हमारी कोशिश है एक ऐसी दुनिया में रचने बसने की जहाँ सत्य सबका साझा हो; और सभी इसकी अभिव्यक्ति में मित्रवत होकर सकारात्मक संसार की रचना करें।

गुरुवार, 19 सितंबर 2013

वर्धा परिसर में अद्‌भुत बदलाव…

दो साल पहले जब केन्द्रीय विश्वविद्यालय- वर्धा छोड़कर उत्तर प्रदेश सरकार की नौकरी पर वापस गया था तो इसका परिसर अभी निर्माणाधीन था। सीमेन्ट की सड़कें तब बन ही रही थीं। पथरीली पहाड़ियों को तराशकर और काट-छीलकर भवन खड़े करने के लिए समतल किया जा रहा था और अनेक संकायों की इमारत खड़ी की जा रही थी। आज जब दो साल बाद यहाँ दो दिन के लिए आना हुआ तो परिसर की साज-सज्जा और तैयार खड़ी इमारतों को देखकर मुग्ध हो गया।

नागार्जुन सराय का भवन तो अभी बनना शुरू ही हुआ था। आज हमें इसी गेस्ट हाउस में ठहराया गया है। सबकुछ इतना बढ़िया है कि मुझे अपने ब्लॉगर मेहमानों के आराम की अब कोई चिन्ता ही नहीं रह गयी। यहाँ का स्टाफ भी आये दिन होने वाले राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों व गोष्ठियों में आने वाले मेहमानों की आव-भगत करने में इतना दक्ष हो चुका है कि मुझे कुछ बताने की जरूरत ही नहीं रह गयी है। उसपर से कुलपति जी की प्रशासनिक सजगता और छोटी-छोटी बातों पर सतर्क दृष्टि और सदाशयता ने मेरा काम बिल्कुल आसान कर दिया है। इस सहजता से संगोष्ठी की सभी तैयारियाँ हो गयी हैं कि मुझे भी अन्य मेहमानों की तरह घूमने-फिरने और फोटू खिंचाने का पूरा मौका मिल गया है। तो लीजिए आज दिन भर की कुछ झाँकी आप भी देखिए मोबाइल कैमरे की नज़र से:

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बाबा नागार्जुन की प्रतिमा बनाने वाले ने उनका फोटो देखकर नहीं बल्कि अपनी आदर्श कल्पना का सहारा लेकर यह मूर्ति बनायी होगी। अब आगे की पीढ़ियाँ नागार्जुन के रूप में इसी चेहरे को पहचानेंगी। बस किसी मनुष्य की आहट मिलते ही यह शीशे का दरवाजा अपने आप खुलता और बन्द होता है।
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आज तीन महान विभूतियों का विदाई समारोह था जिसे फैकल्टी और ऑफीसर्स क्लब में आयोजित किया गया। (बाएँ से)  प्रो. बी. एम. मुखर्जी - मानवशास्त्र, प्रो. रामशरण जोशी - जन संचार, कुलपति जी व राजकिशोर – हिंदीसमय

जोशी जी ने अपना अनुभव अविरल सुनाया तो राजकिशोर जी ने अपना लिखित भाषण पढ़ा। बोले- विदाई समारोह में कही गयी बातें झूठ का ज्वालामुखी होती हैं। साथ ही सफाई दे गये कि मैं कभी किसी के हरम में नहीं रहा।

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मुझे खबर मिली कि तीन चार ब्लॉगरों ने एक वयोवृद्ध साहित्यकार के कमरे पर धावा बोल दिया है। बेचारे सोने की जुगत कर रहे थे कि इन लोगों ने उन्हें कुर्सी पर बिठा दिया और उनसे ‘आशीर्वाद’ मांगने के बहाने घेरकर बैठ गये।
पता चलने पर मैं भागा-भागा आया और हाथ जोड़कर मैंने अपना परिचय दिया- महोदय, ये लोग इस समय सो जाने के बजाय आपको तंग करने का जो दुस्साहस कर रहे हैं उसके लिए जिम्मेदार मैं हूँ क्योंकि इन लोगों को यहाँ बुलाने की गलती  मैंने की है।
बाद में जब फोटो खींचने का उपक्रम हुआ तो हर्ष जी अपना कैमरा लाने चले गये और शैलेश भारतवासी अपनी काठमांडू की कथा सुनाने के बाद विनोद कुमार शुक्ल जी के पीछे खड़े हो गये। डॉ प्रवीण चोपड़ा कैमरे का बटन दबाने लगे।  डॉ. अरविंद मिश्र जी अपनी कुर्सी से तनिक नहीं हिले। मुझे तो आप देख ही रहे हैं Smile

