अहा ! फरवरी कितनी प्यारी।
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कड़ी ठण्ड से पीछा छूटा
सर्दी से गठ बंधन टूटा अब अलाव है नहीं जरूरी दूर हुई सबकी मज़बूरी बच्चे अब भरते किलकारी अहा ! फरवरी कितनी प्यारी।1।
बिस्तर से हट गयी रजाई
हीटर की हो गयी विदाई कम्बल भी बक्से में सोया सबने ऊनी स्वेटर धोया अब सूती कपड़ों की बारी अहा ! फरवरी कितनी प्यारी।2।
एक सूट खबरों में आया
लाखों जिसका दाम बताया मचा मीडिया में कोहराम फिर वो सूट हुआ नीलाम दाम करोड़ों दें व्यापारी अहा ! फरवरी कितनी प्यारी।3।
अच्छे दिन वाली सरकार
भरने लगी विजय हुंकार आम आदमी ने रथ रोका दिल्ली की जनता ने टोका दम्भ पड़ गया इसको भारी अहा ! फरवरी कितनी प्यारी।4।
बढ़ा शादियों का भी जोर
विकट बराती हैं चहुँ ओर फागुन की मस्ती में झूमें चाहें नर्तकियों को चूमें लठ्ठम लठ्ठा गोली बारी अहा ! फरवरी कितनी प्यारी।5।
बोर्ड परीक्षा शुरू हुई है
शुचिता जिसकी छुई मुई है अजब नकलची गजब निरीक्षक सॉल्वर बन बैठे हैं शिक्षक दस्ता सचल करे बटमारी अहा ! फरवरी कितनी प्यारी।6।
राजनीति में फँसा बिहार
लालू जी की टपकी लार संख्या बल में इतनी खूबी माझी की ही नैया डूबी फिर नितीश को मिली सवारी अहा ! फरवरी कितनी प्यारी।7।
संसद में घिरती सरकार
भूमि अधिग्रहण को तैयार अन्ना जी फिर मंचासीन धरना में फिर सीएम लीन छुट्टी पर बेटा-महतारी अहा ! फरवरी कितनी प्यारी।8।
क्रिकेट कुम्भ आरम्भ हुआ है
सौ करोड़ की यही दुआ है टीम इंडिया रख ले लाज बिश्व विजेता हो अंदाज दिखती है अच्छी तैयारी अहा ! फरवरी कितनी प्यारी।9।
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
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गुरुवार, 26 फ़रवरी 2015
अहा ! फरवरी कितनी प्यारी। (गीत)
रविवार, 26 अक्टूबर 2014
मोदी-चाय है कि बवाल की दावत…
मीडिया के लिए मोदी की चाय पार्टी से सोशल मीडिया में जो हलचल मची है वह प्याले में तूफान की उक्ति चरितार्थ करती है। प्रिन्ट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की प्रायः सभी बड़ी हस्तियाँ जो देश की राजधानी में कार्यरत हैं उन्हें नरेन्द्र मोदी ने आदर सहित बुलाया, दीपावली की शुभकामनाएँ दीं और स्वच्छ भारत अभियान में उनके सहयोग के लिए धन्यवाद दिया। देश के सबसे लोकप्रिय राजनेता के पास पहुँच जाने के बाद कुछ लोगों में यह सहज इच्छा पैदा हो गयी कि उनके साथ तस्वीरें खिचवा ली जाय।
मोबाइल फोन में कैमरे की सुविधा ने तो यह हाल कर दिया है कि हमें राह चलते कोई सुन्दर सा कुत्ता भी दिख जाय तो उसके साथ सेल्फ़ी क्लिक करने लगते हैं और तुरन्त देश भर के मित्रों को फेसबुक और व्हाट्सएप के माध्यम से दिखाने लगते हैं। तो फिर पूरी दुनिया में अपने किस्म की अकेली शख्सियत को देखकर किस चुगद का मन सेल्फ़ी खिंचाने के लिए नहीं ललचा जाएगा। अलबत्ता कुछ स्वनामधन्य ऐसे लोग भी हैं जिन्हें मोदी नाम से ही सख्त नफ़रत है। इन्हें भारतीय लोकतंत्र के किसी भी मूल्य से बड़ा लगता है अपने पूर्वाग्रहों की हर हाल में रक्षा करना।
इस चाय-पार्टी से प्रेस की स्वतंत्रता पर आँच आने की चिन्ता में घुलते तमाम मित्रों के स्टेटस देखकर मैं दंग रह गया। भड़ास4मीडिया पोर्टल पर प्रचुर सामग्री जमा हो चुकी है। कुछ देर के लिए सामान्य शिष्टाचार तो हम अपने दुश्मन के साथ भी निभा लेते हैं। यहाँ तो देश के सर्वोच्च जनप्रतिनिधि ने आदर व सम्मान से बुला रखा था। अब इसे जो लोग उत्कोच समझने कॊ मनोवृत्ति रखते हैं वे निश्चित रूप से यह भी समझते होंगे कि पत्रकार समुदाय में ऐसे लोग भरे पड़े हैं जो थोड़ा सा प्रलोभन सामने आते ही उसओर झपट पड़ेंगे और अपने स्वार्थ के आगे जनहित का ख्याल छोड़ देंगे।
भगवान न करे यह बात सच हो; लेकिन यदि इस बात में लेश मात्र भी सच्चाई है कि मीडिया वाले भी मात्र अर्थोपार्जन के उद्देश्य से ही काम कर रहे हैं और ‘मिशन’ वाला हिस्सा पीछे छूट चुका है तो इसके लिए सिर्फ़ उस चाय-पार्टी में सम्मिलित होने को दोष देकर छुटकारा नहीं मिलने वाला। फिर तो पत्रकार बन्धुओं द्वारा गुजारी गयी हर शाम पर निगाह रखनी होगी जिसमें दस-पाँच रूपये की टुच्ची चाय नहीं बल्कि एक से एक उम्दा ब्रैंड की देशी-विदेशी मदिरा और फाइव-स्टार डिनर पार्टी भी आसानी से उपलब्ध है। प्रोफेशनलिज्म की मांग तो यह है कि अपनी स्टोरी को विश्वसनीय बनाने के लिए और अन्दर की सच्ची खबर बाहर लाने के लिए चाहे जिस भी रूप में अन्दर जाना पड़े, चले जाना चाहिए। घोटालेबाज के साथ मक्कारी का खेल खेलकर भी सच्चाई बाहर निकल आये तो ऐसी मक्कारी करने में कोई हर्ज़ नहीं। स्टिंग ऑपरेशन इसे ही तो कहते हैं।
लेकिन जो लोग नरेन्द्र मोदी का नाम लेते ही उल्टियाँ महसूस करने लगते हैं, सारी तर्कशक्ति मिथ्या प्रलाप में लगा देते हैं और हास्यास्पद होने की सीमातक प्रतिकार की भाषा बोलने लगते हैं उनका रोग बहुत भयानक और असाध्य है। कोई एक दशक पहले लगा आघात इनके मन मस्तिष्क पर जो निशान छोड़ गया उससे मानो इनमें बदलते समय के साथ आगे बढ़ने की क्षमता ही जाती रही। स्थिति यह हो गयी है कि अब ये “पाप से घृणा करो पापी से नहीं” वाले सन्देश को उल्टा समझते हैं। यानि- वे पाप से भले ही घृणा न करें लेकिन पापी से घूणा करने का दिखावा जरूर करेंगे। अगर वे वास्तव में पाप से घृणा कर रहे होते तो ऐसे पाप की लंबी फेहरिश्त से जुड़े सभी पापियों से समान दूरी बनाकर चलते। लेकिन तमाम दलों में विविध रूप लेकर बैठे इसी प्रकार का पाप कर चुके लोगों की गोद में बैठकर अपना उल्लू सीधा करते रहने में इन्हें कोई शर्म नहीं आती।
लोकसभा चुनाव से पहले और बाद में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के चर्चित चेहरों के रुख में आये बदलाव को देखकर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि लाखो की लागत लगाकर करोड़ो की कमाई करने के लिए कैसे रंग बदलना पड़ता है, कैसे शर्म-हया ताख पर रख देनी पड़ती है और मालिकान के फरमान को हर हाल में पूरा करना पड़ता है। यह सब मोदी की चाय-पार्टी से पहले की बात है; तो फिर इस चाय पर इतना तूफान क्यों?
