रकट करना चाहिए।
- महत्वाकांक्षी बनें और बड़े सपनें देखें। भारत के सभी नौजवानों के सीने में एक आग होनी चाहिए। भारतीय समाज की जो संरचना है उसमें लड़कियों के लिए जो सपने देखे जाते हैं वे लड़कों से अलग हैं। लड़कियाँ उतनी महत्वाकांक्षा नहीं रख पातीं जितना लड़के। लड़कियों को खुद ही इस स्थिति को बदलना होगा।
- रिश्तों के नाटक में ज्यादा मत उलझें। रिश्ते बहुत जरूरी हैं, लेकिन इतने भी नहीं। एक अच्छी माँ होना, पत्नी होना, बहन होना, बेटी होना, दोस्त होना या एक अच्छी प्रेमिका होना बहुत ही महत्वपूर्ण है, लेकिन इन रिश्तों में पूरी तरह खो जाना ठीक नहीं है। आपके जिम्मे एक और रिश्ता है- स्वयं से। रिश्तों के नाम पर इतना त्याग न करें कि आप अपने आप का ही बलिदान कर दें।
यह पाँचो सदुपदेश देखने में बहुत आकर्षक हैं और फॉलो करने लायक हैं। मैं अपनी बेटी को जरूर सिखाऊंगा। लेकिन इसपर पाठकों की जो राय आयी है वह भी बहुत रोचक है और मंथन को प्रेरित करती है।
मुम्बई की स्निग्धा इन पाँचों का जवाब यूँ देती हैं :
- क्या मर्द हमारी आलोचना नहीं करते हैं। हमने यह उन्हीं से सीखा है।
- क्या आप कभी मर्दों की ओछी हरकतों के शिकार हुए हैं- ‘वाह क्या बॉडी है’ वाली मानसिकता के? इनसे बचने के लिए झूठा व्यवहार करना ही पड़ता है।
- संपत्ति के अधिकार के बारे में अब जागरुकता बढ़ रही है। लेकिन अभी कितनी ग्रामीण औरतें इसका नाम भी जानती हैं?
- अपनी महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए पैसा कहाँ से लाएँ। अच्छा, खुद कमाकर?
- रिश्ते ! हिलैरी क्लिंटन को भी पहले बिल क्लिंटन की पत्नी कहा जाता है और बाद में अमेरिका की विदेश मंत्री।
टिप्पणियाँ तो और भी करारी हैं लेकिन यहाँ केरल निवासी जी.पिल्लई की बातें संक्षेप में रखना चाहूँगा :
चेतन भगत ने अपने आलेख में एक गहरी समस्या के सतह को ही छुआ है। …पुरुष महिलाओं के साथ क्या करते हैं यह तो विचारणीय है ही, एक महिला दूसरी महिला के साथ क्या-क्या और कैसे-कैसे व्यवहार करती है यह भी सोचना होगा। …यह दुश्मनी गर्भ में कन्या भ्रूण के आते ही शुरू हो जाती है। भारत की कौन स्त्री बेटी के बजाय बेटा पैदा करना ज्यादा पसन्द नहीं करती होगी? …घर के भीतर रोज ही बेटे और बेटी में फर्क करने का काम उसकी माँ ही करती है। …कौन माँ अपने बेटे के लिए बड़ा दहेज पाने की कामना नहीं करती? …गोरी-चिट्टी और सुन्दर बहू किस माँ को नहीं चाहिए, भले ही उसका बेटा कुरूप और नकारा हो? इन सबके पीछे आपको एक धूर्त, निष्ठुर, स्वार्थी और लालची महिला दिखायी देगी जिसके मन में एक दूसरी ‘महिला’ के प्रति तनिक भी सहानुभूति नहीं है। …इसके लिए आपको दूर जाने की जरूरत नहीं है, अपने घर के भीतर ही झाँकिए, दिख जाएगा। …दहेज हत्या के मामले ही देख लीजिए। वास्तव में किसी भी औरत के जीवन में मिले कुल कष्टों में से जितने कष्ट दूसरी औरतों से मिलते हैं उतने मर्दों से नहीं।
इस बहस की लंबी सृंखला मूल आलेख में देखी जा सकती हैं। गंभीर बहस तो होती ही रहती है, होनी भी चाहिए। लेकिन मैं यहाँ अपनी बात माहौल को थोड़ा हल्का रखने की इच्छा से यूँ कहना चाहता हूँ :
पहली राय तो इनकी प्रकृति-प्रदत्त विशिष्टता (यू.एस.पी.) को ही तहस-नहस करने वाली है। क्या इसके बिना महिलाओं की अपनी दुनिया उतनी मजेदार रह जाएगी। टाइम-पास का इतना बढ़िया साधन उनके हाथ से छीन लेना थोड़ी ज्यादती नहीं है क्या? ऐसे तो निन्दारस का आनन्द ही विलुप्त हो जाएगा इस धराधाम से। पतिदेव के ऑफिस और बच्चों के स्कूल जाने के बाद जब कामवाली भी सब निपटाकर चली जाती है तो अकेले समय काटना कितना मुश्किल होता है! इस मुश्किल घड़ी में यही तो काम आता है। बालकनी से लटककर पड़ोसन से, या फोन पर अपनी दूर-दराज की दोस्त या बुआ-मौसी-दीदी से यह रसपान करने में घंटो का समय कम पड़ जाता है। सुनते हैं इसके बिना उनका खाना भी मुश्किल से पचता है।
झूठा व्यवहार मत कहिए इसे जी। यह तो दुनियादारी है। यह न करें तो क्या कदम-कदम पर आफ़त को न्यौता दें। रोज इन्हें एक से एक घामड़ और घोंचू भी मिलते हैं। उन्हें हल्का सा ‘फील-गुड’ करा देने से मैडम को सेफ़टी भी मिल जाती है और उस मूढ़ पर मन ही मन हँस लेने का मौका भी मिल जाता है। फालतू में बहादुरी दिखाने से तो टेंशन ही बढ़ता है।
संपत्ति के अधिकार ले तो लें लेकिन ससुराल और मायके को एक साथ सम्हालना कितना मुश्किल हो जाएगा। ऊपर से मायके से भाई-भाभी जो रोज हाल-चाल लेते हैं, कलेवा भेजते हैं, और अपने जीजाजी की दिल से जो आवभगत करते हैं वह सब बन्द न हो जाएगा। सावन का झूला झूलने और गृहस्थी के बोझ से थोड़ी राहत पाने वे किसके पास जाएंगी? बच्चों के लिए मामा-मामी का दुलार तो सपना हो जाएगा। दूसरी तरफ़ बुआ और फूफा जी तो फिल्मी खलनायक ही नजर आएंगे। जब बहन अपने भाई की जायदाद बाँट लेगी तो वह ससुराल में अपनी ननद को भी तो हिस्सा देगी। इस बाँट-बँटवार में हमारे रिश्ते तो बेमानी हो जाएंगे।
महत्वाकांक्षी बनने में कोई बुराई नहीं है। लेकिन इसके लिए खुद ही मेहनत भी करना होगा। एक फॉर्म भरकर रजिस्ट्री करने भर के लिए भैया या पापा का मुँह ताकने से काम नहीं चलेगा। निडर होकर बाहर निकलना पड़ेगा, मम्मी का कंधा छोड़ना होगा और कड़ी प्रतिस्पर्धा के लिए वह सब करना होगा जो लड़के कर रहे हैं। आरक्षण का भरोसा नहीं अपने उद्यम का सहारा लेना होगा। इसके लिए कितनी लड़कियाँ तैयार हैं? मुझे लगता है - बहुत कम। जो तैयार हैं उन्हें सलाम। लेकिन ज्यादा संख्या उनकी है जो सिर्फ़ इसलिए पढ़ रही हैं कि पापा को उनकी शादी के लिए अच्छे लड़के मिल सकें।
रिश्ते नाटक की चीज नहीं हैं। इनके बिना व्यक्ति का अस्तित्व किस प्रकार परिभाषित होगा? मैंने उन लोगों को पागल होते देखा है जिन लोगों ने सामाजिक व पारिवारिक रिश्तों की कद्र नहीं की। कुछ समय तो साहस और उत्साह बना रहता है लेकिन बाद में एक साथी की तलाश शुरू हो जाती है जिसमें विफलता व्यक्तित्व को मुरझा देती है। एकला चलो का नारा इन रिश्तों के बाहर नहीं भीतर ही प्रस्फुटित होना श्रेयस्कर है। अन्य प्राणियों से मनुष्य भिन्न सिर्फ़ इसलिए है कि वह एक सामाजिक प्रामाणिक है। समाज का निर्माण ये रिश्ते ही करते हैं। इसमें महिलाएँ जानबूझकर उलझती नहीं हैं, बल्कि इनके बीच ही वे बड़ी होती हैं। रिश्तों का ख्याल महिलाएँ ज्यादा करती हैं तो इसके लिए उन्हें धन्यवाद दीजिए और उनका अधिक सम्मान करिए। हाँ, उन्हें इतनी जगह जरूर दीजिए कि वे अपने आप के साथ भी एक सुखी और गौरवशाली रिश्ता कायम कर सकें।
मैं तो ऐसा ही सोचता हूँ। आशा है आप अपने विचार यहाँ जरूर साझा करना चाहेंगे।
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
बुधवार, 17 अप्रैल 2013
पाँच के दाम में नौ का मजा…
