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शुक्रवार, 19 दिसंबर 2014

रुबाई की आजमाइश

तरही नशिस्त में उस्ताद जी ने चुनौती दी रुबाई कहने की। शायरी में रुबाई छंद कठिन माना जाता है। इसमें बीस-बीस मात्राओं की चार लाइनें कहनी होती हैं जिनकी पहली, दूसरी और चौथी लाइन की तुक (काफिया) समान होता है। सभी लाइ्नों में मात्राओं का क्रम (बह्‍र) एक समान रखना होता है और चारो लाइनों में अभीष्ठ बात पूरी (मुकम्मल) करनी होती है। उस्ताद द्वारा उदाहरण स्वरूप एक लाइन (मिसरा) समस्या के रूप में दे दी जाती है। उसी रूप और गुण वाली चार लाइने तैयार करके रुबाई पूरी होती है। मुझे जो मिसरा मिला उसकी बहर और उनके घटक (औजान) भी बताये गये जो निम्नवत्‍ है-

कुछ लोग बुरा भला मुझे कहते हैं
मफ़ऊल मफाइलुन मफाईलुन फअ
फलफूल सुफूलफल सुफलफलफल फल

इसके आधार पर जो रुबाई मेरे द्वारा कही गयी उसे उस्ताद ने पास कर दिया है। लीजिए आप भी शौक फरमाइए -

-1-
कमज़ोर सदा नज़र झुकी रखते हैं
कमज़र्फ बहुत सितम किया करते हैं
इक रोज बड़ी सज़ा मिलेगी उनको
जो लोग बुरा भला इन्हे कहते हैं

*
-2-
इक नजर तिरी उथल पुथल करती है
पुरजोर कशिश महक महक जाती है
सब लोग चकित पलट पलट तकते हैं
जो आग बुझी लहक लहक उठती है

**

-3-
वह रोज बहुत मरा मरा कहता था
प्रभु नाम वही जपे चला जाता था
यह बात हुई कि जो कभी रहजन था
वह संत बना अमर कथा रचता था

***

मुझे पता है कि आप हौसला आफ़जाई तो करेंगे ही। नया-नया फितूर है। आपकी दाद से ही यह परवान चढ़ेगा। Smile

(इस मौके पर जो ग़जल कही गयी वह अगली पोस्ट में।)

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
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शनिवार, 15 नवंबर 2014

जिन्दगी अपनी बनाते हैं बनाने वाले (तरही ग़जल)

उस्ताद ने इस बार जब मिसरा दिया था तो मैं उपस्थित नहीं था। किसी और ने जब फोन पर बताकर नोट कराया तो इसकी बहर गलत समझ ली गयी और पूरी ग़जल गलत बहर में कह दी गयी। बाद में ऐन वक्त पर नशिस्त से पहले गलती का पता चला तो काट-छांट करके और कुछ मलहम पट्टी लगाकर शेर खड़े किये गये। अब यहाँ ब्लॉग पर तो अपनी मिल्कियत है। सो इस अनगढ़ को भी ठेल देता हूँ। साथ में एक कठिन बहर की रुबाई भी बनाने को दी गयी थी जिसे मैंने डरते-डरते आजमाया। 

रुबाई

हरगिज न करूँ कभी कहीं ऊल जुलूल
अब बाँध लिया गिरह तिरा पाक उसूल
हर रोज किया करूँ मैं सजदा तेरा
कर ले तू खुदा मेरी इबादत को कुबूल

ग़जल

बदगुमाँ होते हैं क्यूँ हार के जाने वाले
जिंदगी अपनी बनाते हैं बनाने वाले

मत करें प्यार का इजहार गरज़मंदी में
बेगरज़ होके रहें प्यार जताने वाले

गुल खिलाती है हवा धूप की गर्मी लेकर
प्यार के जश्न हुए दिल को खिलाने वाले

प्यार गहरा हो तो बढ़ जाती है ताकत दिल की
साहसी होते बहुत दिल से निभाने वाले

चूम लेने का हुनर आया अदा में कुछ यूँ
लब बिना बोले बहुत कुछ हैं बताने वाले

प्यार के रंग बने जैसे कि ये शेरो सुखन
यकबयक बनते नहीं बनने बनाने वाले

एक मुस्कान से शुरुआत भली होती है
प्यार की राह यही लब हैं बताने वाले

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

सत्यार्थमित्र
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रविवार, 26 अक्टूबर 2014

मोदी-चाय है कि बवाल की दावत…

namochayमीडिया के लिए मोदी की चाय पार्टी से सोशल मीडिया में जो हलचल मची है वह प्याले में तूफान की उक्ति चरितार्थ करती है। प्रिन्ट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की प्रायः सभी बड़ी हस्तियाँ जो देश की राजधानी में कार्यरत हैं उन्हें नरेन्द्र मोदी ने आदर सहित बुलाया, दीपावली की शुभकामनाएँ दीं और स्वच्छ भारत अभियान में उनके सहयोग के लिए धन्यवाद दिया। देश के सबसे लोकप्रिय राजनेता के पास पहुँच जाने के बाद कुछ लोगों में यह सहज इच्छा पैदा हो गयी कि उनके साथ तस्वीरें खिचवा ली जाय।