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
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सोमवार, 22 सितंबर 2014
जुगनू अपना फर्ज़ निभाते रहते है (तरही ग़जल)
तरही नशिस्त के सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए इस बार उस्ताद ने जो मिसरा दिया उसने मुझे बहुत परेशान किया। लेकिन आखिर कुछ तुकबन्दियाँ बन ही गयीं। आप भी समाद फरमाइए :
| जुगनू अपना फर्ज़ निभाते रहते हैं |
| सरकारों ने दिये बहुत उपहार उन्हें जंग जीतता सूरज सदा अँधेरे से बीज डालने की फितरत कुछ लोगों की छोटे से छोटे को छोटा मत समझो मर्दों ने तामीर मकानों की कर ली मन में हो तूफान मगर मत घबराना अच्छी फसलें बहुत सजोनी पड़ती हैं सदाचार सच्चाई की है राह कठिन -सत्यार्थमित्र |
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
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सोमवार, 30 जून 2014
अच्छे दिन की जल्दी मची है…
विज्ञान भवन सभागार में उद्योग और व्यापार संबंधी सम्मेलन में मनमोहन सिंह के भाषण के बाद नरेन्द्र मोदी ने जब उनकी इस बात का समर्थन अपने खास अन्दाज में किया कि भारत की बिगड़ी अर्थव्यवस्था में जल्द ही सुधार होगा और अच्छे दिन आएंगे तो इसका अर्थपूर्ण ढंग से तालियाँ बजाकर स्वागत करने वालों ने भी नहीं सोचा होगा कि अच्छे दिन का जुमला इतनी दूर और इतनी देर तक लोगों की जुबान पर चढ़ा रहेगा। चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा ने जमकर यह नारा लगाया और भुनाया। कुछ इस तरह कि यदि जनता ने वोट देकर भाजपा को जिता दिया तो चुनाव के परिणाम घोषित होते ही देश का काया-पलट हो जाएगा।
ऐसे वादे हुए मानो गरीबी, अशिक्षा, महंगाई और भ्रष्टाचार समुद्र में डूबकर आत्महत्या कर लेंगे, गाँव- गाँव में तेल के कूँए निकल आएंगे, जमीन में से हजारो टन सोना सही में बाहर आ जाएगा, लोगों का बैंक में जमा सारा रूपया डॉलर में तब्दील हो जाएगा और स्विस बैंक से काला धन मालगाड़ी में लादकर भारत चला आएगा, बेरोजगारी उड़न-छू हो जाएगी, सभी अपराधियों का हृदय परिवर्तन हो जाएगा और बलात्कारी साधुवेश धारणकर तीर्थाटन पर निकल जाएंगे । जनता ने शायद इसी तरह के चमत्कार की आशा में प्रचंड बहुमत से उन्हें जिता भी दिया।
अब जबकि झटपट रेल का किराया बढ़ा दिया गया है, एक महीने के भीतर दूसरी बार पेट्रोलियम उत्पादों के दाम बढ़ रहे हैं और देश की बाकी चीजें जहाँ की तहाँ वैसी ही बनी हुई हैं तो वही जनता सरकार पर पिल पड़ी है। क्या यही हैं अच्छे दिन? मानो मोदी सरकार ने घोर अनर्थ और भयंकर धोखा कर डाला हो उनके साथ। सरकार को खरी-खोटी सुनाने में कांग्रेस समर्थक और वामपंथी खेमा तो स्वाभाविक रूप से आगे है लेकिन बहुत से पार्टी-लाइन से स्वतंत्र विचार रखने वाले और कुछ भाजपा समर्थक भी इस हो-हल्ले में शामिल हो गये दिख रहे हैं।
कोई यह मानने को तैयार नहीं कि चुनावी मौसम की जुमलेबाजी और यथार्थ के धरातल पर नीति निर्माण और शासन का संचालन बिल्कुल दो अलग बातें हैं। बिगड़ी हुई अर्थ-व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए जिस कठिन संयम, कठोर अनुशासन और संयत धैर्य की आवश्यकता है उसका संज्ञान लेने की सुध सोशल मीडिया के लिक्खाड़ों से लेकर अखबार के संपादकों और न्यूज चैनेलो के पैनेलो में बोलने वाले विशेषज्ञों में भी नहीं दिख रहा है। चुनाव में करारी शिकस्त खाने वाले कांग्रेसी अपनी दस साल की करनी को भूलकर इस बात से खफा हैं कि इसी एक महीने में वह चमत्कारी परिवर्तन हुआ क्यों नहीं। वामपंथी और ‘सेकुलर गिरोह’ की तो बाछें खिली हुई हैं कि जनता का मोहभंग इतना जल्दी हो गया।
देश की अर्थव्यवस्था कैसे चलती है और किसी आर्थिक नीति का प्रभाव कितने दिनों बाद दिखायी देता है यह सब सोचने-समझने की किसी को फुर्सत नहीं है। बौद्धिक स्तर पर खुद से बेईमानी भरी सोच के एक से एक नमूने दिखायी दे रहे हैं।
किसी अच्छे-भले घर को सिर्फ़ रंगवाने-पुतवाने का काम कराना हो तो भी कुछ दिन के लिए इसमें रहने वालों को परेशानी का सामना करना पड़ता है, बजट के संतुलन के लिए कुछ दूसरे कामों को रोकना पड़ता है तब जाकर काम पूरा होता है। सोचिए अगर किसी इमारत की हालत बेहद कमजोर हो जाय, उसकी दीवारें खराब हो जायें, नींव की ताकत पर भी संदेह हो जाय तो उसे ठीक और मजबूत करने के लिए क्या-क्या करना पड़ेगा। शर्त यह भी है कि इमारत को ठीक तो करा दिया जाय लेकिन इसके लिए इसमें निवास करने वालों को कोई तकलीफ़ न हो, उन्हें इमारत से न तो बाहर निकालना है और न ही पूरी इमारत को गिराकर नये सिरे से बनाना है।
अब ऐसा चमत्कार तो कोई जिन्न ही कर सकता है जिसे अलादीन अपने चिराग से निकालते थे। फिलहाल मोदी सरकार के पास कोई जादू की छड़ी है नहीं। आपने अगर इस मुगालते में वोट दे दिया था तो आप घामड़ किस्म के इंसान हैं। आप अपने निर्णय पर पछता लीजिए, अपने बाल नोच लीजिए, स्टेटस डालकर पूरी भड़ास निकाल लीजिए। अच्छे दिन की इतनी जल्दी है तो छत से कूद जाइए लेकिन उसे आना होगा तो भी वह अपना समय लेकर ही आएगा। अभी जो वातावरण है उसमें तो नहीं आने वाला है अच्छा दिन।
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
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शनिवार, 31 मई 2014
कितना रौशन रौशन उसका चेहरा है
चुनावी कार्यक्रम की जिम्मेदारियों से निवृत्त होने के बाद तरही नसिश्त के संयोजक से मुलाकात हुई। उन्होंने कहा कि अगली बैठक में तो आना ही पड़ेगा। मैंने पूछा मिसरा क्या है तो बोले – “कितना रौशन-रौशन उसका चेहरा है।” फिर क्या था मेरे भीतर शायरी का कीड़ा कुलबुलाने लगा। इसके बाद जो कुछ अवतरित हुआ है वह आपकी नज़र करता हूँ :
| कितना रौशन रौशन उसका चेहरा है |
| (भाग-१) कितना रौशन रौशन उसका चेहरा है आँखें अपलक देख रहीं हैं सूरत को प्यारी सूरत से ही प्यार हुआ है जो जिसने सूरत से बेहतर सीरत समझा चक्कर खा गिर पड़े अचानक अरे मियाँ
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| (भाग-२) वह पुकारती रही सांस थम जाने तक अच्छे दिन आने की आस लगी मुझको वो आये तो अन्धकार मिट जाएगा नौजवान उठ खड़ा हुआ तो ये समझो जिसके सर तोहमद है कत्लो गारद की बदल गयी है बात चुनावी मौसम की बैरी ने हमको जब भी ललकारा है
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(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
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गुरुवार, 29 मई 2014
बदलाव की बातें
सभी ज्योतिषियों, चुनावी पंडितों व भाजपा सहित सभी राजनीतिक पार्टियों के अनुमानों को धता बताते हुए नरेन्द्र मोदी ने अपनी बेहतरीन नेतृत्व क्षमता, उपलब्ध संसाधनों के प्रभावशाली प्रयोग के कौशल और विपक्षी की हर बात का माकूल जवाब देने की चतुराई से लोकसभा के चुनाव में रिकॉर्ड सफलता अर्जित करते हुए देश के पंद्रहवें प्रधानमंत्री के रूप में कुर्सी संभाल ली है। राहुल गांधी, सोनिया गांधी और बाद में सक्रिय हुई प्रियंका गांधी के पास मोदी के हमलों का कोई जवाब नहीं था। कुछ सस्ते किस्म के सिखाये हुए जुमलों और मुहावरों से मोदी के गंभीर, तार्किक और तथ्यपूर्ण भाषणों का कोई मुकाबला नहीं किया जा सका। भ्रष्टाचार, मंहगाई और सरकारी अकर्मण्यता से उकताई हुई जनता को “अच्छे दिन आने वाले हैं” की धुन में एक आशा का राग सुनायी पड़ा और उसने जाति, धर्म और क्षेत्रीयता की बंटवार से बाहर आकर एक ऐसा जनादेश दे दिया जिसमें अनेक समस्याओं का समाधान समाया हुआ था। ऐसी समस्याएँ जिनसे पिछली अनेक सरकारें ग्रसित थीं। आइए देखते हैं क्या-क्या बदल गया है :
- रिमोट कंट्रोल : सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब सत्ता का असली अधिकार भी उसी के पास है जिसके पास जवाबदेही की जिम्मेदारी है। नरेन्द्र मोदी ने अपनी मेहनत और योग्यता से जो सत्ता हासिल की है उसके महत्वपूर्ण नि्र्णयों के लिए उन्हें किसी अन्य अधिष्ठान की ओर ताकने की जरूरत नहीं होगी।
- गठबंधन : लंबे समय से क्षेत्रीय क्षत्रपों ने अपनी स्वार्थी राजनीति से बहुदलीय गठबंधन वाली सरकारों को परेशान कर रखा था। किसी राष्ट्रीय-नीति के निर्माण और क्रियान्वयन जैसी कोई बात हो ही नहीं सकती थी। अपने क्षेत्र में धुर विरोधी राजनीति करने वाले नेता भी एक साथ केन्द्र सरकार को भीतर या बाहर से समर्थन देकर अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति कर रहे थे।
- अस्थिरता : पिछली सरकारों की सबसे बड़ी चिन्ता मात्र सरकार को बचाये रखने की ही रहती थी। घटक दलों में से कोई नाराज न हो जाय इसके लिए तमाम जतन करने पड़ते थे। सीबीआई लगाने से लेकर लालबत्ती देने तक के तमाम हथकंडे जिनकी देश के विकास और राष्ट्र के निर्माण में कोई भूमिका नहीं थी।
- अनिर्णय : निर्णय लेने वाले इतने केन्द्र हुआ करते थे कि कोई एक निर्णय लेना लगभग असंभव था। कुछ निर्णय ले भी लिए गये तो उनके लागू होने से पहले कोई न कोई बिदक गया और कागज फाड़ कर फेंक दिया गया। रोचक बात यह है कि लोगों को ऐसे फाड़ू निर्णय मजेदार लगने लगे।
- देसी-विदेशी : बार-बार यह सफाई देने से निजात मिली कि सत्ता की असली चाभी शुद्ध भारतीय हाथों में ही है, कोई विदेशी शक्ति सत्ता के गलियारों में नियंत्रक की भूमिका में नहीं है।
- लिखित-वाचन : अब हमें स्वाभाविक भाषण सुनने को मिला करेंगे। बोलने वाला यह समझता भी रहेगा कि किस विषय पर बात कर रहा है। लिखी हुई स्क्रिप्ट बाँचने के चक्कर में हमारे नेता नर्मदा योजना को नर-मादा योजना से कन्फ़्यूज नहीं करेंगे।
- राज-परिवार : फिलहाल देश में अब जनता द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों को किसी राज परिवार के प्रति अपनी निष्ठा सिद्ध करने के लिए अपनी गरिमा और स्वतंत्र विचार का बलिदान नहीं करना पड़ेगा। बहुत से प्रतिभाशाली नेता इस अपरिहार्य चरण-वंदना की वृत्ति के कारण कांतिहीन होकर अपनी दुर्गति को प्राप्त हो गये। उम्मीद है कि नयी सरकार जाति और वंश पर ध्यान दिये बिना प्रतिभा और योग्यता के आधार पर बेहतर काम का अवसर देगी।
- पिलपिली उदारता : भ्रष्टाचार, महंगाई, अल्पसंख्यकवाद, क्षेत्रीयतावाद, परिवारवाद, विदेशी घुसपैठ, सांप्रदायिक उन्माद, झगड़े और ब्लैकमेलिंग के प्रति एक लिजलिजे उदार दृष्टिकोण को अब जगह नहीं मिलने वाली। कम से कम गुजरात में सफल मोदी मॉडल के आधार पर ऐसी उम्मीद की जा सकती है।
- सेकुलर-कम्युनल विमर्श : चुनाव परिणाम देखकर भारतीय राजनीति के सेकुलर खेमे के सभी सूरमाओं की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गयी है। वे सोच रहे होंगे कि देश की भतेरी जनता ही कम्युनल हो गयी है। जब तक वे इस सदमे से बाहर नहीं आते तबतक यह विमर्श ठंडे बस्ते में रहेगा।
- दूरदर्शन : सरकारी टेलीविजन के समाचारों में दिखने वाले चेहरों और पैनेल डिस्कसन के विशेषज्ञों का नया सेट आ गया है। कुछ दिनों तक इस चैनेल की टीआरपी ऊँची रहने वाली है।
- पप्पू और फेंकू : सोशल मीडिया के इन दो दुलारों को अब बहुत मिस किया जाएगा। पप्पू शायद कहीं पढ़ाई करने चले जाय और फेंकू ने राजनैतिक पटल पर जो-जो बीज फेंके थे उनके जमीन से उग आने पर खेत में निराई-गुड़ाई करने और उसकी फसल काटने में व्यस्त हो जाएंगे।
बदलाव तो और भी बहुत से होने वाले हैं; लेकिन सब के सब मैं ही थोड़े न बताऊँगा। कुछ आप भी गिनाइए, अपनी नजर से देखकर। टिप्पणी बक्सा इसीलिए तो खुला है।
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
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छपते-छपते- इधर मैंने 11 तक गिनती पूरी की उधर धारा-370 पर “ले तेरी की - दे तेरी की” शुरू हो गयी है। मैंने तो यह सोचा ही नहीं था। मतलब सरप्राइज एलीमेन्ट भी भरपूर रहने वाला है।
सोमवार, 31 मार्च 2014
वोट नहीं डालोगे तो लानत है तुमपर
आगामी लोकसभा चुनावों की सबसे उत्साहजनक तस्वीर यह होने जा रही है कि इस बार वोट देने वालों की संख्या अबतक की सर्वाधिक होगी। जनसंख्या वृद्धि इसका एक कारण तो है ही लेकिन मैं जिस वृद्धि की बात कर रहा हूँ वह मतदान प्रतिशत की है; जो इस बार पिछले सारे रिकार्ड तोड़ने वाला है।
अभी तक होता यह रहा है कि मतदाता सूची में जितने लोगों का नाम होता था उसमें से आधे से कुछ ही अधिक लोग वोट डालते थे, शेष या तो उस स्थान पर रहते ही नहीं थे या रहते हुए भी वोट डालना बेकार का काम समझते थे। इसका कुफल यह हुआ कि राजनीतिक दलों ने अपनी जीट के लिए पन्द्रह से बीस प्रतिशत मतदाताओं को खुश करने के आसान फॉर्मूले खोजने शुरू कर दिए। जाति और धर्म के आधार पर गोलबन्दी होने लगी, अगड़े-पिछड़े-दलित-अल्पसंख्यक वर्ग के लोग अपनी जातीय या सांप्रदायिक पहचान के आधार पर एकजुट होकर अपने को एक वोटबैंक के रूप में देखने लगे और प्रत्याशियों को चुनने के लिए उनकी जातीय या सांप्रदायिक पहचान को अपने मत का आधार बनाने लगे।
इसका परिणाम यह हुआ कि संकीर्ण क्षेत्रीयता और जातीयता का पोषण करने वाली पार्टियों को चुनावों में सफलता मिलने लगी और सत्ता मिलने के साथ ही एक नये प्रभु वर्ग का उदय हो गया जिसके बारे में घोटालों और भ्रष्टाचार की खबरे ज्यादा और जनहित के लिए काम करने की बातें कम सुनायी देती रहीं। हमारी चुनावी पद्धति ऐसी है कि प्रत्याशी को जीत के लिए आधे वोटों की भी जरूरत नहीं पड़ती इसलिए वह सच्चे बहुमत के बारे में सोचने की जरूरत ही नही समझता।
भारत के चुनाव आयोग ने ठीक ही अपना कर्तव्य समझा कि सच्चे अर्थों में लोकतंत्र तभी स्थापित होगा जब वास्तव में बहुमत से चुने हुए प्रतिनिधि देश की संसद और विधान सभाओं में जायें। इसके लिए एक सुविचारित रणनीति बनायी गयी है। यह एक कोशिश है देश की जनता को जगाने की, यह समझाने की कि वोट देना कितना जरूरी है। देश के प्रत्येक वयस्क नागरिक को यह कर्तव्यबोध कराने की कि दुनिया का तथाकथित सबसे बड़ा लोकतंत्र असफल हो जाएगा यदि देश की जनता के आलस्य और उदासीनता के कारण दोयम दर्जे के नेता देश की बागडोर सम्हालते रहेंगे।
इस अभियान की सफलता के लिए युद्ध स्तर पर प्रयास किये गये हैं। यह सुनिश्चित किया जाना है कि देश का संविधान जिस व्यक्ति को वोट देने का अधिकार देता है वह इस अधिकार का प्रयोग भी जरूर करे। इस अभियान को नाम दिया गया है– स्वीप; अर्थात् Systematic Voters’ Education and Electoral Participation (SVEEP).