मार्च की क्लोजिंग हो जाने के बाद थोड़ी फुर्सत निकालकर गाँव जाने का मन हुआ। पिताजी जबसे सेवानिवृत्त होकर गाँव पर अपनी धुनी रमाये हैं तबसे उनकी एक ही इच्छा रहती है कि बच्चे यानि मैं और मेरे बड़े भाई जल्दी-जल्दी गाँव जाते रहें। नौकरी की मजबूरियाँ ऐसी हैं कि उनकी इच्छा पूरी करने में हमें तमाम जुगाड़ लगाना पड़ता है। इस बार मेरे बॉस ने थोड़ी ना-नुकुर के बाद सेकेंड सैटर्डे तथा सन्डे को शामिल करते हुए कुल तीन दिन की छुट्टी तो दे दी लेकिन उसमें इतना बिलम्ब कर दिया कि ट्रेन में कन्फर्म रिजर्वेशन नहीं मिल पाया था। भला हो अपनी ब्लॉगर बिरादरी का कि टिकट कन्फर्म कराने का जुगाड़ लग गया।
लखनऊ से गोरखपुर की इन्टरसिटी में बठते ही मैंने उन्हें धन्यवाद ज्ञाप करने हेतु एस.एम.एस. किया कि- “धन्यवाद सर, मुझे बिठाकर गाड़ी चल दी है”
“What? You have been left sitting at station?” मेरे संदेश पर जाने क्यों वे चिंताग्रस्त (शायद विनोदपूर्ण) हो गये और त्वरित जवाब मांगा।
मैंने फौरन जवाब दिया, “ना ना, गाड़ी में बैठा हूँ
“
“आपकी गाड़ी मुझे छोड़ कैसे सकती है”
खैर, रात को दस बजे गोरखपुर बड़े भैया के आवास पर पहुँच गया। अगले दिन सुबह ससुराल होते हुए गाँव जाना था।
लौटते समय गाँव से गोरखपुर जल्दी आना पड़ा क्योंकि लखनऊ के लिए अवध एक्सप्रेस का निर्धारित समय दोपहर डेढ़ बजे ही था। भतीजे ने इन्टरनेट से अपडेट लिया तो गाड़ी एक घंटे विलम्ब से बतायी गयी। घर वालों से विदा लेकर मैंने ढाई बजे रेलवे स्टेशन की राह पकड़ी। पौने तीन बजे प्लैटफ़ॉर्म-१ पर पहुँचा तो प्लैटफ़ॉर्म-७ पर अवध एक्सप्रेस खड़ी दिखायी दी। इस घबराहट में कि कहीं यह मेरे सामने ही न निकल जाय मेरी साँस फूल गयी। दौड़कर ओवरब्रिज की दो-दो सीढ़ियाँ एक-एक बार में फाँदते हुए प्लैटफ़ॉर्म-७ पर पहुँचा। देखा तो ट्रेन ज्यों की त्यौं खड़ी थी और सारे डिब्बों में ताला लगा था। सभी खिड़कियाँ बन्द थीं। प्लैटफ़ॉर्म पर यात्री तो थे लेकिन किसी दूसरी गाड़ी की प्रतीक्षा कर रहे थे।
मुझे अब समझ में आया कि जिस अवध एक्सप्रेस से मुझे जाना है वो यह नहीं है। यह तो बान्द्रा (मुम्बई) से आयी है और अपनी यात्रा समाप्त कर चुकी है। मुझे अपनी बेवकूफ़ी पर झेंप आयी। मुझे ध्यान आया कि इस छोटी सी दौड़ में मैंने शायद राह में आने वाले कितने ही लोगों को पार करने के लिए धक्का दे दिया होगा।
थोड़ा रुककर मैंने अपनी साँसे स्थिर कीं और स्टेशन पर प्रसारित की जाने वाली सूचना को सुनने का यत्न करने लगा। पूरा एक चक्र सुन लेने के बाद भी मुझे अपनी गाड़ी का कोई उल्लेख सुनने को नहीं मिला। मैंने भतीजे को फोन लगाकर नेट से अपडेट लेने को कहा। उसने बताया कि गाड़ी ढाई घंटे विलम्ब से चल रही है। अब मैं दुबारा प्लैटफ़ॉर्म-१ पर वापस आकर कहीं बैठने की जगह तलाशने लगा। काफ़ी पसीना हो चुका था और बैठने की कोई हवादार जगह नहीं दिख रही थी। खटर-पटर के साथ चल रहे एक पंखे के नीचे खड़ा होकर थोड़ी राहत मिली लेकिन अब पैर दर्द करने लगा। हवा की जरूरत पर बैठने की जरूरत हावी होने लगी। मैंने पिठ्ठू बैग उठाया और एक कोने में लगी पत्थर की बेंच पर बैठ गया। अब दुबारा पसीना होने लगा लेकिन मैं बैठा रहा।
यहाँ लगभग एक घंटे की प्रतीक्षा करनी ही थी। जल्द ही बोर होने लगा तो पास के स्टाल से कोई पत्रिका लेने उठ गया। वहाँ कोई वेंडर नहीं था। ‘शुक्रवार’ का ताजा अंक पसंद आया क्योंकि उतने ही पृष्ठों की ‘इंडिया-टुडे’ और ‘ऑउटलुक’ के पैंतीस रूपये मूल्य की तुलना में इसका मूल्य मात्र पन्द्रह रूपया था। विषय सामग्री तो एक जैसी ही रही होगी, विज्ञापन वाले पृष्ठ इसमें कम थे। मैंने पर्स से पन्द्रह रूपये निकालकर इधर-उधर देखा तो बगल में जूस बेंचने वाले ने मुझसे पैसे ले लिए और मुझे पत्रिका दे दी। पत्रिका में मैंने देखा कि विष्णु नागर ने अपने सम्पादकीय आलेख में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री द्वारा राह चलते अपनी गाड़ी से उतरकर कींचड़ में फँसे एक मेमने को बचाने के समाचार पर कलम तोड़कर लिखा था। संपादक जी ने अपने मनमोहन सिंह को भी इस मानक पर तौलने की कोशिश की थी।
बहरहाल चार बजे घोषणा हुई कि “अवध एक्सप्रेस” थोड़ी ही देर में प्लैटफ़ॉर्म-७ पर आने वाली है। पहले मुझे ‘सात’ के बजाय ‘चार’ सुनायी दिया। शक होने पर मैंने फटी आवाज वाले भोंपू के पास जाकर कन्फ़र्म किया और प्लैटफ़ॉर्म-७ पर पहुँच गया। आधे घंटे फिर खड़ा रहा। अन्ततः साढ़े चार पर गाड़ी आयी। सीधे ऊपर की बर्थ पर जाकर लेट गया। सभी संबंधित को मोबाइल से सूचित करने का काम तुरन्त निपटाने के बाद तकिया चादर की प्रतीक्षा किये बगैर आंखें बन्दकर सोने की कोशिश करने लगा।
अचानक मोबाइल की घंटी से नींद खुली तो गिरिजेश भैया लाइन पर मिले। पूछ रहे थे - कहाँ हो? अचानक नींद से जागने पर मुझे यह याद करने में कुछ समय लग गया कि आज मैंने उन्हें सपरिवार लखनऊ में अपने घर बुलाया था और साथ भोजन करने का कार्यक्रम था। गाड़ी को सात बजे पहुँच जाना था इसलिए मुझे यह कार्यक्रम बनाने में कोई बाधा नहीं महसूस हुई थी। मैंने सम्हालते हुए पूरी बात बतायी और अनुरोध किया कि आप घर पहुँचिए, मैं भी देर-सबेर पहुँच ही जाऊंगा। घर पर श्रीमती जी को उनके आने के बारे में ताक़ीद करके मैं दुबारा सो गया। लेकिन अब अच्छी नींद नहीं आ रही थी। बार-बार गाड़ी खड़ी हो जाती और मेरी बेचैनी बढ़ती जाती।
लखनऊ में बादशाहनगर स्टेशन पड़ता है जहाँ से उतरकर मुझे इन्दिरानगर जाना था। इस चिन्ता में कि कहीं मैं सोया न रह जाऊँ और गाड़ी आगे बढ़ ले मैं प्रत्येक ठहराव पर नीचे वालों से स्टेशन का नाम पूछता रहा। वे भी बेचारे तंग आ गये होंगे। विलम्ब की हद बढ़ती जा रही थी और मैं घरवाली और घर आये मेहमान को लगातार ढांढस देता जा रहा था। मेहमान घर पर आ गये हैं, खाना तैयार हो चुका है, नौ बज गये हैं कब तक आएंगे.. आदि-आदि। उनके और मेरे बच्चे भी खेल-खेलकर बोर हो चुके थे। दोनों की पत्नियाँ भी सारी गलचौर निपटा चुकी थीं। अन्ततः दस बजे मैंने बताया कि आप लोग भोजन प्रारंभ कर दीजिए मुझे लेट हो जाएगा। खाना खाने के बाद उन लोगों ने थोड़ी और प्रतीक्षा की। ग्यारह बजे मैंने उन्हें अपनी बर्थ से ही खेद प्रकट करते हुए ‘शुभ-विदा’ कहा और पत्नी को ही उन लोगों को नीचे छोड़ आने की जिम्मेदारी सौंप दी।
बारह बज गये तो मैं अपनी बर्थ से नीचे उतरकर गलियारे में चहल-कदमी करने लगा। रुकते-रुकाते गाड़ी डेढ़ बजे बादशानगर पहुँची। लगभग सारे यात्री खीझ और गुस्से से बिलबिला रहे थे। डिब्बे का केयरटेकर मजेदार आदमी था। उतरते हुए मैंने कहा – “आज तो हद ही हो गयी यार। गोरखपुर में तीन घंटे लेट थी और उसके बाद पाँच घंटे की यात्रा में नौ घंटे लगा दिए।”
उसने मुस्कराते हुए कहा, “इसे यूँ भी तो कह सकते हैं कि पाँच घंटे का किराया देकर नौ घंटे ए.सी. का मजा लेते रहे।”
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
गुरुवार, 31 जनवरी 2013
जनवरी के जाते-जाते...
