ब्लॉगरों को सेमिनार करने की जरूरत क्या है?
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा ने जब पहली बार हिंदी ब्लॉगिंग को लेकर एक राष्ट्रीय सेमिनार “चिठ्ठाकारी की दुनिया” इलाहाबाद में कराया तो इसे अपनी तरह का पहला कार्यक्रम माना गया। इसे एक मील का पत्थर मानने वालों में दिल्ली के विनीत कुमार भी थे जिन्होंने न सिर्फ़ इसमें प्रतिभाग करते हुए खुलकर अपनी बात रखी थी बल्कि अपनी रिपोर्टों द्वारा इसे इंटरनेट पर खूब प्रचारित भी किया था। मीडिया विषयों पर विशद लेखन करने वाले विनीत आजकल इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में भी पैनेलिस्ट के रूप में दिख जाते हैं। उनकी हुंकार तो आप ब्लॉगरी करते हुए पढ़ते ही होंगे।
अनूप शुक्ल ने इलाहाबाद से लौटकर जो पोस्ट लिखी थी उसमें विनीत की चर्चा इस प्रकार थी-
इस संगोष्ठी में विनीत कुमार से मिलने का मौका मिला। विनीत का काम के प्रति अद्भुत समर्पण देखकर मन खुश हो गया। विनीत ने अपने ब्लाग पर अपनी झांसे वाली फोटो लगा रखी है। सामने से देखने में वो कहीं बेहतर दिखते हैं। ब्लाग वाली उड़ी-उड़ी फ़ोटो बनवाने के लिये बहुत मेहनत करनी पड़ी होगी उनको। अगर किसी को इलाहाबाद में क्या हुआ वह बिना नमक मिर्च के जानना हो तो विनीत की ये और ये वाली पोस्ट देखे।
मैंने आगामी सेमिनार के लिए जब उनसे चर्चा की तो पहले उन्होंने व्यस्तता के बहाने टालना चाहा; लेकिन जब मैंने सप्ताहान्त में एक-दो दिन का समय निकालने की संभावना की ओर इशारा किया तो वे असलियत पर आ गये। बोले- सर, सही बात यह है कि मैं इस प्रकार के ब्लॉगर सम्मेलन के सख़्त खिलाफ हूँ। यह पैसे की फ़िजूलखर्ची तो है ही इससे कोई लाभ भी नहीं होता। मैं समझता हूँ कि वर्चुअल दुनिया में लिखने-पढ़ने वाले भौतिक रूप से एक-दूसरे को न मिलें तो ही अच्छा है।
मैंने टोका- विनीत जी, आपकी बात अपनी जगह सही हो सकती है। लेकिन आपको यह कैसे लगा कि वर्धा में जो होना प्रस्तावित है वह ब्लॉगर “सम्मेलन” है? मेरे ख़्याल से “सम्मेलन” और “सेमिनार (विचारगोष्ठी)” में अन्तर है। यहाँ तो हिंदी ब्लॉगिंग और सोशल मीडिया से जुड़े कुछ मुद्दों पर विचार-मंथन होना है। यह कोई चाय-पार्टी या प्रीतिभोज नहीं है जिसमें ब्लॉग लिखने वाले सभी ऐरे-गैरे को बुलाकर इन्ज्वॉय कराना है। अलबत्ता जिस विषय को केन्द्र में रखा गया है उसके बारे में अच्छी जानकारी रखने वाले लोग अन्य तमाम पेशों से जुड़े होने के साथ-साथ ब्लॉगर भी हैं इसलिए ऐसा महसूस हो सकता है कि यह केवल ब्लॉगरों का जुटान है।
-नहीं सर, मैं तो यह कह रहा हूँ कि जो भी बहस की जानी है वह वर्चुअल स्पेस में ही आसानी से हो सकती है और होती ही रहती है। इसके लिए अलग से सेमिनार कराने की क्या जरूरत है। मेरा विरोध तो इस बात से है।
-जरूरत उनके लिए हैं जो इस वर्चुअल स्पेस (आभासी दुनिया) का प्रयोग करने में आपकी तरह सिद्धहस्त नहीं हैं। बहुत से पढ़े-लिखे लोग इसमें अच्छा कर सकते हैं लेकिन उन्हें कोई सूत्र नहीं मिल रहा है। आपने जब ब्लॉगरी शुरू की होगी (2007) उस समय बहुत कम लोग हिंदी में ब्लॉग लिख रहे थे। लगभग सभी एक दूसरे को जान जाते थे और एक दूसरे के ब्लॉग का लिंक अपने ब्लॉग पर रखते थे। नये लोगों को ब्लॉगवाणी और चिठ्ठाजगत जैसे ब्लॉग एग्रीगेटर्स के सहारे दूसरे ब्लॉगर्स तक पहुँचने का रास्ता मिल जाता था। इनके बन्द हो जाने के बाद अब सबकुछ इतना आसान नहीं रहा। संभव है आज बहुत से नये ब्लॉगर्स हमसे-आपसे बहुत अच्छा लिख रहे हों या लिख सकते हों; लेकिन उनके बारे में हम जान ही नहीं पाते हैं। दूसरी ओर फेसबुक और ट्विटर की तेज रफ़्तार दुनिया में मची भागमभाग ने भी हिंदी ब्लॉगिंग को पीछे कर दिया है। हमें तो यह सोचना है कि इस तेजधारा के बीच खड़ी हिंदी ब्लॉगिंग जमी रह सकने की स्थिति में है या इस बाढ़ में बह जाएगी।
-सर, तो इसे आप कैसे रोक पाएंगे? फेसबुक पर जो सुविधाएँ है या ट्विटर में जो आकर्षण है वह ब्लॉग में कैसे पैदा कर पाएंगे? इसे तो इनके हाल पर ही छोड़ देना होगा। कोई यह सोच भी कैसे सकता है कि इंटरनेट प्रयोग करने वालों की पसन्द बदली जा सकती है? या उनके ऊपर कोई अनुशासन थोपा जा सकता है?