चुनाव आयोग ने यह महसूस किया कि देश की जनता को उसके मताधिकार के प्रति जागरूक करना जितना जरूरी है उससे ज्यादा जरूरी यह है कि वोट डालने की राह में आने वाली उन सभी बाधाओं को दूर किया जाय जो जागरूक वोटर को भी पोलिंग बूथ तक जाने से रोकती हैं।
देश के एक आम नागरिक को मतदाता के रूप में जो ज्ञान रखना चाहिए और वह वास्तव में जितना जानता है इन दोनो में बड़ा अन्तर है। इस अन्तर को पाटने के लिए आयोग ने गंभीर प्रयास किये हैं। मतदाता पंजीकरण कैसे होगा, फोटोयुक्त मतदाता पहचान पत्र (EPIC) कैसे बनेगा, दूसरे पहचान-पत्र क्या हो सकते है, आपका मतदान केन्द्र कहाँ है, बूथ कौन सा है, ई.वी.एम. का प्रयोग कैसे करना है, चुनाव के दिन क्या करना है और क्या नहीं करना है, प्रत्याशी के लिए आदर्श आचार संहिता क्या है, धन-बल का प्रयोग करने वालों की क्या दवा है, समाज के कमजोर और असहाय तबकों का चुनाव के दौरान भयादोहन कैसे किया जा सकता है, और इसे रोकने क्या उपाय हैं; इन सभी प्रश्नों का समुचित उत्तर बताने के लिए चुनाव आयोग ने बाकायदा एक कार्य योजना बनाकर जिम्मेदार अधिकारियों की फौज इसके क्रियान्वयन के लिए लगा रखी है।
आयोग ने कम मतदान प्रतिशत के लिए मोटे तौर पर जिन कारणों की पहचान की है वे हैं- त्रुटिपूर्ण व अधूरी मतदाता सूची, शहरी वर्ग की उदासीनता, लैंगिक विभेद, युवाओं की बेपरवाही इत्यादि। इनके निवारण के लिए मतदाताओं को शिक्षित करने, जागरूक करने और चुनाव संबंधी प्रशासनिक तंत्र को दक्ष बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाये गये हैं।
मतदाता सूची में अनेक फर्जी और गैरहाजिर लोगों के नाम भरे रहते थे जिन्हें गहन समीक्षा करते हुए निकाल दिया जा रहा है, घर से बाहर रहकर रोजी-रोटी कमाने वालों या सरकारी नौकरी करने वालों का नाम गाँव की सूची से निकालकर उनके सामान्य निवास के स्थान पर जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। ऑनलाइन पंजीकरण की सुविधा तो है ही, सभी बूथॊं के लिए स्थानीय रूप से उपलब्ध एक-एक समर्पित कर्मचारी (BLO) की नियुक्ति करके उसे जिम्मेदारी दी गयी है कि वह उस बूथ से संबंधित मुहल्लों में घर-घर जाकर वैध मतदाताओं की सूची तैयार करेगा, उनके पंजीकरण का फॉर्म भरवाएगा, जो मर चुके हैं या कहीं बाहर चले गये हैं उनका नाम सूची से हटवाएगा और वैध व सच्ची मतदाता सूची तैयार करेगा। इस प्रकार तैयार की गयी अद्यतन सूची की प्रतियाँ बूथ के नोटिस बोर्ड पर लगायी जाएंगी, मतदाताओं की चौपाल लगाकर मतदाता सूची को त्रुटिरहित बनाया जाएगा।
सभी मतदाताओं का फोटोयुक्त पहचानपत्र तैयार कराकर घर-घर ले जाकर प्राप्त कराने तक की जिम्मेदारी इस बी.एल.ओ. को दी गयी है। अपने बूथ के प्रायः सभी मतदाताओं को यह व्यक्तिगत रूप से पहचान सकेगा। मतदान के दिन से तीन-चार दिन पहले ही सभी मतदाताओं को वोटर-पर्ची बनाकर उनके घर पर दे आने का जिम्मा भी यह कर्मचारी उठाएगा। अब पार्टियों की स्टॉल लगाकर पर्ची बाँटने के काम से छुट्टी कर दी गयी है।
लाखों की संख्या में जो सरकारी कर्मचारी, पुलिस और अर्द्ध सैनिक बलों के लोग चुनाव की ड्यूटी होने के कारण अपना वोट नहीं डाल पाते थे उनका वोट भी हर हाल में डलवाने की व्यवस्था कर ली गयी है। पोस्टल बैलेट से लेकर ड्यूटी वाले बूथ पर ही उनका वोट डलवाने के विकल्प खोले गये हैं। यह अभियान ‘पल्स पोलियो अभियान’ या ‘सर्व शिक्षा अभियान’ की याद दिलाता है जिसका नारा है- “एक भी बच्चा छूटने न पाये।” चुनाव आयोग भी चाह रहा है कि “एक भी वोटर छूटने न पाये।”
चुनाव आयोग मानो कह रहा है कि हे वोटर महोदय, इतनी कृपा कीजिए कि बूथ तक पहुँचकर अपना वोट डाल दीजिए। लोकतंत्र के मंदिर में वोटर को भगवान बनाने की यह मुहीम रंग लाने वाली है। प्रिन्ट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में, बौद्धिक सेमिनारों में और गाँव-गाँव की गली-गली तक इस संदेश को पहुँचाने की पुरजोर कोशिश की जा रही है। यह सब देखकर बस यही कहने का मन करता है कि इसके बावजूद यदि आप अपने मताधिकार का प्रयोग नहीं करते हैं तो लानत है।
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
बुधवार, 29 जनवरी 2014
यह रिपोर्ट विचलित करती है
आज के अखबार में ये विचलित करने वाले आंकड़े देखने को मिले- भारत में गरीब घरों के वे बच्चे जो लगातार चार साल स्कूल जाते रहे उनमें से 90 प्रतिशत बच्चे साक्षर ही नहीं हो सके। यही नहीं पाँच से छः साल तक स्कूल जाने के बावजूद 30 प्रतिशत बच्चों को अक्षर ज्ञान नहीं हो सका। ग्रामीण क्षेत्रों में कक्षा-पाँच में पढ़ने वाले महाराष्ट्र के 44% विद्यार्थियों और तमिलनाडु के 53% विद्यार्थियों को दो अंको का जोड़-घटाना नहीं आता। बाकी राज्यों में भी हालत खराब ही है। ग्रामीण भारत की गरीब लड़कियों को शतप्रतिशत साक्षर बनाने में अभी 66 साल और लगेंगे।
ये शर्मनाक आंकड़े काल्पनिक नहीं हैं और न ही किसी पार्टी विशेष को लक्ष्य करके तैयार किये गये हैं। भारत सहित दुनिया के तमाम देशों में संचालित सर्व शिक्षा अभियान को अरबो रूपये की आर्थिक मदद देने वाली संस्था यूनेस्को की 11वीं ग्लोबल मॉनीटरिंग रिपोर्ट में ये आंकड़े बताये गये हैं। स्वतंत्र एजेन्सियों द्वारा किये गये सर्वेक्षण पर आधारित ये आंकड़े हमारी प्रशासनिक असफलता और शिक्षा के प्रति लापरवाह दृष्टिकोण को उजागर करते हैं।
यह रिपोर्ट बताती है कि सर्व शिक्षा अभियान के जो लक्ष्य तय किये गये थे उनमें से अधिकांश 2015 तक पूरे नहीं किये जा सकेंगे। यह भी कि दक्षिण-पश्चिम एशिया के देशों में प्राथमिक, जूनियर हाईस्कूल व हाईस्कूल स्तर पर गरीब और वंचित वर्ग के शत प्रतिशत बच्चों को साक्षर और शिक्षित करने की रफ़्तार बहुत ज्यादा धीमी है। भारत में आर्थिक रूप से संपन्न घरों की लड़कियाँ तो शत प्रतिशत साक्षर हो गयी हैं लेकिन गरीब घरों की लड़कियों को शत प्रतिशत साक्षर करने का लक्ष्य सन् 2080 से पहले पूरा होता नहीं दिखता।
इस रिपोर्ट में यह विश्लेषण भी किया गया है कि समाज के हाशिये पर रहने वाले बच्चों को अच्छी गुणवत्ता की शिक्षा देने के लिए सरकारे पर्याप्त खर्च नहीं कर पा रही हैं। एक बच्चे पर खर्च की जाने वाली औसत राशि की तुलना उसे अच्छी शिक्षा देने के लिए आवश्यक राशि से की गयी तो स्थिति बहुत खराब पायी गयी। भारत के आंकड़ों के अनुसार अपेक्षाकृत धनी राज्य केरल में प्रति बालक 685 डालर खर्च किये गये जबकि बिहार में प्रति बालक मात्र 100 डालर की ही व्यवस्था की जा सकी।
इस रिपोर्ट के मुताबिक सभी बच्चों को स्कूल तक पहुँचा देने के लक्ष्य को हासिल करने में भारत अग्रणी रहा है लेकिन स्कूल में उन्हें प्राथमिक स्तर की शिक्षा वास्तव में मिल भी जाय इसकी ओर जैसे कोई ध्यान ही नहीं गया। पूरी दुनिया के करीब 25 करोड़ बच्चे स्कूल जाने के बावजूद निरक्षर हैं और इनमें से एक तिहाई दक्षिण-पश्चिम एशिया के देशों में हैं। इस बेहद निराशाजनक स्थिति में भारत प्रमुख रूप से सम्मिलित है।
शैक्षिक स्तर में प्रगति अत्यन्त धीमी है, खासकर वंचित वर्ग के बालको में। गणित में तो उनकी हालत बहुत ही खराब है। ग्रामीण क्षेत्रों के अध्ययन में यह बात स्पष्त रूप से सामने आयी कि आर्थिक रूप से संपन्न राज्यों में शिक्षा का स्तर गरीब राज्यों की अपेक्षा बहुत बेहतर है। लेकिन महाराष्ट्र और तमिलनाडु जैसे संपन्न राज्यों में भी गरीब घरों की लड़कियाँ शैक्षिक रूप से बहुत पिछड़ी हुई हैं।
बच्चों द्वारा कक्षा-पाँच में पहुँचने से पहले ही स्कूल छोड़ देने का प्रतिशत सीधे तौर पर गरीबी से जुड़ा है। गरीब राज्यों से और गरीब परिवारों के बच्चे स्कूल में टिके रहना ज्यादा कठिन पाते हैं। उत्तर प्रदेश में ऐसे ड्रॉप-ऑउट्स की संख्या 70% और मध्य प्रदेश में 85% पायी गयी।
प्रथमिक स्तर पर शिक्षा के इस संकट का सबसे बड़ा कारण शिक्षकों पर कुशल प्रशासन का अभाव बताया गया है। स्कूल से गैरहाजिर रहने वाले अध्यापकों का प्रतिशत संपन्न राज्यों में 15% (महाराष्ट्र) और 17% (गुजरात) से लेकर विपन्न राज्यों में 38% (बिहार) और 42% (झारखंड) तक है।
इन आंकड़ों को देखकर यह सुनिश्चित जान पड़ता है कि दुनिया चाहे जितनी कोशिश कर ले, हम भारत के लोग विकसित होने को कतई तैयार नहीं हैं। हमें जो भी अवसर मिलेगा हम उसे अपनी मक्कारी, जाहिली और क्षुद्र स्वार्थों की भ्रष्ट बलि-बेदी पर चढ़ा देंगे और झूठी आत्मप्रशंसा के नारे गढ़कर जश्न मनाते रहेंगे। दुनिया वालों हमारा क्या कल्लोगे...?
