आज लोहिया पार्क लखनऊ के हरे -भरे वातावरण में प्रातः काल के धुंधलके में पहुंच गया था। आसन बिछाकर ऑनलाइन योगकक्षा से जुड़ गया। कक्षा तो सात चक्रों के संतुलन संबंधी आसनों और उनके जागरण की मुद्राओं की थी। किंतु यहां की मनोरम छटा में कुछ नियमित आसन लगने का लोभ संवरण न कर सका। कुछ झलकियां आपके लिए।
मोबाइल नहीं, डिजिटल कल्पवास चाहिए
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मोबाइल को जीवन में रस और जीवन के बड़े अर्थ से जोड़ने का उपक्रम सुबह साइकिल
लेकर निकलता हूँ। घरपरिसर में ही गोल गोल चक्कर। साइकिल बहुत तेज नहीं
चलाता—इतनी ही...
5 दिन पहले














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