माँ शाकुंभरी की कृपा ऐसी हुई कि
मुझ अकिंचन को सहारनपुर के इस विश्वविद्यालय में सेवा करने का आदेश मिला। एक नव
स्थापित विश्वविद्यालय के लिए बहुत कुछ पहली बार हो रहा था। मुझे उस सबका साक्षी
बनते हुए उसमें कुछ योगदान करने का भी अवसर मिला। देवी की कृपा से कुलगीत की रचना
हुई जिसके लिए महामहिम राज्यपाल से प्रशस्ति-पत्र और नकद पुरस्कार की प्राप्ति हुई। इस
सौभाग्य के क्षण का समाचार यहाँ से लगभग 1000 किलोमीटर दूर मेरे पैतृक गाँव जनपद
कुशीनगर में पहुँचने वाले अखबार में भी छप गया। अब मन बल्लियों उछल रहा है।
हम बच्चों की आवाज़
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मेरा नाम पद्मजा है, मेरी उम्र तेरह साल है, और मैं गर्व के साथ कहती हूँ कि
मैं भारत की नागरिक हूँ।। मैं एक ऐसे देश में पलीबढ़ी हू जो अपनी संस्कृति,
विविधता ...
2 दिन पहले



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