सोमवार, 9 जुलाई 2012
मत तोल! बस बोल बच्चन…
सोचने का नहीं, बस देखने का
झमाझम बारिश के बीच दो दिन की सप्ताहान्त छुट्टी घर में कैद होकर कैसे मनाते? नेट पर देखा तो घर के सबसे नजदीक के वेव-मॉल में बोल बच्चन की कुछ टिकटें अभी भी बची हुई थीं। मैंने झटपट बुक-माई-शो के सहारे से सीट की लोकेशन चुनकर दो बजे का शो ऑनलाइन बुक किया और मोबाइल पर आए टिकट कन्फर्मेशन की मेसेज लेकर ठीक दो बजे खिड़की पर पहुँच गया। इन्टरनेट बुकिंग वालों की एक अलग खिड़की थी। शीशे के उस पार बैठी सुदर्शना ने मुस्कराकर मेसेज दे्खा और कार्ड से मिलान करने के बाद पहले से मेरे नाम का तैयार टिकट सरकाते हुए साथ में थैंक्यू की मुहर भी लगा दी। बगल की खिड़कियों पर इस शो के लिए हाउसफुल का डिस्प्ले लग चुका था और आगे की बुकिंग जारी थी।
फिल्म देखने का कार्यक्रम अब पहले से काफी लुभावना हो गया है। मैं तो फिल्म से ज्यादा फिल्म दे्खने वालों को दे्खकर खुश हो जाता हूँ। यहाँ आकर लगता है कि हमारे आसपास कोई सामाजिक या आर्थिक समस्या है ही नहीं। सबलोग बहुत खुशहाल, खाते-पीते घरों के दिखते हैं। मनोरम दृश्य होता है। बाहर की ऊमस और चिपचिपी गर्मी भी अन्दर घुसने नहीं पाती। अन्दर जाने की अनुमति केवल हँसते-मुस्कराते चेहरों और मोटे पर्स से फूली हुई जेबों को है। प्रवेश द्वार पर तैनात सुरक्षा कर्मी आपकी कमर में हाथ डालकर यह इत्मीनान कर लेते हैं कि आप अन्दर के मनोरंजन बाजार में जाने लायक तैयारी से आये हैं तभी अन्दर जाने देते हैं। बेचारों को बैग की तलाशी भी लेनी पड़ती है।
मेरी पत्नी को जब महिलाओं वाले तलाशी घेरे से बाहर आने में देर होने लगी तो मैंने बाहर से दरियाफ़्त की। पता चला कि उनके हैंडबैग से आपत्तिजनक सामग्री प्राप्त हुई है जिसे बाहर छोड़ने का निर्देश दिया जा रहा था। मुझे हैरत हुई। पता चला कि उन्होंने घर से चलते समय एक चिप्स का पैकेट और कुछ चाकलेट रख लिये थे। बाहर से लायी हुई कोई भी खाद्य सामग्री अन्दर ‘एलाउड’ नहीं थी। अन्ततः थोड़ी बहस के बाद महिला गार्ड को चिप्स का पैकेट सौंपकर, चॉकलेट का रैपर खोलकर उसे वहीं खाने का उपक्रम करती और गार्ड व प्रबन्धन को कोसती हुई श्रीमती जी निकल आयी। अन्दर आते ही मामला साफ हो गया जहाँ तीनगुने दाम पर बिकने वाले कोल्ड ड्रिंक्स, पॉपकार्न और अन्य फास्ट फूड के स्टॉल लगे हुए थे। वहाँ लम्बी कतारें भी लगी हुई थीं। बेतहाशा ऊँचा दाम चुकाकर बड़ी-बड़ी ट्रे में सामान उठाकर ले जाते लोगों को देखकर हमें कोई हीनताबोध हो इससे पहले ही हम बिना किसी से पूछे सीधे अपनी सीट तक पहुँच गये। यूँ कि हम पूरे हाल का नक्शा और अपनी सीट कम्प्यूटर स्क्रीन पर पहले ही देख चुके थे।
फिल्म शुरू हुई। संगीत का शोर बहुत ऊँचा था। इतना कि बगल वाले से बात करना मुश्किल। अमिताभ बच्चन जी को धन्यवाद ज्ञापित करने वाले लिखित इन्ट्रो के बाद शीर्षक गीत शुरू हो गया। धूम-धड़ाके से भरपूर गीत में अमिताभ बच्चन के साथ अभिषेक और अजय देवगन जोर-जोर से नाच रहे थे। सदी के महानायक के इर्द-गिर्द कमनीय काया लिए लड़कियों और लड़कों की कतारें झूमती रही। सभी लगभग विक्षिप्त होकर बच्चन के बोल में डूब-उतरा रहे थे। हिमेश रेशमिया के कान-फाड़ू संगीत में लिपटा आइटम गीत समाप्त हो्ते ही बड़े बच्चन ने बता दिया कि वे इस फिल्म में हैं नहीं, केवल उनका नाम भर है।
इसके बाद कहानी दिल्ली के रंगीन माहौल से निकलकर सरपट भागती हुई राजस्थान के रणकपुर के संगीन माहौल में दाखिल हो गयी। राजा पृथ्वीराज सिंह अपने गाँव के बहुत खूँखार किन्तु अच्छे मालिक थे। पहलवानी करना और भयंकर अंग्रेजी बोलना उसका शौक था। झूठ से सख्त नफ़रत थी उन्हें। इतनी की केवल निन्यानबे रूपये का हिसाब गड़बड़ करने वाले अपने सुपरवाइजर को उन्होंने खदेड़-खदेड़कर मारा और लहूलुहान कर दिया। उसके बाद उनके दयालु हृदय ने उसे अस्पताल में भर्ती कराया और ‘फाइवस्टार’ स्तर की चिकित्सीय सुविधा दिलवायी। ऐसे सत्यव्रती को पूरी फिल्म मे एक नाटक मंडली ने एक के बाद एक जबरदस्त झूठ बोलकर बेवकूफ़ बनाये रखा और राजा पृथ्वीराज अपनी ग्राम्य-रियासत का भार ढोते हुए झूठ के किले पर अपनी सच्चाई और दयालुता का झंडा फहराते रहे। जिसने पुरानी गोलमाल देख रखी है उसे फिल्म में आगे आने वाले सभी दृश्य पहले से ही पता लग जाते हैं क्योंकि निर्देशक ने पूरा सिक्वेन्स एकमुश्त कट-पेस्ट कर दिया है। वहाँ राम प्रसाद और लक्षमण प्रसाद थे तो यहाँ अभिषेक बच्चन और अब्बास अली हैं जिन्हें देखने पर केवल मूँछों का अन्तर है। यहाँ भी माता जी को एक बार घर में भीतर आने के लिए बाथरूम की खिड़की लांघनी पड़ी है। अलबत्ता एक माँ का जुगाड़ करने के चक्कर में पूरी नाटक मंडली लग जाती है और अन्ततः तीन-तीन माताएँ एक साथ नमूदार हो जाती हैं। इसके बावजूद राजा पृथ्वीराज बेवकूफ़ बन जाते हैं क्योंकि ऐसा मान लिया गया है कि उनके पास प्रयोग करने के लिए अक्ल है ही नहीं।
निर्देशक ने दर्शकों के बारे में भी यही धारणा बना रखी है कि दर्शक आएंगे और जो आँख के सामने आएगा उसे सच मानेंगे और जो कान से सुनायी देगा उसपर तालियाँ पीटेंगे और खुलकर हसेंगे। इसलिए इस फिल्म को देखते समय यदि किसी ने तार्किक दृष्टि से सोचने की गलती की और दृश्यों के रसास्वादन में अपनी बुद्धि का हस्तक्षेप होने दिया तो उसे सिर पीट लेना पड़ेगा। बेहतर है कि चिप्स और चाकलेट की तरह अपनी तर्कणा को भी घर छोड़कर जाइए और वहाँ सजी हुई रंगीनी और लाफ्टर शो के कलाकारों की पंचलाइनों का त्वरित और तत्क्षण आस्वादन कीजिए। द्विअर्थी संवादों पर बगलें मत झांकिए बल्कि उस फूहड़ हास्य पर किलकारी मारती जनता के टेस्ट का समादर करते हुए उसमें शामिल हो जाइए और खुद भी हँसी खनकाइए। अर्चना पूरन सिंह की भद्दी और कामुक अदा पर यदि आपको जुगुप्सा हो रही है तो उसपर सिसकारी मारती अगली पंक्ति से सीख लीजिए कि कैसे टिकट का पैसा वसूल किया जाता है।
