हमारी कोशिश है एक ऐसी दुनिया में रचने बसने की जहाँ सत्य सबका साझा हो; और सभी इसकी अभिव्यक्ति में मित्रवत होकर सकारात्मक संसार की रचना करें।

सोमवार, 3 अगस्त 2009

लोकतन्त्र के भस्मासुर

 

“कृपया मेरे सच बोलने पर नाराज न होइए; कोई भी व्यक्ति जो इस नगर-राज्य में घट रही अनेक अन्यायपूर्ण व गैरकानूनी घटनाओं को रोकने की कोशिश करेगा; और आपका या किसी अन्य ‘भीड़’ का सच्चा विरोध करेगा वह बच नहीं पाएगा। कोई भी व्यक्ति जो न्याय के लिए वास्तविक संघर्ष करता है, उसे यदि जीने की थोड़ी भी इच्छा है तो उसे सार्वजनिक जीवन त्याग कर निजी ज़िन्दगी बितानी होगी।” (एपॉल्जी से)

image यह उद्‍गार ग्रीक दार्शनिक प्लेटो के गुरू सुकरात ने ‘जूरी’ के सामने भरी अदालत में तब व्यक्त किए थे जब उनके विरुद्ध देशद्रोह का मुकदमा चलाया जा रहा था। कुछ ही समय में वह जूरी उन्हें मृत्युदण्ड सुनाने वाली थी। प्लेटो ने अपने गुरू की मौत का कारण जिस राज-व्यवस्था को ठहराया उसे ‘डेमोक्रेसी’ कहा जाता था, जिसमें भींड़ द्वारा नितान्त अविवेकपूर्ण निर्णय लिए जाते थे, और प्रायः अन्यायपूर्ण स्थिति उत्पन्न हो जाती थी। वही डेमोक्रेसी आज दुनिया की सबसे लोकप्रिय, सर्वमान्य और सर्वाधिक व्यहृत शासन व्यवस्था हो गयी है। यह बात अलग है कि राजनीति विज्ञान के जानकार प्राचीन ग्रीक कालीन डेमोक्रेसी और आधुनिक ‘लोकतंत्र’ में जमीन-आसमान का अन्तर बताएंगे।

प्लेटो ने जिस नगर-राज्य को देखा था उसकी जनसंख्या इतनी छोटी होती थी कि राज्य के सभी नागरिक एक स्थान पर एकत्र होकर बहुमत से अपना शासक चुन लेते थे। भीड़ का एक बड़ा हिस्सा जिसे पसन्द करता था वही राजा होता था और उसके फैसले सभी नागरिकों पर बाध्यकारी होते थे। सिद्धान्त रूप में आज भी लोकतंत्र का मतलब यही है- जनता की सरकार, जनता द्वारा चुने गये प्रतिनिधियों की बहुमत आधारित सरकार।

लेकिन प्लेटो ने इस बहुमत की व्यवस्था का जो विश्लेषण किया, वह इसकी खामियों को उजागर करने वाला है, और कदाचित्‌ सच्चाई के करीब भी है। उन्होंने राज्य की तुलना एक व्यक्ति से की थी, और बताया था कि जिस प्रकार एक व्यक्ति के भीतर इन्द्रियबोध (sensation), चित्तवृत्ति (emotion), और बुद्धि (intelligence) के बीच उचित तालमेल से ही उसका सन्तुलित और स्वस्थ जीवन सम्भव है, उसी प्रकार राज्य के विभिन्न अवयवों के आपसी सामन्जस्य से ही न्यायपूर्ण राज-व्यवस्था स्थापित की जा सकती है। यदि बुद्धि-विवेक के ऊपर मन व शरीर में पलने वाले काम, क्रोध, मद व लोभ जैसे विकार हावी हो जाते हैं, तो व्यक्तित्व दोषयुक्त और अन्या्यपूर्ण हो जाता है। शरीर के ऊपर मन और मन के ऊपर मस्तिष्क का नियन्त्रण बहुत आवश्यक है। यदि नियन्त्रण की यह दिशा उलट-पु्लट जाय तो व्यक्ति नष्ट होने लगता है। पतन अवश्यम्भावी हो जाता है। यही स्थिति उस राज्य की भी होती है, जहाँ विवेक पर उन्माद हावी हो जाता है।

