हमारी कोशिश है एक ऐसी दुनिया में रचने बसने की जहाँ सत्य सबका साझा हो; और सभी इसकी अभिव्यक्ति में मित्रवत होकर सकारात्मक संसार की रचना करें।

शनिवार, 21 जून 2008

शहद के छत्ते को न छेड़ें श्रीमन्…

साहित्यकार बनाम ब्लॉगर को लेकर अच्छी बहस छिड़ी है। बहुत रोचक विषय पर चर्चा चल पड़ी है। साहित्य की परिभाषा गढ़ने या इसकी औकात बताने की मेरी कोई नीयत नहीं है और न ही मैं ऐसी क्षमता का भ्रम ही पाले बैठा हूँ। किन्तु मेरा मानना है कि सभ्यता के विकास में मनुष्य ने बहुत से कार्य अवसर की उपलब्धता के कारण करना प्रारम्भ कर दिया जो बाद में उसकी जरूरत और फिर आदत में शुमार हो गया।

आखिर सभ्यता के इस विकास के समयानुक्रम में आदमी ने किसी एक समय-बिन्दु पर आग, पत्थर, पहिया, लोहा, धातु, जानवर, गुफ़ा, जंगल, झोपड़ी, कपड़ा, कागज, बारूद, हथियार, बिजली, कंप्यूटर आदि का पहली बार प्रयोग किया होगा। इस प्रथम प्रयोग के बाद ही इसका प्रसार और परिष्कार होता गया होगा और ये साधन हमारे जीवन के अविभाज्य अंग बनते गये होंगे। जो हमारी सभ्यता को उत्कृष्टता की ओर ले जाने में उपयोगी हुआ उसका हमने वरण कर लिया, आत्मसात कर लिया और उसे सर्वसुलभ बनाने की कोशिश की। जो काम लायक नहीं रहा वह इतिहास में पीछे छूट गया। ‘सर्वोत्तम की उत्तरजीविता’ का सिद्धान्त भी कमोबेश यही कुछ कहता है।

साहित्य के क्षेत्र में भी तकनीक और साधन ने युगान्तकारी परिवर्तन किये हैं। लेखनी के प्रयोग से पहले स्रुति-परम्परा फिर हस्तलेखन हेतु भोजपत्र, कागज, पाण्डुलिपि फिर छपाई-मशीन, पुस्तकों और अखबारों का प्रकाशन, कम्प्यूटर और इण्टरनेट के क्रमिक विकास ने साहित्य के सृजन, अध्ययन-अध्यापन व आस्वादन की रीति को लगातार बदला है। ‘साहित्य’ को एक नियत कालखण्ड में एक विशेष माध्यम से रचे और पढ़े गये शब्द समुच्चय तक सीमित कर देना किसी विडम्बना की ओर इशारा करता है।

मेरे एक मित्र ने मजाक में कहा था कि ब्लॉगिंग का चस्का कुछ-कुछ वैसा ही है जैसा नाई को देखकर हजामत बढ़ आने की कहावत में होता है। मतलब इन्टरनेट की सैर करते-करते भाई लोग मुफ़्त में कवि और लेखक बन जाने और प्रत्यक्ष रूप से पाठकों की दाद पा जाने का अवसर हाथ लगने पर झम्म से साहित्य की दुनिया में कूद पड़ते हैं।

वैसे देखा जाय तो इस बात का बुरा नहीं मानना चाहिए। इस सर्वसुलभ साधन का अकुशल प्रयोग करने वालों के होते हुए भी इसके प्रसार और प्रभाव को अब रोका नहीं जा सकता है। और न ही दोयम दर्जा देकर इसके उत्साह को कम किया जा सकता है।

तुलसीदास ने अपनी अमर रचना किसी समालोचक या मूर्धन्य विद्वान को लक्ष्य करके उसकी ‘रिकॉग्नीशन ’ पाने के लिए नहीं लिखी थी, बल्कि स्वान्तःसुखाय तुलसी रघुनाथगाथा का भाव ही प्रधान था।