इस पूरे माहौल में प्राची देसाई की मासूम और शान्त छवि एक अलग प्रभाव छोड़ने में सफल हुई। बात-बात पर ठकाका लगाने वाले दर्शक इस सफलतम टीवी कलाकार की सिल्वर स्क्रीन पर अभिनीत सादगी और गरिमापूर्ण व्यक्तित्व के कन्ट्रास्ट को इस फिल्म की थीम के मद्देनजर कैसे स्वीकार करेंगे यह देखना होगा। पृथ्वीराज की अंग्रेजों से भी अच्छी अंग्रेजी का आनंद लेने के लिए आपको थोड़ा उदार होना पड़ेगा। वाकई होकर देखिए, बहुत मजा आएगा। पेट में बल पड़ जाएंगे।
कुल मिलाकर यह फिल्म सोचने के लिए कुछ नहीं छोड़ती इसलिए ऐसा कु्छ करने की जहमत उठाना ठीक नहीं। अपनी गृहस्थी की चिन्ताओं को कुछ समय के लिए विराम देकर दो घंटे का विशुद्ध मनोरंजन कीजिए और इंटरवल में अपनी रुचि के अनुसार बाहर सजे स्टॉल पर लाइन लगाकर या बिना लगाये खुशहाल भारतीय समाज का दर्शन कीजिए। हमने भी खूब मस्ती की। बाहर आने पर रिमझिम बारिश का आनन्द दोगुना हो गया था।
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
बुधवार, 4 अप्रैल 2012
बच्चों के लिए खुद को बदलना होगा…
पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी और उसके बाद या उसके बिना भी शादी तक का सफर पूरा कर लेने पर हमें लगता है कि अब इस जिन्दगी में हमें जैसा होना था वह हो लिए। जो मिलना था वह मिल गया। व्यक्तित्व के विकास का क्रम लगभग पूरा हो गया, अब इसमें किसी क्रान्तिकारी परिवर्तन की गुंजाइश नहीं बचती। नौकरी में कुछ पदोन्नति या बिजनेस में कुछ उन्नति पाकर हम अपनी आर्थिक या सामाजिक हैसियत भले ही बढ़ा लें लेकिन एक बार कैरियर और जीवन साथी मिल जाने के बाद हमारे व्यक्तिगत आचरण का जो स्वरूप निर्धारित हो जाता है वह कमोबेश जीवन भर बना रहता है। मुझे अभी हाल तक ऐसा ही महसुस होता रहा है। लेकिन इस बीच कुछ ऐसे अनुभव हुए कि मुझे अपनी धारणा को बदलने और आप सबके बीच चर्चा करने का मन हुआ।
एक विद्यार्थी, एक प्रतियोगी परीक्षार्थी, सफल/असफल अभ्यर्थी और फिर सामर्थ्य व भाग्य के मेल से मिलने वाला कैरियर बनाकर हम चल पड़ते हैं अपने जीवन की नैया को पार लगाने। जीवन संगिनी के साथ जो परिवार बसता है उसकी जिम्मेदारी उठाने में हमारी कार्यकुशलता का स्तर बहुत कुछ हमारे आर्थिक स्तर पर टिका हुआ है, यह भी एक सामान्य धारणा मेरे मन में रहा करती थी। लेकिन अब मैं सोच रहा हूँ कि एक गृहस्थ के रूप में या बच्चों के अभिभावक के रूप में हमारी भूमिका केवल हमारी आर्थिक स्थिति से नहीं तय होती। हमे तमाम ऐसे काम करने हैं जिनका धन से कोई सरोकार नहीं है लेकिन वे बहुत ही महत्वपुर्ण हैं। इनमें से एक महत्वपुर्ण कार्य है अपने छोटे-छोटे बच्चों को समुचित शिक्षा देना। ऐसी शिक्षा जो उन्हें एक योग्य, कर्तव्यपरायण, ईमानदार और मूल्यपरक जीवन जीने वाला खुशहाल नागरिक बना सके। बड़ी से बड़ी फीस चुकाकर भी हम किसी स्कूल से इन बातों की गारंटी नहीं ले सकते। ऐसे सद्गुण विकसित होने की जो उम्र है वह ज्यादा बड़ी नहीं है। बच्चा जब अपने दो पैरों पर खड़ा होकर दौड़ने लगता है स्फुट शब्दों का प्रयोग करके अपनी बात माँ तक पहुँचाने लगता है अपनी उम्र के बच्चों के साथ खेलने लगता है तभी उसके सीखने और व्यक्तित्व का स्वरूप निर्धारित होने की प्रक्रिया भी शुरू हो जाती है। कहते तो हैं कि बहुत से गुण-अवगुण आनुवांशिक भी होते हैं लेकिन जिसपर हमारा कोई वश नहीं उसकी क्या बात की जाय। हम तो उस वातावरण की ही बात करेंगे जिसे हम एक सीमा तक बदल पाने का प्रयास कर सकते हैं।
एक अभिभावक के रूप में बच्चे की परवरिश करते समय हमें किन बातों का ध्यान रखना चाहिए इसपर एक छोटी सी पुस्तिका मेरे हाथ लगी है। सिटी मॉन्टेसरी स्कूल के संस्थापक डॉ.जगदीश गाँधी और उनकी विदुषी पत्नी डॉ. (श्रीमती) भारती गाँधी द्वारा तैयार की गयी इस पुस्तिका में बहुत सी सीखने लायक बातें लिखी गयी हैं। यहाँ सबकुछ तो नहीं दिया जा सकता लेकिन जिन वाक्यों ने मुझे यह सब लिखने को प्रेरित किया उन्हें संक्षेप में उद्धरित कर रहा हूँ :
- बालक को सीखने की तीव्र प्रक्रिया होती है। उसके सामने सब कुछ सही-सही कीजिए।
- विश्वविद्यालय की डिग्रियाँ ही शिक्षित होने का प्रमाण नही अपितु उसकी शिक्षा का पता तो उसके व्यवहार से चलता है।
- बालक की कर्तव्य पालन की शिक्षा देने से पूर्व माता-पिता स्वंय बालक के आज्ञाकारी सेवक बनें।
- आप अपने बच्चे को कभी छोटा न समझिये, वह आपके अच्छे-बुरे कार्यों को समझता और सीखता है।
- एक सफल माँ वह है जो बच्चे की उस माँग को पहचानती है जिसे हम रोना कहते हैं।
- एक सफल पति-पत्नि को बच्चों के सामने कोई ऐसा काम नहीं करना चाहिंए जो बालक को गलत सीख दे।
- आप जैसा भी करते हैं बच्चा उसी का नकल करता है।
- आपकी जरा सी शाबाशी से बच्चे का मन प्रसन्नता से बल्लियों उछल पड़ता है।
- बच्चों को वही खिलौना खरीद कर दीजिए जिससे बच्चा कुछ सीख सके।
- खेलते हुए बच्चे को कोई आदेश न दीजिए वह आपकी आज्ञा का उल्लंघन कर सकता है।
- बच्चे जिज्ञासु होते हैं। उन्हें किसी बात के लिए मना न कीजिए अन्यथा वे वैसा ही करेंगे।
- बालक पैदा होते ही माँ के स्कूल में दाखिला पा लेता है और फिर सोते-जागते, खेलते-खाते, उठते-बैठते हर पल उसकी कक्षाएँ लगी रहती है।
- माता-पिता अपने बच्चों पर धन तो खर्च करते हैं पर समय नहीं खर्च करते।
- बच्चे को खेल-तमाशा दिखाने साथ ले जाइये और उससे सम्बन्धित प्रश्नों का उत्तर दीजिए यह भी शिक्षा है।
- आप आस्तिक हैं और पूजा करना चाहते हैं तो बालक से अच्छा कौन होगा जिसकी पूजा की जाय।
- बच्चों को घर में प्रतिदिन काम आने वाली वस्तुओं से परिचय अवश्य करा देना चाहिए।
- बच्चों को पालतू पशुओं और पक्षियों से भी परिचय करा देना चाहिए।
