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बुधवार, 14 अगस्त 2013

सेमिनार फ़िजूल है: विनीत कुमार

ब्‍लॉगरों को सेमिनार करने की जरूरत क्या है?

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा ने जब पहली बार हिंदी ब्लॉगिंग को लेकर एक राष्ट्रीय सेमिनार “चिठ्ठाकारी की दुनिया” इलाहाबाद में कराया तो इसे अपनी तरह का पहला कार्यक्रम माना गया। इसे एक मील का पत्थर मानने वालों में दिल्ली के विनीत कुमार भी थे जिन्होंने न सिर्फ़ इसमें प्रतिभाग करते हुए खुलकर अपनी बात रखी थी बल्कि अपनी रिपोर्टों द्वारा इसे इंटरनेट पर खूब प्रचारित भी किया था। मीडिया विषयों पर विशद लेखन करने वाले विनीत आजकल इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में भी पैनेलिस्ट के रूप में दिख जाते हैं। उनकी हुंकार तो आप ब्लॉगरी करते हुए पढ़ते ही होंगे।

अनूप शुक्ल ने इलाहाबाद से लौटकर जो पोस्ट लिखी थी उसमें विनीत की चर्चा इस प्रकार थी-

इस संगोष्ठी में विनीत कुमार से मिलने का मौका मिला। विनीत का काम के प्रति अद्भुत समर्पण देखकर मन खुश हो गया। विनीत ने अपने ब्लाग पर अपनी झांसे वाली फोटो लगा रखी है। सामने से देखने में वो कहीं बेहतर दिखते हैं। ब्लाग वाली उड़ी-उड़ी फ़ोटो बनवाने के लिये बहुत मेहनत करनी पड़ी होगी उनको। अगर किसी को इलाहाबाद में क्या हुआ वह बिना नमक मिर्च के जानना हो तो विनीत की ये और ये वाली पोस्ट देखे।

विनीत कुमारमैंने आगामी सेमिनार के लिए जब उनसे चर्चा की तो पहले उन्होंने व्यस्तता के बहाने टालना चाहा; लेकिन जब मैंने सप्ताहान्त में एक-दो दिन का समय निकालने की संभावना की ओर इशारा किया तो वे असलियत पर आ गये। बोले- सर, सही बात यह है कि मैं इस प्रकार के ब्लॉगर सम्मेलन के सख़्त खिलाफ हूँ। यह पैसे की फ़िजूलखर्ची तो है ही इससे कोई लाभ भी नहीं होता। मैं समझता हूँ कि वर्चुअल दुनिया में लिखने-पढ़ने वाले भौतिक रूप से एक-दूसरे को न मिलें तो ही अच्छा है।

मैंने टोका- विनीत जी, आपकी बात अपनी जगह सही हो सकती है। लेकिन आपको यह कैसे लगा कि वर्धा में जो होना प्रस्तावित है वह ब्लॉगर “सम्मेलन” है? मेरे ख़्याल से “सम्मेलन” और “सेमिनार (विचारगोष्ठी)” में अन्तर है। यहाँ तो हिंदी ब्लॉगिंग और सोशल मीडिया से जुड़े कुछ मुद्दों पर विचार-मंथन होना है। यह कोई चाय-पार्टी या प्रीतिभोज नहीं है जिसमें ब्लॉग लिखने वाले सभी ऐरे-गैरे को बुलाकर इन्ज्वॉय कराना है। अलबत्ता जिस विषय को केन्द्र में रखा गया है उसके बारे में अच्छी जानकारी रखने वाले लोग अन्य तमाम पेशों से जुड़े होने के साथ-साथ ब्लॉगर भी हैं इसलिए ऐसा महसूस हो सकता है कि यह केवल ब्लॉगरों का जुटान है।

-नहीं सर, मैं तो यह कह रहा हूँ कि जो भी बहस की जानी है वह वर्चुअल स्पेस में ही आसानी से हो सकती है और होती ही रहती है। इसके लिए अलग से सेमिनार कराने की क्या जरूरत है। मेरा विरोध तो इस बात से है।

