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Sunday, May 8, 2016

साइकिल से सैर में साप्ताहिक विराम


साइकिल से सैर में साप्ताहिक विराम
धन्नो आज अकेली होगी रायबरेली में
आ पहुँचा हूँ आज लखनऊ वाली खोली में
आज साइकिल मेरी सैर नहीं कर पायेगी
खड़ी रहेगी पड़ी रहेगी वहीं हवेली में
आलस का आनंद मुफ़्त में आज उठाता हूँ
कोई वैद्य नहीं दे सकता इसको गोली में
बच्चों की मम्मी ने उठकर टिफिन बनाया है
पानी की बोतल रखती इस्कूली झोली में
बिटिया देर रात तक पढ़के भोर में सोयी थी
जगा रही मम्मी अब उसको मीठी बोली में
झटपट हो तैयार पी रहे दूध चॉकलेटी
आपस में गिटपिट करते हैं किसी पहेली में
जूता मोजा टाई बिल्ला बस्ता बांध लिया
बस की खातिर खड़े हुए नुक्कड़ पे टोली में
बस में हुए सवार सभी बच्चे मुस्काते हैं
महक रहे हैं चहक रहे हैं हंसी ठिठोली में
अल्हड़ सी मुस्कान लिए बच्चे सब जाते हैं
कार, स्कूटी, बस, रिक्शा, पैदल या ठेली में
7 मई, 2016 : लखनऊ
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

www.satyarthmitra.com

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