- बच्चों को कहानियाँ सुनाकर उनमें त्याग, सेवा, आज्ञाकारिता के गुणों को सरलता से भर सकते हैं।
- पाठशालाओं में माताओं को बराबर आते रहना चाहिए जिससे बच्चा यह महसूस करें कि पाठशाला भी घर का एक अंग है।
- आप चाहते हैं कि बच्चा सच बोले तो स्वयं सच बोलना शुरू कर दीजिए।
- बालक को अनुशासित रखना चाहते हो तो स्वयं अनुशासित रहो।
- प्रायः चार वर्ष की अवस्था का बालक कहानियाँ सुनने को बड़ा उत्सुक रहता है।
- बच्चों को कहानियाँ इतनी प्रिय होती हैं कि वे कुछ देर के लिए भूख प्यास भी भूल जाते हैं।
- बच्चे कहानी के पात्रों पर नहीं बल्कि नायक की सफलता और असफलता पर अधिक ध्यान देते हैं।
- बच्चों को सच्ची कहानियाँ ही सुनानी चाहिंए जिससे बड़े होने पर वे माता-पिता पर अविश्वास न करने लगे।
- चार वर्ष का शिशु पशु पक्षियों, परियों और चाँद की कहानियाँ पसन्द करता है।
- बच्चों को राजा रानी की बहादुरी की कहानियाँ सुनाकर माताएँ बच्चों को बहादुर बना सकती हैं।
- संसार के अनेक महापुरूषों को कहानियाँ द्वारा ही बचपन में संस्कार और प्रेरणा मिली है।
- माँ ही अपने बच्चे की एक सफल अध्यापिका हो सकती है।
- बालक माता-पिता या अभिभावकों के कटु व्यवहार, घर की असंतोषजनक स्थिति के कारण ही घर से भगता है।
- अपने बच्चे को जासूसी और सस्ते किस्म की पुस्तकों से बचाइये।
- बच्चों को सुधारने से पूर्व माता-पिता या अभिभावकों को अपने बुनियादी बुराइयाँ दूर करनी चाहिंए।
- जो माता-पिता या अभिभावक स्वभाव से क्रोधी और चिड़-चिड़े हैं वे मेहरबानी करके बच्चों पर तरस खायें उन्हें इन दुर्गणों से दूर रखें।
- बच्चा अपनी वाणी में ही नहीं वरन् वह आपके हृदय एवं आँखों में भी स्नेह खोजता है।
- कौन जानता है कि आँगन में खेलने वाला कौन शिशु कल का कवि, डाक्टर, इंजीनियर, दार्शनिक, जनसेवक या कुशल प्रशासक होगा।
- यह नन्हीं बालिकाएं ही तो कल की सरोजनी नायडू, लक्ष्मीबाई, अहिल्याबाई आदि नारी रत्ना है।
- देश का भविष्य इन नन्हें मुन्नों के निर्माण में है, इस उत्तरदायित्व से भागने वाले राष्ट्रदोही हैं।
- बच्चों को निर्दयता से पीटना एक जघन्य पाप एवं अपराध है।
- प्रसन्नता और मनोरंजन ही आपके बच्चे का जीवन है।
- बालक को कभी झिड़किये नही अन्यथा वह निरूत्साही एवं भीरू बन जायेगा।
- बालक को बात-बात पर शाबाशी दीजिए उसका साहस दुगुना हो जायेगा।
- बालक को ईश्वर का स्वरूप मानकर उसके समक्ष मेहरबानी करके कोई गलत काम न कीजिए।
- बच्चा जन्मजात अहिंसक होता है।
- यह मत भूलिये कि 2 वर्ष का शिशु आपकी सारी आदतें सीख रहा है।
- मेरी मानिये तो मैं कहूँगी कि 2 वर्ष से 5 वर्ष के बच्चों को शिशु विहारों में पुस्तक पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि केवल खेलने के लिए भेजिए।
- बच्चो को कभी ऐसे पड़ोसियों, मित्रों एवं सम्बन्धियों से न मिलने दें जो असंयम का व्यवहार करते हों।
- आप पर कितनी ही, परेशानियॅा या आपत्ति क्यों न हों, आप बच्चों के सामने मुस्कराते रहें।
- बच्चों को श्रेष्ठात्मायें समझ कर उनके प्रति उत्तरदायित्व को पूर्णता से निभाना चाहिए।
- बच्चों में सहयोग एवं मिलजुल कर कार्य करने की भावना को जाग्रत कीजिए।
- बच्चों को अपना खाना मिल बाँटकर खाना चाहिंए।
- माता-पिता या अभिभावक जब समय-समय पर बच्चे की पढ़ाई, उसके विद्यालय के सांस्कृतिक कार्यक्रमों, उन्नति, अवनति आदि के प्रति रूचि दिखाते हैं तो बालक में आत्मविश्वास की भावना पैदा होती है।
- वे माता-पिता धन्य हैं जो बालक के प्रत्येक कार्य में रूचि लेते हैं और सदैव बालक को आगे बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करते रहते हैं।
- आज के विद्यार्थी के गुमराह होने का एकमात्र कारण है-माता पिता या अभिभावक द्वारा उसकी उपेक्षा।
- कभी-कभी माता-पिता प्रायः मोह के वशीभूत होकर उसकी प्रगति में बाधक बन बैठते हैं।
- चतुर माता पिता ज्वर ग्रस्त शिशु के लाख रोने पर भी उसे लड्डू नहीं खिलायेंगें।
- माता पिता बालक पर अपनी रूचि न थोपे बल्कि बालक की ही रूचि के अनुसार उसका मार्गदर्शन करते रहें।
- बच्चे को सदैव अपने से अधिक बुद्धिमान मानते हुए उसकी प्रत्येक बात का सम्मान करना चाहिंए।
- यह कोरी भूल और अपराध है कि बालक का सुधार डंडे से किया जाय।
- आप बच्चे की बुराई नहीं स्वयं अपने दोषों का बखान कर रहे हैं, जिसकी छाप बच्चे पर पड़ी है।
- बच्चे को सदैव क्रियाशील खेलों में लगाइयें।
- शिशुओं के लिए चिडि़याखाने व अजायबघर जैसे स्थान जिज्ञासा बढ़ाने के लिए बड़े उपयुक्त होते हैं, अवश्य साथ ले जाइये।
- जो माँ बालक की मूक भाषा नहीं समझ पाती वह अनपढ़ है भले ही उसने कितनी ही डिग्रियाँ प्राप्त कर ली हों।
- आप लट्टू नहीं नचा सकते तो बालक को नचाने से न रोकिए। उसका मन प्रसन्नता से नाचने लगेगा।
- बालक एक सफल चितेरा होता है उसकी फेरी हुई प्रत्येक टेढ़ी-मेढ़ी रेखा में कला का पुट होता है।
- यदि आप बच्चों से विनोद नहीं कर सकते, उसे हॅंसा नही सकते, तो आप उसे पढ़ा भी नहीं सकते।
- बच्चे की कोई वस्तु गिर जाय तो तुरन्त आप पर आदर के साथ उठाकर बालक को दे दीजिए।
- बालक के स्कूल जाते समय उसे दरवाजे तक अवश्य छोड़ने जाइये।
- बच्चों की देखभाल कीजिए कि वे बाजार की खुली चीजें न खायें।
- बच्चों को पहाड़ों और नदियों की खूब सैर कराईये इससे हृदय की विशालता और करूणा की भावना उत्पन्न होती है।
- रात में छत या आँगन से बच्चे को चन्दा मामा दिखाइये, उसे प्रसन्नता होगी।
मैने जब इन बातों की कसौटी पर खुद को परखा तो अनेक मुद्दों पर सुधार की आवश्यकता दिखी। आशा है मेरी ही तरह इनमें से कुछ बातें आपका ध्यान जरूर खींचेगी जिनमें आप गलती कर रहे थे।
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
सोमवार, 31 अक्टूबर 2011
मेरा मन क्यूँ छला गया…?