-जरूरत उनके लिए हैं जो इस वर्चुअल स्पेस (आभासी दुनिया) का प्रयोग करने में आपकी तरह सिद्धहस्त नहीं हैं। बहुत से पढ़े-लिखे लोग इसमें अच्छा कर सकते हैं लेकिन उन्हें कोई सूत्र नहीं मिल रहा है। आपने जब ब्लॉगरी शुरू की होगी (2007) उस समय बहुत कम लोग हिंदी में ब्लॉग लिख रहे थे। लगभग सभी एक दूसरे को जान जाते थे और एक दूसरे के ब्लॉग का लिंक अपने ब्लॉग पर रखते थे। नये लोगों को ब्लॉगवाणी और चिठ्ठाजगत जैसे ब्लॉग एग्रीगेटर्स के सहारे दूसरे ब्लॉगर्स तक पहुँचने का रास्ता मिल जाता था। इनके बन्द हो जाने के बाद अब सबकुछ इतना आसान नहीं रहा। संभव है आज बहुत से नये ब्लॉगर्स हमसे-आपसे बहुत अच्छा लिख रहे हों या लिख सकते हों; लेकिन उनके बारे में हम जान ही नहीं पाते हैं। दूसरी ओर फेसबुक और ट्विटर की तेज रफ़्तार दुनिया में मची भागमभाग ने भी हिंदी ब्लॉगिंग को पीछे कर दिया है। हमें तो यह सोचना है कि इस तेजधारा के बीच खड़ी हिंदी ब्लॉगिंग जमी रह सकने की स्थिति में है या इस बाढ़ में बह जाएगी।

-सर, तो इसे आप कैसे रोक पाएंगे? फेसबुक पर जो सुविधाएँ है या ट्विटर में जो आकर्षण है वह ब्लॉग में कैसे पैदा कर पाएंगे? इसे तो इनके हाल पर ही छोड़ देना होगा। कोई यह सोच भी कैसे सकता है कि इंटरनेट प्रयोग करने वालों की पसन्द बदली जा सकती है? या उनके ऊपर कोई अनुशासन थोपा जा सकता है?

-नहीं-नहीं, मैं या कोई भी ऐसा नहीं सोच सकता। मैं तो यह कहना चाह रहा हूँ कि ब्लॉग, फेसबुक और ट्विटर का डोमेन बिल्कुल अलग-अलग है। आप बताइए, किसी फेसबुक स्टेटस की सक्रिय आयु कितनी होती है या एक ट्वीट कितने मिनट तक ताजा रहता है? दो-चार मिनट से लेकर अधिकतम चौबीस घंटे तक ही न! आप कितनी बार अपने पुराने स्टेटस या ट्वीट को देखना चाहते हैं? दूसरे लोग कितनी रुचि रखते हैं इसमें? इसमें कितना कुछ सहेज कर रखने लायक होता है? एक अखबार की तरह यह एक बार पढ़ लिये जाने के बाद रद्दी नहीं बन जाता? लेकिन ब्लॉग का स्वरूप तो इससे अलग है। इसका आर्काइव कभी भी निराश नहीं करता। इसमें वह बदहवास भागमभाग नहीं है। फास्ट-फूड कल्चर का जो प्रभाव फेसबुक और ट्विटर में दिखता है वह ब्लॉग पर नहीं है। ये तीनो एक-दूसरे के प्रतिस्पर्धी नहीं हैं बल्कि इस आभासी दुनिया में इन तीनों के एक दूसरे के समानान्तर चलने भर का स्पेस मौजूद है।