(सत्यार्थमित्र)
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मंगलवार, 21 जनवरी 2014
माइक, कैमरा, एक्शन और आम आदमी
भ्रष्टाचार के विरुद्ध अन्ना हजारे के मंच से अरविंद केजरीवाल के भाषण देश के नौजवानों में जोश भरने वाले होते थे। रामलीला मैदान हो या जन्तर-मन्तर, केजरीवाल जब भी माइक सम्हालते देश की मीडिया जुट जाती उसके कवरेज के लिए। न्यूज चैनेलों के माध्यम से दूर-दूर तक केजरीवाल की आवाज पहुँचाती वीडियो कैमरे और ओ.वी.वैन की सुविधा इन्हें ऐसी रास आयी कि आगे के सभी कार्यक्रमों में इनका पुख्ता इन्तजाम किया जाने लगा। आन्दोलन जब अपने चरम पर पहुँचा तो सोशल मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की ओर से राजनीति में सीधे हाथ आजमाने की चुनौती और सलाह पेश कर दी गयी। मजबूत कलेजे वाले केजरीवाल ने अन्ना जी को पीछे छोड़कर आम आदमी पार्टी का गठन किया और पहली ही परीक्षा में पास होते हुए दिल्ली विधान सभा चुनाव में मिली अप्रत्याशित सफलता के बाद मुख्य मंत्री की कुर्सी पर काबिज हो गये।
भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक मजबूत (जन) लोकपाल बनाने की मांग से प्रारंभ हुआ धरना-प्रदर्शन विभिन्न मुद्दों, बहसों और रोज बदलती घटनाओं के बीच आगे बढ़ता हुआ आज चार पुलिस वालों को निलंबित किये जाने की मांग को लेकर बदस्तूर जारी है। केजरीवाल पहले सड़क पर नारे लगाते और भाषण देते एक आम आदमी से बदलकर दिल्ली के मुख्यमंत्री बन गये; लेकिन यह अद्भुत बदलाव भी सड़क पर जारी आन्दोलन की निरन्तरता में बाधक नहीं बन पाया। भरपूर भीड़ के बीच मंच पर खड़ा होकर भाषण देने, नारे लगवाने और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को बाइट देने का जो नशा है वह उतरने का नाम ही नहीं ले रहा। मंत्रीमंडल का शपथ ग्रहण कार्यक्रम ही रामलीला मैदान में मंच सजाकर अपार भीड़ के बीच में किया गया। आम आदमी ने खूब जश्न मनाया था; लेकिन अब भी रोज़-ब-रोज़ दिल्ली के मंत्रीगण और मुख्यमंत्री जी बार-बार अपने दफ़्तर से बाहर निकलकर सड़क पर आने और माइक, कैमरा के सामने एक्शन दिखाने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहे हैं।
मुझे लगता था कि राज्य सत्ता में बैठे हुए मंत्रियों और उनके अधीन कार्यरत नौकरशाही द्वारा आम जनता के अधिकारों और जरूरी नागरिक सुविधाएँ मुहैया कराने में जो भ्रष्टाचार व्याप्त है उसे दूर करने के उद्देश्य से केजरीवाल जी ने यह आन्दोलन खड़ा किया है और इसी साध्य को साधने में उनका सहयोग करने के लिए देश का आम जनमानस और मीडिया भी आगे आया है। धरना प्रदर्शन का साधन कारगर भी लगने लगा था क्योंकि जनता ने उससे प्रभावित होकर उन्हें वोट भी दे दिया था, मुख्य मंत्री की कुर्सी भी मिल गयी और संसद ने लोकपाल अधिनियम भी बना दिया। फिलहाल जो लक्ष्य लेकर केजरीवाल जी चुनाव लड़े थे वह पूरा होता दिखायी दिया। इसके बाद उम्मीद थी कि वे लोग जमकर सचिवालय में बैठकर काम करेंगे और अबतक हुए घपलों घोटालों की खबर लेंगे और जनता को तमाम सहूलियतें देने का रास्ता निकालेंगे। लेकिन देख रहा हूँ कि मुख्य मंत्री जी ने शपथ ग्रहण करने के बाद भी सड़क पर आकर माइक, कैमरा, एक्शन का लुत्फ़ लेना जारी रखा हुआ है।
जनता की अर्जी लेने के नाम पर ‘जनता दरबार’ (एक सामन्ती संज्ञा) लगा तो सड़क पर लगा, माइक-कैमरा-एक्शन के साथ। मुख्यमंत्री जी भीड़ के बीच कैमरे से ओझल होने लगे तो भागकर चारदीवारी पर चढ़ लिए। आम आदमी ने वहाँ भी नहीं छोड़ा तो छत पर पहुँचकर माइक सम्हाल लिया लेकिन कैमरा नीचे से मुस्तैद रहा। मंत्रीगण अपने सरकारी काम के लिए बाहर निकलते हैं तो माइक और कैमरा का इन्तजाम पहले से कर लेते हैं। यहाँ तक कि आधी रात को गश्त पर भी बिना माइक-कैमरा लिए नहीं जा पाते। पुलिस वालों से तू-तू मैं-मैं भी हुई तो माइक-कैमरा-एक्शन के साथ ताकि चैनेल वाले बुरा न मान जाँए।
लगता है जैसे यह ‘माइक-कैमरा-एक्शन’ कोई साधन नहीं है बल्कि अपने आप में एक साध्य हो गया है। इस साध्य को सिद्ध कर लेने के बाद अब आगे कुछ बचता ही नहीं। वो अठ्ठारह मुद्दे जो माइक-कैमरा-एक्शन के साथ मीडिया में गिनाये गये थे उनका कोई पुरसा हाल नहीं है। जिन मुद्दों पर काम करके वे आम दिल्लीवासियों को तत्काल राहत पहुँचा सकते थे वे पीछे हो गये। इनकी फाइलों पर कोई निर्णय लिये जाने हेतु धरना-रत मंत्रियों के सचिवालय में लौटने तक प्रतीक्षा करनी होगी।
अब मुद्दा वह चुना गया है जो राज्य सरकार के पास है ही नहीं। मुद्दा यही है कि क्यों नहीं है राज्य सरकार के पास - पुलिस पर नियन्त्रण? आजादी के इतने साल बाद भी दिल्ली पुलिस को राज्य सरकार के हाथ में नहीं दिया गया। केंन्द्र और दिल्ली में परस्पर विरोधी सरकारें भी रहीं फिर भी यह मुद्दा कभी इतना भारी नहीं हुआ। राष्ट्रीय राजधानी होने के कारण दिल्ली की पुलिस निगरानी बहुत आसान है भी नहीं। हो सकता है कि पहले की राज्य सरकारें इस झंझट से जानबूझकर दूरी बनाये रखना चाहती हों।
पुलिस का काम अपराध को रोकना और अपराध करने वाले को दंडित कराना है। इसके लिए पुलिस को पर्याप्त अधिकार दिये गये हैं और जिम्मेदारी भी। पुलिस यदि इन अधिकारों का ठीक-ठीक प्रयोग करे तो भी अपनी जिम्मेदारी पूरी तरह नहीं निभा सकती; कुछ न कुछ अपराध होते ही रहेंगे। लेकिन यदि पुलिस वाले अपराधियों के साथ नरमी बरतने और पैसे के बदले आँख मूंद लेने के लिए सहज ही तैयार हो जाँय तब तो स्थिति भयावह हो जाएगी। एक दक्ष और समर्पित पुलिस समाज में छोटे-मोटे अपराध होने से तो रोक ही सकती है; लेकिन ये छोटे-मोटे अपराध ही पुलिसवालों की कमाई का साधन बन जाँय तो क्या कीजिएगा? केजरीवाल ने पुलिस के मगरूर रवैये के खिलाफ खड़ा होकर कुछ गलत नहीं किया है; लेकिन उन्होंने जो तरीका चुना है वह उन्हें अपने दायित्वों से विचलित करने वाला है।
पुलिस व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए जो विरोध और आन्दोलन करना है उसे वे अपने कार्यकर्ताओं के जिम्मे कर सकते थे; लेकिन मुख्यमंत्री होने के नाते उनके पास दूसरे सांस्थानिक तरीके भी उपलब्ध थे। विधानसभा की विशेष बैठक बुलाकर बहस कराने, राज्य सरकार की ओर से औपचारिक विरोध दर्ज कराते हुए केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजने का विकल्प चुनना चाहिए था। पहले वे शांति पूर्वक गृहमंत्री, प्रधानमंत्री और आवश्यक होने पर राष्ट्रपति से समय लेकर मुलाकात करते और अपनी भावनाओं से अवगत कराते हुए ठोस मांग रखते। पूरे देश में तब भी चर्चा होती और शायद कोई रास्ता भी निकलता। लेकिन बात-बात पर सड़क पे आ जाना, अनशन करना और धरना देना काम के प्रति एक स्टेट्समैन की गंभीरता को नहीं दिखाता।
जिस सोशल मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने उन्हें आँखों पर बिठाया वही उनका उपहास करने लगी है। मुद्दा विचारणीय होने के बावजूद आज चर्चा मुद्दे पर कम हो रही है और उनके छूठे दंभ, अनावश्यक आक्रामकता, और पदीय दायित्वों से भटक जाने की अधिक हो रही है। जिन लोगों की छाती पर मूंग दलते हुए उनका काफिला सत्ता के गलियारों तक पहुँचकर कुर्सी पर कब्जा जमा बैठा वे ही इस तमाशे को देखकर जैसे दुबारा जिन्दा हो गये हैं। डॉ. हर्षवर्धन की दमित इच्छा भी मानो अब कुलाँचे मारने लगी है। आम आदमी पार्टी की विरुदावली गाने वाले अब इसका उपसंहार लिखने बैठ गये हैं। यह उन करोड़ों लोगों के लिए निराशा का क्षण है जिन्होंने इस बदलाव की बयार से बहुत उम्मीदें लगा ली थीं। कदाचित् मैं भी उनमें सम्मिलित हूँ।
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
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मंगलवार, 31 दिसंबर 2013
कुछ अलग रहेगा नया साल
| मन की आशा |
| अब तक चाहे जो रहा हाल, कुछ अलग रहेगा नया साल तथाकथित आजादी में हमने सुख-दुख बहुतेरे देखे आशा प्रस्फुटित हुई मन में कटने वाला है विकट जाल संप्रभु समाजवादी सेकुलर हो लोकतंत्र जनगण अपना जनमानस बदल रहा अब जो लेगा इस दलदल से निकाल भ्रष्टाचारी अपराधी जन अब राजनीति से दूर रहेंगे रिश्वतखोरों को रंगे हाथ पकड़े जाने का बिछा जाल बहू बेटियाँ घर की देहरी निर्भयता से पार करेंगी चल रहा राष्ट्र निर्माण यज्ञ सब अपनी आहुति रहे डाल मतदाता ने आंखे खोली अंतर्मन की सुनता बोली सच्चे अच्छे जनसेवक को वोटर अब कर देगा निहाल |
आप सबको नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
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सोमवार, 18 नवंबर 2013
ध्यानचंद को भारतरत्न क्यो?