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(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

शनिवार, 31 अगस्त 2013

हिंदी की छवि बदलनी होगी

सोशल मीडिया और हिंदी ब्लॉगिंग के विषय पर राष्ट्रीय सेमिनार के लिए अच्छे पैनेल की तलाश करते हुए मैंने बहुत से लोगों तक इस सेमिनार की रूपरेखा पहुँचायी। ट्विट्टर और फेसबुक पर सक्रिय अनेक प्रोफाइलें देख डालीं। एक से बढ़कर एक व्यक्तित्व देखने को मिले। मैंने अपनी ओर से संदेश भेजे। बहुत से लोगों ने रुचि दिखायी। आने का वादा किया। कुछ लोग आना चाहते हुए भी निजी कारणों व अन्यत्र व्यस्तता से आने में असमर्थ थे। उन्होंने खेद के साथ सेमिनार के लिए शुभकामनाएँ व्यक्त कर दी। इसी सिलसिले में ट्विट्टर पर राजनैतिक रूप से सक्रिय दो महिला प्रवक्ताओं के बारे में एक मित्र के माध्यम से पता चला। आभासी पटल पर ही उनसे संपर्क हुआ। यद्यपि वे अंग्रेजी भाषा में लिखती हैं, दक्ष और सहज हैं फिर भी उनकी प्रोफाइल, लोकप्रियता, फॉलोवर्स की संख्या और राजनैतिक विषयों पर उनके ट्वीट्स देखकर मैं प्रभावित हुआ और इस सेमिनार में सोशल मीडिया और राजनीति विषयक सत्र के लिए उन्हें बुलाने का लोभ संवरण नहीं कर सका।

जब मेरे संदेश का जवाब दो दिनों तक नहीं आया तो मैंने फोन मिला दिया। औपचारिक अभिवादन के बाद उन्होंने कहा कि हम इसमें आना तो चाहते थे लेकिन एक झिझक की वजह से आने में संकोच कर रहे हैं। मैंने तफ़सील पूछी तो बोलीं- असल में हमारी हिंदी उतनी अच्छी नहीं है जितनी आप लोगों की है। आपका मेल देखने के बाद हमें लगा कि शायद उस मंच पर हिंदी के बड़े-बड़े साहित्यकार आयेंगे जिनके सामने हम लोग शुद्ध हिंदी में अपनी बात नहीं बोल पाएंगे। दूसरी नेत्री ने भी लगभग यही बात बतायी। कहने लगीं- मुझे ऐसा महसूस हो रहा है कि आप आयोजकों द्वारा हमारे चुनाव में जरूर कोई चूक हुई है। हम ऐसे तो हिंदी में बात-चीत कर लेते हैं लेकिन उतने बड़े मंच पर हिंदी के विद्वानों के बीच बोलना थोड़ा मुश्किल हो जाएगा।

उनकी बातों का जो संक्षिप्त जवाब मैंने दिया और जिससे संतुष्ट होकर उन्होंने अपनी झिझक तोड़ी और आने की संभावना टटोलने  और पूरा प्रयास करने का वादा किया वही सब मैं यहाँ थोड़ा विस्तार से बताना चाहता हूँ ताकि इस बहाने इस सेमिनार के एक बहुत ही महत्वपूर्ण उद्देश्य को समझा जा सके।

आजादी के इतने साल बीत जाने के बाद भी देश में हिंदी भाषा के प्रति आम दृष्टिकोण बहुत उत्साह वर्द्धक नहीं कहा जा सकता है। उत्तर भारत के तथाकथित हिंदी प्रदेशों में भी इसका स्थान जो होना चाहिए वह नहीं है। दक्षिण के गैर हिंदी भाषी क्षेत्रों का तो कहना ही क्या? आज भी हिंदी को साहित्य रचने और स्कूल कॉलेज में एक विषय के रूप में पढ़ने –पढ़ाने वाली भाषा तो माना जाता है लेकिन आधुनिक ज्ञान-विज्ञान को पढ़ने-समझने और दूसरों को पढ़ाने-समझाने के लिए इस भाषा पर भरोसा करने वाले बहुत कम हैं।

