हमारी कोशिश है एक ऐसी दुनिया में रचने बसने की जहाँ सत्य सबका साझा हो; और सभी इसकी अभिव्यक्ति में मित्रवत होकर सकारात्मक संसार की रचना करें।

बुधवार, 30 अप्रैल 2014

सोलहवें का सुरूर…

16th year आज सोलहवीं लोकसभा के लिए वोट डाल कर आया हूँ। चुनावी ड्यूटी की जिम्मेदारी थी इसलिए रायबरेली में बना रहना अनिवार्य था। वर्ना आज लखनऊ जरूर जाता। इसलिए कि आज उस घड़ी को याद करने का दिन भी है जब मेरे जीवन में युगान्तकारी परिवर्तन की शुरुआत हुई; जब मेरे मन पर और मेरी इच्छाओं पर स्थायी लगाम लगाने की ठोस व्यवस्था सुनिश्चित कर दी गयी थी। जी हाँ, आपने ठीक समझा। इसी तारीख को मेरी शादी हुई थी। पन्द्रह साल पहले। आज से मैं दांपत्य जीवन के सोलहवें साल में प्रवेश कर रहा हूँ।

मैं इस सालगिरह को चुनाव की भेंट चढ़ाने का दोष लेकर कैसे रह जाता…! इसलिए मैंने लखनऊ से श्रीमती जी और बच्चों को रायबरेली बुला लिया। एक तरफ़ नौकरी और दूसरी तरफ़ बच्चों की शिक्षा की जरूरतों को एक साथ साधने के लिए और साथ ही एक-दूसरे का साथ पाने के लिए हम दोनो के लिए लखनऊ और रायबरेली की दूरी नापते रहने की मजबूरी साथ लग गयी है। कुछ वैसे ही जैसे केन्द्र में सरकार चलाने के लिए दूसरे दलों से गठबंधन करने की मजबूरी होती है। इस मजबूरी की आगे भी जारी रहने की संभावना है, अगली सरकार की ही तरह। अपनी शादी के सोलहवें साल के बारे में सोचते-सोचते मुझे सोलहवी लोकसभा का ध्यान आ जाता है और कभी इसका उल्टा भी।

इस चुनाव के बाद ज्यादा संभावना यही है कि सत्ता की सेज पर जमे रहने के लिए सबसे बड़े दल को छोटे-छोटे दूसरे दलों के साथ गठबंधन करना पड़ेगा, उनके नखरे उठाने पड़ेंगे, अपना मैनीफेस्टो ताख पर रखकर उनके साथ न्यूनतम साझा कार्यक्रम तय करना पड़ेगा; और रोज-ब-रोज उनके मूड का ख्याल रखना पड़ेगा। ना जाने कौन सी बात उन्हें नागवार लगे और बिदककर समर्थन वापस ले लें। एक मदारी की तरह हाथ में लोकलुभावन घोषणाओं का बाँस लेकर संतुलन बनाते हुए आसमान में तनी हुई सत्ता की रस्सी पर चलना होगा। सारा ध्यान बस इसपर कि इस छोर से उस छोर तक सकुशल पहुँच सके।

शादी की सत्ता भी कुछ ऐसा ही कौशल मांगती है। यह भी ऐसा ही गठबंधन है कि अपनी छोड़ अपने पार्टनर के बारे में ज्यादा सोचना पड़ता है, सोलहवाँ साल आते-आते तो कुनबा बढ़कर ऐसा हो जाता है कि आप पूरी तरह अल्पमत में आ जाते हैं। आप की कोई नहीं सुनता और आपको सबकी सुननी पड़ती है। बच्चों से लेकर बड़े-बूढ़ों तक जो जैसा कहे आपको वैसा ही करना पड़ता है। बिल्कुल यूपीए-टू की तरह।  अभी एक मित्र ने फेसबुक पर स्टेटस डाला कि शादी के पहले तो सभी केजरीवाल होते हैं लेकिन बाद में मनमोहन बन जाना पड़ता है। ठीक ही कहा है, कमोबेश सबका अनुभव ऐसा ही होता होगा।

