हमारी कोशिश है एक ऐसी दुनिया में रचने बसने की जहाँ सत्य सबका साझा हो; और सभी इसकी अभिव्यक्ति में मित्रवत होकर सकारात्मक संसार की रचना करें।

Tuesday, May 24, 2016

सी.एम.के साथ साइकिल यात्रा

#साइकिल_से_सैर, लखनऊ में


पिछले शनिवार को बुद्ध पूर्णिमा और अगले दिन रविवार की छुट्टी तो थी ही, शुक्रवार को एनपीएस पर परिचर्चा के लिए मुख्यालय से सभी कोषाधिकारियों को बुलावा आ गया तो मुझे लगातार चार रातें और तीन दिन लखनऊ में गुजारने का मौका मिल गया। वृहस्पतिवार की शाम ऑफिस से लौटकर लखनऊ के लिए चलने को हुआ तो मेरी पार्टनर भी साथ चलने को मचल उठी। इतने दिनों रायबरेली में अकेले गुजारना इसे गँवारा नहीं था। मैंने भी इसके साथ लंबे ब्रेक को टालने के लिए इसे साथ ले चलना ही ठीक समझा। इस तरह मेरी सरकारी गाड़ी पर सवार होकर मेरी हमसफ़र साइकिल नवाबों की नगरी में नमूदार हो गयी।
लखनऊ में अगली सुबह स्पेशल हो गयी। मेरी बेटी वागीशा साइकिल चलाने के लिए बहुत उत्साहित थी। दरअसल मुख्यमंत्री अखिलेश यादव जी ने उस दिन पर्यावरण को प्रदूषण मुक्त रखने में साइकिल के प्रयोग को बढ़ावा देने के लिए स्कूली बच्चों के साथ साइकिल चलाने का कार्यक्रम बनाया था। टाइम्स ऑफ़ इण्डिया के Go Green Campaign का हिस्सा बने इस कार्यक्रम में शहर के प्रत्येक स्कूल से एक बच्चा बुलाया गया था। वागीशा को उसके स्कूल से इसके लिए चुना गया था। बच्चे के साथ अभिभावक भी 'सादर' आमंत्रित थे। फिर क्या था। मैंने अपनी साइकिल से ही मुंशी पुलिया से मुख्य मंत्री आवास की दूरी तय करने की ठानी। अलबत्ता बेटी को उसकी साइकिल सहित गाड़ी पर बिठाकर 5-कालिदास मार्ग के लिए रवाना कर दिया।

मेरी साइकिल का उत्साह देखते ही बनता था। हम मुंशी पुलिया से पॉलिटेक्निक चौराहा तक सर्विस लेन पकड़कर कतारबद्ध हरे-भरे पेड़ों से बात करते हुए पहुँचे। गोमतीनगर के विभूतिखंड में 'वेव मॉल' को पार करके फ्लाईओवर की चढ़ाई चढ़ने में अच्छी कसरत हो गयी लेकिन उसकी ढलान पर बिना पैडल चलाये तेजी से उतरते हुए ठंडी हवा खाकर थकान छू-मंतर भी हो गयी। लोहिया पार्क चौराहे को पार करते ही मैं सड़क के बायीं ओर थोड़ा ऊँचा बनाये गये पैदल पथ पर चढ़ गया। 

लाल टाइल्स लगे इस चिकने ट्रैक पर साइकिल चलाने में थोड़ी सावधानी तो जरुरी थी लेकिन मुख्य सड़क पर फर्राटा भरती गाड़ियों से सुरक्षित दूरी और बायीं ओर घने पेड़ों से घिरे लोहिया पार्क से निकटता के कारण मन प्रफुल्लित हुआ। इस पैदल पथ पर साइकिल चलाने का आनंद जल्दी ही जाता रहा क्यों कि आगे इसके निर्माण का कार्य 'प्रगति पर' हो गया था। मिट्टी के ढूहे में घुसकर बिला गयी थी यह पगडंडी। यहाँ साइकिल खड़ी कर एक दो तस्वीरें लेने के बाद मैं मुख्य सड़क पर आ गया और फन रिपब्लिक मॉल को पार करते हुए उस ओर बढ़ गया जिसे लखनऊ की शान समझा जाता है।

संगमरमर से बनी हाथियों के अलावा अनेक (दलित) महापुरुषों की विशालकाय प्रतिमाओं से सजे सामाजिक परिवर्तन स्थल की शोभा देखते ही बनती है। बाबासाहब की महिमा इस स्थान पर खूब मुखरित हुई है। इस समय यहाँ धूप निकल आयी थी लेकिन इससे बेखबर एक आदमी यहीं पैदल पथ पर गहरी नींद में सो रहा था। जैसे पूरी रात गर्मी में जागकर ठंडी सुबह की प्रतीक्षा में गुजारी हो। यह बात दीगर है कि अच्छे दिनों की आस पर महंगाई की मार की तरह इसकी शीतल कामना पर भी सूरजदेव अग्नि के कोड़े बरसाने की तैयारी करने लगे थे।


