हमारी कोशिश है एक ऐसी दुनिया में रचने बसने की जहाँ सत्य सबका साझा हो; और सभी इसकी अभिव्यक्ति में मित्रवत होकर सकारात्मक संसार की रचना करें।

Friday, August 11, 2017

नेताओं की पेंशन तो बनती है

आजकल सोशल मीडिया या अन्य माध्यमों पर इस आशय की टिप्पणियाँ देखने को मिल रही हैं कि एक बार विधायक या सांसद बन जाने और पाँच या उससे कम समय के कार्यकाल पर भी आजीवन पेंशन क्यों दी जाती है; जबकि सरकारी कर्मचारियों को पूरी पेंशन पाने के लिए कम से कम बीस साल की सेवा देनी पड़ती है। कुछ लोगों ने तो बाकायदा प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर राजनैतिक पेंशन समाप्त करने की मांग की है और सोशल मीडिया पर अधिक से अधिक शेयर करने का अभियान भी चला रहे हैं।
मैं इस प्रस्ताव के विचार से कतई सहमत नहीं हो पा रहा हूँ। मुझे लगता है कि जनप्रतिनिधियों/ नेताओं (सांसद, विधायक) का कार्यकाल पाँच वर्ष या इससे कम होने पर भी पेंशन मिलने पर आपत्ति करना और इसकी तुलना सरकारी कर्मचारियों से करना सीमित दृष्टि का परिचायक है।
कभी यह भी गणना कीजिए कि चुनाव लड़कर जीत की देहरी तक पहुंचने से पहले ये लोग कितना समय और परिश्रम राजनीति की दुनिया में लगाते हैं। साल-दो साल की मेहनत करके सरकारी नौकरी पा जाने वालों की तरह कोई व्यक्ति तुरत-फ़ुरत विधायक या सांसद नहीं बन जाता। अपवादों को छोड़ दें तो इस सफलता तक पहुंचने के लिए उन्हें बीसो साल तक पसीना बहाना पड़ता है - जनता के बीच रहकर। जनता के बीच एड़ियाँ रगड़नी पड़ती हैं। माथा टेकना पड़ता है। उनका सुख दुख बांटना पड़ता है। वे जब विधायक या सांसद नहीं हुए रहते हैं तब भी जनसेवा का काम करते रहते हैं। राजनीतिक गतिविधियों में ही दिन-रात लगे रहते हैं।
जरा आकलन कीजिए कि जितने लोग राजनीति में करियर बनाते हैं उनमें कितनों को विधायकी या उससे ऊंची कुर्सी नसीब होती है? एक-दो प्रतिशत से अधिक नहीं। जबकि जनसेवा में अपनी क्षमता के अनुसार सभी लगे रहते हैं। उन्हें हर पांच साल बाद परीक्षा देनी पड़ती है। बिल्कुल नये सिरे से जुटना पड़ता है। सिर्फ एक सीट के लिए उनकी परीक्षा होती है। कितने तो ऐसे भी होते हैं जो पूरी जिंदगी लगे रहते हैं और पेंशन लायक नहीं बन पाते।
सरकारी नौकरी में तो एक बार दो-तीन साल की कड़ी मेहनत से (या चोर दरवाजे से भी) नौकरी पा जाने के बाद आजीवन वेतन व पेंशन की गारंटी हो जाती है। मेहनत से काम करें या ऊंघते रहें, ईमानदारी करें या मक्कारी करें समय से वेतन वृद्धि और वेतन आयोग की संस्तुतियां मिलती रहेंगी। दर्जनों किस्म की छुट्टियाँ और तमाम सुविधाएं भी।
जिस असुरक्षा और अनिश्चितता के बीच जनता की नजरों से ये राजनेता निरंतर परखे जाते हैं वैसी स्थिति सरकारी कर्मचारियों की नहीं है। यहाँ तो ये स्थायी लोकसेवक अतिशय सुरक्षा और न्यूनतम उत्तरदायित्व का सुख लूटने में लगे हुए हैं। मुझे तो राजनेताओं की पेंशन पर प्रश्नचिह्न लगाना बेहद अनैतिक और संकुचित सोच का परिणाम लगता है।
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
संयुक्त निदेशक कोषागार व पेंशन