जीवन के सोलहवें साल का जो सुरूर होता है वह शादी के सोलहवें साल में शीर्षासन करता दीखता है। वह उमंग, वह उत्साह, वह क्रान्ति कर डालने का जज़्बा, कुछ भी कर डालने की ऊर्जा का एहसास लेकर जब सोलह साल की उम्र में हम स्कूल से कॉलेज पहुँचते हैं और अपने करियर की जद्दोजहद के बाद नौकरी और शादी का पायदान छू लेते हैं तो जीवन एक उत्सव लगने लगता है।

इस उत्सव को और आगे तक ले जाने के लिए हमें एक साथी मिलता है, जीवन भर साथ निभाने को। ऐसी घड़ी को याद करने और अच्छा महसूस करने का समय तो निकालना ही चाहिए। छोटी-छोटी खुशियों को सहेजकर ही हम जीवन में उमंग और उत्साह को बनाये रख सकते हैं और शादी की सत्ता का स्वाद लंबे समय तक ले सकते हैं। सोलहवें के सुरूर को जो जितनी दूर तक खींच कर ले जा सके वह उतना ही धन्य है। इष्टमित्रों व रिश्तेदारों की शुभकामनाएँ भी तो इसी लिए हैं।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
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शुक्रवार, 18 अप्रैल 2014

वृक्ष और बालक

child-climbing-treeबहुत पुरानी बात है। गाँव में एक विशाल आम का पेड़ था। बहुत घना और छायादार जो गर्मियों में फल से लदा रहता था। उसमें फलने वाले छोटे-छोटे देसी (बिज्जू) आम जो पकने पर पूरी तरह पीले हो जाते थे बहुत मीठे और स्वादिष्ट थे। निरापद इतने कि चाहे जितना खा लो नुकसान नहीं करते थे।

एक छोटा बच्चा उस पेड़ को बहुत पसंद करता था। वह रोज आकर उसके नीचे खेलता, उसके ऊपर तक चढ़ जाता, आम तोड़कर खाता और उसकी ठंडी छाँव में सोकर आराम करता। उसे पेड़ से बहुत प्यार था और पेड़ को भी उससे बहुत लगाव हो गया था।

कुछ साल बीत गये। बच्चा अब कुछ बड़ा हो गया था। अब वह पेड़ के नीचे खेलने नहीं आता था। पेड़ भी उसके दूर हो जाने से उदास रहता था। एक दिन  वह लड़का अचानक पेड़ के पास आया और बहुत बुझा-बुझा लग रहा था।

पेड़ ने उसे देखा तो बहुत खुश हुआ, चहककर बोला- “आओ-आओ, मेरे साथ खेलो।”

बच्चे ने जवाब दिया - “मैं अब छोटा बच्चा नहीं रहा जो पेड़ के आस-पास खेलता रहूँ। अब मुझे खेलने के लिए अच्छे खिलौने चाहिए। उसके लिए रूपयों की जरूरत पड़ती है और मेरे पास रूपये हैं ही नहीं...!”

पेड़ सोच में पड़ गया, फिर बोला, “ओह! लेकिन मेरे पास तो रूपये हैं नहीं जो तुम्हें दे सकूँ। अलबत्ता तुम मेरे सारे आम तोड़ सकते हो और उन्हें बाजार में बेच सकते हो। इससे तुम्हें रूपये मिल जाएंगे।”

यह सुनकर बच्चा खुशी से उछल पड़ा। उसने फौरन पेड़ के सारे आम तोड़ डाले और उन्हें लेकर बाजार की ओर चल पड़ा। उसके बाद लड़का फिर नहीं लौटा। पेड़ फिर से उदास रहने लगा।

कुछ साल बाद वही लड़का जो अब बड़ा होकर एक युवा आदमी बन चुका था, पेड़ के पास लौटकर आया। उसे देखकर पेड़ बहुत खुश हुआ। बोला- “आओ-आओ, मेरे साथ जी भरकर खेलो।”

“मेरे पास अब खेलने का समय नहीं है। मुझे अपने परिवार के पालन-पोषण के लिए काम करना पड़ता है। बहुत व्यस्त रहता हूँ। अभी हमें रहने के लिए एक घर बनाना है। क्या तुम इसमें हमारी कोई मदद कर सकते हो?”