मोबाइल फोन में कैमरे की सुविधा ने तो यह हाल कर दिया है कि हमें राह चलते कोई सुन्दर सा कुत्ता भी दिख जाय तो उसके साथ सेल्फ़ी क्लिक करने लगते हैं और तुरन्त देश भर के मित्रों को फेसबुक और व्हाट्सएप के माध्यम से दिखाने लगते हैं। तो फिर पूरी दुनिया में अपने किस्म की अकेली शख्सियत को देखकर किस चुगद का मन सेल्फ़ी खिंचाने के लिए नहीं ललचा जाएगा। अलबत्ता कुछ स्वनामधन्य ऐसे लोग भी हैं जिन्हें मोदी नाम से ही सख्त नफ़रत है। इन्हें भारतीय लोकतंत्र के किसी भी मूल्य से बड़ा लगता है अपने पूर्वाग्रहों की हर हाल में रक्षा करना।

इस चाय-पार्टी से प्रेस की स्वतंत्रता पर आँच आने की चिन्ता में घुलते तमाम मित्रों के स्टेटस देखकर मैं दंग रह गया। भड़ास4मीडिया पोर्टल पर प्रचुर सामग्री जमा हो चुकी है। कुछ देर के लिए सामान्य शिष्टाचार तो हम अपने दुश्मन के साथ भी निभा लेते हैं। यहाँ तो देश के सर्वोच्च जनप्रतिनिधि ने आदर व सम्मान से बुला रखा था। अब इसे जो लोग उत्कोच समझने कॊ मनोवृत्ति रखते हैं वे निश्चित रूप से यह भी समझते होंगे कि पत्रकार समुदाय में ऐसे लोग भरे पड़े हैं जो थोड़ा सा प्रलोभन सामने आते ही उसओर झपट पड़ेंगे और अपने स्वार्थ के आगे जनहित का ख्याल छोड़ देंगे। namochay.2jpg

भगवान न करे यह बात सच हो; लेकिन यदि इस बात में लेश मात्र भी सच्चाई है कि मीडिया वाले भी मात्र अर्थोपार्जन के उद्देश्य से ही काम कर रहे हैं और ‘मिशन’ वाला हिस्सा पीछे छूट चुका है तो इसके लिए सिर्फ़ उस चाय-पार्टी में सम्मिलित होने को दोष देकर छुटकारा नहीं मिलने वाला। फिर तो पत्रकार बन्धुओं द्वारा गुजारी गयी हर शाम पर निगाह रखनी होगी जिसमें दस-पाँच रूपये की टुच्ची चाय नहीं बल्कि एक से एक उम्दा ब्रैंड की देशी-विदेशी मदिरा और फाइव-स्टार डिनर पार्टी भी आसानी से उपलब्ध है। प्रोफेशनलिज्म की मांग तो यह है कि अपनी स्टोरी को विश्वसनीय बनाने के लिए और अन्दर की सच्ची खबर बाहर लाने के लिए चाहे जिस भी रूप में अन्दर जाना पड़े, चले जाना चाहिए। घोटालेबाज के साथ मक्कारी का खेल खेलकर भी सच्चाई बाहर निकल आये तो ऐसी मक्कारी करने में कोई हर्ज़ नहीं। स्टिंग ऑपरेशन इसे ही तो कहते हैं।

namochay.1jpgलेकिन जो लोग नरेन्द्र मोदी का नाम लेते ही उल्टियाँ महसूस करने लगते हैं, सारी तर्कशक्ति मिथ्या प्रलाप में लगा देते हैं और हास्यास्पद होने की सीमातक प्रतिकार की भाषा बोलने लगते हैं उनका रोग बहुत भयानक और असाध्य है। कोई एक दशक पहले लगा आघात इनके मन मस्तिष्क पर जो निशान छोड़ गया उससे मानो इनमें बदलते समय के साथ आगे बढ़ने की क्षमता ही जाती रही। स्थिति यह हो गयी है कि अब ये “पाप से घृणा करो पापी से नहीं” वाले सन्देश को उल्टा समझते हैं। यानि- वे पाप से भले ही घृणा न करें लेकिन पापी से घूणा करने का दिखावा जरूर करेंगे। अगर वे वास्तव में पाप से घृणा कर रहे होते तो ऐसे पाप की लंबी फेहरिश्त से जुड़े सभी पापियों से समान दूरी बनाकर चलते। लेकिन तमाम दलों में विविध रूप लेकर बैठे इसी प्रकार का पाप कर चुके लोगों की गोद में बैठकर अपना उल्लू सीधा करते रहने में इन्हें कोई शर्म नहीं आती।

लोकसभा चुनाव से पहले और बाद में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के चर्चित चेहरों के रुख में आये बदलाव को देखकर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि लाखो की लागत लगाकर करोड़ो की कमाई करने के लिए कैसे रंग बदलना पड़ता है, कैसे शर्म-हया ताख पर रख देनी पड़ती है और मालिकान के फरमान को हर हाल में पूरा करना पड़ता है। यह सब मोदी की चाय-पार्टी से पहले की बात है; तो फिर इस चाय पर इतना तूफान क्यों?

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
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