कविता, कहानी, ग़जल और उपन्यास लिखकर पत्र-पत्रिकाओं में छपवाने या पुस्तक प्रकाशित कराने के लिए तो हिंदी का प्रयोग किया जा रहा है लेकिन जब कोई वैज्ञानिक शोध पत्र लिखने की बात होती है या कानूनी, वाणिज्यिक, या आर्थिक मुद्दों पर कोई संदर्भ लेख लिखना होता है तो देश के विद्वान उसे अंग्रेजी में तैयार करते हैं और फिर आवश्यक होने पर उसका अनुवाद हिंदी के किसी विद्वान से कराया जाता है। भाषा के ऐसे विद्वान जिसे  मूल विषय का शायद ही कोई ज्ञान होता है। ये अनुवादक कभी-कभी ऐसा अर्थ का अनर्थ कर देते हैं कि हँसी भी आती है और क्षोभ भी होता है। मैंने एक बार Pearl Harbor का अनुवाद ‘मोती पोताश्रय’ पढ़ा था तो बहुत देर तक इस पोंगा-पंडिताई पर कुढ़ता रहा।  पाश्चात्य लेखकों की लिखी किताबों से तैयार इग्नू (IGNOU) की अनूदित अध्ययन सामग्री कभी पढ़ने को मिले तो इस कष्ट को समझा जा सकता है जहाँ MORE OFTEN THAN NOT को ‘‘नहीं से अधिक बहुधा’’ अनूदित करते हैं।

हमने आज भी हिंदी को एक पवित्रता का चोला पहनाकर उसे दीवार पर टंगी देवी-देवताओं की तस्वीर बना दी है जिसे केवल अगरबत्ती दिखायी जाती है और दूर से सिर झुकाकर अपनी श्रद्धा व्यक्त कर दी जाती है। गनीमत है कि अभी इस तस्वीर पर चन्दन की माला नहीं टांग दी गयी है।

मुझे लगता है कि हिंदी को इस गोबर-गणेश की छवि से बाहर निकालकर एक आधुनिक चिन्तन-मनन और ज्ञान-विज्ञान की भाषा बनाने, जीवनोपयोगी बातों को कहने समझने का माध्यम बनाने और सबसे बढ़कर रोजगार की भाषा बनाने का समय आ गया है। इसके लिए हिंदी के दरवाजे चारो ओर से खोलने होंगे। इसे प्रवचन की व्यास गद्दी  और कवि-सम्मेलन  के मंच से उतारकर भारतवर्ष और अखिल विश्व के आम जनमानस पर जमाना होगा। इसे बाजार में काम करने वालों से लेकर उसे नियंत्रित करने वालों तक सबकी जुबान पर चढ़ाना होगा। पांडित्य प्रदर्शन के बजाय सभी प्रकार के विचारों, तथ्यों, सिद्धान्तों, प्रयोगों, व्यापारों, नौकरियों, साक्षात्कारों, और आचार-व्यवहार में इसके प्रयोग को सहज और सरल बनाने के यत्न करने होंगे। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा की स्थापना अन्य के साथ-साथ कदाचित इस उद्देश्य से भी की गयी थी।

अधकचरी अंग्रेजी में गिट-पिट करने वालों को भी हम आधुनिक और पढ़ा-लिखा मान लेते हैं लेकिन हिंदी बोलने वाले से उम्मीद करते हैं कि वह आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की परम्परा का पोषक हो। रूढ़िवादी हम हिंदी भाषा के व्याकरण और वर्तनी को लेकर इतने आग्रही हो जाते हैं कि इधर कदम बढ़ाने वाला अपना रास्ता मोड़ लेने को बाध्य हो जाय। जब कोई भारी-भारी शब्दों से लदी हुई अबूझ बात कहे, रस छंद अलंकार की कसौटी पर कसी हुई शुद्ध हिंदी का प्रयोग करे तभी उसे विद्वान कहा जाय और उसे सम्मान की माला पहनायी जाय;  और फिर…?  फिर एक ऊँचे मंच पर स्थापित करके अक्षत-फूल से पूज दिया जाय। बस, काम खत्म।