Wednesday, August 9, 2017

बच्चों की बड़ी बातें


डैडी - बेटा, कबतक सोते रहोगे? उठो, आठ बजने वाले हैं...
बेटा - जगा तो हूँ डैडी...!
डैडी - ऐसे जगने का क्या फ़ायदा? बिस्तर पर आँख मूँदे पड़े हुए हो।
मम्मी - देखिए, साहबजादे एक आँख खोलकर मुस्कराये और फ़िर करवट बदलकर सो गये।
डैडी - हाँ जी देखो न, इन दोनों की आदत बिगड़ गयी है। छुट्टी के दिन दोनो पड़े रहते हैं।
मम्मी - कम से कम उठकर ब्रश कर लेते और दूध ही पी लेते... कब से गिलास का दूध बनाकर टेबल पर रख आयी हूँ।
डैडी - आज तो राखी भी है न!
मम्मी – तो क्या, दोनो जानते हैं कि मूहूर्त ग्यारह बजे के बाद का है।
डैडी - अच्छा, तो अभी बेटी भी सो रही है ?
मम्मी - हाँ और क्या,  ... लेकिन वो रात को देरतक पढ़ रही थी।
डैडी - यह भी कोई अच्छी बात नहीं है। सोने का और जागने का समय फ़िक्स्ड होना चाहिए। अगले दिन छुट्टी हो या पढ़ाई, कोई फ़र्क नहीं पड़ना चाहिए। ये लोग तो हर दिन अलग प्लान लेकर चलते हैं। ...सब तुम्हारे लाड़-प्यार ने बिगाड़ा है...!
मम्मी – लीजिए, तो अब आप शुरू हो गये...!
डैडी – शुरू क्या हो गये, मैंने भी पढ़ाई की है। लेकिन इस तरह अनिश्चित दिनचर्या कभी नहीं रही मेरी। सुबह सोकर उठने, नहाने-धोने और पढ़ने का समय हमेशा एक ही रहा।
मम्मी – तो सिखा क्यों नहीं देते...? किसने रोका है...!
डैडी – मेरी बातें सुनें तब न..! मुझे तो समझ में नहीं आता कि ‘मेरे’ बच्‍चे इतने आलसी कैसे हो गये। मैं तो कभी भी ऐसा अनऑर्गनाइज्ड नहीं रहा। दिशाहीन, अनफ़ोकस्ड...
मम्मी - बेटा, सुन रहे हो न...? ठीक है मेरी बेइज्जती करा लो!
बेटा - (लेटे हुए ही) अरे डैडी, वो मैथ्स में पढ़े हो न... माइनस माइनस मिलकर प्लस होता है। दीदी और हम दोनो माइनस हैं तभी तो तुम प्लस हो।
डैडी – क्या मतलब ?
बेटा – अरे डैडी, इतनी सिम्पल बात नहीं समझे...। हम दोनो आलसी हैं क्योंकि तुम नहीं हो... J
मम्मी – देखिए, दूसरी आलसी भी आ गयी। अब दोनो को समझाइए..!
डैडी – समझाऊँ क्या, पता नहीं इन सबों को क्या मिलता है यूँ ही पड़े रहने में...!
बेटी – डैडी, तुम नहीं जानते? ओह, कैसे बताऊँ कि क्या मिलता है...? बस ये समझ लो कि ‘पड़े रहना’ एक कला है। इट्स‍ प्योर आर्ट।
डैडी – वाह, क्या बात है बेटी, शाबास...! क्या खासियत है इस कला की?
बेटी – यह बहुत कठिन है डैडी। पूरी तरह थॉटलेस होना पड़ता है। कुछ भी अगर दिमाग में चल रहा है तो वह ‘पड़े रहना’ नहीं होता। कुछ करने के बारे में सोचना तो दूर की बात है, अगर इतना सा भी सोच रहे हैं कि खाली दिमाग पड़े हुए हैं तो इस कला में कमी रह जाएगी। इसमें कुछ भी नहीं सोचना होता है। सोचने के बारे में भी नहीं और न सोचने के बारे में भी नहीं। बहुत बड़ी तपस्या है यह... जो इसमें एक्सपर्ट हो जाय वही इसका आनन्द महसूस कर सकता है।
मम्मी – सुन लिए न...! बताइए, आप तो फिलॉस्फी पढ़े हैं। कहीं सुने थे ऐसी ‘कला’ के बारे में...?
बेटा – अरे मम्मी, डैडी को चैलेन्ज मत करो... जरूर जानते होंगे यह सब।
डैडी - सारी चिन्ता से मुक्त होना तो संभव है लेकिन चिन्तन से मुक्त होना तो सही में परम सिद्ध योगी ही कर सकते हैं। महर्षि पतन्जलि के अष्टांगिक योगमार्ग में एक चरण ऐसा आता है।
बेटा – अच्छा डैडी, अब उसे छोड़ो। यह बताओ कि तुम अपने हाथ से कपड़ा क्यों प्रेस कर रहे हो? धोबी को क्यों नहीं दे देते?
डैडी – मुझे यह काम आसान लगता है। बचपन से आदत है। खाली बैठने से अच्छा है इस स्किल का फ़ायदा उठा लिया जाय।
बेटी – लेकिन कपड़ा जलने का डर भी तो रहता है। मम्मी अपनी साड़ी जला चुकी हैं। अभी देखो, वहाँ की चादर लाल हो गयी है। JJ
डैडी – अच्छा, क्या गारन्टी है कि धोबी अच्छा प्रेस कर ही दे? किसी से भी जल सकता है। सबको उतनी ही सावधानी बरतनी पड़ती है।
बेटा – अच्छा डैडी, ये बताओ अगर धोबी तुम्हारा कोई नया कपड़ा जला दे तो क्या करोगे?
डैडी – क्या कर सकता हूँ? अपना ही माथा ठोंक लूंगा। वह बेचारा तो वैसे ही घबरा जाएगा। कोई जानबूझकर तो जलाएगा नहीं। ऐसे में उसे कुछ भी भला-बुरा कहने से कोई फ़ायदा नहीं होगा। हाँ उसे यह बताया जा सकता है कि आगे से उसे प्रेस के लिए कपड़ा नहीं मिलेगा।
बेटा – हाँ, ताकि वह आगे से लापरवाही नहीं करेगा। ...लेकिन मन में तो उसके खिलाफ़ खूब खराब वाली फ़ीलिंग आयेगी न...?
बेटी – ऑफ़कोर्स आयेगी...! कोई उसकी आरती थोड़े ही न उतारेगा। लेकिन... यू हैव टु कन्ट्रोल योर फ़ीलिंग्स मेनी टाइम्स...!
बेटा – हाँ, सही है। मन के भीतर जैसी-जैसी फ़ीलिंग्स पैदा होती हैं अगर सबको बाहर कर दिया जाय तो यह दुनिया ढह जाएगी। अपनी टीचर, क्लास टीचर, बस ड्राइवर, कोच, सीनियर भैया लोग, दीदी लोग, बगल वाले अंकल-आन्टी. काम वाली दीदी, गार्ड अंकल...
डैडी – बाहर वाले ही क्यों, घर के भीतर भी तो बताओ...! मम्मी, डैडी, दीदी, बाबाजी, दादी जी, ताई-ताऊ, आदि-आदि...
बेटी – अब रहने दो डैडी, यह सोचना भी ठीक नहीं है। पड़े रहने दो...