लोकतान्त्रिक व्यवस्था में सभी व्यक्तियों को एक इकाई के रूप में बराबर माना जाता है। भले ही उनकी मानसिक और शारीरिक क्षमता तथा सामाजिक पृष्ठभूमि में भारी अन्तर हो। यह व्यवस्था इसी सिद्धान्त पर टिकी है कि राज्य/देश की सरकार चुनने में प्रत्येक व्यक्ति के मत का मान बराबर है। कोई किसी से कम या अधिक महत्व नहीं रखता। कुल मतदाताओं में से बहुमत जिसके पक्ष में हो, वही सरकार बनाता है। इस सरकार द्वारा जो भी निर्णय लिए जाते हैं वह उन अल्पमत वाले नागरिकों पर भी प्रभावी होता है जिनका मत इस सरकार के विरुद्ध रहा है।

सिद्धान्त रूप में इस व्यवस्था में कोई कमी नहीं नज़र आती; लेकिन व्यवहार में बहुत कुछ बदला हुआ नजर आता है। प्लेटो ने इन बदलावों पर कुछ प्रकाश डाला था। बहुमत की पसन्द कौन होता है? लोकप्रियता का पैमाना क्या है? व्यक्ति अपना नेता किसे चुनता है? जिसे देश की सम्पूर्ण जनता का ख़्याल रखना है; आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, सामरिक, राजनयिक, वाणिज्यिक आदि विषयों से सम्बन्धित लोकनीति बनानी है, उसका चुनाव करते समय जनता इन विषयों में उसकी प्रवीणता देखने के बजाय उसकी जाति, उसका धर्म व रंग देखती है; उसकी वक्तृता पर मोहित हो जाती है, किसी दूसरे क्षेत्र में उसके कौशल से प्रभावित हो लेती है; और अपना नेता चुन लेती है।

अच्छी भाषण कला में माहिर एक नेता किसी स्वास्थ्य सम्बन्धी मुद्दे पर आम जनता का मत एक डॉक्टर की अपेक्षा अधिक आसानी से बदल सकता है। वह कमजोर और निरीह नागरिकों  को भी शत्रु देश पर हमले के लिए तैयार कर सकता है, जो एक आर्मी-जनरल नहीं कर सकता। जनप्रतिनिधियों द्वारा प्रभावशाली भाषण के माध्यम से बड़े-बड़े जनसमूहों को सम्मोहित कर बेवक़ूफ बनाने और उनके अन्ध-समर्थन से अत्यन्त शक्तिशाली बन जाने के उदाहरणों से इतिहास भरा पड़ा है।

फ्रेडरिक नीत्शे कहते थे कि उन्माद, पागलपन, मूर्खता या विक्षिप्तता के लक्षण किसी व्यक्ति के भीतर किंचित्‌ ही पाये जाते हैं; लेकिन एक समूह, दल, राष्ट्र या किसी ऐतिहासिक कालखण्ड में ये लक्षण एक अनिवार्य नियम जैसे मिलते हैं। एक भीड़ या समूह का हिस्सा बन जाने पर व्यक्ति के सोचने समझने का ढंग पूरी तरह बदल जाता है। भीड़ में उसकी मानसिकता भेंड़ जैसी हो जाती है। विवेक भ्रष्ट हो जाता है। इसी भीड़ द्वारा चुने गये प्रतिनिधि जब सरकार चलाते हैं तो सुकरात को जहर का प्याला पीना पड़ता है।

भारतवर्ष में लोकतंत्र का जो मॉडल चलाया जा रहा है, उसमें भी इस उत्कृष्ट सिद्धान्त का व्यावहारिक रूप किसी धोखे से कम नहीं है। यहाँ का समाज भी जाति, धर्म, कुल, गोत्र, क्षेत्र, रंग, रूप, अमीर, गरीब, अगड़े, पिछड़े, दलित, सवर्ण, निर्बल, सबल, शिक्षित, अशिक्षित, शहरी, ग्रामीण, उच्च, मध्यम, निम्न, काले, गोरे, स्त्री, पुरुष, आदि के पैमानों पर इतना खण्ड-खण्ड विभाजित है; और ये पैमाने हमारी लोक संस्कृति में इतनी गहरी पैठ बना चुके हैं, कि किसी भी मुद्दे पर आम सहमति या सर्वसहमति नहीं बनायी जा सकती। राष्ट्र-राज्य की परिकल्पना से हम कोसों दूर हैं। ऐसे में बहुमत का अर्थ मात्र दस-पन्द्रह प्रतिशत मतों तक सिमट जाता है। शेष मत विखण्डित होकर इस आँकड़े से पीछे छूट जाते हैं।