-यह बात तो ठीक है। सहमत हूँ इससे। आपको मैं कुछ साल पहले ज्ञानोदय में छपा अपना एक लंबा आलेख भेजूंगा जिसमें मैंने हिंदी ब्लॉगिंग के प्रति लोगों के बदलते नज़रिए के बारे में लिखा था। पारंपरिक रूप से हिंदी भाषा और साहित्य को अपनी मिल्कियत समझने वाले तथाकथित कालजयी साहित्यकार और समालोचक जब इस नये माध्यम को मार्गदर्शन देने की मुद्रा बनाते हैं तो मुझे बहुत खराब लगता है। कल तक जो इसे कूड़ा-कचरा कहते रहते थे वे आज खुद ही यहाँ आने और चर्चित होने की जुगत भिड़ा रहे हैं। सबने अपने पेज बना लिए हैं और यहाँ सक्रियता दिखा रहे हैं। मैं इस लिए किसी साहित्यिक संस्था द्वारा इस माध्यम को हाईजैक करने का विरोधी हूँ।

-तो भाई मेरे, जब आप जैसे लोग अपनी बात रखने के बजाय ऐसे मौकों से किनारा करते रहेंगे तो उस जगह को भरने के लिए कोई तो आएगा। मैं तो चाहता हूँ कि आप अपने रैडिकल विचार यहाँ रखें और एक गंभीर बहस की शुरुआत हो। एक दूसरा पहलू यह भी है कि हिंदी भाषा-भाषी बहुत से लोग जो कंप्यूटर और इंटरनेट के संपर्क में हैं और फेसबुक/ ट्विटर पर बाइट बढ़ा रहे हैं वे रोमन में ही हिन्दी बातें ठेले जा रहे हैं। देवनागरी लिपि का प्रयोग करने के लिए यूनीकोड की जानकारी नहीं है। लिप्यान्तरण के औंजार प्रयोग करना नहीं जानते। इसलिए फेसबुक की कामचलाऊ स्टेटस तो लिख लेते हैं लेकिन ब्लॉग शुरू ही नहीं कर पाते। क्या आपको नहीं लगता कि इन्टरनेट पर देवनागरी का प्रयोग सहज और सरल रूप में प्रचलित करने के लिए हमें प्रयास करना चाहिए। क्या इसके लिए वर्कशॉप करना फिजूल है?

-नहीं सर, यह तो जरूरी ही है। लेकिन…

-लेकिन क्या? हिन्दी में ब्लॉग लिखने और बड़े पाठक वर्ग तक पहुँचने में कठिनाई सिर्फ़ फेसबुक और ट्विटर के कारण तो आयी नहीं है! यूनीकोड के मसले के अलावा इसे सर्च इंजन के अनुकूल बनाने, अपनी सामग्री को सही तरीके से टैग करने तथा अपने ब्लॉग की विषय वस्तु को सुव्यवस्थित तरीके से वर्गीकृत करने का शऊर कितने लोगों को आता है?  इसके लिए एक अदद सक्षम एग्रीगेटर यदि नहीं है तो उसे खोजने की कोशिश तो करनी पड़ेगी न! यह हिन्दी ब्लॉग का दुर्भाग्य है कि इसे कोई जुकरबर्ग नहीं मिला। जिन लोगों ने निजी जुनून से कुछ प्रयास किया उनको अंततः आर्थिक मोर्चे पर निराशा मिली और गाड़ी पटरी से उतरती दिखती है। आज यदि कोई संस्था इस कमी को पूरा करने की संभावना दिखाती है तो उसे क्यों मिस किया जाय। क्या हिंदी ब्लॉगरी का इतिहास लिख कर इसे मटिया दिया जाय? अथवा इसके जो लाभ हैं और जिसके बारे में आपने भी बहुत कुछ लिखा है उसे और अधिक विस्तार देने के बारे में सोचा जाय?