जबसे सचिन तेन्दुलकर को भारतरत्न का सर्वोच्च सम्मान देने की घोषणा हुई है तबसे ध्यानचंद का नाम ऐसे लिया जा रहा है जैसे किसी स्कूली वाद-विवाद प्रतियोगिता में लगभग एक जैसा प्रदर्शन करने वाले दो बच्चों में से एक के जीत जाने पर दूसरे के लिए सहानुभूति व्यक्त करने वालों की होड़ लग जाती है। यहाँ तक कि उसे सहविजेता घोषित कर देने की मांग कर दी जाती है; इसलिए कि दोनो में से किसी बच्चे को अपनी मेहनत व्यर्थ जाने का मलाल न रहे। कई बार निर्णायक मंडल ऐसे फैसले कर भी लेता है। लेकिन हाकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद का केस भी क्या ऐसा ही है?
भारतरत्न पुरस्कार की शुरुआत आजाद भारत में पहली संवैधानिक सरकार गठित हो जाने के बाद 1954 में हुई थी। सम्प्रभु देश की लोकतांत्रिक सरकार ने जब इन पुरस्कारों की परिकल्पना की थी तो ये पुरस्कार कला, साहित्य, विज्ञान और लोकसेवा के क्षेत्र में असाधारण/ विशिष्ट योगदान के लिए ही दिये जाने का प्रस्ताव किया गया था। भारतवर्ष की आजादी के बाद जिन लोगों ने इन क्षेत्रों में देश का नाम रौशन किया उन्हें ही स्वाभाविक रूप से इन पुरस्कारों के लिए योग्य माना गया। शुरुआत में ऐसे महापुरुष ही इसकी सूची में आये जिन्होंने आजादी की लड़ाई में खास योगदान दिया था और/ या आजाद भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे। सी.राजगोपालाचारी, सी,वी,रमन, राधाकृष्णन, भगवान दास, विश्वैश्वरैया, नेहरू, जी,बी.पन्त, डी.के. कर्वे, बी.सी.रॉय, पी.डी.टंडन, राजेन्द्र प्रसाद, जाकिर हुसेन,पी.वी.काने, लाल बहादुर शास्त्री इत्यादि जो भी नाम आये वे स्वंतंत्रता के बाद भी सक्रिय थे।
आजादी से पहले जिन महापुरुषों ने भारत का नाम उज्ज्वल किया उनमें अनेक अद्भुत व्यक्तित्व के स्वामी थे जिनका परिश्रम, त्याग और बलिदान अप्रतिम रहा; लेकिन जिनका जीवन आजाद भारत के लिए नींव की ईंट बनकर रह गया। विवेकानंद, दयानंद सरस्वती, बालगंगाधर तिलक, चंद्रशेखर आजाद, भगतसिंह या स्वयं महात्मा गांधी के लिए यदि भारत रत्न की मांग नहीं की गयी तो गुलाम भारत की ब्रिटिश इंडियन फौज में काम करते हुए वर्ष 1928, 1932, और 1936 के ओलंपिक खेलों में अनेक अंग्रेज खिलाड़ियों के साथ भाग लेने वाले ध्यानचंद को भारतरत्न देने की चीत्कार अब क्यों मच रही है? मेजर ध्यानचंद का जन्म 1905 में हुआ था। उनका खेल कैरियर 1921 में अंग्रेजों की इंडियन आर्मी की टीम से शुरू हुआ और 1948 में पूरी तरह समाप्त हो चुका था।
ध्यानचंद की विलक्षण प्रतिभा को लेकर किसी प्रकार का संशय नहीं है; लेकिन जिस कालखंड में उन्होंने अपना प्रदर्शन किया उस कालखंड के लिए भारतरत्न की परिकल्पना नहीं की गयी थी। यदि इतिहास के महापुरुषों को पुरस्कृत करने का दौर शुरू हो जाता तो यह श्रृंखला कितने पीछे ले जायी जाय यह विवाद का विषय बन जाता। इतना ही नहीं, खेल के लिए भारतरत्न देने की बात तो तब शुरू हुई जब आजादी के साठ से अधिक साल बीत चुके थे, ध्यानचंद का स्वर्गवास (1979) हो चुका था और खेलजगत में सचिन तेन्दुलकर नाम के एक ऐसे विलक्षण सितारे की चमक बिखर चुकी थी जिसकी तुलना किसी पूर्व के खिलाड़ी से की ही नहीं जा सकती थी। बल्कि वर्ष 2011 में जब खेलों को भी एक श्रेणी के रूप में स्वीकार किया गया तो इसके अभीष्ठ सचिन तेन्दुलकर ही थे।
ध्यानचंद का युग तो काफी पहले बीत चुका था और तबकी पीढ़ी के लोग भी इस धरा-धाम से जा चुके थे। पुरस्कार मिलने से जिसे सबसे ज्यादा खुशी होती है वह स्वयं पुरस्कृत व्यक्ति होता है, उसके बाद उसके परिवार वाले, फिर इष्टमित्र जिन्हें वह जानता हो उसके बाद उन लोगों को जो उसे पसन्द करते हों और उसे जानते हों। आज ध्यानचंद को पुरस्कार दे भी दिया जाय तो इस सम्मान की खुशी का सर्वाधिक अनुभव कौन करेगा? किसकी आंखें भर आएंगी? राष्ट्रपति के हाथों ट्रॉफी लेने कौन खड़ा होगा? तालियों की गड़गड़ाहट किसके कानों को रोमांचित करेगी? स्वर्गीय ध्यानचंद की तो कतई नहीं। इसपर एक नीरस अकादमिक चर्चा के अलावा कुछ भी नहीं हाथ लगेगा। तब कौन होगा जो भावुक होकर यह पुरस्कार अपनी माँ को समर्पित कर देगा, या आश्चर्य में डूबकर खुशी से रो पड़ेगा और अपने विद्यार्थियों और सहकर्मियों को गले लगाकर उसका श्रेय सबमें बाँटेगा जैसा सी.एन.आर. राव ने किया? पुरस्कार की खुशी का असली हकदार जब नहीं रहा तो इस टोकनबाजी का क्या मतलब है?