-नहीं-नहीं, मैं या कोई भी ऐसा नहीं सोच सकता। मैं तो यह कहना चाह रहा हूँ कि ब्लॉग, फेसबुक और ट्विटर का डोमेन बिल्कुल अलग-अलग है। आप बताइए, किसी फेसबुक स्टेटस की सक्रिय आयु कितनी होती है या एक ट्वीट कितने मिनट तक ताजा रहता है? दो-चार मिनट से लेकर अधिकतम चौबीस घंटे तक ही न! आप कितनी बार अपने पुराने स्टेटस या ट्वीट को देखना चाहते हैं? दूसरे लोग कितनी रुचि रखते हैं इसमें? इसमें कितना कुछ सहेज कर रखने लायक होता है? एक अखबार की तरह यह एक बार पढ़ लिये जाने के बाद रद्दी नहीं बन जाता? लेकिन ब्लॉग का स्वरूप तो इससे अलग है। इसका आर्काइव कभी भी निराश नहीं करता। इसमें वह बदहवास भागमभाग नहीं है। फास्ट-फूड कल्चर का जो प्रभाव फेसबुक और ट्विटर में दिखता है वह ब्लॉग पर नहीं है। ये तीनो एक-दूसरे के प्रतिस्पर्धी नहीं हैं बल्कि इस आभासी दुनिया में इन तीनों के एक दूसरे के समानान्तर चलने भर का स्पेस मौजूद है।
-यह बात तो ठीक है। सहमत हूँ इससे। आपको मैं कुछ साल पहले ज्ञानोदय में छपा अपना एक लंबा आलेख भेजूंगा जिसमें मैंने हिंदी ब्लॉगिंग के प्रति लोगों के बदलते नज़रिए के बारे में लिखा था। पारंपरिक रूप से हिंदी भाषा और साहित्य को अपनी मिल्कियत समझने वाले तथाकथित कालजयी साहित्यकार और समालोचक जब इस नये माध्यम को मार्गदर्शन देने की मुद्रा बनाते हैं तो मुझे बहुत खराब लगता है। कल तक जो इसे कूड़ा-कचरा कहते रहते थे वे आज खुद ही यहाँ आने और चर्चित होने की जुगत भिड़ा रहे हैं। सबने अपने पेज बना लिए हैं और यहाँ सक्रियता दिखा रहे हैं। मैं इस लिए किसी साहित्यिक संस्था द्वारा इस माध्यम को हाईजैक करने का विरोधी हूँ।
-तो भाई मेरे, जब आप जैसे लोग अपनी बात रखने के बजाय ऐसे मौकों से किनारा करते रहेंगे तो उस जगह को भरने के लिए कोई तो आएगा। मैं तो चाहता हूँ कि आप अपने रैडिकल विचार यहाँ रखें और एक गंभीर बहस की शुरुआत हो। एक दूसरा पहलू यह भी है कि हिंदी भाषा-भाषी बहुत से लोग जो कंप्यूटर और इंटरनेट के संपर्क में हैं और फेसबुक/ ट्विटर पर बाइट बढ़ा रहे हैं वे रोमन में ही हिन्दी बातें ठेले जा रहे हैं। देवनागरी लिपि का प्रयोग करने के लिए यूनीकोड की जानकारी नहीं है। लिप्यान्तरण के औंजार प्रयोग करना नहीं जानते। इसलिए फेसबुक की कामचलाऊ स्टेटस तो लिख लेते हैं लेकिन ब्लॉग शुरू ही नहीं कर पाते। क्या आपको नहीं लगता कि इन्टरनेट पर देवनागरी का प्रयोग सहज और सरल रूप में प्रचलित करने के लिए हमें प्रयास करना चाहिए। क्या इसके लिए वर्कशॉप करना फिजूल है?