हाँ-हाँ, यह तो बहुत अच्छा है। यदि वर्धा वाले एक एग्रीगेटर की कमी पूरी कर दें तो बहुत अच्छा होगा। लेकिन सर मैं आपके इस स्नेह के लिए और आपने जो मान मुझे दिया उसके लिए धन्यवाद देते हुए भी इतना कहना चाहूंगा कि मेरी पूरी सक्रियता इस माध्यम के लिए रहेगी लेकिन मैं अपने को वर्चुअल स्पेस तक ही सीमित रखना चाहता हूँ। मैं किसी भी प्रकार से ऐसे आयोजन में पहुँचकर प्रतिभाग नहीं कर सकता। बाकी जो भी विषय सामग्री आपको चाहिए मैं आपको मेल कर दूंगा। आप उसे सेमिनार में जैसे चाहें प्रयोग करें।

विनीत ने वादे के मुताबिक जो आलेख (ब्लॉगिंग जो हिन्दी विभाग की पैदाईश नहीं है) भेजा उसकी शुरुआती पंक्तियाँ इस प्रकार हैं-

“ब्लॉग के बहाने पहले तो वर्चुअल स्पेस में और अब प्रिंट माध्यमों में एक ऐसी हिंदी तेजी से पैर पसार रही है जो कि देश के किसी भी हिंदी विभाग की कोख की पैदाइश नहीं है। पैदाइशी तौर पर हिंदी विभाग से अलग इस हिंदी में एक खास किस्म का बेहयापन है, जो पाठकों के बीच आने से पहले न तो नामवर आलोचकों से वैरीफिकेशन की परवाह करती है और न ही वाक्य विन्यास में सिद्धस्थ शब्दों की कीमियागिरी करनेवाले लोगों से अपनी तारीफ में कुछ लिखवाना चाहती है। पूरी की पूरी एक ऐसी पीढ़ी तैयार हो रही है जो निर्देशों और नसीहतों से मुक्त होकर हिंदी में कुछ लिख रही है। इतनी बड़ी दुनिया के कबाड़खाने से जिसके हाथ अनुभव का जो टुकड़ा जिस हाल में लग गया, वह उसी को लेकर लिखना शुरू कर देता है। इस हिंदी को लिखने के पीछे का सीधा-सा फार्मूला है जो बात जैसे दिल-दिमाग के रास्ते कीबोर्ड पर उतर आये उसे टाइप कर डालो, भाषा तो पीछे से टहलती हुई अपने-आप चली आएगी।”

इस वार्ता के बाद मेरा विश्वास और पक्का हुआ है कि वर्धा में एक जोरदार विचार मंथन और कुछ ठोस फैसले लेने का औचित्य बनता है। आपका क्या ख़्याल है?

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

गुरुवार, 8 अगस्त 2013

खुद करके देखो...

[मेरे मेलबॉक्स में एक मित्र का भेजा एक सामूहिक मेल मिला। अंग्रेजी में। इसके अन्त में यह अपील थी कि इसे अधिक से अधिक लोगों तक फॉरवर्ड कीजिए। यह अपील यदि प्रारंभ में होती तो शायद मैंने बिना पढ़े ही इसे मिटा दिया होता। लेकिन पूरी कहानी पढ़ने के बाद स्थिति दूसरी हो गयी। मैंने इसे हिंदी में प्रसारित करने का निर्णय लिया। इसका मूल संदेश तो मेरे मन में बहुत पहले से बैठा हुआ था जिसे लेकर कई बार अपने घर में चर्चा कर चुका हूँ। लेकिन आज इसे बहुत सुन्दर तरीके से समझाता हुआ यह संदेश मिला तो मेरी पौ-बारह हो गयी। इसे देखिए फिर बताइए आप क्या सोचते है।]

यह कहानी भीतर तक कुरेदती है।

एक नौजवान ने एक बड़ी कंपनी में मैनेजर की पोस्ट के लिए आवेदन किया। प्रारंभिक चरण के साक्षात्कार में सफल होने के बाद अब उसे कंपनी के निदेशक से मिलना था – फाइनल इंटरव्यू के लिए।

निदेशक ने उसके आत्मवृत्त (सी.वी.) से जान लिया कि उसकी शैक्षणिक उपलब्धियाँ उत्कृष्ट कोटि की हैं। उसने पूछा- “क्या तुम्हें स्कूल में कोई छात्रवृत्ति मिलती थी?” नौजवान ने जवाब दिया- “नहीं”

“तो क्या तुम्हारी स्कूल फीस तुम्हारे पिताजी ने दी ?”