आज पूरा देश एक सच्चे भारतीय खिलाड़ी को भगवान का रुतबा देकर रोमांचित और उल्लसित है। आंकड़े बयान कर रहे हैं कि जो चालीस साल का व्यक्ति भावुक होकर देश के क्रिकेट फैन्स को संबोधित कर रहा है उसके जैसा शायद भविष्य में कोई दूसरा नहीं आने वाला। मुझे याद नहीं कि इससे पहले किसी दूसरे व्यक्ति को यह पुरस्कार मिलने पर एक साथ इतने लोगों ने ऐसा जश्न मनाया हो। ऐसे में तेन्दुलकर के सामने ध्यानचंद का नाम खड़ा कर देने का काम एक खास मानसिकता का परिचायक है। यह वही सोच है जो हर मामले में सोशल इन्जीनियरिंग, जेंडर बायस, या दूसरे भेद-भाव की गुंजाइश सूंघती रहती है और सही परिप्रेक्ष्य में स्थिति का मूल्यांकन करने के बजाय हर जगह राजनीति घुसेड़ने के चक्कर में रहती है। पुरस्कार तो वैसे भी राजनीति का अखाड़ा बनने के लिए सबसे आसान शिकार होते जा रहे हैं।
राजसत्ता द्वारा पुरस्कार और दंड का प्रयोग अपनी धाक और प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए किया ही जाता है। लोकतांत्रिक सरकारों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे इसमें यथासंभव पारदर्शिता और वस्तुनिष्ठता रखें लेकिन व्यवहार में यह संभव नहीं है। इस पुरस्कार के नियम इतने लचीले हैं कि यह प्रधानमंत्री (न कि मंत्रिपरिषद) की संस्तुति पर राष्ट्रपति द्वारा प्रदान किया जाता हैं। इसके लिए किसी औपचारिक संस्तुति की आवश्यकता नहीं होती। सत्ता की असली बागडोर जिसके हाथ में है वह किसी को भी यह माला पहना सकता है। अबतक के सभी भारतरत्न पुरस्कृत विभूतियों की सूची देखिए, आंख खुल जाएगी।
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
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शनिवार, 2 नवंबर 2013
कोंख में धरती के सोना है बहुत (ग़जल)
सेवानिवृत्त कर्मचारी की पेंशन शुरू करने के लिए जो गवाही होती है उसी के लिए नरेन्द्र जी मेरे पास दफ़्तर में आये। सरकारी काम खत्म होने के बाद मैंने उनसे पूछ लिया - जीवन भर अध्यापक के तौर पर बच्चों से बातें करने के बाद सेवानिवृत्ति की शांति कैसे कटती है? बोले – मैं थोड़ा-बहुत लिखने का शौक रखता हूँ। कवि-सम्मेलनों में बुलाया जाता हूँ। उसके लिए लगातार रचनायें तैयार करने और समानधर्मी मित्रों के साथ सुनने-सुनाने में समय कटता रहता है।
मैंने जब बताया कि कुछ लिखने पढ़ने का शौक मैं भी रखता हूँ तो उन्होंने मुझसे पूछकर बाहर खड़े अपने साथी को भी अन्दर बुला लिया। फिर उन्होंने बताया कि उनकी एक साहित्यिक मंडली है जो नियमित अन्तराल पर कविगोष्ठी करती रहती है। इसमें “तरही मुशायरा” भी किया जाता है। मैंने पहले कहीं यह शब्द सुना तो था लेकिन मेरे लिए यह अभी भी अबूझ पहेली सा था। सो मैंने पूछ लिया कि इसमें दरअसल होता क्या है? उन्होंने बताया कि हम सबको एक लाइन दे देते हैं जिसे ग़जल के मक्ते में प्रयोग करके पूरी ग़जल कहनी होती है। “अच्छा, तो इस बार आप लोग किस लाइन पर ग़जल कह रहे हैं?”, मैंने पूछा।
“कोंख में धरती के सोना है बहुत” । मुझे यह लाइन सुनते ही संत शोभन सरकार के सपनों का स्वर्णकोष याद आ गया जिसकी खुदाई का कार्यक्रम बहुत चर्चा में रहा है। पुरातत्व विभाग वाले अब अपना काम समेटने लगे हैं लेकिन स्वर्णकोष है कि बाहर आने का नाम नहीं ले रहा। लगता है यह लाइन तब तय की गयी होगी जब देश की सारी मीडिया इस तमाशे को पीपली लाइव बनाकर उन्नाव जिले के उस डोंडियाखेड़ा गाँव में जम चुकी थी।
बहरहाल फुरसतिया जी के शब्दों में कहें तो इस लाइन को लेकर बहुत सी तुकबन्दी मेरे दिमाग में खदबदाती रही और आज सबकुछ उफनकर बाहर आ गया है। अब जब यह बाहर आ ही गया है तो आपसब के लिए पेश भी कर देता हूँ:
| कोंख में धरती के सोना है बहुत |
| खोजने का हुनर होना है बहुत |
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
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बुधवार, 30 अक्टूबर 2013
लोकतंत्र के गुनहगार हमलोग
आजकल जहाँ देखिए वहाँ नेताओं को गाली देती पब्लिक मिल जाएगी और उन गालियों पर ताली बजाती भीड़ भी। कांग्रेस का वंशवाद हो या भाजपा का संप्रदायवाद, समाजवादियों का मुस्लिम तुष्टिकरण हो या शिवसैनिकों का संकुचित क्षेत्रवाद, वामपंथी पार्टियों का मार्क्सवाद के नाम पर खोखला पाखंड हो या दक्षिणपंथियों का धूर्त राष्ट्रवाद। ये सभी बुराइयाँ बदस्तूर जीवित है और लहलहा रही हैं तो यह निश्चित है कि इनके लिए आवश्यक उर्वरक और खाद-पानी हमारे समाज से ही मिल रहा है।
एक राजनैतिक दल का घोषित और जायज लक्ष्य होता है राजनैतिक सत्ता पाने के लिए चुनाव लड़ना और सत्ता मिल जाने पर उसे बरकरार रखना। इसी लक्ष्य को पाने के लिए पार्टी का गठन होता है, इसके संगठन को मजबूत किया जाता है, इसके लिए लोकप्रिय समर्थन जुटाने का प्रयास किया जाता है। एक खास विचारधारा और राजनैतिक सिद्धान्त का पालन करते हुए मतदाताओं के बीच अपनी स्वीकार्यता का आधार बढ़ाया जाता है और उनके वोट पाकर सत्ता की कुर्सी पायी जाती है। चुनाव लड़ना और सरकार बनाना राजनीतिक दलों का काम ही है। इसमें सफलता पाने के लिए उन्हें जो करना चाहिए वे करते हैं। यदि उन्हें लगता है कि जनता हमें वोट तब देगी जब हम किसी एक खास जाति एक खास धर्म या एक खास इलाके के पक्ष में काम करेंगे या कम से कम करने का वादा करेंगे तो वे ऐसा करने लगते हैं। इसे यूं भी कह सकते हैं कि वे ऐसा करते हैं क्योंकि उन्हें ऐसा लगता है कि जनता इसी आधार पर उन्हें वोट देगी। अब उन्हें ऐसा लगता है तो इसमें कुछ सच्चाई जरूर होगी।
अगर कांग्रेस के एक से एक प्रतिभाशाली नेता अपनी योग्यता और अनुभव को नेपथ्य में रखकर सोनिया गांधी और राहुल गांधी की अति साधारण बुद्धि और वैयक्तिक योग्यता पर वाह-वाह करते रहना और चारण धर्म का पालन करना बेहतर समझ रहे हैं तो निश्चित रूप से उन्हें यह विश्वास है कि जनता का वोट पाने के लिए उनकी अपनी योग्यता और अनुभव से ज्यादा कारगर नेहरू खानदान का नाम है। यह विश्वास इस जनता ने ही तो दिया है। कांग्रेस का साठ साल का शासन चाहे जितना भ्रष्ट और नकारा रहा हो लेकिन हर पाँच साल बाद उसे कुर्सी पर जनता ने वोट देकर पहुँचाया है। यह कोई सद्दाम हुसेन या कर्नल गद्दाफी के लंबे शासन काल की तरह बन्दूक की ताकत से नहीं चला है। जब बहुसंख्यक जनता इस वंश को अपना शासक मानने के लिए तैयार है तो आप शिकायत कैसे कर सकते हैं?
बाबरी मस्जिद टूट जाने के बाद दुनिया भर में भारत की किरकिरी भले ही हुई हो लेकिन उसके बाद हुए चुनावों में इस देश की जनता ने उन लोगों को ही वोट दे दिया जो इस कारनामें के लिए जिम्मेदार माने गये। मजहबी खूँरेजी बढ़ती गयी और चुनाव दर चुनाव इनका वोट-प्रतिशत। अब जनता की ऐसी प्रकृति और प्रवृत्ति देखकर क्यों न नेता कोशिश करेंगे ऐसा माहौल बनाने की? वोटर को पोलराइज करने का प्रयास कोई कर रहा है, तो क्यो? इसलिए कि जनता पोलराइज होने की ताक में बैठी है।
भ्रष्टाचार के नित नये कीर्तिमान बनाती सरकारों को कई राज्यों में बारी-बारी से मौका देते रहने का गर्हित कार्य यह “जनता-जनार्दन” लगातार करती आ रही है। चारा घोटाले की खबर पूरी तरह चर्चित और प्रचारित हो जाने के बाद भी लालू प्रसाद यादव को जनता ने दूसरे दलों पर तरजीह देते हुए तीसरी बार जिता दिया था; जिसकी उम्मीद शायद वे खुद ही नहीं कर रहे थे। तमिलनाडु में बारी-बारी नागनाथ और साँपनाथ का दुष्चक्र खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है – वह भी पूरे लोकतांत्रिक तरीके से।
लोकतंत्र के नाम पर वोट के माध्यम से लिया गया हर फैसला परम पवित्र और सर्वोत्कृष्ट माना जाता है लेकिन उच्च स्तरीय मानवीय मूल्यों की कसौटी पर तौलने बैठिए तो जनता द्वारा किये हुए बहुत से फैसले गले से नहीं उतरते। समानता, स्वतंत्रता, भाईचारा, धर्म निरपेक्षता, न्याय, मानवाधिकार आदि के मूल्य सेमिनारों और अकादमिक बहसों में तो स्थान पा जाते हैं लेकिन भारत का वोटर जब हाथ पर अमिट स्याही लगवाकर गोपनीय घेरे में वोट डालने के लिए घुसता है तो ये मूल्य जाने कहाँ पीछे छूट जाते हैं और उसे केवल अपनी जाति, अपना धर्म, अपना संकुचित समाज और अपना निजी स्वार्थ याद रहता है; और याद रहती है सदियों से चली आ रही रूढ़िवादी, दकियानूसी, गुलामी की विरासत में पगी पिछड़ी सोच का प्रतिनिधित्व करती अधोचेतना।
आप कह सकते हैं कि पार्टियों और नेताओं ने हमें कोई बेहतर विकल्प दिया ही नहीं तो क्या करें? जो विकल्प उपलब्ध हैं उन्हीं में से तो चुनेंगे। लेकिन यह प्रश्न तो वैसा ही है जैसा “पहले मुर्गी कि पहले अंडा?” विकल्प भी तो इस जनता को ही देना था। इस जनता के हाथों अरविन्द केजरीवाल की जो गति होने जा रही है वह एक बड़ा सबक बनकर उभरने वाला है। बस देखते जाइए। अन्ना हजारे और रामदेव का हश्र तो सामने है ही।
इसलिए अब मैंने किसी बड़े परिवर्तन की आस लगभग छोड़ ही दी है। लगता है सबकुछ ऐसे ही चलता रहेगा। थोड़ा बहुत इधर या उधर पैबन्द लगाकर। सिद्धान्त और व्यवहार में भयंकर अंतर बना रहेगा। दौड़ की रेखा सबसे पहले छूने वाले (First Past the Post) को ही विजेता घोषित करने वाली चुनाव की प्रक्रिया में आमूल-चूल परिवर्तन तो होने से रहा। आम आदमी की आदर्श छवि इस धरा-धाम पर हकीकत बनकर आने से रही। भले ही इस नाम की टोपियाँ लगाने वालों की संख्या बढ़ती रहे। अतः एक नागरिक होने के नाते मैं खुद को भारतीय लोकतंत्र का गुनहगार मानता हूँ… आपको भी… और आपको भी…।
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
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मंगलवार, 8 अक्टूबर 2013
सेकुलरिज्म का श्रेय हिंदुओं को: विभूति नारायण राय
“हिंदुस्तान का बँटवारा मुस्लिम कौम के लिए एक अलग मुल्क की मांग के कारण हुआ। मुसलमानों ने अपने लिए पाकिस्तान चुन लिया। उस समय यह बहुत संभव था कि हिंदू भारतवर्ष में हिंदूराष्ट्र की स्थापना करने की मांग करते और जिस प्रकार पाकिस्तान से हिंदुओं को भगा दिया गया उसी प्रकार यहाँ से मुसलमानों को बाहर कर देते। लेकिन ऐसा हुआ नहीं; क्योंकि हिंदू जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा भारत को धर्म पर आधारित राष्ट्र नहीं बनाना चाहता था। हमने एक धर्मनिरपेक्ष संविधान बनाया और आज देश में सेक्युलर शक्तियाँ इतनी मजबूत हो चुकी हैं कि अब दक्षिणपंथी पार्टियाँ चाहें तो भी भारत एक हिंदूराष्ट्र नहीं बन सकता। यह देश ज्यों ही हिंदूराष्ट्र बनेगा, टूट जाएगा। भारत जो एक बना हुआ है तो इसका कारण यह सेक्युलरिज्म ही है; और इस सेक्युलरिज़्म के लिए हिंदुओं को श्रेय देना पड़ेगा।”