लो अक्टूबर चला गया
मेरा मन क्यूँ छला गया
सोचा भ्रष्टाचार मिटेगा सब खुशहाल बनेंगे अब
अन्ना जी की राह पकड़कर मालामाल बनेंगे सब
काला धन वापस आएगा, रामदेव जी बाटेंगे
अति गरीब पिछड़े जन भी अब धन की चाँदी काटेंगे
लेकिन था सब दिवास्वप्न जो पलक झपकते टला गया
मेरा मन फिर छला गया।
गाँव गया था घर-घर मिलने काका, चाचा, ताई से
बड़की माई, बुढ़िया काकी, भाई से भौजाई से
और दशहरे के मेले में दंगल का भी रेला था
लेकिन जनसमूह के बीच खड़ा मैं निपट अकेला था
ईर्श्या, द्वेष, कमीनेपन के बीच कदम ना चला गया
मेरा मन फिर छला गया
एक पड़ोसी के घर देखा एक वृद्ध जी लेटे थे
तन पर मैली धोती के संग विपदा बड़ी लपेटे थे
निःसंतान मर चुकी पत्नी अनुजपुत्रगण ताड़ दिए
जर जमीन सब छीनबाँटकर इनको जिन्दा गाड़ दिए
दीन-हीन थे, शरणागत थे, सूखा आँसू जला गया
मेरा मन फिर छला गया
मन की पीड़ा दुबक गयी फिर घर परिवार सजाने में
जन्मदिवस निज गृहिणी का था खुश हो गये मनाने में
घर के बच्चे हैप्पी-हैप्पी बर्डे बर्डॆ गाते थे
केक, मिठाई, गिफ़्ट, डांस, गाना गाते, चिल्लाते थे
सबको था आनंद प्रचुर, हाँ बटुए से कुछ गला गया
मेरा मन बस छला गया
सोच रहा था तिहवारी मौसम में खूब मजे हैं जी
विजयादशमी, दीपपर्व पर घर-बाजार सजे हैं जी
शहर लखनऊ की तहजीबी सुबह शाम भी भली बहुत
फिर भी मन के कोने में क्यूँ रही उदासी पली बहुत
ओहो, मनभावन दरबारी राग गवइया चला गया
मेरा मन फिर छला गया।
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
मंगलवार, 2 अगस्त 2011
‘निर्वासन’ में स्त्री विमर्श - प्रेमचंद
पिछली पोस्ट में मैने वादा किया था कि आपको प्रेमचंद की एक विलक्षण कहानी पढ़वाऊंगा। लीजिए, कहानी पढ़िए जिसका शीर्षक है – निर्वासन। यह पूरी कहानी संवाद शैली में लिखी गयी है। कहानीकार ने अपनी ओर से कुछ भी नहीं बताया है; लेकिन इस बात-चीत से तत्कालीन समाज में स्त्री की नाजुक स्थिति का जैसा चित्र उभर कर आया है वह मन को विदीर्ण कर देता है। हम उस परंपरा को ढो रहे हैं जिसमें अग्निपरीक्षा देने के बावजूद सीता को जंगल में निर्वासित जीवन बिताना पड़ा। आज भी स्थितियाँ बहुत नहीं सुधरी हैं। क्या आधुनिक स्त्री-विमर्श इस मानसिकता को बदल पाएगा?
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निर्वासन कहानी- प्रेमचंद परशुराम- वहीं-वहीं, दालान में ठहरो! मर्यादा- क्यों, क्या मुझमें कुछ छूत लग गयी? परशुराम- पहले यह बताओ तुम इतने दिनों कहाँ रहीं, किसके साथ रहीं, किस तरह रहीं और फिर यहाँ किसके साथ आयीं? तब, तब विचार... देखी जायगी। मर्यादा- क्या इन बातों के पूछने का यही वक्त है; फिर अवसर न मिलेगा? परशुराम- हाँ, यही बात है। तुम स्नान करके नदी से तो मेरे साथ ही निकली थीं। मेरे पीछे-पीछे कुछ देर तक आयीं भी; मैं पीछे फिर-फिरकर तुम्हें देखता जाता था, फिर एकाएक तुम कहाँ गायब हो गयीं? मर्यादा- तुमने देखा नहीं, नागा साधुओं का एक दल सामने से आ गया। सब आदमी इधर-उधर दौड़ने लगे। मैं भी धक्के में पड़कर जाने किधर चली गयी। जरा भीड़ कम हुई तो तुम्हें ढूँढ़ने लगी। बासू का नाम ले-लेकर पुकारने लगी, पर तुम न दिखायी दिये। परशुराम- अच्छा तब? मर्यादा- तब मैं एक किनारे बैठकर रोने लगी, कुछ सूझ ही न पड़ता कि कहाँ जाऊँ, किससे कहूँ, आदमियों से डर लगता था। संध्या तक वहीं बैठी रोती रही। परशुराम- इतना तूल क्यों देती हो? वहाँ से फिर कहाँ गयीं? मर्यादा- संध्या को एक युवक ने आकर मुझसे पूछा, तुम्हारे घर के लोग खो तो नहीं गये हैं? मैंने कहा- हाँ। तब उसने तुम्हारा नाम, पता ठिकाना पूछा। उसने सब एक किताब पर लिख लिया और मुझसे बोला- मेरे साथ आओ, मैं तुम्हें तुम्हारे घर भेज दूँगा। परशुराम- वह आदमी कौन था? मर्यादा- वहाँ की सेवा-समिति का स्वयंसेवक था। परशुराम- तो तुम उसके साथ हो लीं? मर्यादा- और क्या करती ? वह मुझे समिति के कार्यालय में ले गया। वहाँ एक शामियाने में एक लम्बी दाढ़ीवाला मनुष्य बैठा हुआ कुछ लिख रहा था। वही उन सेवकों का अध्यक्ष था। और भी कितने ही सेवक वहाँ खड़े थे। उसने मेरा पता-ठिकाना रजिस्टर में लिखकर मुझे एक अलग शामियाने में भेज दिया, जहाँ और भी कितनी खोयी हुई स्त्रियाँ बैठी हुई थीं। परशुराम- तुमने उसी वक्त अध्यक्ष से क्यों न कहा कि मुझे पहुँचा दीजिए? मर्यादा- मैंने एक बार नहीं सैकड़ों बार कहा; लेकिन वह यही कहते रहे, जब तक मेला न खत्म हो जाय और सब खोयी हुई स्त्रियाँ एकत्र न हो जायँ, मैं भेजने का प्रबन्ध नहीं कर सकता। मेरे पास न इतने आदमी हैं, न इतना धन। परशुराम- धन की तुम्हें क्या कमी थी, कोई एक सोने की चीज बेच देती तो काफी रुपये मिल जाते। मर्यादा- आदमी तो नहीं थे। परशुराम- तुमने यह कहा था कि खर्च की कुछ चिंता न कीजिए, मैं अपना गहना बेचकर अदा कर दूँगी? मर्यादा- नहीं, यह तो मैंने नहीं कहा। परशुराम- तुम्हें उस दशा में भी गहने इतने प्रिय थे? मर्यादा- सब स्त्रियाँ कहने लगीं, घबरायी क्यों जाती हो? यहाँ किस बात का डर है। हम सभी जल्द से जल्द अपने घर पहुँचना चाहती हैं; मगर क्या करें? तब मैं भी चुप हो रही। परशुराम- और सब स्त्रियाँ कुएँ में गिर पड़तीं तो तुम भी गिर पड़तीं? मर्यादा- जानती तो थी कि यह लोग धर्म के नाते मेरी रक्षा कर रहे हैं, कुछ मेरे नौकर या मजूर नहीं हैं, फिर आग्रह किस मुँह से करती? यह बात भी है कि बहुत-सी स्त्रियों को वहाँ देखकर मुझे कुछ तसल्ली हो गयी। परशुराम- हाँ, इससे बढ़कर तस्कीन की और क्या बात हो सकती थी? अच्छा, वहाँ कै दिन तस्कीन का आनन्द उठाती रहीं? मेला तो दूसरे ही दिन उठ गया होगा? मर्यादा- रात-भर मैं स्त्रियों के साथ उसी शामियाने में रही। परशुराम- अच्छा, तुमने मुझे तार क्यों न दिलवा दिया? मर्यादा- मैंने समझा, जब यह लोग पहुँचाने को कहते ही हैं तो तार क्यों दूँ? परशुराम- खैर, रात को तुम वहीं रहीं। युवक बार-बार भीतर आते-जाते रहे होंगे। मर्यादा- केवल एक बार एक सेवक भोजन के लिए पूछने आया था, जब हम सबों ने खाने से इनकार कर दिया तो वह चला गया और फिर कोई न आया। मैं रात-भर जागती ही रही। परशुराम- यह मैं कभी न मानूँगा कि इतने युवक वहाँ थे और कोई अंदर न गया होगा। समिति के युवक आकाश के देवता नहीं होते। खैर, वह दाढ़ीवाला अध्यक्ष तो जरूर ही देखभाल करने गया होगा? मर्यादा- हाँ, वह आते थे; पर द्वार पर से पूछ-पूछकर लौट जाते थे। हाँ, जब एक महिला के पेट में दर्द होने लगा था तो दो-तीन बार दवाएँ पिलाने आये थे। परशुराम- निकली न वही बात! मैं इन धूर्तों की नस-नस पहचानता हूँ। विशेषकर तिलक-मालाधारी दढ़ियलों को मैं गुरुघंटाल ही समझता हूँ। तो वह महाशय कई बार दवाएँ देने गये? क्यों, तुम्हारे पेट में तो दर्द नहीं होने लगा था? मर्यादा- तुम एक साधु पर आक्षेप कर रहे हो। वह बेचारे एक तो मेरे बाप के बराबर थे, दूसरे आँखें नीची किये रहने के सिवाय कभी