“मेरे पिताजी की मृत्यु बहुत पहले हो गयी थी, जब मैं मात्र एक वर्ष का था। ...मेरी फीस तो मेरी माँ देती है।” उसने जवाब दिया।

“तुम्हारी माँ कहाँ काम करती है?”

“मेरी माँ कपड़े धुलती है।”

निदेशक ने उससे अपने हाथ दिखाने को कहा। नौजवान ने अपने हाथ दिखाये जो बहुत कोमल और सुन्दर थे। बिल्कुल तराशे हुए दिखते थे।

“क्या तुमने कभी अपनी माँ के साथ कपड़े धोए हैं? कभी उनकी मदद की है?”

“कभी नहीं, मेरी माँ हमेशा चाहती थी कि मैं पढ़ाई करूँ, अधिक से अधिक किताबें पढ़ूँ। इसके अलावा मेरी माँ कपड़े बहुत जल्दी-जल्दी धो लेती है। मुझसे कहीं ज्यादा तेजी से।”

निदेशक ने कहा, “मेरा एक अनुरोध है। जब तुम आज घर जाना तो अपनी माँ के हाथ देखना और उन्हें खूब अच्छी तरह धोना। उसके बाद कल सुबह मुझसे मिलना।”

नौजवान को लगा कि अब उसे नौकरी शायद मिल ही जाएगी। घर लौटकर उसने अपनी माँ से कहा कि वह उसके हाथ धोना चाहता है। माँ को यह अजीब लगा। वह खुश तो थी लेकिन मन में मिश्रित भाव लिए उसने अपना हाथ बेटे के आगे कर दिया।

effort and experienceयुवक ने अपनी माँ का हाथ धीरे-धीरे धोना शुरू किया ...और उसकी आँखों ने रोना...। यह पहली बार था जब उसने देखा कि माँ के हाथों में कितनी झुर्रियाँ है और कितने घाव के निशान हैं। कुछ घाव तो इतने दर्द से भरे हुए थे कि जब वह छू रहा था तो माँ के मुँह से सिसकी निकल जाती। एक दबायी हुई कराह...।

यह पहली बार था जब उसे भान हुआ कि इन्ही चोटिल हाथों से उसकी माँ रोज कपड़े धोती है ताकि उसकी पढ़ाई के लिए फीस जमा कर सके। उसकी पढ़ाई के लिए, उसके स्कूल की दूसरी गतिविधियों के लिए और उसका भविष्य सँवारने के लिए उसकी माँ को जो कीमत चुकानी पड़ती थी वे उसके हाथों में रिसते घावो की पीड़ा ही थी।

माँ के हाथ धोने के बाद उस नौजवान ने चुपचाप वो सारे कपड़े धो डाले जो उसकी माँ को धोने थे।

उस रात माँ-बेटे बहुत देर तक आपस में बात करते रहे।

अगली सुबह वह निदेशक के कार्यालय में पहुँचा।

“अच्छा बताओ, कल तुमने अपने घर क्या किया और क्या सीखा?” निदेशक ने यह पूछने से पहले उस नौजवान की आँखों में तिर आयी नमी को देख लिया था।

उसने बताया, “मैंने अपनी माँ के हाथों को धोया और बाकी बचे सारे कपड़े भी धो डाले...”