…ऐसी सोच वालों की जकड़बन्दी से हिंदी को छुड़ाये बगैर इसका भला नहीं होने वाला।

मुझे अच्छा लगता है जब फेसबुक, ट्विटर और ब्लॉग स्पेस में बिना कोई साहित्यिक दावा किये तमाम लोग अपने मन की बात हिंदी में कहते हैं। बहुत प्रभावशाली ढंग से कहते हैं। उसपर त्वरित प्रतिक्रियाएँ होती हैं और विचारों का बिन्दास आदान-प्रदान होता रहता है। यहाँ थोड़ी सी तकनीक अपनाकर अभिव्यक्ति का बड़ा सा माध्यम हमारे हाथ आ जाता है। लेकिन जब देखता हूँ कि देश के तमाम युवा अपनी हिंदी बात कहने के लिए रोमन लिपि का प्रयोग करते हैं और इस मजबूरी में अपनी बात असंख्य संक्षेपाक्षरों में और बहुत खंडित तरीके से करते हैं तो दुख होता है। मन में एक कसक उठती है कि काश इन्हें यूनीकोड के बारे में पता होता, लिप्यान्तरण के औंजारों का पता होता तो वे अपनी बात अधिक सहज और सरल तरीके से कह पाते। रोमन में लिखी हुई हिंदी को  प्रवाह के साथ पढ़ना कितना कठिन है…! उस बात का पूरा आनंद भी नहीं मिल पाता।

…तो क्या हमें इस विकलांगता से उबरने के बारे में नहीं सोचना चाहिए?

इंटरनेट  अब कोई दूर-देश की चिड़िया नहीं है। यह अब हमारे घर-आंगन में चहकने वाली जीवन्त गौरैया है। ट्विटर का नाम शायद यही सोचकर पड़ा होगा। हिंदी ब्लॉग्स की संख्या पिछले दशक में जिस तेजी से बढ़ी उसपर फेसबुक और ट्विटर की तेजी ने थोड़ा ब्रेक लगा दिया। इसका कारण मूलतः तकनीकी है। इनके फॉर्मैट को देखिए। हम पलक झपकते ट्वीट कर लेते हैं और राह चलते फेसबुक पर स्टेटस लिखकर डाल देते हैं। लेकिन ब्लॉग पोस्ट लिखने के लिए थोड़ा समय तो देना ही पड़ता है। यहाँ हिंदी में पोस्ट लिखने के लिए यूनीकोड-देवनागरी जरूरी हो जाती है जबकि वे दोनो ‘छुटके’ (micro-blogging) रोमन में ही निपटाये चले जा रहे हैं। शार्टकट का जो सुभीता इन ‘छुटकों’ के यहाँ है वह ब्लॉग में नहीं। लेकिन कुछ स्थायी किस्म का सहेजकर रखने लायक उपयोगी और जानकारी पूर्ण आलेख लिखना हो तो फेसबुक/ ट्विटर का मंच टें बोल जाता है। यहाँ तो चाय-बैठकी वाली बतकही ही चल पाती है। फास्ट-फूड टाइप है जी यह; निस्संदेह इसका अलग मजा है। यह तकनीक और प्रारूप का अंतर है कि एक है जो एक दिन में कई बार हुआ जाता है तो दूसरा है जो कई दिन में एक बार हो पाता है।

सोशल मीडिया और हिंदी ब्लॉगिंग पर राष्ट्रीय सेमिनार कराने का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य यही है कि हिंदी के प्रयोग को अधिक से अधिक बढ़ावा मिले। देवनागरी में लिखने की तकनीक सहज, सरल और सर्वसुलभ हो। इन माध्यमों का प्रयोग जो लोग धड़ल्ले से कर रहे हैं वे इसे हिंदी में आसानी से कर सकें। साथ ही इन माध्यमों ने हमारे  सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य में कैसा हस्तक्षेप किया है और पारंपरिक साहित्यिक  मानकों की कसौटी पर हम कहाँ ठहरते हैं; इन प्रश्नों पर विचार करने  और बड़ी बहस कराने की तैयारी की गयी है।