लखनऊ के जयशंकर प्रसाद सभागार (राय उमानाथ बली प्रेक्षागृह) में महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय ने जब यह बात कही तो दर्शक दीर्घा में तालियाँ बजाने वालों की संख्या बहुत ज्यादा नहीं थी। इसका कारण भी स्पष्ट था। दरअसल यह मौका था हफ़ीज नोमानी के जेल-संस्मरण पर आधारित पुस्तक “रूदाद-ए-क़फ़स” के हिंदी संस्करण के लोकार्पण का और आमंत्रित अतिथियों में हफ़ीज साहब के पारिवारिक सदस्यों, व्यावसायिक मित्रों, पुराने सहपाठियों, मीडिया से जुड़े मित्रों, उर्दू के विद्वानों, और शेरो-शायरी की दुनिया के जानकार मुस्लिम बिरादरी के लोगों की बहुतायत थी। मंच पर हफ़ीज नोमानी साहब के सम्मान में जो लोग बैठाये गये थे उनमें श्री राय के अलावा लखनऊ विश्वविद्यालय के डॉ.रमेश दीक्षित, पूर्व कुलपति और “साझी दुनिया” की सचिव प्रो.रूपरेखा वर्मा, पूर्व मंत्री अम्मार रिज़वी, जस्टिस हैदर अब्बास रज़ा, नाट्यकर्मी एम.के.रैना, पत्रकार साहिब रुदौलवी और कम्यूनिस्ट पार्टी के अतुल कुमार “अन्जान” भी शामिल थे। दर्शक दीर्घा में मशहूर शायर मुनव्वर राना भी थोड़ी देर के लिए दिखे लेकिन वे कहीं पीछे चले गये।
पुस्तक की प्रस्तावना में बताया गया है कि- “रूदाद-ए-कफ़स एक ऐसी शख्सियत का इकबालिया बयान है जिसने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से “मुस्लिम” लफ्ज़ हटाने और उसकी अकलियती स्वरूप को खत्म करने की नीयत से मरक़जी हुकूमत द्वारा 20 मई 1965 को जारी किये गये अध्यादेश की पुरज़ोर मुखालिफत करने के लिए अपने साप्ताहिक अख़बार “निदाये मिल्लत” का मुस्लिम यूनिवर्सिटी नंबर निकालकर और हुकूमत की खुफिया एजेन्सियों की दबिश के बावजूद उसे देश के कोनो-कोनों तक पहुँचाकर भारतीय राज्य के अक़लियत विरोधी चेहरे को बेनकाब करने और तत्कालीन मरकज़ी हुकूमत को खुलेआम चुनौती तेने का जोख़िम उठाया था और अपने उस दुस्साहसी कदम के लिए भरपूर कीमत भी अदा की थी, पूरे नौ महीने जेल की सलाखों के भीतर गु्ज़ारकर।”
इस कार्यक्रम के मंच संचालक डॉ.मुसुदुल हसन उस्मानी थे जो प्रत्येक वक्ता के पहले और बाद में खाँटी उर्दू में अच्छी-खासी तक़रीर करते हुए कार्यक्रम को काफी लंबा खींच ले गये थे और उतनी देर माइक पर रहे जितना सभी दूसरे बोलने वालों को जोड़कर भी पूरा न होता। अंत में जब अध्यक्षता कर रहे कुलपति जी की बारी आयी तबतक सभी श्रोता प्रायः ऊब चुके थे। उनके पूर्व के वक्ताओं ने बहुत विस्तार से उन परिस्थितियों का वर्णन किया था जिसमें श्री नोमानी जेल गये थे और जेल के भीतर उन्हें जो कुछ देखना पड़ा। बहुत सी दूसरी रोचक बातें भी सुनने को मिलीं।
अतुल कुमार “अंजान” ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए लगातार संघर्ष करने के लिए हफ़ीज़ नोमानी की सराहना की। प्रो.रूपरेखा वर्मा ने पुस्तक में व्यक्त किये गये इस मत का समर्थन किया कि आज भी राज्य सरकार की मशीनरी में हिंदू सांप्रदायिकता का रंग चढ़ा हुआ है जो मुस्लिमों के प्रति भेदभाव का व्यवहार करती है। डॉ रमेश दीक्षित ने तो इस पुस्तक की प्रस्तावना में लिखी अपनी यह सरासर ग़लत बात भी मंच से दुहरा दी कि 20 मई 1965 में केंद्र सरकार ने जो अध्यादेश लाया था उसका असल उद्देश्य अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से “मुस्लिम” शब्द हटाने का था और बी.एच.यू. का नाम तो केवल बहाने के लिए जोड़ा गया था।
एक तुझको देखने के लिए बज़्म में मुझे।
औरों की सिम्त मसलहतन देखना पड़ा॥
उन्होंने कहा - “हकीकत यह है कि मुस्लिम समुदाय का अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के साथ जितना गहरा जज़्बाती और अपनेपन का रिश्ता रहा है उतना गहरा रिश्ता हिंदू लफ़्ज जुड़ा रहने के बावजूद बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के साथ बहुसंख्यक हिंदू समाज का कभी नहीं रहा।” दीक्षित जी यह भी बता गये कि उस यूनिवर्सिटी का नाम अंग्रेजी में तो बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी है लेकिन उसका हिंदी नाम काशी विश्वविद्यालय है काशी हिंदू विश्वविद्यालय नहीं। उनकी इस जबरिया दलील को विभूति जी ने अपने अध्यक्षीय भाषण में खारिज कर दिया।
सेक्यूलरिज़्म के सवाल पर जो खरी बात कुलपति जी ने कही उसका कारण यह था कि हफ़ीज़ मोमानी की जिस किताब का लोकार्पण उन्होंने अभी-अभी किया था उसमें लिखी कुछ बातें उनके गले नहीं उतर रही थीं। समय की कमी के बावजूद उन्होंने एक उद्धरण पृष्ठ-19 से सुनाया- “लेकिन यह भी सच है मुल्क की तकसीम होने और पाकिस्तान बनने के बाद आम तौर पर हिंदू लीडरों और कांग्रेस के कार्यकर्ताओं का व्यवहार मुसलमानों के प्रति नफ़रत और दूसरे दर्ज़े के शहरी जैसा होता जा रहा था। वास्तविकता यह है कि 90 प्रतिशत हिंदू लीडरों और कार्यकर्ताओं को यह बात सहन नहीं होती थी कि पाकिस्तान बनने के बाद भी चार करोड़ मुसलमानों की मौजूदगी अपनी आंखों से वे यहाँ देख रहे थे।…”
विभूति नारायण राय ने इस धारणा पर चोट करते हुए उपस्थित लोगों में हलचल मचा दी। कानाफूसी होने लगी जब उन्होंने जोर देकर कहा कि हिंदुस्तान में यदि सेक्युलरिज्म मजबूत हुआ है तो वह इन 90 प्रतिशत हिंदुओं की वजह से ही हुआ है। उन्होंने जोड़ा कि इस जमाने में सबके के लिए सेक्यूलरिज ही एक मात्र रास्ता है- न सिर्फ़ भारत के लिए बल्कि पूरी दुनिया के लिए। यह पाकिस्तान में भी उतना ही जरूरी है और सऊदी अरब में भी। यह नहीं चलेगा कि आप हिंदुस्तान में तो सेक्यूलरिज़्म की मांग करें और जहाँ बहुसंख्यक हैं वहाँ निज़ाम-ए-मुस्तफा की बात करें।
मेरे बगल में बैठे एक नौजवान मौलवी के चेहरे पर असंतोष की लकीरें गहराती जा रही थीं। अंत में उसने अपने बगलगीर से फुसफुसाकर पूछा- इन्हें सदारत के लिए किसने बुलाया था?
पुस्तक : रूदाद-ए-क़फ़स (नौ महीने कारागार में)
लेखक : हफ़ीज़ नोमानी
प्रकाशक : दोस्त पब्लिकेशन, भोपाल हाउस, लालबाग-लखनऊ
संपर्क : 9415111300
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
शुक्रवार, 23 अगस्त 2013
अब कौन पढ़ाए…?
कोषागार में एक महत्वपूर्ण काम होता है सरकारी सेवा से रिटायर होने वाले कर्मचारियों, अधिकारियों और शिक्षकों इत्यादि को पेंशन का भुगतान करना। जब पहली बार पेंशन की शुरुआत होती है तो इसके लिए संबंधित पेंशनर को स्वयं कोषाधिकारी के समक्ष उपस्थित होना पड़ता है। कोषाधिकारी को पेंशन संबंधी अभिलेखों में दी गयी सूचना और फोटो इत्यादि का सत्यापन उस व्यक्ति से पूछताछ करके करना होता है जो उसकी पहचान से संतुष्ट होने के बाद पेंशन भुगतान करने के आदेश पर हस्ताक्षर करता है। इसके बाद प्रत्येक माह की पहली तारीख को उसकी पेंशन उसके बैंक खाते में ई-पेमेंट की प्रक्रिया से भेज दी जाती है। साल में केवल एक बार नवंबर-दिसंबर में उसे अपने ‘जीवित होने का प्रमाणपत्र’ देने के लिए कोषागार या बैंक में उपस्थित होना पड़ता है। जिस पेंशनर की मृत्यु हो जाती है उसकी सूचना लेकर उसकी पत्नी या पति (यदि जीवित हैं) को उपस्थित होना होता है जिनकी पहचान से संतुष्ट होने के बाद उन्हें पारिवारिक पेंशन का भुगतान प्रारंभ हो जाता है।
लगातार एक ही काम करते हुए यह सब इतना यंत्रवत होता रहता है कि मुझे इस काम में बोर हो जाना चाहिए। लेकिन मैं इसमें कभी बोर नहीं होता। कारण यह है कि इस काम को मैं एक विशिष्ट अवसर के रूप में प्रयोग करता हूँ। साठ साल की उम्र में जो लोग मेरे पास आते हैं उनके पास सरकारी काम करने का एक लंबा अनुभव होता है और उनके पास इस जीवन के बारे में अपने-अपने निष्कर्ष होते हैं। पारिवारिक पेंशन के लिए जो वयोवृद्ध महिलाएँ आती हैं उन सबकी आँखों में एक अलग कहानी झाँकती रहती है। कुछेक पुरुष जो अपनी नौकरीशुदा पत्नी की मृत्यु के बाद पारिवारिक पेंशन लेने आते हैं उनकी कहानी तो और भी उत्सुकता जगाती है। समय की उपलब्धता और उनकी प्राइवेसी की मर्यादा की रक्षा करते हुए मुझे उनसे बात-चीत करके जो कुछ जानने-समझने का अवसर मिलता है उसे मैं इस नौकरी की बहुत विशिष्ट उपलब्धि मानता हूँ। इन बुजुर्गों से दोस्ती करके एक अलग आनन्द आता है।
आप जानते ही होंगे कि शिक्षकों की सेवानिवृत्ति एक खास नियम के कारण प्रायः जून महीने की समाप्ति पर होती है। शिक्षा सत्र के बीच में चाहे जब भी उनकी सेवानिवृत्ति की आयु पूरी हो जाय उन्हें सत्र के अंत तक अपने विद्यार्थियों को पूरा कोर्स पढ़ाने के बाद सेवा से निवृत्त किया जाता है। इसे “सत्रान्त लाभ” कहते हैं। तो आजकल कोषागार में गुरूजी लोगों की आमद ज्यादा हो गयी है। जून में सेवानिवृत्त होने के बाद उनकी पेंशन का प्राधिकार पत्र सक्षम स्वीकर्ता अधिकारियों द्वारा कोषागार में भेजा जा रहा है और वे अपनी पहचान/ सत्यापन की औपचारिकता पूरी कराने कोषागार में आ रहे हैं।
पहचान के सत्यापन सम्बंधी कुछ वैधानिक प्रश्न पूछने के बाद मैं कुछ अनौपचारिक चर्चा उनके विद्यालय की दशा और दिशा के बारे में भी कर लेता हूँ। जैसे- आपके विद्यालय में किन-किन विषयों की पढ़ाई होती है। उन विषयों के अध्यापक उपलब्ध हैं कि नहीं? जो लोग रिटायर हो जा रहे हैं उनके स्थान पर नयी भर्तियाँ हो रही हैं कि नहीं? क्या बच्चे रेग्युलर कक्षाओं में पढ़ाई करने आते हैं? परीक्षाओं में नकल पर रोक लग पाती है कि नहीं? कितने प्रतिशत बच्चों में विषय का ज्ञान अर्जित करने की ललक होती है? ऐसे बच्चों को गुरुजन कितना संतुष्ट कर पाते हैं। पहले से अब की शिक्षा व्यवस्था में क्या परिवर्तन आये हैं? बच्चों को अपने स्कूल की कक्षा की पढ़ाई से काम चल जाता है या उन्हें प्राइवेट ट्यूशन करना पड़ता है? आदि-आदि।
इन प्रश्नों का जो उत्तर टुकड़ों-टुकड़ों में मिलता है उसे अपने अनुभवों की गोंद से जोड़ता हूँ तो एक ऐसी तस्वीर उभरती है जिसे देखकर कलेजा बैठ जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों व छोटे-छोटे कस्बों में पसरे इन विद्यालयों में कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाय तो पठन पाठन की दुरवस्था देखकर मन में घोर निराशा पाँव पसारने लगती है। जिनके ऊपर इस दिशा में कुछ कदम उठाने की जिम्मेदारी है उनकी चाल-ढाल देखकर मन में एक डर सा बैठ जाता है – इस समाज की नयी पीढ़ी का भविष्य कैसा होगा?