पेड़ फिर सोच में पड़ गया और बोला, “ओह! लेकिन मेरे पास तो रूपये हैं नहीं जो तुम्हें दे सकूँ। अलबत्ता तुम मेरी शाखाओं को काटकर अपने घर के काम में ला सकते हो।”

युवक के मन की मुराद पूरी हो गयी। उसने बिना देर किये पेड़ की मोटी-मोटी शाखाओं को काट डाला और उन्हें ट्रक में लादकर ले गया। जाते समय युवक बहुत प्रसन्न था और पेड़ भी उसकी खुशी देखकर मुस्करा रहा था। युवक उसके बाद फिर कई साल तक नहीं लौटा। पेड़ अकेला उदास रहते हुए उसकी बाट जोहता रहता।

एक दिन भीषण गर्मी के दिन वह आदमी अचानक दिखायी पड़ा। पेड़ इतने सालों बाद उसे देखकर बहुत प्रसन्न हुआ।

“आओ-आओ, मेरे साथ खेलो।” पेड़ ने मुस्कराकर आमंत्रण दिया।

“नहीं-नहीं, अब मेरी वो उम्र नहीं रही। अब तो मैं देश भर की सैर करना चाहता हूँ। दुनिया देखना चाहता हूँ। छुट्टियों में घूमना चाहता हूँ। हाँ, इसके लिए मुझे एक नाव की जरूरत है। क्या तुम मेरी कोई सहायता कर सकते हो?” उस आदमी ने बेहद अनौपचारिक ढंग से कहा।

“हाँ-हाँ, क्यों नहीं। नाव बनाने के लिए तुम मेरे तने का प्रयोग कर सकते हो। इसमें इतनी लकड़ी निकल आएगी कि तुम्हारी नाव तैयार हो जाय। इससे तुम दूर-दूर तक घूमना और खुश रहना।” पेड़ ने उत्साह पूर्वक कहा।

इतना सुनकर आदमी ने मजदूर बुलाये और पेड़ का मोटा तना काटकर ले गया। उसने बड़ी सी नाव बनवायी और सैर पर निकल गया। कई साल तक उसका पता नहीं चला। कट चुके तने के बाद बेहाल पेड़ वहीं पड़ा रहा।

अन्त में कई साल बाद वह आदमी फिर एक दिन वहाँ लौटा। थका-हारा उदास चेहरा लेकर।

“ओह! मेरे बच्चे, लेकिन अब तो मेरे पास कुछ भी नहीं बचा है जो तुम्हें दे सकूँ। अब तो आम भी नहीं हैं।” पेड़ उसे देखते ही दुखी होकर बोला।

“कोई बात नहीं।” उस प्रौढ़ आदमी न कहा, “वैसे भी अब आम खाने लायक मैं नहीं रह गया हूँ। दाँत भी टूट चुके हैं और मधुमेह का रोगी अलग से हो गया हूँ।”

पेड़ बोला, “मेरा तो तना भी नहीं बच रहा और न ही शाखाएँ जिनपर तुम चढ़ सको।”

“वे होतीं तब भी मैं कैसे चढ़ पाता? अब बूढ़ा जो हो गया हूँ।” आदमी ने कैफ़ियत दी।

पेड़ रो रहा था। बोला- “असल में अब तुम्हें देने को मेरे पास कुछ भी नहीं बचा है। क्या करूँ अब? अब तो केवल ये जड़ें बची हैं; ये भी धीरे-धीरे सूख रही हैं।”