कोई भी राजनेता यदि इस गणित को ठीक से समझ लेता है तो वह उन्हीं दस-पन्द्रह प्रतिशत मतों को अपने पक्ष में सुनिश्चित हुआ जानकर सन्तुष्ट हो लेता है, और यह सन्देश भी देता है कि उनके हितों की रक्षा के लिए वह कुछ भी कर सकता है। सारे नियम-कायदे ताख़ अपर रख सकता है; दूसरे समूहों को सार्वजनिक रूप से गाली दे सकता है; साम्प्रदायिक हिंसा करा सकता है; मार-पीट, झगड़ा-लड़ाई, अभद्रता और गुण्डागर्दी से यदि उनका स्वार्थ सधता है तो उसका सहारा लेने में तनिक भी संकोच नहीं करता है। विरोधी मतवाले वर्ग के विरुद्ध खुलेआम अत्याचार और दुर्व्यवहार करने से यदि उसके पीछे खड़ी उन्मादी भीड़ तालिया पीटती है तो इस तथाकथित जनप्रतिनिधि को वह सब करने में कोई गुरेज़ नहीं है।

ऐसी हालत में लोकतन्त्र के चार उपहार- स्वतंत्रता, समानता, भ्रातृत्व व न्याय एक बड़े वर्ग के हाथ से छीन लिए जा रहे हैं, और इन्हें लोकतन्त्र के भस्मासुर अपनी चेरी बनाकर रखने में सफल हो रहे हैं। आजकल अखबारों की सुर्खिया ऐसे समाचारों से भरी पड़ी हैं जहाँ नेता जी अपनी बात मनवाने के लिए प्रशासन के अधिकारियों को मारने-पीटने से लेकर उनकी हत्या कर देने से भी गु़रेज नहीं करते। राजनैतिक पार्टियों द्वारा आपसी रंजिश में एक दूसरे पर राजनैतिक हमले करना तो अब पुरानी बात हो गयी है। अब तो सीधे आमने-सामने दो-दो हाथ कर लेने और विरोधी के जान-माल को क्षति पहुँचाने का काम भी धड़ल्ले से किया जा रहा है।

क्या हम प्लेटो के मूल्यांकन को आधुनिक सन्दर्भ में भी सही होता नहीं पा रहे हैं? 

मंगलवार, 21 जुलाई 2009

बच के रहना रे बाबा... जाने कौन कैसा मिल जाय- भाग-२

(इस पोस्ट को पढ़ने से पहले इसका पूर्वार्द्ध जानना आवश्यक है। यदि आप पिछली पोस्ट न पढ़ पाये हों तो यहाँ चटका लगाएं...।)

अब आगे... 

failed marriageजुलाई की ऊमस भरी गर्मी...। मैं अपने ऑफिस में बैठा कूलर की घर्र-घर्र के बीच चिपचिपे पसीने पर कुढ़ता हुआ सरकारी फाइलों और देयकों (bills) आदि का काम निपटा रहा था। बाहर का मौसम तेज धूप और रुक-रुक कर पड़ते बारिश के छींटो से ऐसा खराब बन गया था कि बहुत मजबूरी में ही बाहर निकला जा सकता था। मेरे कमरे में कोई दूसरा न था।

तभी एक स्मार्ट सा युवक अन्दर आया और मेरी अनुमति लेकर कुर्सी पर बैठ गया। उसका चेहरा कुछ जाना पहचाना लगा। एक दिन पहले ही इस चेहरे से परिचय हुआ था जब लखनऊ से कुछ प्रशिक्षु अधिकारियों का एक दल हमारे कोषागार में भ्रमण के लिए आया था। करीब पन्द्रह प्रशिक्षणार्थियों ने एक-एक कर अपना नाम बताया था और अपना संक्षिप्त परिचय दिया था। सुन्दर काया और किसी जिमखाने से निकली सुडौल देहयष्टि वाला यह नौजवान भी उस टी्म का एक सदस्य था। लेकिन तब उस परिचय में सबका नाम तत्काल याद कर पाना सम्भव नहीं हो पाया था।

“तुम तो कल आए थे...? सॉरी यार, मैं तुम्हारा नाम याद नहीं रख पाया...” मैने संकोच से पूछा।

“जी सर, मैं कल आया था। आपसे अकेले मिलने की इच्छा थी इसलिए आज चला आया। ...मेरा नाम आप जानते होंगे। ...मैं अमुक हूँ। ...आज फेमिली कोर्ट में सुनवायी थी, लेकिन वो लोग फिर नहीं आए। केवल डिले करने की टैक्टिक्स अपना रहे हैं।”