“अब मैं जान गया हूँ कि दूसरों के काम का मूल्य समझना क्या होता है। मैं जो आज हूँ वह माँ के बिना नहीं बन सकता था। माँ का हाथ बँटाने के बाद मैंने आज ही जाना कि अपने आप अपने हाथ से कोई काम करना कितना कठिन और दुष्कर होता है। मुझे अब पता चला है कि अपने परिवार की देखभाल करने और उसे संभालने का काम कितना महत्वपूर्ण और मूल्यवान है।”

निदेशक ने कहा, “बस यही है जो मैं एक मैनेजर में देखना चाहता हूँ। मैं एक ऐसे व्यक्ति की भर्ती करना चाहता हूँ जो दूसरों की मदद का मोल समझ सके, जो यह जानता हो कि कोई काम करके देने में कितनी तक़लीफ उठानी पड़ती है, और जिसने जीवन में केवल धन कमाने का एकमात्र लक्ष्य नहीं निर्धारित किया हो।”

“अब तुम चुन लिये गये हो”

इस नौजवान ने कड़ी मेहनत से काम किया और अपने अधीनस्थों के लिए खूब आदर व सम्मान का पात्र बना। सभी कर्मचारियों ने एक टीम की तरह खूब परिश्रम किया। कंपनी के प्रदर्शन में गजब का उछाल आ गया।

एक ऐसा बालक जिसे खूब संरक्षण दिया गया हो और उसे सभी मनचाही चीजें आसानी से पा जाने की आदत पड़ गयी हो, उसके भीतर एक ‘हकदारी की मानसिकता’ (entitlement mentality) विकसित हो जाती है। वह अपने को ही सबसे पहले रखने का आदी हो जाता है। वह अपने माँ-बाप की कठिनाइयों और संघर्ष से पूरी तरह अन्‍जान होता है। जब वह काम करना शुरू करता है तो यह मानकर चलता है कि सबको उसकी बात सुननी ही चाहिए। जब वह एक मैनेजर बन जाता है तो वह अपने कर्मचारियों की कठिनाइयाँ जान ही नहीं पाता है और हमेशा उन्हें दोषी ठहराता रहता है।

इस प्रकार के लोग हो सकता है पढ़ाई में बहुत आगे रहे हों और कुछ समय के लिए सफल भी हो गये हों; लेकिन अन्ततः उन्हें जीवन में कुछ उपलब्धि पा लेने का एहसास नहीं हो पाता है। वे हमेशा कुढ़ते रहते हैं, विद्वेष से भरे होते हैं और अधिक से अधिक पाने के लिए लड़ते रहते हैं। यदि हम अपने बच्‍चों को इस प्रकार का अतिशय दुलार और संरक्षण दे रहे हैं तो सोचिए, क्या हम उन्हें वास्तव में प्यार कर रहे हैं कि उल्टे अपने ही हाथों उन्हें बर्बाद कर रहे हैं।

OLYMPUS DIGITAL CAMERA         यह ठीक है कि आप अपने बच्‍चे को रहने के लिए एक बड़ा घर दे सकते हैं, खाने के लिए अच्छा भोजन दे सकते हैं, पियानो सिखा सकते हैं और बड़ी स्क्रीन वाली टीवी देखने को दे सकते हैं, लेकिन जब आप लॉन में घास काट रहे हों तो उन्हें भी यह करने को प्रेरित कीजिए। उन्हें अच्छा अनुभव होगा। भोजन करने के बाद उन्हें भाई-बहनों के साथ अपनी जूठी थाली और कटोरियाँ धुलने दीजिए। फर्श पर कुछ गिर गया हो तो उसे साफ करने को कहिए।

यह इसलिए नहीं कि आपके पास कामवाली बाई रखने को पैसे नहीं है, बल्कि इसलिए कि आप को उन्हें एक सही तरीके से प्यार करना है। उन्हें यह समझाना है कि उनके माता-पिता चाहे जितने अमीर हों, एक दिन जरूर आयेगा जब उनके बाल भी सफेद हो जाएंगे जैसे उस नौजवान की बूढ़ी माँ के हो गये थे। सबसे महत्वपूर्ण बात उन्हें यह समझाना है कि कोई काम अपने हाथ से करने में जो कष्ट होता है उसका अनुभव होना जरूरी है और उसका मूल्य इन्हें समझना चाहिए। दूसरों के साथ मिलकर कोई काम कैसे पूरा किया जाता है यह योग्यता उन्हें सीखनी चाहिए।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