... ... ...

Monday, July 31, 2017

नये सिरे से ब्लॉग-यात्रा का प्रारम्भ


सत्यार्थमित्र पर मौलिक रूप से ब्लॉग पोस्ट करने की आदत फ़ेसबुक ने छीन ली थी। जो मन में आया उसे तुरत-फुरत स्टेटस के रूप में फेसबुक पर डालकर छुट्टी ले लेने का आसान रास्ता पकड़ लिया था मैंने। अधिकतम चौबीस घंटे की सक्रिय आवाजाही पाने के बाद वह स्टेटस काल के गाल में समा जाया करता था। लेकिन इतने में ही करीब सौ पाठकों की लाइक्स व कुछ के कमेन्ट्स की खुराक मिल जाती थी। अधिक महत्वाकांक्षा न पालने के कारण इतने से काम चल जा रहा था।

मैं ऐसा मान चुका था कि हिन्दी ब्लॉगरी की दुनिया प्रायः निष्क्रिय हो चुकी है। लेकिन खुशदीप सहगल जी के तगादे से एक बार फ़िर से हरकत शुरू हुई है। नौकरी में तबादला भी एक कारण बना है। नयी तैनाती में अब पहले जैसी कमरतोड़ मेहनत की जरूरत नहीं रह गयी है। यहाँ थोड़ा आराम और खाली समय उपलब्ध हो गया है। इसलिए अब आशा की जानी चाहिए कि इन पन्नों पर अब धूल नहीं जमने पायेगी।