“ओफ़्फ़ो, यार मैं तो तुम्हारे बारे में सुनकर बड़ा रुष्ट था। आखिर यह सब करने की क्या जरूरत थी? अच्छी भली लड़की का जीवन नर्क बना दिया।” मैं तपाक से बोल पड़ा।

उसके चेहरे पर एक बेचैनी का भाव उतर आया था, “सर, लगता है उसने यहाँ आकर भी अपनी कलाकारी का जादू चला दिया है...। सच्चाई यह है सर, कि जिन्दगी मेरी तबाह हुई है। उसने जो कहानी गढ़ी है वह उसके वकील की बनायी हुई है।”

मैंने अपने हाथ का काम बन्द कर दिया और उसकी बात ध्यान से सुनने लगा।

“सर, जब इन्स्टीट्यूट में यहाँ से फोन गया था तो मैं वहीं था। बाद में मुझे पता चला कि आपको भी इस मामले में गुमराह किया गया है। ...उसने जो आरोप लगाया है वह पूरी तरह बेबुनियाद है।”

“भाई मेरे, इस आरोप को सही सिद्ध करने के लिए तो शायद उसने मेडिकल एक्ज़ामिनेशन की चुनौती दी है...।”

“सर, मैने तो एफिडेविट देकर इसकी सहमति दे दी है। लेकिन इक्ज़ामिनेशन उसका भी होना चाहिए। शादी के बाद हम साथ-साथ रहे हैं। वह अपनी सेक्सुअल एक्टिविटी को कैसे एक्सप्लेन करेगी...?”

“ऐसी परसनल बातें यहाँ करना ठीक नहीं है... लेकिन वो बता रही थी कि आप उसके साथ किसी डॉक्टर से भी मिले थे, फर्जी नाम से...”

“नहीं सर, मेरी जिन्दगी का सुख चैन छिन गया है। रात-दिन की घुटन से परेशान हूँ। सच्चाई कुछ और है और मेरे ऊपर वाहियात आरोप लगाया जा रहा है। ...आप ही बताइए, मेरे घर में ही तीन-चार डॉक्टर हैं। मुझे कोई दिक्कत होती तो मैं उनसे परामर्श नहीं लेता?”

मैं चुपचाप सुनता रहा, इतनी अन्तरंग बातें कुरेदने की मंशा ही नहीं थी। लेकिन उसे अपने साथ हुए हादसे को बयान करना जरूरी लग रहा था। इसलिए मुझे भी उत्सुकता हो चली...

सर, यह मामला ‘थर्ड-परसन’ का है। लड़की का ऑब्सेसन एक दूसरे लड़के से है जिससे वह शादी नहीं कर सकती क्योंकि वह उसके ‘ब्लड रिलेशन’ में है। ...विदा होकर जब यह मेरे साथ मेरे घर गयी तो अगले दिन ही ये जनाब मेरे घर पहुँच गये। ...सीधा मेरे बेडरूम में जाकर पसर गये और फिर दिनभर जमे रहे। मेरे ही शहर में उसकी बहन का घर भी था। लेकिन सारा समय मेरे घर में, मेरी नयी नवेली पत्नी के साथ गुजारता रहा...

नयी-नयी शादी, ससुराल से आया हुआ चचेरा साला, संकोच में कुछ कहते नहीं बनता...। एक दिन बीता, दूसरा दिन गया, तीसरा दिन भी ढल गया...। रोज की वही दिनचर्या.... सुबह दोनो का एक साथ ब्रश करना, नाश्ता करना, आगे-पीछे नहाना-धोना, लन्च, डिनर सब कुछ साथ में; और देर रात हो जाने पर... “अब इतनी रात को कहाँ जाओगे, ताऊजी को फोन करदो, यहीं लेट जाओ”

“मैं बगल का कमरा ठीक करा देता हूँ? वहाँ आराम से सो जाओ...” मैने कहा था।

“नहीं-नहीं, किसी को क्यों डिस्टर्ब करेंगे। यहीं सोफ़े पर लेट जाता हूँ। ...या फर्श पर ही गद्दा डाल लिया जाय... ” उसने ‘बेतक़ल्लु्फी’ दिखायी।

“हाँ-हाँ ठीक तो है, यहीं ठीक है।” मेरी पत्नी ने खुशी से ‘इजाजत’ दे दी थी।

यह सब करने में उन दोनो को कोई शर्म या संकोच नहीं था। भाई-बहन का रिश्ता  मेरे सामने ही अन्तरंग दोस्ताना बना रहता, एक दूसरे के बिना उनका मन ही नहीं लगता। अपने ही बेडरूम में अपनी ब्याहता पत्नी के साथ एकान्त क्षण पाने के लिए मैं तरसता रहता। 