-नहीं सर, यह तो जरूरी ही है। लेकिन…
-लेकिन क्या? हिन्दी में ब्लॉग लिखने और बड़े पाठक वर्ग तक पहुँचने में कठिनाई सिर्फ़ फेसबुक और ट्विटर के कारण तो आयी नहीं है! यूनीकोड के मसले के अलावा इसे सर्च इंजन के अनुकूल बनाने, अपनी सामग्री को सही तरीके से टैग करने तथा अपने ब्लॉग की विषय वस्तु को सुव्यवस्थित तरीके से वर्गीकृत करने का शऊर कितने लोगों को आता है? इसके लिए एक अदद सक्षम एग्रीगेटर यदि नहीं है तो उसे खोजने की कोशिश तो करनी पड़ेगी न! यह हिन्दी ब्लॉग का दुर्भाग्य है कि इसे कोई जुकरबर्ग नहीं मिला। जिन लोगों ने निजी जुनून से कुछ प्रयास किया उनको अंततः आर्थिक मोर्चे पर निराशा मिली और गाड़ी पटरी से उतरती दिखती है। आज यदि कोई संस्था इस कमी को पूरा करने की संभावना दिखाती है तो उसे क्यों मिस किया जाय। क्या हिंदी ब्लॉगरी का इतिहास लिख कर इसे मटिया दिया जाय? अथवा इसके जो लाभ हैं और जिसके बारे में आपने भी बहुत कुछ लिखा है उसे और अधिक विस्तार देने के बारे में सोचा जाय?
हाँ-हाँ, यह तो बहुत अच्छा है। यदि वर्धा वाले एक एग्रीगेटर की कमी पूरी कर दें तो बहुत अच्छा होगा। लेकिन सर मैं आपके इस स्नेह के लिए और आपने जो मान मुझे दिया उसके लिए धन्यवाद देते हुए भी इतना कहना चाहूंगा कि मेरी पूरी सक्रियता इस माध्यम के लिए रहेगी लेकिन मैं अपने को वर्चुअल स्पेस तक ही सीमित रखना चाहता हूँ। मैं किसी भी प्रकार से ऐसे आयोजन में पहुँचकर प्रतिभाग नहीं कर सकता। बाकी जो भी विषय सामग्री आपको चाहिए मैं आपको मेल कर दूंगा। आप उसे सेमिनार में जैसे चाहें प्रयोग करें।
विनीत ने वादे के मुताबिक जो आलेख (ब्लॉगिंग जो हिन्दी विभाग की पैदाईश नहीं है) भेजा उसकी शुरुआती पंक्तियाँ इस प्रकार हैं-
“ब्लॉग के बहाने पहले तो वर्चुअल स्पेस में और अब प्रिंट माध्यमों में एक ऐसी हिंदी तेजी से पैर पसार रही है जो कि देश के किसी भी हिंदी विभाग की कोख की पैदाइश नहीं है। पैदाइशी तौर पर हिंदी विभाग से अलग इस हिंदी में एक खास किस्म का बेहयापन है, जो पाठकों के बीच आने से पहले न तो नामवर आलोचकों से वैरीफिकेशन की परवाह करती है और न ही वाक्य विन्यास में सिद्धस्थ शब्दों की कीमियागिरी करनेवाले लोगों से अपनी तारीफ में कुछ लिखवाना चाहती है। पूरी की पूरी एक ऐसी पीढ़ी तैयार हो रही है जो निर्देशों और नसीहतों से मुक्त होकर हिंदी में कुछ लिख रही है। इतनी बड़ी दुनिया के कबाड़खाने से जिसके हाथ अनुभव का जो टुकड़ा जिस हाल में लग गया, वह उसी को लेकर लिखना शुरू कर देता है। इस हिंदी को लिखने के पीछे का सीधा-सा फार्मूला है जो बात जैसे दिल-दिमाग के रास्ते कीबोर्ड पर उतर आये उसे टाइप कर डालो, भाषा तो पीछे से टहलती हुई अपने-आप चली आएगी।”
इस वार्ता के बाद मेरा विश्वास और पक्का हुआ है कि वर्धा में एक जोरदार विचार मंथन और कुछ ठोस फैसले लेने का औचित्य बनता है। आपका क्या ख़्याल है?
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