ब्लॉग को दुबारा सक्रिय करने की कड़ी में सर्वप्रथम मैंने रायबरेली में सुबह-सुबह की गयी साइकिल से सैर का हाल-चाल बताने वाली रिपोर्टों को कालानुक्रम में सहेजकर उन्हें ब्लॉग-पोस्ट का रूप दे दिया है। चूँकि ये पोस्टें पुरानी तिथियों में शिड्यूल हो गयी हैं इसलिए ब्लॉगर के पाठक इसे वर्तमान ट्रैफ़िक में शायद नहीं देख पायेंगे। इसलिए मैं इन सभी पोस्टों के लिंक यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ। समय की उपलब्धता के अनुसार इसे देखा जा सकता है। मुझे विश्वास है कि यह सामग्री आपको पसन्द आयेगी –
01.       साइकिल से सैर की सरपट रपट 
02.       अल्पवयस्क कटहल और चहकते टमाटर के पेड़
03.       विस्मृति का शिकार मुंशीगन्ज शहीद स्मारक
04.       साइकिल से सैर में साप्ताहिक विराम
05.       रायबरेली के लोकउद्यम भी बदहाल हैं
06.       अभियानों से बेखबर गाँव और सूखती नदी
07.       सी.एम. के साथ साइकिल यात्रा
08.       कुकरैल जंगल की सैर के बहाने
09.        साइकिल के साथ तैराकी का लुत्फ़
10.       साइकिल से देखा ग्रीप साहब का पुरवा
11.       दरीबा से सीतारामपुर की ओर
12.       गजोधरपुर और कूड़ा प्रसंस्करण संयन्त्र
13.       परसदेपुर रोड पर पुलिस वाले की ट्रकपन्थी
14.       इब्राहिमपुर से आगे मछेछर
15.       तकरोही और अमराई गाँव, इन्दिरानगर लखनऊ
16.       बारिश में उफ़नती सई, धोबीघाट और शहीद स्मारक
17.       हरित दर्शन औरपढ़ाई की कठिन राह
18.       भूएमऊ गाँव की गन्दी भैंसें और भली गायें
19.       भूएमऊ के प्राथमिक स्कूल और ज्ञान मन्दिर
20.       महानन्दपुर की तंग गलियों के दुधारू पशु
21.       ऑर्टीमिसिया और ओडीएफ़ गाँव की खोज
22.       बारिश में भींगने की अधूरी ख़्वाहिश
23.       बालमखीरा केदर्शन
24.       महुए पर क़ाबिज माफ़िया बन्दर
25.       झाड़-फूँक की अदृश्य शक्ति से सामना
26.       गढ्ढामुक्त सड़कों का सपना
27.       बेहटा-खुर्द एक बेहतर गाँव है
28.       थूहर : एकऔषधीय वृक्ष
29.       नदी के ऊपर से बहती इन्दिरा नहर
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी) 
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Sunday, July 30, 2017