आज भी भारत में जिस एक भाषा को बोलना और पढ़ना-लिखना सबसे बड़ी संख्या में लोग जानते हैं वह हिंदी ही है। फिर भी हमें इंटरनेट पर अंग्रेजी और रोमन लिपि अधिक दिख रही है तो इसका एक कारण हमारा तकनीकी रूप से पिछड़ा होना है और दूसरा कारण हिंदी भाषा के प्रति हमारा रुढ़्वादी दृष्टिकोण है। इन दोनो कारणों को इतिहास की वस्तु बनाने में इस सेमिनार ने यदि थोड़ा भी योगदान किया तो यह हमारी सफलता होगी। इसीलिए हम आह्वान करते हैं उन सबका जिन्हें हिन्दी से प्यार है, हिन्दुस्तान से प्यार है और जो इन दोनो को गौरवशाली बनाने के लिए कुछ करना चाहते हैं। इंटरनेट पर हिंदी से जुड़िये और हिंदी का प्रयोग कीजिए। एक बार हिंदी से जुड़ जाने के बाद उसे अनगढ़ से सुगढ़ बनते देर नहीं लगेगी, ऐसा हमारा विश्वास है।

आपका क्या ख्याल है? हमें जरूर बताइएगा।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)     

शुक्रवार, 23 अगस्त 2013

अब कौन पढ़ाए…?

कोषागार में एक महत्वपूर्ण काम होता है सरकारी सेवा से रिटायर होने वाले कर्मचारियों, अधिकारियों और शिक्षकों इत्यादि को पेंशन का भुगतान करना। जब पहली बार पेंशन की शुरुआत होती है तो इसके लिए संबंधित पेंशनर को स्वयं कोषाधिकारी के समक्ष उपस्थित होना पड़ता है। कोषाधिकारी को पेंशन संबंधी अभिलेखों में दी गयी सूचना और फोटो इत्यादि का सत्यापन उस व्यक्ति से पूछताछ करके करना होता है जो उसकी पहचान से संतुष्ट होने के बाद पेंशन भुगतान करने के आदेश पर हस्ताक्षर करता है। इसके बाद प्रत्येक माह की पहली तारीख को उसकी पेंशन उसके बैंक खाते में ई-पेमेंट की प्रक्रिया से भेज दी जाती है। साल में केवल एक बार नवंबर-दिसंबर में उसे अपने ‘जीवित होने का प्रमाणपत्र’ देने के लिए कोषागार या बैंक में उपस्थित होना पड़ता है। जिस पेंशनर की मृत्यु हो जाती है उसकी सूचना लेकर उसकी पत्‍नी या पति (यदि जीवित हैं) को उपस्थित होना होता है जिनकी पहचान से संतुष्ट होने के बाद उन्हें पारिवारिक पेंशन का भुगतान प्रारंभ हो जाता है।

लगातार एक ही काम करते हुए यह सब इतना यंत्रवत होता रहता है कि मुझे इस काम में बोर हो जाना चाहिए। लेकिन मैं इसमें कभी बोर नहीं होता। कारण यह है कि इस काम को मैं एक विशिष्ट अवसर के रूप में प्रयोग करता हूँ। साठ साल की उम्र में जो लोग मेरे पास आते हैं उनके पास सरकारी काम करने का एक लंबा अनुभव होता है और उनके पास इस जीवन के बारे में अपने-अपने निष्कर्ष होते हैं। पारिवारिक पेंशन के लिए जो वयोवृद्ध महिलाएँ आती हैं उन सबकी आँखों में एक अलग कहानी झाँकती रहती है। कुछेक पुरुष जो अपनी नौकरीशुदा पत्‍नी की मृत्यु के बाद पारिवारिक पेंशन लेने आते हैं उनकी कहानी तो और भी उत्सुकता जगाती है। समय की उपलब्धता और उनकी प्राइवेसी की मर्यादा की रक्षा करते हुए मुझे उनसे बात-चीत करके जो कुछ जानने-समझने का अवसर मिलता है उसे मैं इस नौकरी की बहुत विशिष्ट उपलब्धि मानता हूँ। इन बुजुर्गों से दोस्ती करके एक अलग आनन्द आता है।