इस तस्वीर की कुछ बानगी देखिए-
- स्कूलों में जितने बच्चों का नाम लिखा होता है उसके चौथाई बच्चे ही नियमित स्कूल आकर कक्षाओं में पढ़ने बैठते हैं। इन बच्चों को पढ़ाने के लिए आवश्यक जितने शिक्षकों का मानक निर्धारित है उनसे चौथाई संख्या में ही वास्तव में कक्षा में जाकर पढ़ाते है। इसका कारण लगातार बढ़ती रिक्तियों व शिक्षक समुदाय पर प्रशासनिक नियन्त्रण की कमी से लेकर शिक्षक संघ की राजनीति तक बहुत कुछ है। अब यह अनुमान लगाना कठिन है कि बच्चे कम आते हैं इसलिए शिक्षक कम पढ़ाते हैं या शिक्षक कम पढ़ाते हैं इसलिए बच्चे कम आते हैं।
- सेवानिवृत्ति के फलस्वरूप जो पद रिक्त हो जाते हैं उन पदों को समय से भरे जाने की कोई मुकम्मल व्यवस्था नहीं है। निजी प्रबंधतंत्र वाले विद्यालय शिक्षकों के वेतन के लिए जब सरकारी अनुदान पाने लगते हैं तब स्टाफ की नियुक्ति का अधिकार सरकारी नियन्त्रण में चला जाता है। सरकार द्वारा शिक्षकों की भर्ती के लिए जो चयन-बोर्ड गठित किया गया वह पिछले दो-तीन सालों से कोई चयन की प्रक्रिया पूरी नहीं कर सका है। भ्रष्टाचार और अयोग्यता के दलदल में फँसकर यह प्रक्रिया लगभग दम तोड़ चुकी है। तीन साल पहले जब इस बोर्ड के माध्यम से शिक्षकों का चयन होता भी था तब कोई भी अभ्यर्थी अपनी योग्यता और मेरिट के भरोसे सफल होने की कल्पना नहीं कर पाता था। आवेदन डालने के साथ ही किसी जुगाड़ के फेर में पड़ जाता था। पक्षपात और धाँधली की शिकायतें बढ़ी और असफल अभ्यर्थी कोर्ट जाने लगे। कोर्ट-केस इतने बढ़ गये कि अब नयी भर्ती की प्रक्रिया लगभग बन्द ही हो गयी है।
- जो अभ्यर्थी येन-केन प्रकार से सफल होकर इन विद्यालयों में पहुँचे उन्हें निजी प्रबन्ध तन्त्र ने अपनी शर्तों पर ज्वाइन कराया; या नहीं ज्वाइन करने दिया। एक शिक्षक ने तो बड़े गर्व से कहा कि मेरे विद्यालय में करीब आधा दर्जन लोग चयन बोर्ड से परवाना लेकर आये लेकिन मेरे मैनेजर साहब इतने मजबूत हैं कि किसी को ज्वाइन नहीं करने दिया। मैंने पूछा- तो फिर पढ़ाता कौन है वहाँ? वे बोले- सब व्यवस्था हो जाती है साहब। मैनेजर साहब ने बहुत लोगों को ‘ऐडहाक’ पर रख लिया है। आज नहीं तो कल वे रेगुलर हो ही जाएंगे। उनके विश्वास को देखकर मुझे वह बहस याद आ गयी जो मैंने अपनी ट्रेनिंग के दौरान एक माननीय न्यायमूर्ति के साथ कर ली थी-
- अज्ञानतावश तगड़े आत्मविश्वास का शिकार होकर मैंने हाईकोर्ट के पूर्व अधिवक्ता और तत्कालीन न्यायमूर्ति का लेक्चर सुनते हुए उनसे एक ऐसा तकलीफ़देह प्रश्न पूछ लिया था जिससे अवमानना का दोषी भी होने का खतरा उत्पन्न हो गया था। यह कि किसी निजी प्रबन्धतंत्र द्वारा भ्रष्टाचारी तरीका अपनाकर अनियमित रूप से किसी भाई-भतीजे को शिक्षक के रूप में नियुक्त कर लिया जाता है जिसका अनुमोदन सरकारी अधिकारी द्वारा नहीं किया जा सकता है। लेकिन वह जानबूझकर उसकी नियुक्ति रद्द करने का एक ऐसा आदेश पारित कर देता है जिसमें पूरा प्रकरण युक्तियुक्त तरीके से उद्धरित नहीं होता है। उस आदेश को प्रबंधतंत्र कोर्ट में चुनौती देता है और माननीय न्यायमूर्तिगण आसानी से अन्तरिम स्थगनादेश (स्टे ऑर्डर) जारी कर देते हैं। कोर्ट का आदेश भले अस्थायी स्थगन का हो लेकिन उसका स्थायी लाभ उन गलत व्यक्तियों को मिल जाता है। मेरा प्रश्न था कि क्या कोर्ट के पास इस गलत कार्य में खुद एक सहयोगी पक्ष (पार्टी) बन जाने से बचने का कोई सूत्र नहीं है? मुझे कोई संतोषजनक उत्तर न तब मिला था न अबतक मिल पाया है। कोर्ट के स्टे के सहारे बहुत से लोग अपने गलत रास्ते पर आगे बढ़ने में सफल हो जाते हैं। अलबत्ता उनकी इस सफलता में कार्यपालिका के जिम्मेदार अधिकारी बड़े सहयोगी की भूमिका निभाते हैं।
- यह स्थिति तो अशासकीय सहायता प्राप्त माध्यमिक विद्यालयों की थी। प्राथमिक शिक्षा विभाग में शिक्षकों की स्थिति और भयावह है। शिक्षा का अधिकार अधिनियम आ जाने के बाद प्राथमिक शिक्षा को मौलिक अधिकार बना दिया गया लेकिन वास्तविकता के धरातल पर उस अधिकार को जिस प्रकार उपलब्ध कराया जा रहा है वह किसी से छिपा नहीं है। शिक्षकों के जितने पद मानक के अनुसार जरूरी हैं उनमें आधे रिक्त हैं। इनकी भर्ती की प्रक्रिया तीन-चार साल से अटकी पड़ी है। इसके पीछे भी प्रशासनिक अयोग्यता और भ्रष्टाचार का खेल काम कर रहा है। हम लाखों की संख्या में उपलब्ध योग्यताधारी अभ्यर्थियों में से जरूरी संख्या में प्राथमिक शिक्षकों का चयन कर पाने में असमर्थ हैं। आज स्थिति यह है कि प्रशासनिक अधिकारी नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू करने में घबरा रहे हैं। हाथ खड़े कर देते हैं। जैसे किसी आफ़त को दावत दे रहे हों। काम हो चाहे न हो लेकिन जिसने नियुक्ति का काम हाथ में लिया उसका फँसना तय है। आखिर हमने ऐसी भयावह स्थिति क्यों बन जाने दी है? कौन जिम्मेदार है इसके लिए?
- राजकीय हाई-स्कूल व इंटर कॉलेजों में भी शिक्षक भर्ती की कमोबेश यही दशा है। राज्य लोक सेवा आयोग में जो उहापोह और अनिर्णय की स्थिति है वह हाल की घटनाओं के बाद सभी जान गये हैं। पूरा डेलिवरी सिस्टम चरमरा गया लगता है।
- एक संस्कृत महाविद्यालय के सेवानिवृत्त शिक्षक ने तो ऐसी बात बतायी कि मैं सन्न रह गया। बता रहे थे कि वे अपने महाविद्यालय के अंतिम बचे हुए शिक्षक थे जो अब सेवानिवृत्त हो गये हैं। अब वहाँ एक भी शिक्षक नहीं है और प्रबंधतंत्र बहुत खुश है कि अब उसे संस्कृत महाविद्यालय बन्द करके उसके विशाल प्रांगण में निजी पब्लिक स्कूल चलाने की पूरी स्वतंत्रता मिल गयी है। यह व्यवसाय आजकल बहुत लाभकारी हो गया है क्योंकि कोई भी जागरूक गार्जियन अपने बच्चों को सरकारी प्राइमरी स्कूल में भरसक नहीं भेजना चाहता। संस्कृत पाठशालाओं व महाविद्यालयों को सरकारी अनुदान पर चलाने के लिए पिछले जमाने की सरकारों ने जब फैसला किया तब यह नहीं सोचा कि इन शिक्षकों की निरन्तरता कैसी बनायी जाएगी। जो पद खाली हो रहे हैं वे समाप्त होते जा रहे हैं और शनैः शनैः ये सभी विद्यालय भी काल के गाल में समा जाएंगे। जो विद्यालय चल भी रहे हैं उनके पठन-पाठन का स्तर देखकर लगता है कि वे यदि सुधर नहीं सकते तो उनका समाप्त हो जाना ही बेहतर है।
- एक बार मुझे एक जिले में इन संस्कृत विद्यालयों के निरीक्षण का दायित्व मिला। इनकी दुर्दशा और गुरुजनों की अकर्मण्यता के बारे में जब मैंने खरी-खरी रिपोर्ट बनानी शुरू की तो मुझे समझाया गया कि आप लोग उर्दू मदरसों पर तो ऐसी कड़ाई नहीं करते। वहाँ भी तो किसी विषय की वस्तुनिष्ठ पढ़ाई नहीं होती। वहाँ भी तो नकल कराकर बच्चों को पास कराया जाता है। वहाँ भी तो मुफ़्त में सरकारी अनुदान की बन्दरबाँट होती है। वहाँ तो किसी की हिम्मत नहीं है जो जाँच कर ले। मैंने जब अपने काम से काम रखने पर बल दिया तो मेरे खिलाफ़ एक आन्दोलन सा खड़ा हो गया और उच्च अधिकारियों ने ‘समझदारी से’ बीच-बचाव करके मुझे उस काम से अलग कर दिया।
इन सारी दुर्व्यवस्थाओं के बीच एक आशा की किरण दिखती है तो वह सरकारी तंत्र से अलग निजी क्षेत्र में काम कर रहे कुछेक ऐसे शिक्षण संस्थानों में दिखती है जिन्होंने गुणवत्ता बनाये रखने के तमाम जतन कर रखे हैं। लेकिन उनके ऊँचे तोरण द्वारों के भीतर जाने का सुभीता कितने बच्चों के पास है?
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

