एक सुखद संयोग बना जब मेरे भाग्य
से आदरणीय बुद्धिनाथ मिश्रा जी ट्रैफिक जाम में अटक गए और उनकी सहारनपुर से लखनऊ
की ट्रेन छूट गई। अगली ट्रेन कुछ घंटे बाद थी। मित्र मनीष कच्छल जी ने बताया तो
मैंने शाम की चाय पर उन्हें सानुरोध
आमंत्रित किया। साथ में कुछ और कविगण भी पधारे। एक अल्पकालिक कविगोष्ठी हो गयी।
शाम यादगार बन गई। कविश्रेष्ठ का कालजयी गीत बगल में बैठकर सुनने का आनंद ही कुछ
और था। "एक बार जाल और फेंक रे मछेरे..."
श्रीराम नामकरण संस्कार | Ramcharitmanas Balkand 196 to 198 |
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https://youtu.be/UP_Ab7sVAXQश्रीरामचरितमानस: बालकाण्ड (दोहा 196 से
198)यहाँ फिर से रामचरितमानस के कुछ दोहों और छंदों को एक मधुर भक्ति गीत के
रूप में प्रस्...
9 घंटे पहले




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