धीरे-धीरे मेरा माथा ठनका। मैने उन्हें चेक करना शुरू किया और उन्होंने मुझे टीज़ करना...। मैने उस लड़के के घर वालों से बात की। उन्होंने इस ‘इल्लिसिट रिलेशन’ की बात स्वीकार की लेकिन इसे रोक पाने में अपने को असहाय प्रदर्शित किया। बोले, “हमने लड़की की शादी में इसी उम्मीद से सहयोग किया था कि शायद इसके बाद हमारा लड़का हमारे हाथ में आ जाय। ...लेकिन अफ़सोस है कि वह हमारे हाथ से निकल चुका है।”

फिर मैंने अपने ससुर और साले से कहा। लेकिन उनकी बात से यही लगा कि सबकुछ जानते हुए भी उन्होंने यह शादी बड़े जतन से इस आशा में कर दी थी कि एक बार पति के घर चले जाने के बाद मायके की कहानी समाप्त हो जाएगी और लोक-लाज बची रह जाएगी। ...दुर्भाग्य का यह ठीकरा मेरे ही सिर फूटना लिखा था। मुझे पिछले दो साल में जो ज़लालत और मानसिक कठिनाई झेलनी पड़ी है उसे बयान नहीं कर सकता।

“आपने पता चलने के बाद उस लड़के को घर से बाहर क्यों नहीं कर दिया?” मैंने अपनी व्यग्रता को छिपाते हुए पूछा।

उसने मुझे इसका मौका ही कहाँ दिया...? शुरू-शुरू में तो मैं संकोच कर रहा था। इतने बड़े धोखे की मुझे कल्पना भी नहीं थी। लेकिन जब उनकी गतिविधियाँ पूरी तरह स्पष्ट हो गयीं और आठवें-नौवें दिन जब उन्हें लगा कि असलियत जाहिर हो चुकी है तब वह उस लड़के के साथ अपने सारे जेवर और कीमती सामान गाड़ी में लेकर मायके चली आयी...।

“आजकल जेवर वगैरह तो लॉकर में रख दिए जाते हैं? आपने सबकुछ घर में ही रख छोड़ा था?”

नहीं सर, मैने उससे कीमती जेवर वगैरह पास के ही बैंक लॉकर में रखने को जब भी कहा था तो वह कोई न कोई बहाना बनाकर टाल जाती। अब मुझे लगता है कि सबकुछ योजनाबद्ध था। यहाँ तक की नौकरी मिलने के बाद मेरे पापा ने मेरे नाम से जो गाड़ी बुक करायी थी उसे भी इन लोगों ने कैन्सिल कराकर इसके नाम से रजिस्ट्रेशन कराया जबकि बुकिंग एमाउण्ट का रिफण्ड लेकर हमने इनके खाते में ट्रान्सफर किया था। सारे बैंक रिकॉर्ड मौजूद हैं।

“अभी क्या स्थिति है?”

अब मैं तलाक का मुकदमा लड़ रहा हूँ। फेमिली कोर्ट सुनवायी कर रही है। नियमित हाजिर होकर जल्द से जल्द निपटारा कराना चाहता हूँ ताकि दूसरी शादी कर सकूँ। उसे अब शादी करनी नहीं है इसलिए उन्के द्वारा किसी न किसी बहाने से मामले को लटकाए रखा जा रहा है। ऐसे मामलों की सुनवायी शुरू होने से पहले पत्नी के निर्वाह की धनराशि कोर्ट द्वारा तय की जाती है जो उसके पति को मुकदमें के अन्तिम निस्तारण होने तक प्रति माह अदा करनी पड़ती है। अभी कोर्ट ने मेरे वेतन को ध्यान में रखते हुए ढाई हजार तय किया है। वे लोग इसे बढ़वाना चाहते हैं। इसी लिए ‘पे-स्लिप’ की खोज कर रहे हैं...। अपने वेतन की सूचना तो मैने एफीडेविट पर दी है लेकिन उन्हें विश्वास नहीं है।

पहले उसने मेडिकल जाँच की माँग उठायी। मैने कोर्ट में इसके लिए सहमति दे दी। साथ में यह भी अनुरोध कर दिया कि उसकी भी जाँच होनी चाहिए। यदि उसके अनुसार मैं नपुंसक हूँ तो उसकी वर्जिनिटी भी सिद्ध होनी चाहिए। यदि उसमें नॉर्मल सेक्सुअल एक्टिविटी पायी जाती है तो उसका आधार भी उसे स्पष्ट करना पड़ेगा। इसके बाद उसका दाँव उल्टा पड़ गया है। अब ‘सबकुछ भूलकर साथ रहने को तैयार’ रहने का सन्देश आ रहा है। लेकिन सर, मैं इस नर्क से निकलना चाहता हूँ...।

