वन-डे ने जब टेस्ट को, टक्कर में दी मात।
ट्वेन्टी-ट्वेन्टी ने किया, तब आकर उत्पात॥
तब आकर उत्पात मचा, डी.एल.एफ़ कप में।
जुटे धुरंधर देश-देश के नाहक गप में॥
धन-कुबेर इस मेले की रौनक बढ़वाते।
फ़िल्मी तारे आकर टी. आर.पी. चढ़ाते॥
चीयर-लीडर थक गये, नाच-नाच बेहाल।
चौके-छक्के पड़ रहे भज्जी हो गये लाल॥
भज्जी हो गये लाल, दनादन हार गये जब।
जीना हुआ मुहाल, सन्त को मार गये तब॥
सुन सत्यार्थमित्र, ये खेल है गज़ब निराला।
भाई के हाथों भाई को पिटवा डाला॥
एक बार फिर से दीपावली पर चौपाल सजाने की इच्छा हो रही है। रचनाओं की दीपक जला
कर अमावस के अँधेरे को मिटाने की चाह मन में है।
-
इस बार जैसे यहाँ लौटने में सदियाँ ही बीत गयी हैं। पिछला तरही मुशायरा 2025
की होली पर आयोजित होना था, उसके लिए मिसरा दिया जा चुका था। ग़ज़लें भी
प्राप्त ह...
1 हफ़्ते पहले


क्या बात है।
जवाब देंहटाएंबहुत खूब.
जवाब देंहटाएंबहुत खूब...वाह!
जवाब देंहटाएं