“मुझे आपसे अब कुछ चाहिए भी नहीं। बस आराम करने के लिए एक शान्त स्थान चाहिए। मैं भी इतने सालों की भाग-दौड़ में थक गया हूँ।” आदमी ने जवाब दिया।

“तब तो बहुत अच्छा है, पुराने पेड़ की मोटी जड़ टेक लेकर आराम करने के लिए बहुत सुविधाजनक होती है। आओ, मेरे पास बैठो और आराम करो।” आदमी वहाँ टेक लेकर बैठा तो बूढ़ा पेड़ प्रसन्न होकर मुस्कराने लगा। खुशी के आँसू छलक पड़े।child-and-tree1

***

यह कहानी यहीं खत्म होती है। लेकिन हमारे समाज में यह कहानी रोज दुहरायी जाती है। यह कहानी हम सबकी है। यह पेड़ हमारे माता-पिता ही तो हैं। बचपन में हमें उनकी गोद में खेलना अच्छा लगता है। जब हम बड़े हो जाते हैं तो उन्हें छोड़कर चले जाते हैं। जब हमें उनसे कुछ चाहिए होता है तभी लौटते हैं; या जब कोई संकट आता है। इसके बावजूद माता-पिता हमारे लिए, हमारी खुशियों के लिए हमेशा हाजिर रहते हैं; अपना सबकुछ सौंप देने को तैयार ताकि हम खुश रह सकें।

आप सोच सकते हैं कि इस कहानी में उस बच्चे ने उस पेड़ के साथ बहुत निर्दयता की; लेकिन हम भी शायद अपने माता-पिता के साथ कुछ ऐसा ही करते हैं। हम यह मानकर चलते हैं कि यह तो उनका काम ही है। वे हमारे लिए जो भी करते हैं उसका सम्मान करना, उसका महत्व समझना और उसे अपने व्यवहार से व्यक्त करना हम भूल जाते हैं। जब इसकी याद आती है तबतक बहुत देर हो चुकी होती है।

जिनके माता-पिता साथ हैं उन्हें इस अनमोल सौभाग्य के लिए ईश्वर को धन्यवाद देना चाहिए और श्रद्धा पूर्वक सेवा से उनको तमाम खुशियाँ देनी चाहिए। ऐसा न हो कि हमें उनका महत्व तब पता चले है जब वे हमें छोड़कर चले जाएँ।

(अनूदित)

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
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सोमवार, 31 मार्च 2014

वोट नहीं डालोगे तो लानत है तुमपर

  आगामी लोकसभा चुनावों की सबसे उत्साहजनक तस्वीर यह होने जा रही है कि इस बार वोट देने वालों की संख्या अबतक की सर्वाधिक होगी। जनसंख्या वृद्धि इसका एक कारण तो है ही लेकिन मैं जिस वृद्धि की बात कर रहा हूँ वह मतदान प्रतिशत की है; जो इस बार पिछले सारे रिकार्ड तोड़ने वाला है।

SVEEP Poster1अभी तक होता यह रहा है कि मतदाता सूची में जितने लोगों का नाम होता था उसमें से आधे से कुछ ही अधिक लोग वोट डालते थे, शेष या तो उस स्थान पर रहते ही नहीं थे या रहते हुए भी वोट डालना बेकार का काम समझते थे। इसका कुफल यह हुआ कि राजनीतिक दलों ने अपनी जीट के लिए पन्द्रह से बीस प्रतिशत मतदाताओं को खुश करने के आसान फॉर्मूले खोजने शुरू कर दिए। जाति और धर्म के आधार पर गोलबन्दी होने लगी, अगड़े-पिछड़े-दलित-अल्पसंख्यक वर्ग के लोग अपनी जातीय या सांप्रदायिक पहचान के आधार पर एकजुट होकर अपने को एक वोटबैंक के रूप में देखने लगे और प्रत्याशियों को चुनने के लिए उनकी जातीय या सांप्रदायिक पहचान को अपने मत का आधार बनाने लगे।