सोमवार, 5 अगस्त 2013

आपकी प्रविष्टियों की प्रतीक्षा है

हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा की राष्ट्रीय संगोष्ठी में प्रतिभाग हेतु पहला कदम बढ़ाइए 

मेरी पिछली पोस्ट में सूचना दी गयी थी कि वर्धा में एक बार फिर हिंदी ब्लॉगिंग को केन्द्र में रखकर राष्ट्रीय स्तर का सेमिनार आगामी 20-21 सितंबर को आयोजित किया जा रहा है। कुछ ब्लॉगर मित्रों की उत्साहजनक प्रतिक्रिया मिली है। कुलपति जी ने इसकी आवश्यक तैयारियों के लिए निर्देश दे दिये हैं। इस सेमिनार के संयोजन से पूर्व उन्होंने मेरे जिम्मे किया है – इस राष्ट्रीय विचारमंथन के लिए एक ऐसे पैनेल के लिए नाम सुझाने का दायित्व जो हिंदी ब्लॉगिंग और सोशल मीडिया के तमाम पक्षों पर  साधिकार विचार विनिमय कर सके और जिसके माध्यम से कुछ ठोस नतीजों पर पहुँचा जा सके।

इसी जिम्मेदारी को पूरा करने के लिए मैंने पिछली पोस्ट में आप सभी से अनुरोध किया था कि इस मंच पर विचार और बहस के लिए प्रस्तावित विषय सामग्री अपने एक आलेख के रूप में मुझे उपलब्ध करा दें ताकि उनको सम्मिलित करते हुए सभी सत्रों की रूपरेखा तैयार की जा सके। अभी तक कुछ मित्रों से मौखिक बात-चीत हुई है। कुछ लोगों ने अपनी टिप्पणी में एक-दो बिन्दु सुझाए हैं। लेकिन अभी भी आप सबका इनपुट अपर्याप्त लग रहा है। मैं दिल से चाहता हूँ कि बहस के तमाम मुद्दे एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया से उभरकर आयें। पिछला अनुभव बताता है कि समय रहते अवसर का सदुपयोग करने में जो भाई लोग आलस्य दिखाते है वे ही बाद में कार्यक्रम का छिद्रान्वेषण करते हैं।

मैं बार-बार अनुरोध करता हूँ कि आप इस कार्यक्रम का हिस्सा बनने में यदि गहरी रुचि रखते हैं तो इसे जाहिर कीजिए। अपने आलेख द्वारा व अपने सुझावों द्वारा अपनी यू.एस.पी. से हमें परिचित कराइए ताकि हम विश्वविद्यालय से कार्यक्रम के पैनेलिस्टों व प्रतिभागियों का शीघ्रातिशीघ्र अनुमोदन प्राप्त करते हुए आमंत्रण पत्र भेज सकें। वर्धा आने के लिए आपको रेल टिकट भी बुक कराना होगा। समय रहते नहीं करा लिया तो कन्फर्म टिकट मिलने में मुश्किल आ सकती है। कुलपति जी ने बताया कि विश्वविद्यालय द्वारा आमंत्रित अतिथियों को वहाँ आने-जाने का किराया रेलगाड़ी की ए.सी.थ्री टियर की सीमा तक भुगतान किया जाएगा।

आज मुझे औपचारिक रूप से एक प्रतिष्ठित प्रिन्ट माध्यम के संपादक व स्वयं एक महत्वपूर्ण ब्लॉगर द्वारा निम्नलिखित विषय सुझाए गये हैं:

साहित्य की ब्लॉगिंग : इसमें इस विषय पर चर्चा की जानी चाहिए कि वास्तव में ब्लॉग पर पर साहित्य है क्या. इसमें कितने स्थापित, युवा, नवोदित, उदीयमान या शौकिया साहित्यकार हैं. किन विधाओं की अधिकता है और उनमें वास्तव में कितना साहित्य और कितना साहित्य के नाम पर कूड़ा है.