गोस्वामी तुलसीदास ने अपनी अमर रचना किसी समालोचक या मूर्धन्य विद्वान को लक्ष्य करके उसकी ‘रिकॉग्नीशन ’ पाने के लिए नहीं लिखी थी, बल्कि स्वान्तःसुखाय तुलसी रघुनाथगाथा का भाव ही प्रधान था। लेकिन उनके शब्दों में भाव और लालित्य की वह अविरल धारा फूट निकली कि सारे साहित्यकार पीछे छूट गये।
मैने अनुभव किया है कि ब्लॉग के दरवाजे से अनेक ऐसे हस्ताक्षर भी निकलकर सामने आ रहे हैं जो संकोच में शायद किसी अन्य दरवाजे को खटखटाना भी गँवारा नहीं करते। जबकि उनकी लेखनी में नगीना जड़ा हुआ है।

जंगल में मोर नाचा किसने देखा? होंगे ऐसे मूर्धन्य साहित्यकार किसी विलक्षण रचना के मालिक। लेकिन पढ़ेंगे तो हम वही जो हमारे करीब आयेगा। भौतिक रूप से भी और भाव रूप में भी। प्यासे और कुएं की कहावत अब बेमानी हो गयी लगती है। अबतो घर-घर ‘वाटर-सप्लाई’ की व्यवस्था पर जोर है। ज्यादातर कुएं तो अब केवल मांगलिक कार्यों में पूजा के काम आने लगे हैं। उनका पानी पीने पर बीमारी फैलने का खतरा बताया जाता है।

घर में बैठकर कनाडा में इसी क्षण रचा गया साहित्य तुरंत पढ़ने और दुनिया को उसके बारे में अपनी राय बता देने का जो सुख हमें एक क्लिक करते ही मिल जा रहा है उसे कौन साहित्य चुनौती दे सकेगा?

अस्तु, हे परम्परा के पुरोधा साहित्यकार श्रीमन आइए अपने छोटे किन्तु विकासशील भाई को गले लगाइये। आपके अच्छे गुणों को यह ग्रहण कर लेगा और बदले मे यह दुआ भी करेगा कि आपकी लोकप्रियता में कोई ‘ग्रहण’ न लगने पाए।

शनिवार, 14 जून 2008

एक है हिरमतिया…

प्यार क्या है? इस जटिल प्रश्न का उत्तर कवियों, शायरों, फ़िल्मकारों, अनुभवी प्रेमियों और खालिस विद्वानों ने अपने-अपने ढंग से दिया है। इसके पीछे पड़े बगैर मैं आपको एक ऐसी दास्ताँ सुनाने जा रहा हूँ जहाँ प्यार सिर्फ़ एक कल्पना है, एक अव्यक्त एहसास है, कुछ अस्पष्ट यादें हैं और बाकी आँसू हैं।

यह कोई काल्पनिक कहानी नहीं है। बल्कि आँखों देखी एक सच्ची बात है। मेरे गाँव की। यह कहानी वहाँ रोज चर्चा का विषय बनती है। क्योंकि इसकी नायिका जहाँ-तहाँ घूमती, गाँव की गलियों में, घरों के आँगन में, नुक्कड़ की दुकान पर लोगों के मनोरंजन का केन्द्र बनी लड़की-लड़कों व आदमियों से घिरी दिख जाती है।

इस कहानी के मुख्य पात्र से मेरा परिचय उसकी माँ के माध्यम से हुआ जो मेरे घर बर्तन माँजने आया करती थी। उसकी माँ की उम्र लगभग ५५-६० की रही होगी पर काम के बोझ और अपने पति के हाथों नित्य-प्रति प्रताड़ना व पिटाई से वह ७० से उपर की दिखती थी। हम उसे ‘संताइन’ के नाम से जानते थे। इस महिला का नाम संताइन क्योंकर पड़ा यह मेरे लिये एक अबूझ पहेली सा रहा क्योंकि उसका ‘संत गोंड़’ नामक पति परम नशेड़ी (वस्तुतः गँजेड़ी) रिक्शाचालक था। ऐसे में मास्टराईन, डाक्टराईन वाला फ़ार्मूला उस पर लागू नहीं होना चाहिए था। खैर …