इसका परिणाम यह हुआ कि संकीर्ण क्षेत्रीयता और जातीयता का पोषण करने वाली पार्टियों को चुनावों में सफलता मिलने लगी और सत्ता मिलने के साथ ही एक नये प्रभु वर्ग का उदय हो गया जिसके बारे में घोटालों और भ्रष्टाचार की खबरे ज्यादा और जनहित के लिए काम करने की बातें कम सुनायी देती रहीं। हमारी चुनावी पद्धति ऐसी है कि प्रत्याशी को जीत के लिए आधे वोटों की भी जरूरत नहीं पड़ती इसलिए वह सच्चे बहुमत के बारे में सोचने की जरूरत ही नही समझता।

SVEEP Posterभारत के चुनाव आयोग ने ठीक ही अपना कर्तव्य समझा कि सच्चे अर्थों में लोकतंत्र तभी स्थापित होगा जब वास्तव में बहुमत से चुने हुए प्रतिनिधि देश की संसद और विधान सभाओं में जायें। इसके लिए एक सुविचारित रणनीति बनायी गयी है। यह एक कोशिश है देश की जनता को जगाने की, यह समझाने की कि वोट देना कितना जरूरी है। देश के प्रत्येक वयस्क नागरिक को यह कर्तव्यबोध कराने की कि दुनिया का तथाकथित सबसे बड़ा लोकतंत्र असफल हो जाएगा यदि देश की जनता के आलस्य और उदासीनता के कारण दोयम दर्जे के नेता देश की बागडोर सम्हालते रहेंगे।

इस अभियान की सफलता के लिए युद्ध स्तर पर प्रयास किये गये हैं। यह सुनिश्चित किया जाना है कि देश का संविधान जिस व्यक्ति को वोट देने का अधिकार देता है वह इस अधिकार का प्रयोग भी जरूर करे। इस अभियान को नाम दिया गया है– स्वीप; अर्थात्‌ Systematic Voters’ Education and Electoral Participation (SVEEP).

चुनाव आयोग ने यह महसूस किया कि देश की जनता को उसके मताधिकार के प्रति जागरूक करना जितना जरूरी है उससे ज्यादा जरूरी यह है कि वोट डालने की राह में आने वाली उन सभी बाधाओं को दूर किया जाय जो जागरूक वोटर को भी पोलिंग बूथ तक जाने से रोकती हैं।

देश के एक आम नागरिक को मतदाता के रूप में जो ज्ञान रखना चाहिए और वह वास्तव में जितना जानता है  इन दोनो में बड़ा अन्तर है। इस अन्तर को पाटने के लिए आयोग ने गंभीर प्रयास किये हैं। मतदाता पंजीकरण कैसे होगा, फोटोयुक्त मतदाता पहचान पत्र (EPIC) कैसे बनेगा, दूसरे पहचान-पत्र क्या हो सकते है, आपका मतदान केन्द्र कहाँ है, बूथ कौन सा है, ई.वी.एम. का प्रयोग कैसे करना है, चुनाव के दिन क्या करना है और क्या नहीं करना है, प्रत्याशी के लिए आदर्श आचार संहिता क्या है, धन-बल का प्रयोग करने वालों की क्या दवा है, समाज के कमजोर और असहाय तबकों का चुनाव के दौरान भयादोहन कैसे किया जा सकता है, और इसे रोकने  क्या उपाय हैं; इन सभी प्रश्नों का समुचित उत्तर बताने के लिए चुनाव आयोग ने बाकायदा एक कार्य योजना बनाकर जिम्मेदार अधिकारियों की फौज इसके क्रियान्वयन के लिए लगा रखी है।

