वन-डे ने जब टेस्ट को, टक्कर में दी मात।
ट्वेन्टी-ट्वेन्टी ने किया, तब आकर उत्पात॥
तब आकर उत्पात मचा, डी.एल.एफ़ कप में।
जुटे धुरंधर देश-देश के नाहक गप में॥
धन-कुबेर इस मेले की रौनक बढ़वाते।
फ़िल्मी तारे आकर टी. आर.पी. चढ़ाते॥
चीयर-लीडर थक गये, नाच-नाच बेहाल।
चौके-छक्के पड़ रहे भज्जी हो गये लाल॥
भज्जी हो गये लाल, दनादन हार गये जब।
जीना हुआ मुहाल, सन्त को मार गये तब॥
सुन सत्यार्थमित्र, ये खेल है गज़ब निराला।
भाई के हाथों भाई को पिटवा डाला॥
बनारसी आलू पापड़ – जब बनारस की गलियों ने एक ब्रांड गढ़ा
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एक अख़बार में लिपटे पापड़ से शुरू हुई खोज मुझे बाबूसराय की दुकान से बनारस
के कबीर चौरा की गलियों तक ले गई। कुछ दिन पहले अमेज़न पर बनारसी आलू पापड़
खोज रहा ...
10 घंटे पहले


क्या बात है।
जवाब देंहटाएंबहुत खूब.
जवाब देंहटाएंबहुत खूब...वाह!
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