ब्लॉग साहित्य की आलोचना : अगर साहित्य को विकास के लिए आलोचना की ज़रूरत है तो ब्लॉग पर साहित्य के लिए क्यों नहीं? क्या ब्लॉग पर जो साहित्य प्रेषित किया जा रहा है, उसकी आलोचना के लिए कुछ लोग हैं?  क्या उन्होंने ब्लॉग साहित्य को केन्द्र में रखकर साहित्य की कसौटी पर उसे कसने की कोशिश कभी की? या केवल सतही टिप्पणियों से ही ब्लॉगरजन ख़ुश हैं?

साहित्येतर ब्लॉग : ब्लॉग पर साहित्य के अलावा जो कुछ है, क्या साहित्य के धुरंधर ब्लॉगर गण उन ब्लॉग्स पर कभी जाते हैं? अगर जाते हैं तो उसे पढ़ने की जहमत उठाते हैं और उसपर टिपियाते भी हैं या केवल एक नज़र मारकर खिसक लेते हैं.

ब्लॉगिंग के विकास में चिट्ठा चर्चा जैसे ब्लॉग्स और अग्रीगेटर्स की अहमियत.  

साहित्य, साहित्य के ब्लॉग और समाज : एक-दूसरे से अपेक्षाएं

ब्लॉगिंग कम होने के कारण और उसे बढ़ावा देने की रणनीति.

अविनाश वाचस्पति  जी ने पिछली पोस्ट पर टिप्पणी करते हुए एक महत्वपूर्ण बिन्दु का उल्लेख किया था –

“कि हिन्‍दी ब्‍लॉगबुक जैसा एक मंच बनाया जाए जो कि ब्‍लॉगवाणी और चिट्ठाजगत की पूर्ति करे तथा 'फेसबुक' की तरह सदैव प्रवाहमान हो। इसमें हिंदी के सभी ब्‍लॉग जड़े हों और उनकी पोस्‍टें क्रम से सामने से गुजरती रहें और जिसे जिसको पढ़ना व अपनी राय देनी है, वह इसमें बिना अलग से लॉगिन किए दे सके। इससे इस मंच को आगे विस्‍तारित होने से कोई नहीं रोक सकता। इसके लिए तकनीकी और धन-संसाधन की व्‍यवस्‍था किसी विश्‍वविद्यालय से ही की जा सकती है और इसे अमली जामा पहनाया जा सकता है।”

इसी प्रकार आप सभी सुधी जनों से अपेक्षा है कि इस महामंथन के लिए अलग-अलग पहलुओं पर अपना नजरिया प्रस्तुत कीजिए। हमारी कोशिश होगी अधिक से अधिक मुद्दों को मंच पर लाया जाय और उनपर चर्चा करके कुछ ठोस निष्कर्ष निकाले जाय। कुछ ऐसे निर्णय लिए जाय जिनपर विश्वविद्यालय के संसाधनों द्वारा अमल करके हिंदी को अंतर्जाल पर अधिकाधिक प्रयोग की भाषा बनाया जा सके। सूचना, साहित्य और ज्ञान के प्रसार के लिए हिंदी को भी उतना ही समर्थ और सहज-सरल बनाया जा सके जितना अंग्रेजी और अन्य भाषाएँ हैं। यह सब तभी संभव होगा जब प्रत्येक हिंदीप्रेमी जो इंटरनेट से जुड़ा हुआ है पूरे मनोयोग से इस दिशा में अपना योगदान देने के लिए उद्यत हो जाएगा।

तो देर किस बात की है? संभालिए अपना की-बोर्ड और शुरू हो जाइए। मैं प्रतीक्षा कर रहा हूँ।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)