किसी पर सीधी निगाह नहीं करते थे। परशुराम- हाँ, वहाँ सब देवता ही देवता जमा थे। खैर, तुम रात-भर वहाँ रहीं। दूसरे दिन क्या हुआ? मर्यादा- दूसरे दिन भी वहीं रही। एक स्वयंसेवक हम सब स्त्रियों को साथ लेकर मुख्य-मुख्य पवित्र स्थानों का दर्शन कराने गया। दोपहर को लौट कर सबों ने भोजन किया। परशुराम- तो वहाँ तुमने सैर-सपाटा भी खूब किया, कोई कष्ट न होने पाया। भोजन के बाद गाना-बजाना हुआ होगा? मर्यादा- गाना-बजाना तो नहीं; हाँ, सब अपना-अपना दुखड़ा रोती रहीं। शाम तक मेला उठ गया तो दो सेवक हम लोगों को लेकर स्टेशन पर आये। परशुराम- मगर तुम तो आज सातवें दिन आ रही हो और वह भी अकेली? मर्यादा- स्टेशन पर एक दुर्घटना हो गयी। परशुराम- हाँ, यह तो मैं समझ ही रहा था। क्या दुर्घटना हुई? मर्यादा- जब सेवक टिकट लेने जा रहा था, तो एक आदमी ने आकर उससे कहा- यहाँ गोपीनाथ की धर्मशाला में एक बाबूजी ठहरे हुए हैं, उनकी स्त्री खो गयी है, उनका भला-सा नाम है, गोरे-गोरे लम्बे-से खूबसूरत आदमी हैं, लखनऊ मकान है, झबाई टीले में। तुम्हारा हुलिया उसने ऐसा ठीक बयान किया कि मुझे उस पर विश्वास आ गया। मैं सामने आकर बोली, तुम बाबू जी को जानते हो? वह हँसकर बोला, जानता नहीं हूँ तो तुम्हें तलाश क्यों करता फिरता हूँ। तुम्हारा बच्चा रो-रोकर हलाकान हो रहा है। सब औरतें कहने लगीं, चली जाओ, तुम्हारे स्वामीजी घबरा रहे होंगे। स्वयंसेवक ने उससे दो-चार बातें पूछकर मुझे उसके साथ कर दिया। मुझे क्या मालूम था कि मैं किसी नर-पिशाच के हाथों में पड़ी जाती हूँ। दिल में खुशी थी कि अब बासू को देखूँगी, तुम्हारे दर्शन करूँगी। शायद इसी उत्सुकता ने मुझे असावधान कर दिया। परशुराम- तो तुम उस आदमी के साथ चल दीं? वह कौन था? मर्यादा- क्या बतलाऊँ कौन था? मैं तो समझती हूँ, कोई दलाल था? परशुराम- तुम्हें यह न सूझी कि उससे कहतीं, जाकर बाबूजी को भेज दो? मर्यादा- अदिन आते हैं तो बुध्दि भ्रष्ट हो जाती है। परशुराम- कोई आ रहा है। मर्यादा- मैं गुसलखाने में छिपी जाती हूँ। परशुराम- आओ भाभी, क्या अभी सोयी नहीं, दस तो बज गये होंगे। भाभी- वासुदेव को देखने को जी चाहता था भैया, क्या सो गया? परशुराम- हाँ, वह तो अभी रोते-रोते सो गया है। भाभी- कुछ मर्यादा का पता मिला? अब पता मिले तो भी तुम्हारे किस काम की। घर से निकली हुई स्त्रियाँ थान से छूटी हुई घोड़ी है जिसका कुछ भरोसा नहीं। परशुराम- कहाँ से कहाँ मैं उसे लेकर नहाने गया। भाभी- होनहार है भैया, होनहार! अच्छा तो मैं जाती हूँ। मर्यादा- (बाहर आकर) होनहार नहीं है, तुम्हारी चाल है। वासुदेव को प्यार करने के बहाने तुम इस घर पर अधिकार जमाना चाहती हो। परशुराम- बको मत! वह दलाल तुम्हें कहाँ ले गया? मर्यादा- स्वामी, यह न पूछिए, मुझे कहते लज्जा आती है। परशुराम- यहाँ आते तो और भी लज्जा आनी चाहिए थी। मर्यादा- मैं परमात्मा को साक्षी देती हूँ, कि मैंने उसे अपना अंग भी स्पर्श नहीं करने दिया। परशुराम- उसका हुलिया बयान कर सकती हो? मर्यादा- साँवला-सा छोटे डील का आदमी था। नीचा कुरता पहने हुए था। परशुराम- गले में ताबीजें भी थीं? मर्यादा- हाँ, थीं तो। परशुराम- वह धर्मशाले का मेहतर था। मैंने उससे तुम्हारे गुम हो जाने की चर्चा की थी। उस दुष्ट ने उसका वह स्वाँग रचा। मर्यादा- मुझे तो वह कोई ब्राह्मण मालूम होता था। परशुराम- नहीं मेहतर था। वह तुम्हें अपने घर ले गया? मर्यादा- हाँ, उसने मुझे ताँगे पर बैठाया और एक तंग गली में, एक छोटे-से मकान के अंदर ले जाकर बोला, तुम यहीं बैठो, तुम्हारे बाबूजी यहीं आयेंगे। अब मुझे विदित हुआ कि मुझे धोखा दिया गया। रोने लगी। वह आदमी थोड़ी देर के बाद चला गया और एक बुढ़िया आकर मुझे भाँति-भाँति के प्रलोभन देने लगी। सारी रात रोकर काटी। दूसरे दिन दोनों फिर मुझे समझाने लगे कि रो-रोकर जान दे दोगी, मगर यहाँ कोई तुम्हारी मदद को न आयेगा। तुम्हारा एक घर छूट गया। हम तुम्हें उससे कहीं अच्छा घर देंगे जहाँ तुम सोने के कौर खाओगी और सोने से लद जाओगी। जब मैंने देखा कि यहाँ से किसी तरह नहीं निकल सकती तो मैंने कौशल करने का निश्चय किया। परशुराम- खैर,सुन चुका। मैं तुम्हारा ही कहना मान लेता हूँ कि तुमने अपने सतीत्व की रक्षा की, पर मेरा हृदय तुमसे घृणा करता है, तुम मेरे लिए फिर वह नहीं हो सकती जो पहले थीं। इस घर में तुम्हारे लिए स्थान नहीं है। मर्यादा- स्वामीजी, यह अन्याय न कीजिए, मैं आपकी वही स्त्री हूँ जो पहले थी। सोचिए, मेरी क्या दशा होगी? परशुराम- मैं यह सब सोच चुका और निश्चय कर चुका। आज छ: दिन से यही सोच रहा हूँ। तुम जानती हो कि मुझे समाज का भय नहीं है। छूत-विचार को मैंने पहले ही तिलांजलि दे दी, देवी-देवताओं को पहले ही विदा कर चुका; पर जिस स्त्री पर दूसरी निगाहें पड़ चुकीं, जो एक सप्ताह तक न-जाने कहाँ और किस दशा में रही, उसे अंगीकार करना मेरे लिए असम्भव है। अगर यह अन्याय है तो ईश्वर की ओर से है, मेरा दोष नहीं। मर्यादा- मेरी विवशता पर आपको जरा भी दया नहीं आती? परशुराम- जहाँ घृणा है वहाँ दया कहाँ? मैं अब भी तुम्हारा भरण-पोषण करने को तैयार हूँ। जब तक जीऊँगा, तुम्हें अन्न-वस्त्र का कष्ट न होगा। पर तुम मेरी स्त्री नहीं हो सकतीं। मर्यादा- मैं अपने पुत्र का मुँह न देखूँ अगर किसी ने मुझे स्पर्श भी किया हो। परशुराम- तुम्हारा किसी अन्य पुरुष के साथ क्षण-भर भी एकांत में रहना तुम्हारे पतिव्रत को नष्ट करने के लिए बहुत है। यह विचित्र बंधन है, रहे तो जन्म-जन्मांतर तक रहे; टूटे तो क्षण-भर में टूट जाय। तुम्हीं बताओ, किसी मुसलमान ने जबरदस्ती मुझे अपना उच्छिष्ट भोजन खिला दिया होता तो तुम मुझे स्वीकार करतीं? मर्यादा- वह...वह...तो दूसरी बात है। परशुराम- नहीं, एक ही बात है। जहाँ भावों का संबंध है, वहाँ तर्क और न्याय से काम नहीं चलता। यहाँ तक कि अगर कोई कह दे कि तुम्हारे पानी को मेहतर ने छू लिया है तब भी उसे ग्रहण करने से तुम्हें घृणा आयेगी। अपने ही दिल से सोचो कि तुम्हारे साथ न्याय कर रहा हूँ या अन्याय? मर्यादा- मैं तुम्हारी छुई हुई चीजें न खाती, तुमसे पृथक् रहती, पर तुम्हें घर से तो न निकाल सकती थी। मुझे इसीलिए न दुत्कार रहे हो कि तुम घर के स्वामी हो और समझते हो कि मैं इसका पालन करता हूँ। परशुराम- यह बात नहीं है। मैं इतना नीच नहीं हूँ। मर्यादा- तो तुम्हारा यह अंतिम निश्चय है? परशुराम- हाँ, अंतिम। मर्यादा- जानते हो इसका परिणाम क्या होगा? परशुराम- जानता भी हूँ और नहीं भी जानता। मर्यादा- मुझे वासुदेव को ले जाने दोगे? परशुराम- वासुदेव मेरा पुत्र है। मर्यादा- उसे एक बार प्यार कर लेने दोगे? परशुराम- अपनी इच्छा से नहीं, तुम्हारी इच्छा हो तो दूर से देख सकती हो। मर्यादा तो जाने दो, न देखूँगी। समझ लूँगी कि विधवा भी हूँ और बाँझ भी। चलो मन! अब इस घर में तुम्हारा निबाह नहीं। चलो जहाँ भाग्य ले जाय!