आइये अपने मुख्य पात्र पे आते हैं। संताइन के साथ साए की तरह लिपटी उसकी बेटी ‘हीरमती’। इसकी उम्र करीब २४-२५ साल की होगी लेकिन आजभी उसकी माँ ही उसका खयाल रखती है। संताइन के साथ ही घरों में काम करने वह भी आती थी। उसके हाव-भाव और कपड़े से थोड़े ही समय में मैने यह अनुमान कर लिया कि ‘हीरमती’ मंदबुद्धि है। वैसे यह बात मेरे घर वाले पहले से ही जानते थे और इसका प्रयोग भी चतुराई से करते थे। जैसे एक कप चाय के बदले सब्जी कटवा लेना या इधर-उधर की बातों में उलझा कर घंटों शरीर दबवाना वगैरह-वगैरह…। हीरमती का इस तरह का शोषण सिर्फ़ मेरे ही घर नही होता वरन्‍ पूरा गाँव ही मौके-बेमौके इस मुफ़्त सेवा का लुत्फ़ उठाता था। उसकी उलझी-उलझी बातों का सिर-पैर ढूढने की मेरी सभी कोशिशें बेकार गयीं। तुलसीदास जी को झुठलाती हुई हीरमती एक ही समय में ‘हँसहि, ठठाहिं, फुलावहिं गालू’ की छवि पेश कर देती।

जीवन के २४-२५ बसन्त यूँ ही देख लेने के बाद हीरमती का शरीर इतना विकसित न था कि एक बार में ही नज़र में आ जाए पर इतना अविकसित भी न था कि नज़र ही न आए। वैसे भी गरीब की बेटी की बढ़ती उमर का शोर कुछ जल्दी ही हो जाता है। ऐसे में कभी-कभी अगर यह सुनने को मिल जाता कि आज ‘हिरमतिया’ ने फलाने को मारने के लिये दौड़ा लिया या उसकी माँ ढिमाके को पानी पी-पी कर गरिया रही है तो किसी को कत्तई आश्चर्य नही होता।

गाँव भर की ‘हिरमतिया’ को संताइन हमेशा ‘बबुनवा’ ही कहती। प्यार से अपने दुलारे बेटे को किया जाने वाला संबोधन है यह। इसे सुनने वाले मुँह छिपाकर मुस्कराये बिना नहीं रहते। लेकिन संताइन के लिये उसे अपने खाने से पहले खाना खिलाना, उसकी हर एक बात का समर्थन कर उस मंदबुद्धि लड़की को संतुष्ट रखना बहुत सहज लगता था। ऐसा लगता जैसे संताइन ने मंदबुद्धि बच्चों के साथ रहने और उनकी परवरिश करने की ट्रेनिंग ले रखी है। पर ऐसा नहीं था, यह तो एक अनपढ माँ की नैसर्गिक ममता थी जो बेटी के लिये कुछ भी करने को तैयार थी। हम तथाकथित पढे-लिखे लोग मानसिक रूप से मंद व्यक्तियों से जैसे पेश आते हैं, उसे संताइन के व्यवहार के प्रकाश में देखने पर खुद से शर्म आती है।

दिन ऐसे ही कट रहे थे- संताइन के घर-घर जाकर बर्तन धोते, हीरमती के दूसरों की कुटिल मेहरबानियों की चाय पीते, गाँववालों के घटिया मुफ़्तखोरी और व्यर्थ की चर्चा और ठिठोली करते। शायद ऐसे ही जिन्दगी चलती भी रहती अगर संताइन ने हीरमती की शादी न की होती। लेकिन लोकलाज के भय से माँ ने जवान होती गरीब की बेटी के हाथ पीले करना बेहद जरूरी समझा।

हीरमती की शादी ‘प्रभू’ नाम के एक शख्स से हुई, जो खेती-बाड़ी करने वाला एक साधारण गृहस्थ था। हीरमती की ससुराल मेरे गाँव से कोई पंद्रह किलोमीटर की दूरी पर थी। ये बातें मुझे संताइन के माध्यम से पता चलीं। हीरमती के ससुराल चले जाने के बाद संताइन जब हमारे घर आती तो बहुत उदास दिखती। कभी गुस्से में बड़बड़ाती तो कभी रोने भी लगती। मेरे घर वाले उसे समझाते कि बेटी को विदा तो करना ही पड़ता है। यही उचित कायदा है। यह सुनकर वह चुप हो जाती, हीरमती और उसकी ससुराल का जिक्र छेड़ देती और प्रसन्न हो जाती।

