एक सुखद संयोग बना जब मेरे भाग्य
से आदरणीय बुद्धिनाथ मिश्रा जी ट्रैफिक जाम में अटक गए और उनकी सहारनपुर से लखनऊ
की ट्रेन छूट गई। अगली ट्रेन कुछ घंटे बाद थी। मित्र मनीष कच्छल जी ने बताया तो
मैंने शाम की चाय पर उन्हें सानुरोध
आमंत्रित किया। साथ में कुछ और कविगण भी पधारे। एक अल्पकालिक कविगोष्ठी हो गयी।
शाम यादगार बन गई। कविश्रेष्ठ का कालजयी गीत बगल में बैठकर सुनने का आनंद ही कुछ
और था। "एक बार जाल और फेंक रे मछेरे..."
ढाई हजार घरों की चाय
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[ छियालीस साल हो गये हमारी शादी को। याद नहीं आता कि किसी ने सालगिरह के अवसर
पर उपहार दिया हो। इस बार उन लोगों ने दिया जो शादी के समय तो हो नहीं सकते थे
— ह...
2 दिन पहले




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