आप जानते ही होंगे कि शिक्षकों की सेवानिवृत्ति एक खास नियम के कारण प्रायः जून महीने की समाप्ति पर होती है। शिक्षा सत्र के बीच में चाहे जब भी उनकी सेवानिवृत्ति की आयु पूरी हो जाय उन्हें सत्र के अंत तक अपने विद्यार्थियों को पूरा कोर्स पढ़ाने के बाद सेवा से निवृत्त किया जाता है। इसे “सत्रान्त लाभ” कहते हैं। तो आजकल कोषागार में गुरूजी लोगों की आमद ज्यादा हो गयी है। जून में सेवानिवृत्त होने के बाद उनकी पेंशन का प्राधिकार पत्र सक्षम स्वीकर्ता अधिकारियों द्वारा कोषागार में भेजा जा रहा है और वे अपनी पहचान/ सत्यापन की औपचारिकता पूरी कराने कोषागार में आ रहे हैं।

पहचान के सत्यापन सम्बंधी कुछ वैधानिक प्रश्न पूछने के बाद मैं कुछ अनौपचारिक चर्चा उनके विद्यालय की दशा और दिशा के बारे में भी कर लेता हूँ। education crisisजैसे- आपके विद्यालय में किन-किन विषयों की पढ़ाई होती है। उन विषयों के अध्यापक उपलब्ध हैं कि नहीं? जो लोग रिटायर हो जा रहे हैं उनके स्थान पर नयी भर्तियाँ हो रही हैं कि नहीं? क्या बच्चे रेग्युलर कक्षाओं में पढ़ाई करने आते हैं? परीक्षाओं में नकल पर रोक लग पाती है कि नहीं? कितने प्रतिशत बच्चों में विषय का ज्ञान अर्जित करने की ललक होती है? ऐसे बच्चों को गुरुजन कितना संतुष्ट कर पाते हैं। पहले से अब की शिक्षा व्यवस्था में क्या परिवर्तन आये हैं? बच्चों को अपने स्कूल की कक्षा की पढ़ाई से काम चल जाता है या उन्हें प्राइवेट ट्यूशन करना पड़ता है? आदि-आदि।

इन प्रश्नों का जो उत्तर टुकड़ों-टुकड़ों में मिलता है उसे अपने अनुभवों की गोंद से जोड़ता हूँ तो एक ऐसी तस्वीर उभरती है जिसे देखकर कलेजा बैठ जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों व छोटे-छोटे कस्बों में पसरे इन विद्यालयों में कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाय तो पठन पाठन की दुरवस्था देखकर मन में घोर निराशा पाँव पसारने लगती है। जिनके ऊपर इस दिशा में कुछ कदम उठाने की जिम्मेदारी है उनकी चाल-ढाल देखकर मन में एक डर सा बैठ जाता है – इस समाज की नयी पीढ़ी का भविष्य कैसा होगा?