नदी के ऊपर से बहती इंदिरा नहर

#साइकिल_से_सैर #रायबरेली
रायबरेली से स्थानांतरण का आदेश मिला तो थोड़ी उलझन हुई। साढ़े चार साल तक की जीवन चर्या में बड़ा बदलाव आने वाला था। पदोन्नति के पद पर तैनाती हुई तो बधाइयाँ भी मिली लेकिन नये ठिकाने पर जाना कष्टप्रद भी महसूस हो रहा था। ऐसी मनःस्थिति में वहाँ की आखिरी साइकिल यात्रा का हाल बताने की सुध ही नहीं रही; जबकि वह सबसे यादगार यात्रा साबित हुई।
01 जुलाई 2017 को अपनी साइकिल लेकर मैं एक ऐसे पुल के ऊपर पहुँच गया जहाँ नदी के ऊपर से सड़क के साथ-साथ विशाल जलराशि वाली इंदिरा नहर भी गुजरती है। यह अद्भुत 'जलसेतु' बेहटा खुर्द गाँव के पास ही है जो रायबरेली से परसदेपुर जाने वाली सड़क से दो किलोमीटर दक्षिण की ओर सई नदी को पार करने के लिए बनाया गया है। रायबरेली शहर को बाहर से पार करने के लिए जो फोर-लेन बाई-पास बनाया जा रहा है वह इंदिरानहर की बायीं पटरी के किनारे से होकर जाएगा। इसके लिए सई नदी पर एक और बड़ा पुल इस जलसेतु के समानांतर बनाया जा रहा है जिसके पाये (pillars) अभी खड़े किये जा रहे हैं।
इस पानी-पुल पर खड़ा हुआ तो मैंने देखा कि इंदिरानहर का अकूत पानी इसके पेट में एक तरफ से गड़गड़ाता हुआ प्रवेश कर रहा था और दूसरी ओर से थोड़ी गर्जना के साथ कलकल झरने की तरह बाहर निकल रहा था। पुल के एकदम नीचे सुस्त और अलसायी सी सई नदी अनेक वनस्पतियों से घिरी और ढंकी हुई अपने अस्तित्व मात्र का भान करा रही थी। लग रहा था कि मानसून की शुरुआती बारिश ने सोयी हुई सई को अभी-अभी जगा दिया है। नहर के किनारों को कुछ आगे तक सीमेंट-कांक्रीट से पक्का किया गया था और उसमें नीचे उतरने के लिए एक स्थान पर सीढ़ियाँ भी बनी थीं। मैं नहर के दक्षिणी छोर पर जाकर पूर्वी पटरी पर खड़ा हुआ तो उसके पश्चिमी किनारे की ढलान पर एक वृद्ध आदमी कपड़ा धुलता हुआ दिखायी दिया। खतरे की एक आशंका मेरे सीने में डर की लहर बनकर गुजर गयी। मैंने नहर की दूसरी पटरी की ओर साइकिल मोड़ दी। पास जाकर मैंने उस वृद्ध से पूछा कि ढलान पर बैठने के बजाय सीढ़ियों पर क्यों नहीं बैठते? यहाँ फिसलने का डर नहीं है क्या? इसपर उन्होने बताया कि सीढ़ियों पर कुछ लोग गंदा (शौच) कर गये हैं इसलिए यहाँ बैठा हूँ। यहाँ की चिकनाई को मैंने रगड़कर साफ कर दिया है इसलिए फिसलन नहीं है। मैंने उन्हें सावधान रहने की सलाह देकर साइकिल वापस मोड़ दी।
यहाँ लगाये गये पत्थरों पर जो रोचक सूचना उत्कीर्ण है वह मिटती जा रही है। फिर भी ध्यान से पढ़ने पर मुझे जो समझ में आ सका वह सहेज लाया हूँ। इसके अनुसार शारदा सहायक परियोजना के अंतर्गत "सई नदी जलसेतु" का शिलान्यास भारत की प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने 12 अप्रैल 1975 को किया था। यद्यपि इसके निर्माण कार्य का प्रारंभ जनवरी 1974 में हो गया था जो दिसंबर 1978 में पूरा हुआ। पुल के उदघाटन से संबंधित कोई शिलालेख मुझे दिखायी नहीं दिया। इंजीनियरिंग के दृष्टिकोण से निम्नलिखित रोचक आंकड़े यहाँ दिये गये हैं उनसे इस जलसेतु की विशालता का कुछ अनुमान हो सकता है :-

जल सेतु
सई नदी
सेतु की जल प्रवाह क्षमता 167 क्युमेक्स
सेतु में जल प्रवाह का वेग 3.8 मीटर/सेकेंड
पानी की अधिकतम गहराई 8.0 मीटर
जलसेतु की लंबाई 248.5 मीटर
प्रत्येक दर की लंबाई 35.5 मीटर
दरों की संख्या 7
नींव के कुओं की माप 14×20 मीटर
नींव के कुओं की गहराई 33.0 मीटर
पूर्व प्रतिवलित कांक्रीट गर्डर की ऊंचाई 85.85 मीटर
दोणी के अंदर की माप 7.3×6.75 मीटर
उच्चतम बाढ़ स्तर 105.0 मीटर
अधिकतम जल प्रवाह 2830 क्युमेक्स
जलसेतु और नहर के बीच संक्रमण-
ऊपरी संक्रमण की लंबाई 26.7 मीटर
निचली संक्रमण की लंबाई 40.0 मीटर
ऊपरी संक्रमण के नींव के कुओं की संख्या 03 नंबर
निचली संक्रमण के नींव के कुओं की संख्या 04 नंबर
नींव के कुओं की माप 10×20 मीटर
नींव के कुओं की गहराई 18.0 मीटर


पहले इस जलसेतु स्थल को एक सुंदर पिकनिक स्पॉट की तरह विकसित किया गया होगा। इसे देखने आसपास के लोग आते रहते हैं। पुल के किनारे बोगनबेलिया की पुरानी झाड़ी की दशा देखने से ऐसा लगा कि किसी समय इस स्थान का सौन्दर्यीकरण किया गया होगा लेकिन वर्तमान में इसके अनुरक्षण की कोई खास व्यवस्था नहीं है। लेकिन इस जलसेतु के भीतर इंदिरानहर के चौड़े पाट को एक-तिहाई तक पतला करके उसकी तेज धारा के दोनों किनारों पर सड़क की पटरी तैयार कर बनाया गया यह तीन लेन वाला पुल अपने आप में एक विलक्षण दृश्य उत्पन्न करता है।
मेरे मोबाइल कैमरे में इस विशाल निर्माण को ठीक-ठीक दिखा पाने का सामर्थ्य शायद नहीं था। फिर भी मैंने कुछ प्रतिनिधि चित्र सहेज लिये; इस सोच के साथ कि रायबरेली से स्थानांतरण के बाद यहाँ तक दुबारा आना शायद संभव न हो सके। आप इन चित्रों को देखकर वहाँ के दृश्य की कल्पना कीजिए। एक-दो चित्र वापसी के समय रास्ते से लिए गये जो ग्रामीण जीवन की एक खास झलक दिखाते हैं।