वह अपने पिता के घर में ही रह रही है। प्रायः उस लड़के के साथ सिविल लाइन्स, मैक्डॉवेल्स, हॉट स्टफ या दूसरे स्पॉट्स पर घूमती और मौज उठाती दिख जाती है। लड़का भी एक सरकारी महकमें में मालदार पोस्ट पर काम करता है।

“उसके पिताजी यह सब करने की उसे अनुमति क्यों देते हैं? उन्हें यह सब कैसे देखा जाता है?”

असल में वह पूरा परिवार ही व्यभिचार और अनैतिक सम्बन्धों के मकड़जाल में उलझा हुआ है। ससुर जी का व्यक्तिगत जीवन भी मौज-मस्ती से भरा रहा है। उनके बड़े भाई का लड़का उनकी बेटी के साथ जिस अन्तरंगता से रहते हुए उनकी छाती पर मूँग दल रहा है उसे अलग करने का नैतिक बल उनके पास नहीं है। सुरा और सुन्दरी उनकी पुरानी कमजोरी रही है। यह सब उनकी लड़की बखूबी जानती है और यही सब देखते हुए बड़ी हुई है। उस लड़के के माँ-बाप ने स्वयं अपनी व्यथा मुझसे बतायी है। उस परिवार में केवल मेरे सगे साले की पत्नी है जो मेरे साथ हुए अन्याय की बात उठाती है। बाकी पूरे कुँए में भाँग मिली हुई है...।

“मुझे जहाँ तक याद है उन लोगों ने दहेज उत्पीड़न का मुकदमा भी कर रखा है। सामान वापस देने और क्षतिपूर्ति के लिए यदि आप तैयार हो जाँय तो क्या निपटारा हो सकता है?” मैने पूछा।

सर, मैं तो कबसे तैयार बैठा हूँ। लेकिन वे लोग बहुत लालची है। सुरसा की तरह उनका मुँह फैलता जा रहा है। मेरा प्रस्ताव है कि जिन लोगों ने यह शादी तय करायी थी, वे दोनो पक्ष के मध्यस्थ एक साथ बैठ जाँय, जो भी दहेज का सामान और रुपया पैसा मिला था उसकी सही-सही सूची बना दें। मैं उससे कुछ ज्यादा ही देकर इस कलंक से छुट्टी पाना चाहता हूँ।

दूसरी शादी के लिए भी उम्र निकल जाएगी तो मैं कहीं का नहीं रहूँगा। उसे तो अब शादी की जरूरत ही नहीं है। वह चाहती है कि मैं उसे अपना आधा वेतन देता रहूँ, पति का नाम बना रहे और वह मायके में रह कर अपने साथी के साथ लिव-इन रिश्ता बनाये रखे। मुकदमा यूँ ही अनन्त काल तक चलता रहे...। (इति)

उसने इस दौरान जाने कितनी कानून की किताबें पढ़ ली हैं कि उसकी हर बात में आइपीसी, सीआरपीसी और सीपीसी की अनेक धाराएं उद्धरित होती रहती हैं। कानूनी पेंचों को वह समझने लगा है और सभी बातों में सतर्कता झलकती है। पीसीएस की तैयारी करके अपने दम पर नौकरी पाने वाले इस युवक की प्रतिभा और अनुशासन पर कोई सन्देह तो वैसे भी नहीं है लेकिन वह ऐसे सन्देह के घेरे में तड़प रहा है जिससे पार पाना मुश्किल जान पड़ता है...।

इतना सब सुनने के बाद मेरा दिमाग शून्य हो गया...। मैं निःशब्द होकर बैठा रहा। यह तय करना मुश्किल है कि कौन सच बोल रहा है और कौन झूठ। आप कुछ निष्कर्ष निकाल पाएं तो जरूर बताएं।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

सोमवार, 20 जुलाई 2009

बच के रहना रे बाबा... जाने कौन कैसा मिल जाय !?!