पर शायद विधाता इतने दयालु भी नहीं हैं कि वह संताइन की खुशी को लंबे अरसे तक बनाये रखते । ससुराल जाने के १०वें दिन दुपहर में ही हीरमती अकेले पैदल गाँव लौट आई। आश्चर्य प्रायः किसी को नहीं हुआ। यह तो होना ही था। आखिर पागल लड़की को कोई कब तक बर्दाश्त करता। अलबत्ता उसके पीहर के अनुभवों को जानने का कौतूहल सारे गाँव में फैल गया।

हीरमती अगले ही दिन संताइन के साथ मेरे घर आई। उत्सुकता हम सभी के मन में भी थी। सोच रहे थे कि संताइन आते ही सबकुछ बड़बड़ा के बता देगी पर आज वह बेहद शांत थी। हमने हीरमती से ही पूछा- “बड़ी जल्दी चली आयी ?” उसके चेहरे पर डर उभर आया, बोली- “बड़ा मारत रहले हँ, एही से भाग अइनी हईं”। हीरमती ने ससुराल में हुई अपनी दुर्दशा के बारे में सारी बातें रोते हुए बताया पर वहाँ से भाग आने की अपनी बहादुरी को हँस-हँस कर बताया।

हीरमती के गाँव लौटने के बाद सब कुछ पहले जैसा हो गया। पर हीरमती में एक परिवर्तन आ गया था। उसके भीतर उस एहसास का प्रवेश हो चुका था जिसे पारखी ‘प्रेम’ कहते हैं। एक दिन, एक रात या एक पल का जो प्यार हीरमती को अपने ‘परभू’ से मिला था (कदाचित वासना-प्रधान ही रहा हो) उसने हीरमती को अपने वश में कर लिया था। अब वह सिर्फ़ और सिर्फ़ परभू की बात करती। हिचकी आती तो अपनी माँ से पूछती- “के इयाद करता?” फ़िर खुद ही जवाब देती, “प्रभू इयाद करताड़े”। छींक आती तो प्रभू याद करते, पानी सरक जाता तो प्रभू याद करते, खाना अटक जाता तो प्रभू याद करते, मतलब यह कि हीरमती अब ‘प्रभुमय’ हो चुकी थी। (यहाँ आपको याद दिला दूँ कि प्रभू हीरमती के पति का नाम था कहीं आप इसे ईश्वर न समझ लीजियेगा।)

इधर गाँववालों को एक नया खेल मिल गया था। लोग हीरमती से प्रभू का हाल-चाल पूछते और उसकी बिना सिर-पैर और कल्पना की बातों को सुनकर आनन्द उठाते। घंटों उससे इस आश्वासन पर काम कराते कि प्रभू की चिट्ठी आई है और अभी वह उसे पढ़कर के सुनायेंगे। काम कराने के बाद कुछ भी ऊल-जलूल पढ़ देते और हीरमती पूरे गाँव को बता आती कि ‘परभू के चिट्ठी आइल बा, कहलें हँ आइब, साड़ी अउरी चूड़ी लेकर अइहें’ या ‘देवरा परसों आई’ या ‘ससुई के तबियत खराब बा’। चूंकि गाँव में प्रायः सभी हिरमतिया का मुफ़्त प्रयोग करने के आदी हो चुके थे इसलिये किसी को भी दूसरे का कार्य अनैतिक नहीं लगता।

पर संताइन बेटी को लेकर चिंतित थी। वह उसकी दूसरी शादी कराना चाहती थी। उसने फ़िर से एक बार प्रयास किया। हीरमती एक बार फ़िर दुल्हन बनी, ससुराल गई लेकिन इसबार तीसरे दिन ही लौट आई, शरीर पर चोटों के पर्याप्त निशान लिये। लेकिन बड़ी चोट उसके मन को लगी थी। वह किसी को दिखा भी नहीं सकती थी। अगले दिन उसके ससुराल वाले उसे खोजते हुए आये। उन्होंने बताया कि यह न तो अपने पति के पास रहती है और न ही घर में बैठती है। बार-बार भागने का प्रयास करती है। इसका दिमाग खराब है, हम इसको अपने पास नहीं रख सकते। यह कह कर वे भी चले गये।