 



(अब साइकिल से सैर का अगला किस्सा किसी नये शहर से सुनाऊंगा। थोड़ी प्रतीक्षा कीजिए।)

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

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Friday, July 28, 2017

थूहर : एक औषधीय वृक्ष

रायबरेली में #साइकिल_से_सैर करते हुए मुझे एक गाँव जगदीशपुर के बाहर एक छोटी सी चाय की दुकान के सामने एक विचित्र शक्ल -सूरत का पेड़ मिला। विचित्र इसलिए कि यह खूब घना और हरा था लेकिन इसमें एक भी पत्ती नहीं थी। यह बिजली के तारों के मकड़जाल जैसी आकृति लिए बहुत सी लताओं का पुंज था। हरी, मुलायम और सफेद दूध से भरी लताएं।
मैंने चाय बना रहे आदमी से पूछा तो पता चला कि इसे स्थानीय स्तर पर 'थूहर' कहा जाता है। यह त्वचा पर सफेद दाग का बेहतरीन इलाज़ है। उसने बताया कि इसका दूध लगाने पर एक-दो हफ्ते में दाग गायब हो जाते हैं। यदि कोई इस औषधीय वृक्ष के बारे में वैज्ञानिक जानकारी साझा कर सके तो मुझे खुशी होगी।






