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Wednesday, July 13, 2016

इब्राहिमपुर से आगे मछेछर

बरसात का मौसम शुरू होने के बाद स्विमिंग पूल में उतरने से बेहतर है साइकिल चलाना। जल जनित बीमारियों से बचना जरूरी है। ऐसे मौसम में एक सुरक्षित व्यायाम भी है साइकिल चलाना। शहर से बाहर निकल कर प्राकृतिक हरियाली से आँखों को तरोताजा करने का अच्छा माध्यम है साइकिल चलाना।
साइकिल से सैर के लिए मैं रायबरेली पुलिस लाइन्स के बगल से गुजरने वाली मटिहा रोड पर दूसरी बार गया। पहली बार गया था तो मई की भीषण गर्मी थी। पानी के लिए त्राहि-त्राहि मची हुई थी। जिला प्रशासन सूखे हुए तालाबों में पानी भरवा रहा था और स्कूली बच्चे परीक्षा परिणाम के बाद गर्मी की छुट्टी का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे। इस बार शहर से बाहर निकलते ही हरियाली का साम्राज्य फैला हुआ दिखा। सड़क के दोनो तरफ पेड़-पौधे, घास-फूस, और खर-पतवार का एक विस्तृत कोलाज़ बना हुआ था। इसका थीम कलर हरा था और सन्देश था - "सुबह-शाम की हवा - लाखों रूपये की दवा।"
गोड़ियन का पुरवा, मटिहा और इब्राहिमपुर से गुजरते हुए मुझे इस बार धरती का रंग पूरी तरह बदला हुआ दिखा। जिस तालाब में डीएम साहब ने तब पानी भरवाया था उसमें पानी के ऊपर हरे रंग की काई की मोटी परत जम गयी थी। वैसे ही जैसे गरम दूध को खुला छोड़ देने पर कुछ देर में उसकी सतह मोटी मलाई से ढक जाती है। ऐसा लगा जैसे किसी ने भी तालाब का पानी प्रयोग नहीं किया था। तालाब के किनारे आम के पेड़ों पर फल चमक रहे थे और खटिया पर बैठकर उनकी निगरानी करने वाली आँखे भी।
थोड़ी दूर आगे जो दूसरा तालाब था उसमें कुछ हलचल थी। काई का नामोनिशान नहीं था। तीन-चार लोग उसके किनारे बैठे हुए कटिया लगाकर मछली पकड़ने की कोशिश कर रहे थे। पानी की सतह पर उठते-गिरते बुलबुलों से पता चला कि इस तालाब में मछलियों का बसेरा है और इसीलिए हलचल भी है।
इब्राहिमपुर गाँव तो बबूल के घने जंगल के पीछे पूरी तरह छिप गया दिखता है। जंगल के बीच की पगडंडी से पिचरोड पर आकर दूसरी ओर जाते पुरुष और स्त्रियों को देखकर ही पता चल पाता है कि उधर कोई बसावट है जिसका निकास-पइसार इस सड़क की ओर से सई नदी तक है। मैंने सड़क किनारे साइकिल खड़ी करके तस्वीरें लेनी शुरू की तो एक सज्जन बोतल लटकाये लौटते दिखे। मुझे ही थोड़ी झेंप हुई। सोचते होंगे कि सुबह-सुबह यहाँ साइकिल खड़ी करके मैं कर क्या रहा हूँ। लघुशंका के उपक्रम का अभिनय करते हुए मैंने एक मिनट बिताया और उनके पीठ पीछे होते ही साइकिल भगाकर नदी के पुलपर चला आया।
पुल के नीचे एक ओर पानी थोड़ा बढ़ा हुआ था जिसमें मछलियाँ किलोल कर रहीं थी। दूर पूरब की ओर कुछ लड़के भी नदी के किनारे खड़े होकर किल्लोल कर रहे थे। नदी किनारे नित्यक्रिया से निपटने के बाद उनके हाव-भाव में जो मस्ती उभर आयी थी वह इतनी दूर से देखी और सुनी तो जा सकती थी लेकिन कैमरे में सहेजना संभव नहीं हुआ। पुल के दूसरी ओर नदी की सतह अभी भी जलकुम्भी और दूसरे खर-पतवार से पूरी तरह ढकी हुई थी। निश्चित ही उसके नीचे बह रहे पानी का दम घुटता होगा। शायद बरसात का पानी थोड़ा और बढ़े, बहाव तेज हो तो इस हरे और घने जाल को काटकर नदी की धारा स्वतंत्र हो सके। पुल पर यह नजारा देख रहे दूसरे लड़कों को वहीं छोड़कर मैंने थोड़ा और आगे जाने का निश्चय किया।
