आज रविवार को माँ शाकुंभरी विश्वविद्यालय परिसर में सन्नाटा पसरा रहा। छुट्टी के दिन मैं अकेला ही था। अपने आवास में बिस्तर पर लेटा हुआ लखनऊ से किसी समाचार की प्रतीक्षा में था। हाथ में टीवी का रिमोट लेकर ओटीटी पर विचरण करता रहा। आज मध्यरात्रि को स्थानांतरण की समय सीमा भी समाप्त हो रही है। कल शायद कोई आदेश मिल जाय। इस परिसर में मेरे लिए कुछ ही दिन शेष बचे हैं। सूरज ढल गया तो घर से बाहर निकला।
आज शाम को परिसर में अकेले टहलते हुए मुझे एक मोहपाश में बंध
जाने की अनुभूति हुई। स्वच्छ वातावरण, प्रदूषण रहित भरपूर ऑक्सीजन, नवरोपित पेड़-पौधों
की हरियाली में खिलखिलाता उनका बचपन, भीड़भाड़ से बिल्कुल अछूता यह प्रांगण कुछ ही दिनों
में मेरे लिए दुर्लभ हो जाएगा। सबकुछ बहुत याद आएगा।
जब मैंने यहाँ ज्वाइन किया था तो यहां के भवनों की नींव खोदी जा रही थी। लगभग चार साल बाद आज इस परिसर ने एक मोहक छवि प्राप्त कर ली है। प्रशासनिक और अकादमिक भवन, कुलपति आवास के साथ टाइप 5, 4, 3 के आवास बन गए हैं और प्रायः बस भी गये हैं। पक्की सड़कों के किनारे स्ट्रीट लाइट, सोलर लाइट और हाईमास्ट लाइट की सीधी पंक्तियां सूर्यास्त के समय यहां की स्काईलाइन को बेहद आकर्षक रूप दे रही हैं। इसे शब्दों में वर्णन करना कठिन है। आप आज की ताजा तस्वीरों का आनंद लीजिए।























कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
आपकी टिप्पणी हमारे लिए लेखकीय ऊर्जा का स्रोत है। कृपया सार्थक संवाद कायम रखें... सादर!(सिद्धार्थ)