|
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
बुधवार, 9 मार्च 2011
रेलवे की जुगाड़ सुविधा...
समय: प्रातःकाल 6:30 बजे
स्थान: बर्थ सं.18 - A1, पटना-सिकंदराबाद एक्सप्रेस
इस पोस्ट को लिखने का तात्कालिक कारण तो इस ए.सी. कोच का वह ट्वॉएलेट है जिससे निकलकर मैं अभी-अभी आ रहा हूँ और जिसके दरवाजे पर लिखा है- ‘पाश्चात्य शैली’। लेकिन उसकी चर्चा से पहले बात वहाँ से शुरू करूँगा जहाँ पिछली पोस्ट में छोड़ रखा था।
आप जान चुके हैं कि वर्धा से कार में इलाहाबाद के लिए चला था तो एक चौथाई रास्ता टायर की तलाश में बीता। जबलपुर में टायर मिला तो साथ में एक पोस्ट भी अवतरित हो ली। आगे की राह भी आसान न थी। रीवा से इलाहाबाद की ओर जाने वाला नेशनल हाई-वे पिछले सालों से ही टूटा हुआ है। अब इसकी मरम्मत का काम हो रहा है। नतीज़तन पूरी सड़क बलुआ पत्थर, पथरीली मिट्टी और बेतरतीब गढ्ढों का समुच्चय बनी हुई है। पिछले साल इसी रास्ते से वर्धा जाते समय मुझे करीब चालीस किमी. की दूरी पार करने में ढाई घंटे लग गये थे। इसलिए इस बार मैं सावधान था।
मैंने अपने एक मित्र से वैकल्पिक रास्ता पूछ लिया था जो रीवा से सिरमौर की ओर जाता था; और काफी घूमने-फिरने के बाद रीवा-इलाहाबाद मार्ग पर करीब साठ किमी आगे कटरा नामक बाजार में आकर मिल जाता था। रीवा से सिरमौर तक चिकनी-चुपड़ी सड़क पर चलने के बाद हमें देहाती सड़क मिली जो क्यौटी होते हुए कटरा तक जाती थी। हमें दर्जनों बार रुक-रुककर लोगों से आगे की दिशा पूछनी पड़ी। एक गाँव के बाहर तिराहे पर भ्रम पैदा हो गया जिसे दूर करने के लिए हमें पीछे लौटकर गाँव के भीतर जाना पड़ा। अँधेरा हो चुका था। कोई आदमी बाहर नहीं दिखा। एक घर के सामने गाड़ी रोककर ड्राइवर रास्ता पूछने के लिए उस दरवाजे पर गया। दो मिनट के भीतर कई घरों के आदमी हाथ में टॉर्च लिए गाड़ी के पास इकठ्ठा हो गये। फिर हमें रास्ता बताने वालों की होड़ लग गयी। कम उम्र वालों को चुप कराकर एक बुजुर्गवार ने हमें तफ़्सील से पूरा रास्ता समझा दिया। उनके भीतर हमारी मदद का ऐसा जज़्बा था कि यदि हम चाहते तो वे हमारे साथ हाइ-वे तक चले आते।
खैर, आगे का करीब चालीस किमी. का सर्पाकार देहाती रास्ता प्रायः गढ्ढामुक्त था। रात का समय था इसलिए इक्का-दुक्का सवारी ही सामने से आती मिली। सड़क इतनी पतली थी कि किसी दुपहिया सवारी को पार करने के लिए भी किसी एक को सड़क छोड़ने की नौबत आ जाती। जब हम हाइ-वे पर निकल कर आ गये तो वही क्षत-विक्षत धूल-मिट्टी से अटी पड़ी सड़क सामने थी। उफ़्... हम हिचकोले खाते आगे बढ़ते जा रहे थे और सोचते जा रहे थे कि शायद हमारा वैकल्पिक रास्ते का चुनाव काम नहीं आया। खराब सड़क तो फिर भी मिल गयी। हमने कटरा बाजार में गाड़ी रुकवायी। सड़क किनारे दो किशोर आपस में तल्लीनता से बात कर रहे थे। उनमें से एक साइकिल पर था। जमीन से पैर टिकाए। दूसरा मोबाइल पर कमेंट्री सुन रहा था और अपने साथी को बता रहा था।
मैंने पूछा- भाई, यह बताओ यह सड़क अभी कितनी दूर तक ऐसे ही खराब है?
लड़का मुस्कराया- “अंकल जी, अब तो आप ‘कढ़’ आये हैं। पाँच सौ मीटर के बाद तो क्या पूछना। गाड़ी हवा की तरह चलेगी।” उसने अपने दोनो हाथों को हवा में ऐसे लहराया जैसे पानी में मछली के तैरने का प्रदर्शन कर रहा हो। जब हमने बताया कि हम हाई-वे से होकर नहीं आ रहे हैं बल्कि सिरमौर होकर आ रहे हैं तो उसने हमें शाबासी दी और बुद्धिमान बता दिया। बोला- जो लोग हाई-वे से आ रहे हैं उनकी गाड़ी लाल हो जाती है। गेरुए मिट्टी-पत्थर की धूल से। आप अपनी कार ‘चीन्ह’ नहीं पाते। हमें समझ में आ गया कि आगे का रास्ता बन चुका है। हम खुश हो लिए और आगे चल दिए। इलाहाबाद तक कोई व्यवधान नही हुआ।
इलाहाबाद में सरकारी काम निपटाने के अलावा अनेक लोगों से मिलने का सुख मिला। आदरणीय ज्ञानदत्त पांडेय जी के घर गया। श्रद्धेया रीता भाभी के दर्शन हुए। सपरिवार वर्धा जाकर नौकरी करने के हानि-लाभ पर चर्चा हुई। गुरुदेव के स्वास्थ्य की जानकारी मिली। लम्बे समय तक चिकित्सकीय निगरानी में रहने और लगातार दवाएँ लेते रहने की मजबूरी चेहरे पर स्थिर भाव के रूप में झलक रही थी। वे इस बार कुछ ज्यादा ही गम्भीर दिखे।
प्रयाग में मेरे पूर्व कार्यस्थल-कोषागार से जुड़े जितने भी अधिकारी-कर्मचारी और इष्टमित्र मिले उन सबका मत यही था कि मुझे अपना प्रदेश और इलाहाबाद छोड़कर बाहर नहीं जाना चाहिए था। इस विषय पर फिर कभी चर्चा होगी।
वर्धा वापस लौटने का कार्यक्रम रेलगाड़ी से बना। दिन भर मंगल-व्रत का फलाहार लेने के बाद शाम को एक मित्र की गृहिणी के हाथ की बनी रोटी और दही से व्रत का समाहार करके मैं स्टेशन आ गया। अनामिका प्रकाशन के विनोद शुक्ल और वचन पत्रिका के संपादक प्रकाश त्रिपाठी गाड़ी तक विदा करने आये। उन्हें हार्दिक धन्यवाद देकर हम विदा हुए। रात में अच्छी नींद आयी।
आज सुबह जब हम ‘पाश्चात्य शैली’ के शौचालय में गये तो वहाँ का अद्भुत नजारा देखकर मुस्कराए बिना न रह सके। साथ ही पछताने लगे कि काश कैमरा साथ होता। फिलहाल ट्वॉएलेट की देखभाल करने वालों के बुद्धि-कौशल और गरीबी में भी काम चला लेने की भारतीय प्रतिभा का नमूना पेश करते इस ए.सी. कोच के पश्चिमी बनावट वाले शौचालय की कुछ तस्वीरें मैंने अपने मोबाइल से ही खींच डाली हैं। खास आपके लिए। देखिए न...
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