हीरमती से भाग आने का कारण पूछने पर उसने जो उत्तर दिया उसकी मैने कल्पना भी न की थी। उसने भाव बिह्वल होकर भींगी आँखों को झुकाकर कहा-‘‘हमार बियाह त परभू से भईल बा, हम केहू दुसरा लगे काहें सूती? एही से भाग अइनी हईं’’।

इस घटना के बाद संताइन ने हीरमती की शादी का प्रयास फ़िर नहीं किया। हीरमती ने प्रभू का जिक्र करना नहीं छोड़ा है। प्रभू कभी हीरमती से मिलने नहीं आया। गाँववालों ने हीरमती का शोषण करना नहीं छोड़ा, बस बहाने बदल गये है। हीरमती को मोबाइल से कस्टमर-केयर पर मिलाकर प्रभू से बात करा दी जाती है। हीरमती इतने पर ही घर के सारे काम कर देती है।

अब हीरमती दुबली-पतली और मलिन हो गई है या थोड़ा और स्पष्ट करें तो बस हाड़ की गठरी रह गई है। संताइन जरावस्था में पहुँचकर और कमजोर हो घर पर पड़ी रहती है। गाँववालों की दया से इन दोनों माँ-बेटी को कुछ खाने को मिल जाता है। पर हीरमती आज भी प्रभू की आस में जी रही है। उसे यह कौन बताये कि उसने दूसरी शादी करके अपना घर बसा लिया है। बताये भी तो वह विश्वास कहाँ करेगी?

हीरमती के लिये प्रभू का नाम एक उम्मीद है, एक इंतजार है, एक खूबसूरत एहसास है, जिसके आलोक में वह जी रही है। शायद प्यार ऐसा ही कुछ होता है।

( यह सत्यकथा बालमन द्वारा लिखी गयी है। )

गुरुवार, 12 जून 2008

लो मैं आ गया…सिर मुड़ा कर!

मेरे दादाजी ने जिस इमर्जेंसी मीटिंग के लिए परिवार के हम सभी सदस्यों को गाँव बुलाया था उसमें पहुँचने में मुझे कुछ घण्टों की देर हो गयी। घर से सबसे अधिक दूरी पर मैं ही जो था। रात भर सड़क मार्ग से यात्रा करने के बाद जब सुबह सपरिवार गाँव मे दाखिल हुआ तो लगभग सभी गाँव वालों को अपने दरवाजे पर इकठ्ठा पाया। अंतिम यात्रा की तैयारी हो रही थी।

हरे बाँस को काटकर डोली बनायी गयी थी। महायात्री को गंगाजल से नहला-धुला कर शुद्ध घी से मालिश कर नया वस्त्र पहनाया गया, सुगन्धित इत्र लगाया गया, स्वर्णादि से आभूषित किया गया। सफ़ेद वस्त्र व पीली चादर में डोली पर विराजमान कर लाल चुनरी से डोली सजा दी गयी। बैण्ड बाजा बजने लगा। स्रिंगा की ध्वनि गूंज उठी। रामनाम के जयघोष के साथ डोली उठ गयी। कहांर बनने की होड़ लगी थी। तीन पुत्र, आठ पौत्र, और छः प्रपौत्र जिनमें नन्हा ‘सत्यार्थ’ शामिल था, इस सुअवसर के लिए उद्यत थे। गाँव के सभी पुरुष, पड़ोस के स्वजन, मित्र, रिश्तेदार, बड़े-बुजुर्ग बारात में शामिल हुए। घर की कुछ औरतों व बेटियों की आखें इस विदाई पर जरूर नम थीं, लेकिन शेष जन-समुदाय स्थिर चित्त हो उत्साहित नजर आ रहा था। विषाद का वातावरण प्रायः नहीं था।

लगभग सौ साल (जन्म सन-१९१० ई.) का पूर्ण जीवन बिताने के बाद ‘बाबाजी’ का महाप्रयाण जैसे पूर्व नियोजित कार्यक्रम के अनुसार हुआ। अन्तिम क्षणों से पूर्व गाय की पूँछ पकड़कर वैतरिणी पार करने का अनुष्ठान, शैय्या-दान व घी के कटोरे में स्वर्णमुद्रा डाल उसमें अपनी छवि देखकर छाया-दान, और परिजनों द्वारा श्रीमद्‍भगवद्‍गीता का पाठ, विष्णूसहस्त्रनाम का जप व सुंदरकाण्ड का गायन। ऐसे वातावरण में जब बाबाजी ने आँखे बंद की थीं तो उस समय उनके चारो ओर अपार जनसमूह इकठ्ठा हो प्रार्थना कर रहा था। जब मैं सुबह पहुँचा तो यह प्रार्थना जारी थी। लोग दूर-दूर से आकर उनका चरण-स्पर्श करते और आँखें बंद कर प्रार्थना करते।