पुल से सड़क की ढलान पर सरपट भागती साइकिल पर बैठा हुआ मैं सामने कम और दायें-बायें ज्यादा देख रहा था। कारण यह कि समतल सड़क पर सवारियाँ न के बराबर थीं और आसपास के खेतों की हरियाली छटा देखते ही बनती थी। कुछ ही मिनटों में मैं मछेछर गाँव में पहुँच गया। सबसे पहले मुझे गायों और भैसों का बाड़ा मिला। एक पक्के मकान के बगल में खड़े छप्पर के नीचे बंधे दुधारू पशुओं के बीच बैठी एक युवती गोबर उठा रही थी। घर के बरामदे में चौकी पर बैठे दो-तीन पुरुष चाय पी रहे थे। एक महिला फर्श पर बैठकर कोई अनाज साफ कर रही थी। वहीं एक बल्ब दिन के उजाले में भी बहुत तेज चमक रहा था जिसे बन्द कर देने का ध्यान किसी को नहीं था। शायद उसे प्रकाश के लिए नहीं बल्कि बिजली आने-जाने का सूचक यन्त्र समझा जाता होगा।
पक्की सड़क पर बसे इस गाँव में कुछ परचून की दुकानें, चाय-पानी की भट्ठियां, पंक्चर बनाने वाले साइकिल मिस्त्री और रिचार्ज करने वाली गुमटियां दिखीं। गाँव में एक बड़ा सा परिसर सरकारी प्राइमरी स्कूल का भी दिखा। मैंने बिना रुके इस गाँव को भी पार कर लिया और एक सूखी हुई नहर की पुलिया पर रुका। वहीं खेतों के बीच से एक लड़का नमूदार हुआ तो मैंने उससे नहर में पानी नहीं होने के बारे में पूछा। उसे कुछ खास पता नहीं था। बोला- कभी-कभी पानी आता है। सड़क के दूसरी ओर एक टापू नुमा ऊँचा खेत दिखा जिसके चारो ओर टेढ़ा-मेढ़ा नाला खुदा हुआ था। लड़के ने बताया कि इस नाले में गंगनहर से सप्ताह में एक बार पानी छोड़ा जाता है। इस समय खेत में कोई फसल नहीं थी।
मैं वहीं से लौट आया। लौटते समय दो जगह रुकना पड़ा। एक जगह पिचरोड से निकलने वाली एक नई भरी गयी कच्ची सड़क मिली जिसकी पीली रेखा चारो ओर फैली हरियाली के बीच कंट्रास्ट बना रही थी उसकी तस्वीर खींचने रुका तो एक कुत्ता भी साथ लग लिया। दूसरी जगह एक झोपड़ी नुमा आकृति मिली जो लबे-सड़क वीराने में खड़ी थी। लग रहा था जैसे किसी फ़िल्म की शूटिंग के लिए सेट बनाया गया हो। यह आश्रय बनाने के लायक तो कतई नहीं थी, लेकिन फोटो लेने के लिए बरबस आकर्षित करती थी।
वहाँ से आगे बढ़ा तो कमलेश मिले जो खटर-खटर करती साइकिल पर भागे जा रहे थे। मैंने भी अपनी गति बढ़ा कर उनसे बराबरी की। बीए पार्ट-3 के विद्यार्थी थे। बछरावां के डिग्री कॉलेज में नाम लिखाया है। क्लास करने नहीं जाना पड़ता, केवल परीक्षा देना पड़ता है। इसलिए लगे हाथों एसएससी की तैयारी भी कर रहे हैं। रायबरेली में कोचिंग करते हैं। आठ सौ महीने के लगते हैं। छः महीने का कोर्स है। अलग-अलग विषय का कोचिंग महंगा पड़ता है। कम्बाइन में सस्ता पड़ता है। गणित, विज्ञान, रीजनिंग, इंग्लिश, जनरल नॉलेज पढ़ाया जाता है। घर पर रहकर पढ़ाई नहीं हो पाती। कोचिंग में ठीक रहता है।
यह सब बात करते हुए हम रायबरेली पहुँच गये। कमलेश कैनाल रोड की ओर कोचिंग लेने चले गये और मैं जेलरोड होते हुए अपने घर आ गया हूँ।


















(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

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