इस तस्वीर की कुछ बानगी देखिए-

  • स्कूलों में जितने बच्चों का नाम लिखा होता है उसके चौथाई बच्चे ही नियमित स्कूल आकर कक्षाओं में पढ़ने बैठते हैं। इन बच्चों को पढ़ाने के लिए आवश्यक जितने शिक्षकों का मानक निर्धारित है उनसे चौथाई संख्या में ही वास्तव में कक्षा में जाकर पढ़ाते है। इसका कारण लगातार बढ़ती रिक्तियों व शिक्षक समुदाय पर प्रशासनिक नियन्त्रण की कमी से लेकर शिक्षक संघ की राजनीति तक बहुत कुछ है। अब यह अनुमान लगाना कठिन है कि बच्चे कम आते हैं इसलिए शिक्षक कम पढ़ाते हैं या शिक्षक कम पढ़ाते हैं इसलिए बच्चे कम आते हैं।
  • सेवानिवृत्ति के फलस्वरूप जो पद  रिक्त हो जाते हैं उन पदों को समय से भरे जाने की कोई मुकम्मल व्यवस्था नहीं है। निजी प्रबंधतंत्र वाले विद्यालय शिक्षकों के वेतन के लिए  जब सरकारी अनुदान पाने लगते हैं तब स्टाफ की नियुक्ति का अधिकार सरकारी नियन्त्रण में चला जाता है। सरकार द्वारा शिक्षकों की भर्ती के लिए जो चयन-बोर्ड गठित किया गया वह पिछले दो-तीन सालों से कोई चयन की प्रक्रिया पूरी नहीं कर सका है। भ्रष्टाचार और अयोग्यता के दलदल में फँसकर यह प्रक्रिया लगभग दम तोड़ चुकी है। तीन साल पहले जब इस बोर्ड के माध्यम से शिक्षकों का चयन होता भी था तब कोई भी अभ्यर्थी अपनी योग्यता और मेरिट के भरोसे सफल होने की कल्पना नहीं कर पाता था। आवेदन डालने के साथ ही किसी जुगाड़ के फेर में पड़ जाता था। पक्षपात और धाँधली की शिकायतें बढ़ी और असफल अभ्यर्थी कोर्ट जाने लगे। कोर्ट-केस इतने बढ़ गये कि अब नयी भर्ती की प्रक्रिया लगभग बन्द ही हो गयी है।
  • जो अभ्यर्थी येन-केन प्रकार से सफल होकर इन विद्यालयों में पहुँचे उन्हें निजी प्रबन्ध तन्त्र ने अपनी शर्तों पर ज्वाइन कराया; या नहीं ज्वाइन करने दिया। एक शिक्षक ने तो बड़े गर्व से कहा कि मेरे विद्यालय में करीब आधा दर्जन लोग चयन बोर्ड से परवाना लेकर आये लेकिन मेरे मैनेजर साहब इतने मजबूत हैं कि किसी को ज्वाइन नहीं करने दिया। मैंने पूछा- तो फिर पढ़ाता कौन है वहाँ? वे बोले- सब व्यवस्था हो जाती है साहब। मैनेजर साहब ने बहुत लोगों को ‘ऐडहाक’ पर रख लिया है। आज नहीं तो कल वे रेगुलर हो ही जाएंगे। उनके विश्वास को देखकर मुझे वह बहस याद आ गयी जो मैंने अपनी  ट्रेनिंग के दौरान एक माननीय न्यायमूर्ति के साथ कर ली थी-
  • अज्ञानतावश तगड़े आत्मविश्वास का शिकार होकर मैंने हाईकोर्ट के पूर्व अधिवक्ता और तत्कालीन न्यायमूर्ति का लेक्चर सुनते हुए उनसे एक ऐसा तकलीफ़देह प्रश्न पूछ लिया था जिससे अवमानना का दोषी भी होने का खतरा उत्पन्न हो गया था। यह कि किसी निजी प्रबन्धतंत्र द्वारा भ्रष्टाचारी तरीका अपनाकर अनियमित रूप से किसी भाई-भतीजे को शिक्षक के रूप में नियुक्त कर लिया जाता है जिसका अनुमोदन सरकारी अधिकारी द्वारा नहीं किया जा सकता है। लेकिन वह जानबूझकर उसकी नियुक्ति रद्द करने का एक ऐसा आदेश पारित कर देता है  जिसमें पूरा प्रकरण युक्तियुक्त तरीके से उद्धरित नहीं होता है। उस आदेश को प्रबंधतंत्र कोर्ट में चुनौती देता है और माननीय न्यायमूर्तिगण आसानी से अन्तरिम स्थगनादेश (स्टे ऑर्डर) जारी कर देते हैं। कोर्ट का आदेश भले अस्थायी स्थगन का हो लेकिन उसका स्थायी लाभ उन गलत व्यक्तियों को मिल जाता है। मेरा प्रश्न था कि क्या कोर्ट के पास इस गलत कार्य में खुद एक सहयोगी पक्ष (पार्टी) बन जाने से बचने का कोई सूत्र नहीं है? मुझे कोई संतोषजनक उत्तर न तब मिला था न अबतक मिल पाया है। कोर्ट के स्टे के सहारे बहुत से लोग अपने गलत रास्ते पर आगे बढ़ने में सफल हो जाते हैं। अलबत्ता उनकी इस सफलता में कार्यपालिका के जिम्मेदार अधिकारी बड़े सहयोगी की भूमिका निभाते हैं।