अंतिम विदा के समय परंपरागत नियमों व रूढ़ियों और कर्म-काण्ड का जो सिलसिला शुरू हुआ उसका विस्तार अगले बारह दिनों तक देखने को मिला। अशुद्धि और शोक के प्रधान तत्वों को परिलक्षित करता यह ‘सूतक’ पखवारा मेरे लिए किसी ‘मेण्टल-एडवेंचर’ से कम नहीं था। परिवार के सदस्य जैसे किसी अभिशाप से ग्रस्त हो गये हों। प्रायश्चित स्वरूप उन्हें अपने आहार-व्यवहार में कठिन नियमों का पालन करना था। दिनभर निराहार या अल्प फ़लाहार, गो-धूलि बेला में हल्दी-तेल-मशाला से रहित सादा-फीका भोजन, कठोर बिस्तर और ग्रामीण विद्युत आपूर्ति की बदहाल व्यवस्था के बीच गर्मी, ऊमस और मच्छरों का साथ। घर से बाहर स्नान करने का नियम औरतों को भी कड़ाई से पालन करना था।

यह सब भोगकर मुझे एक तरफ अपनी दर्शनशास्त्र की किताबों में लिखी धार्मिक आस्था की अतार्किकता संबन्धी विश्लेषण याद आते तो दूसरी ओर बाबाजी की आत्मा की शान्ति के लिए परिजनों द्वारा पूरी आस्था व विश्वास के साथ पुरोहित द्वारा बताये गये कठिन नियमों के अक्षरशः पालन करने की तत्परता देखकर मन में एक स्वतःस्फूर्त आस्था पैदा हो जाती। सारा दर्शन ताकता रह गया। मैं अपनी पढ़ाई और ज्ञान मन में दबाए रह गया कि ईसा पूर्व छठी-सातवीं सदी में हिन्दू धर्म में प्रचलित कठिन कर्म-काण्डों की वजह से एक आम गृहस्थ पुरोहितों के हाथों किस प्रकार शोषित व प्रताड़ित होता था। मृतक की आत्मा को प्रेत-योनि से छुटकारा दिलाने और पितरों को बैकुण्ठ पहुंचाने के फेर में पड़कर कैसे गरीब परिवार लोभी पुरोहितों के हाथों अपना सर्वस्व लुटा कर भी उन्हें तृप्त नहीं कर पाते थे। मृत्युलोक में जीवनपर्यंत भयंकर पाप व दुष्कर्म करने वाले धनवान सेठ साहुकार, राजे-महराजे व जमींदार किस प्रकार पुरोहितों की निष्ठा खरीदकर खर्चीले यज्ञ-अनुष्ठान व कर्म-काण्ड के बल पर अपने स्वर्गलोक वासी होने के प्रति आश्वस्त हो जाते थे।

हमारे देश में हर प्रकार की मान्यताओं, रूढ़ियों, पंथों और स्वतन्त्र इच्छाओं की पूर्ति का सुभीता है। लेकिन हम अपनी परम्परा छोड़कर कुछ नया आजमाने में डरते हैं। जाने क्यों? शायद हजारों-हजार साल से चली आ रही बातों को छोड़ने पर मझधार में अटक जाने का भय हमें रोकता है।

मैने पढ़ा था कि इन्हीं कर्म-काण्डों की जंजीर में जकड़े हिन्दूधर्म से आजिज आकर विद्रोह स्वरूप बौद्ध व जैन धर्मों का अभ्युदय हुआ। अनेक रूढ़ियों व विकृतियों से बाहर निकलकर महात्मा बुद्ध और भगवान महावीर के उपदेशों के मुक्त आकाश व खुली हवा में साँस लेकर तत्कालीन समाज के बहुतेरे लोगों ने वैदिक धर्म का त्याग कर दिया था और सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह, अस्तेय, और ब्रह्मचर्य के नियमों पर आधारित धर्म का वरण कर लिया था।

