हमारी कोशिश है एक ऐसी दुनिया में रचने बसने की जहाँ सत्य सबका साझा हो; और सभी इसकी अभिव्यक्ति में मित्रवत होकर सकारात्मक संसार की रचना करें।

सोमवार, 23 मार्च 2015

कुछ अच्छा सा कर जाएँ हम

अमर शहीद भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव को याद करते हुए आज एक मेला लगा है, मुंशीगंज- रायबरेली में। वर्ष 1921 के मुंशीगंज गोलीकांड को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के ‘दूसरे जालियाँवाला बाग’ का ऐतिहासिक महत्व प्राप्त है। इन शहीदों के अमर बलिदान के सम्मान में यहाँ सई नदी के तट पर एक भव्य शहीद स्मारक स्थापित है। एक गैर सरकारी संस्था के संयोजन में स्थानीय लोगों द्वारा प्रतिवर्ष २३ मार्च से तीन दिनों का शहीद स्मृति मेला लगता है। शहीदों को पुष्पांजलि, और गणमान्य अतिथियों के उद्‍बोधन के साथ-साथ इस दौरान अनेक सांस्कृतिक कार्यक्रम, खेल-कूद प्रतियोगिताएँ, किसान मेला, प्रदर्शनी, स्वास्थ्य शिविर इत्यादि आयोजित होते हैं। रायबरेली में तैनाती के फलस्वरूप इस वर्ष मुझे भी यहाँ आयोजित कवि-सम्मेलन का रसास्वादन करने का अवसर मिला है।
आज सुबह इसकी तैयारी करते-करते मन में जो कुछ घूम रहा था उसे शब्दों में जोड़ने का अवसर लखनऊ से रायबरेली की यात्रा के दौरान मिल गया (मार्च महीने में कोषागार में कार्याधिक्य की व्यस्तता के कारण ऐसा ही समय ब्लॉगरी और फेसबुक के लिए मिल पाता है)। इस गीत को वहाँ मंच पर सुनाने का मौका मिलेगा ही लेकिन यहाँ अपने ब्लॉग पर इसे और प्रतीक्षा नहीं करा सकता-
कुछ अच्छा सा कर जाएँ हम

रोज़ शिकायत इनकी-उनकी
अस्त-व्यस्त से जन-जीवन की
देख पराये काले धन की
पीड़ा सहलाते निज मन की
इन सब से बाहर आएँ हम
कुछ अच्छा सा कर जाएँ हम।1।



हमने नेक समाज बनाया
इसमें है हम सब की छाया
अंग-अंग जब स्वस्थ रहेगा
तभी निरोग रहेगी काया
अपने हिस्से काम मिला जो
पूरा करें, सँवर जाएँ हम
कुछ अच्छा सा कर
जाएँ हम।2।


बेटा हँसता, बिटिया रोती
वह पढ़ता वो घर को ढोती
अधिकारों में भेदभाव क्यों
क्षमता में तो समता होती
पढ़ें बेटियां, बढ़ें बेटियां
कर दें सिद्ध सुधर जाएँ हम
कुछ अच्छा सा कर जाएँ हम।3।


देशप्रेम से बड़ा प्रेम क्या
राष्ट्रधर्म से बड़ा धर्म क्या
निर्मल स्वच्छ बनायें भारत
इससे सुन्दर और कर्म क्या
नहीं हाथ पर हाथ धरेंगे
कस के कमर उतर जाएँ हम
कुछ अच्छा सा कर जाएँ हम।4।


अपने संविधान को जानें
अधिकारों को हम पहचानें
लोकतंत्र में शक्ति तभी है
जब हम कर्तव्यों को मानें
धर्म-जाति की छुआ-छूत को
तजकर अपने घर जाएँ हम
कुछ अच्छा सा कर जाएँ हम।5।



सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
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गुरुवार, 26 फ़रवरी 2015