 

मुझे तो अपने ही ऊपर तरस आ रही थी। कैसे यह सब सुनकर भी मैं उसके लिए कुछ खास नहीं कर पाया था। बेचारी कितनी हिम्मत करके आयी होगी अपना दुखड़ा सुनाने...।

मैं अपने बॉस के पास उनके चैम्बर में बैठा कुछ सरकारी कामकाज पर विचार-विमर्श में तल्लीन था। मई का महीना... बाहर सूर्यदेवता आग उगल रहे थे। कमरे के भीतर आती-जाती बिजली की आँख-मिचौनी के बीच ए.सी. की अधकचरी सेवा मन को उद्विग्न कर रही थी। गर्मी के कारण दफ़्तर में प्रायः सन्नाटा ही था। इसी बीच उसने अपने पिता के साथ कमरे में प्रवेश किया था।

साफ-सुथरे परिधान में पूरा शरीर ढँका हुआ था। पूरी बाँह ढँकने वाला कुर्ता, एड़ियों के नीचे तक पहुँचने वाली सलवार, और गले में लिपटा व सिर को ऊपर तक ढँकने वाला सूती दुपट्टा कान के पीछे करीने से दबाया गया था। कट-शू में पूरी तरह छिपे हुए पाँव उसके नख-शिख आवृत्त होने के सायास उपक्रम की कहानी कह रहे थे। दुग्ध धवल चेहरे पर प्रायः कोई मेक-अप नहीं था। जैसे सोकर उठने के बाद किसी अच्छे फेसवाश से चेहरा धुलकर साफ़ तौलिए से पोंछ लिया गया हो... बस। चेहरे पर असीम गाम्भीर्य और स्थिरता का भाव चस्पा था। निगाहें जमीन की ओर अपलक ताकती हुईं। करीब दो घण्टे की बात-चीत में कुछ सेकेण्ड्‌स के लिए ही नज़र ऊपर उठी होगी।

साथ में जो सज्जन आए थे वे काफी थके-हारे और दुखी दिख रहे थे। चेहरे पर उभरता पसीना जो रुमाल से बार-बार पोंछने के बाद भी छिटक आता। उम्र साठ के पार रही होगी। हमने सोचा शायद पेंशन के फरियादी होंगे जो अपनी बेटी के साथ आए हैं। बिना कुछ बोले कुर्सी पर आराम से बैठ गये। अपने थैले से कुछ कागज निकालने और रखने लगे। जैसे कोई खास कागज दिखाने के लिए ढूँढ रहे हों...।

बॉस ने हमारी बात-चीत बीच में रोककर उनसे आने का प्रयोजन पूछा तो उन्होंने इशारे से कहा कि आपलोग अपनी बात पूरी कर लें और ध्यान से सुनने को तैयार हों तभी वे अपनी बात कहेंगे। हम फौरन उनकी बात सुनने को तैयार हो लिए।

“हमें अमुक विभाग के एक अधिकारी की पे-स्लिप चाहिए...”

“कौन सा अधिकारी? कहाँ काम करता है?”

“आज-कल लखनऊ में ट्रेनिंग ले रहा है...”

“तो पे-स्लिप तो वहीं से मिलेगी, यहाँ से उसकी कोई सूचना कैसे मिल सकती है?”

“वहाँ से नहीं मिल पा रही है, तभी तो ट्रेजरी में आपकी मदद के लिए आए हैं...” पिता का स्वर लाचार सा था।

“किसी भी ट्रेजरी से प्रदेश के सभी अफसरों की पे-स्लिप नहीं मिलती...। ऐसी क्या जरूरत पड़ गयी आपको पे-स्लिप की..? और मिलने में क्या समस्या आ रही है?” बॉस के प्रश्न में हैरानी थी।

इसके बाद उन्होंने जो कहानी सुनायी वह सिर पीट लेने लायक थी।

“हमने इस लड़की की शादी उस अफसर लड़के से की थी। दहेज में काफी रकम खर्च किया था मैने। गाड़ी और जेवर अलग से...। ...लेकिन हमें धोखा हो गया है। ...अब नौबत तलाक की आ गयी है। ...कोर्ट में मुकदमा चल रहा है। उसी सिलसिले में हमें उसकी नौकरी से सम्बन्धित कागजात की जरूरत है” बगल में शान्त बैठी बेटी के बाप की आवाज रुक-रुककर निकल रही थी।

सहसा लड़की ने भी बोलना शुरू कर दिया, “वह झूठ पर झूठ बोल रहा है। हम उसकी असलियत साबित करना चाह रहे हैं लेकिन सरकारी विभाग हमारी मदद नहीं कर रहे हैं।”

हमने पूछा, “आखिर गड़बड़ी क्या हो गयी जो बात तलाक तक पहुँच गयी? ”

इसपर बाप-बेटी दोनो एक दूसरे का मुँह देखने लगे। जैसे यह तय कर रहे हों कि बात खोली जाय कि नहीं...। फिर दोनो ने इशारे से एक-दूसरे को सहमति दी।

imageलड़की ने बड़े इत्मीनान से बताया, “इन-फैक्ट... वो इम्पोटेन्ट है”

यह सुनकर हम सन्न रह गये, “ओफ़्फ़ो... आपलोगों को बड़ा धोखा हुआ!”