  • यह स्थिति तो अशासकीय सहायता प्राप्त माध्यमिक विद्यालयों की थी। प्राथमिक शिक्षा विभाग में शिक्षकों की स्थिति और भयावह है। शिक्षा का अधिकार अधिनियम आ जाने के बाद प्राथमिक शिक्षा को मौलिक अधिकार बना दिया गया लेकिन वास्तविकता के धरातल पर उस अधिकार को जिस प्रकार उपलब्ध कराया जा रहा है वह किसी से छिपा नहीं है। शिक्षकों के जितने पद मानक के अनुसार जरूरी हैं उनमें आधे रिक्त हैं। इनकी भर्ती की प्रक्रिया तीन-चार साल से अटकी पड़ी है।  इसके पीछे भी प्रशासनिक अयोग्यता और भ्रष्टाचार का खेल काम कर रहा है। हम लाखों की संख्या में उपलब्ध योग्यताधारी अभ्यर्थियों में से जरूरी संख्या में प्राथमिक शिक्षकों का चयन कर पाने में असमर्थ हैं। आज स्थिति यह है कि प्रशासनिक अधिकारी नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू करने में घबरा रहे हैं। हाथ खड़े कर देते हैं। जैसे किसी आफ़त को दावत दे रहे हों। काम हो चाहे न हो लेकिन जिसने नियुक्ति का काम हाथ में लिया उसका फँसना तय है। आखिर हमने ऐसी भयावह स्थिति क्यों बन जाने दी है? कौन जिम्मेदार है इसके लिए?
  • राजकीय हाई-स्कूल व इंटर कॉलेजों में भी शिक्षक भर्ती की कमोबेश यही दशा है। राज्य लोक सेवा आयोग में जो उहापोह और अनिर्णय की स्थिति है वह हाल की घटनाओं के बाद सभी जान गये हैं। पूरा डेलिवरी सिस्टम चरमरा गया लगता है।
  • एक संस्कृत महाविद्यालय के सेवानिवृत्त शिक्षक ने तो ऐसी बात बतायी कि मैं सन्न रह गया। बता रहे थे कि वे अपने महाविद्यालय के अंतिम बचे हुए शिक्षक थे जो अब सेवानिवृत्त हो गये हैं। अब वहाँ एक भी शिक्षक नहीं है और प्रबंधतंत्र बहुत खुश है कि अब उसे संस्कृत महाविद्यालय बन्द करके उसके विशाल प्रांगण में निजी पब्लिक स्कूल चलाने की पूरी स्वतंत्रता मिल गयी है। यह व्यवसाय आजकल बहुत लाभकारी हो गया है क्योंकि कोई भी जागरूक गार्जियन अपने बच्चों को सरकारी प्राइमरी स्कूल में भरसक नहीं भेजना चाहता। संस्कृत पाठशालाओं व महाविद्यालयों को सरकारी अनुदान पर चलाने के लिए पिछले जमाने की सरकारों ने जब फैसला किया तब यह नहीं सोचा कि इन शिक्षकों की निरन्तरता कैसी बनायी जाएगी। जो पद खाली हो रहे हैं वे समाप्त होते जा रहे हैं और शनैः शनैः ये सभी विद्यालय भी काल के गाल में समा जाएंगे। जो विद्यालय चल भी रहे हैं उनके पठन-पाठन का स्तर देखकर लगता है कि वे यदि सुधर नहीं सकते तो उनका समाप्त हो जाना ही बेहतर है।
  • एक बार मुझे एक जिले में इन संस्कृत विद्यालयों के निरीक्षण का दायित्व मिला। इनकी दुर्दशा और गुरुजनों की अकर्मण्यता के बारे में जब मैंने खरी-खरी रिपोर्ट बनानी शुरू की तो मुझे समझाया गया कि आप लोग उर्दू मदरसों पर तो ऐसी कड़ाई नहीं करते। वहाँ भी तो किसी विषय की वस्तुनिष्ठ पढ़ाई नहीं होती। वहाँ भी तो नकल कराकर बच्चों को पास कराया जाता है। वहाँ भी तो मुफ़्त में सरकारी अनुदान की बन्दरबाँट होती है। वहाँ तो किसी की हिम्मत नहीं है जो जाँच कर ले। मैंने जब अपने काम से काम रखने पर बल दिया तो मेरे खिलाफ़ एक आन्दोलन सा खड़ा हो गया और उच्च अधिकारियों ने ‘समझदारी से’ बीच-बचाव करके मुझे उस काम से अलग कर दिया।

इन सारी दुर्व्यवस्थाओं के बीच एक आशा की किरण दिखती है तो वह सरकारी तंत्र से अलग निजी क्षेत्र में काम कर रहे कुछेक ऐसे शिक्षण संस्थानों में दिखती है जिन्होंने गुणवत्ता बनाये रखने के तमाम जतन कर रखे हैं। लेकिन उनके ऊँचे तोरण द्वारों के भीतर जाने का सुभीता कितने बच्चों के पास है?

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)