इस मंजर को पीछे छोड़ मैं गोमती नदी के पुल पर पहुँच गया। नदी के किनारों को पक्का करके उसे आकर्षक रूप देने का काम प्रगति पर है। मिट्टी के पहाड़ काटे जा रहे हैं, कंक्रीट की मोटी दीवारें खड़ी की जा रही हैं जिनपर पत्थर की सीढ़िया जमायी जा रही हैं। सुन्दर नारियल के पेड़ सीधी कतार में लगाये जा रहे हैं। सुना है कि शहर में गुजरती गोमती को लन्दन की टेम्स नदी का रूप दिया जाने वाला है।
पहली बार मैंने रुककर देखा तो नदी का पानी काफी साफ-सुथरा और हरा-भरा दिखा। मुझे तो वहीं ठहर जाने का मन हो रहा था, लेकिन सात बजने में कुछ ही मिनट बाकी थे और मुख्यमंत्री का कार्यक्रम शुरू होने वाला था। मैंने पैडल पर दबाव तेज़ किया और पूरी शक्ति लगाकर तेजी से कालिदास मार्ग चौराहे पर पहुँच गया जहाँ वागीशा अपनी साइकिल के साथ मुख्यमंत्री आवास तक चलने के लिए मेरी प्रतीक्षा कर रही थी। सुरक्षा कर्मियों ने हमारा हुलिया देखकर सहर्ष गेट के अंदर जाने दिया। मैंने अपनी साइकिल अगले सुरक्षा बूथ के किनारे खड़ी कर लॉक किया और मुख्यमंत्री आवास के सामने उस स्थान पर चला गया जहाँ से कार्यक्रम की शुरुआत होनी थी।


रंगी-पुती चौड़ी सड़क की बायीं पटरी पर लोहे की रेलिंग से घेरकर साइकिल ट्रैक बनाया गया था जिसके ऊपर आकर्षक साइनबोर्ड लगाकर पर्यावरण की रक्षा और साइक्लिंग के महत्व को दर्शाते नारे लिखे गये थे। वहाँ एक-एक कर इकट्ठा होते बच्चों और उनकी साइकिलों को पंक्तिबद्ध खड़ा कराने के लिए सुरक्षा कर्मी और कुछ वरिष्ठ अधिकारी मुस्तैद थे। एक सिपाही खोजी कुत्ते की बागडोर थामें चारो ओर घुमा रहा था। कुत्ते ने जब इंच-इंच को सूंघकर सिक्यूरिटी क्लीयरेंस दे दिया तब एक सुरक्षा अधिकारी ने वॉकी-टॉकी पर खबर भेजी। एक सफारी वाला लम्बा-तगड़ा आदमी सिपाहियों को समझा रहा था कि गार्जियन्स‍ को सी.एम. से कितनी दूरी पर रोकना है।
लाइन लगाकर खड़े बच्चों की तस्वीरें खींची जा रही थीं। मीडिया वालों का एंगल अलग था और अभिभावकों का अलग। वे अपने बच्चे को फोकस कर रहे थे। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का जमावड़ा बढ़ता गया और उनके रिपोर्टर अपनी स्टोरी तैयार करने लगे। बच्चों को अब अपनी-अपनी साइकिल के साथ ट्रैक में खड़ा कर दिया गया ताकि फ़ोटो अच्छी आ सके। अंग्रेजी अखबारों की रिपोर्टर प्रायः नयी उम्र की लड़कियाँ थी जो एक-एक बच्चे से सवाल पूछकर नोट बना रही थीं और अपने मोबाइल कैमरे से जरूरी फोटोग्राफ लेती जा रही थीं।


टाइम्स ऑफ़ इण्डिया की रिपोर्टर मेरे पास भी आयी और मुझसे वागीशा के बारे में पूछा। यह भी पूछा कि साइकिल से स्कूल क्यों नहीं जाती। लखनऊ की बेतरतीब ट्रैफिक में सुरक्षा की चिंता और स्कूल की दूरी, ये दो वजहें मैंने बतायी। उसने कहा कि आप बड़े उत्साह से बेटी की तस्वीरें ले रहे थे। प्लीज़ एक बार और ऐसा कीजिए ताकि मैं आपकी फोटो ले सकूँ। मैंने ख़ुशी-ख़ुशी आईपैड का कैमरा ऑन किया और बच्चों की ओर फोकस करने लगा। मोहतरमा ने मुझे थैंक्यू बोला तो लगा जैसे कल अख़बार में मुझे जरूर छापेंगी। 