वैदिक धर्म की पुनर्स्थापना आठवीं-नौवीं सदी में आदि-शंकराचार्य के प्रयास से तब हुई जब उन्होने अद्वैत वेदान्त का प्रतिपादन कर यह उद्‍घोष किया-
ब्रह्मसत्यं जगन्मिथ्या, जीवोब्रह्मैवनापरः।
(ब्रह्म सत्य है, जगत मिथ्या है, और जीवात्मा ब्रह्म से भिन्न नहीं है।)

संसार को मिथ्या बताकर इसमें व्यवहृत समस्त आडम्बरों को समाप्त करने का मार्ग शंकर के दर्शन से प्रशस्त हुआ। उन्होने गीता की व्याख्या कर भारतीय दार्शनिक परम्परा के सर्वमान्य कर्मसिद्धान्त को स्पष्ट किया जिससे जीवन में वास्तविक सद्‍कर्मों के पालन का महत्व रेखांकित हुआ। इस समय तक बौद्ध मठों में भी प्रायः वही आडम्बर व कुरीतियाँ फैल चुकी थीं जिनके विरुद्ध कभी इनका विकास हुआ था। परिणाम स्वरूप कालचक्र का पहिया पूरा घूम गया। फिरसे वैदिक धर्म के प्रति आस्था जमने लगी। आज के बहुलवादी समाज (pluralist society) में ये सारे तत्व न्यूनाधिक मात्रा में यत्र-तत्र मिल जायेंगे।

मैंने ‘सूतक’ के दौरान घर के बड़ों द्वारा बताये गये नियमों का यथा-सामर्थ्य पालन किया और कर्म-काण्ड विशेषज्ञ पुरोहित ‘शास्त्रीजी’ द्वारा पं. लालबिहारी मिश्र लिखित व गीताप्रेस से छपी अन्त्यकर्म श्राद्ध प्रकाश के अनुसार पिण्डदान के असंख्य चरणों में अपने पूज्य पितामह के नाम के आगे ‘प्रेत’ शब्द जोड़कर उसके निवृत्यार्थ किए जा रहे अनुष्ठान को कलेजे पर पत्थर रखकर देखता रहा। उस शब्द का उच्चारण मात्र हमारे सीने में नश्तर चुभोता रहा और हम भीरुता से सब कुछ सहते रहे।

हमारे देश में हर प्रकार की मान्यताओं, रूढ़ियों, पंथों और स्वतन्त्र इच्छाओं की पूर्ति का सुभीता है। लेकिन हम अपनी परम्परा छोड़कर कुछ नया आजमाने में डरते हैं। जाने क्यों? शायद हजारों-हजार साल से चली आ रही बातों को छोड़ने पर मझधार में अटक जाने का भय हमें रोकता है।

दसवें दिन घर के सभी मर्दों ने एकसाथ बाग में जाकर अपना सर मुड़वाया। वहीं बोरिंग पर सामूहिक स्नान हुआ, जनेऊ बदला गया, मेरे पिताजी ( दगहा, होता) ने अशौच के बाद सफ़ेद वस्त्र में पहली बार घर में प्रवेश किया। पहली बार हमने घर के भीतर सामूहिक रूप से अन्न ग्रहण किया। ग्यारहवें व बारहवें दिन का कार्यक्रम अत्यंत विस्तृत और थकाने वाला था। उसका विवरण देना आवश्यक नहीं है। आखिर में ब्रह्मभोज की बड़ी दावत के साथ सूतक पखवारे का समापन हुआ।

दूर-दूर से आये रिश्तेदारों में से कुछ तो मेरे लिए भी अपरिचित थे। तीन-चार पीढ़ी पुराने रिश्तों के कुछ वर्तमान वंशजों से मेरा पहली बार मिलना एक अचंभित करने वाला अनुभव था। सभी को ससम्मान विदा करने के बाद हमें अपनी नौकरी की सुधि आयी। अर्जित अवकाश पूरा हुआ। इस अवकाश में हम अति व्यस्त रहे। बिलकुल नया अनुभव अर्जित किया। हमने दादाजी का स्थूल रूप खो दिया किन्तु सूक्ष्म रूप में वे हमारे हृदय में बस गये हैं। तभी तो हम वापस आए हैं
– सिर मुड़ा कर।