आयोग ने कम मतदान प्रतिशत के लिए मोटे तौर पर जिन कारणों की पहचान की है वे हैं- त्रुटिपूर्ण व अधूरी मतदाता सूची, शहरी वर्ग की उदासीनता, लैंगिक विभेद, युवाओं की बेपरवाही इत्यादि। इनके निवारण के लिए मतदाताओं को शिक्षित करने, जागरूक करने और चुनाव संबंधी प्रशासनिक तंत्र को दक्ष बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाये गये हैं।

SVEEP Poster2 मतदाता सूची में अनेक फर्जी और गैरहाजिर लोगों के नाम भरे रहते थे जिन्हें गहन समीक्षा करते हुए निकाल दिया जा रहा है, घर से बाहर रहकर रोजी-रोटी कमाने वालों या सरकारी नौकरी करने वालों का नाम गाँव की सूची से निकालकर उनके सामान्य निवास के स्थान पर जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। ऑनलाइन पंजीकरण की सुविधा तो है ही, सभी बूथॊं के लिए स्थानीय रूप से उपलब्ध एक-एक समर्पित कर्मचारी (BLO) की नियुक्ति करके उसे जिम्मेदारी दी गयी है कि वह उस बूथ से संबंधित मुहल्लों में घर-घर जाकर वैध मतदाताओं की सूची तैयार करेगा, उनके पंजीकरण का फॉर्म भरवाएगा, जो मर चुके हैं या कहीं बाहर चले गये हैं उनका नाम सूची से हटवाएगा और वैध व सच्ची मतदाता सूची तैयार करेगा। इस प्रकार तैयार की गयी अद्यतन सूची की प्रतियाँ बूथ के नोटिस बोर्ड पर लगायी जाएंगी, मतदाताओं की चौपाल लगाकर मतदाता सूची को त्रुटिरहित बनाया जाएगा।

सभी मतदाताओं का फोटोयुक्त पहचानपत्र तैयार कराकर घर-घर ले जाकर प्राप्त कराने तक की जिम्मेदारी इस बी.एल.ओ. को दी गयी है। अपने बूथ के प्रायः सभी मतदाताओं को यह व्यक्तिगत रूप से पहचान सकेगा। मतदान के दिन से तीन-चार दिन पहले ही सभी मतदाताओं को वोटर-पर्ची बनाकर उनके घर पर दे आने का जिम्मा भी यह कर्मचारी उठाएगा। अब पार्टियों की स्टॉल लगाकर पर्ची बाँटने के काम से छुट्टी कर दी गयी है।

लाखों की संख्या में जो सरकारी कर्मचारी, पुलिस और अर्द्ध सैनिक बलों के लोग चुनाव की ड्यूटी होने के कारण अपना वोट नहीं डाल पाते थे उनका वोट भी हर हाल में डलवाने की व्यवस्था कर ली गयी है। पोस्टल बैलेट से लेकर ड्यूटी वाले बूथ पर ही उनका वोट डलवाने के विकल्प खोले गये हैं। यह अभियान ‘पल्स पोलियो अभियान’ या ‘सर्व शिक्षा अभियान’ की याद दिलाता है जिसका नारा है- “एक भी बच्चा छूटने न पाये।” चुनाव आयोग भी चाह रहा है कि “एक भी वोटर छूटने न पाये।”

चुनाव आयोग मानो कह रहा है कि हे वोटर महोदय, इतनी कृपा कीजिए कि बूथ तक पहुँचकर अपना वोट डाल दीजिए। लोकतंत्र के मंदिर में वोटर को भगवान बनाने की यह मुहीम रंग लाने वाली है। प्रिन्ट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में, बौद्धिक सेमिनारों में और गाँव-गाँव की गली-गली तक इस संदेश को पहुँचाने की पुरजोर कोशिश की जा रही है। यह सब देखकर बस यही कहने का मन करता है कि इसके बावजूद यदि आप अपने मताधिकार का प्रयोग नहीं करते हैं तो लानत है।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

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