अहा ! फरवरी कितनी प्यारी। (गीत)

अहा ! फरवरी कितनी प्यारी।
कड़ी ठण्ड से पीछा छूटा
सर्दी से गठ बंधन टूटा
अब अलाव है नहीं जरूरी
दूर हुई सबकी मज़बूरी
बच्चे अब भरते किलकारी
अहा ! फरवरी कितनी प्यारी।1।
बिस्तर से हट गयी रजाई
हीटर की हो गयी विदाई
कम्बल भी बक्से में सोया
सबने ऊनी स्वेटर धोया
अब सूती कपड़ों की बारी
अहा ! फरवरी कितनी प्यारी।2।
एक सूट खबरों में आया
लाखों जिसका दाम बताया
मचा मीडिया में कोहराम
फिर वो सूट हुआ नीलाम
दाम करोड़ों दें व्यापारी
अहा ! फरवरी कितनी प्यारी।3।
अच्छे दिन वाली सरकार
भरने लगी विजय हुंकार
आम आदमी ने रथ रोका
दिल्ली की जनता ने टोका
दम्भ पड़ गया इसको भारी
अहा ! फरवरी कितनी प्यारी।4।
बढ़ा शादियों का भी जोर
विकट बराती हैं चहुँ ओर
फागुन की मस्ती में झूमें
चाहें नर्तकियों को चूमें
लठ्ठम लठ्ठा गोली बारी
अहा ! फरवरी कितनी प्यारी।5।
बोर्ड परीक्षा शुरू हुई है
शुचिता जिसकी छुई मुई है
अजब नकलची गजब निरीक्षक
सॉल्वर बन बैठे हैं शिक्षक
दस्ता सचल करे बटमारी
अहा ! फरवरी कितनी प्यारी।6।
राजनीति में फँसा बिहार
लालू जी की टपकी लार
संख्या बल में इतनी खूबी
माझी की ही नैया डूबी
फिर नितीश को मिली सवारी
अहा ! फरवरी कितनी प्यारी।7।
संसद में घिरती सरकार
भूमि अधिग्रहण को तैयार
अन्ना जी फिर मंचासीन
धरना में फिर सीएम लीन
छुट्टी पर बेटा-महतारी
अहा ! फरवरी कितनी प्यारी।8।
क्रिकेट कुम्भ आरम्भ हुआ है
सौ करोड़ की यही दुआ है
टीम इंडिया रख ले लाज
बिश्व विजेता हो अंदाज
दिखती है अच्छी तैयारी
अहा ! फरवरी कितनी प्यारी।9।
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी) www.satyarthmitra.com

बुधवार, 21 जनवरी 2015

एक रुबाई एक ग़ज़ल (तरही नशिस्त से)

रुबाई
हर शाख हरी भरी महकते हैं फूल
जो साथ मिले तेरा चहकते हैं फूल 
लहरा जो गयी हवा तेरा आँचल सुर्ख
पाकर के जवाँ अगन दहकते हैं फूल
ग़ज़ल
आज ये हादसा हो गया
प्यार मेरा जुदा हो गया
बंदगी कर न पाया कभी
यार मेरा ख़ुदा हो गया
आप ने तो जिसे छू लिया
वो ही सोना खरा हो गया
सूखता जा रहा था शजर
तुमने देखा हरा हो गया
आदमी ख़्वाब में उड़ रहा
जागना बेमज़ा हो गया
भाइयों की जुदा ज़िन्दगी
दरमियाँ फासला हो गया
गोद में जिसने पाला कभी
आज वो भी ख़फा हो गया
उसकी उंगली पकड़ के चले
बस यही हौसला हो गया
जब सियासत में रक्खा क़दम
देखिये क्या से क्या हो गया
है सियासत बड़ी बेवफ़ा
दोस्त बैरी बड़ा हो गया
राजधानी में छायी किरन
केजरी क्या हवा हो गया

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
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