लेकिन अगले दिन फ़ोटो खींचते हुए जिस अभिभावक की फ़ोटो छपी वो एक मॉम की थी जिन्होंने यहाँ आने से पहले जरूर किसी ब्यूटी पार्लर में अच्छा समय और पैसा खर्च किया होगा। खैर जो हुआ अच्छा हुआ। सम्पादक का सौंदर्यबोध उम्दा था। उसने मेरे बारे में लिखित रिपोर्ट जरूर छापी लेकिन वह थी विशुद्ध कल्पना पर आधारित; ऐसी बात जो मुझसे मेल नहीं खाती।


इतने में हूटर बजाती गाड़ियों का काफिला आ पहुँचा। मैं अचकचा कर सोचने लगा कि सामने के ही आवास से आने के लिए सी.एम. को इतनी गाड़ियों की जरूरत क्यों पड़ी। लेकिन कुछ समझ पाता इससे पहले ही श्री अखिलेश जी सामने आ चुके थे। साथ में उनकी बेटी भी थी। मीडिया वालों ने उन्हें ऐसे घेर लिया कि बच्चे उनसे ओझल हो गये। सुरक्षा कर्मियों ने रेलिंग से एक मोटा रस्सा बांधकर उसके भीतर कैमरामेन और रिपोर्टर्स को सीमित करने की कोशिश की लेकिन सब बेकार साबित हुआ। थोड़ी देर तक मीडिया वाले एक दूसरे पर चढ़ते हुए फ़ोटो और बाईट लेते रहे।


आखिर मुख्यमंत्री जी को ही बच्चों की सुध आयी। उन्होंने मीडिया वालों को परे धकेलते हुए बच्चों से परिचय लेना शुरू किया और धक्का-मुक्की के बीच अपनी स्पोर्ट्स साइकिल पर बैठकर ट्रैक में घुस गये। उनके ब्लैक कैट कमांडो भी सुरक्षा घेरा नहीं बना पा रहे थे। मीडिया वाले इस कदर हावी थे कि मुख्यमंत्री जी साइकिल के पैडल का प्रयोग अंत तक नहीं कर सके। पैरों से ठेलते हुए और पोज़ देते हुए करीब पचास मीटर की साइकिल यात्रा पूरी हुई। स्कूली बच्चों ने भी साइकिल घसीटते हुए उनका साथ दिया। 

आगे सुरक्षा बूथ पर रुककर उन्होंने बाकायदा प्रेस को संबोधित किया। इस बीच सभी गाड़ियाँ उनके प्रस्थान के लिए वहीं पर लगा दी गयीं। लेकिन उन्होंने अपनी बात खत्म करने के बाद सभी बच्चों को अपने निवास के प्रांगण में साथ चलने का इशारा किया और साइकिल से ही चल दिये। बाकी सबको वहीं रुकने का आदेश दिया।

जब बच्चों के साथ मुख्यमंत्री जी गेट के भीतर चले गये तब अभिभावक गण गेट पर इकठ्ठा हो गये। तभी भीतर से आदेश हुआ की पेरेंट्स को भी अंदर बुला लिया जाय। इस प्रकार मुख्यमंत्री आवास के विशाल और भव्य प्रांगण में जाने का सुअवसर हमें भी मिला। खूब घने और छायादार वृक्ष परिसर की शोभा बढ़ा रहे थे। फूलों की क्यारियाँ अलग छटा बिखेर रही थीं। वहाँ सबकुछ सलीके से हुआ। बच्चों और अभिभावकों के साथ विधिवत् फोटो सेशन भी हुआ और सबको मिठाई के साथ ठंडा पानी भी पिलाया गया।

बेहद प्रसन्न बेटी के साथ जब हम बाहर आये तो प्रायः सभी साइकिलें अलग-अलग चार-पहिया वाहनों पर लादी जा रही थीं जिनकी व्यवस्था अभिभावकों ने की थी। हमने भी वागीशा को साइकिल सहित गाड़ी में बिठाकर उसके स्कूल छोड़ने को भेज दिया और अपनी साइकिल पर सवार होकर मुंशी पुलिया इंदिरानगर चला आया।
नौ बज चुके थे और तैयार होकर राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (NPS) पर आयोजित परिचर्चा में भाग लेने वित्तीय प्रबंध प्रशिक्षण और शोध संस्थान (IFMTR) के सभागार में पहुँचना था। सरकारी नौकरी में समझौता भी बहुत करना पड़ता है। इसी वजह से यह वृतांत लिखने में इतना विलम्ब तो होना ही था।
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी) www.satyarthmitra.com

1 comment:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, " खुशियाँ बाँटते चलिये - ब्लॉग बुलेटिन " , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

    ReplyDelete

आपकी टिप्पणी हमारे लिए लेखकीय ऊर्जा का स्रोत है। कृपया सार्थक संवाद कायम रखें... सादर!(सिद्धार्थ)