“...अगर ऐसा था तो उसे क्या पड़ी थी शादी करने की”, मैने हैरत से कहा और मन में उभर आये अजीब  से भाव को संयत करने के लिए कुर्सी की पीठ पर टेक लेकर छत की ओर निहारने लगा।

...ईश्वर ने इस लड़की को इतना सुन्दर व्यक्तित्व दिया, एक सक्षम पिता के घर जन्म लेकर सुख सुविधाओं में पली बढ़ी, घर वालों ने अच्छे दान-दहेज के साथ एक राजपत्रित अधिकारी के साथ इसका विवाह कर दिया; ...फिर भी बेचारी आज भरी दुपहरी में कोर्ट  कचहरी और सरकारी दफ़्तरों के चक्कर काट रही है। निश्चित्‌ रूप से बुरे ग्रहों का प्रभाव झेल रही है यह...। ...ऐसा दुर्भाग्य जिसकी कल्पना भी न की जा सके!

इस बीच बॉस ने फोन मिलाकर उस ट्रेनिंग इन्स्टीट्यूट के अधिकारियों से बात करनी शुरू कर दी थी। स्वार्थ में अन्धे युवक द्वारा अपनी कमजोरी छिपाकर एक मालदार बाप से दहेज ऐंठने के लालच में एक सुन्दर सुशील कन्या का जीवन नर्क बना देने वाले का परोक्ष रूप से सहयोग करने वालों को भी लानत भेंजी जाने लगी।

मैने भी ‘सूचना का अधिकार कानून (RTI Act)’ के अन्तर्गत पे-स्लिप की सूचना मांगने की सलाह दे दी। इसपर उन्होंने बताया कि वे इसप्रकार के सारे उपाय आजमा चुके हैं। कोई परिणाम नहीं निकला। मैने प्रदेश के ‘सूचना आयुक्त’ से अपील करने को कहा। वहाँ कार्यरत अपने एक मित्र से मदद के लिए फौरन मोबाइल पर बात कर लिया और इन लोगों से परिचय भी करा दिया।

इस काम से मेरे मन को थोड़ी तसल्ली मिली...।

हमने उन दोनो के मुँह से ही शादी तय होने, बारात का भव्य स्वागत सत्कार किए जाने और मोटी दहेज देने के साथ ही साथ लड़की के ससुराल जाने के बाद एक-दो दिन के भीतर उसे अपने दुर्भाग्य की जानकारी होने, संकोच में बात छिपाकर रखने, उस लड़के द्वारा ‘फर्जी नाम से पर्चा बनवाकर’ अनेक डाक्टरों से परामर्श लेने तथा अपनी अक्षमता को छिपाने के प्रयासों का विस्तृत वर्णन सुना। पूरी दास्तान बताने में लड़की ज्यादा मुखर हो उठी थी। उसने कहा कि मैने कोर्ट से इसका मेडिकल टेस्ट कराने की प्रार्थना की है लेकिन वह इससे भग रहा है।

हमने यथासामर्थ्य मदद का आश्वासन देकर उन्हें सहानुभूति पूर्वक विदा किया। उन्होंने भी अपने ठगे जाने की कहानी विस्तार से बताने के बाद हमसे सधन्यवाद विदा लिया।

भाग-दो 

जुलाई की ऊमस भरी गर्मी...। मैं अपने ऑफिस में बैठा कूलर की घर्र-घर्र के बीच चिपचिपे पसीने पर कुढ़ता हुआ सरकारी फाइलों और देयकों (bills) आदि का काम निपटा रहा था। बाहर का मौसम तेज धूप और रुक-रुक कर पड़ते बारिश के छींटो से ऐसा खराब बन गया था कि बहुत मजबूरी में ही बाहर निकला जा सकता था। मेरे कमरे में कोई दूसरा न था।

तभी एक स्मार्ट सा युवक अन्दर आया और मेरी अनुमति लेकर कुर्सी पर बैठ गया। उसका चेहरा कुछ जाना पहचाना लगा...।

(कहानी थोड़ी लम्बी खिंचने वाली है, इसलिए अभी यहीं बन्द करता हूँ। शेष अगली पोस्ट में बहुत शीघ्र...)

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)