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Wednesday, May 4, 2016

साइकिल से सैर की सरपट रपट

वैसे तो मुझे साइकिल खरीदे महीना भर से ऊपर हो गया; और खरीदा भी था सुबह की सैर के लिए ही, लेकिन कोषागार के काम में अत्यन्त व्यस्त होने का भाव और शादी-विवाह के मौसम में इधर-उधर की यात्राओं का प्रभाव ऐसा हुआ कि इस अद्‍भुत आनंद में लगातार व्यवधान आता रहा। लेकिन अब मैंने तय कर लिया है कि कोई बहाना नहीं करूंगा। आलस्य त्याग कर सुबह अंधेरा छँटते ही अपनी सवारी लेकर निकल जाया करूंगा। अस्तु, बहुत दिनों से रुकी हुई गाड़ी चल पड़ी है। इसका एक लाभ यह है कि इन पन्नों पर जमी धूल भी साफ़ करने का अवसर मिल गया है। तो पेश है साइकिल से सैर की कहानी की प्रारंभिक कड़ी :
4 मई, 2016
भूएमऊ, रायबरेली

आज सुबह साढ़े पाँच बजे साइकिल लेकर सैर को निकले। साइकिल चलाने के लिए मेरी पसंदीदा सड़क रायबरेली से परसदेपुर की ओर जाती है। यह हाइवे नहीं है फिर भी चौड़ी है, गढ्ढामुक्त है और इसपर भारी वाहन भी कम चलते हैं। इसपर पीएसी कैम्पस के बाद ही देहात का हरा-भरा इलाका शुरू हो जाता है। शायद इसीलिए स्थानीय सांसद सोनिया जी ने इसी सड़क पर भूएमउ गाँव में एक भव्य गेस्टहाउस बनवाया है। कई एकड़ क्षेत्र में बना यह प्रांगण उनके प्रवास के समय भारी गहमागहमी का केंद्र होता है।
खैर, आज जब निकला तो सड़क किनारे की धूल पर आसमानी बूँदों के निशान बता रहे थे कि शायद रात में बरखा रानी ने गरम हवा से मुठभेड़ का मन बनाया होगा लेकिन ऐन वक्त पर पुरजोर हमला करने से संकोच कर गयी होंगी। शायद उनके पीछे बादल सैनिकों की भरपूर संख्या न जुट पायी हो। इसके बावजूद उनके एक झलक दिखा जाने भर से सुबह की हवा सुहानी हो गयी थी।

पूरे आनंद से साइकिल हाँकते हुए मैंने ऊँचे-ऊँचे दो पुलों की चढ़ाई पार कर उनकी ढलान का मजा उठाया और देखते-देखते पाँच किमी दूर भूएमउ गेस्टहाउस के उस पार पहुँच गया। उस प्रांगण के भीतर झाँकने का तो कोई झरोखा नहीं था लेकिन दीवारों के ऊपर से दिख रहे हजारों पेड़ पौधों के बीच बनी इमारत की छटा देखकर सहज ही अनुमान हुआ कि भीतर किसी साम्राज्ञी की रिहाइश का सारा इंतजाम होगा।

वापसी यात्रा में पुल की चढ़ाई दुबारा पार करने के बाद सामने से आते काले बादलों ने रोक लिया। तभी उनके बीच बिजली चमकी और जोर की गड़गड़ाहट से मन कांप गया। बादलों ने एक के बाद एक कई गर्जनाएं कर डाली। जैसे मोदी सरकार ने सत्ता में आते ही एक के बाद एक कई घोषणाएं कर डाली थीं
मैंने एक चाय की दुकान की बरसाती में शरण ली। मूसलाधार बारिश शुरू हुई तो मन ख़ुशी से भर गया, लेकिन जल्दी ही बरसाती टपकने लगी। थोड़ी देर बाद बरसाती के अनगिनत छेदों से झरने गिरने लगे। इस बरसाती में शरण लेने वालों के लिए जगह कम पड़ने लगी तो मैंने बारिश में भीगने का मन बना लिया। चाय वाले ने चूल्हा बुझाकर हमारा आर्डर पहले ही मटिया दिया था। अब मैंने उससे एक पॉलीथिन मांगकर अपना बटुआ और मोबाइल लपेटा और साइकिल पर बैठ फुहारों की बहार लूटते हुए घर लौटे। हालाँकि घर पहुंचने से पहले ही बारिश उसी प्रकार सिमट कर बन्द हो गयी जिस प्रकार उन घोषणाओं का हश्र हो गया है।

वाह, मजा आ गया। साइकिल की सवारी का आनंद वाकई अद्भुत है अनूप जी। आइडिया देने का शुक्रिया।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

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