Thursday, June 29, 2017

बेहटा खुर्द एक बेहतर गाँव है

(29.06.2017) 
आज परसदेपुर मार्ग पर इंदिरानहर के पुल की चढ़ाई शुरू करने वाला था तभी दाहिनी ओर एक नयी-नवेली ग्रामीण सड़क दिखायी दे गयी। देखने से लग रहा था कि इसकी 'पेंटिंग' अभी एक-दो सप्ताह के भीतर ही हुई होगी। शायद योगी सरकार के गढ्ढा-मुक्ति अभियान के अंतर्गत। मैंने पीछे देखकर किसी सवारी के न आने की तसल्ली करते हुए साइकिल दाहिनी ओर इस नयी सड़क पर मोड़ दी। सड़क के दोनों ओर खूब हरियाली थी। मन प्रसन्न हो गया। एक तो चढ़ाई चढ़ने से बच गया था और दूसरे सुनसान सड़क पर हरियाली और स्वच्छता के बीच इस नयी राह पर कुछ नया देखने का लाभ मिल रहा था।
इधर सड़क के किनारे कुछ एकल मकान दिख रहे थे जो गाँव की घनी बस्ती से बाहर आकर बनाये गये लग रहे थे। समकोण पर बनी चारदीवारी और गेट के भीतर बने पक्के मकान। जानवर इत्यादि पालने का पूरा प्रबंध एक सलीके से। निश्चित ही गाँव के भीतर घनी बस्ती में निवास की कठिनाई से अब खेती की जमीन पर नये मकानों का कब्ज़ा होने लगा है। साथ ही बाग-बगीचे काटकर खेती के लिए जमीन बढ़ायी जा रही है। धरती पर जनसंख्या के दबाव की एक भौतिक तस्वीर मेरे सामने थी। मेरे मन में इस गाँव का नाम जानने की जिज्ञासा पैदा हो रही थी तभी एक बोर्ड पर "रामनगर (ग्रामसभा जगदीशपुर) रामप्रताप यादव की याद में" लिखा हुआ मिला। मैं मुस्कराकर आगे बढ़ गया।
थोड़ी दूर बाद ही सड़क पर से तारकोल व बारीक बजरी की नयी परत समाप्त हो गयी और उसका पुराना रूप सामने आ गया। लेकिन सड़क में गढ्ढे फिर भी नहीं थे। आगे सड़क बायीं ओर मुड़ी तो थोड़ी दूरी पर एक विशाल बरगद का पेड़ दिखा जो एक सिकुड़ते हुए तालाब के किनारे जाने कितने सालों से खड़ा था। इसकी मोटी-मोटी डालें खुद ही किसी पेड़ के तने जैसी थीं। इनसे अनेक जटाएँ लटक रहीं थी। तालाब में जो थोड़ा पानी बचा हुआ था उसपर हरे रंग की काई जमी हुई थी। पेड़ के नीचे कुछ औरतें खड़ी थीं और एक भैंस बंधी हुई थी। आगे बढ़ा तो रंगा-पुता प्राथमिक विद्यालय बेहटा-खुर्द मिला जो बन्द था। जुलाई में खुलेगा। इस गाँव में समृद्धि के चिह्न दिखायी दे रहे थे। केनरा बैंक की एक शाखा थी। लगभग सभी मकान पक्के थे। चाय-पान और परचून की दुकानें थीं और अधिकांश घरों में दुधारू पशु भी थे। सड़क किनारे एक-दो खटालें भी दिखी जो दूध के व्यावसायिक उत्पादन होने का संकेत दे रही थीं। संयोग से मुझे कोई व्यक्ति खुले में शौच के लिए भी आता-जाता नहीं दिखा। सड़क पर दिखी तो एक महिला जो कमर पर एक खाली टोकरा टिकाये चली आ रही थी। शायद कूड़ा या गोबर फेंक कर आ रही हो। इस काम के दौरान भी उसका घूँघट में चेहरा छिपाकर रखना रोचक था।
जब यह सड़क गाँव के भीतर घुसकर कई शाखाओं में बंटकर विलीन होने लगी तो मैं वापस मुड़ आया। एक जगह गोबर की खाद से एक ट्रॉली भरी जा रही थी जिसमें ट्रैक्टर जुता हुआ था। भरे हुए गढ्ढे से खाद उठाकर ट्रॉली में भरने का काम औरतें, बच्चे और मर्द मिलकर कर रहे थे। यह जरूर कोई खाता-पीता, सम्पन्न व परिश्रमी गृहस्थ परिवार रहा होगा। वापस लौटते हुए मैंने ध्यान दिया कि गेंहूँ की कटाई से खाली हुए खेतों में गोबर की खाद की ढेरियां लगी हुई हैं। इन्हें कुदाल से फैलाकर जोत दिया जाएगा और बारिश का पानी पाकर मिट्टी अधिक उर्वर हो जाएगी। यह जैविक खाद फसल के लिए कृत्रिम रासायनिक उर्वरकों से बेहतर तो होती ही है, यह पर्यावरण के संरक्षण में भी सहायक है।
एक खेत के किनारे एक झोपड़ी का भग्नावशेष देखकर मैं रुक गया। खेत खाली था जिसमें गोबर की खाद गिरायी गयी थी। इसमें मक्का या ऐसी ही कोई अन्य फसल रही होगी जिसकी रखवाली के लिए यह झोपड़ी डाली गयी होगी। रखवाली का काम हो जाने के बाद इसे इसके हाल पर छोड़ दिया गया था तो यह यूँ क्षत-विक्षत हो गयी थी जैसे बॉर्डर के किसी पाकिस्तानी चौकी पर बीएसएफ ने हमला करके ध्वस्त कर दिया हो।
मैंने आज ज्यादा तस्वीरें नहीं ली। मनोरम प्रकृति के बीच आनंदित होकर और स्वच्छ ऑक्सीजन में भरपूर सांस लेकर वापस आ गया। फिर भी एक-दो दृश्यों ने बरबस ही मेरे मोबाइल कैमरे को जेब से बाहर खींच ही लिया। आप भी देखिए।







