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Thursday, June 22, 2017

गढ्ढामुक्त सड़कों का सपना

(22.06.217) 
गढ्ढा मुक्त टूटी सड़कें

कल मानसून की दस्तक देती बरसात के बीच योग कार्यक्रम के बाद आज साइकिल ने रायबरेली शहर के भीतर ही घूमने का मन बनाया। मामा चौराहे की रेलवे क्रॉसिंग पारकर जेल रोड के अंत तक पहुँचा और वहाँ से दाहिनी ओर मुड़कर जिलाधिकारी आवास की चारदीवारी के बगल से जिला अस्पताल चौराहे पर निकल आया। सुबह साढ़े छः बजे भी यहाँ पर्याप्त चहल-पहल थी। साइकिल-रिक्शा, ऑटोरिक्शा, विक्रम, बाइक इत्यादि का आगमन अस्पताल की ओर हो रहा था। दवा की कुछ दुकानें खुल चुकी थी। एक ठेले पर अंकुरित चना और मूंग की बिक्री शुरू हो गयी थी। बन-मक्खन और चाय की दुकाने भी ग्राहकों से घिरने लगी थीं। इनमें इमरजेंसी वाले मरीजों के तीमारदार ही ज्यादा होंगे।
अस्पताल चौराहे से कचहरी रोड पकड़कर मैं फ़िरोज गांधी चौराहे पर आया जहाँ एक नुक्कड़ पर शहीद स्मारक बना हुआ है। इस समय तक जिन सड़कों से मैं गुजरा था उनपर योगी जी के गढ्ढा-मुक्ति आदेश की स्पष्ट छाप दिखायी दे रही थी। मैं मन ही मन प्रसन्न था। खासतौर पर इसलिए कि मुझे साइकिल से सैर में सहूलियत होने वाली थी। वैसे इस प्रकार की प्रसन्नता का भाव मेरे मन में उस समय भी पैदा हो गया था जब सभी शहरों में साइकिल-पथ का निर्माण जोर-शोर से हो रहा था। लेकिन दुर्भाग्यवश मुझे किसी 'साइकिल-पथ' पर अपनी द्विचक्री दौड़ाने का अनुकूल अवसर नहीं मिल सका। आगे का राम जाने।
फ़िरोज गांधी चौराहे से अपनी कॉलोनी के लिए मैं प्रायः ओवर-ब्रिज पर चढ़ाई करके रायबरेली क्लब के बगल से होकर 'सेशन्स-हाउस' के सामने से जाता हूँ। लेकिन आज मैं विकासभवन के सामने से होकर बरगद चौराहा क्रासिंग की ओर जाने वाले रास्ते पर गया। मैं विकास भवन के सामने तक पहुंचा था तबतक सड़क-गढ्ढा-मुक्ति से उपजी खुशी काफ़ूर हो गयी। हालाँकि मुझे इस सड़क पर जो मिला उसे गढ्ढा नहीं कहा जा सकता लेकिन हिचकोले इतने जबरदस्त थे कि मुझे अपना भार सीट के बजाय पैडल्स पर ट्रांसफर करना पड़ा। इस सड़क की ऊपरी सतह जगह-जगह से उघड़ गयी है।
आज की सैर का कोटा पूरा नहीं हो पाया था तो मैं नेहरू नगर की ओर मुड़कर सीधे जेलरोड की ओर चल दिया। सड़क किनारे के नाले की मरम्मत का काम प्रगति पर था। नाले को ढंकने के लिए सीमेंट के अनेक स्लैब ढाले गये थे जो अभी सूख रहे थे। इधर से निकलकर इंदिरानगर की ओर जाने वाली सड़कों के टी-पॉइंट अवरुद्ध थे। आगे अच्छी सुविधा मिलने की आस में अभी कष्ट उठा रहे होंगे इधर के लोग। मैं जेल रोड पहुँचकर बायें मुड़ा और #बालमखीरा वाले की खटाल से आगे पुलिस चौकी तक जाकर दाहिनी ओर सई नदी के अमर शहीद स्मारक लोहे के पुल की ओर चला गया। नदी पर बने धोबीघाट पर खूब रौनक थी। पाट पर पटके जाते कपडों की आवाज ऊपर तक आ रही थी।
नदी और सड़क के संगम के पास पीपल का एक विशाल वृक्ष है। इसके नीचे शंकर जी की प्रतिमा वाला एक छोटा सा मंदिर है जिसके सामने कुछ लोग सत्संग कर रहे थे। पेड़ के ऊपर एक बड़ी सी चील मंडरा रही थी जिससे आक्रांत कुछ पक्षी पेड़ पर बैठे चांव-चांव कर रहे थे। उसमें कुछ कौवों की कांव-कांव भी समाहित थी। सड़क पर नियमित टहलने वाले आ-जा रहे थे। वहाँ कुछ तस्वीरें लेकर मैं वापस चल दिया लेकिन कुछ ही दूर बाद रुक जाना पड़ा।
एक रिक्शेवाला भारी सामान लादे बड़बड़ाता हुआ चला आ रहा था। उसकी नाराज़गी का विषय योगी जी के फरमान के बावजूद इस सड़क का न बनना था। यह सड़क क्षेत्रीय ग्राम्य विकास संस्थान के सामने से सई घाट तक जाती है जहाँ एक नामी पब्लिक स्कूल भी है। बच्चों से लेकर बड़े-बूढ़ों तक और गृहिणी औरतों से कामकाजी माहिलाओं तक सभी यहाँ से गुजरते हैं। लेकिन इस सड़क का भाग्योदय नहीं हो सका है।
मैंने देखा उसका रिक्शा हमारी साइकिल से ज्यादा हिचकोले खा रहा था। एक बुजुर्ग के टहलने की चाल भी यहाँ धीमी हो गयी थी। मैंने रुककर जो तस्वीरें लीं उसे आप भी देखिए।













(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
www.satyarthmitra.com

1 comment:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (23-07-2017) को "शंखनाद करो कृष्ण" (चर्चा अंक 2675) पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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