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Friday, May 6, 2016

विस्मृति का शिकार मुंशीगंज शहीद स्मारक


6 मई, 2016
शहीद स्मारक स्थल मुंशीगंज,रायबरेली
‪#‎साइकिल_से_सैर‬
आज की सुबह का मौसम क्या मस्त था। आसमान में छुट्टा बादलों की आवाजाही और पुरवाई के वेग को रोकती-टोकती पछुवा हवा बारिश की संभावना बताती हुई भी सैर पर निकलने वालों को डरा नहीं रही थी। घर से बाहर निकलते ही महसूस हुआ कि वातावरण में ऑक्सीजन की मात्रा रोज से ज्यादा है। साइकिल पर बैठते ही ठंडी हवा का ताजा झोंका चेहरे पर पड़ा जो किसी भी ए.सी. की बयार को लज्जित करने वाला था। अभी चार दिन पहले तक प्रचंड गर्मी थी, यही प्रकृति झुलसाए डाल रही थी और आज है कि सबकुछ सुहाना लगने लगा है। बुन्देलखण्ड से आ रही खबरों की सोचें तो हम खुद को कितना भाग्यशाली पाते हैं।

आज हम जेलरोड से क्षेत्रीय ग्राम्य विकास संस्थान वाले रास्ते पर मुड़कर सई नदी की ओर चले गए। यहाँ नदी पर एक बहुत पुराने ध्वस्त हो चुके पुल के पायों के ऊपर लोहे का पैदल पुल बनाया गया है। इस पगडंडी-नुमा पुल पर लोगों की अच्छी आवाजाही दिख रही थी। मैंने भी साइकिल खड़ी करके ताला लगा दिया और लोहे की सीढ़िया उतरकर नदी के ठीक ऊपर आ गया। वैसे आजकल सई का जो हाल है इसे नदी नहीं कहा जा सकता। जलकुम्भी, खर-पतवार, शहर के मंदिरों का कूड़ा और भारी गर्मी से सूखती जलधारा के कारण यह एक गंदे नाले का रूप ले चुकी है। इसके बावजूद पुल के नीचे जमा पानी में दर्जनों धोबी कपड़ा धुलते दिखायी दिए। अनेक खाली पाट अपने धोबी का इंतजार कर रहे थे। इस गन्दे पानी से कपड़े साफ कैसे हो जाते हैं यह मेरे लिए एक पहेली ही है। हालांकि मैंने यह कहावत जरूर सुनी है कि कीचड़ से कीचड़ धुलता है।

इस पैदल पुल का दूसरा सिरा प्रसिद्ध 'मुंशीगंज शहीद स्मारक' के प्रांगण में खुलता है। वहाँ पहुँचा तो बहुत से नर-नारी इस विशाल परिसर में अपनी सेहत की देखभाल करते दिखे। यहाँ दूसरे लड़के-लड़कियाँ भी थे जो अपने तरीके से बढ़िया मौसम का लुत्फ़ उठा रहे थे। एक छोटा बच्चा एक पोटली में कच्चे आम (टिकोरा) लिए जा रहा था जिसे तीन-चार लड़के घेरकर अमिया के लिए फँसाने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन वह भी एक चंट था। पोटली पर अपनी पकड़ ढीली न होने दी।

स्वतंत्रता संग्राम में रायबरेली जिले के अमर शहीदों के सम्मान में यह स्मारक बनाया गया था। यहाँ हर साल 7 जनवरी को एक बड़ा कार्यक्रम भी होता है। यहाँ स्मारक स्तम्भ के अलावा भारत माता मंदिर भी है जिसके चौड़े बरामदे में व्यायाम करते युवक इसकी अलग उपादेयता बता रहे थे। स्मारक स्तम्भ पर लगे संगमरमर पर खुदाई करके यहाँ का इतिहास बताया गया है, कुछ शहीदों के नाम लिखे गए हैं और प्रमुख घटनास्थलों को मानचित्र बनाकर दिखाया गया है।

इस परिसर को सुरम्य बनाने के लिए कभी उद्यान विकसित करने की कोशिश की गयी लगती है; लेकिन वर्तमान में सैकड़ो पौधे पानी के अभाव में सूख गए हैं। पगडंडियों को पक्का कर दिया गया है लेकिन सफाई और देखभाल करने की जिम्मेदारी शायद आम जनता के भरोसे ही है। तभी तो 'स्वागत कक्ष' और 'शहीद कला वीथिका' को कबाड़ घर बन जाना पड़ा है, स्वागत द्वार पर खड़े दोनो सफ़ेद घोड़ों की एक-एक टांग काट ली गयी है और दूसरी मूर्तियों पर से सजावटी पत्थरों को उखाड़ लिया गया है। 
शहीद स्तम्भ पर उकेरी गयी सूचनाओं के बीच अनेक उत्साही प्रेमियों ने अपने सन्देश खोद डाले हैं। मैं समझ नहीं पाता कि दिल के आरपार एक नुकीला-कटीला तीर घुस जाने के बावजूद वह धड़कता कैसे है; इजहारे-मोहब्बत करने लायक बचा कैसे रहता है।

यह सब देखकर मन का आनंद थोड़ा कम होने लगा तो मैंने वापस पुल की ओर लौटना मुनासिब समझा। इसी पुल पर 7 जनवरी 1921 को अंग्रेजी शासन के विरुद्ध किसानों ने मोर्चा लिया था जिनपर अंधाधुंध गोलियां बरसायी गयीं थी। सैकड़ों जाने गयीं जिनके खून से सई नदी का पानी लाल हो गया था। अंग्रेज़ो ने स्वातंत्र्य वीरों को रोकने के लिए शायद तभी इस पुल को तोप से उड़ा दिया होगा।
खैर, वापस साइकिल पर चढ़कर हम शहर की ओर लौट आये। हर तरफ टहल कर वापस लौटने वालों के अलावा स्कूल जाते बच्चे, उन्हें पहुँचाने जाते माता-पिता, भाई-बहन, बुआ-चाचा-चाची, ताऊ-ताई, दादा-दादी, रिक्शे वाले आदि और उन्हें पढ़ाने जाते अध्यापक-अध्यापिकाएँ दिखायी दे रहे थे। हम जेल रोड से फिरोज गांधी चौराहा होते हुए कलेक्ट्रेट के बगल से बरगद चौराहा क्रासिंग तक गए लेकिन हाइवे से बचने के लिए वापस नेहरू नगर और इंदिरानगर के बीच वाली सड़क से जेलरोड पर वापस आ गए।

घर पहुंचने के लिए मामा चौराहे की ओर जाते हुए एक साइनबोर्ड देखकर मैं रुक गया। लिखा था- "वातानुकूलित, मॉडल शॉप, बैठकर पीने की उचित व्यवस्था"। वाह, क्या बात है। इससे पहले कि आप कुछ ऐसा-वैसा सोचें, मैं यहाँ स्पष्ट कर दूँ कि मैं रुका था सिर्फ फ़ोटो लेने के लिए। पडोसी राज्य बिहार को देखकर यूपी वाले श्रेष्ठता बोध की खुशफहमी पाले रहते थे, लेकिन अब तो यह मंजर है कि आइना भी चिढ़ा रहा है।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी) 

3 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (11-05-2016) को "तेरी डिग्री कहाँ है ?" (चर्चा अंक-2339) पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. एक तरफ सेहत बनाओ तो दूसरी तरफ व्यवस्था भी बनी रही। . सबका ख्याल है

    बहुत सुन्दर प्रस्तुति

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