(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
www.satyarthmitra.com

Thursday, June 22, 2017

गढ्ढामुक्त सड़कों का सपना

(22.06.217) 
गढ्ढा मुक्त टूटी सड़कें

कल मानसून की दस्तक देती बरसात के बीच योग कार्यक्रम के बाद आज साइकिल ने रायबरेली शहर के भीतर ही घूमने का मन बनाया। मामा चौराहे की रेलवे क्रॉसिंग पारकर जेल रोड के अंत तक पहुँचा और वहाँ से दाहिनी ओर मुड़कर जिलाधिकारी आवास की चारदीवारी के बगल से जिला अस्पताल चौराहे पर निकल आया। सुबह साढ़े छः बजे भी यहाँ पर्याप्त चहल-पहल थी। साइकिल-रिक्शा, ऑटोरिक्शा, विक्रम, बाइक इत्यादि का आगमन अस्पताल की ओर हो रहा था। दवा की कुछ दुकानें खुल चुकी थी। एक ठेले पर अंकुरित चना और मूंग की बिक्री शुरू हो गयी थी। बन-मक्खन और चाय की दुकाने भी ग्राहकों से घिरने लगी थीं। इनमें इमरजेंसी वाले मरीजों के तीमारदार ही ज्यादा होंगे।
अस्पताल चौराहे से कचहरी रोड पकड़कर मैं फ़िरोज गांधी चौराहे पर आया जहाँ एक नुक्कड़ पर शहीद स्मारक बना हुआ है। इस समय तक जिन सड़कों से मैं गुजरा था उनपर योगी जी के गढ्ढा-मुक्ति आदेश की स्पष्ट छाप दिखायी दे रही थी। मैं मन ही मन प्रसन्न था। खासतौर पर इसलिए कि मुझे साइकिल से सैर में सहूलियत होने वाली थी। वैसे इस प्रकार की प्रसन्नता का भाव मेरे मन में उस समय भी पैदा हो गया था जब सभी शहरों में साइकिल-पथ का निर्माण जोर-शोर से हो रहा था। लेकिन दुर्भाग्यवश मुझे किसी 'साइकिल-पथ' पर अपनी द्विचक्री दौड़ाने का अनुकूल अवसर नहीं मिल सका। आगे का राम जाने।
फ़िरोज गांधी चौराहे से अपनी कॉलोनी के लिए मैं प्रायः ओवर-ब्रिज पर चढ़ाई करके रायबरेली क्लब के बगल से होकर 'सेशन्स-हाउस' के सामने से जाता हूँ। लेकिन आज मैं विकासभवन के सामने से होकर बरगद चौराहा क्रासिंग की ओर जाने वाले रास्ते पर गया। मैं विकास भवन के सामने तक पहुंचा था तबतक सड़क-गढ्ढा-मुक्ति से उपजी खुशी काफ़ूर हो गयी। हालाँकि मुझे इस सड़क पर जो मिला उसे गढ्ढा नहीं कहा जा सकता लेकिन हिचकोले इतने जबरदस्त थे कि मुझे अपना भार सीट के बजाय पैडल्स पर ट्रांसफर करना पड़ा। इस सड़क की ऊपरी सतह जगह-जगह से उघड़ गयी है।
आज की सैर का कोटा पूरा नहीं हो पाया था तो मैं नेहरू नगर की ओर मुड़कर सीधे जेलरोड की ओर चल दिया। सड़क किनारे के नाले की मरम्मत का काम प्रगति पर था। नाले को ढंकने के लिए सीमेंट के अनेक स्लैब ढाले गये थे जो अभी सूख रहे थे। इधर से निकलकर इंदिरानगर की ओर जाने वाली सड़कों के टी-पॉइंट अवरुद्ध थे। आगे अच्छी सुविधा मिलने की आस में अभी कष्ट उठा रहे होंगे इधर के लोग। मैं जेल रोड पहुँचकर बायें मुड़ा और #बालमखीरा वाले की खटाल से आगे पुलिस चौकी तक जाकर दाहिनी ओर सई नदी के अमर शहीद स्मारक लोहे के पुल की ओर चला गया। नदी पर बने धोबीघाट पर खूब रौनक थी। पाट पर पटके जाते कपडों की आवाज ऊपर तक आ रही थी।
नदी और सड़क के संगम के पास पीपल का एक विशाल वृक्ष है। इसके नीचे शंकर जी की प्रतिमा वाला एक छोटा सा मंदिर है जिसके सामने कुछ लोग सत्संग कर रहे थे। पेड़ के ऊपर एक बड़ी सी चील मंडरा रही थी जिससे आक्रांत कुछ पक्षी पेड़ पर बैठे चांव-चांव कर रहे थे। उसमें कुछ कौवों की कांव-कांव भी समाहित थी। सड़क पर नियमित टहलने वाले आ-जा रहे थे। वहाँ कुछ तस्वीरें लेकर मैं वापस चल दिया लेकिन कुछ ही दूर बाद रुक जाना पड़ा।
एक रिक्शेवाला भारी सामान लादे बड़बड़ाता हुआ चला आ रहा था। उसकी नाराज़गी का विषय योगी जी के फरमान के बावजूद इस सड़क का न बनना था। यह सड़क क्षेत्रीय ग्राम्य विकास संस्थान के सामने से सई घाट तक जाती है जहाँ एक नामी पब्लिक स्कूल भी है। बच्चों से लेकर बड़े-बूढ़ों तक और गृहिणी औरतों से कामकाजी माहिलाओं तक सभी यहाँ से गुजरते हैं। लेकिन इस सड़क का भाग्योदय नहीं हो सका है।
मैंने देखा उसका रिक्शा हमारी साइकिल से ज्यादा हिचकोले खा रहा था। एक बुजुर्ग के टहलने की चाल भी यहाँ धीमी हो गयी थी। मैंने रुककर जो तस्वीरें लीं उसे आप भी देखिए।













(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
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